Download App

26 January Special : मेरा बाबू- एक मां की दर्द भरी कहानी

जून, 1993 की बात है. मुंबई में बंगलादेशियों की धरपकड़ जारी  थी. पुलिस उन्हें पकड़पकड़ कर ट्रेनों में ठूंस रही थी.   कुछ तो चले गए, कुछ कल्याण स्टेशन से वापस मुड़ गए. किसी का बाप पकड़ा गया और टे्रेन में बुक कर दिया गया तो बीवीबच्चे छूट गए. किसी की मां पकड़ी गई तो छोटेछोटे बच्चे इधर ही भीख मांगने के लिए छूट गए. पुलिस को किसी का फैमिली डिटेल मालूम नहीं था, बस, जो मिला, धर दबोचा और किसी भी ट्रेन में चढ़ा दिया. सब के चेहरे आंसुओं से भीग गए थे.

यह धरपकड़ करवाने वाले दलाल इन्हीं में से बंगाली मुसलमान थे. रात के अंधेरे में सोए हुए लोगों पर पुलिस का कहर नाजिल होता था, क्योंकि इन्हें दिन में पकड़ना मुश्किल था. कभी तो कोई मामला लेदे कर बराबर हो जाता और कभी किसी को जबरदस्ती ट्रेन में ठूंस दिया जाता. इन की सुरक्षा के लिए कोई आगे नहीं आया, न ही बंगलादेश की सरकार और न ही मानवाधिकार आयोग.

उन दिनों मेरे पास कुछ औरतों का काम था. सब की सब सफाई पर लगा दी गई थीं. कुछ को मैं ने कब्रिस्तान में घास की सफाई पर लगा रखा था. ज्यादातर औरतें बच्चों के साथ थीं. उन के साथ जो मर्द थे, उन के पति थे या भाई, मालूम नहीं. ये भेड़बकरियों की तरह झुंड बना कर निकलती थीं और झुंड ही की शक्ल में रोड के ब्रिज के नीचे अपने प्लास्टिक के झोपड़ों में लौट जाती थीं.

उन्हीं में एक थी फरजाना. देखने में लगता था कि वह 17 या 18 साल की होगी. मुझे तब ज्यादा आश्चर्य हुआ जब उस ने बताया कि वह विधवा है और एक बच्चे की मां है. उस का 2 साल का बच्चा जमालपुर (बंगलादेश) में है.

इस धरपकड़ के दौरान एक दिन वह मेरे पास आई और बोली, ‘‘साहब, मैं यहां से वापस बंगलादेश नहीं जाना चाहती.’’

‘‘क्यों? चली जाओ. यहां अकेले क्या करोगी?’’

‘‘साहब, मेरा मर्द एक्सीडेंट में मर गया. मेरा एक लड़का है जावेद, मेरा बाबू, मैं अपनी भाभी और भाई के पास उसे छोड़ कर आई हूं. मैं अपने बाबू के लिए ढेर सारा पैसा कमाना चाहती हूं ताकि उसे अच्छे स्कूल में अच्छी शिक्षा दिला सकूं और बड़ा आदमी बना सकूं.’’

फरजाना को पुकारते समय मैं उसे ‘बेटा’ कहता था और इसी एक शब्द की गहराई ने उस को मेरे बहुत करीब कर दिया था. न जाने क्यों, जब वह मेरे पास आती तो मेरे इतने करीब आ जाती जैसे किसी बाप के पास बेटी आती है. वह मुझे ‘रे रोड’ के प्लास्टिक के झोंपड़ों की सारी दास्तान सुनाती.

उस की कई बार इज्जत खतरे में पड़ी, लेकिन वह भाग कर या तो रे रोड के रेलवे स्टेशन पर आ गई या रोड पर आ कर चिल्लाने लगी. ये इज्जत लूटने वाले या उन्हें जिस्मफरोशी के बाजार में बेचने वाले बंगलादेशी ही थे. पहले वह यहां के दलालों से मिलते थे. रात के समय औरतों को दिखाते थे और फिर सौदा पक्का हो जाता था. कितनी ही औरतें फकलैंड रोड, पीली कोठी और कमाठीपुरा में धंधा करने लगीं और कुछ तंग आ कर मुंबई से भाग गईं.

फरजाना ने एक दिन मुझे बताया कि वह बंगाली नहीं है. बंटवारे के समय उस के पिता याकूब खां जिला गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) से पूर्वी पाकिस्तान गए थे. उस के बाद 1971 के गृहयुद्ध में वह मुक्ति वाहिनी के हाथों मारे गए. इस के बाद उस के भाई ने उस की शादी कर दी. उस का पति एक्सीडेंट में मर गया. जब उस का पति मरा तो वह पेट से थी. अब यह खानदान पूरी तरह उजड़ गया था. बंगलादेश से जब बिहारी मुसलमानों  ने उर्दू भाषी पाकिस्तान की तरफ कूच करना शुरू किया तो वहां की सरकार ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया. इधर बंगलादेश सरकार भी उन्हें अपने पास रखना नहीं चाहती थी, क्योंकि इस गृहयुद्ध में इन की सारी वफादारी पाकिस्तान के साथ थी. यहां तक कि इन्होंने मुक्ति वाहिनी से लड़ने के लिए अपनी रजाकार सेना बनाई थी.

जबपाकिस्तान हार गया और एक नए देश, बंगलादेश, का जन्म हो गया तो ये सारे लोग बीच में लटक गए. न बंगलादेश के रहे न पाकिस्तान के. फरजाना उन्हीं में से एक थी. वह भोजपुरी के साथ बहुत साफ बंगला बोलती थी. एक दिन तो हद हो गई, जब वह टूटेफूटे बरतनों में मेरे लिए मछली और चावल पका कर लाई.

मैं ने अपने दिल के अंदर कई बार झांक कर देखा कि फरजाना कहां है? हर बार वही हुआ. फरजाना ठीक मेरी लड़की की तरह मेरे दिल में रही. अब वह मुझे बाबा कह कर पुकारती थी. दिल यही कहता था कि उसे इन सारे झमेलों से उठा कर क्यों न अपने घर ले जाऊं, ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि मेरी 3 के बजाय 4 लड़कियां हो जाएंगी. लेकिन उस के बाबू जावेद का क्या होगा, जिस को वह जमालपुर (बंगलादेश) में छोड़ कर आई थी और फिर मैं ने उसे इधरउधर के काम से हटा कर अपने पास, अपने दफ्तर में रख लिया. काम क्या था, बस, दफ्तर की सफाई, मुझे बारबार चाय पिलाना और कफन के कपड़ों की सफाई.

मुंबई एक ऐसा शहर है जहां ढेर सारे ट्रस्ट, खैराती महकमे हैं, बुरे लोगों से ज्यादा अच्छे लोग भी हैं और जिस विभाग का मैं मैनेजर था वह भी एक चैरेटी विभाग था. मसजिदों की सफाई, इमामों, मोअज्जिनों की भरती, पैसों का हिसाब- किताब लेकिन इस के अलावा सब से बड़ा काम था लावारिस मुर्दों को कब्रिस्तान में दफन करना. जो भी मुसलिम लाशें अस्पताल से मिलती थीं, उन का वारिस हमारा महकमा था. हमारा काम था कि उन को नहला कर नए कपड़ों में लपेट कर उन्हें कब्रिस्तान में सुला दिया जाए.

मुंबई में कब्रिस्तानों का तो यह आलम है कि चाहे जहां भी किसी के लिए कब्र खोदी जाए, वहां 2-4 मुर्दों की हड्डियां जरूर मिलती हैं. मतलब इस से पहले यहां कई और लोग दफन हो चुके हैं, और फिर इन हड्डियों को इकट्ठा कर के वहीं दफन कर दिया जाता है. यहां कब्रिस्तानों में कब्र के लिए जमीन बिकती है और यह दो गज जमीन का टुकड़ा वही खरीद पाते हैं जिन के वारिस होते हैं.

सोनापुर के इलाके में ज्यादातर कब्रें इसलिए पुख्ता कर दी गई हैं ताकि दोबारा यहां कोई और मुर्दा दफन न हो सके. मुंबई में मुर्दों की भी भीड़ है, इन के लिए दो गज जमीन का टुकड़ा कौन खरीदे? इसलिए हमारा विभाग यह काम करता है. हमारे विभाग ने लावारिस लाशों के लिए एक जगह मुकर्रर कर रखी है. यह संस्था कफनदफन का सारा खर्च बरदाश्त करती है. बाकायदा एक मौलाना और कुछ मुसलमान इस काम पर लगा दिए गए हैें कि जब कोई लावारिस लाश आए उसे नहलाएं, कफन पहनाएं और नमाजेजनाजा पढ़ कर कब्र में उतारें. शायद ऐसा विभाग हिंदुस्तान के किसी शहर में नहीं है, लेकिन मुंबई में है और यह चैरेटी इस काम को खुशीखुशी करती है. वैसे इस दफ्तर का मुंबई की भाषा में एक दूसरा नाम भी है, ‘कफन आफिस.’

एक दिन फरजाना ने आ कर मुझे एक मुड़ीतुड़ी तसवीर दिखाई, ‘‘बाबा, यह मेरा बाबू है, ठीक अपने बाप पर गया है,’’ और फिर उस ने किसी कीमती चीज की तरह उसे अपने ब्लाउज में रख लिया. बच्चे की तसवीर बड़ी प्यारी थी. बड़ीबड़ी आंखें, उस में ढेर सारा काजल, माथे पर काजल का टीका, बाबासूट पहने फरजाना की गोद में बैठा हुआ है. मैं ने पूछा, ‘‘फरजाना, यह छोटा बच्चा तुम्हारे बगैर कैसे रहता होगा?’’

‘‘मैं वहां उसे भैयाभाभी के पास छोड़ कर आई हूं. उन के अपने 2 बच्चे हैं. यह तीसरा मेरा है. बड़े आराम से रह रहा होगा बाबा. आखिर, इस का बाप नहीं, दादा नहीं, चाचा नहीं, फिर इस के लिए कौन कमाएगा? इस को कौन बड़ा आदमी बनाएगा? मैं अपने सीने पर पत्थर रख कर आई हूं. जब किसी का बच्चा रोता है तो मेरा बाबू याद आता है. मैं अकेले में चुपके- चुपके रोती हूं. लेकिन मैं चाहती हूं, थोड़ा- बहुत पैसा कमा लूं तो वहां जाऊं, अपनेबाबू का अच्छे स्कूल में नाम लिखाऊं और फिर बड़ा हो कर मेरा बाबू कुछ बन जाए.’’

कुछ दिनों के बाद पुलिस ने इन की धरपकड़ बंद कर दी. लेकिन मैं ने उन सारी औरतों को काम से हटा दिया. वह कहां गईं, किधर से आईं, किधर चली गईं, मैं इस फिक्र से आजाद हो गया क्योंकि इन में कुछ रेडलाइट एरिया का चक्कर भी काटती थीं. मैं अपनेआप को इन तमाम झंझटों से दूर रखना चाहता था.

एक दिन जब दफ्तर की सफाई करते समय एक थैला मिला. खोल कर देखा तो उस में छोटे बच्चे के लिए नएनए कपड़े थे. मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि यह सारे कपड़े फरजाना ने अपने बाबू के लिए खरीदे होंगे और जल्दबाजी या पुलिस की धरपकड़ के दौरान वह इन्हें भूल गई होगी. अब ऐसे खानाबदोश लोगों का न घर है न टेलीफोन नंबर. फिर इन कपड़ों का क्या किया जाए?

मैं ने एकएक कपड़े को गौर से देखा. बाबासूट, जींस की पैंट, जूता, मोजा और एक छोटी सी टोपी. मैं ने भी उन्हें वहीं संभाल कर रख दिया. शहर में फरजाना को तलाश करना मुश्किल था.

एक दिन अखबार पर सरसरी निगाह डालते हुए मैं ने देखा कि कुछ औरतें सोनापुर (भानडूप) के रेडलाइट एरिया से पकड़ी गई हैं और पुलिस की हिरासत में हैं. इन में फरजाना का भी नाम था. इन सारी औरतों को कमरे के नीचे तहखाने में रखा गया था. दिन में केवल एक बार खाना दिया जाता था और जबरदस्ती उन से देह व्यापार का धंधा कराया जाता था.

उस का नाम पढ़ते ही मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा. उस का बारबार मुझे बाबा कह के पुकारना याद आने लगा. दिल नहीं माना और मैं उस की तलाश में निकल पड़़ा.

उसे ढूंढ़ने में अधिक परेशानी नहीं हुई. वह भांडूप पुलिस स्टेशन में थी और वहां की पुलिस उसे बंगलादेश भेज रही थी. मैं थोड़ी देर के लिए उस से मिला लेकिन अब वह बिलकुल बदल चुकी थी. वह मुझे टकटकी लगा कर देख रही थी. उस के चेहरे की सारी मुसकराहट गुम हो चुकी थी. मुझे मालूम था कि उस की इज्जत भी लुट चुकी है. औरत की जब इज्जत लुट जाती है तो उस का चेहरा हारे हुए जुआरी की तरह हो जाता है, जो अपना सबकुछ गंवा चुका होता है. मैं ने वह प्लास्टिक का थैला उस के हाथ में दे दिया. उस ने उसे देखा और रोते हुए बोली, ‘‘बाबा, अब इस की जरूरत नहीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बाबा, मेरा बाबू मर गया.’’

‘‘क्या बात कर रही हो. यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘बाबा, वह मर गया. मैं अपने भाई और भाभी को पैसा भेजती रही और वह मेरे बाबू की मौत मुझसे छिपाए रहे. वह  उसे कमरे के बाहर सुला देते थे. रात भर वह नन्हा फरिश्ता बारिश और ठंड में पड़ा रहता था. उसे सर्दी लगी और वह मर गया. भाभी और भाई ने उस की मौत को मुझ से छिपाए रखा ताकि उन को हमेशा पैसा भेजती रहूं. वह तो एक औरत वहां से आई थी और उस ने रोरो कर मेरे बाबू की दास्तान सुनाई. अब मेरा जिस्म बाकी है. अब मुझे जिंदगी से कोई दिलचस्पी नहीं.’’

फिर वह दहाड़ मार कर रोने लगी.

उस के इस तरह रोने से पुलिस स्टेशन में हड़बड़ी मच गई. सभी अपना काम छोड़ कर उस की तरफ दौड़ पड़े. उसे पानी वगैरह पिला कर चुप कराया गया. पुलिस अपनी काररवाई कर रही थी लेकिन मुझे यकीन था कि अब वह बंगलादेश नहीं जाएगी, अलीगंज या किशनगंज से दोबारा भाग आएगी. अब वहां उस का था भी कौन? एक बच्चा था वह भी मर गया. मैं उसे पुलिस स्टेशन में छोड़ कर आ गया और अपने कफन आफिस के कामों में लग गया. रोज एक नया मुर्दा और उस का कफनदफन.

एक दिन अस्पताल से फोन आने पर वहां गया. एक लाश की पहचान नहीं हो पा रही थी. लाश लोकल ट्रेन से कट गई थी. दोनों जांघों की हड्डियां कट गई थीं. पेट की आंतें बाहर थीं. यह एक औरत की लाश थी. ब्लाउज के अंदर एक छोटे बच्चे की तसवीर खून में डूबी हुई थी. तसवीर को पानी से साफ किया. अब सबकुछ साफ था. यह फरजाना की लाश थी. उस का बाबू अपनी तसवीर में हंस रहा था. न जाने अपनी मौत पर, या अपनी मां की मौत पर या फिर इस मुल्क के बंटवारे पर. मैं उस लाश को उठा कर ले आया और तसवीर के साथ उसे कब्र में दफन कर दिया.

26 जनवरी स्पेशल : जवाबी हमला

story in hindi

रामलला प्राण प्रतिष्ठा, पाखंडियों ने सिखाई अनटाइमली डिलीवरी

समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों का शारीरिक अनुपात नौर्मल नहीं होता. वे बड़े सिर और छोटे शरीर के आकार वाले बच्चे होते हैं. उन के शरीर में वसा की कमी होती है और शरीर पर महीन बाल होते हैं. त्वचा चमकदार दिखाई दे सकती है.

यदि कोई महिला समय से पहले बच्चे को जन्म देती है तो डाक्टर उन के जन्म के तुरंत बाद उन्हें सीधे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में स्थानांतरित कर देते हैं क्योंकि उन्हें जिंदा रखने के लिए मैडिकल सहायता की जरूरत पड़ती है. वहां शिशु के महत्वपूर्ण अंगों की लगातार जांच और निगरानी रखनी होती है. तापमान, श्वसन दर, हृदय गति आदि पर नजर रखना होता है.

समय से पहले जन्म लेने वाले यानी प्रीमैच्योर बेबी को कई तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

एक भ्रूण को विकसित होने के लिए गर्भाशय में पूर्ण अवधि यानी 40 सप्ताह की आवश्यकता होती है. यदि वे जल्दी पैदा हो जाते हैं तो वे पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते हैं. इस से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. प्रीमैच्योर शिशुओं को हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े या यकृत संबंधी समस्याएं होती हैं.

फेफड़ों के अपरिपक्व होने की वजह से प्रीमैच्योर बेबी को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. इस से कई श्वसन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं जिन के लिए तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है. प्रीमैच्योर बेबी में सांस लेने में रुकावट आने को एपनिया कहा जाता है. अधिकांश बेबी अस्पताल से घर जाने तक एपनिया से पीड़ित हो जाते हैं. समय से पहले पैदा हुए कुछ शिशुओं में फेफड़ों का एक कम सामान्य विकार हो जाता है जिसे ब्रोन्कोपल्मोनरी डिसप्लेसिया कहा जाता है. उन्हें कुछ हफ्तों या महीनों तक औक्सीजन की आवश्यकता होती है.

इन शिशुओं में सामान्य हृदय संबंधी जटिलताएं भी होती हैं. समय से पहले जन्मे बेबी को होने वाली कुछ सामान्य हृदय समस्याएं पेटेंट डक्टस आर्टेरीओसस (पीडीए) और निम्न रक्तचाप हैं. ऐसे में उपचार के बिना हृदय उतनी अच्छी तरह रक्त पंप नहीं कर पाता जितना उसे करना चाहिए. निम्न रक्तचाप का इलाज नस के माध्यम से दिए जाने वाले तरल पदार्थ और दवाएं हैं.

समय से पहले जन्म लेने वाले बेबीज के मस्तिष्क में आंतरिक रक्तस्राव हो सकता है. रक्तस्राव आमतौर पर थोड़े समय के बाद बंद हो जाता है लेकिन इस से घातक जटिलताएं भी हो सकती हैं. ऐसे शिशुओं में वसा की कमी के कारण उन के शरीर में तेजी से गर्मी कम होती है. इस से शरीर का तापमान कम हो जाता है.

समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं में खून की एक आम समस्या एनीमिया होती है. यह एक ऐसी स्थिति है जहां लाल रक्त कोशिका की संख्या कम होती है. यही नहीं समय से पहले जन्मे शिशुओं में प्रतिरक्षा प्रणाली का पूरी तरह से विकसित न होना आम बात है. इन शिशुओं में संक्रमण तेजी से रक्त प्रवाह में फैल सकता है और सेप्सिस नामक जानलेवा समस्या का कारण बन सकता है.

ऐसे शिशुओं की रेटिना में रक्त वाहिकाएं सूज सकती हैं. इस से अंधापन सहित विभिन्न दृष्टि समस्याएं हो सकती हैं. उन्हें सुनने की समस्याएं भी हो सकती हैं. लोन्ग टर्म में मस्तिष्क के विकास की कमी के कारण ऐसे बच्चों में स्कूली उम्र में परिपक्व बच्चों की तुलना में सीखने की क्षमता में कमी दिखती है.

प्रीमैच्योर बेबी अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित नहीं कर सकते इसलिए उन्हें इनक्यूबेटर सपोर्ट दिया जाता है. ऐसे शिशुओं में दूध पिलाने की अक्षमता को संतुलित करने के लिए इंट्रावेनस (IV) ट्यूब का उपयोग कर आवश्यक पोषक तत्व शरीर में पहुंचाए जाते हैं. इस IV ट्यूब का उपयोग तब तक आवश्यक हो जाता है जब तक कि शिशु इतना मजबूत न हो जाए कि वह मां का दूध चूस सके.

शुभ मुहूर्त में चाहिए बेटा

इतना सब होने के जोखिम के बावजूद हमारे देश के कितने ही हिस्सों में गर्भवती महिलाओं ने रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दिन यानी 22 जनवरी को प्रसव कराने का स्लौट बुक कराया था ताकि जिन बच्चों को दुनिया में आने का समय नहीं आया उन्हें भी सर्जरी द्वारा जबरन इसी दिन जन्म दिया जाए भले ही उन्हें स्वस्थ और जिंदा रखना ही कठिन क्यों न हो जाए. इस से बड़ी मूर्खता क्या होगी कि अंधविश्वास की वजह से अपने ही बच्चे की सेहत से खिलवाड़ किया जाए.

कितनी ही महिलाओं ने प्राण प्रतिष्ठा के दिन बच्चे को जन्म देने की मंशा से प्रसव कराने का स्लौट बुक करा रखा था. महिलाओं का प्रसव कराने के लिए कक्ष की साज सज्जा की गई थी. ऐसी सभी महिलाओं की डिलीवरी सर्जरी से हुई. महिलाएं सर्जरी के लिए सहर्ष तैयार थीं. सामान्य तौर पर लोग सर्जरी अवायड करते हैं क्योंकि सर्जरी के बाद मां की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है और कुछ जोखिम भी होते हैं. मगर यहां राम नाम के अंधविश्वास के आगे महिलाओं की जिंदगी भी दांव पर लगा दी गई. सिर्फ इस चाह में कि बच्चा उसी मुहूर्त में पैदा हो.

दरअसल धर्म ने हमारे सोचने समझने की क्षमता खत्म कर दी है. हम हकीकत से दूर कल्पना की दुनिया मंल उड़ते रहते हैं और फिर कभी भी ठोकर खा कर नीचे गिर जाते हैं. तब भी अपनी ही किस्मत को दोष दे देते हैं. अपने कर्मों का हिसाब नहीं रखते. तर्क के बजाए विश्वास के सहारे जीते हैं. समय आ गया है अब हमें सही गलत का भेद समझना होगा.

जान लीजिए, दान में दी गई संपत्ति नहीं है औरत

झारखंड हाई कोर्ट रांची के चीफ जस्टिस सुभाष चंद्र ने रूद्र नारायण राय बनाम पियाली राय चटर्जी मामले में फैसला सुनाते हुए यजुर्वेद और मनुस्मृति के श्लोक का हवाला देते कहा कि ‘हे महिला तुम चुनौतियों से हारने लायक नहीं हो. तुम सब से शक्तिशाली चुनौती को हरा सकती हो.‘

अदालत ने मनुस्मृति के श्लोक का हवाला देते कहा कि ‘जहां परिवार की महिलाएं दुखी होती है वह परिवार जल्द ही नष्ट हो जाता है. जहां महिलाएं संतुष्ट रहती है वह परिवार हमेशा फलताफूलता है. वृद्ध सास की सेवा करना बहू का कर्तव्य है. वह अपने पति को मां से अलग रहने के लिए दबाव नहीं बना सकती है.’

रूद्र नारायण राय बनाम पियाली राय चटर्जी मामले में कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने के आदेश को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने नाबालिग बेटे के परवरिश के लिए 15 हजार की राशि को बढ़ा कर 25 हजार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि पत्नी के लिए अपने पति की मां और नानी की सेवा करना अनिवार्य है.’ कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद ‘51-ए’ का हवाला देते कहा कि इस में एक नागरिक के मौलिक कर्तव्यों को बताया गया है. इस में हमारी समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व देने और संरक्षित करने का प्राविधान है. वृद्ध सास या दादी सास की सेवा करना देश की संस्कृति है.’

धर्म के नाम पर औरतों का शोषण

धर्म के नाम पर औरतों का किस तरह से शोषण होता है. पौराणिक कहांनियों के जरीए इस को महिलाओं के मन में ठूंस कर भर दिया गया है. हिंदू धर्म में विवाह संस्कारों में लड़की को दान देने की वस्तु बताया गया है. इस को कन्या दान कहा गया है. इस को सब से बड़ा दान बताया गया है. इस का महत्व बहुत अधिक बताया गया है. कहा गया है कि मायके से लड़की की डोली जाती है और ससुराल से उस की अर्थी ही निकलती है. दान के बारे में कहा गया कि दान देने के बाद फिर उस पर दान देने वाले का अधिकार नहीं रहता है.

इस वजह से ही कन्यादान के बाद मायके से उस का रिश्ता खत्म कहा गया. इस दबाव में ही पिता लड़की की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है. शादी के बाद जब लड़की अपने मायके रहना भी चाहे तो भाई बाप और समाज इस को सही नहीं मानते. मायके से लड़की का नाता टूट जाता है. ससुराल में उस का नाता केवल सेवा तक रह जाता है. पिता का नाता छोड़ ससुराल पहुंची लड़की को ससुर अपनी जायदाद में हिस्सा नहीं देता है. बहू सब की सेवा करेगी यह कर्तव्य उस को बताया जाता है. सास और ससुर उस की कितनी और क्या जिम्मेदारी उठाएंगे यह कहीं नहीं बताया गया.

*संविधान और कानून के हक नहीं मिलते *

यही वह पेंच है कि जिस से 1956 में बने कानून और 2005 में लड़कियों को पिता की जायदाद में बराबर का हक देने के बाद भी कोई अपनी जायदाद बेटी को देता है. बेटी जब यह अधिकार मांगने जाती है तो रिश्ते टूट जाते हैं. मायके में जो कानून अधिकार मिला उसे कोई देना नहीं चाहता. दूसरी तरफ धर्म यह बताता है कि ससुराल में लड़की की भूमिका केवल सेवक जैसी ही होती है. जिस तरह लड़की को जिम्मेदारी बताई जाती है उस तरह से लड़के को उस के मातापिता या सासससुर की सेवा के बारे में नहीं बताया जाता. यही भेदभाव है जिस को मिटाने की जरूरत है. संविधान भी इस गैर बराबरी की खिलाफत करता है.

संविधान अनुच्छेद 14 से ले कर 32 तक नगारिक अधिकारों की बात की गई है. इन में से अनुच्छेद 14 में साफ लिखा गया है कि भारत के अंदर भारत के रहने वालों और विदेशियों दोनों को ही समान व्यवहार की बात कही गई है.

ऐसे में पतिपत्नी के साथ अलगअलग व्यवहार कैसे हो सकता है. सासससुर की जिम्मेदारी पत्नी की हो सकती है तो पति उस से अलग कैसे हो सकता है ? यह व्यवहार केवल इसलिए होता है क्योंकि पत्नी कन्यादान से आती है. दान में दी गई वस्तु को पाने वाला अपने तरह से इस्तेमाल कर सकता है. दान देने वाले का अधिकार उस पर खत्म समझा जाता है. सवाल उठता है क्या ऐेसे में पत्नी के मौलिक अधिकारों का क्या होगा ?

पति को भी जिम्मेदारी दी जाए

2023 में नोबल शांति पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी मानवाधिकार कार्यकर्ता और डिफेंडर औफ ह्यूमन राइट्स सेंटर की उपाध्यक्ष हैं. नरगिस ने एक किताब भी लिखी है जिस का नाम ‘व्हाइट टौर्चर’ है. नरगिस ने कहा कि ‘पारिवारिक सुरक्षा कानून के अब कोई मायने नहीं रह गए है. पुरुषों को पत्नी को छोड़ने का अधिकार है. उन को बच्चों का प्राकृतिक संरक्षक माना गया. जो पत्नी अपना सब कुछ छोड़ कर उन के साथ आती है उस के प्रति जिम्मेदारी नहीं दी है.’

‘पुरुष पत्नी के अलावा कितनी भी अस्थायी बीबियां रख सकता है. यह उस का हक है, मर्द अपने घर की औरतों को बाहर जाने से रोक सकते हैं. महिलाओं से निर्णय का हक छीन लिया गया. दकियानूसी विचारों का बोलबाला हो गया. कट्टरपंथी शासन के हिमायती लोगों की संख्या बढ़ गई है. जो औरतें लगातार गैर बराबरी और भेदभाव के खिलाफ लिखती बोलती हैं वो भी निशाने पर आती हैं. धर्म के नाम पर औरतों को काबू करने की कोशिश हमेशा से होती रही है.’

महिलाओं और उन के अधिकारों को ले कर बहस लंबे समय से चली आ रही है. एक पक्ष महिला या पत्नी के रूप में उसे अधिकार दिए जाने की वकालत करता है दूसरा पक्ष उस को सीमित दायरे में रखना चाहता है. दार्शनिक प्लेटो का मानना था कि ‘महिलाओं को नागरिक और राजनीतिक अधिकार देने से घर और राज्य की प्रकृति में काफी बदलाव आएगा. इस का घर परिवार और समाज को लाभ होगा.’

प्लेटो द्वारा पढ़ाए गए अरस्तू के विचार इस मामले में अलग थे, उन्होंने तर्क दिया कि ‘प्रकृति ने महिला और दास के बीच अंतर किया है. लेकिन वह पत्नियों को ‘खरीदी गई’ मानते थे. उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं की मुख्य आर्थिक गतिविधि पुरुषों द्वारा बनाई गई घरेलू संपत्ति की सुरक्षा करना है. इस का मतलब यह है कि आदमी जो कमा कर लाएगा उस की सुरक्षा करना औरत का काम है. इंसान नहीं नहीं शेर और कुछ पक्षी नर मादा के रूप में साथ रह कर अपने घर परिवार बच्चों को बेहतर जीवन देने का काम करते हैं.

आदमी औरत में भेदभाव क्यों ?

इन दार्शनिकों ने अपने समय और जरूरतों के हिसाब से अपने अपने तर्क दिए. आज धर्म की जगह कानून और संविधान का राज है. औरतें कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं. औरतें अगर औफिस में 10 से 7 की नौकरी कर रही हैं तो घर आने पर वह भी थकी होती हैं. उन का भी मन करता कि औफिस से आए गरम चाय और पकौड़ी खाने को मिल जाए. औफिस में काम कर के थकने के बाद आराम करने का मन करता है. औरतों में कोई अलग एनर्जी नहीं होती है.
धर्म इस भेदभाव को बढ़ाता है. वह अभी भी औरत को दान में दी गई वस्तु समझता है. इसलिए वह औरत से गुलामों की तरह काम करने की उम्मीद रखता है. औरतें अपना सबकुछ त्याग कर पति के पास आती है. उसे सम्मान और अधिकार की जगह बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता है. उस से केवल सेवा की उम्मीद की जाती है. इसे औरत का धर्म बताया जाता है. धर्म के नाम पर यह भेदभाव सदियों से जारी है. कानून और संविधान के बाद भी धर्म को ही ऊपर रख कर अदालतें भी फैसला सुना रही हैं.

‘पंचायत’ का फुलेरा गांव और झूठ, लोकतंत्र और तानाशाही

कोई 4 साल पहले आई दीपक मिश्रा द्वारा निर्देशित बेब सीरिज ‘पंचायत’ युवाओं द्वारा खासी पसंद की गई थी क्योंकि इस में फुलेरा गांव के बहाने ग्रामीण भारत की झलक दिखाई गई थी जिस से जब पढ़ालिखा नया नियुक्त शहरी पंचायत सचिव अभिषेक त्रिपाठी ( जितेंद्र कुमार यानी जीतू भैया ) रूबरू होता है, तो हैरान हो उठता है कि गांव की राजनीति में आज भी दबंगों का रसूख चलता है और उस में भ्रष्टाचार भी जम कर होता है.

इसी के एक प्रसंग में अंधविश्वासों का भी जिक्र है. होता कुछ यूं है कि एक योजना के तहत गांव में सोलर एनर्जी के 11 खंबे लगना स्वीकृत होते हैं. पंचायत की मीटिंग में सभी रसूखदार अपने घरों के सामने खम्बा लगाने का प्रस्ताव पास करा लेते हैं.

एक आखिरी खंबा लगने की बात आती है तो उसे गांव के बाहर की तरफ पेड़ के पास लगाने का प्रस्ताव आता है. गांव वाले मानते हैं कि उस पेड़ पर भूत रहता है.
अभिषेक चूंकि एमबीए कर रहा है इसलिए पढ़ाई की अपनी सहूलियत के लिए चाहता है कि आखिरी बचा हुआ खम्बा पंचायत औफिस के बाहर लग जाए जहां वह एक कमरे में रहता है. भूत वाली बात पर उसे यकीन नहीं होता इसलिए वह उस की सचाई जानने निकल पड़ता है. जिस से उसे पता चलता है कि कुछ साल पहले गांव के सरकारी स्कूल के मास्टर ने अपनी नशे की लत छिपाने के लिए यह झूठ फैलाया था जो इस कदर चला था कि कई गांव वालों को भूत होने का तजुर्बा हुआ था. कईयों को अंधेरी रात में उस भूत ने पकड़ा और दौड़ाया था. राज खुलता है तो सभी हैरान रह जाते हैं और खम्बा अभिषेक की मर्जी और जरूरत के मुताबिक लग जाता है.

देश में इन दिनों भूत वाले एक नहीं बल्कि कईयों झूठ सफेद, काले, हरे, पीले, भगवा, नीले सब इफरात से चल नहीं बल्कि दौड़ रहे हैं. नशेडी मास्टर तो सिर्फ भूत होने की बात कहता है लेकिन कईयों लोग बताने लगते हैं कि यह भूत उन्होंने देखा है.

एक बार तो उस ने इन्हें पकड़ ही लिया था जब होश आया तो दिन निकल चुका था और भूत गायब हो चुका था. कच्चे चावलों की खिचड़ी बनाने का काम इतने आत्मविश्वास से जोरों पर है कि झूठ और सच में फर्क कर पाने के मुश्किल काम को छोड़ लोग झूठ को ही सच करार देने लगे हैं कि कौन बेकार की कवायद और रिसर्च के चक्कर में पड़े. इसलिए मास्टरजी जो कह रहे हैं उसे ही सच मान लो और उस का इतना हल्ला मचाओ कि कोई हकीकत जानने पेड़ के पास जाने की हिम्मत ही न करे.

गलत नहीं कहा जाता कि झूठ के पांव नहीं होते दरअसल में झूठ के मीडिया और सोशल मीडिया रुपी पंख होते हैं जिन के चलते वह मिनटों में पूरा देश और दुनिया घूम लेता है और सच कछुए की तरह रेंगता रहता है. इन दिनों झूठ और झूठों का बोलबाला है. जितना बड़ा झूठ आप बोलेंगे उतने ही महान देवता और प्रभुतुल्य करार दिए जाएंगे. कम से कम एक हजार साल तक तो उस का असर रहेगा. इस से आगे की सोचना किसी के बस की बात नहीं.

झूठ में अगर धर्म आध्यात्म और दर्शन का भी तड़का लग जाए तो वह और आकर्षक लगने लगता है. आप लाख पढ़ेलिखे और तार्किक हों लेकिन आग और उर्जा में फर्क नहीं कर पाएंगे और जब तक सोचेंगे और करेंगे तब तक गंगा और सरयू का काफी पानी बह चुका होगा. एक नए किस्म की फिलौसफी इन दिनों बड़ी लोकप्रिय हो रही है जिस में लालबुझक्कड़ टाइप की बातें होती हैं. ये ऊपर से गिरती हैं और नीचे लाखों करोड़ों स्रोतों और कंठों से किस्से कहानियों की शक्ल में प्रवाहित होती हैं.

अब से कोई 28 साल पहले 1995 में अफवाह उड़ी थी कि गणेशजी दूध पी रहे हैं. बस फिर क्या था देखते ही देखते गणेश मंदिरों में भक्त लोग दूध का कटोरा ले कर उमड़ पड़े थे. जिन्हें गणेश मंदिरों में जगह नहीं मिली उन्होंने घर में रखी मूर्तियों के मुंह में जबरन दूध ठूंस कर प्रचारित कर दिया कि उन की मूर्ति ने भी दूध पिया. जिन के घर गणेश की मूर्ति नहीं थी उन्होंने राम, कृष्ण, शंकर और हनुमान तक को दूध पिला कर छठी का दूध याद दिला दिया .

उस अफरातफरी का मुकाबला वर्तमान दौर की कोई आस्था नहीं कर सकती जिस के तहत भक्तों के मुताबिक भगवान ने समोसे, कचोरी, छोले भटूरे, जलेबी और बड़ा पाव भी खाए. सार ये कि मूर्तियों में इन्द्रियां होती हैं और प्राण भी होते हैं. समयसमय पर यह बात अलगअलग तौरतरीकों से साबित करने की कोशिश भी की जाती है.
अब मूर्तियां पलक झपकाएं, हंसे और रोएं भी तो हैरानी किस बात की. हैरानी सिर्फ इस बात पर हो सकती है कि 21 सितंबर, 1995 की आस्था असंगठित थी उस के लिए कोई समारोह आयोजित नहीं करना पड़ा था और न ही खरबों रुपए खर्च हुए थे. बस कुछ करोड़ रुपए लीटर दूध की बर्बादी हुई थी. तब भी विहिप ने इसे सनातनी चमत्कार कहा था और तब भी दुनियाभर के देशों में रह रहे हिंदुओं ने मूर्तियों को दूध पिलाया था और तब भी मीडिया दिनरात यही अंधविश्वास और पाखंड दिखाता और छापता रहा था.

यह विश्वास या आस्था होती ही ऐसी ही चीज है जिस में न होने का एहसास कोई माने नहीं रखता. कोई है और आदि से है और अंत तक रहेगा यह फीलिंग बड़ा सुकून देती है. फिर चाहे वह पेड़ वाला भूत हो या फिर कोई मूर्ति हो इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. सच यही है कि यह एक विचार है और रोटी, पानी, रोजगार और दीगर जरूरतों से ज्यादा देश को विचारों की जरूरत है, जिस से दुनिया देश का लोहा माने कि देखो इन्हें भूखे नंगे फटेहाल हैं लेकिन इन के विचार बड़े उच्च कोटि के हैं.

इस चक्कर में देश बेचारों का बन कर रह जाए इस की परवाह जिन को है वे वाकई बेचारे हैं जो पत्थर से सिर फोड़ने की मूर्खता कर रहे हैं. लेकिन यकीन माने यही वे लोग हैं जो अभिषेक त्रिपाठी की तरह भूत की हकीकत उजागर करेंगे. 1995 के तमाशे को वैज्ञानिकों ने मौस हाइपीनो और साइको मैकेनिक रिएक्शन नाम दिया था.
लेकिन यह झूठ के केंद्रीयकरण का भी दौर है. सारी दुनिया और कहानी एक फुलेरा गांव में समेट दी गई है. आप देश के किसी भी हिस्से में हों सोचना और बतियाना आप को फुलेरा के बारे में ही है. मीडिया और सोशल मीडिया भी फुलेरा के इर्दगिर्द ही है क्योंकि उसे प्राणवायु वहीँ से मिल रही है.

अब यह और बात है कि आज भी मीडिया, साहित्य और पत्रकारिता झूठ को उजागर करने का नहीं बल्कि उस के प्रचारप्रसार की जिम्मेदारी निभाते हैं. उस की हालत तो गाइड फिल्म के देवानंद से कमतर नहीं, फर्क इतना है कि इस बार खुद राजू ने ही पीताम्बर ओढ़ लिया है.

इस और ऐसी फिल्म का अंत क्या होगा यह राम जाने लेकिन हालफिलहाल तो हिटलर का दौर भी याद आता है जो यह मानता था कि जर्मन आर्य हैं और विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं. इसी झोंक में द्वितीय विश्व युद्ध हो गया था जिस की तबाही किसी सबूत की मोहताज नहीं.

हिटलर के एक मामूली आदमी से तानाशाह बन जाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं. कहानी तो नाजियों की भी कम दिलचस्प नहीं जो पूरी दुनिया में अलगअलग तरीकों से दिख रहा है. ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान की बदहाली की वजह वहां का कट्टरवाद ही है जिसे हिटलर आस्था कहता है.

शुद्ध नस्ल की खोज और जरूरत खत्म सी हो गई है लेकिन शुद्धता का अहंकार बरकरार है जिस के चलते लोकतंत्र बौने होते जा रहे हैं और व्यक्तिवाद पनपता जा रहा है. इस से मानव जाति के कल्याण और विश्व शांति, विश्व बंधुत्व की उम्मीद एक तरह की हिंसक सनक है जो बहुत छोटे रूप में फुलेरा में दिखी. यह कैसे नुकसानदेह है और इस से बच कर कैसे रहा जाए यह बताने वाले कम ही बचे हैं.

युवा नेताओं को नहीं मिलने वाली है सत्ता

2024 की शुरुआत ही देशभर के कोई 90 लाख ड्राइवरों की हड़ताल से हुई थी. यह हड़ताल एक नए बनाए गए कानून के विरोध में थी जिस पर सरकार ने तुरंत  झुकने में ही अपनी बेहतरी सम झी. पूरे रंग पर हड़ताल आ पाती, इस से पहले ही सरकार और ड्राइवरों के बीच सम झौता हो गया.

सम झौता केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला और औल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के पदाधिकारियों के बीच हुआ. हां ताकि ड्राइवरों को यह खुशखबरी ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के अध्यक्ष अमृतलाल मदान ने देते हुए कहा, ‘गृहमंत्री अमित शाह मान गए हैं जबकि वे बैठक में नहीं थे.

हर कोई इस पिक्चर में परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के ही होने की उम्मीद कर रहा था क्योंकि मामला उन के मंत्रालय से संबंधित था. उन के न होने से एक बार फिर साबित हो गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भी हाशिए पर ही रख छोड़ा है. उन के हिस्से में अपने राजनीतिक जीवन के संस्मरण सुनाना भर रह गया है. हिट एंड रन कानून पर हड़ताल खत्म होने के बाद भी नितिन गडकरी ड्राइवरों की आंखों में मोतियाबिंद होने का किस्सा सुना रहे थे.

ठीक इसी दिन सोशल मीडिया पर भाजपा का लोकसभा चुनाव 2024 को ले कर एक गाना तेजी से वायरल हो रहा था. इस गाने में एक सुंदर युवा गायिका अनामिका जैन अम्बर गेरुए वस्त्र पहन गा रही है, ‘तय कर लो अब सत्य सनातन की छाया हो शासन पर, रामभक्त ही राज करेगा दिल्ली के सिंहासन पर…’ 3 मिनट एक सैकंड के इस वीडियो में नदी किनारे गायिका और उस की साथियों के अलावा बैकग्राउंड में मंदिर और नरेंद्र मोदी के पूजापाठ करते दृश्य दिखाई दे रहे हैं. भगवान राम नरेंद्र मोदी को आशीर्वाद देते हुए भी एक दृश्य में दिखाई दे रहे हैं.

नितिन गडकरी सहित भाजपा की दूसरी पीढ़ी के तमाम नेताओं ने लोकसभा चुनाव प्रचार का यह आगाज देख लिया होगा कि पार्टी ने तीसरी बार मोदी का चेहरा बतौर प्रधानमंत्री पेश कर दिया है. उन्हें सपने में भी यह नहीं सोचना कि वे कभी प्रधानमंत्री बन पाएंगे.

सोचना तो उन्हें यह भी नहीं है कि यह कैसी दोहरी नीति है जिस के तहत राज्यों के विधानसभा चुनाव तो बगैर मुख्यमंत्री का नाम और चेहरा पेश किए लड़े जाते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की बारी आई तो  झट से बिना किसी से पूछे नरेंद्र मोदी को आगे कर यह मैसेज दे दिया गया कि कोई, और फिर चाहे वह युवा हो या पिछली किसी पीढ़ी का नेता हो, इस पद के बारे में न सोचे क्योंकि इस पर फैसला हो चुका है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सार्वजनिक मंचों से 3 बार खुद को प्रधानमंत्री घोषित कर चुके हैं.

पूरी पीढ़ी ही गायब

ऐसा नहीं है कि नितिन गडकरी या उन की पीढ़ी के दूसरे भाजपाई नेता सनातनी या रामभक्त या कट्टर न हों. हां, इतना जरूर है कि वे, आस्थावान या कट्टर कुछ भी कह लें, नरेंद्र मोदी जितने नहीं हैं. अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी युग भाजपा से कब का खत्म हो चला है. इसे 2014 के बाद खत्म करने का श्रेय भी नरेंद्र मोदी को ही जाता है जो बड़े डिप्लोमैटिक तरीके से 2014 में आडवाणी को धकिया कर प्रधानमंत्री बन बैठे थे.

तब एक नाम मध्य प्रदेश के तत्कालीन और चंद दिनों पहले ही पूर्व बना दिए गए शिवराज सिंह चौहान का भी प्रधानमंत्री पद के लिए उठा था जिसे लालकृष्ण आडवाणी ने ही आगे किया था पर नरेंद्र मोदी की जिद और जुनून के आगे किसी की एक न चली थी क्योंकि उन्हें धर्मसंसद और आरएसएस ने चुना था.

शिवराज सिंह चौहान अब फुरसत में हैं और नितिन गडकरी की तरह ही टाइमपास राजनीति करते भावुक हो कर आंसू बहाते नजर आते हैं. मोदी-शाह जोड़ी ने उन्हें 5वीं बार मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के काबिल नहीं सम झा तो इस की इकलौती वजह यही है कि कहीं वे भी दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सपना न देखने लगें. शिवराज सिंह भी नितिन गडकरी की तरह काबिल और तजरबेकार हैं और सब से बड़े पद के लिए डिजर्व करते हैं. लिहाजा, खतरा तो है.

ऐसे एकदो नहीं, बल्कि दसियों भाजपाई नेता हैं जिन का कैरियर या वजूद, कुछ भी कह लें, पिछले 10 सालों में खत्म कर दिया गया है. इन में एक नाम कद्दावर क्षत्रिय नेता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का भी है जिन के हिस्से में फ्रांस जा कर राफेल के पहियों के नीचे नीबू रखने और स्वास्तिक का चिह्न बनाने जैसे फुजूल काम ज्यादा हैं. एक नाम तेजतर्रार साध्वी उमा भारती का भी है जो हर कभी हिमालय जाने की धौंस देती रहती हैं लेकिन कुछ दूरी तय कर वापस आ कर नश्वर संसार की मोहमाया में रम जाती हैं.

रमन सिंह और वसुंधरा राजे सिंधिया सहित रविशंकर प्रसाद भी इसी लिस्ट में शुमार होते हैं. निर्मला सीतारमण, एस जयशंकर, रमेश पोखरियाल, अर्जुन मुंडा और पीयूष गोयल जैसे यस मैनों से कोई खतरा नहीं है क्योंकि ये लोग जयजयकार करने में माहिर हैं और जमीनी राजनीति उन्होंने कभी नहीं की.

कांग्रेस सहित दूसरे क्षेत्रीय दलों पर परिवारवाद का आरोप लगाते रहने वाली भाजपा तो उस से भी खराब व्यक्तिवाद का शिकार हो कर रह गई है. जो हालत कांग्रेस की जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी युग में थी वही अब भाजपा की हो गई है. फर्क यह है कि कांग्रेस में तब भी दूसरी पीढ़ी के नेताओं की इतनी बेरहमी से अनदेखी नहीं की जाती थी जितनी कि भाजपा में इन दिनों की जा रही है.

इस की एक बेहतर मिसाल देवेंद्र फडणवीस हैं जो कभी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे लेकिन इन दिनों उपमुख्यमंत्री पद पर रहते शिवसेना के एकनाथ शिंदे की मातहती में काम कर रहे हैं. शिवसेना को मिटाने के चक्कर में मोदी, शाह की जोड़ी ने महाराष्ट्र में खुद की पार्टी के नफेनुकसान का भी ध्यान नहीं रखा. संभव है कि उन का असल मकसद देवेंद्र फडणवीस का हश्र भी शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह जैसा कर देना था.

कांग्रेस से भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसों ने भी बड़े सपने देखना छोड़ कर संघ के कार्यालयों में माथा टेकना शुरू कर दिया है. अब वे भी मोदी-शाह के आगेपीछे परिक्रमा करते नजर आते हैं. वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी नहीं बन पाएंगे कभी.

मुख्यमंत्री भी हैं चंगुल में

देश इन दिनों किस कदर अयोध्या और राममय हो रहा है, यह नजारा किसी सुबूत का मुहताज नहीं है. इस से किसे क्या हासिल होगा, यह भी अभी कोई नहीं सोच पा रहा. मोदी, शाह की जोड़ी ने अपनी इस मुहिम के लिए भाजपाशासित तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चंगुल में ले रखा है जिस से वे कभी प्रधानमंत्री बनने का खयाल दिल में न लाएं. जब भी नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात या चर्चा छिड़ती है तो 2 ही नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं, पहला गृहमंत्री अमित शाह का और दूसरा सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का.

यह सोचना बेमानी है कि आदित्यनाथ को फ्री हैंड मिला हुआ है. उन्हें हाशिए पर होने का एहसास जबतब मोदीशाह की जोड़ी कराती रहती है. निकाय चुनावों में भाजपा ने 17 नगरनिगमों पर जीत हासिल की थी लेकिन भाजपा के ट्विटर पर दिए बधाई संदेश में योगी आदित्यनाथ का न तो नाम था न ही फोटो.

एक और चर्चित मामला राज्य के कार्यवाहक डीजीपी देवेंद्र सिंह चौहान का है जिन की गिनती आदित्यनाथ के चहेतों में होती है. वे चाहते थे कि देवेंद्र सिंह चौहान का रिटायरमैंट बढ़ा दिया जाए लेकिन दिल्ली से ऐसा नहीं किया गया तो योगीजी मन मसोस कर रह गए. इसी तरह मनीष अवस्थी को भी आदित्यनाथ के चाहने के बाद भी सेवा विस्तार नहीं दिया गया जबकि राज्य के मुख्य सचिव दुर्गाशंकर मिश्रा को केंद्र ने सेवाविस्तार दिया.

ऐसे कई मामले हैं जिन में आदित्यनाथ की अनदेखी की गई जबकि उन का कुसूर इतना भर था कि उन का नाम बतौर प्रधानमंत्री लिया जाने लगा था. पिछले विधानसभा चुनाव में रिकौर्ड बहुमत से भाजपा की सत्ता में वापसी कराने वाले आदित्यनाथ ने लोकसभा चुनाव 2019 में भी पार्टी को 80 में से 64 सीटें दिलाने में अहम रोल निभाया था. उन की बुल्डोजरी इमेज तो चर्चित हुई लेकिन महंत होने के चलते पूजापाठी इमेज भी नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ने लगी तो उन के पर कुतरना शुरू कर दिए गए.

अब हालत यह है कि काशी, मथुरा और अयोध्या में वे नरेंद्र मोदी के पीछेपीछे घूमते, उन की तारीफों में कसीदे गढ़ते नजर आते हैं. उन्हें भी यह ज्ञान प्राप्त करा दिया गया है कि दिल्ली उन से बहुत दूर है, आप तो लखनऊ में बने रहने की जुगत भिड़ाते रहो वरना हश्र शिवराज सिंह चौहान सरीखा भी हो सकता है.

भाजपाशासित राज्यों में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हों या गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्रभाई पटेल, ये दोनों तो बेचारे प्रधानमंत्री बनने का सपने में भी नहीं सोच सकते. इन्हें भी राज्य की सब से बड़ी कुरसी मोहन यादव, भजनलाल शर्मा और विष्णुदेव साय की तरह खैरात में इसी शर्त पर मिली थी कि राज्य नरेंद्र मोदी के अपने कार्यक्रम जिसे पीएमओ कहा जाता है के अफसरों के आदेशों से चलेंगे. छोटेमोटे भूमिपूजन और उद्घाटन जैसे फैसले वे लोग ले सकते हैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर भी 3 राज्यों का ड्रामा देख निराश ही होंगे हालांकि वे आरएसएस से गहरे तक जुड़े हैं लेकिन अब पहली दफा ऐसा भी लगने लगा है कि आरएसएस भी मोदीशाह की शर्तों पर चलने लगा है. हालांकि, ऐसा सोचने वालों की यह दलील हालफिलहाल दूर की कौड़ी ही लगती है कि संघ तभी तक इन दोनों को भाव और तवज्जुह देगा जब तक ये उस के एजेंडे पर काम कर रहे हैं और अयोध्या का रामलला के मंदिर का भव्य आयोजन उन में से एक है.

प्रधानमंत्री पद के काबिल एक नाम असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा का लिया जाता रहा है जो इन दिनों कट्टरता की तमाम हदें पार करते रहे हैं और इसे ही योग्यता मान बैठे हैं. हेमंत बिस्वा 8 साल पहले तक कट्टर कांग्रेसी हुआ करते थे लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह उन्हें भी लगा कि राज्याभिषेक करवाना है तो विभीषण तो बनना ही पड़ेगा. लिहाजा, राहुल गांधी को कोसते वे भगवा  झंडे तले आ गए और नई जगह में सिंधिया की तरह ही घुलमिल गए लेकिन भाजपा ने कभी उन्हें राष्ट्रीय पहचान नहीं दी. उन का काम भी विकसित भारत यात्राओं में नरेंद्र मोदी की जयजयकार करना रह गया है जिसे वे पूरी निष्ठा व ईमानदारी से कर भी रहे हैं.

पीढ़ी परिवर्तन के नाम पर पपेट

भाजपा ने 3 राज्यों में जो मुख्यमंत्री बनाए वे किसी भी एंगल से इस अहम पद के काबिल नहीं कहे और माने जा सकते. धर्म, हिंदुत्व और राममंदिर के नाम पर मिले वोट और समर्थन का मनचाहा और बेजा फायदा मोदीशाह की जोड़ी उठा रही है. अब उसे मुख्यमंत्री नहीं बल्कि पपेट चाहिए जो कि ये तीनों हैं भी. भाजपा प्रचार यह कर रही है कि उस में पीढ़ी परिवर्तन होता है और युवाओं को वह राजनीति में आने का मौका दे रही है.

मध्य प्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजनलाल शर्मा और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय जितने युवा हैं उतने ही युवा मुख्यमंत्री दिल्ली में अरविंद केजरीवाल,  झारखंड में हेमंत सोरेन, तेलंगाना में रेवंत रेड्डी और पंजाब में भगवंत मान भी हैं. पहली बार मुख्यमंत्री बनते समय अरविंद केजरीवाल की उम्र 45 साल और हेमंत सोरेन की उम्र

44 साल थी. लेकिन एक बड़ा और दिखने वाला फर्क यह है कि गैरभाजपाई राज्यों के इन मुख्यमंत्रियों को उन के नाम से वोट मिले थे जबकि भाजपा के युवा थोपे गए मुख्यमंत्री हैं. अगर पार्टी इन के नाम और चेहरे पर चुनाव लड़ती तो नतीजे क्या होते, कोई भी इस का सहज अंदाजा लगा सकता है.

आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्रियों अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान को कोई भी फैसला लेने से पहले न किसी दिल्ली की तरफ देखना पड़ता है और न ही किसी अफसरों बौसों के मुंह की तरफ ताकना पड़ता है.  झारखंड में हेमंत सोरेन चुटकियों में छोटेबड़े फैसले लेते हैं. तेलंगाना में रेवंत रेड्डी एक हद तक ही नीतिगत फैसलों के लिए सोनिया और राहुल गांधी के मुहताज हैं, बाकी तो उन्हें आजादी मिली हुई है.

थोपे गए मुख्यमंत्री कैसे और कितने नुकसानदेह साबित होते हैं, इस की मिसाल कांग्रेस है जिस के नक्शेकदम पर अब मोदीशाह चल रहे हैं. रही बात युवाओं की तो तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री आरएसएस के अखाड़े के पट्ठे हैं जिन्हें हिंदुत्व और रामचरितमानस तो दोनों रटे पड़े हैं. ये लोग जनता का भला करने नहीं लाए गए बल्कि भगवा गैंग के एजेंडे को रफ्तार देने के लिए थोपे गए हैं. पर ये हिंदी या अंगरेजी में एक छोटामोटा भी नहीं लिख सकते. तीनों विकट के पूजापाठी हैं. कैसे ये हिंदुत्व के एजेंडे और भाजपा की मंदिर नीति को आगे बढ़ा रहे हैं, ये इन के शुरुआती फैसलों से पता चलता है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सब से पहले अहम फैसला धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर्स हटाने और खुले में मांस बिक्री न होने देने का लिया. किसी को कहनेसुनने की जरूरत नहीं पड़ी कि यह हिंदुत्व के एजेंडे का पहला चैप्टर है. इस से हिंदुओं का भी फायदा नहीं होगा क्योंकि नुकसान हिंदू व्यापारियों को भी होगा और मीटमांस खाने वाले हिंदुओं को भी. दूसरे चैप्टर के तहत वे सीधे उज्जैन के महाकाल मंदिर पूजनदर्शन करने गए. उन के तीसरेचौथे फैसले भी इसी सिलेबस का हिस्सा हैं कि राज्य में उन जगहों को तीर्थस्थल बनाया जाएगा जहांजहां हो कर वनवास के दौरान राम गुजरे थे. सड़कों, अस्पतालों, उद्योगों, एयरपोर्टों के फैसले-दिल्ली में पीएमओ लेगा और वे पढ़ कर सुना भर देंगे.

छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी अप्रत्यक्ष रूप से ईसाईयों को हड़काते कहा कि गौवध और धर्मांतरण बरदाश्त नहीं किया जाएगा. वे भी अपने नाम की घोषणा होते ही सीधे रायपुर स्थित राम जानकी मंदिर गए थे. राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी सब से पहले जयपुर में सरल बिहारी मंदिर जा कर भगवान के दर्शन किए और वहीं एक संत मृदुल कृष्ण शास्त्री से आशीर्वाद भी लिया.

मंदिर हर कोई जाता है लेकिन जब कोई बड़ी और अप्रत्याशित उपलब्धि मिल जाती है तब मंदिर जा कर उक्त चमत्कार की बाबत भगवान को नमस्कार करने का मतलब होता है कि हे प्रभु, तेरा लाखलाख धन्यवाद जो तू ने इस नाचीज भक्त की सुनी, वरना तो हम कहां इस काबिल थे.

अब असल सियासी मंदिर दिल्ली में है. नरेंद्र मोदी इन के आदर्श और आराध्य दोनों हैं. उन से और उन के पीएमओ से मिले आदेशोंनिर्देशों का पालन ये तीनों व बाकी मुख्यमंत्री पूरी निष्ठा से करते हैं. यही मोदीशाह चाहते भी थे क्योंकि शिवराज सिंह, वसुंधरा राजे और रमन सिंह उन के बराबर ही सीनियर हैं. लिहाजा, उन पर हुक्म चलाना और मनमाने काम करा लेना आसान नहीं रह जाता. दूसरे लफ्जों में कहें तो ये तीनों वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री बनते तो इस बात पर राजी नहीं होते कि राज्य पूरा का पूरा पीएमओ से चले.

युवा मुख्यमंत्रियों को भाजपा अभी हाथोंहाथ ले रही है लेकिन ठीक वैसे ही जैसे नई बहू को लिया जाता है. नई बहुओं के बारे में गलत नहीं कहा जाता कि वे चूडि़यां ज्यादा खनकाती हैं जिस से लगे कि वे काम ज्यादा कर रही हैं. यह भी सच है कि वे काम दिखाने के लिए क्षमता से ज्यादा मेहनत करती हैं लेकिन यह नहीं सम झ पातीं कि इस से उन्हें कोई अधिकार नहीं मिल गए और न ही घर की तिजोरी की चाबियां मिल गईं. कभी तो मिलेंगी, इस आस में बेचारी ड्राइंग और डायनिंग रूम के जूठे बरतन उठाते नौकरानियों की तरह उम्र गुजार देती हैं लेकिन सास से घर की सत्ता नहीं छीन पातीं.

कहीं प्राउड बौयज जैसा इरादा तो नहीं

बहैसियत भाजपा परिवार के मुखिया, इन नईपुरानी बहुओं के जरिए नरेंद्र मोदी अपने इर्दगिर्द जो घेरा बना रहे हैं वह काफीकुछ अमेरिका के दक्षिणपंथी संगठन प्राउड बौयज जैसे स्ट्रक्चर सा बनता जा रहा है. इस संगठन की बुनियाद साल 2016 में डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने रखी थी. प्रगतिशीलता और वामपंथ के विरोधी प्राउड बौयज की खासीयत यह है कि इस में सिर्फ पुरुष सदस्य ही होते हैं जो साम्यवाद और नारीवाद के विरोधी होते हैं.

यह संगठन पूरी तरह रिपब्लिकन पार्टी के एजेंडे पर आक्रामक रूप से चलता है, मसलन धर्म और रंग के आधार पर भेदभाव करना. नस्ल की बिना पर प्राउड बौयज खुद को श्रेष्ठ मानता है. इस की नफरत का शिकार आएदिन महिलाएं, मुसलिम और ट्रांसजैंडर होते रहते हैं.

कम शब्दों में कहें तो प्राउड बौयज अपने से अलग दिखने वाले हर आदमी को खारिज करता है. हालांकि यह किसी भी तरह की हिंसा और भेदभाव से इनकार करता है लेकिन कई बार इस का सच उजागर हो चुका है. प्राउड बौयज के सदस्य हर उस रैली में दिखते हैं जो व्हाइट सुप्रीमेसी के समर्थन में निकाली जाती है.

ये लोग लाल रंग की टोपी पहनते हैं जिस पर इंग्लिश में लिखा होता है, ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’. गौरतलब है कि यह नारा 2016 में डोनाल्ड ट्रंप की चुनावी मुहिम में लगाया जाता था. इस के मौजूदा मुखिया अफ्रीकन-क्यूबन मूल के एंट्रिक टेरियो हैं. कई हिंसक और उग्र गतिविधियों में प्राउड बौयज की भागीदारी उजागर हो चुकी है जिन में 6 जनवरी, 2021 को हुई कैपिटल हिल की चर्चित हिंसा भी शामिल है. कुल जमा ये लोग डोनाल्ड ट्रंप को भगवान की तरह मानते हैं. ऐसे ही लोगों का जमावड़ा, अलग तरीके से ही सही, भारत में नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द होने लगा है.

देश और दुनिया को ऐसे युवाओं की कतई जरूरत नहीं है फिर चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी. ये शांति, सद्भाव और लोकतंत्र के लिए खतरा ही साबित होते हैं और तरक्की में बड़ा अडं़गा भी होते हैं क्योंकि ये एक विचार या धर्म के गुलाम हो कर रह जाते हैं, फिर इन्हें खुद से और देश से जुड़ी समस्याओं व मुद्दों से कोई सरोकार नहीं रह जाता. अर्धराजनेता बन जाने वाले ये युवा पूरी जवानी और ताकत अपने आकाओं के मकसद को पूरा करने में  झोंक देते हैं.

कांग्रेस भी खा रही मात

देश में युवा नेतृत्व का अभाव सभी पार्टियों में बराबर से है और सभी पार्टियां बूढ़ों के भरोसे ही चल रही हैं. कांग्रेस एक हद तक इस का अपवाद इन मानो में कही जा सकती है कि राहुल गांधी युवा हैं लेकिन हालफिलहाल उन के भी प्रधानमंत्री बन जाने के आसार कम ही दिख रहे हैं. हालांकि लोकतांत्रिक राजनीति में गारंटी से कुछ भी कहना बुद्धिमानी की निशानी नहीं मानी जाती लेकिन वर्तमान हालात की अनदेखी करना भी बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती. राहुल गांधी खुद प्रधानमंत्री बनने के बहुत ज्यादा उत्सुक और नरेंद्र मोदी की तरह उतावले नहीं दिख रहे हैं. इस की एक वजह ‘इंडिया’ गठबंधन की आपसी कलह और मतभेद भी है.

हिंदी पट्टी के 3 राज्यों के नतीजों ने कांग्रेस को भी आगाह किया है कि वह बूढ़ों से छुटकारा पाते युवाओं को आगे लाए लेकिन उस के साथ भी दिक्कत यही है कि पार्टी के बूढ़ों ने युवाओं को कभी पनपने का मौका ही नहीं दिया. मध्य प्रदेश से कमलनाथ-दिग्विजय सिंह के युग की विदाई अगर चुनाव के पहले ही वह कर देती और राजस्थान में अशोक गहलोत की जगह सचिन पायलट को आगे कर चुनाव लड़ती तो परिणाम कुछ और भी हो सकते थे.

अब उस ने उन जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है जो खुद अपनी सीट राऊ से लंबे मार्जिन से हारे हैं. जीतू पटवारी हालांकि पूरे जोशखरोश से नई जिम्मेदारी संभालने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वे  झांकी और शोबाजी के कांग्रेसी संस्कारों से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहे, न ही हार से कोई सबक ले रहे हैं. पद संभालने के बाद उन्होंने इंदौर से भोपाल तक वाहनों का काफिला निकाला और उज्जैन के महाकाल मंदिर में पूजाअर्चना भी की जबकि महाकाल तो आशीर्वाद भाजपा को पहले ही दे चुके हैं.

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस को वजनदार और जमीनी युवा चेहरे ही नहीं मिल रहे. ऐसे में कांग्रेसी युवाओं को दिल्ली के सपने देखने चाहिए या नहीं, यह खुद उन्हें ही तय करना है कि अब उन के लिए राजनीति पहले सी आसान नहीं रह गई और बिना वोटर से सीधे जुड़े प्रदेश जीतना ही मुश्किल और बड़ी चुनौती बन गया है. उन की यह मुश्किल मंदिरों से तो हल नहीं होने वाली. तीनों राज्यों में सुकून देने वाली इकलौती बात यह है कि कांग्रेस के वोट शेयर में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आई है. अब इसे बढ़ाने के लिए क्या कोशिश और मेहनत युवा कांग्रेसी करते हैं, यह देखना दिलचस्पी की बात होगी.

इंडिया गठबंधन क्या करेगा, यह एक अलग बात है लेकिन युवा कांग्रेसियों का काम बिना राहुल गांधी को ताकतवर बनाए नहीं चलने वाला ठीक वैसे ही जैसे भाजपाइयों का नरेंद्र मोदी के बिना नहीं चलता. कर्नाटक की 28 और तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटें बेहद अहम कांग्रेस के लिहाज से हो चली हैं. कर्नाटक में कितना जोर सिद्धारमैया, डी के शिवकुमार की जोड़ी और तेलंगाना में रेवंत रेड्डी लगा पाएंगे, खुद उन का भविष्य भी इसी नंबर पर निर्भर करेगा. इस के लिए कांग्रेस को युवाओं को फिर से जोड़ना ही पड़ेगा और खुद भी उन से जुड़ना पड़ेगा.

क्षेत्रीय दलों की भी है परेशानी

क्षेत्रीय दलों की यह खूबी रही है कि उन की शुरुआत युवा नेतृत्व से ही होती रही है लेकिन उन्होंने भी गलती वही की कि वक्त पर युवा नेतृत्व नहीं उभरने दिया और जब उभरने दिया तब तक भाजपा अपनी पैठ बना चुकी थी. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को सत्ता और संगठन दोनों का अनुभव है लेकिन सवर्ण और दलित युवाओं को सपा से जोड़ने की कोशिश उन्होंने कभी नहीं की.

अखिलेश अभी भी उत्तर प्रदेश में खासे लोकप्रिय हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद उन से अभी भी बहुत दूर है. अयोध्या के होहल्ले में वे बहुत ज्यादा सीटें हासिल कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा. दूसरे, कांग्रेस से उन की सीटों पर क्या डील होती है, इस का भी असर नतीजों पर पड़ेगा.

बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी की कमान ऐसे वक्त में भतीजे आकाश आनंद को सौंपी है जब हाट लुट चुकी है. वैसे भी, आकाश जमीनी नेता नहीं हैं और न ही बहुत ज्यादा लोकप्रिय हैं.  विधानसभा चुनाव के वक्त जब वे पिछली 9 अगस्त को भोपाल रैली करने आए थे तब बमुश्किल हजारपंद्रह सौ की भीड़ ही जुट पाई थी जबकि इतने लोग तो कभी मायावती और कांशीराम की रैलियों के इंतजाम का काम देखते और करते थे. दलितों की बदहाली का अंदाजा भी उन्हें नहीं है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी ?अपने भतीजे 36 वर्षीय अभिषेक बनर्जी को राजनीति में काढ़ना शुरू कर दिया है और वहां के वोटर भी अभिषेक को सहज स्वीकारने लगे हैं लेकिन भाजपा को यह युवा रास नहीं आ रहा है, लिहाजा उन्हें भी अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन की तर्ज पर सरकारी एजेंसियों के जरिए हर कभी परेशान किया जाता है जिस से उन की हिम्मत टूटे.

अभिषेक की लोकप्रियता और स्वीकार्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे 2 बार डायमंड हार्बर सीट से लोकसभा पहुंच चुके हैं.  2019 में तो उन्होंने भाजपा उम्मीदवार नीलांजन राय को 3 लाख 20 हजार से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी थी. देशभर के युवा नेताओं में से कोई देश की सब से बड़ी कुरसी का सपना देख सकता है तो अभिषेक का नाम उन में सब से ऊपर है.

यह सपना अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन भी देख सकते हैं लेकिन उन की नींद ईडी ने उड़ा रखी है. ये दोनों कभी भी गिरफ्तार किए जा सकते हैं लेकिन हथियार डालने या हिम्मत छोड़ने की उम्मीद इन से नहीं की जाती क्योंकि ये जमीनी और जु झारू हैं और वैकल्पिक व्यवस्थाएं इन्होंने अपनेअपने राज्यों में कर रखी हैं.

-साथ में शैलेंद्र और चंद्रकला द्य

नौकरी के लिए जा रहे हो अनजान शहर, तो इन बातों का रखें ध्यान

किसी अनजान जगह में नौकरी करना आसान काम नहीं होता खासकर बङे शहरों में. बङी समस्या तब आती है जब रहने के लिए किसी आशियाने की तलाश करनी हो.

जौइनिंग के बाद किसी गेस्टहाऊस या होटल में रह कर मकान ढूंढ़ना बेहद पेचिदा काम होता है. रहने का ठौर मिल भी जाए तो फिर जरूरत का सामान जैसे बैड, टेबलकुरसी वगैरह के साथ शिफ्ट करना आसान काम नहीं होता.

भोपाल के 26 वर्षीय चैतन्य ने बताया,”मुझे समझ आ गया कि आते वक्त क्यों मम्मीपापा चिंता जताते ढेरों नसीहतें दे रहे थे.”

अब से कोई डेढ़ साल पहले बीटेक करने के बाद चैतन्य की नौकरी एक नामी सौफ्टवेयर कंपनी में लगी थी तो उस की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था.

शुरुआती पैकेज भी अच्छा यानी उसे ₹7 लाख सालाना मिल रहा था. अपना घर, शहर और पेरैंट्स को छोड़ने का दुख जरूर था लेकिन सवाल कैरियर का था.

यों आजकल के युवा बेहद व्यावहारिक हो चले हैं और खुद के लिए फैसले लेने लगे हैं पर चैतन्य के साथ जो हुआ उसे जान कर लगता है कि उस के अंदर उत्साह तो था मगर अनुभव की कमी थी.

अनजान जगह नौकरी करने जाना आसान काम है लेकिन वहां जमने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है और इस की तालीम किसी कालेज में नहीं मिलती.

चैतन्य जैसे कई और युवाओं से बात करने पर महसूस होता है कि घर से दूर अनजान जगह जा कर नौकरी करना एक तरह से नई जिंदगी की शुरुआत होती है जिस की तुलना उस प्रचलित कहावत से की जा सकती है कि बच्चे को जन्म देना किसी भी स्त्री का दूसरा जन्म होता है.

होमवर्क कर के जाएं

दूरदराज तो दूर की बात है खुद के शहर में भी किराए का मकान आसानी से नहीं मिलता फिर मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, पुणे और बैंगलुरु जैसे महानगरों की तो बात ही कुछ और है.

चैतन्य ने सोचा था कि मकान यों ही घूमतेफिरते मिल जाएगा. इस के लिए उस ने कुछ इलाकों के चक्कर काटे मगर खुद चकरा उठा.

पहली समस्या उसे भाषा की आई क्योंकि कन्नड़भाषी हिंदी और इंग्लिश दोनों ही अच्छी तरह नहीं जानते, दूसरे अनजान आदमी को कोई मकान देने को तैयार नहीं होता.

घबराए चैतन्य ने कंपनी के हिंदीभाषी सहकर्मियों को अपनी परेशानी बताई तो उसे सलाह दी गई कि किसी ब्रोकर के जरीये मकान ले लो. ब्रोकर के जरीये मकान लेना महंगा पड़ता है.

भागादौड़ी के बाद पता चला कि बैंगलुरु में अधिकतर हिंदी प्रदेशों के नौकरीपेशा युवा इलैक्ट्रोनिक सिटी और व्हाइट फील्ड इलाकों में रहते हैं. चैतन्य इन इलाकों में गया तो उसे थोड़ी राहत मिली क्योंकि वहां वाकई हिंदीभाषी राज्यों के युवा इफरात से दिखे, जिन से बातचीत हुई तो उसे मकान मिलने की आस बंधी और पहली बार अपनापन महसूस हुआ.

नहीं तो पिछले 10 दिनों में उसे यही लगा कि वह अपने ही देश के एक राज्य में नहीं बल्कि विदेश में कहीं रहने आया है.

खैर जैसेतैसे उसे मकान मिल गया. मदद करने वाला था झारखंड के धनबाद जिले का अभिनव, जिसे एक रूममेट की तलाश थी क्योंकि 2 कमरों वाले जिस छोटे से फ्लैट में वह रह रहा था उस का किराया ही ₹25 हजार महीना था.

अभिनव की नौकरी भी चैतन्य की तरह प्लेसमेंट के जरीये एक सौफ्टवेयर कंपनी में लगी थी. आधा किराया चैतन्य के हिस्से आया जो उसे ज्यादा नहीं लगा क्योंकि मकान में तमाम सुविधाएं मौजूद थीं.

रहने की समस्या हल हो गई लेकिन 12 दिन चैतन्य तनाव, आशंका और चिंता में रहा.

चैतन्य ने बताया कि अगर हिंदीभाषी राज्यों के युवा खासतौर से दक्षिण भारत के राज्यों में नौकरी के लिए आएं तो उन्हें घर से ही सारी जानकारियां हासिल कर लेनी चाहिए और किसी अनजान जगह में नौकरी करते समय कई सावधानियां भी बरतनी चाहिए.

गलतियों से बचें

चैतन्य को अभिनव ने पहले ही बता दिया था कि यहां सब से बडी परेशानी भाषा की है. स्थानीय लोग कन्नड़ ही बोलते हैं और इस वजह से हिंदी भाषियों से ज्यादा मेलजोल भी नहीं रख पाते.

फ्लैट में शिफ्ट होने के बाद नई परेशानी खानेपीने की होने लगी. कुछ दिन तो होटल का खाना अच्छा लगा लेकिन फिर बेस्वाद लगने लगा क्योंकि बैंगलुरु में अच्छी रोटी मिलती नहीं और मिलती भी है तो मैदे की बनी, जिस की उसे आदत नहीं थी.

मुंबई की एक कंपनी में जौब कर रही गुंजन के मुताबिक, हिंदीभाषी राज्यों के युवाओं की एक बडी समस्या खानपान है जो महाराष्ट्र में भी मनमुताबिक नहीं मिलता.

पुणे की अपूर्वा को अब भी याद है कि जब मम्मी मनपसंद पकवानों से सजी थाली लिए आगेपीछे घूमती थीं तो उसे नखरे आते थे. अब अकसर वड़ापाव खाना पङता है.

लेकिन रहने और खाने के अलावा और भी कई बातें हैं जिन पर बाहर रह कर नौकरी कर रहे युवाओं को खास ध्यान रखने की जरूरत है.

आइए, कुछ अहम बातों को ऐसे ही कुछ युवाओं की जबानी समझें :

• घर से दूर नौकरी करने पर युवा पारिवारिक बंदिशें, रोकटोक और नसीहतों से आजाद हो जाते हैं लेकिन इस का दुरुपयोग महंगा पड़ सकता है इसलिए उन्हें बहुत संभल कर रहना चाहिए.

• सब से पहले तो युवाओं को शराब और नशे की लत आदि से बच कर रहना चाहिए.

• शराब की तरह धूम्रपान भी युवाओं के लिए नुकसानदेह साबित होता है. यह सोचना बहुत बङी गलती और गलतफहमी भी है कि सिगरेट पीने से गम को भुलाया जा सकता है या फिर कम किया जा सकता है. धूम्रपान से असाध्य रोगों यानी कैंसर आदि से पीङित होने की संभावना रहती है.

• पुणे में नौकरी कर रही विदिशा की मानें तो रैडलाइट इलाकों में भी कई नौकरीपेशा युवा जाते हैं और वहां से सैक्स रोग ले आते हैं और फिर दूसरी गलती नीमहकीमों से बीमारियों का इलाज कराते हैं.

इसलिए गलती से ही सही ऐसा कुछ हो जाए तो उन्हें एलोपैथी के विशेषज्ञ डाक्टरों से ही इलाज कराना चाहिए और सैक्स संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

• गुरुग्राम की एक कंपनी में कार्यरत उज्जैन की प्रकृति सोशल मीडिया पर वक्त की बरबादी को नौकरीपेशा युवाओं की सब से बङी गलती मानती हैं.

उन के मुताबिक, सोशल मीडिया की जगह युवाओं को पत्रपत्रिकाएं अथवा अच्छा साहित्य पढ़ने में मन लगाना चाहिए जिस से बुद्धि और प्रतिभा और निखरें.

• युवाओं को यह हर समय याद रखना चाहिए कि वे घर से दूर जा कर नौकरी पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं नकि अपनी कमाई को बरबाद करने के लिए, इसलिए उन्हें फुजूलखर्ची से बचना चाहिए.

बचत का पैसा ही असली कमाई होता है जोकि भविष्य और बुरे वक्त में काम आता है.हालांकि अपनी कमाई से उन्हें अपने वे तमाम शौक पूरे करने का पूरा हक है जिस के लिए कालेज लाइफ में वे तरस जाते थे मसलन ब्रैंडेड कपङे, फुटवियर और फैशन से जुङी तमाम ऐसी चीजें जिन का उन्हें पहले से ही शौक रहा हो लेकिन छात्र जीवन में पूरी न कर पाए हों.

• जितना हो सके उधारी के लेनदेन से बचना चाहिए.

• महीने का बजट बना कर खर्च करना चाहिए और सट्टे की लत आदि से दूर रहना चाहिए.

• आमतौर पर किसी कंपनी में एक दिन में 10 से 12 घंटे काम करना पड़ता है. इसलिए बचे हुए वक्त में खुद की सेहत पर खास ध्यान देना चाहिए. इस के लिए या तो घर पर ही कसरत करना बेहतर होता है या फिर जिम आदि जौइन करना, जिस से फिट रहा जा सके.

• वक्त काटने का एक और उपयोगी तरीका खुद घर पर खाना बनाने का है. इस से अपनी पसंद का जायकेदार खाना खाने को मिलेगा.

• शुरुआती दौर में होम सिकनैस से बचने के लिए घर वालों से रोज बात करना बेहतर है. वीडियो काल इस के लिए बेहतर है.

• स्थानीय लोगों से वादविवाद में नहीं पड़ना चाहिए.

• युवतियों को खासतौर से एहतियात बरतने की जरूरत होती है.

चैन्नई में कार्यरत नेहा कहती है कि अनजान लोगों से ज्यादा संबंध बनाना कभीकभी महंगा पड़ जाता है.

वह यह भी सलाह देती है कि लड़कियां  अपने बौयफ्रैंड से सैक्स संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल जरूर करें और सैक्स पार्टनर को इस के लिए दबाव दें ताकि अनावश्यक गर्भधारण से बचा जा सके.

ऐसी कई छोटीबडी बातों का ध्यान रखा जाए तो कई परेशानियों से युवा खुद को बचाए रख सकते हैं. खुद को अपडेट रखने से जौब में भी फायदा होता है और खुद का आत्मविश्वास भी बढ़ता है.

मैं रोज मास्टरबेशन करती हूं, क्या ऐसा करना ठीक है ?

सवाल

मेरी उम्र 24 साल है, 3-4 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. मैं ने अभी तक किसी के साथ सैक्स संबंध नहीं बनाए हैं, वर्जिन हूं पर मास्टरबेशन रोज ही करती हूं. इस कारण मुझे लगता है कि इस से प्राइवेट पार्ट की स्किन ढीली हो गई है. इस वजह से बहुत तनाव में आ गई हूं. मेरे होने वाले पति कहीं मु झे गलत न समझ बैठें कि मैं ने शादी से पहले किसी के साथ सैक्स संबंध बनाए हैं.

जवाब

जिस तरह सैक्स करने से प्राइवेट पार्ट की स्किन लूज नहीं होती, उसी तरह मास्टरबेशन से भी स्किन पर कोई फर्क नहीं पड़ता और वह ढीली भी नहीं पड़ती है.

हकीकत तो यह है कि किसी अंग के कम उपयोग से ही उस में शिथिलता आती है न कि नियमित उपयोग से. आप अपनी शादी की तैयारियां जोरशोर से करें और मन में व्याप्त भय को पूरी तरह निकाल दें. आप की वैवाहिक जिंदगी पर इस का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा.

सत्ता के लिए

हमारे नेताओं में सत्ता पाने या सत्ता में बने रहने की कितनी छटपटाहट है, यह सब दिख रहा है. संसद में बहुमत के चलते नरेंद्र मोदी सरकार और कुछ विधानसभाओं में बहुमत के चलते भाजपाई सरकारें सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर सत्ता में बने रहने का हरसंभव प्रयास कर रही हैं तो विपक्षी दल आरोपों की झड़ी लगाते संसद में हंगामा खड़ा कर और सुप्रीम कोर्ट में जो बचीखुची ताकत है उस के बल पर देश में बचे लोकतंत्र को बचाने व राजनीति को जैसेतैसे बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

सत्ता की छटपटाहट के सैकड़ों उदाहरण हमारे सनातन ग्रंथों में मिलते हैं. हमारे ऋषि, मुनि, राजा, देवी, देवता, दस्यु सब की कथाएं जो वेदों व पुराणों में हैं, सब सत्ता के लिए हैं. जनसेवा का उदाहरण तो बड़ी मुश्किल से ढूंढ़ने पर मिलेगा. शिवपुराण में एक कथा दस्यु राजा तारक की है जिन्होंने तपस्या कर के ब्रह्मा से 3 पुत्र मांगे. आज के वोटरों की तरह ब्रह्मा ने ये 3 पुत्र दे दिए तो देवताओं में खलबली मच गई.

इन पुत्रों ने 3 नगर बसाए और इन नगरों में शिवपुराण के अनुसार बावलियां, उद्यान, नदियां, फलोंफूलों से भरे पेड़, क्रीड़ास्थल, पाठशालाएं थीं. उन्होंने, जैसा हर ग्रंथ में लिखा होता है, ब्राह्मणों का भी रहनेखाने, गृहस्थी जमाने का पूरा ध्यान रखा. पर फिर भी इंद्र आदि देवता दुखी हुए. वे भी ब्रह्मा के पास पहुंचे, ठीक वैसे ही जैसे आज विपक्ष सत्ताधारी पार्टी को हटाने के लिए वोटरों के पास पहुंच जाता है.

ब्रह्मा ने वैसे तो इनकार कर दिया पर फिर भी उपाय बताया कि तारक पुत्रों को धर्म से विमुख कर दो. जैसे कांग्रेस पर अयोध्या की बाबरी मसजिद को बचाने और राममंदिर न बनने देने का आरोप लगा, वैसा ही तारक पुत्रों पर लगा. बाद में शिव की सहायता से तीनों नगरों को देवताओं ने जीत लिया.

यह किस्सा सत्ता का है. इसी तरह का मामला देश में बारबार दोहराया जा रहा है. सत्ता में रहने के लिए जो लोलुपता हमारे नेताओं में है कि जिस के लिए लोकतंत्र की बचीखुची भावना को भी कुचला जा रहा है, वह संसद के शीतकालीन सत्र में दिखी.

भारतीय जनता पार्टी 3 राज्यों में कांग्रेस को पराजित कर के आई है तो उसे संसद में बड़प्पन दिखाना चाहिए पर वह अभी भी इंद्र आदि देवताओं की तरह भयभीत है और ब्रह्मा को अपना वरदान वापस लेने की मिन्नत करने जैसे काम कर रही है. फर्क यह है कि भाजपा सत्ता में है और देवीदेवताओं पर भी उस का एकाधिकार है.

पर मूल बात यह है कि विवाद सत्ता का है, जनहित की नीतियों का नहीं. अब यह सत्ता सामाजिक वर्णव्यवस्था को धर्म के सहारे बनाए रखने की है, अपने मनचाहे उद्योगपतियों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की है या शासन में रहने के गरूर की है, या इन तीनों की है, फर्क नहीं पड़ता. यह साफ है कि दोनों पक्ष जनहित की बात करते नहीं दिखते.

सरकार केवल मंदिर बनवा रही है तो विपक्ष केवल बेरोजगारों की बात कर रहा है. जैसे तारक पुत्रों से देवताओं को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा था, वैसे ही आज विपक्षी दलों या उन की गिनीचुनी राज्य सरकारों से भाजपा को खास फर्क नहीं पड़ रहा.

भाजपा व्यवहार ऐसे कर रही है मानो कोई धर्मयुद्ध हो रहा हो. लोकतंत्र की भावना को बचाए रखने की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए क्योंकि संवैधानिक हक उस के पास हैं पर वह तो अपनी सत्ता को सदासदा के लिए बनाए रखने को ब्रह्मारूपी वोटरों को बटोरने में लगी है. इस के लिए दोष तो उसी सनातन पौराणिक सोच को देना होगा न, जिसे बारबार दोहरा कर हर समझदार के मन में बैठाया जा रहा है और यह कृत्य भाजपा, आरएसएस व उस से संबद्ध संगठनों द्वारा ही किया जा रहा है.

ख्वाब पूरे हुए : नकुल की शादी से क्यों घर वाले नाराज थे?

story in hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें