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सोशल मीडिया ने दिया पुराने कलाकारों को नया एक्सपोजर

70 के दशक के तमाम बौलीवुड सितारे, जैसे शर्मीला टैगोर, आशा पारेख, वैजन्ती माला बाली, वहीदा रहमान, मुमताज, जीनत अमान, धर्मेंद्र जीतेंद्र आदि अपने जमाने और अपनी जवानी में अदाकारी के आसमान पर चमचमाने के बाद बीच के दशकों में गहरे अंधेरे की परतों में जो खो गए थे, अब फिर रंगीन परदे पर जगमगाने लगे हैं और यह मौका उन्हें मिला है सोशल मीडिया से.

सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स, जैसे यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के बढ़ते इस्तेमाल ने इन पुराने कलाकारों को फिर से ग्लैमर की दुनिया में आने के लिए प्रेरित किया है. छोटीछोटी रील्स के जरिए जब इन खोए हुए कलाकारों की दिनचर्या दर्शकों के सामने आई तो वे भी खुशी से उछल पड़े.

यूट्यूब और फेसबुक के जरिए घरघर तक पहुंचने पर न सिर्फ उन के व्यूअर्स की तादाद बढ़ी बल्कि टीवी शोज के निर्माताओं का ध्यान भी उन की ओर गया. 70 से 80, 85 और कुछ तो इस से भी उम्रदराज कलाकार अनेक टीवी शोज में बतौर जज बन कर आने लगे. हास्य से भरपूर ‘द कपिल शो’ में पूनम ढिल्लो, पद्मिनी कोल्हापुरे जैसी अभिनेत्रियों को देख कर 80 के दशक की अनेक फिल्में फिर से जीवंत हो उठीं. उन के अनुभव और खट्टीमीठी यादों ने जहां दर्शकों को गुदगुदाया, वहीं इन कलाकारों को भी यह एहसास दिलाया कि अच्छी अदाकारी और अच्छे कलाकार कभी मिटते नहीं हैं, हां, समय की धूल में ढक जाते हैं, मगर भला हो सोशल मीडिया का, जिस ने धूल को झाड़फूंक कर सितारों को गर्दिश से निकाला.

सारा अली खान ने अपनी दादी शर्मिला टैगोर के साथ कई रील्स यूट्यूब पर शेयर कीं तो लोगों के जेहन में फिर से ‘कश्मीर की कली’ वाली खूबसूरत डिंपल वाली शोख और कमसिन शर्मिला की छवि उभर आई. लोगों को जान कर आश्चर्य हुआ कि नवाब पटौदी की करोड़ों की संपत्ति की मालकिन शर्मीला इन दिनों दिल्ली की एक कोठी में अकेले रह रही हैं. समयसमय पर उन के बच्चे उन से मिलने आते रहते हैं. दिल्ली की मीडिया को जब इस बात का पता चला तो कई रिपोर्टर्स ने शर्मिला टैगोर का इंटरव्यू किया. उन्होंने भी खुशीखुशी इंटरव्यू दिए.

‘द कपिल शो’ ने पुराने समय के अनेक बेहतरीन कलाकारों को अपने मंच पर आमंत्रित किया. 1990 में आई फिल्म ‘आशिकी’ के कलाकार दीपक तिजोरी, अन्नू अग्रवाल और राहुल रौय जब कपिल के मंच पर आए तो आशिकी के तमाम रूमानी और मेलोडियस गीत कानों में बज उठे, जो बीच के सालों में बिलकुल गायब हो गए थे. डांस रिऐलिटी शो में मिथुन चक्रवर्ती ने बतौर जज खूब उत्साहित किया और उन के फिल्मी अनुभव नए कलाकारों के लिए प्रेरणा बने.

छोटे परदे पर आईं वहीदा रहमान ने जब दर्शकों से अपने गुजरे फिल्मी जीवन और वर्तमान जीवन के अनुभव साझा किए तो दर्शक यह जान कर आश्चर्चकित रह गए कि मशहूर वेटरन ऐक्ट्रैस वहीदा रहमान आज 86 साल की उम्र में अपना सालों पुराना फोटोग्राफी का शौक पूरा कर रही हैं.

वहीदा रहमान इस उम्र में स्कूबा डाइविंग तक करना चाहती हैं. पद्मश्री, पद्मभूषण और दादा साहेब फाल्के जैसे बड़े सम्मान हासिल कर चुकीं वहीदा रहमान महज 17 साल की थीं जब वे हिंदी सिनेमा का हिस्सा बनी थीं. अपने 6 दशकों के ऐक्टिंग कैरियर के बाद वहीदा रहमान लोगों की नजरों से बिलकुल गायब हो गई थीं मगर छोटा परदा उन्हें फिर उन के चाहने वालों के पास ले आया.

फिल्मी परदे पर अपनी रूमानी अदाओं का जादू चलाने वाली आशा पारेख गुजरे जमाने की मशहूर अदाकाराओं में से एक थीं. अपने सिने कैरियर में आशा ने एक से बढ़ कर एक सुपरहिट फिल्में दी हैं. अपने दमदार अभिनय से आशा ने कई दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया. आज कैमरे 81 वर्षीय आशा पारेख का फिर से पीछा करने लगे हैं. यह सोशल मीडिया का ही कमाल है. हालांकि, इस बीच वे सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्ष भी रहीं.

81 साल की आशा पारेख ने आज तक शादी नहीं की. अपनी बायोग्राफी ‘आशा पारेख: द हिट गर्ल’ में ऐक्ट्रैस ने खुलासा किया कि वे मशहूर डायरैक्टर और प्रोड्यूसर नासिर हुसैन से प्यार करती थीं. मगर वे उन से शादी नहीं कर पाईं, क्योंकि नासिर पहले से ही शादीशुदा थे. वे किसी का घर तोड़ कर अपना आशियाना नहीं बनाना चाहती थीं. नासिर के साथ रिलेशनशिप की खबरों के बावजूद आशा का उन की पत्नी और बच्चों के साथ अच्छा बौंड था. आशा की बायोग्राफी लौंच में नासिर की फैमिली भी शामिल हुई थी.

फिल्म ‘शर्मीली’ में जुड़वां बहनों का शोख और शर्मीला रोल निभाने वाली राखी गुलजार के बारे में किसी को नहीं पता था कि फिल्में छोड़ने के बाद वे कहां हैं, क्या कर रही हैं. हाल ही में उन की कई रील्स सोशल मीडिया पर दिखाई दीं जिन में 75 वर्षीया राखी अपने फार्महाउस में पौधे रोपती दिख रही हैं, अपनी गायों को चारा खिलाती नजर आ रही हैं. कभी हर वक्त लाइमलाइट में रहने वाली राखी आज सपनों की दुनिया मुंबई से दूर एक फार्महाउस में एकाकी जीवन जी रही हैं.

‘जीवन मृत्यु’, ‘शर्मीली’, ‘दाग़’, ‘ब्लैकमेल’, ‘कभीकभी’, ‘तपस्या’, ‘दूसरा आदमी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘बसेरा’, ‘शक्ति’ और ‘करण अर्जुन’ जैसी कितनी ही फिल्में राखी के खाते में हैं. मगर आज अपने फार्महाउस पर राखी एक किसान की तरह रहती हैं. सब्जियां उगाती हैं, बागबानी करती हैं. उन के इस फार्महाउस में कितने ही किस्म के कुत्ते और बिल्लियों के साथ बहुत से जानवर रहते हैं जिन्हें वे अपने हाथों से खिलातीपिलाती भी हैं और नहलातीधुलाती भी.

राखी के बारे में यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि स्टार रहते हुए भी वे अपने सभी काम खुद करती रहीं चाहे घर के कामकाज की निगरानी हो या कानूनी मसले या इनकम टैक्स जमा कराना हो. बता दें कि राखी ने कभी अपने लिए प्रचार एजेंट नहीं रखा.

एक रिपोर्टर ने जब राखी से एक इंटरव्यू में पूछा कि ‘वे इतनी एकांत प्रिय क्यों हो गई हैं?’ तो राखी ने जवाब दिया, ‘मैं अब चकाचौंध की दुनिया में नहीं रहना चाहती. मैं काफी फिल्में कर चुकी हूं. मुझे अब न ज्यादा रुपयों की जरूरत है, न फिल्मों की. मेरी दुनिया अब पनवेल का मेरा फार्महाउस है, जहां मैं हूं और मेरे प्रिय जानवर. मुझे अपनी आजादी से प्यार है. वहां मुझ से कोई सवाल नहीं कर सकता. मैं अपनी जिंदगी स्वतंत्र ढंग से जीती हूं. कोई मेरे प्रति दया या सहानुभूति दिखाए तो वह मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता. अगर मुझे कोई दुख मिलेगा तो मैं उस से खुद निबटने में सक्षम हूं. मुझे रोने के लिए किसी के कंधे का सहारा नहीं चाहिए.’

छोटे परदे और यूट्यूब रील्स में गुजरे जमाने के सुपरस्टार्स धर्मेंद्र और जीतेंद्र भी आजकल खूब नजर आने लगे हैं. धर्मेंद्र तो अकसर अपने खेतखलिहानों में सब्जियां व फूल उगाते दिखते हैं. कभी वे अपने पशुओं के साथ भी उन की सेवा करते और उन्हें चारापानी देते भी रील्स में नजर आ जाते हैं. वहीं जीतेंद्र को आजकल टीवी पर आने वाले डांस शोज में बतौर जज देखा जाता है. उम्र के इस पड़ाव पर परदे पर आने की उन की खुशी उन के चेहरे की चमक से पता चलती है.

परदा भले सिनेमा का नहीं, टीवी का है मगर पुराने कलाकारों का वहां मौजूद होना उन बीते दिनों की यादें ताजा करता है. उन के होने के साथ उन के पुराने डायलौग्स, वो कर्णप्रिय गीत-संगीत सबकुछ फिर सजीव हो उठा है. बीच के दशकों में रैप और भांगड़ा मिला जो शोरभरा, कानफोड़ू संगीन था और जिसे सुनसुन कर हम उकता चुके थे, इन पुराने कलाकारों के सामने आने से मन को सुकून और कानों में रस घोलने वाले गीतों की मधुर लहरियां फिर से सुनाई देने लगी हैं. इस बदलाव को लाने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है.

कामकाजी पति पत्नी : आमदनी ही नहीं खुशियां भी बढ़ाएं

एक समय था जब महिलाओं का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक सीमित था. पुरुष घर से बाहर कमाने जाते थे और महिलाएं गृहस्थी संभालती थीं. लेकिन आज हालात बदल गए हैं. महिलाएं गृहस्थी तो अब भी संभालती हैं, साथ ही नौकरी भी करती हैं. मगर दोनों के नौकरीपेशा होने से परिवार की आमदनी भले ही बढ़ जाती हो, लेकिन दंपती के पास एकदूसरे के लिए समय नहीं बचता.

कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें एकदूसरे से बतियाने तक का समय नहीं मिल पाता है.

ऐसे में कामकाजी महिला के पास पति और बच्चों के लिए ही समय नहीं होता है, तो किट्टी पार्टी, क्लब जाने या सखीसहेलियों से गप्पें लड़ाने का तो सवाल ही नहीं उठता है.

पत्नी पर निर्भर पति

भारतीय समाज में पुरुष भले ही घर का मुखिया हो, पर वह हर बात के लिए पत्नी पर निर्भर रहता है. यहां तक कि अपनी निजी जरूरतों के लिए भी उसे पत्नी की जरूरत होती है. पत्नी बेचारी कितना ध्यान रखे? पति को हुक्म चलाते देर नहीं लगती, लेकिन पत्नी को तत्काल पति की खिदमत में हाजिर होना पड़ता है अन्यथा ताने सुनने पड़ते हैं कि उसे तो पति की परवाह ही नहीं है. अब जब वह काम के बोझ तले इतनी दबी हुई है कि स्वयं खुश नहीं रह पाती है, तो भला पति को कैसे खुश रखे? जरा सी कोताही होने पर पति के तेवर 7वें आसमान पर पहुंच जाते हैं.

कैसी विडंबना है कि पत्नी अपने पति की सारी जरूरतों का ध्यान रखती है, फिर भी प्रताडि़त होती है और पति क्या वह अपनी पत्नी की इच्छाओं, भावनाओं और जरूरतों का ध्यान रख पाता है? क्या पति ही थकता है, पत्नी नहीं?

कामकाजी पतिपत्नी को एकदूसरे की पसंदनापसंद, व्यस्तता और मजबूरी को समझना होगा. तभी वे सुखी रह सकते हैं.

कामकाजी दंपती कहीं जाने का कार्यक्रम बनाते हैं. लेकिन यदि उन में से किसी एक को छुट्टी नहीं मिलती है, तो ऐसे में यात्रा स्थगित करनी पड़ जाती है. इसे सहज रूप में लेना चाहिए. इसी तरह शाम को कहीं होटल, पार्टी में जाने का प्रोग्राम बना हो, लेकिन किसी एक को दफ्तर में काम की अधिकता की वजह से आने में देर हो जाए, तो उस की यह विवशता समझनी चाहिए.

कामकाजी दंपतियों में औफिस का तनाव भी रहता है. हो सकता है उन में से किसी एक का बौस खड़ूस हो, तो ऐसे में उस की प्रताड़ना झेल कर जब पति या पत्नी घर आते हैं, तो वे अपनी खीज साथी या फिर बच्चों पर उतारते हैं. उन्हें ऐसा न कर एकदूसरे की समस्याओं और तनाव पर चर्चा करनी चाहिए. यदि वे एकदूसरे को दोस्त मानते हुए अपना तनाव व्यक्त करते हैं, तो वह काफी हद तक दूर हो सकता है.

थोपा गया निर्णय गलत

कई बार किसी बात या काम के लिए एक का मूड होता है और दूसरे का नहीं. बात चाहे मूवी देखने या शौपिंग करने की हो, होटल में खाना खाने की हो या कहीं जाने की. यदि दोनों में से एक की इच्छा नहीं है, तो दूसरे को उसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए या फिर एक को दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हुए इस के लिए खुद को तैयार करना चाहिए. लेकिन जो भी निर्णय हो वह थोपा गया या शर्तों पर आधारित न हो.

कामकाजी पतिपत्नी को एकदूसरे से उतनी ही अपेक्षा रखनी चाहिए, जिसे सामने वाला या वाली बिना किसी परेशानी में पड़े पूरा कर सके.

कामकाजी दंपतियों को जितना भी वक्त साथ गुजारने के लिए मिलता है उसे हंसीखुशी बिताएं न कि लड़ाईझगड़े या तनातनी में. इस कीमती समय को नष्ट न करें. घर और बाहर की कुछ जिम्मेदारियों को आपस में बांट लें.

जिस के लिए जो सुविधाजनक हो वह जिम्मेदारी अपने जिम्मे ले ले. इस से किसी एक पर ही भार नहीं पड़ेगा.

माना कि कामकाजी दंपती की व्यस्तताएं बहुत अधिक होती हैं, लेकिन उन्हें दांपत्य का निर्वाह भी करना है. यदि दोनों के पास ही एकदूसरे के लिए समय नहीं है, तो ऐसी कमाई का क्या फायदा? कुछ समय तो उन्हें एकदूसरे के लिए निकालना ही चाहिए. इसी में उन के दांपत्य की खुशियां निहित हैं.

एक और एक ग्यारह : रजत और रोजी की शादी के लिए बुआ क्यों तैयार नहीं थी

‘‘बूआ ने रोजी के पापा को शादी के लिए मनाने की भरसक कोशिश की, मगर वे टस से मस नहीं हो रहे थे…’’‘‘क्या रोजी डिसूजा क्रिश्चियन है? लल्ला तुम्हारा क्या दिमाग खराब हो गया है? क्या हमारी जाति में लड़कियों का अकाल पड़ गया है, जो हम विजातीय बहू घर लाएं? मैं दिवंगत भैयाभाभी को क्या मुंह दिखाऊंगी? मुझ उपेक्षित विधवा को दोनों ने मन से सहारा दिया था. उन की उम्मीदें पूरी करना मेरा फर्ज है… सारे समाज में हमारी खिल्ली उड़ेगी वह अलग,’’  सुमित्रा ने नाराज होते हुए कहा.

‘‘उफ, बूआ, आप नाहक परेशान हो रही हैं. आजकल अंतर्जातीय विवाह को सहर्ष स्वीकार किया जाता है… मांपापा जिंदा होते तो वे भी इनकार नहीं करते. आप पहले रोजी से मिल तो लो… बहुत सभ्य और संस्कारी लड़की है. आप को जरूर पसंद आएगी. बूआ हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं… जातिधर्म का क्या करना है… जीवन में प्यारविश्वास की अहमियत होती है,’’ मैं ने बूआ को समझाते हुए कहा.

‘‘मैं कह देती हूं लल्ला तुम अपनी पसंद की लड़की ला सकते हो, मुझे कोई एतराज नहीं होगा, किंतु विजातीय नहीं चलेगी,’’ बूआ ने भी अपना निर्णय सुना दिया.बूआ अपनी शादी के 10 दिन बाद ही विधवा हो गई थीं. फूफाजी का रोड ऐक्सीडैंट में देहांत हो गया था. बूआ के ससुराल वालों ने उन से रिश्ता खत्म कर लिया. रोतीबिलखती बूआ की चीखपुकार ससुराल के दरवाजे न खुलवा सकी थी. उस दुखदाई घड़ी में मेरे मांपापा ने उन्हें सहारा देते हुए कहा था, ‘‘जीजी, हमारे रहते खुद को बेसहारा और अकेला न समझो,’’ और फिर बूआ हमारे साथ ही रहने लगीं.

मेरे विवाह के संबंध में बूआ का निर्णयमेरे लिए आदेश से कम न था. मैं उसे नकार नहीं सकता था. बूआ ही मेरी सबकुछ थीं. मैं 14 साल का था जब मेरे मांपापा का देहांत हुआ था. उस कच्ची उम्र में मेरी बूआ ने मुझे टूटनेबिखरने नहीं दिया. वे चट्टान बन मेरा संबल बनी रहीं. पापा की छोटी सी किराने की दुकान थी. उन के देहांत के बाद बूआ और मैं ने मिल कर उसे संभाला, बूआ मुझे पढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित करती रहीं. परिणामस्वरूप मैं ने बीकौम तक पढ़ाई कर ली. फिर मुझे प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई. मैं और बूआ बेहद खुश हुए.

मेरे औफिस में मेरी जूनियर रोजी और मैं एकदूसरे से प्यार करने लगे, किंतु बूआ के इनकार के कारण अगले ही दिन मैं ने रोजी को बताते हुए कहा, ‘‘रोजी, बूआ हमारी शादी के लिए तैयार नहीं हैं? मुझे रत्तीभर भी अंदेशा न था कि बूआ जातिधर्म का सवाल खड़ा कर देंगी. वरना मैं आगे न बढ़ता. मुझे माफ कर देना. मैं ने नाहक तुम्हारा दिल दुखाया.’’

रोजी ने संयत स्वर में कहा, ‘‘रजत, हमें बूआ को सोचने हेतु पर्याप्त समय देना चाहिए. मुझे पूरा विश्वास है एक दिन बूआ जरूर मान जाएंगी.’’ ‘‘रोजी, बूआ की बातों से तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है कि जातिधर्म की रूढि़वादिता उन के अंदर जड़ें जमाए है. मैं तुम्हें अन्यत्र शादी की सलाह देना चाहता हूं, शादीविवाह सही उम्र में ही अच्छे लगते हैं. मेरे लिए अपना जीवन बरबाद न करो,’’ मैं ने रोजी को समझाते हुए कहा.

‘‘यह मुझ से नहीं होगा रजत,’’ रोजी ने धीरे से कहा. ‘‘रोजी, तुम मेरी हमउम्र ही हो न यानी तुम भी बत्तीस वर्ष की हो रही है. अत: रिक्वैस्ट कर रहा हूं कि अन्यत्र विवाह पर विचार करो. रोजी हम बूआ की सहमति के बिना विवाह कर लेते हैं. मगर मैं बूआ को किसी भी कीमत पर नाराज नहीं कर सकता,’’ मैं ने रोजी को अन्यत्र शादी करने हेतु बात बनाते हुए कहा.

‘‘नहीं रजत हम बूआ को नाराज नहीं कर सकते. उन्होंने तुम्हें पालपोस कर इस योग्य बनाया कि आज तुम गर्व से दुनिया का सामना कर सकते हो. वे चाहतीं तो पुनर्विवाह कर अपनी गृहस्थी बसा सकती थीं, किंतु उन्होंने मांपापा बन कर तुम्हें पालापोसा, पढ़ायालिखाया,’’ रोजी ने कहा.  ‘‘इसी समझदारी का तो मैं दीवाना हूं. इसीलिए तुम से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता हूं कि अन्यत्र विवाह हेतु सोचना शुरू कर दो.’’

रोजी मुसकराते हुए अपनी टेबल पर चली गई. लंचब्रेक खत्म हो चुका था.10 दिनों के अंदर ही रोजी का ट्रांसफर कंपनी की दूसरी शाखा में कर दिया गया. मालूम हुआ इस हेतु रोजी ने अनुरोध किया था. मेरे दिल को ठेस लगी, किंतु मैं ने महसूस किया कि यह उचित ही है. दूर रहने से अन्यत्र विवाह हेतु मन बना सकेगी.

अब फोन से बातें कर संतोष करना पड़ता. मैं सदैव उसे अन्यत्र विवाह हेतु प्रोत्साहित करता, मगर वह बात हंसी में टाल देती. मैं ने एक दिन कहा रोजी, ‘‘अपने विवाह में मुझे अवश्य बुलाना. भुला न देना.’’उस ने खोखली हंसी के साथ कहा, ‘‘घबराओ नहीं, रजत पहला इन्विटेशन तुम्हें ही जाएगा… तुम्हारे बिना मेरी शादी संभव ही नहीं.’’

रोजी के बारे में जान लेने के बाद बूआ मेरी शादी के लिए विशेष सक्रिय हो गई थीं. मैं ने भी उन की आज्ञा का पालन करते हुए विज्ञापन दे दिया था. कई जगह रिश्ते की बात चली भी,किंतु कहीं मेरी साधारण कदकाठी, शक्लसूरत तो कहीं मेरी साधारण नौकरी तो कहीं मेरी सादगी और गंभीरता मेरे रिश्ते के लिए बाधक बन गई. कहींकहीं तो मेरी वृद्ध बूआ का मेरे साथ रहना और मेरा उन्हें सर्वस्व मान पूजना ही बाधक बन बैठा.

एक लड़की का कहना था, ‘‘मुझे तो सारे काम अपनी मनमरजी से करने की आदत है. तुम्हारे यहां तो तुम्हारी बूआ ही घर की सर्वेसर्वा हैं. मैं नहीं सह सकूंगी.’’ मेरी शादी की बात नहीं बन सकी. मैं अब करीब 35 साल का हो चला था और बूआ 70 की. हम दोनों की बढ़ती उम्र ने बूआ को मेरी शादी हेतु चिंतित कर रखा था.

रविवार का दिन था. मैं समाचारपत्र पढ़ रहा था तभी बूआ मेरे पास बैठ कर मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं, ‘‘लल्ला, एक बात कहूं, इनकार तो नहीं करेगा?’’ मैं ने आश्चर्य से कहा, ‘‘बूआ, कुछ कहने के लिए आप को मुझ से पूछने की आवश्यकता कब से महसूस होने लगी? मैं आप को इतना पराया कब से लगने लगा?’’

‘‘क्या बोलूं लल्ला, बात ही कुछ ऐसी है,’’ बूआ ने धीरे से कहा. मैं ने आशंका से समाचारपत्र एक तरफ पटकते हुए कहा, ‘‘बूआ, जो भी मन में है बोल दो. आप का कथन मेरे लिए आदेश से कम नहीं है. इनकार करने का तो सवाल ही नहीं उठता.’’ ‘‘लल्ला, तुम रोजी से शादी कर लो, तुम जैसे हो, जैसी तुम्हारी नौकरी और आमदनी है और तुम्हारी वृद्ध बूआ, सभी उसे यथास्थिति स्वीकार्य था न… वह तो तुम से अपनी इच्छा से शादी करना चाहती थी. मैं कम अक्ल अपनी रूढि़वादी सोच ले कर तुम दोनों के बीच आ खड़ी हुई,’’ बूआ ने अपनी बात रखी, ‘‘वह आज भी अविवाहित बैठी है लल्ला. मेरा दिल कहता है वह तुम्हारा इंतजार कर रही है. तुम उस से शादी कर लो,’’ भावावेश में बूआ की आंखें सजल हो उठी थीं.

मैं ने उन के आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘बूआ, स्वयं को दोषी नहीं समझो. सब विधि का विधान समझो. आप के इनकार के बाद हम व्यक्तिगत रूप से कभी मिले ही नहीं. हां, औफिशियल मीटिंग में कभीकभी भेंट हुई है. हम ने अपनी शादी के संबंध में तो कभी चर्चा ही नहीं की इस दौरान. मैं जरूर उसे फोन करता हूं और हमेशा उसे अन्यत्र विवाह हेतु प्रोत्साहित करता हूं…फिर अचानक स्वयं के साथ शादी… इस के अलावा बूआ मैं ने महसूस किया है कि रोजी मुझ से बात करने से कतराती भी है.’’

‘‘अचानक ही सही लल्ला तुम मुझे उस के घर ले चलो. मैं स्वयं उसे मांग लूंगी. लल्ला इनकार न करो,’’ बूआ ने मनुहार करते हुए कहा तो मैं टाल न सका, पहुंच गया बूआ को ले कर रोजी के घर. रोजी के घर में पहली बार आया था. हां, उसे कालोनी के मोड़ पर 2-4 बार ड्रौप जरूर किया था.

मुझे अचानक बूआ के साथ देख कर रोजी का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक था. उस ने अव्यवस्थित कुरसी को व्यवस्थित कर बैठने का आग्रह करते हुए बूआ के चरण स्पर्श किए. रोजी का घर बेहतर साधारण था. एक पुरानी सी चौकी पर उस के वृद्ध कमजोर पापा ताश के पत्तों में लगे थे. उन की भावभंगिमाएं साफ प्रकट कर रही थीं कि उन्हें हमारा आना नापसंद है. एक कोने में खिड़की की तरफ बेहद वृद्ध दादी एक थाली में चावल लिए उन्हें चुनने की कोशिश में लगी थी. उन्हीं के पास रोजी की दीदी बच्चों जैसी हरकतें कर रही थी. वह मुंह में अंगूठा डाल चूसते हुए हंसते हुए बोल रही थी, ‘‘आप कौन हैं? ही…ही… आप यहां क्यों आए हैं…ही…ही…’’

मैं रोजी के घर के वातावरण से हैरान सा था. अब मैं समझ सकता था कि रोजी हमेशा क्यों कहती थी कि शादी का फाइनल करने के पहले मैं अपने परिवार के संबंध में तुम से विस्तार से बात करना चाहती हूं. क्या बोलूं,क्या न बोलूं, समझ न आया तो शांत रहना ही उचित समझा.

बूआ हमारी शादी के लिए जैसे सोच कर आई थीं. अत: रोजी के पापा की बेरुखी के बावजूद मुसकराते हुए बोलीं, ‘‘नमस्ते भाई साहब, मैं रजत से रोजी के विवाह हेतु प्रस्ताव

ले कर आई हूं. दोनों बच्चे एकदूसरे से प्यार करते हैं. अत: दोनों का विवाह कर देना उचित होगा.’’‘‘रोजी के विवाह के संबंध में सिर्फ और सिर्फ मैं निर्णय लूंगा,’’ उन्होंने बेहद सख्त लहजे में कहा. ‘‘हांहां, यह उचित भी है. आप उस के ‘पापा’ हैं आप ही निर्णय करेंगे, मैं इस संबंध में आप की मंशा जानने आई हूं?’’ बूआ ने सहजता से कहा. ‘‘मुझे रोजी की शादी करनी ही नहीं है,’’ उन्होंने पूर्ववत सख्त लहजे में कहा.

रोजी के पापा की बात पर मैं और बूआ आश्चर्यचकित थे. बूआ ने स्वयं को शीघ्र ही संयत कर हंसते हुए कहा, ‘‘कैसी बातें कर रहे हैं भाईसाहब, लड़की को कोई घर थोड़े ही बैठाता है… वह तो दूसरे की अमानत होती है…’’उन्होंने बीच में ही बूआ की बात काटते हुए अत्यधिक तिरस्कार से कहा, ‘‘मुझे रोजी की शादी नहीं करनी है, आप ने सुना नहीं?’’ मैं ने बूआ को शांत रहने और लौट चलने का इशारा किया. रोजी भी नजरों से यही प्रार्थना करती प्रतीत हुई.

अगले दिन मैं बुझे मन से घर लौटा, तो बूआ ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘क्या बात है लल्ला, तबीयत तो ठीक है? एकदम लुटेपिटे से लग रहे हो.’’ मैं ने कहा, ‘‘बूआ, ऐसा ही समझ लो. दरअसल, मैं औफिस से लौटते हुए रोजी से मिल कर आया. हमारे विवाह हेतु उस के पापा के विचार जान कर मैं हैरान था. यह भी मालूम हुआ, मेरे और रोजी के संबंध के बारे में जान लेने के बाद उन्होंने डांटफटकार कर उसे ट्रांसफर हेतु मजबूर कर दिया था.’’

सारी बात सुन कर बूआ भी हैरान हो गईं, शीघ्र ही अति उत्साह से बोलीं, ‘‘लल्ला, जल्दी चाय खत्म कर मुझे रोजी के घर ले चलो.’’‘‘क्या बूआ, आप को बेइज्जत होना बुरा नहीं लगता?’’ मैं ने इनकार करते हुए कहा.‘‘इनकार न करो, मेरे पास रोजी के पापा के भय का निवारण है,’’ बूआ ने अधीरता से कहा.

हमें स्वयं के घर पर देख कर रोजी केपापा ने आग्नेय नेत्रों से देखते हुए तिरस्कृतशब्दों में कहा, ‘‘आप दोनों फिर आ धमके,क्या मेरी बात…’’बूआ ने हाथ जोड़ कर अनुरोध करते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब, आप से प्रार्थना करती हूं, आप नाराज न हों. आप मेरी पूरी बात सुन निर्णय करें. आप का निर्णय हमें शिरोधार्य होगा.’’

‘‘भाई साहब, आप अपने दिल से यह भय निकाल दीजिए कि विवाहोपरांत रोजी पर आप का अधिकार नहीं रहेगा वरन रोजी के साथसाथ रजत पर भी आप का पूरा अधिकार रहेगा. दोनों मिल कर परिवार की सारी जिम्मेदारियां पूरी करेंगे.’’ ‘‘देखिए भाई साहब, दोनों एकदूसरे को चाहते हैं, विधि के विधान को भी दोनों का मेल स्वीकार्य है, मैं तो अपनी संकीर्ण रूढि़वादी सोच के कारण रोजी जैसी सभ्य, सुसंस्कृत लड़की को ठुकरा कर स्वजातीय विवाह हेतु प्रयासरत रही. किंतु मेरे लल्ला का रिश्ता कहीं भी नहीं हो सका. मेरी रूढि़वादी सोच ने खुद ही दम तोड़ दिया.’’

बूआ आज सब खुल कर बोल देना चाहती थीं, ‘‘भाई साहब, मैं अपनी संकीर्ण सोच त्याग कर आगे बढ़ना चाहती हूं. आप से भी प्रार्थना करती हूं, अपने शक अपने भय को त्याग कर प्यार करने वालों का संगम करवा दोनों को आशीर्वाद दीजिए. 2 प्यार करने वालों की राह में बाधा डालना उचित नहीं है.’’

वे बोलीं, ‘‘देखिए भाई साहब, समस्या से डरने या भागने से उस का समाधान असंभव है, किंतु अगर हम साहस के साथ सकारात्मक पहल करें तब अवश्य समस्या का समाधान निकाल लेंगे.’’थोड़ी देर चुप रहने के बाद बूआ अतीत में जाते हुए बोलीं, ‘‘मैं उपेक्षित विधवा थी. जिन्होंने मुझे सहारा दिया कुछ समय बाद वे किशोर रजत को मेरे हवाले कर इस दुनिया से चल बसे. हम दोनों उदास और दुखी थे. मगर फिर साहस और सकारात्मक सोच के साथ जीवन पथ पर बढ़ चले. परिणाम आप के सामने है.’’

रोजी के पापा शांत भाव से बूआ की बातें सुन रहे थे. बूआ ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘मैं आप को आश्वासन देती हूं कि रोजी और रजत मिल कर एक और एक 2 नहीं, 11 बन कर घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल लेंगे.’’

रोजी के पापा की आंखों से झरझर आंसू बह चले. जैसे भय और शक की जमी बर्फ बूआ के आश्वासन की ऊष्मा पा कर पिघल कर आंसू बन आंखों से बह चली. वे आंसू पोंछते हुए बोले, ‘‘सिस्टर, जीवन में बहुत छलकपट देखा है. मैं बैंक कर्मी था. ईमानदार, सख्त मिजाज, रूखे स्वभाव का, बस सहकर्मियों की आंखों की किरकिरी बना रहता था. एक फ्रौड में जबरदस्ती फंसा दिया गया, नौकरी चली गई, मेरी पत्नी मैगी साहसी महिला थी, उस ने मुझे टूटने नहीं दिया. उस ने स्कूल में नौकरी कर घर संभाल लिया, किंतु नियति के क्रूर प्रहार से वह रोड ऐक्सीडैंट में मारी गई, तो मैं टूट गया.’’

‘‘रोजी अपनी मां जैसी साहसी है, पढ़लिख कर नौकरी कर घर संभाल रही है, इसी की आमदनी से घर का खर्च चलता है. अब आप ही बताइए इसे विवाह कर दूसरे घर भेज दूं, तो अपनी वृद्ध मां, मंदबुद्धि दूसरी बेटी और हाराटूटा मैं किस के सहारे रहें? बस इसी स्वार्थी सोच के कारण मुझे रोजी के विवाह यहां तक कि विवाह की चर्चा से ही भय हो गया था.’’

कुछ चुप रहने के बाद वे पुन: बोले, ‘‘आज आप की बातों से पुन: विश्वास करने का दिल हो रहा है कि दुनिया में आज भी इंसानियत है. सच कहता हूं रोजी बेटी की खुशियों का दमन करते हुए मुझे दुख भी बहुत होता था. सच ही कहा गया है कि सारे रास्ते बंद नजर आने के बावजूद एक रास्ता अवश्य खुला रखता है. बस साहस और सकारात्मक पहल की आवश्यकता होती है.’’

फिर उन्होंने मुसकराते हुए मुझ से कहा, ‘‘बेटा रजत मैं ने तुम्हारा और तुम्हारी बूआ का बहुत अनादर किया. मुझे माफ करना’’ और उन्होंने हाथ जोड़ दिए. मैं ने उन के हाथ अलग करते हुए कहा, ‘‘आप बड़े हैं. आप का हाथ माफी के लिए नहीं आशीर्वाद के लिए उठना चाहिए. आप माफी मांग कर मुझ शर्मिंदा न करें अंकल.’’

‘‘बेटा, तुम मुझे पापा कह सकते हो, तुम्हारे जैसा बेटा पा कर मैं धन्य हो गया,’’ कहते हुए उन्होंने मुझे गले से लगा लिया.

सभी की आंखें खुशी के आंसुओं से भर उठीं. मैं मन ही मन अपनी बूआ के साहस, दृढ़संकल्प एवं सकारात्मक पहल को सलाम कर रहा था.

 

मैं 54 साल की उम्र में दोबारा शादी करना चाहता हूं, बच्चों को कैसे बताऊं?

सवाल

मैं दिल्ली में रहता हूं और उम्र 54 वर्ष है. पत्नी अब इस दुनिया में नहीं है. एक बेटा है जिस के 2 बच्चे और बीवी है और वह उन्हीं में व्यस्त रहता है. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफैसर हूं. मेरी एक सहकर्मी हैं जो 46 वर्ष की हैं और तलाकशुदा हैं. हम दोनों का एकदूसरे के प्रति रुझान है. बात आगे कैसे बढ़ाएं, यह समझ नहीं आता. वे अकेली हैं, पढ़ीलिखी और समझदार हैं, मौडर्न हैं. दूसरी तरफ मैं हूं जो यह नहीं सोच पा रहा कि इस उम्र में विवाह करना या नए जीवनसाथी की चाह रखना सही भी है या नही. मैं इस बात को अपने जेहन से निकाल ही नहीं पा रहा कि जब मेरे बेटेबहू और पोतेपोतियों को मेरी इस इच्छा का पता चलेगा तो वे यह न सोचने लगें कि मैं उन्हें शर्मिंदा करने जा रहा हूं, या अपनी शारीरिक जरूरतों के लिए ऐसा कर रहा हूं. सच तो यह है कि मैं ऐसा साथी चाहता हूं जो मुझ से मेरे सुखदुख बांटे, यह एक जीवनसाथी ही पूरा कर सकती है. क्या यह इच्छा रखना गलत है? क्या मुझे अपने बच्चों से इस बारे में बातचीत करनी चाहिए?

जवाब

आप का जीवनसाथी की इच्छा रखना किसी भी तरह से गलत नहीं है. आखिर हो भी क्यों, उम्र प्रेम का पैमाना नहीं होती. आप को अपने परिवार से बेझिझक इस विषय में बात करनी चाहिए. आप प्रोफैसर हैं तो यकीनन आप का बेटा इतना समझदार तो होगा ही कि आप की जरूरतों व भावनाओं को समझे. आप अपनी सहकर्मी से इस विषय में बात करें और हो सके तो शादी को ले कर उन के विचार जानें. यदि वे भी आप से शादी करना चाहती हैं तो फिर अपने परिवार से इस बारे में स्पष्टता से बात करें. अपनी इच्छा उन के सामने बिना कतराए रखें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

पश्चाताप: आज्ञाकारी पुत्र घाना को किस बात की मिली सजा?

लेखक- धीरज कुमार

ट्रेन से उतर कर टैक्सी किया और घर पहुंच गया. महीनों बाद घर वापस आया था. मुझे व्यापार के सिलसिले में अकसर बाहर रहना पड़ता है. मैं लंबी यात्रा के कारण थका हुआ था, इसलिए आदतन सब से पहले नहाधो कर फ्रेश हुआ. तभी  पत्नी आंगन में चायनाश्ता ले आई. चाय पीते हुए मां से बातें कर रहा था. अगर मैं घर से बाहर रहूं और कुछ दिनों बाद वापस आता हूं तो  मां  घर की समस्याएं और गांवघर की दुनियाभर की बातें ले कर बैठ जाती है. यह उस की पुरानी आदत है. इसलिए कुछ उस की बातें सुनता हूं. कुछ बातों पर ध्यान नहीं देता हूं. परंतु इस प्रकार अपने गांवघर के बारे में बहुतकुछ जानकारी मिल जाती है.

मां ने बातोंबातों में बताया कि, “उस ने अपने बिसेसर चाचा की हत्या  डंडे से पीटपीट कर  कर दी है. उसे  जेल हो गई है.”

“कौन, मां, तुम किस के बारे में कह रही हो?” मैं ने हत्या और जेल के बारे में सुन कर जरा चौकन्ना होते हुए पूछा.

” घाना…ना…, घाना के बारे में बता रही हूं,” मां जोर देते हुए बोली.

” घाना ने किस की हत्या कर दिया, मां? ” मैं ने ज़रा आश्चर्य से पूछा था.

“अरे, वह अपने बिसेसर चाचा की, बउआ,” वह दृढ़ता से बोली थी.

यह सुन कर मुझे विश्वास नहीं हुआ. एक पल को लगा, शायद यह झूठ है. किंतु सच तो सच होता है न, कई दिनों तक उस के बारे में मेरे मन में विचार उमड़तेघुमड़ते रहे.

मुझे आज भी याद है. हम दोनों एकसाथ बचपन में खेलते थे. साथसाथ बगीचे से आम चुराते थे. खेतों से मटर ककी फलियां तोड़ना, एकसाथ पगडंडियों पर दौड़ना… दोनों साथ साथ खेलते हुए बड़े हुए थे.

आज मैं व्यापार के सिलसिले में अपने गांव से दूर रहता हूं और कभीकभार ही आ पाता हूं. समयाभाव के कारण मिलनाजुलना हम दोनों का कम हो गया था. किंतु आज भी हमदोनों की पटती है. जब भी मैं गांव  आता हूं, हम दोनों की घंटों बातें होती हैं.

उस के परिवार के लोगों की विसेसर चाचा से पुरानी रंजिश थी क्योंकि वे उस के गोतिया थे. मैं एक बार किसी काम से उस के घर जा रहा था. उस की चाची से उस की मां की तूतूमैंमैं हो रही थी. उस की मां जोरजोर से गालियां दे रही थी.

उस की चाची व उस की चचेरी बहनें भी उस की मां को  गालियां देने लगीं.

उस की मां  जोरजोर से चिल्लाने लगी, “दौड़ रे घाना…” इतना सुनते ही घाना अंदर से दौड़ पड़ा था. ऐसा लग रहा था, अभी वह चाची पर टूट पड़ेगा. वह भी मां की तरह से अनापशनाप बोलने लगा. मैं ने उस को डांटा और शांत किया. वह मेरी बात मानता था. मैं ने उस को समझाया, “छोटीछोटी बातों पर गुस्सा क्यों करते हो, आखिर, वह तुम्हारी चाची ही तो है.”

कुछ देर बाद मामला रफादफा हो गया था.

कुछ दिनों बाद उस ने बताया कि, “चाचा के परिवार से परेशान हो गया हूं. वे लोग जमीनजायदाद के बंटवारे को उलझा कर रखे हैं. उन्होंने बंटवारे में ज्यादा जमीन रख ली है. इसलिए हम दोनों परिवारों में झगड़ा और तनाव रहता है. वे दोबारा बंटवारे के लिए  तैयार नहीं हो रहे हैं.”

यह कहते हुए वह गंभीर हो गया था.

मैं ने उस को समझाया, “क्यों नहीं तुम लोग सहूलियत से ही  मांग लेते हो.”

“वे कभी नहीं देंगे. वे बहुत अड़ियल हैं,” वह निराश होते हुए बोला था.

वह मेरा बचपन का दोस्त था. मैं उस को भलीभांति जानता हूं. वह कभीकभी उखड़ जाता है, गुस्से पर नियंत्रण नहीं कर पाता है. परंतु वह इतना कठोर नहीं है कि हत्या जैसे अपराध में लिप्त हो जा.

गांव के लोगों से मालूम हुआ कि जब वह केस हार गया और उसे सजा मिल गई तो उस ने अपने मांबाबूजी से भी मिलने से इनकार कर दिया.

सभी लोग उसे अपराधी मान रहे थे. लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था. इसलिए मैं ने समय निकाल कर उस से मिलने के लिए सोचा.

मैं जेल के सामने खड़ा था. वह कुछ देर बाद  सलाखों के पीछे आ चुका था. मुझे देखते ही उस की आंखों में आंसू आ गए. उस के आंसू रुक नहीं रहे थे. मैं बारबार उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था.

“घाना,  मैं तुम से जानने आया हूं  कि आखिर यह सब कैसे हो गया?” मैं ने उस से सीधा सवाल किया था.

वह बहुत देर तक अपने आंसुओं पर काबू पाने की कोशिश करता रहा. जब आंसू रुके तो उस ने बोलना शुरू किया, “भैया, आप जानते हैं…”

मैं उस की उम्र से थोड़ा बड़ा हूं और गांवघर के रिश्ते में भाई भी लगता हूं, इसलिए वह मुझे भैया ही कहता है. फिर भी, वह मेरा दोस्त है.

एक बार फिर रुक कर उस ने बोला शुरू किया, “मैं गुस्से के आवेग में ऐसा कर गया. वहां मांबाबूजी और मेरी बहन  भी थी. मां मारोमारो की आवाज लगा रही थी. बहन ने आग में घी डालने का काम कर दिया. मैं आगेपीछे नहीं सोच पाया. किसी ने एक बार भी मुझ से यह नहीं कहा कि मत मारो. अगर  किसी ने एक बार भी रोका होता,  तो शायद मैं उन की हत्या न करता और कारावास का दंड न मिलता.”

मैं ने तसल्ली देने की कोशिश की, “अब जो हो गया,  हो गया. अब पछताने से कोई फायदा नहीं है.”

कुछ देर मुझ से नज़रें नहीं मिला पा रहा था वह. अपना चेहरा इधरउधर घुमा रहा था. वह स्वयं को अपराधी महसूस कर रहा था, ऐसा मुझे महसूस हो रहा था.

वह कुछ सोचते हुए अपना हाथ मलने लगा था. वह बारबार अपनी उन हथेलियों को देख रहा था जिन से उस ने हत्या की थी. भले ही वह हत्या के लिए पश्चात्ताप कर रहा था, यह बात तो स्पष्ट थी कि वह गुनाहगार और अपराधी तो बन ही गया. मैं कुछ देर तक गांवघर के बारे में इधरउधर की बातें कर उस का मन बहलाता रहा.

“मैं ने सुना है कि तुम अपने मांबाबूजी से अब नहीं मिलते हो. शायद, तुम ने  उन को मिलने से मना कर दिया है. लेकिन क्यों ?” मैं ने उस से सवाल किया.

उस का चेहरा कठोर हो गया था. उस ने बताया, “भैया, आप जानते हैं,  मांबाबूजी की आकांक्षाओं के कारण ही तो यह महाभारत हुआ है. अब मैं जिंदगीभर जेल में रहूंगा. इस के पीछे मेरे मांबाबूजी ही जिम्मेदार हैं. वे जमीन के कुछ टुकड़ों के लिए जिंदगीभर जहर भरते रहे. वे लोग एक बार भी रोके  होते तो शायद मैं  कारावास में जीवन नहीं भोगता.”

मैं सचाई सुन कर घाना के प्रति द्रवित हो रहा था. लेकिन इस परिस्थिति में मदद नहीं कर पा रहा था. मैं ने महसूस किया कि इन सहानुभूतियों का भी कोई फायदा नहीं है. मैं भारीमन से फिर मिलने का वादा कर के निकल गया.

उस ने कहा, “आते रहिएगा भैया, आप के सिवा अब मेरा कोई अपना नहीं है. अब मेरे मांबाबूजी अपने नहीं रहे जिन्होंने मुझे गुनाह के रास्ते पर धकेल दिया है.”

“ऐसा नहीं कहते मेरे भाई, वे तुम्हारे ही मांबाबूजी हैं. वे तुम्हारे ही रहेंगे,” मैं ने समझाने की कोशिश की.

उस की आंखों में घृणा और पश्चात्ताप के आंसू स्पष्ट दिख रहे थे.

कूड़ेदान : नेहा किसकी सफलता से खुश थी

रोहित ने नेहा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा और उस ने झट से हां कर दी. रोहित को वह बहुत पसंद करती थी. हो भी क्यों न, रोहित आईआरएस यानी भारतीय राजस्व सेवा का क्लास वन अफसर था. उस पर वह बेहद आकर्षक और शिष्ट भी था. रोहित के प्रस्ताव से नेहा को लगा जैसे उस ने जग जीत लिया है. झट से उस ने मम्मी को फोन लगाया और सब कह सुनाया. नेहा की बात सुन कर मम्मी भी खुशी से झूम उठीं. नेहा दिल्ली में एक प्रतिष्ठित एयरलाइंस में काम करती थी. रोहित भी इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर असिस्टैंट कमिश्नर के पद पर कार्यरत था. दोनों शाम का समय साथ ही बिताते थे. शादी के प्रस्ताव के बाद नेहा अकसर रोहित के फ्लैट पर ही रुक जाया करती थी.

रोहित का घर चंडीगढ़ में था. मम्मीपापा वहीं नौकरी करते थे. एक भाई था जो पोलियो से ग्रस्त था. रोहित नेहा से कहा करता था कि भाई की देखभाल और मम्मीपापा की नौकरी की वजह से वे लोग दिल्ली नहीं आ पाते हैं. जैसे ही उस के घर वाले समय निकाल कर दिल्ली आएंगे वह अवश्य नेहा को उन से मिलवाएगा. दिन जैसे पंख लगा कर उड़ने लगे. धीरेधीरे 2 साल बीत गए परंतु अभी तक रोहित ने बात आगे नहीं बढ़ाई. यही नहीं, रोहित नेहा के मम्मीपापा से भी मिलने को तैयार नहीं होता था. वह आईएएस अफसर बनने की तैयारी कर रहा था लेकिन हर बार उसे आईआरएस ही मिलता था.

नेहा को उस की सफलता देख कर खुशी होती थी, लेकिन रोहित अपनी रैंक में सुधार न होते देख झुंझला जाता था. नेहा इस स्थिति में उस से शादी की बात करना श्रेयस्कर नहीं समझती थी. अब तक नेहा की अधिकांश सहेलियों की शादी हो चुकी थी. इसलिए नेहा भी अब इंतजार से उकता चुकी थी. अचानक एक दिन उस की मुलाकात सुप्रिया से हुई. सुप्रिया रोहित के चचेरे भाई की मंगेतर थी. दोनों पहले भी कई बार मिल चुकी थीं. अचानक काफी दिन बाद मुलाकात होने के कारण नेहा ने लपक कर उसे गले लगाया, ‘‘हाय बेबी, ग्लैड टू मीट यू.’’ नेहा को पता था कि जल्दी ही रोहित के भाई से उस की शादी होने वाली है.

‘‘ओह, सेम हेयर,’’ सुप्रिया ने उस से पूछा, ‘‘खैर, अच्छा लगा तुम्हें खुश देख कर. मुझे तो लगा था कि तुम काफी नाराज होंगी.’’ ‘‘नाराज, पर क्यों? क्या हुआ, तुम क्या बात कर रही हो सुप्रिया. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है,’’ नेहा कुछ भी नहीं समझ पाई थी कि क्यों सुप्रिया उसे इस तरह देख रही है. उस में पहले वाला अपनापन तो बिलकुल नहीं लग रहा था.

अब सुप्रिया भी अचकचा गई. फिर भी उस ने बताया, ‘‘रोहित की शादी पक्की होने की बात तुम्हें पता है न.’’ नेहा की तो काटो तो खून नहीं वाली स्थिति हो गई थी. उस की हालत देख कर सुप्रिया भी घबरा गई थी. वैसे भी वह किसी अप्रिय स्थिति में नहीं पड़ना चाहती थी.

‘‘मुझे जल्दी घर पहुंचना है,’’ बहाना बना कर सुप्रिया झट से चलती बनी.

नेहा सीधे रोहित के फ्लैट पर पहुंची. रोहित किसी पार्टी में जाने की तैयारी कर रहा था.

‘‘रोहित, तुम्हारी शादी तय हो गई,’’ नेहा अपनेआप को संभाल नहीं पा रही थी.

‘‘देखो डियर, मैं ने मम्मीपापा से तुम्हारे बारे में बात की थी. लेकिन वे लोग लव मैरिज के सख्त खिलाफ हैं और किसी भी हालत में तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे,’’ रोहित ने बताया और रोने लगा.

‘‘बंद करो यह ड्रामा. तुम्हारे चचेरे भाई की तो लव मैरिज हो रही है और अगर ऐसा है भी तो मुझे बरबाद करने से पहले एक बार अपने मम्मीपापा से पूछ लिया होता,’’ नेहा ने चिल्लाते हुए कहा.

‘‘धीमे स्वर में बात करो नेहा, मेरी सोसायटी में इज्जत है. देखो नेहा, बात को समझो. मेरा परिवार है और जिम्मेदारी भी है. मुझे सिविल सर्विस में चयनित जीवनसाथी ही चाहिए था.’’

रोहित ने नेहा से कहा तो उसे जैसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ. उस की आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह सिर्फ इस्तेमाल करने की वस्तु है.

नेहा रोते हुए अपना बैग उठा कर अपने फ्लैट में आ गई. रोहित को तो बिलकुल भी यकीन नहीं था कि इतनी आसानी से नेहा से उस का पिंड छूट जाएगा. पार्टी में दोस्तों से उस ने कहा भी, ‘‘यार, मुझे तो लगा था कि नेहा ये सब सुन कर मुझ पर टूट पड़ेगी, लेकिन वह तो चुपचाप अपने घर चली गई.’’

‘‘ध्यान रखना रोहित, कहीं पुलिस केस न हो जाए,’’ रोहित के एक दोस्त ने उसे आगाह करते हुए कहा.

‘‘यार, मैं फ्री में थोड़े न उस के हाथ लग जाता. 4 साल से तैयारी की है मैं ने आईएएस बनने के लिए. चली भी गई तो जाए, पुलिस स्टेशन में कोई अपना ही बैचमेट बैठा होगा,’’ रोहित ने बेफिक्री से कहा.

पार्टी खत्म होने के बाद जब रोहित घर पहुंचा तो उसे अपने फ्लैट के पास पुलिस दिखी. देखा तो पुलिस के साथ नेहा भी थी.

थाने में एसीपी सुधांशु को देख कर रोहित की जान में जान आ गई. सुधांशु उस का बेहद प्रिय दोस्त जो था.

उधर, नेहा कह रही थी, ‘‘सर, इस ने मेरा भरपूर शोषण किया है. मैं पूरी तरह टूट चुकी हूं.’’

‘‘यार सुधांशु, यह लड़की जबरदस्ती मेरे गले पड़ रही है. इस ने मेरे पैसों से ढेर सारी शौपिंग की है और अब पूरी जिंदगी मुफ्त का ऐशोआराम चाहती है,’’ रोहित अब नीचता पर उतर आया था.

‘‘मैडम, आप की शिकायत पर पुलिस कार्यवाही कर रही है. हम चार्जेज लगा रहे हैं. आप परेशान मत होइए.’’

एसीपी दोस्त जैसा बरताव न कर के रोहित से अपराधी की तरह बात कर रहा था. यह देख कर रोहित के होश उड़ गए.

‘‘देखो नेहा, तुम जितना चाहो मैं तुम्हें पैसा दूंगा, पर तुम से शादी नहीं कर सकता. प्लीज, मेरी बहुत बदनामी होगी. तुम पुलिस से अपनी शिकायत वापस ले लो.’’

नेहा तो जैसे पागल ही हो गई. उस ने एक जोरदार तमाचा जड़ते हुए रोहित के मुंह पर थूक दिया, ‘‘तुम्हारी ही इज्जत है, मेरी तो कोई इज्जत नहीं है.’’

पुलिस स्टेशन में मौजूद किसी भी पुलिसकर्मी ने नेहा को नहीं रोका. रोहित को लगा कि सभी इस सीन का आनंद ले रहे हैं. उधर, सुधांशु रोहित को हिकारत भरी नजरों से देख रहा था. रोहित के सामने ही नेहा ने दर्जनों फोटोग्राफ्स, कार्ड्स, वीडियोज इत्यादि रख दिए. इन वीडियोज में रोहित ने कई जगह नेहा को माई डियर वाइफ कह कर संबोधित किया था. रोहित इस स्थिति के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था.

‘‘ओह, ठीक है, मैं शादी के लिए तैयार हूं,’’ निराश हो कर रोहित ने नेहा से कहा.

अचानक एक झन्नाटेदार थप्पड़ फिर रोहित के गाल पर पड़ा. नेहा ने उस के चेहरे पर दोबारा थूकते हुए कहा, ‘‘तुम से कौन करेगा शादी, चल निकल यहां से.’’

इस बार नेहा जब पुलिस स्टेशन से बाहर निकली तो उस का गर्व उस के साथ था. वहीं रोहित बेइज्जती के कारण खुद को कूड़ेदान महसूस कर रहा था.

– ऋचा चौधरी  

अल्का : ममता ने किसकी बात सुनकर बयोडाटा देखा

‘‘मम्मी, चयन समिति ने 5 नाम छांटे हैं. उन्होंने जिस की सिफारिश की है उस के पास योग्यता तो है परंतु अनुभव नहीं है.’’

‘‘कौन है?’

‘‘एक लड़की अल्का है.’’

‘‘बाकी?’’

‘‘बाकी के पास योग्यता के साथ अनुभव भी है परंतु चयन समिति का कहना है कि उन के पास क्रिएटिविटी का अभाव है. हम उसे कुछ दिन ट्रेनी के रूप में रख सकते हैं.’’

‘‘लेकिन हम ने कोई ट्रेनिंग सैंटर तो खोला नहीं है परंतु चयन समिति को जब काम सौंपा है तब उस पर विश्वास भी करना पड़ेगा. इस समिति की सलाह हमेशा सही ही साबित हुई है. फिर कोई भी हो, उस के साथ कुछ समय सिखाने में ही निकल जाता है.’’

यह बातचीत ‘अमित ग्रुप औफ इंडस्ट्रीज’ की चेयरपर्सन ममता और उन के बेटे अमित में हो रही थी. अमित बोला, ‘‘मम्मी, आप ने इस लड़की का बायोडाटा देखा?’

‘‘क्यों?’’

‘‘उस की मम्मी का नाम अमिता है और उस के पापा का नाम भी वही है जो मेरे पापा का नाम है.’’

अमित की बात सुन कर ममता ने उस का बायोडाटा देखा और बोलीं, ‘‘यह संयोग भी हो सकता है, बेटा.’’

वैसे, बेटे की बात ने मां को भी सोचने को मजबूर कर दिया था. अमिता, जिस के नाम पर उन के पति ने अपनी कंपनी का नाम ‘अमिता ग्रुप औफ इंडस्ट्रीज’ रखा था, उन की प्रेमिका थी. उस के साथ उन की शादी नहीं हो पाई क्योंकि वे परिवार के दबावके आगे झुक गए थे. उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी से अपने प्रेमप्रसंग का खुलासा कर दिया था और कहा था कि मुझ से शादी करने पर तुम मेरे शरीर को तो पा लोगी लेकिन मेरे दिल को नहीं पा सकोगी क्योंकि उन के दिल में तो अमिता ही रहेगी. उन की होने वाली पत्नी यानी ममता ने यह कह कर क्लीनबोल्ड कर दिया था, ‘मैं अपने प्यार से आप के दिल में भी स्थान बना लूंगी.’

शादी हुई दोनों हनीमून पर भी गए. लेकिन जब नई कंपनी बनाई तब उस का ‘अमिता’ नाम रखने के लिए वे अड़ गए थे. जहां घर वाले उस की याद पूरी तरह मिटाना चाहते थे वहीं वे इस बहाने उस की याद बनाए रखना चाहते थे. इस बार उन की बात मान ली गई क्योंकि उन्होंने धमकी दे दी थी, ‘उस से मेरी शादी तो आप सब ने नहीं होने दी पर अब यदि मेरी बात नहीं मानी तो मैं घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’ उस दिन पहली बार स्वीकार किया कि उन्होंने उस से मंदिर में शादी कर ली थी हालांकि इस का पत्थर की मूर्ति के अलावा कोई गवाह नहीं था और मूर्ति बोलती नहीं. लेकिन शादी के बाद वे अपनी पत्नी के प्रति वफादार रहे. इसलिए जब अमिता उन के पास आई तब उसे बेइज्जत कर भगा दिया. उस के यह कहने पर कि वह उन के बच्चे की मां बनने वाली है, तब उन्होंने कह दिया कि क्या पता, किस का दोष है जो मेरे ऊपर मढ़ रही है. वही सबकुछ, जो एक पैसे वाला करता है, उस को जितना बेइज्जत कर सकते थे, किया.

उस के जाने के बाद कई दिन तक वे सामान्य नहीं हो पाए थे.

जब बेटे का जन्म हुआ तब उन्होंने उस का नाम ‘अमित’ रखा. समय के साथ सबकुछ ठीक हो गया था. परंतु अल्का के आने से एक बार फिर पुराने घाव हरे हो गए. हालांकि अब पति तो इस दुनिया में नहीं रहे. पिछले साल उन का देहांत हो गया था.

‘‘मम्मी, क्या सोचा है?’’

ममता ने मन ही मन सोचा, ‘तो यह है उन के पति का अंश. उस के बायोडाटा से और चयन समिति की सिफारिश से ममता खुश थीं और अगर आज अमित के पापा जिंदा होते तो अल्का को देख कर बहुत खुश होते. वे बोलीं, ‘‘उसे रख लो. तुम्हारे पापा के अंश को इस प्रकार छोड़ भी तो नहीं सकते.’’

‘‘लेकिन मम्मी, अभी यह क्लीयर तो नहीं हुआ है कि वह पापा की ही बेटी है?’’

‘‘उसे रख लो. उस में योग्यता तो है ही. उस पर नजर रखो.’’

अल्का को रख लिया गया. दो जोड़ी आंखें अल्का पर लगी हुई थीं. उस ने धीरेधीरे कंपनी में अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया. वह भूल गई कि वह मात्र एक ट्रेनी है. उस का व्यवहार ऐसा था जैसे वह इस कंपनी की मालकिन है. हर कर्मचारी को डांट देती, फिर फौरन माफी मांग लेती. यह नहीं देखती कि सामने वाला उस से पद में बड़ा है या छोटा. कोई उस की बात का बुरा नहीं मानता क्योंकि वह हर किसी की मदद को हमेशा तैयार रहती. सब यह कहने लगे कि ‘साहब वापस आ गए’ क्योंकि साहब भी यही करते थे. लेकिन उस की यह विशेषता अमित की नजरों में आ गई. वह अपनी मम्मी से बोला, ‘‘मम्मी, पापा भी तो ऐसा ही करते थे. पापा की इस आदत ने उन को कर्मचारियों में लोकप्रिय बनाया और इस की यह आदत भी इसे लोकप्रिय बना रही है.’’

ममता भी यह देख रही थीं. कभीकभी वह अमित को भी जवाब दे देती. वह इस का बुरा नहीं मानता. हंस कर रह जाता. हां, बाद में अपनी गलती का एहसास होने पर वह अमित से ‘सौरी सर’ कह कर माफी मांग लेती.

उस दिन ममता के पूछने पर बोली, ?‘‘मैडम, मेरा कोई भाई नहीं है. बौस में मुझे भाई की झलक दिखती है और मैं अपने भाई को गलती करते नहीं देख सकती. इसलिए भूल जाती हूं कि वे मेरे बौस हैं.’’

‘‘तुम जैसा आचारव्यवहार कर रही हो वैसे ही करती रहो. मुझे और अमित, किसी को भी तुम्हारा यह व्यवहार बुरा नहीं लगता. तुम्हारे पापा क्या करते हैं?’’

‘‘पापा नहीं हैं. बस, मैं हूं और मेरी मम्मी, 2 ही जने हैं. मम्मी और पापा ने अपनेअपने घर वालों से छिप कर मंदिर में शादी की थी पर पापा ने घर वालों के दबाव में परिवार द्वारा पसंद की लड़की से शादी कर ली. और जब मम्मी ने पापा से मुलाकात की तो उन को बेइज्जत कर बाहर निकाल दिया. वहां से निराश हो कर मम्मी ने आत्महत्या की कोशिश की पर बचा ली गईं. उन को दुख इस बात का नहीं था कि उन्होंने उस को ठुकरा दिया बल्कि दुख इस बात का था कि उन के चरित्र पर आक्षेप लगाया था.’’

ममता इस समय अल्का से यह कह नहीं पाईं कि उस के पापा भी कई दिन तक गुमसुम रहे क्योंकि उन को भी खुद पर क्रोध आया था कि उस की मम्मी के चरित्र पर शक किया था. ममता सुन रही थीं और उन का अनुमान सही साबित हो रहा था यानी अल्का उन के पति का ही अंश है. परंतु उन को लगा कि अभी उसे बताने का समय नहीं आया था. हां, उस के प्रति उन का व्यवहार अब एक अधिकारी और कर्मचारी भर का नहीं रह गया. कभी औफिस में देर हो जाने पर कंपनी की टैक्सी नहीं जाती बल्कि खुद अमित छोड़ने जाता और वहां पहुंच कर वह उस की मम्मी से जरूर मिलता.

कंपनी के मालिक अमित का जन्मदिन नजदीक आ रहा था. गहमागहमी बढ़ गई थी. इस बार का समारोह विशेष था. मांबेटा दोनों ही बातबात पर अल्का को ही पूछ रहे थे मानो वह ही सबकुछ है.

अल्का भी बिना किसी नानुकुर के अपना काम कर रही थी. एक बार उस ने कहा भी कि मैडम, मैं एक ट्रेनी ही हूं और अभी मेरा इस कंपनी में भविष्य निश्चित नहीं है, फिर भी आप मुझ पर इतना विश्वास कर रही हैं.

‘‘यह सोचने का काम हमारा है कि तुम क्या हो, तुम्हारा नहीं,’’

जवाब में ममता ने कह दिया. अल्का कुछ नहीं बोली. कल समारोह का दिन है, इसलिए आज काम ज्यादा था. काम खत्म होतेहोते रात के 8 बज गए थे. उसे आज घर जल्दी जाना था क्योंकि अगले दिन उस के पापा का भी जन्मदिन था. मां को बाजार जाना था परंतु यहां भी अगले दिन मनाए जाने वाले समारोह की तैयारी के कारण वह लेट हो गई. मां का फोन 2-3 बार आ गया. उस ने कह दिया कि वह आते हुए बाजार से मिठाई लेती आएगी. काम खत्म कर के वह घर जाने के लिए उठी ही थी कि ममता का फोन आ गया. उसे केबिन में बुलाया था. जब ममता ने कहा, ‘आज मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलूंगी’ तब वह चौंक गई लेकिन ममता ने जब कहा कि वे उस की मम्मी से मिलना चाहेंगी तब वह चुप रही. ममता को मना भी कैसे करे वह. ममता और अमित दोनों ही साथ थे. उस ने रास्ते में मता को बताया था, उस के पापा का भी कल जन्मदिन है.

ममता ने पूछा, ‘‘जिस आदमी ने तुम्हारी मम्मी को छोड़ कर दूसरी महिला से शादी कर ली, फिर भी तुम्हारी मम्मी अब भी उन का जन्मदिन मनाती हैं?’’

‘‘मैडम, मम्मी कहती हैं कि वे जहां भी हों, खुश रहें. मेरे लिए अब भी वे ही सबकुछ हैं,’’ फिर उस ने ममता को बताया कि मम्मी ने पापा की पसंद की मिठाई लाने को कहा था. मैडम ने गाड़ी मिठाई वाले की दुकान पर रोक दी. उस ने पापा की पसंद की मिठाई ली. वहां से चल कर मैडम ने एक साड़ी के शोरूम पर गाड़ी रोक ली. वह चौंक गई. साड़ी के शोरूम में मैडम ने एक साड़ी को उसे दिखा कर पूछा, ‘‘तुम्हारी मम्मी के लिए कैसी रहेगी?’’

‘‘मैडम, यह पापा का पसंदीदा रंग है. आप को मेरे पापा की पसंद पता है, कैसे?’’

ममता हंस पड़ीं पर उन्होंने उस को कोई जवाब नहीं दिया. ममता ने साड़ी पसंद कर पैक करवा दी कि तुम्हारे पापा के जन्मदिन पर मेरी ओर से तुम्हारी मम्मी को उपहार है. फिर मुसकरा कर बोलीं, ‘‘तुम्हारे पापा को और क्याक्या पसंद है?’’

‘‘बाकी तो पता नहीं, हां, मम्मी पापा के जन्मदिन पर इसी रंग की साड़ी पहनती हैं और यही मिठाई मंगाती हैं.’’

रास्तेभर ममता उस के पापा के बारे में बातें करती रहीं. सब घर पहुंचे. उस की मम्मी को चिंता नहीं थी क्योंकि देर होने पर खुद उस के बौस छोड़ जाते हैं. लेकिन आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई थी. वे इंतजार कर रही थीं.

आज अल्का के साथ आने वाली को देख कर चौंक गईं.

अल्का ने मां से उन का परिचय कराया, ‘‘मम्मी, ये हमारी कंपनी की चेयरपर्सन हैं.’’

‘‘आप हमारे घर!’’ उन्होंने उन के बैठने के लिए कुरसी खिसकाई तब ममता उस की मम्मी का हाथ पकड़ कर वहां बिछी चारपाई पर साथ ही बैठ गईं और बोलीं, ‘‘आज चाय ही नहीं, खाना भी यहीं खाएंगे.’’

‘‘आप?’’

‘‘तो क्या हुआ, आप हमारी सब से अच्छी एंपलौई की मां हैं.’’

अल्का की मां उठने लगीं तब ममता ने उन को रोक लिया और कहा, ‘‘खाना अल्का बनाएगी.’’ वह खाना बनाने के लिए चल दी. तब ममता ने अपने बेटे से कहा, ‘‘तू भी जा, रसोई में अपनी बड़ी बहन की मदद कर.’’

‘‘बड़ी बहन? वे तो उस के बौस हैं और रसोई में वे क्या मदद करेंगे?’’

मैडम बोलीं, ‘‘आप के पति ने परिवार के दबाव में जिस लड़की से शादी की वह मैं हूं.’’

अमिता कुछ बोल नहीं पाईं. रसोई की ओर जा रही अल्का भी रुक गई.

ममता ने अमिता से पूछा, ‘‘आप ने कभी यह नहीं सोचा कि आप की लड़की जिस कंपनी में काम कर रही है उस का नाम आप के नाम पर है और उस के मालिक का नाम आप के पति का नाम है?’’

‘‘इसलिए कि मुझे यह विश्वास नहीं था कि जिस व्यक्ति ने मुझे बुरी तरह बेइज्जत कर भगाया था वह ऐसा करेगा. फिर मैं ने इसे केवल संयोग माना.’’

‘‘आप गलत समझीं. उस समय उन का उद्देश्य तुम्हें बेइज्जत करने का नहीं था बल्कि तुम्हारे मन से अपनी याद मिटाने की कोशिश थी. परंतु न तो तुम्हारे मन से उन की याद मिटी और न ही वे तुम्हें भुला पाए. तुम्हारे नाम पर कंपनी का नाम रखा और बेटे का नाम भी अमित रखा जिस से इस बहाने वे आप को याद रख सकें.’’

अमिता कुछ नहीं बोल पा रही थीं ममता ही बोलीं, ‘‘पिछले साल उन की मौत हो गई परंतु अंतिम समय तक उन को यह मलाल रहा कि ‘अपनी उस के’ चरित्र पर आक्षेप किया. उन को यह भी मलाल रहा कि उस के गर्भवती होने का पहले पता होता तब वे मुझ से शादी नहीं करते.’’

‘‘आप को कब पता चला कि मैं उन की बेटी हूं?’’ अल्का बोली.

‘‘जब तुम्हारा बायोडाटा सामने आया था.’’

‘‘इस का मतलब है कि मुझे मेरी योग्यता के कारण जौब नहीं मिली बल्कि इस कंपनी के मालिक की बेटी होने के कारण मिली.’’

‘‘तुम्हें जौब तुम्हारी योग्यता के कारण ही मिली. चयन समिति ने जो पैनल दिया था उस में सब से ऊपर तुम्हारा नाम था. उस समय तक किसी को भी पता नहीं था कि तुम किस की बेटी हो. फिर तुम्हारे कार्यव्यवहार ने बता दिया कि तुम मेरे पति की बेटी हो. बेटा, तुम ने महसूस किया होगा कि तुम्हारे व्यवहार को देख कर सब क्या कहते हैं, ‘साहब वापस आ गए.’’’

‘‘हां, पर वे ऐसा क्यों कहते हैं?’’

‘‘तुम्हारे पापा के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं था और गलती होने पर किसी से भी माफी मांगने में उन को कोई गुरेज नहीं थी और तुम भी वही कर रही हो. वास्तव में तुम अपने पापा के सच्चे प्यार की निशानी हो. तुम में अपने पिता की सभी खूबियां हैं. तुम्हारा एक मालिक की तरह व्यवहार भी यही बता रहा था.’’

‘‘इसीलिए आप और बौस मेरे व्यवहार को नजरअंदाज कर रहे थे? परंतु मैडम…’’

उस की बात पूरी होने से पूर्व ही ममता ने उसे टोक दिया, ‘‘मुझे मम्मी नहीं कह सकतीं?’’

अल्का बोली, ‘‘सौरी मम्मी, मैं आप को ‘छोटी मम्मी’ कहूंगी और अपनी मम्मी को ‘बड़ी मम्मी’ कहूंगी.’’ इतना कह कर उस ने अपनी मम्मी की ओर देखा. उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी.

‘‘मैं भी ऐसा ही करूंगा,’’ अमित बोला.

ममता ने उसे गले से लगा लिया और कहा, ‘‘यह तेरा बौस नहीं, बल्कि तेरा छोटा भाई है. तुझे इस का खयाल रखना है क्योंकि यह बहुत भोला है.’’

‘‘मम्मी, मेरे छोटे भाई और अपने बेटे को अंडरएस्टीमेट मत करो. पापा की मौत के बाद यही तो कंपनी को चला रहा है.’’

यह सुन कर ममता हंस पड़ीं और अमिता से बोलीं, ‘‘अपने भाई को अंडरएस्टीमेट नहीं करना चाहती. वे भी तो यही करते थे, किसी के सम्मान को कम नहीं होने देते थे. अब मुझे चिंता नहीं, दोनों भाईबहन इस कंपनी को नई ऊंचाई पर ले जाएंगे.’’

अगले दिन जन्मदिन समारोह बहुत धूमधाम से मनाया गया. अमिता को उस का सम्मान मिला. दोनों मम्मियों ने अपने बच्चों को ढेर सारा प्यार दिया.

और फिर भगवान भी गायब हो गए

वह दिन अशोक के लिए आफत बन के सामने आया जब देश के महामहिम ने अपने तुगलकी फैंसले से पुरे देश में तालाबंदी की घोषणा कर दी. भला यह भी कोई बात हुई कि लाखों मजदूरों को महामहिम ने एक ही पल में अनाथ कर दिया. वैसे तो गरीबों का कोई माईबाप नहीं होता लेकिन ऐसे वक्त में उम्मीद तो महामहिम से ही लगाई जा सकती थी. खैर यह बातें अब बैमानी लगती है.

अशोक 35 वर्षीय युवक था जो यूपी के आजमगढ़ जिले से काम की तलाश में दिल्ली आया था. सुना है इस शहर में सब को कुछ न कुछ काम मिल ही जाता है. लेकिन वह सच्चाई जानता था कि यह शहर जितना अमीरों की रंगीनियत के लिए मशहूर है उतना ही मजदूरों की खाल खींच लेने वाले काम को ले कर. और फिर अशोक पांचवी से ऊपर पढ़ा भी तो नहीं था जो उसे बाबू का काम मिल जाता.

अपने लड़कपन में उस ने बड़ेबड़े किसानों की जमीन में कटाई, रुपाई, सिंचाई खूब की लेकिन इस मॉडर्न समाज ने उसे शहर की तरफ खींच ही लिया. सुना है छटांग भर की थोड़ी बहुत जमीन भी बाबा के इलाज में गिरवी रख दिया था. दिल्ली आने से पहले अशोक को लगा था की दिन रात मेहनत कर अपनी जमीन छुड़ा लेगा लेकिन अब तो बस सूद चुका ले वही बहुत है.

जिस जगह अशोक काम कर रहा था वह दिल्ली से थोड़ी दूर सटे नॉएडा में कंस्ट्रक्शन साईट थी. जहां अमीरों के लिए बड़े बड़े 4 बीएचके वाले अपार्टमेंट्स बनाए जा रहे थे. वहीँ उसी साईट से थोड़ी दूर ठेकेदार ने कंस्ट्रक्शन में काम करने वाले मजदूरों के लिए टीनटप्पर के चलते फिरते कामचलाऊ कमरे बनाए हुए थे. यह कमरे सर्दियों में सर्द हो जाते और गर्मियों में गर्म भट्टी. गर्म रात तो आसमान के नीचे जैंसे तैंसे कट जाया करती लेकिन ठिठुरती रातों में मेहरारू के गर्म बदन की याद सताती जिसे बहुत समय से अशोक ने छुआ नहीं था.

महामहीम की घोषणा के बाद नींद कहां आने वाली थी, “इस बेगाने शहर में एक दिन मन नहीं लगता तो इस माचिस की डिबिया जैसे कमरे में कैसे 21 दिन गुजार लें.”

लाकडाउन में शुरू के 3-4 दिन इस डर से बाहर नहीं निकला गया कि ना जाने कौन सी देत्यी बीमारी फ़ैल गई है कि जरा सा बाहर निकले कि सीधा मौत के घाट. लेकिन जब खाने के टोटे पड़ने लगे तो बीमारी गई तेल लेने. भूख की गुड़गुड़ आवाज मानो कमरे में गूँज रही थी, और भूख का देत्य तो ऐंसा जो शरीर का पूरा खून चूस ले और मांस कच्चा चबा जाए.

 कमरे से डेढ़ किलोमीटर दूर पर पहली राशन की दूकान थी. हिम्मत कर अशोक अपने बचेकुचे पैसों से राशन के लिए निकला, जैंसे ही आधा रास्ता पार हुआ कि नाके में पुलिस के हत्थे चढ़ गया. पुलिस की मार तो पड़ी ही साथ में मुर्गा भी बनना पड़ गया. “साला अजीब नोटंकी है, सरकारी खाना तो पहुंच नहीं रहा गरीबों तक लेकिन सरकारी डंडे जरुर पहुंच जाते हैं.” यह बात मन ही मन सोचकर थोडा बहुत राशन ले कर वह वापस लौटा.

अशोक जानता था कि “सरकार हमारे लिए कभी चिंता दिखाएगी नहीं. आखिर प्रवासी मजदूर बमुश्किल वोट देने अपने घरगांव जाते हैं, इसलिए किसी सरकार और पार्टी के लिए हमारी एहमियत न के बराबर है. उन के लिए तो हम कोल्हू का बैल हैं.”

अशोक ने ठान लिया कि अब यहां रहना मतलब भूखे मरने जैंसा है इसलिए यहां से अपने गांव निकलना होगा चाहे जो हो जाए. उसे चिंता थी तो लम्बे सफ़र की.

“न कोई गाड़ी न पैसा. ऊपर से जगह जगह सरकारी पहरा, कहीं आधे रस्ते वापस न लोटना पड़ जाए”. लेकिन तपती दोपहरी में बड़ेबड़े चट्टानों को तोड़ने वाला यह मजदूर इतनी आसानी से हार नहीं मानने वाला था.

उन से योजना बनाई और अगली रात कांधे में बस्ता टांगा जिसके अन्दर एक कम्बल, एक टिकिया साबुन और एक जोड़ी कपड़ा था, वहीँ साइकिल के एक तरफ भिगाए चने और पानी की बोतल की गठरी टांग दी. वह इतना समझ गया था कि उसे बस यह शहर पार करना है उस के बाद बस वो और उसका सफ़र होगा. योजना जैसे बनाई थी उस में वह कामयाब रहा, वह शहर से बचते बचाते बाहर निकल गया.

पहले दिन उस ने लगभग 100 किलोमीटर का लम्बा सफ़र तय किया. रास्तों में लगे साइन बोर्ड को उसने अपना मेप बनाया, गांव से आते जाते उसने रास्तों में पड़ने वाले शहरों के नाम याद किये हुए थे. इसलिए रास्ते में ज्यादा दिक्कत नहीं आई. जहां थोड़ी बहुत समस्या होती तो आसपास कोई सज्जन दिखता तो पूछ लेता. इस दौरान वह रास्ता भी भटका लेकिन वापस मुड़ अपने राह पर निकल पड़ा.

सर के ऊपर पड़ने वाली धूप से काली चमड़ी और काली दिखने लगी थी, शरीर की मांसपेशियां अकड़ने लगी थी, लगातार साइकिल चलाने की वजह से दोनों पावं के बीच चमड़ी छिलने लगी थी.

वह सहसा थक चुका था और शाम भी हो चली थी. उस ने पास में भगवान कृष्ण का एक मंदिर देखा, ढलते सूरज को देखते हुए रात इसी मंदिर के देहली में बिताने की सोची. उस का शरीर भूख और थकान से निढाल हो चुका था. आंखों में गहरी थकान महसूस होने लगी थी. जैंसे उस की आँखे घोर निद्रा में डूबने लगीं हो.

एकाएक उस की नजर भगवान कृष्ण की हंसती हुई मूर्ति पर पड़ी. उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा कि भगवान भी उस की इस विपदा पर हंस रहे हैं. वह उस मूर्ति को देख खीजने लगा. उस ने खीजते हुए कहा “है भगवान तू अगर कहीं है तो इस दुनिया में जो भी मजदूरों ने बनाया है वह सारा मिटा दे.”

उस का इतना ही कहना था कि एकाएक सब कुछ गायब होने लगा.

जिस हवाई जहाज से देश के महामहिम अमीर प्रवासियों को दूसरे देश से ले कर आए थे उस के अंजरपंजर, नटबोल्ट एकाएक सब बिखर कर गायब होने लगे. कोटा से छात्रों को जिन बसों में रेस्क्यू किया गया वह गायब बसें होने लगीं. जो मंडप नेताओं के बच्चों की शादी में लगाया गया वह तम्बूबम्बू सब उखड़ने लगा. सड़के टूटटूट कर मिटटी के मलवे में बदलने लगी. कल कारखानों की मशीनें गायब होने लगीं. रिहायशी बिल्डिंगे, अपार्टमेंट सब धूलधाल हो गए. फ़िल्मी सितारों के गिटार सितार सब टूटने लगे. गली मोहल्ले की स्ट्रीट लाईट, स्कूल, अस्पताल, यहां तक की शरीर में ओढ़े ब्रांडेड कपड़े तक गायब होने लगे.

अशोक का पसीना तब छूटने लगा जब उस ने देखा कि जिस मंदिर में वह खड़ा है वह मंदिर गायब होने लगा है. और सब से बड़ा धक्का उसे तब लगा जब उस ने देखा कि जिस मूर्ति के सामने वह प्रार्थना कर रहा था वह मूर्ति भी मलवे के ढेर में बदल गई है.

अचानक अशोक की आंख खुली वह घबरा गया. वह उठ खड़ा हुआ तो देखा सब सामान्य है. सब अपनी जगह वैसा ही है जैंसा पहले था. उसे आभास हुआ कि उस ने एक बुरा सपना देखा है. शायद शारीरिक थकान के साथ साथ मानसिक थकान ने उसे भीतर तक प्रभावित किया था.

अब जब वह उठ ही गया था तो उस ने आगे का रास्ता नापने का फैसला कर लिया था. अभी अँधेरा खुला भी नहीं था. रास्ते ठीक से नजर नहीं आ रहे थे, लेकिन अशोक जल्दी अपने घरपरिवार के पास पहुंच जाना चाहता था. उस ने बस्ते में रखे चनों को हाथ भी नहीं लगाया था. वह उसे अपने लम्बे सफर के लिए बचाए रखना चाहता था.

जैंसे ही वह थोड़ी ही दूर साइकिल से पहुंचा कि एकाएक पीछे से एक जोर का धक्का उसे लगा. वह 6 मीटर दूर उछल कर गिर पड़ा. गठरी में बंधे चने सड़क पर बिखर गए और शरीर खून से लतपथ हो गया. अंधेरे में ट्रक तेजी से निकल गया, उसकी आंखे धीरे धीरे बंद हो गई, लगता है उस ने अपनी थकान और ताउम्र की पीड़ा से सम्पूर्ण मुक्ति पा ली.

मुझे जंकफूड खाने की आदत है, जिस वजह से मैं मोटी होती जा रही हूं?

सवाल 

मेरी उम्र 25 वर्ष है. खानेपीने की जंकफूड का सेवन करना मेरी कमजोरी है. इसी का नतीजा है कि मैं बहुत मोटी हो गई हूं. मेरी फिजीकल ऐक्टिविटी ज्यादा नहीं है. घर पर ही रहती हूं. मेरा काम औनलाइन ही है, ऐक्सरसाइज करने में आलस करती हूं और खानेपीने पर कंट्रोल नहीं रख पाती. अपनी आदतों से खुद ही परेशान हो गई हूं. जिंदगी के प्रति उदासीन होती जा रही हूं. ऐसा लग रहा है मैं डिप्रैशन का शिकार हो रही हूं. कृपया मुझे इस स्थिति से उबारें.

जवाब
आप खुद मान रहीं हैं कि आप की आदतें गलत हैं फिर भी उन्हें दूर करने का प्रयास नहीं कर रहीं, यह तो गलत है न. खानेपीने का शौकीन होना गलत बात नहीं लेकिन हर चीज की अति गलत होती है. जंकफूड का ज्यादा सेवन, घर पर बैठे रहना, फिजिकल ऐक्सरसाइज न करना इन सब के कारण आप का मोटापा बढ़ा है. उदास होने की जरूरत नहीं, अभी भी वक्त है. आप पहले की तरह पतली हो सकती हैं. ऐसा भी नहीं कि आप के पास वक्त नहीं. घर पर ही रहती हैं. आप अपनी सामान्य रूटीन लाइफ में कुछ परिवर्तन कर के अपना मोटापा कम कर सकती हैं, क्योंकि अभी तो आप की उम्र कम है, आगे चल कर यही मोटापा ब्लड प्रैशर, डायबिटीज, हाई कोलैस्ट्रौल व अन्य कई बीमारियों का कारण बन सकता है. रही बात ऐक्सरसाइज की तो वह तो करनी ही पड़ेगी, उस से आप बच नहीं सकतीं इसलिए आलस बिलकुल मत करें. एरोबिक्स क्लासेस जौइन कर सकतीं हैं. स्विमिंग, जौगिंग, साइक्ंिलग, स्किपिंग, पुशअप इन सब के बाद से शरीर से विभिन्न अंगों की चर्बी को कम किया जा सकता है. दिन में 2 से 3 बार ग्रीन टी पिएं. एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद, 3 बड़े चम्मच नीबू का रस, एक चुटकी काली मिर्च पाउडर डाल कर हर रोज सुबह पिएं. रोटी कम सलाद ज्यादा खाएं. रोज 8 गिलास पानी जरूर पिएं. पानी गरम पिएंगी तो शरीर डिटौक्स होने लगेगा. इस में मैटाबोलिज्म बढ़ेगा और बौडी स्लिम होगी. इस के अलावा खाना थोड़ाथोड़ा कर के 4 बार खा सकती हैं. रात को खाना खाने के बाद थोड़ा टहल लें. इन सब बातों को फौलो करेंगी तो वह दिन दूर नहीं जब आप की एक बार फिर परफैक्ट बौडी होगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

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