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सर्दी में रखें खाना गरम और ताजा

सर्दी में खाने का मजा दोगुना हो जाता है जब वह ताजा और गरमागरम हो लेकिन सर्दी में खाना जल्दी ही ठंडा हो जाता है. घर पर हैं तो गरम कर लेते हैं लेकिन खाना पैक कर के ले जाए तो ठंडा खाना खा तो लेते हैं लेकिन स्वाद में वह बात नहीं रह जाती.

इस समस्या का हल है हमारे पास. आइए जानें सर्दी में खाने को ताजा और गरम खाने के लिए किस तरह के कंटेनर का उपयोग कर सकते हैं ताकि आप के खाने का स्वाद सदैव सुरक्षित और स्वादिष्ठ रहे.

थर्मल इंसुलेटेड डिब्बा : थर्मल इंसुलेटेड डिब्बे खाने को गरम रखने के लिए उपयोगी होते हैं. इस में खाने की गरमी को बनाए रखने के लिए थर्मल इंसुलेशन होता है.

वुडन बौक्स : ये डिब्बे गरमी को दिनभर बनाए रखते हैं और इस कारण खाना गरम रहता है.

एल्यूमिनियम फौयल बौक्स :एल्यूमिनियम फौयल डिब्बा भी अच्छा औप्शन है, खासकर जब आप खाने को बाहर ले जा रहे होते हैं. इस के बारे में एक चीज ध्यान देने की है कि इसे अच्छी तरह से सील करें ताकि गरमी बनी रहे और खाने की ताजगी बनी रहे.

इलैक्ट्रिक थर्मस : इलैक्ट्रिक थर्मस खाने को लंबे समय तक गरम रखने के लिए उपयोगी हो सकते हैं. इन में खाने को गरमी दी जा सकती है और वे खाने की ताजगी बनाए रखते हैं.

प्लास्टिक थर्मोस बौक्स : इन्हें विशेष तरीके से डिजाइन किया जाता है, जिस से खाना गरम रहता है. ये डिब्बे आसानी से साफ किए जा सकते हैं और प्रयोग में भी सुरक्षित होते हैं.

इंसुलेटेड बौक्स : इन बौक्स में खाद्य को ताजगी और गरमी में बनाए रखने के लिए इंसुलेशन लीनिंग होती है जिस से खाना गरम और ताजा रहता है.

डबल लेयर स्टेनलैस स्टील बौक्स : डबल लेयर की वजह से इस में खाना गरम और ताजा रखा जा सकता है.

थर्मस फ्लास्क : यह उपकरण गरम पानी, चाय और खाने को गरम रखने के लिए बहुत ही अच्छा होता है. यह खाद्य को तापमान के साथ रखने का काम करता है ताकि आप बाहरी तापमान के बदलाव के बिना खाने का आनंद ले सकें.

इंसुलेटेड थर्मल पाउच : ये पाउच खाद्य को गरम रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं और इन्हें आसानी से बहुत लंबे समय तक गरम रख सकते हैं.

वैक्यूम इंसुलेटेड कंटेनर्स : ये कंटेनर्स खाद्य को बिना तापमान के बदले गरम और ताजगी में बनाए रखने के लिए वैक्यूम तकनीक का उपयोग करते हैं.

इंडक्शन वार्मर्स : इंडक्शन वार्मर्स खाद्य को गरम रखने के लिए इंडक्शन कुकटौप की मदद से काम करते हैं, जिस से खाने का जलने का खतरा कम होता है.

स्मार्ट खाद्य कंटेनर्स : कुछ खास खाद्य कंटेनर्स आप को खाद्य के तापमान को नियंत्रित करने और सैट करने की सुविधा प्रदान करते हैं जिस से आप खाद्य को बरतन में ही गरम और ताजगी को बनाए रख सकते हैं.

इलैक्ट्रिक हौट प्लेट्स : इन प्लेट्स का उपयोग खाद्य को गरम रखने के लिए किया जा सकता है.

आप इन औप्शंस में से किसी का भी चयन कर के अपने खाने को गरम और स्वादिष्ठ बना कर रख सकते हैं और सर्दी में अपने पसंदीदा खाने का आनंद ले सकते हैं. याद रखें कि खाने को गरम रखते समय पैकिंग का भी महत्त्वपूर्ण रोल होता है.

डिब्बे और बरतन को ध्यानपूर्वक बंद करें ताकि गरमी बनी रहे. आप डिब्बों, बरतनों और थर्मस को पूर्व गरम कर के खाने को गरम रख सकते हैं. आप का डिब्बे और बरतनों को साफ और सुरक्षित रखने के लिए उपयोग से पहले उन्हें अच्छी तरह से साफ करना महत्त्वपूर्ण है.

कुछ प्रमुख ब्रैंड

इस प्रकार के उत्पादों के संबंध में बाजार में कुछ प्रमुख ब्रैंड हैं :

मिल्टन : यह एक प्रसिद्ध ब्रैंड है जो थर्मस फ्लास्क और वैक्यूम इंसुलेटेड खाद्य जौर्म्स के लिए जाना जाता है.

सेलो : थर्मल कंटेनर्स के लिए जाना जाता है.

स्टैनली : यह ब्रैंड अपने ड्यूरेबल थर्मस कंटेनर्स के लिए जाना जाता है जो सर्दी के सूप, स्ट्यू और अन्य गरम भोजन को गरम रखने के लिए उपयुक्त होते हैं.

बोरोसिल : ये एयर टाइट ग्लास कंटेनर के लिए प्रसिद्ध हैं.

रोटी गरम रखने के लिए

बाजार में रोटी को गरम और ताजगी में बनाए रखने के लिए कई प्रकार के उत्पाद और कंटेनर उपलब्ध हैं :

रोटी बौक्स : ये खास डिजाइन किए कंटेनर होते हैं जिन में थर्मल इंसुलेशन होता है.

रोटी वार्मर : ये इलैक्ट्रिक वार्मर्स होते हैं जो रोटी को गरम रखने के लिए उपयोगी होते हैं. आप इन्हें रोटी बौक्स के अंदर रख सकते हैं ताकि वे गरम बनी रहें.

रोटी कवर : ये एक प्रकार का छावन होता है जिस के अंदर रख कर रोटी गरम और ताजा बनी रहती है.

रोटी बौक्स कौंबो : कुछ ब्रैंड्स रोटी को गरम रखने के लिए रोटी बौक्स कम्बो प्रदान करते हैं जिन में रोटी बौक्स के साथ एक इलैक्ट्रिक वार्मर भी शामिल होता है.

रोटी वार्मर बैग : बाजार में ये वार्मर बैग भी उपलब्ध हैं जिन में रोटी रख सकते हैं ताकि उन की ताजगी बनी रहे.

मुझे अपना जीवन निरर्थक लगने लगा है, बताएं कि मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं कालेज में पढ़ने वाला युवा हूं. लगता है कि घर से कालेज जाना ही मेरे जीवन में रह गया है. वैसे घर में कोई परेशानी नहीं है. लेकिन कुछ है जो मुझे अंदर ही अंदर कचोट रहा है और जीवन उदासीनता की तरफ बढ़ रहा है.

मातापिता को जैसे मेरे जीवन में कोई रुचि नहीं है. भाईबहन अपने दोस्तों में व्यस्त रहते हैं. दोस्तों को ट्रैंड फौलो करने से फुरसत नहीं, जो मेरा हाल पूछें. अकेलापन मुझे अवसादग्रस्त कर रहा है. मुझे अपना जीवन निरर्थक लगने लगा है. मेरी बातें सुनने वाला कोई है ही नहीं. क्या मुझे सभी से बात करनी चाहिए, क्या कोई मेरी बात समझेगा?

जवाब 

बदलते समय के साथ रिश्ते बदल चुके हैं, इस में दोराय नहीं है. मातापिता हों या भाईबहन, वे आप को निजी कारणों से समय नहीं देते, जो कि गलत भी है. आप को अपने मातापिता से बात करनी ही चाहिए. हो सकता है कि उन्हें लग रहा हो कि वे आप को स्पेस दे रहे हैं और इसीलिए आप के अकेलेपन को समझ न पा रहे हों. वे बातें कर रहे हों तो आप भी उन के साथ बैठ कर बातें कीजिए, अपना समय भी उन्हें दीजिए.

अकसर भाईबहन एकदूसरे से लड़ते झगड़ते रहते हैं, आप उन की मनपसंद चीजों में रुचि लें तो आप के बीच सौहार्द की और दोस्ती की नई शुरुआत हो सकती है. और रही बात दोस्तों की, तो आप उन्हें अपने डिप्रैशन के विषय में बताइए, वे अवश्य ही आप को समय देना, टैं्रड फौलो करने से ज्यादा जरूरी समझेंगे. यदि वे ऐसा नहीं करते तो आप खुद ही समझदार हैं कि आप को किन दोस्तों की जरूरत है और किन की नहीं.

अपनी अपनी नजर : जीवन को देखने का नजरिया

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मोहन यादव की नियुक्ति : तो इसलिए भाजपा का हो रहा कांग्रेसीकरण

मध्यप्रदेश की राजनीति यादवों के इर्दगिर्द इस चुनाव के दौरान कहीं भी नहीं दिखी थी जिस का खमियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा. यह अब डाक्टर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद समझ आ रहा है. बिलाशक यह चौंका देने वाले फैसलों की एक और कड़ी है जिस के माने अच्छेअच्छों की समझ नहीं आ रहे.

अरुण यादव कांग्रेस का एक बड़ा नाम और चेहरा है जो चुनाव के दौरान गायब रहा. उन के पिता सुभाष यादव मध्यप्रदेश के उप मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्हें अपने दौर के कद्दावर ठाकुर नेता अर्जुन सिंह आगे लाए थे. निमाड़ इलाके में खासा दखल रखने वाले अरुण यादव को नतीजों के बाद सोनिया, राहुल गांधी ने तलब किया तो राजनातिक विश्लेषकों ने यह अंदाजा गलत नहीं लगाया कि अब कांग्रेस को वापस पिछड़े वर्ग की तरफ लौटना पड़ेगा, खासतौर से यादवों की तरफ जिन की प्रदेश में 12 फीसदी आबादी है.

लेकिन भाजपा ने नतीजों से सबक लेते हुए मोहन यादव को प्रदेश की कमान देते हुए एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं जिन में से पहला और अहम दिग्गजों की कलह को पनपने से रोकने का है. अब प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर सहित शिवराज सिंह चौहान को भी कोई दिक्कत नहीं है. हालांकि इन में से खुश कोई नहीं है लेकिन बहुत ज्यादा दुखी भी कोई नहीं है. अगर कोई दुखी है, तो उस का इजहार लोकसभा चुनाव के वक्त वह कर सकता है.

58 वर्षीय मोहन यादव आरएसएस के अखाड़े के पहलवान हैं जिन के तलवार लहराते वीडियो शपथ लेने के पहले से वायरल होने लगे थे. उज्जैन के रहने वाले मोहन यादव भी मामूली खातेपीते घर के हैं जिन्होंने अपने नाम की घोषणा के साथ ही महाकाल के साथसाथ नरेंद्र मोदी का भी आभार व्यक्त किया. पुराने दिग्गजों को किनारे करते जो नई टीम नरेंद्र मोदी गढ़ रहे हैं एक तरह से मोहन यादव उस के वाइस कैप्टन हैं.

अब भाजपा ने खुद को इस आरोप से भी मुक्त कर लिया है कि वह यादवों से परहेज करती है. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी यादव को अब थोड़ा सतर्क रहना पड़ेगा क्योंकि भाजपा इन राज्यों में दूसरीतीसरी पंक्ति के यादव नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं को हवा देगी. मोहन यादव की ताजपोशी यादव कुनबे में सेंध लगाने का आगाज भी है.

नई पीढ़ी के मोहन यादव की तरह शिक्षित हो चले यादव यह दाना नहीं चुगेंगे, इस सवाल के जवाब में न कहने की कोई वजह नहीं, जिन में कास्ट फीलिंग कूटकूट कर भरी है. अब इन की निष्ठाएं हिंदुत्व के चलते बदल भी सकती हैं. ठीक वैसे ही जैसे दलितों और आदिवासियों की बदल रही हैं. यह और बात है कि हालफिलहाल इस बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा कि ये युवा भी बड़े पैमाने पर धर्मांधता का भी शिकार हो सकते हैं.

उत्तर प्रदेश में जो यादव कांग्रेस और जनसंघ का वोटबैंक हुआ करता था उसे 80 के दशक से ही मुलायम ने इकट्ठा करना शरू कर दिया था जिस के दम पर सपा ने वहां राज भी किया लेकिन इस दौरान जातिगत राजनीति में आए बदलावों के नएनए समीकरणों में ब्राह्मण-ठाकुर भाजपा के होते गए. बनिए और कायस्थ तो उस के साथ पहले से थे ही.

संघ परिवार की नई बिरादरी 

तीनों राज्यों में भाजपा को खासा और अप्रत्याशित बहुमत मिला है जिस के चलते वह नएनए प्रयोग करने का जोखिम भी उठा रही है. तेजी से यह सवाल भी सियासी गलियारों में पूछा जा रहा है कि अगर मोहन यादव और विष्णु साय जैसों के पीछे नरेंद्र मोदी हैं तो उन के पीछे कौन हैं जो वर्णव्यवस्था का नया स्ट्रक्चर खड़ा कर रहा है. यह ढांचा ठीक वैसा ही है जो कभी कांग्रेस के दौर में इंदिरा गांधी ने खड़ा किया था.

नरेंद्र मोदी के पीछे आरएसएस है जिस के मुखिया मोहन भागवत 5 वर्षों से जातिगत एकता का राग आलापते रहे हैं. इसी साल जब उन्होंने यह कहा था कि जातियां ब्राह्मणों ने गढ़ी हैं तो देशभर के ब्राह्मणों ने आसमान सिर पर उठा लिया था और उन से `सौरी` बुलवा कर ही दम लिया था.

कहने का मतलब यह नहीं कि भगवा गैंग छोटी जातियों को बराबरी का दर्जा देने को तैयार हो गई बल्कि हो यह रहा है कि वह ब्राह्मणों को यह मेसेज दे रही है कि अगर वर्चस्व बनाए रखना है तो इन नए पुरोहितों को उन की आबादी के मुताबिक हिस्सा तो देना ही पड़ेगा. राज और दबदबा धर्म का ही रहेगा, यह गारंटी मोदी के जरिए दी और दिलवाई जा रही है. अयोध्या में 22 जनवरी को जो भव्य आयोजन होगा उस में सारे धार्मिक सूत्र श्रेष्ठि वर्ग के हाथों में ही रहेंगे.

‘जिस की जितनी आबादी उतनी उस की भागीदारी’ वाला कांशीराम का फार्मूला अब कम से कम सियासी गलियारों में चलता दिख रहा है लेकिन प्रशासन सवर्णों के हाथों में सिमट रहा है ऐसे में राहुल गांधी के यह पूछने के माने खत्म हो जाते हैं कि इतने और उतने सैक्रेट्री ओबीसी के हैं तो बताओ उन के हाथ में है क्या.

उन के हाथ में अब कुछ राज्यों की सत्ता है जिस के लिए वे खाकी नेकर पहन कर नव हिंदुत्व के पैरोकार बन रहे हैं तो चिंता अब कांग्रेस, सपा और जेडीयू जैसे दलों को करना चाहिए कि उन की असल लड़ाई है किस से और 2024 में किस की भूमिका क्या होगी? मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश यादव ने बुदेलखंड की खूब ख़ाक छानी थी लेकिन उन्हें मिला कुछ नहीं, उलटे सपा ऐतिहासिक दुर्गति का शिकार हो कर रह गई.

कमलनाथ ने बेहद अपमानजनक तरीके से अखिलेश यादव के बारे में कहा था कि ये अखिलेश वखिलेश कौन. तभी समझने वालों की समझ आ गया था कि यादवों के स्वाभिमान को ठेस लगी है. चूंकि सपा की दुर्गति का आभास यादवों को था इसलिए वे भाजपा को वोट दे आए.

उन के इस फैसले पर अब भाजपा ने मोहर लगा दी है तो सभी सकपकाए हुए हैं और गलती अभी भी इसे सियासी नजरिए से देखने की ही कर रहे हैं. जरूरत इस बात की है कि इस और ऐसे फैसलों को सामाजिक नजरिए से देखा जाए कि वर्णव्यवस्था का यह नया स्वरूप पिछड़ों को पिछड़ा रखने के लिए ही है.

योगी के सुशासन और अपराधमुक्त प्रदेश के दावे पर करारी चोट है चलती कार में गैंगरेप

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले सुशासन और अपराधमुक्त प्रदेश बना लेने के बड़ेबड़े दावे करते रहें मगर हकीकत यह है कि प्रदेश में न तो सुशासन है, न पुलिस का कोई डर है. अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि दिनदहाड़े लड़की को कार में घसीट लिया जाता है. ट्रैफिक से भरी सड़कों पर कार में ही उस के साथ गैंगरेप किया जाता है. 6 थानाक्षेत्रों से हो कर कार गुजरती है.लखनऊ से ले कर बाराबंकी तक कोई 20 किलोमीटर के रास्ते पर भागती गाड़ी पर किसी पुलिसकर्मी की नजर नहीं पड़ती जिस में एक बच्ची अपनी इज्जत बचाने की कोशिश में चीख रही थी, दरिंदों से लड़ रही थी.

उत्तर प्रदेश की राजधानी में एक सेवानिवृत्त अफसर की बेटी से चलती कार में सामूहिक बलात्कार हो रहा था और पुलिस सो रही थी. 22 साल की अनुजा (परिवर्तित नाम) लखनऊ के किंग जौर्ज मैडिकल कालेज में अपने इलाज के सिलसिले में जाती थी. उस को कुछ मानसिक समस्या थी जिस का ट्रीटमैंट मानसिक रोग विभाग में चल रहा था. वह अकसर वहां जाती थी. कई बार भीड़ होने के कारण बाहर चाय की दुकान पर बैठ जाती थी. इस बीच वहां काम करने वाले मड़ियांव के सत्यम मिश्र से उस की जानपहचान हो गई. 5 दिसंबर को अनुजा इलाज के लिए अस्पताल गई और डाक्टर को दिखाने के बाद वह सत्यम की दुकान पर चाय पीने लगी.

इस दौरान उस का मोबाइल फोन बंद हो गया. अनुजा ने सत्यम से कहा तो उस ने बाजारखाला के मो. असलम (चालक) की एंबुलेंस में उस का मोबाइल फोन चार्जिंग पर लगवा दिया. कुछ देर बाद अनुजा ने अपना फोन मांगा तो सत्यम ने कहा कि चालक एंबुलेंस ले कर डालीगंज चला गया है. सत्यम ने अनुजा को बातों में फंसा कर उस को ईरिकशे से डालीगंज ले आया. वहां उस ने किसी को फोन किया और अनुजा से कहा कि एंबुलेंस आईटी चौराहे पर है.

दोनों आईटी चौराहे पहुंचे.वहां अनुजा को उस का मोबाइल फोन दिलाया मगर तभी 2 लड़के – मो. सुहैल और असलम एक वैगनार कार से वहां आए और उन्होंने सत्यम और अनुजा को कार में यह कह कर बैठा लिया कि वे उन्हें मैडिकल कालेज छोड़ देंगे. इस के बाद कार तेजी से सड़क पर भागने लगी.

केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास से आरोपियों ने 5 कैन बियर के खरीदे. लखनऊ की सीमा से निकल कर कार बाराबंकी के सफेदाबाद स्थित एक ढाबे पर पहुंची. वहां उन लोगों ने खाना खाया. सत्यम लगातार अनुजा को बातों में उलझाए रहा. ढाबे पर ही उन लोगों ने अनुजा को जबरन कोई नशीला पदार्थ पिलाया. जब वह नशे में हो गई तो उसे कार में डाल कर तीनों ने चलती कार में एक के बाद एक उस का बलात्कार किया. अनुजा नशे के बावजूद चीखती रही,खुद को बचाने के लिए लड़ती रही लेकिन दरिंदों ने उस को छोड़ा नहीं बल्कि उस की पिटाई भी की.

पहले लखनऊ से बाराबंकी तक और फिर बाराबंकी से ले कर लखनऊ तक कोई 20-25 किलोमीटर तक यह कार सड़क पर दौड़ती रही. वे युवक युवती से दरिंदगी करते रहे. उस का नग्न वीडियो बनाया और अंत में मुंशी पुलिया पर कार रोक कर तीनों बलात्कारियों ने रात साढ़े बारह बजे अनुजा को सड़क पर फेंका और निकल भागे.

यह घटना है 5 दिसंबर की. बाराबंकी के सफेदाबाद से ले कर मुंशी पुलिया तक 20 किलोमीटर की दूरी में कई थाने और पुलिस चौकियां हैं. सड़क पर अगर कहीं भी पुलिस सक्रिय होती, तो नशे में 7 घंटे तक कार दौड़ा रहे आरोपी उसी समय पकड़ में आ जाते. लेकिन प्रदेश पुलिस सो रही थी. प्रदेश के पुलिस कमिश्नर योगी सरकार की जयजय कार करते हुए अपराधमुक्त प्रदेश का बिगुल फूंकते हैं, जगहजगह बैरिकेटिंग, पिकेट, चैकिंग और मुस्तैदी का ढोल पीटते हैं मगर सचाई इस के बिलकुल उलट है.

अनुजा काफी डरीसहमी थी. मुंशी पुलिया से वह किसी तरह अपनी एक सहेली के घर पहुंची और उस को सारी बात बताई. फिर किसी तरह अपने घर पहुंची. इस के बाद रविवार को उस ने हिम्मत जुटाई और सारी बात परिवारजनों को बताई. इस के बाद तीनों आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और तीनों को पकड़ा गया.

अनोखी शादी : न लिया दहेज, न ही बुलाए पंडेपुजारी

हाल ही में धार्मिक रस्मों को नजरअंदाज कर बिहार के जमुई में एक युवा जोड़े ने बगैर दहेज के शादी रचाई. इस शादी में न दहेज का लेनदेन हुआ, न ही बैंडबाजा, बाराती दिखे और न ही पंडित या पुरोहित ही. संविधान का शपथ ले कर आशीष नारायण और निशा कुमारी शादी के बंधन में बंध गए. इस तरीके से शादी करने का निर्णय दोनों ने खुद लिया था.

अलग सोच

यह अनोखी शादी बीते 28 नवंबर को जमुई के एक विवाह भवन में संपन्न हुई. शादी के बंधन में बंधे सरकारी आईटीआई कालेज में पढ़ाने वाले इंजीनियरिंग में एमटेक पास आशीष और एमकौम कर रही निशा की सोच इस मामले में कुछ अलग दिखी.

इन्होंने परंपरा से अलग अपने दिमाग की सुन कर इस शादी को अंजाम दिया जिस में न तो वैदिक मंत्रोच्चारण हुआ और न ही अग्नि को साक्षी मान कर दूल्हादुलहन ने सात फेरे लिए.

दूल्हादुलहन ने एकदूसरे को माला पहनाने के बाद संविधान के विवाह विशेष अधिनियम 1954 के तहत शपथ ली और शादी के बंधन में बंध गए.

संविधान की शपथ क्यों

अपनी इस शादी के बारे में दूल्हे आशीष नारायण का कहना था कि पतिपत्नी के बीच अगर किसी तरह का विवाद होता है तो अदालत में मंत्र और अग्नि की गवाही नहीं होती. विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अनुसार उन्होंने प्रेम और आपसी संबंध के साथ स्वतंत्र रूप से एकदूसरे के विचारों को सहर्ष स्वीकार किया है.

अगर भविष्य में इन दोनों के बीच कुछ विवाद होता है तो उस के समाधान के लिए कोर्ट और कानून का सहारा लेना पड़ता है. यही कारण है कि उन्होंने संविधान का शपथ ले कर शादी करने का निर्णय लिया है.

फुजूलखर्ची से बचने के लिए

आशीष नारायण के अनुसार, उस ने इस शादी में लड़की वालों से किसी तरह की दहेज की मांग नहीं की थी. अगर लड़की वालों ने उपहार दिए भी तो अपनी बेटी को अपनी इच्छा से दिए. शादी के बंधन में बंधी निशा कुमारी ने बताया कि फुजूलखर्ची और आडंबर से बचने के लिए उन्होंने सोचसमझ कर इस तरीके को अपनाया, जिस से दोनों खुश हैं.

इस बीच 1 दिसंबर को हरियाणा के जींद में भी बिना दहेज की शादी हुई. कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों को पौधे बांटे गए और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया.

मिसाल बन गई शादी

जींद की हाऊसिंग बोर्ड कालोनी निवासी नरेंद्र के लैक्चरर बेटे डा. सुनील बूरा ने बिना दहेज की शादी कर मिशाल पेश की तो शादी के कार्यक्रम में आने वाले सभी मेहमानों को पौधे भेंट कर पर्यावरण सरंक्षण का भी संदेश दिया.

डा. सुनील ने बहुत ही साधारण तरीके से बिना किसी शोर शराबे के हिंदू रीतिरिवाजों के साथ डा. श्वेता के साथ शादी की और शादी में किसी तरह का दानदहेज नहीं लिया.

शहर में आयोजित कार्यक्रम में जहां जानपहचान वालों को दावत दी गई, तो वहीं गरीबों को खाना खिलाया गया. शहर में कई सार्वजनिक जगहों पर पौधे रखवाए गए. शादी के कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों को भी पौधे भेंट किए गए.

इसी तरह 8 दिसंबर को हरियाणा के जींद में भी बिना दहेज और बिना फेरों की शादी हुई. इस के विरोध में पंडेपुजारियों ने इस परिवार को धमकियां भी दीं. शादी से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए.

जाहिर है, पंडितपुजारी ऐसी शादियों का विरोध करेंगे ही. आखिर उन की तथाकथित काल्पनिक सत्ता जो हिल रही है. उन की धर्म की दुकान पर संकट जो गहराने लगा है. एक को देख कर 10 लोग और ऐसा करने की सोचेंगे. इस तरह समाज में ब्राह्मणवादी साम्राज्य की नींव हिलने का डर पैदा होगा तो पाखंड के नाम पर जेबें भरने वाले बौखलाएंगे ही.

धर्म और पाखंड

सदियों से ब्राह्मणों ने धर्म और पाखंड के नाम पर झूठ को सच बना कर परोसा है। जन्मपत्री, कुंडली, वैदिक मंत्रों, फेरों और रीतिरिवाजों को शादी जैसे सामाजिक कार्यों के लिए अनिवार्य बनाया है. पर जरा सोचिए कि जिन देशों में इस तरह के पाखंडों का वजूद नहीं, जहां पत्रियां देख कर शुभ मुहूर्त नहीं निकाले जाते, जहां कुंडली मिलान नहीं होता, जहां दानदहेज देने या फेरों और मंत्रों की जरूरत नहीं होती क्या वहां शादियां सफल नहीं हो रहीं? क्या वहां लोग खुशहाल जीवन नहीं जी रहे?

यह सब रुढ़िवादी परंपरा के अलावा कुछ नहीं. वैज्ञानिक दृटिकोण से देखने पर समझ आएगा कि इन पाखंडों की जरूरत नहीं.

लोगों को बेवकूफ बनाना

लोगों को बेवकूफ बना कर धन ऐंठना और लोगों को डरडर कर जीने को विवश करना ही ज्यादातर पंडेपुजारियों की फितरत होती है. दानदहेज जैसी कुप्रथाएं भी हमारे रूढ़िवादी समाज की देन हैं जिन से लड़ना आज के पढ़ेलिखे और खुली सोच रखने वाले युवाओं और उन के अभिभावकों का दायित्व है.

बदलते जमाने के साथ स्त्रीपुरुष के रिश्ते बदले हैं. घर में उन का वजूद बदला है. फिर लोगों की सोच बदलने में देर क्यों?

शादी 2 परिवारों का मिलन है. इस में दानदहेज और पाखंडों की नहीं बल्कि प्यार और एकदूसरे को समझने की जरूरत होती है.

हरियाणा सरकार की किरकिरी

सरकारी नौकरियां या दूसरे रोजगार पैदा करने में निखट्टू साबित होने के बाद सरकारों ने निजी उद्योगों और दफ्तरों में नौकरियां पर डाका डालने की योजना बनाई है. हरियाणा सरकार ने 2021 में एक कानून पास किया कि हर प्राइवेट कंपनी को 30,000 से कम वेतन वाले कर्मचारियों में से 75 प्रतिशत हरियाणवी रखने होंगे चाहे वे दूसरे राज्यों के कर्मचारियों के मुकाबले ठीक हों या न हों. इस कानून को लागू करने के लिए लंबीचौड़ी रिटर्नें, कागजी कार्रवाई, फाइन, जेल का बाकायदा प्रबंध किया गया.

कुछ कंपनियों ने इस कानून को चुनौती दी और अब हरियाणा, पंजाब हाईकोर्ट ने कहा है कि यह कानून असंवैधानिक है और मौलिक अधिकारों के खिलाफ है. कंपनियों ने तो राहत महसूस की है पर नेताओं को अब अपनी खिल्ली उड़ती नजर आ रही है क्योंकि इस तरह की चोंचलेबाजी भारतीय जनता पार्टी ही सरकारी फैसलों की पहचान बन गई है.

अब एक ज्योतिष रिसर्च केंद्र का आर्थिक कष्ट निवारण उपाय देखिए : एक लोटे में जल, दूध, गुड़ और काले तिल मिला कर हर शनिवार को पीपल के पेड़ पर धूप में चढ़ाएं तथा ओम नमो भगवते वासुदेव मंत्र जपते हुए पीपल की 7 बार परिक्रमा करें. इसी तरह का एक और निर्देश उसी रिसर्च केंद्र से आया है धर्म का कार्य करने में कभी देर मत करना और सत्धर्म मिल जाए तो दानपुण्य करने में देर नहीं करना. धन और वोट दान अब गैर ब्राह्मण नेता भी लेने लगे हैं और हरियाणा में हरियाणावासियों को लौलीपौप देने का कानून इन्हीं पाठों को पढ़ कर आए नेताओं ने दिया है.

एक तरफ भारतीय जनता पार्टी अखंड भारत की बात करती है और दूसरी तरफ यह हरियाणा में नौकरियां केवल हरियाणवी लोगों के लिए सुरक्षित रखना चाहती है. यह दोगलापन हिंदू धर्म के देवीदेवताओं के कारनामों में भरा पड़ा है और वहीं से सीख कर तो लोग अपना राज चला रहे हैं.

हरियाणा ही नहीं सभी राज्यों में सरकारें इसी तरह की नौटंकी करती रहती हैं. आरक्षण इसी नौटंकी का एक हिस्सा है. पहला आरक्षण तो सदियों से पौराणिक है जिस में काम का बंटवारा जाति से कर रखा है और हमारा आरक्षण इस धार्मिक आरक्षण को ठीक करने के लिए कानूनी है जिस में नौकरियों को सभी जातियों में बांटने की बात होती है.

जरूरत है कि देश में खेती भी उत्पादक व लाभदायक हो ताकि वह और लोगों को रोजगार दे सके और उद्योग सा लाभदायक हो और फलेफूले ताकि वे नौकरियां पैदा करे. बनीबनाई नौकरियों को बांटने या धर्मस्थलों पर नौकरियां पैदा करने से देश और समाज का कल्याण नहीं होगा. जपतप, मंत्र पढ़ने से या कानून बना डालने से देश नहीं सुधरता. इस के लिए नेताओं और जनता को मिल कर काम करना होता है, चाहे वह 70 घंटे सप्ताह का क्यों न हो.

अगर हरियाणा सरकार कहती कि हरियाणवी बंदे को ही रखो और वे सातों दिन रोज 10 घंटे काम करेंगे तो देखते हैं कैसे उद्योग छीनाछपटी करते हैं लोकल लेबर के लिए, पर नीयत तो खराब थी. मुफ्त का माल हड़पने की थी जिस पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है.

भारीभरकम की जगह थर्मल कपड़े

पहनावा व्यक्ति के जीवन का अहम हिस्सा है. यह शरीर को मौसम की विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाता है. मौसम से शरीर को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कभी सूती तो कभी ऊनी वस्त्र पहनने पड़ते हैं. थर्मल वियर भी इसी कड़ी में एक प्रकार का वस्त्र है, जो सर्दी के मौसम में शरीर को गरमी प्रदान करता है और किसी भी प्रकार की एक्टिविटी को आसानी से कर पाने में सक्षम बनाता है, क्योंकि इस का टैक्सचर हलका होने के साथसाथ आरामदायक व शरीर को गरमी देने वाला होता है.

नया ट्रैंड

पिनाकल ब्रैंड की फैशन डिजाइनर श्रुति संचेती कहती हैं कि कोविड के बाद से लोगों में हैल्थ को ले कर जागरूकता बढ़ी है. पहले लोग काम अधिक करते थे, इसलिए उन का स्वास्थ्य ठीक रहता था. लेकिन अब उन के सारे काम तकनीक और मशीन की सहायता से होते हैं, इसलिए उन की मेहनत कम हो गई है. सो, फिटनैस के लिए वे साइक्ंिलग, वाक आदि करने लगे हैं. ऐसे में वैसे ही कपड़े जो आरामदायक होने के साथसाथ फिट भी हों, उन्हें अधिक पसंद करने लगे हैं.

लौकडाउन के दौरान एक नया कल्चर भी सामने आया. लोग कैजुअल रहना पसंद करने लगे हैं. अब यह एक नया ट्रैंड बन गया है. इस में पहले एथ्लेजर आया, जिस का अर्थ थोड़ा कम्फर्ट और थोड़ा लेजर का होना है. इसे कैजुअल भी कहा जा सकता है. इस का कौन्सैप्ट ऐक्टिव रहना है, किसी प्रकार का कोई रेस्ट्रिक्शन किसी काम में न होना है.

आधुनिक तकनीक

हिमाचल, कश्मीर आदि के लोग अधिकतर शौल, स्वेटर, फिरन पहनते हैं. विदेश में थर्मल वियर अधिक प्रचलन में हैं. वहीं से यह इंडिया में आया है. इस का क्रेज आज हमारे देश में भी है. कई बड़ेबड़े ब्रैंड्स यहां आ चुके हैं. ये कपड़े नौर्मल लाइफ देते हैं और किसी काम में रेस्ट्रिक्ट नहीं करते. जापान की एक कंपनी नासा की हिटन टैक्नोलौजी से कपड़े बनाती है. ये कपड़े तापमान के अनुसार शरीर को प्रोटैक्ट करते हैं.

स्टाइल स्टेटमैंट

पहले थर्मल कपड़ों को सर्दी में अंडरवियर के रूप में पहना जाता था ताकि शरीर गरम रहे, लेकिन आज का यूथ इसे फैशन के रूप में पहनने लगा है और यह एक फैशन ट्रैंड बन गया है. ये कपड़े हलके होने के साथसाथ गरमी अधिक देते हैं जिस से भारीभरकम ऊनी या गरम कपड़े न पहन कर इसे पहनना आरामदायक होता है और इस का रखरखाव भी आसान है.

डिजाइनर भी इस में नएनए प्रिंट्स, रंगों और डिजाइनों का प्रयोग कर रहे हैं. ये कपड़े अब बोरिग नहीं, स्मार्ट पहनावा हैं और स्टाइल स्टेटमैंट में आ चुके हैं. इस के अलावा इन कपड़ों को पहन कर कहीं किसी गैदरिंग में जा सकते हैं.

सैलेब्स की पसंद

थर्मल वियर को आगे बढ़ाने में बौलीवुड और हौलीवुड के कलाकारों का भी योगदान कम नहीं है. अनुष्का शर्मा, करिश्मा कपूर, करीना कपूर आदि सभी ने ऐसे कपड़े पहने हैं.

साथ ही, लोगों ने भारीभरकम ड्रैस पहन कर देख ली है. ऐसे सुंदर हलकेफुलके कपड़े भी ठंड से राहत दिला सकते हैं, इसलिए वे भारी पहनावे से बचने लगे हैं. इन कपड़ों की मांग आज बाजारों में बढ़ी है. इन्हें घरबाहर हर जगह पहना जा सकता है.

इस में प्रयोग किए जाने वाले फेब्रिकप्योर मैरिनो वूल, ब्लैंडेड वुल, सिल्क, कौटन के साथसाथ कौटन पोलिएस्टर ब्लैंड होते हैं, जो अधिकतर यूरोप में प्रयोग होते हैं. इस में फैब्रिक के नीचे एक फाइन और पतली क्वालिटी की पोलिएस्टर की लाइनिंग होती है. थर्मल वियर, फलालैन और कैपिलीन से भी बनाए जाते हैं. ये कपड़े सौफ्ट और रिलैक्स फिट होने के साथसाथ स्किनफ्रैंडली भी होते हैं. ये शरीर के मौइस्चर को जल्दी सोख कर, तापमान को अंदर स्टोर करने के साथसाथ बाहर की ठंड को अंदर प्रवेश करने नहीं देते, जिस से ठंड नहीं लगती.

फैशनेबल आउटफिट

थर्मल कपड़ों का कौन्सैप्ट यह है कि ये बौडी के शेप के अनुसार फिट हो जाते हैं, जिस से गरमी अधिक मिलती है. ये स्किन से टच हो जाने की वजह से बाहर की ठंडी हवा को अंदर नहीं जाने देते. इस के अलावा, ये शरीर के नौर्मल टैम्परेचर को अंदर बनाए रखने में भी सहायक होते हैं.

इस के तहत पैंट, लैगिंग्स, टीशर्ट, पुलोवर आदि कई फैशनेबल आउटफिट्स आज बाजारों में उपलब्ध हैं.

सर्दी की बीमारियों से कैसे बचें ?

ज्यादातर लोगों को सर्दी का मौसम बहुत पसंद होता है. मगर सर्दी में जब तापमान कम हो जाता है तो हमें अपनी सेहत का खास खयाल रखना जरूरी हो जाता है क्योंकि इस दौरान संक्रमण का खतरा बढ़ता है और कई तरह की शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं. डायबिटीज, हार्ट पेशेंट, श्वास रोगी और ब्रेनस्ट्रोक के पेशेंट अकसर सर्दी में परेशान होते हैं. कौमन कोल्ड भी कुछ लोगों में दिक्कत बढ़ाता है.

सर्दी में होने वाली बीमारियों और उन के बचाव के उपाय

खांसी, जुकाम यानी सामान्य सर्दी:यह एक वायरल संक्रमण है जो आप की नाक और गले को प्रभावित करता है. कभीकभी कानों पर भी असर पड़ता है. यह कुछ दिनों से ले कर कई हफ्तों तक रहता है. इस के लक्षणों में गले में खराश, सिरदर्द, सीने में जकड़न, नाक बहना, छींक आना, ठंड लगना, बदन दर्द, सिर या आंखों में भारीपन और कभीकभी हलका बुखार शामिल हैं. इस की वजह 200 से अधिक वैसे वायरस हैं जो सामान्य सर्दी का कारण बन सकते हैं. मगर सब से आम राइनोवायरस है.

यह रोग बदलते मौसम, किसी संक्रमित व्यक्ति के आप के पास खांसने या छींकने से या किसी दूषित सतह के संपर्क में आने से होता है. यह इम्यूनिटी कमजोर होने पर और संक्रमण फैलने के कारण भी हो सकता है.

फ्लू : यह इन्फ्लुएंजा वायरस के कारण होने वाला एक संक्रामक श्वसन रोग है. यह आम सर्दी के समान है लेकिन यह संक्रामक श्वसन रोग मुंह, नाक, गले और फेफड़ों को प्रभावित करता है. बुखार 4-5 दिनों में ठीक हो जाता है पर खांसी और थकान 2 सप्ताह तक रहती है. तेज बुखार, खांसी, सिरदर्द, दस्त, शरीर में दर्द, गले में खराश आदि इस के लक्षण हैं.

सर्दी जुकाम और फ्लू से ऐसे करें बचाव

  • विटामिन सी बेस्ड फूड्स लें और ऐसा भोजन करें जो रोग प्रतिरोधक क्षमताओं को बढ़ाए.
  • सुबह बिस्तर से उठते ही गर्म कपड़े पहनें. सैर करने या जिम जा रहे हैं तो सिर पर गर्म टोपी और हाथों में ग्लव्स पहनना न भूलें.
  • फ्रिज से निकाल कर कुछ भी तुरंत न खाएं.
  • नाक बंद होने पर दिन में 2 से 3 बार भाप लें. गुनगुने पानी से गरारे करें.
  • खांसते या छींकते वक्त मुंह पर हाथ या रूमाल रखें.
  • जिन्हें पहले से सर्दीजुकाम है उन से दूर रहें.
  • बाहर से आने पर अपने हाथ जरूर धोएं.
  • मौसमी फलों और सब्जियों का भरपूर सेवन करें.

श्वास संबंधी रोग

श्वसन संबंधी बीमारियां निस्संदेह वर्ष के ठंडे महीनों के दौरान अधिक होती हैं. लोग घर के अंदर या बंद जगहों में ज्यादा रहते हैं जिस से वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से जा सकते हैं. ठंडी, शुष्क हवा हमारी प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है. ज्यादा सर्दी पड़ने पर कुछ लोगों में सांस की नली सिकुड़ जाती है. जल्दीजल्दी सांस लेना, सीने में जकड़न या कसाव महसूस होना, सांस के साथ आवाज आना इस के लक्षण हैं.

बचाव के उपाय

  • ठंड, धुंध, धूलमिट्टी और पालतू जानवरों से खुद को दूर रखें.
  • इनहेलर हमेशा साथ रखें.
  • ठंडी चीजों को खाने से बचें.
  • त्वचा की समस्याएं
  • सर्दी आते ही स्किन समस्याएं जैसे ड्राइनैस, स्किन का फटना, डैंड्रफ आदि का सामना करना पड़ता है. स्किन में खुजली, जलन, सूजन जैसे लक्षण हो सकते हैं.

बचाव

  • गुनगुने पानी से नहाएं.
  • सिर को धोने से आधे घंटे पहले गुनगुने तेल से मालिश भी कर सकते हैं.
  • सर्दी में मौइश्चर युक्त साबुन का इस्तेमाल करें.
  • नहाने से पहले नारियल तेल से बौडी मसाज करने से भी त्वचा को आराम मिलता है.
  • रोजाना 10-12 गिलास पानी पीएं.
  • रात को होंठों पर अच्छी क्वालिटी का लिप बाम या मलाई लगा सकते हैं.

हड्डियों की समस्या

सर्दी में जोड़ों में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है. सीनियर सिटिजन के साथ ऐसा ज्यादा होता है. दर्द, सूजन,चलनेफिरने में दिक्कत, उठते और चलते समय जोड़ों में अकड़न जैसे लक्षण हो सकते हैं.

बचाव

  • सोने से पहले दर्द वाले हिस्से पर गर्म पानी का तौलिया रखें. करीब 15 मिनट सिंकाई करें.
  • एक्सरसाइज करें.
  • धूप में आधे घंटे जरूर बैठें.
  • रोज गुनगुने तेल से मालिश करें.

इन के अलावा कुछ और बीमारियां हैं-

ब्रोंकाइटिस : ब्रोंकाइटिस एक वायरल श्वसन संक्रमण है. इस के लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, हलका बुखार, सूखी खांसी, घरघराहट, बहती नाक आदि शामिल है. कई अलगअलग वायरस हैं जो ब्रोंकाइटिस का कारण बनते हैं. इन में सब से कौमन आरएसवी है. यदि आप धूम्रपान करते हैं, आप को साइनसाइटिस, बढ़े हुए टौंन्सिल या एलर्जी है तो भी आप को इस के होने की संभावना है.

स्ट्रैप थ्रोट : यह ज्यादातर स्कूल जाने वाले बच्चों में देखा जाता है और इस में आमतौर पर सर्दी या खांसी के लक्षण नहीं होते हैं. गले में खराश, तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, भोजन या पानी निगलने में कठिनाई, लिम्फ नोड्स में सूजन आदि इस के लक्षण हैं. यह बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है.

काली खांसी : यह एक गंभीर और अत्यंत संक्रामक जीवाणु संक्रमण है. यह मुख्य रूप से शिशुओं और छोटे बच्चों को प्रभावित करता है. यह स्थिति 10 सप्ताह तक रह सकती है. इस के लक्षण हैं खांसी, बुखार, आंखों से पानी आना, छींक आना और नाक बहना.

इन बीमारियों से बचाव

  • अपने हाथों को पूरे दिन लगातार धोएं.
  • पर्याप्त आराम करें और खूब सारे तरल पदार्थ पिएं.
  • सर्दीजुकाम वाले लोगों से सुरक्षित दूरी बनाए रखें. दूसरों के कपड़े, कंबल, रूमाल आदि के इस्तेमाल से बचें.
  • नियमित व्यायाम करें. इस से रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलती है.
  • गर्म पानी पिएं और पर्याप्त नींद लें.
  • ताजे फल और सब्जियों से युक्त अच्छा आहार लें.

चिलब्लेन

पैरों और हाथों की उंगलियों में ठंड लगना, उंगलियों का नीला या लाल होना और दर्द व खुजली होने को मैडिकल भाषा में चिलब्लेन कहते हैं. यह समस्या ज्यादातर सर्दी में ही होती है. आप दस्ताने और जुराब का प्रयोग सर्दी के शुरुआती दौर से ही करें. समस्या होने पर गर्म पानी से सिंकाई करें.

हाइपोथर्मिया

इस का मतलब है शरीर का तापमान कम हो जाना. वयस्कों खासकर बुजुर्गों और बच्चों का शरीर जल्द ही ठंडा हो जाता है. यदि उपयुक्त सावधानियां न बरती जाएं तो वे हाइपोथर्मिया के शिकार हो सकते हैं. लापरवाही बरतने पर यह समस्या गंभीर हो सकती है. इस के लक्षण हैं, शरीर का ठंडा पड़ जाना, बेसुध होना, हृदय गति और सांस गति का धीमा पड़ना.

पब्लिक लाइब्रेरी औफ साइंस जर्नल में पब्लिश एक रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि जिन्हें पहले से हार्ट डिजीज है सर्दी में उन में हार्ट अटैक का खतरा 31 फीसदी तक बढ़ जाता है.

ठंड में खतरा क्यों बढ़ता है ?

दरअसल सोते समय शरीर की एक्टिविटीज स्लो हो जाती हैं. बीपी और शुगर का लेवल भी कम होता है. लेकिन उठने से पहले ही शरीर का औटोनौमिक नर्वस सिस्टम उसे सामान्य स्तर पर लाने का काम करता है. यह सिस्टम हर मौसम में काम करता है. लेकिन ठंड के दिनों में इस के लिए दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इस से जिन्हें हार्ट की बीमारी है उन में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है.

साथ ही ठंड के मौसम में नसें ज्यादा सिकुड़ती हैं और सख्त बन जाती हैं. इस से नसों को गर्म और एक्टिव करने के लिए ब्लड का फ्लो बढ़ जाता है जिस से ब्लड प्रैशर बढ़ जाता है. ब्लड प्रैशर बढ़ने से हार्ट अटैक होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

दिल की बीमारी में ध्यान रखें ये बातें

बहुत ज्यादा पानी न पिएं. नमक कम खाएं. दिल का एक काम शरीर में मौजूद रक्त के साथ लिक्विड को पंप करने का भी होता है. जिन्हें दिल की बीमारी होती है उन के दिल को वैसे भी पंप करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. ऐसे में अगर आप बहुत ज्यादा पानी पी लेंगे तो हार्ट को पंपिंग में और भी मेहनत करनी पड़ेगी और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाएगा.

सुबह जल्दी सैर पर न जाएं

जिन लोगों को पहले भी हार्ट अटैक आ चुका है या जिन के दिल पर ज्यादा खतरा है, वे ठंड के दिनों में न तो बिस्तर जल्दी छोड़ें और न ही जल्दी सैर पर जाएं. ठंड की वजह से नसें पहले से ही सिकुड़ी हुई होंगी और जब ठंडे वातावरण के संपर्क में आएंगे तो बाहर की अधिक सर्दी की वजह से शरीर को अपनेआप को गर्म बनाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी. इस से दिल को ज्यादा काम करना पड़ेगा.

खानपान व व्यायाम

अच्छे पाचन और खुद को स्वस्थ रखने के लिए डाइट में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें. साथ ही मेवे भी लें. सूखे मेवे न केवल आप को ऊर्जा देते हैं बल्कि सर्दी में गरमी भी देते हैं.

पानी शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है. जब आप पर्याप्त रूप से हाइड्रेटेड नहीं होते हैं तो नाक का मार्ग और गला सूख जाता है.

मुझे हमेशा गैस की समस्या रहती है, बताएं कि मैं इससे छुटकारा कैसे पाऊं ?

सवाल

मेरी उम्र 20 साल है. मैं हमेशा ऐसिडिटी और गैस की समस्या से परेशान रहती हूं. मैं ने कई दिनों तक डाक्टर से इलाज भी करवाया. घर के बड़ेबुजुर्गों के कहने पर घरेलू नुसखे भी आजमा कर देखे, पर कोई फर्क नहीं पड़ा. कुछ उपचार बताएं.

जवाब

ऐसिडिटी और गैस का लाइफस्टाइल से गहरा संबंध है. हम क्या खाते हैं, कैसे खाते हैं, कितने तनाव में रहते हैं, कैसे वस्त्र पहनते हैं, कैसी दिनचर्या रखते हैं, सभी का इस पर असर पड़ता है. यदि हम अपने खानेपीने में कुछ छोटेछोटे परहेज बरतने लगें, टेबल मैनर्स पर ध्यान दें. दिनचर्या में छोटेछोटे परिवर्तन ले आएं.

तली हुई चीजें और अधिक चरबी वाले गरिष्ठ व्यंजन ऐसिडिटी पैदा करते हैं. टमाटर, प्याज, लालमिर्च, कालीमिर्च, संतरा मौसमी, चौकलेट आदि से परहेज किया जा सकता है. इसी प्रकार कुछ शाकसब्जियां और फल पेट में अधिक गैस बनाते हैं. फलियां, फूलगोभी, मूली, प्याज, पत्तागोभी जैसी सब्जियां और सेब, केला और खूबानी पेट में गैस बनाते हैं. इसी तरह जिन चीजों में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है, वे भी बादी होती हैं. ऐसे व्यंजन जो गरमगरम सर्व  होते हैं जैसे सिजलर्स वे भी पेट में गैस बढ़ाते हैं. इन से परहेज करें.

खाने की मेज पर चंद टेबल मैनर्स भी ध्यान में रखने जरूरी हैं. भोजन करते समय छोटेछोटे निवाले लें. पचपच कर के खाने से भी बहुत सारी हवा पेट में पहुंच जाती है. पानी और दूसरे पेयपदार्थ पीते समय कप, गिलास, चम्मच होठों से सटा कर रखें और जल्दबाजी न करें.

दिनचर्या का भी सेहत पर असर पड़ता है. पूरा दिन एक जगह बैठेबैठे बिता देने के बजाय थोड़ीथोड़ी देर पर चलतेफिरते रहना आंतों के लिए अच्छा है. जीवन में स्ट्रैस को नियंत्रण में करना भी जरूरी है. व्यायाम, हास्य आदि स्ट्रैस से मुक्ति दिलाते हैं.

ओवर द काउंटर दवाओं में ऐंटासिड घोल या गोलियां जैसे डायजिन, म्यूकेन, जेल्यूसिल और अम्लरोधी दवाएं जैसे रेनिटिडिन, पैंटोप्राजोल, लेंसोप्राजोल और ओमेप्राजोल आराम दिला सकती हैं. यदि इन से भी आराम न मिले तो किसी गैस्ट्रोएंट्रोलौजिस्ट से कंसल्ट करें.

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