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क्या मुसलमानों की बदलेगी सोच?

वर्ष 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुसलिम विधायकों की संख्या 11 से घट कर 9 हो गई. कहने को 2 सीटों का नुकसान हुआ लेकिन राज्य में जिस तरह मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन यानी एमआईएम ने 2 सीटें हासिल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, उस से सियासी पंडितों की बेचैनी बढ़ी है. यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या मुसलिम मतदाताओं की सोच में तबदीली आ रही है? क्या अब मुसलमानों ने भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना से डरना छोड़ दिया है? क्या एमआईएम के पीछे भाजपा है ताकि हिंदू वोटरों को एकजुट रखा जा सके?

ये सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं कि एमआईएम ने न केवल 2 सीटों पर कामयाबी हासिल की बल्कि कई सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही और कुछ सीटों पर तीसरे स्थान पर. पार्टी इस कामयाबी से इतनी खुश है कि वह अब देश के अन्य राज्यों–दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है. जबकि मुंबई नगर निकाय चुनाव में हिस्सा लेने की घोषणा ने सियासी तापमान को बढ़ा दिया है. महाराष्ट्र में मुसलमानों की जनसंख्या कुल आबादी की 10.6 फीसदी है और वह राज्य का सब से बड़ा अल्पसंख्यक समूह है लेकिन यदि उन का सियासी प्रतिनिधित्व आंकड़ों में देखा जाए तो 1999 की विधानसभा में मुसलिम विधायकों की संख्या 12 थी, 2004 में यह संख्या 11 रह गई, 2009 के चुनाव में 1 मुसलिम विधायक और कम हो कर 10 रह गई जिस में 6 विधायक मुंबई शहर से निर्वाचित हुए थे. 288 सदस्यीय विधानसभा में कम से कम 40 क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.

हालिया चुनावी नतीजे इस की पुष्टि नहीं करते. इस से मुसलिम वोटबैंक का भ्रम टूट गया व मुसलिम वोट सिर्फ कांगे्रस और राष्ट्रवादी कांग्रेस यानी एनसीपी को नहीं मिले बल्कि भाजपा और शिवसेना को भी मिले. मुसलिम उम्मीदवारों की भीड़ ने वोटरों को बुरी तरह विभाजित किया और भिवंडी, जहां हमेशा मुसलिम उम्मीदवार चुनाव जीतता था इस बार वहां शिवसेना और भाजपा को कामयाबी मिली. मजलिस इत्तेदाउल मुसलेमीन ने कुल 24 उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में उतारे थे जिन में से 2 सीटों पर उसे कामयाबी मिली. मुंबई के बाइकला से एडवोकेट वारिस पठान जीते हैं और औरंगाबाद सैंट्रल से एक महीने पहले सियासत में आए पत्रकार इम्तियाज जलील कामयाब हुए हैं जबकि 3 अन्य उम्मीदवारों ने अपने प्रतिद्वंद्वी को कड़ी टक्कर दी है.

इन में शोलापुर (सैंट्रल), प्रबनी और औरंगाबाद (ईस्ट) सीटें शामिल हैं. 8 सीटों पर इस के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे. इन में नांदेड़ (साउथ), औरंगाबाद (वैस्ट), वडेंदा (ईस्ट), सोनार, मालेगांव, मुंबरा और मुंबादेवी सीटें शामिल हैं.

अहम रहे चुनाव

इन में सभी उम्मीदवार मुसलिम नहीं थे बल्कि कुछ गैरमुसलिम भी उम्मीदवार थे. कांगे्रस, एनसीपी, भाजपा, शिवसेना, एमएनएस और समाजवादी पार्टी सभी ने मुसलिम उम्मीदवार उतारे थे जिन्हें कुल मिला कर 19 लाख वोट हासिल हुए जबकि मजलिस के 24 उम्मीदवारों को कुल 5,16,632 वोट मिले. यानी कुल वोटों का 27 फीसदी मजलिस को मिला.  कांगे्रस को 31 फीसदी मुसलिम वोट मिले और एनसीपी को 21 फीसदी मुसलिम वोट हासिल हुए. 2009 के विधानसभा चुनाव में मुसलिम वोटों का 70 फीसदी कांग्रेस-एनसीपी गठजोड़ को मिला था.

महाराष्ट्र विधानसभा का यह चुनाव इस प्रसंग में बहुत अहम रहा कि मुसलिम मतदाताओं के विभाजन से मुसलमानों से ज्यादा नुकसान कांगे्रस और एनसीपी अथवा तथाकथित सैक्युलर पार्टियों को हुआ. कांगे्रस और एनसीपी के बहुत से नेता सिर्फ इसलिए चुनाव हार गए कि मुसलमानों ने उन्हें निरस्त कर दिया. मुसलिम वोट जो एकजुट हो कर उन्हें मिलते थे, इस बार उन्हें नहीं मिले बल्कि विभिन्न उम्मीदवारों में बंट गए. कांगे्रस विधायक आरिफ नसीम खां इस के लिए मजलिस को दोषी ठहराते हैं. वे इसे वोट कटवा पार्टी बताते हैं कि जिस की वजह से सैक्युलर वोट बंट गया और सांप्रदायिक ताकतों को फायदा हुआ.

आम मुसलमानों की धारणा है कि कांगे्रस हमेशा भाजपा और शिवसेना का डर दिखा कर मुसलिम वोट हासिल करती रही है. जहां तक मुसलमानों के लिए काम करने की बात है तो 11 फीसदी मुसलिम आबादी वाले इस राज्य की जेलों में बंद मुसलमानों की संख्या 27 फीसदी है. चुनावी मुहिम में मजलिस ने इस मामले को बड़े जोरशोर से उठाया था.

हो गया मोहभंग

इन चुनावों से यह बात खुल कर सामने आ गई है कि मुसलमानों के लिए कोई सियासी पार्टी अछूत नहीं रह गई है और वह सैक्युलरिज्म के नाम पर बंधुआ मजदूर बनने को तैयार नहीं है. इन तथाकथित सैक्युलर पार्टियों से उस का मोह भंग होता जा रहा है. शिवसेना और भाजपा को भी वह अब आजमाने लगा है. मजलिस अपनी इस कामयाबी से उत्साहित हो कर मुंबई कौर्पोरेशन में अपने उम्मीदवार खड़े करने की तैयारी कर रही है. मुंबई कौर्पोरेशन में समाजवादी पार्टी को काफी सीटें मिल जाया करती थीं और वे आमतौर पर मुसलिम क्षेत्रों से ही जीत कर जाती थीं. मजलिस के इस फैसले से यह संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि इन सीटों पर एमआईएम का कब्जा हो जाएगा. इस डर से मजलिस को भाजपा का एजेंट बताया जा रहा है. यह खतरा सभी सैक्युलर कहलाने वाली पार्टियों को हो गया है. हालिया दिनों में हुए जनता परिवार के महामोरचा गठन को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए जो अपने वजूद को बचाने के लिए सैक्युलरिज्म की दुहाई देते हुए एक बार फिर एकजुट होने की जुगत में है.

भारत भूमि युगे युगे

राज्यपाल की लाटसाहबी

कल्पना करें कि आप को विदेश जाना है और एअरपोर्ट जा कर अपनी जेब व सामान टटोलने के बाद आप को समझ आता है कि अरे, पासपोर्ट तो घर पर ही रह गया, तब आप पर जो गुजरेगी उसे कोई दूसरा नहीं समझ सकता. कभी खुद को तो कभी पत्नी या सेक्रैटरी को कोसते आप की नाकाम कोशिश यही होगी कि अधिकारी आप की बात का यकीन करते हुए आप को यात्रा की अनुमति दे दें.पासपोर्ट का कोई विकल्प नहीं होता, इसलिए यह इजाजत तो छत्तीसगढ़ के राज्यपाल गौरीशंकर अग्रवाल को भी नहीं मिली जो 19 नवंबर को रायपुर से ढाका जाने के लिए निकले थे. कोलकाता हवाईअड्डे पर उन्हें याद आया कि पासपोर्ट तो राजभवन में ही रह गया है. चूंकि वे आम आदमी नहीं थे इसलिए तुरंत ही एक हवाई जहाज रायपुर से उड़ कर पासपोर्ट ले कर आया. इसे कहते हैं लाटसाहबी.

महादलित की महा इच्छा

बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी बड़े दिलचस्प बयान देते हैं, कभीकभी तो लगता है कि वे मजाक कर रहे हैं. इसी श्रृंखला में उन्होंने पटना में कह डाला कि कल को मैं पीएम भी बन सकता हूं. बकौल जीतनराम, ‘चूंकि मैं महादलित हूं इसलिए ताकतवर लोग मेरा मजाक बनाते हैं,’ जाति का यह टोटका अब पुराना हो चला है. दलित या महादलित होना प्रधानमंत्री बनने की योग्यता होती तो मायावती एकांतवास न काट रही होतीं. भाग्यवाद से खुद को ऊपर उठा पाएं तो जीतन के लिए यह भी मुश्किल नहीं कि राजनीति में सबकुछ इत्तफाक से होता है. जो मौके भुनाता है और नए मौके बनाता है वह शीर्ष पर भी पहुंच जाता है. इस में न जाति आड़े आती है न पेशा.

ब्रैंड और राजनीति

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सुप्रीमो शरद पवार की पूछ अभी भी है. वजह, महाराष्ट्र की राजनीति पर उन की जमीनी पकड़ है, जहां त्रिशंकु विधानसभा की समस्या हल होते नहीं दिख रही. मध्यावधि चुनाव की भविष्यवाणी कर चुके पवार की नजर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रोडक्ट नहीं जानते लेकिन मार्केटिंग अच्छी कर लेते हैं. अर्थ बाजार में इस शब्दकोश का एक और महत्त्वपूर्ण शब्द ब्रैंडिंग है और अब हर कोई मानने लगा है कि मोदी एक अच्छे ब्रैंड हैं. राजनीति की भाषा का कारोबार के इर्दगिर्द आते जाना हैरत की बात नहीं है. अब हर कोई पैसा कमाने के लिए सेवा करना चाहता है, इसलिए ब्रैंड, प्रोडक्ट और मार्केटिंग जैसे शब्द चलन में आने लगे हैं. शुक्र है पवार को समझ तो आया कि बेचने के लिए हाथ में कुछ न कुछ हमेशा रहना चाहिए. मोदी तो 5 साल बाद विश्व गुरु बनने का सपना भी अभी से विदेशों में जाजा कर बेचने लगे हैं.

रामदेव पर मेहरबान सरकार

पद्म उपाधियों की तरह अब सुरक्षा श्रेणियां भी सरकार खैरात की तरह बांटने लगी है जो जरूरत पर नहीं बल्कि सरकार से नजदीकी और दूरी के हिसाब से मिलती हैं. रामदेव को यों ही, खामख्वाह जेड प्लस सुरक्षा दे दी गई तो कुछ नासमझ से लोगों ने सोचा कि इन्हें किस से खतरा, ये तो खुद भगवानटाइप के व्यक्ति हैं. ऐसा सोचने व सवालजवाबों के कुछ माने नहीं होते. माने इस बात के होते हैं कि जिस के पास धन होता है उसे ज्यादा खतरा रहता है. अब जब सरकार के लिए रामदेव जैसी खासमखास शख्सीयत हो तो इस में हैरानी किस बात की. सरकारी सुरक्षा अब शान और रसूख की बात हो चली है, जिसे सरकार किसी एक से छीन कर अपने वाले को दे देती है ताकि सुरक्षा लेने वाला एहसान से दबा रहे.

सारदा चिटफंड घोटाला जांच : अब बड़ी मछली की बारी

कोलकाता के प्रेसीडेंसी जेल में बंद सारदा चिटफंड घोटाला मामले के अभियुक्त व तृणमूल कांगे्रस के बहिष्कृत सांसद कुणाल घोष ने 14 नवंबर को 5 मिलीग्राम की एलजोलम नामक नींद की 54 गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी. इस से पहले कुणाल ने अदालत में सुनवाई के दौरान सारदा ग्रुप से आर्थिक फायदा उठाने वाले राज्य के अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों की गिरफ्तारी न किए जाने पर आत्महत्या करने की धमकी दी थी. यानी कुणाल द्वारा घोषित रूप से आत्महत्या की यह कोशिश थी. जेल प्रशासन ने धमकी को गंभीरता से नहीं लिया था. सुबह इलाज के बाद अस्पताल से बाहर निकलते हुए कुणाल ने पत्रकारों से बात करने की कोशिश की तो पुलिस ने अति तत्परता के साथ रोक दिया. कुणाल को धक्का दिया गया और उन के मुंह पर पुलिस ने अपनी टोपी रख कर मुंह खोलने से रोक दिया.

हालांकि अगले दिन कुणाल अपनी बात पत्रकारों तक पहुंचाने में सफल रहे. सीबीआई की पूछताछ के लिए जाते समय कुणाल ने यह बयान दे ही दिया कि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सारदा चिटफंड से अगर किसी को सब से अधिक लाभ हुआ है तो वे हैं ममता बनर्जी. आत्महत्या की कोशिश से पहले सीबीआई को लिखे 4 पन्ने के पत्र में कुणाल ने ममता बनर्जी, मुकुल राय, मदन मित्र, मुख्य सचिव संजय मित्र, मुख्यमंत्री के सचिव गौतम सान्याल, कोलकाता पुलिस कमिश्नर सुरजीत पुरकायस्त, विधाननगर पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार, ‘प्रतिदिन’ अखबार के मालिक व तृणमूल के पूर्व राज्यसभा सांसद स्वप्न साधन बोस और उन के बेटे व तृणमूल के वर्तमान राज्यसभा सांसद सृंजय बोस जैसे तृणमूल के बड़े नेताओं के नाम लिए हैं. पत्र के अंत में कुणाल ने इसे सुसाइड नोट मानने का अनुरोध सीबीआई से किया था.

ममता पर सीधा निशाना

आत्महत्या की कोशिश से पहले भी पूछताछ के लिए सीबीआई दफ्तर आतेजाते कुणाल ने पत्रकारों को आगाह करते हुए कहा था कि तृणमूल के 9 बड़े नेताओं को, सारदा से आर्थिक लेनदेन कर के, सब से अधिक लाभ हुआ है, लेकिन उन से पूछताछ नहीं की जा रही है. कुणाल का यह भी कहना था कि सुदीप्त सेन भले ही इन नेताओं का नाम लेने से डर रहा हो, पर उन्हें किसी का डर नहीं है. कुणाल ने अदालत में खड़े हो कर सुदीप्त सेन, आसिफ खान को उन के सामने बिठा कर पूछताछ करने के लिए कई बार कहा है. आसिफ खान और कुणाल घोष को आमनेसामने बिठा कर जिरह हो चुकी है. रही बात सुदीप्त सेन की तो वह कुणाल के साथ आमनेसामने बैठने को राजी नहीं है.

कुणाल घोष ने जब ममता बनर्जी को उस के सामने बिठा कर जिरह करने की चुनौती दे डाली तो विरोधी पक्ष को चर्चा का मौका मिल गया. विधानसभा में विरोधी पार्टी के नेता सूर्यकांत मिश्र, कांगे्रस प्रदेशाध्यक्ष अधीर चौधरी और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष राहुल सिन्हा ने कुणाल के प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा कि अगर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वाकई निर्दोष हैं और सारदा चिटफंड घोटाले से उन का कोई लेनादेना नहीं है तो उन्हें कुणाल की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए. गौरतलब है कि कुणाल से अब तक सीबीआई ने 14 बार, प्रवर्तन निदेशालय ने 9 बार और एसएफआईओ यानी सीरियस फ्रौड इन्वैस्टिगेशन औफिस की ओर से पूछताछ की जा चुकी है.

सारदा चिटफंड मामले के एक और आरोपी व तृणमूल से बहिष्कृत आसिफ खान ने भी इशारे ही इशारे में ममता को कठघरे में खड़ा किया है. आसिफ का कहना है, ‘‘पूरा तृणमूल कांगे्रस ही ममता की संतान है. संतान की समृद्धि देख मां को आनंद होता ही है. यह आनंद और फायदा दोनों एक ही चीज हैं.’’ गौरतलब है कि अप्रैल 2013 में सारदा चिटफंड मामले का खुलासा होने के बाद यह पहला मौका है जब ममता बनर्जी का नाम ले कर कीचड़ उछाला गया. इस से पहले आसिफ खान यह भी बयान दे चुका है कि 2009 से 2013 तक पार्टी के विभिन्न नेताओं के साथ उठनेबैठने और उन के लिए चाय परोसने के दौरान उस ने जितना कुछ देखा, समझा और जाना, वह सब सीबीआई को बता दिया है.

आसिफ खान ने तो यहां तक कह दिया कि सारदा का करोड़ों रुपया ममता बनर्जी के काफिले में शामिल एंबुलैंस में भर कर हटा दिया गया है. गौरतलब है कि जांच में रुपए से भरे 10 सूटकेसों के गायब होने का मामला सामने आ चुका है. ममता की पेंटिंग्स सुदीप्त सेन को जबरन बेचे जाने का भी मामला सामने आया है. कुणाल से पूछताछ में जांच अधिकारियों को पता चला कि सृंजय बोस के दबाव में सुदीप्त सेन को ममता की पेंटिंग 180 लाख रुपए में खरीदनी पड़ी. मगर पेंटिंग्स सुदीप्त सेन को कभी मिली नहीं.

चिदंबरम से जुड़े तार

सारदा घोटाले के तार पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से भी जुड़े. दरअसल, पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम असम के पूर्व कांगे्रसी सांसद मतंग सिंह की पूर्व पत्नी मनोरंजना सिंह की वकील के रूप में सारदा के मालिक सुदीप्त सेन के संपर्क में आईं. मनोरंजना सिंह और मतंग सिंह ने पूर्वोत्तर में एक टीवी चैनल खोलने के लिए सुदीप्त पर दबाव बनाया. इस के लिए मनोरंजना से 800 करोड़ रुपए के एवज में नलिनी चिदंबरम के जरिए एक करार हुआ. एक तरफ मनोरंजना सिंह ने नलिनी के जरिए सारदा को वित्त मंत्रालय से लाभ पहुंचाने का भरोसा दिया तो दूसरी तरफ नलिनी चिदंबरम ने डेढ़ साल तक तमाम कानूनी पक्षों से निबटने के लिए 1 करोड़ रुपए हर महीने लेने का करार किया था. मामले का खुलासा कुणाल द्वारा सीबीआई को 92 पन्ने के पत्र में पहले ही हो चुका था. लेकिन मालदह के पूर्व कांगे्रसी सांसद और पूर्व राज्यमंत्री अबु हसीम चौधरी ने 15 मार्च, 2012 को सारदा को आरबीआई के दायरे में लाने की मांग करते हुए एक शिकायतीपत्र लिखा था. लेकिन पी चिदंबरम और उन की पत्नी का नाम आने के बाद उन पर दबाव डाला गया. इस के बाद अबु हसीम चौधरी ने अपनी शिकायत वापस ले ली.

बंगाल के मालदह से कांगे्रस सांसद और राज्यमंत्री अबु हसीम चौधरी ने सारदा ग्रुप के खिलाफ लिखी अपनी सारी शिकायतें वापस ले ली थीं. चौधरी ने पहले सारदा ग्रुप के खिलाफ शिकायती चिट्ठी लिखी थी और कहा था कि इस चिटफंड कंपनी को आरबीआई के दायरे में लाना चाहिए. लेकिन 15 मार्च, 2012 को उन्होंने अपनी शिकायत वापस ले ली. सारदा ग्रुप औफ कंपनी से तृणमूल नेताओं के अलावा पार्टी के समर्थक फिल्मी हस्ती से ले कर पेंटर तक ने खूब पैसा बटोरा. प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के जांच के घेरे में अपर्णा सेन, मिथुन चक्रवर्ती और शुभाप्रसन्न भट्टाचार्य तक के नाम शामिल हैं. अपर्णा सेन का नाम सारदा मीडिया की एक पत्रिका के संपादक के रूप में और मिथुन चक्रवर्ती पर सारदा मीडिया के न्यूज चैनल के ब्रैंड एंबैसेडर के रूप में हर महीने एक बहुत ही मोटी रकम लेने का आरोप है.

राज्य में सत्ता परिवर्तन के साथ वाम समर्थक माने जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती ने पाला बदला और वे तृणमूल समर्थक बन गए. इस का फायदा उन्हें सारदा के वेतनभोगी के रूप में मिला. वहीं सिंगूरनंदीग्राम आंदोलन से जुड़ने के साथ अपर्णा सेन ने माओवादियों के साथ मध्यस्थता भी की थी. इसी तरह नंदीग्रामसिंगूर आंदोलन के दौरान तृणमूल बुद्धिजीवियों के अगुआ बने तृणमूल समर्थक पेंटर शुभाप्रसन्न भट्टाचार्य खूब फलेफूले. जांच से साफ हो गया है कि पहले वामपंथी और फिर तृणमूल समर्थक शुभाप्रसन्न ने सारदा का खूब दोहन किया. उन्होंने देवकृपा व्यापार प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक फर्जी कंपनी को सुदीप्त सेन को बेचा. ममता के करीबी माने जाने वाले पेंटर ने सारदा से इस के अलावा भी खूब पैसा बटोरा. गौरतलब है कि प्रवर्तन निदेशालय अब तक शुभाप्रसन्न के 26 बैंक अकाउंट फ्रीज कर चुका है. साथ ही मुंबई में उन के 3 होटल और 2 फ्लैटों को जब्त करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

श्यामल सेन कमीशन

श्यामल सेन कमीशन की जांच अवधि को बढ़ाने से अक्तूबर में राज्य गृह विभाग ने इनकार कर दिया. गृह विभाग का कहना है कि चूंकि सारदा मामले की जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय कर रहा है, इसलिए प्रताडि़तों को रकम लौटाने की जिम्मेदारी अब सरकार की नहीं है. इस से पहले सारदा की संपत्ति की बिक्री कर के श्यामल सेन कमीशन ने 17 लाख प्रताडि़त लोगों को पूंजी लौटाई. इन में से 5 लाख लोगों ने 10 हजार रुपए से कम की रकम सारदा में जमा की थी. बहरहाल, सरकार के इस फैसले के खिलाफ प्रताडि़त लोगों ने यह कहते हुए हाईकोर्ट में मामला दायर किया है कि श्यामल सेन कमीशन न केवल सारदा चिटफंड की जांच कर रहा था, बल्कि इस जैसी अन्य 108 कंपनियों की भी जांच कर रहा है. मामला अभी भी विचाराधीन है.

जांच में प्रगति

इस बीच कई केंद्रीय जांच संस्थाओं को सारदा घोटाले का जिम्मा सौंपा गया है. प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय इस की जांच कर रहे हैं. इस दौरान, सीबीआई की ओर से 2 चार्जशीट जमा कर दी गई हैं. पहली चार्जशीट में सुदीप्त सेन, देवजानी मुखर्जी, कुणाल घोष, रजत मजूमदार, असम गायक सदानंद गोगई, ईस्ट बंगाल फुटबाल क्लब के पदाधिकारी देवव्रत उर्फ नीतू सरकार, कोलकाता कारोबारी सज्जन अग्रवाल और उस का बेटा संधीर अग्रवाल के नाम हैं. इन में सज्जन अग्रवाल को छोड़ कर बाकी सब गिरफ्तार किए जा चुके हैं. बताया जाता है कि सीबीआई की दूसरी चार्जशीट में कोई बड़ा नाम नहीं है. हालांकि सीबीआई जल्द ही अगली चार्जशीट जमा करेगी. आशंका व्यक्त की जा रही है इस में सृंजय बोस के अलावा कई चौंकाने वाले नाम हो सकते हैं.

सीबीआई के अलावा प्रवर्तन निदेशालय की ओर से भी जांच का काम चल रहा है. प्रवर्तन निदेशालय को पहले चरण में सारदा के 350 करोड़ रुपए की संपत्ति का पता चला था. इस के बाद 150 करोड़ रुपए की और भी संपत्ति का पता चला. फिलहाल इन संपत्तियों से जुड़े तमाम तथ्यों की भी जांच की जा रही है. पता यह भी चला है कि सारदा टूर ऐंड ट्रैवेल्स के नाम पर बाजार से 1,259 करोड़ रुपए की उगाही की गई और इस रकम को सारदा मीडिया ग्रुप में लगाया गया. गौरतलब है कि सारदा मीडिया ग्रुप का इस्तेमाल ममता के पक्ष में जनसमर्थन बनाने के लिए भी किया गया. इस का फायदा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला.

बहरहाल, सारदा मीडिया में बड़े नुकसान का हवाला दे कर सुदीप्त सेन ने कई अखबार और चैनल को बंद करने व उन में आगे रकम झोंकने से मना कर दिया. सुदीप्त सेन ने सारदा मीडिया के कर्मचारियों के वेतन भी रोक दिए. यहीं से कुणाल घोष और सृंजय बोस के साथ सुदीप्त के संबंध बिगड़ने लगे. अर्पिता घोष ने कर्मचारियों के वेतन के लिए पुलिस में एफआईआर दर्ज करा दी.

कई राज्यों से जुड़े तार

पश्चिम बंगाल के सारदा घोटाले के तार असम तक जा पहुंचे. सारदा से प्रताडि़त लोगों को न्याय दिलाने के लिए असम विधानसभा ने असम निवेशक हित संरक्षण बिल (2013) को आम सहमति से पारित किया. असम सरकार ने स्वत:प्रेरित हो कर सारदा ग्रुप के खिलाफ मामला दायर किया है. इस के अलावा, असम सरकार ने अन्य 127 चिटफंड कंपनियों के खिलाफ भी मामला दायर किया. 303 लोगों की गिरफ्तारी हुई और उन के पास से 94 लाख रुपए जब्त किए गए. इस के अलावा विभिन्न बैंकों के अकाउंट में जमा 24 करोड़ रुपए भी जब्त किए गए. फिलहाल, मामला सीबीआई जांच के दायरे में है.

बंगाल के सीमांत इलाके के गांवकसबे के लगभग 6 हजार निवेशकों की शिकायत पर ओडिशा सरकार ने राज्य पुलिस के अंतर्गत आर्थिक अपराध शाखा को जांच का निर्देश दिया. इस बीच, शारदा ग्रुप के खिलाफ 207 मामले दायर किए गए. सारदा के दफ्तर के अधिकारियों और एजेंटों को मिला कर 440 लोगों को गिरफ्तार किया गया. भारतीय दंड विधान, प्राइस चिट ऐंड मनी सर्कुलेशन स्कीम ऐक्ट, ओडिशा निवेशक हित संरक्षण बिल के तहत 120 मामले में चार्जशीट जमा की जा चुकी है. मई, 2014 में सारदा घोटाले का मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. वहीं, त्रिपुरा में भी सारदा द्वारा लोगों को सब्जबाग दिखा कर निवेशकों को उल्लू बनाने का मामला सामने आया है. त्रिपुरा सरकार ने सारदा से जुड़ी तमाम शिकायतों को 9 मई, 2014 को सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को सौंप दिया है.

पूर्वोत्तर से बंगलादेश तक पहुंचा

आरोप है कि असम के पूर्व कांगे्रसी सांसद हेमंत विश्वकर्मा के जरिए आसू, अल्फा और नगालैंड के अलगाववादी संगठन एनएससीएन (आईएम) के साथ सारदा का समझौता हुआ, ताकि पूर्वोत्तर के राज्यों में सारदा अपनी पहुंच बना सके. बंगाल ही नहीं, असम और त्रिपुरा के रास्ते भी सारदा के पैसे बंगलादेश तक पहुंचे जिस का इस्तेमाल बंगलादेश की शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की सरकार को अस्थिर करने में हुआ. हाल ही में शेख हसीना सरकार ने भारत की केंद्र सरकार को एक खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट भी भेजी है. रिपोर्ट में तृणमूल कांगे्रस का इस में सीधे हाथ होने की बात कही गई है. रिपोर्ट में तृणमूल सांसद अहमद हसन इमरान का संपर्क जमात-ए-इसलामी से जुड़े होने की बात कही गई है.

गौरतलब है कि 1970 के युद्ध अपराधियों को बंगलादेश विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी. बंगलादेश की विपक्षी नेता खालिदा जिया समर्थक  जमात-ए-इसलामी ने 2013 में ढाका के शाहबाग मैदान समेत पूरे बंगलादेश में उपद्रव मचाया था. आएदिन हिंसक झड़पों, लूटपाट, विरोधप्रदर्शन और आगजनी के दौरान सैकड़ों लोग मारे गए थे. यह उपद्रव शाहबाग आंदोलन के नाम से जाना जाता है. दरअसल, 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद शेख हसीना ने जमात-ए-इसलामी को प्रतिबंधित घोषित कर दिया है. केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट में बंगलादेश खुफिया एजेंसी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल के सीमा से सटे बनगांव, हासनाबाद, बशीरहाट, लालगोला, हबीबपुर, कालियागंज, बालूरघाट जैसे इलाके के जरिए तृणमूल सांसद अहमद हसन इमरान ने बंगलादेश में हथियार और गोलाबारूद सप्लाई किए थे.

बंगलादेश ने ममता बनर्जी पर यह भी आरोप लगाया है कि अपने मुसलमान वोटबैंक को बनाए रखने के लिए उन के द्वारा जमात-ए-इसलामी को मदद दी जाती रही. यही नहीं, जमात-ए-इसलामी के इशारे पर ममता बनर्जी तिस्ता जल बंटवारे में अड़चन डाल रही हैं. ममता के कारण भारत के बंगलादेश के साथ और भी कई समझौते अधर में लटक गए हैं. अब तक की जांच से साफ हो चुका है कि सारदा की बहती गंगा में तृणमूल से जुड़े तमाम नेताओं से ले कर विधायकों, सांसदों, पत्रकारों, संपादकों, बौलीवुड से ले कर टौलीवुड के अभिनेताअभिनेत्रियों और पेंटर तक सब ने हाथ धोए. न केवल हाथ धोए, बल्कि आकंठ डुबकी भी लगाई. दरअसल, सत्ता में आने के बाद ममता ने इन सभी को सारदा के जरिए फायदा पहुंचाया. वहीं, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के हाथ धीरेधीरे प्रभावशाली लोगों तक पहुंच रहे हैं. इस बीच, वामपंथी संगठनों ने सीबीआई को ज्ञापन दे कर जल्द से जल्द सारदा से जुड़ी बड़ी मछलियों को पकड़ने की मांग की है.

सार्क का मकसद फेल : नहीं चली भारत की

‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो’. कहना गलत न होगा कि बशीर बद्र की शायरी की ये लाइनें सार्क सम्मेलन के दौरान नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच सच होती दिखीं. नेपाल की राजधानी काठमांडू से 30 किलोमीटर दूर धुलीखेल में 26 नवंबर को शुरू हुआ 18वां सार्क शिखर सम्मेलन 27 नवंबर को खत्म हो गया पर पाकिस्तान के अक्खड़पन की वजह से सार्क देशों के बीच आपसी सहयोग और व्यापार की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं. प्रधानमंत्री बनने के बाद जिन मोदी ने पाकिस्तान की करतूतों को भुला कर गले मिलने के लिए नवाज को भारत बुला कर खातिरदारी की थी, उन्हीं से सार्क सम्मेलन में मोदी कटेकटे रहे.

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ यानी दक्षेस का 18वां शिखर सम्मेलन भारत और पाकिस्तान की तनातनी का शिकार हो कर रह गया. सम्मेलन पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस उत्साह से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपने शपथग्रहण समारोह में न्योता दिया था और नवाज ने जिस गर्मजोशी से मोदी का बुलावा कुबूल किया था, वह सार्क सम्मेलन में पूरी तरह से ठंडा दिखा. पाकिस्तान के अडि़यल रवैए की वजह से सार्क सम्मेलन में कोई ठोस फैसले नहीं लिए जा सके और सार्क के सदस्य देशों को यह बात साफ हो गई कि जब तक भारत और पाक के बीच के रिश्ते नहीं सुधरेंगे तब तक सम्मेलन का मकसद और घोषणापत्र पर कागजों से बाहर निकल पाना मुमकिन नहीं है.

सार्क शिखर सम्मेलन के आखिरी दिन आखिरी समय में सार्क देशों के बीच बिजली व्यापार को ले कर समझौता हुआ, जिस ने सम्मेलन की लाज बचा ली. मोटर गाडि़यों की आवाजाही और रेल सदस्य देश इन समझौतों को आगे बढ़ाने को सहमत थे. पाकिस्तान ने इन करारों के प्रस्ताव से खुद को जहां अलगथलग रखा वहीं बिजली व्यापार को ले कर भी आंतरिक कार्यवाही पूरी न होने का हवाला दे कर आखिरी पल तक रोड़े अटकाने की पुरजोर कोशिश की. सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने घोषणापत्र पर सहमति बनाने की पूरी कोशिश की पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने उन की उम्मीदों और कोशिशों पर पानी फेर दिया. 

दरअसल, पाकिस्तान इस बात से खार खाए बैठा है कि भारत ने विदेश सचिव स्तर की बातचीत को पिछले दिनों रद्द कर दिया था. गौरतलब है कि भारत ने दोनों देशों के बीच सचिव स्तर की होने वाली बातचीत को यह कह कर रद्द कर दिया था कि जब तक पाकिस्तान कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बात करना, आतंकवाद को बढ़ावा देना और सीमा पर गोलीबारी करना बंद नहीं करेगा तब तक किसी भी तरह की बातचीत बेकार है. पाकिस्तान भारत के इस फैसले को एकतरफा करार दे कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को घेरने की फिराक में लगा है, पर कहीं उस की दाल गल नहीं पा रही है. भारत में तेजी से बढ़ते बाजार के साथ सार्क के सभी देश जुड़ना चाहते हैं पर अकेला पाकिस्तान ही भारत से ‘कभी हां तो कभी ना’ वाला रिश्ता बनाए हुए है.

पिछले 29 सालों मेें सार्क की कुल 18 बैठकें ही हो सकी हैं. शुरू के 4 सालों में तो हरेक साल सार्क सम्मेलन आयोजित हुआ. उस के बाद कभी 2 साल तो कभी 3 साल के अंतराल पर इस का आयोजन किया जा सका. 17वां सम्मेलन 2011 में हुआ और 18वां अब हो सका. अर्थशास्त्री हेमंत राव मानते हैं कि सार्क देशों की समस्याएं और जरूरतें करीबकरीब एक जैसी हैं. सभी देशों में बिजली, सड़क, रेल, पानी आदि मूलभूत सुविधाओं की हालत खराब है. इन में भारत की हालत ही कुछ बेहतर है. इस वजह से सार्क देश भारत से जलतेभुनते रहे हैं.

पिछले कुछेक सालों में पाकिस्तान को छोड़ कर बाकी देशों का रवैया भारत के प्रति बदला है. 18वें सार्क सम्मेलन में यह साफ दिखा भी. सम्मेलन में सभी सदस्य देश चाह रहे थे कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर सालों से जमी बर्फ पिघले और सार्क के गठन का मकसद पूरा हो सके. लेकिन पाकिस्तान की जिद और अकड़ की वजह से ऐसा मुमकिन नहीं हो सका.

भारत ने भरी नेपाल की झोली

सार्क सम्मेलन के दौरान ही नेपाल के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए भारत ने 600 करोड़ रुपए की मदद देने का ऐलान किया. सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने काठमांडू पहुंचे नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के साथ 40 मिनट की बातचीत में 10 समझौते किए. नेपाल में अरुण नदी पर 900 मेगावाट पनबिजली घर लगाने को ले कर करार किया गया. साल 2021 तक इस योजना को पूरा कर लिया जाएगा और इस से पैदा होने वाली कुल बिजली का 21 फीसदी हिस्सा नेपाल को मुफ्त में मिलेगा. मोटर वाहन को ले कर हुए समझौते में कहा गया है कि दोनों देशों के मुसाफिर एकदूसरे देश में आसानी से आजा सकेंगे और दोनों देशों के तयशुदा मार्गों पर चलने के लिए गाडि़यों को परमिट दिए जाएंगे. इस के साथ ही, भारतीय पर्यटकों को यह राहत दी गई कि वे 1000 और 500 रुपए के नोट ले कर नेपाल जा सकेंगे पर यह रकम 25 हजार रुपए से ज्यादा नहीं होगी.

डेढ़ अरब रुपए की लागत से बना 200 बैड वाला ट्रामा सैंटर मोदी ने नेपाल को भेंट किया. इस की नींव 1997 में तब के भारतीय प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने रखी थी. इस के अलावा काठमांडू और दिल्ली के बीच बस सर्विस की शुरुआत भी की गई. नेपाल पर मदद की बौछार करने के बाद मोदी ने मुसकराते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री से कहा, ‘‘अगर नेपाल मुसकराता है तो भारत को खुशी होगी.’’ नेपाल के लिए मदद की झोली खोल भारत ने नेपाल को जहां अपना मुरीद बनाने की कोशिश की है वहीं नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने का भी उस ने दांव खेला है. पिछले जुलाई महीने में भी भारत सरकार ने नेपाल को 1 अरब डौलर का रियायती कर्ज दे कर यह साफ तौर पर बता दिया कि माली मदद के लिए उसे चीन के सामने हाथ पसारने की दरकार नहीं है.

रिटायर्ड आईएएस अफसर कमला प्रसाद कहते हैं कि भारत ने काफी लंबे समय तक नेपाल की अनदेखी करने का खमियाजा भुगता है. पिछले 17 सालों से भारत के प्रधानमंत्री का वहां नहीं जाना तो यही साबित करता है कि भारत लंबे समय से उसे हलके में लेता रहा है. इस से मजबूर हो कर नेपाल ने चीन की ओर ताकना शुरू किया और चीन ने नेपाल की कमजोरी और गरीबी का भरपूर फायदा उठा कर उस के सामने रुपयों का पिटारा खोलना चालू कर दिया. इसी बेचैनी में भारत ने अब नेपाल पर ध्यान देना शुरू किया है.

नेपाल की परेशानी

भारत और चीन के धौंस और पुचकार के बीच उस की हालत सांपछछुंदर वाली बनी हुई है. नेपाल की मजबूरी है कि वह न भारत की अनदेखी कर सकता है, न ही चीन की. नेपाल के लिए सब से बड़ी परेशानी यह रही है कि भारत और चीन दोनों उसे अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं और वे एकदूसरे पर रौब व धौंस जमाने के लिए नेपाल की जमीन का बेजा इस्तेमाल करते रहे हैं. 2 बड़े एशियाई देशों की नाक की लड़ाई में नेपाल पिछले कई सालों से जंग का मैदान बना हुआ है.

ध्वस्त हो गया रामपाल का सामंती साम्राज्य

संतों की भारत भूमि पर आजकल एक और ‘संत की लीला’ के चर्चे गरम हो रहे हैं. एक हफ्ते तक न्यायिक और राजसत्ता को अपने किलेनुमा आश्रम से किसी राजशाही सामंत की तरह टक्कर और चुनौती देने वाला कथित संत रामपाल आखिर धरा गया. अपने निजी सुरक्षा कर्मचारियों और अनुयायियों की फौज को आगे कर वह पुलिस और सुरक्षा जवानों को लगातार छकाने में कामयाब हो रहा था. 19 नवंबर को आखिर उसे राजसत्ता के जवानों के आगे पस्त होना ही पड़ा. जब यह प्रतिनिधि गिरफ्तारी के 2 रोज बाद हरियाणा के बरवाला से 3 किलोमीटर दूर चंडीगढ़टोहाना मार्ग पर बने विशाल महलनुमा आश्रम पर पहुंचा तो भी देखा कि बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ है. भीड़ में आश्रम के किसी रहस्य के उजागर होने जैसी उत्सुकता दिखाई दे रही थी. लोग खुशी और रोमांच से भरे हुए थे. भीड़ में ज्यादातर आसपास के गांवों के लोग थे जो आश्रम की गतिविधियों पर संदेह करते आ रहे थे और इस से परेशान थे.

रामपाल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं हैं. रामपाल आखिर आश्रम में क्या करता था? उस ने अपनी कमांडो फोर्स क्यों बनाई? पुलिस और सुरक्षा बलों के जवानों के साथसाथ आश्रम के बाहर मौजूद हर व्यक्ति जानना चाहता है कि आश्रम के भीतर से क्या कुछ नया रहस्य बाहर निकल कर आ रहा है. सतलोक आश्रम के तिलिस्म से परदा उठ रहा है. आश्रम के प्रमुख रामपाल और उस के 800 से ज्यादा समर्थकों की गिरफ्तारी के बाद आश्रम में सर्च अभियान चलता रहा. नएनए खुलासे होते रहे. पहले आश्रम के भीतर क्या चल रहा था, अब तक किसी को पता न था. 

इस प्रतिनिधि ने देखा कि करीब 12 एकड़ में फैले और सामने 3 दीवारों से मजबूत किलेबंदी वाले विशाल सतलोक आश्रम के मुख्य दरवाजे पर खड़े अधिकारी भीतर से आ रहे सामान पर गहराई से निगाह रख रहे हैं और फिर उस सामान को टै्रक्टरों में भर कर पुलिस के संरक्षण में भेजा जा रहा था. आश्रम के अंदर केवल जांच टीम के सदस्य मौजूद थे. अन्य किसी को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं थी. 3 दिन पहले पुलिस से पिट चुका मीडिया 30 फुट दूर से ही तमाशा देख रहा था.

संदेहास्पद आश्रम

4-5 दिन तक आश्रम समर्थकों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद आश्रम से हजारों महिला, पुरुष, बच्चे, अनुयायियों को बाहर निकाला गया. इन में से 6 लोगों की मौत हो गई. मरने वालों में 4 महिलाएं थीं. आश्रम के भीतर से भारी मात्रा में हथियार, लाठियां, तेजाब की बोतलें, पैट्रोल बम, हजारों गुलेल, कमांडो ड्रैसें मिलने से सनसनी व्याप्त है. हजारों भक्तों को बाहर निकालने के 2 दिन बाद आश्रम में महिलाओं के अंत:वस्त्र, कंडोम, नशीली दवाएं, गर्भपात कराने की किट और एक बेहोश महिला के मिलने की खबर से आश्रम और भी संदेहास्पद लग रहा था. आश्रम से लैपटौप, कंप्यूटर, हार्डडिस्क, सीडी, डायरियां भी बरामद हुईं.

आश्रम के आगे की बाहरी दीवार टूटी हुई है. अंदर भक्तों के रहने की जगह नजर आ रही थी. टूटी दीवार के पास दर्जनों धूलभरी मोटरसाइकिलें खड़ी थीं. ये शायद आश्रम के कर्मचारियों की हैं. दावा किया जा रहा है कि आश्रम में सुरक्षा, सफाई, खानपान, हिसाबकिताब देखने वाले आदि सैकड़ों कर्मचारी थे. दीवार को पुलिस द्वारा जेसीबी मशीनें लगा कर तोड़ दिया गया क्योंकि इस दीवार समेत भीतर तहखाना और मंजिलें बनाने के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी. आश्रम को हाईवोल्टेज का कनैक्शन भी दे दिया गया था. क्यों और कैसे का जवाब कोई देने को तैयार नहीं. लग रहा है, प्रशासन ने इस पूरे निर्माण पर पहले आंखें  मूंदे रखीं.

रामपाल के रोहतक जिले के करौंथा आश्रम में गोलीबारी से एक आदमी की मौत के बाद उस के खिलाफ 2006 में रोहतक के सदर थाना में हत्या का मामला दर्ज हुआ था. वहां रामपाल का पहला सब से बड़ा हिंसक संघर्ष हुआ था. वह कुछ समय जेल में भी रहा. फिर उसे जमानत मिल गई पर अदालत में पेशियों पर गैरहाजिर रहने लगा. इसी वजह से उस की जमानत रद्द कर दी गई. इस संघर्ष की वजह, उस का भक्तों को अपने प्रवचन में आर्यसमाजियों के विरुद्ध खूब विषवमन करना था. उस की लिखी किताबों में भी ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की खिल्ली उड़ाई गई है. इस से आर्य समाज के लोग भड़क गए थे और रामपाल को बाज आने की चेतावनी दी थी. रामपाल ने 2008 के बाद अदालत में पेशी पर जाना बंद कर दिया और उस के समर्थक वकीलों से उलझ पड़ते थे. रामपाल द्वारा जजों के खिलाफ पर्चे बांटे गए जिस में लिखा होता था,  ‘भ्रष्ट जज कुमार्ग पर’ है. ऐसा कर के उस ने न्यायपालिका व शासनप्रशासन से सीधा टकराव मोल ले लिया.

हिसार जिला अदालत के एडवोकेट सुंदरलाल सैनी कहते हैं, ‘‘अदालत की तारीख के आसपास वह जानबूझ कर आश्रम में सत्संग रखता था और अपने हजारों अनुयायियों को इकट्ठा करता था. उस के हजारों अनुयायी अदालत में हंगामा करते थे. वकीलों से बदसलूकी करते थे और जजों पर दबाव बनाते थे, धमकाते भी थे. वकीलों को उस के खिलाफ हड़ताल करनी पड़ी. पुलिस जब वारंट तामील कराने जाती तो समर्थकों द्वारा पुलिस को धमकाया जाता था. हम ने उस की ज्यादती की शिकायत चंडीगढ़ हाईकोर्ट में भेजी थी. फिर भी उस ने कोई परवा नहीं की. वह खुद को सरकार और न्यायपालिका से ऊपर समझने लगा था और अदालती आदेश की अवहेलना करता रहा. वह सरकार और अदालत को चुनौती देने लगा था.’’

2008 के बाद रामपाल अदालत में हाजिर नहीं हुआ. उस के खिलाफ 40 से अधिक बार वारंट जारी किए जा चुके थे फिर भी वह टालमटोल करता रहा. बीमारी का बहाना खोजता था. आखिर पंजाब ऐंड चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने इस पाखंडी की मंशा को समझा और गैरजमानती वारंट जारी किए. पुलिस बारबार वारंट तामील कराने में नाकाम रही तो पुलिस को कई बार फटकार सुननी पड़ी. ताजा वारंट जारी करने के बावजूद पुलिस उसे पकड़ने में नाकाम रही तो अंत में हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि सरकार अगर रामपाल को पेश नहीं कर सकती तो मुख्यमंत्री को अदालत में पेश किया जाए. इस से आश्रम के बाहर तनाव फैल गया क्योंकि रामपाल के समर्थक कहते थे कि वे कानून और सरकार को नहीं मानते, वे तो कथित ईश्वर के दूत की मानते हैं जो रामपाल ही है.

सोचीसमझी रणनीति

अदालत की सख्ती के बाद सरकार को रामपाल की गिरफ्तारी के पक्के इंतजाम करने पड़े. क्योंकि हजारों समर्थक सतलोक आश्रम में डेरा डाले रामपाल की हिफाजत के लिए जान देने की बात कर रहे थे. प्रशासन द्वारा इस से निबटने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया लेकिन रामपाल को शायद पहले से अंदेशा था कि अब वह अदालती शिकंजे से बच नहीं पाएगा, इसीलिए उस ने 7 दिन का सत्संग का आयोजन रखा और अपने हजारों समर्थकों को आश्रम में इकट्ठा कर लिया. आश्रम की किलेबंदी कर दी गई. हथियार, लाठियां, पैट्रोल बम, गुलेल, ईंट, पत्थर आदि सामान पुलिस से मुकाबले के लिए तैयार कर लिए गए. रामपाल की ‘सेना’ आश्रम की छत व दीवारों पर जंग के लिए आ डटी. महिलाएं और बच्चों को भी आगे कर दिया गया. रामपाल आश्रम में छिपा रहा. पुलिस ने आश्रम के संचालकों से बारबार रामपाल को उसे सौंपने के लिए कहा. बारबार चेतावनी दी गई लेकिन रामपाल हठधर्मिता ओढे़ अंदर घुसा रहा. रामपाल ने लोगों को इकट्ठा करने के लिए आश्रम में 7 दिन का सत्संग रखा था और भक्तों को संदेश भेजे गए कि सभी गुरुमर्यादा को ध्यान में रख कर सत्संग में पहुंचें. वह भक्तों को मर्यादा में बांध कर रखता था. वह कहता था कि भक्तों को गुरुमर्यादा में रहना जरूरी है. वह अपनी हर बात मानने के लिए कहता था. हर बाबा की तरह रामपाल भी अपने भक्तों से सुख, शांति, समृद्धि के लिए पूजापाठ के एवज में 8 से 10 हजार रुपए लेता था.

पुलिस ने आत्मसमर्पण कराने के लिए रामपाल के भरोसेमंद 2 नेताओं के जरिए उस से बात भी की पर कोई फायदा नहीं हुआ. पुलिस ने रामपाल के बेटे को कब्जे में ले कर धमकाया तो उस ने अपने पिता से बात की, तब जा कर वह समर्पण को राजी हुआ.  रामपाल की गिरफ्तारी के बाद उस के पाखंड के किस्से खुलने शुरू हो गए. उस के खिलाफ हत्या के प्रयास, देशद्रोह सहित विभिन्न धाराओं में 2 दर्जन से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. आश्रम की तलाशी में तरहतरह के सामान मिल रहे हैं. जांच का काम एक एसआईटी गठित कर उसे सौंपा गया है. जांच से पता चला है कि रामपाल के 3 में से 2 ट्रस्ट ही पंजीकृत हैं. एक, कबीर परमेश्वर भक्ति ट्रस्ट (हिसार) तथा दूसरा, बंदी छोड़ भक्ति मुक्ति ट्रस्ट (लुधियाना).

अकूत संपत्ति का मालिक

रामपाल की ज्यादातर संपत्तियां बंदी छोड़ भक्ति मुक्ति ट्रस्ट के अंतर्गत हैं. इस ट्रस्ट के नाम से उस ने मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के निकट उड़दन गांव में 50 एकड़ जमीन ली थी जिस पर आश्रम निर्माणाधीन है. साढे़ 4 एकड़ की जमीन पर बना करौंथा आश्रम, दौलतपुर में 2 एकड़ और सतलोक आश्रम क 12 एकड़ जमीन खरीदी गई कीं. जांच में अभी तक कबीर परमेश्वर भक्ति ट्रस्ट की संपत्ति नहीं आंकी गई है. अनुमान है कि रामपाल के पास 250 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है. पूर्व सरपंच धर्मपाल कहते हैं, ‘‘लोगों को इस बात का भी डर रहता था कि उन्हें कहीं अपनी जमीन, घर बेच कर न जाना पड़ जाए. लोकल गांव का कोई भी आदमी रामपाल का चेला नहीं है, सब बाहर के हैं. अंदर क्या चल रहा होता था, किसी को कुछ पता न रहता था.’’

निकटवर्ती बरवाला के बलबीर सिंह कहते हैं, ‘‘गांववासी खुश हैं. उन जज को शुक्रिया, जिन्होंने सही निर्णय लिया. सचाईर् के प्रति आम जनता में खुशी का माहौल है.’’ कुछ समझदार लोग चकित हैं कि कैसे हजारों, लाखों लोग इन बाबाओं के झांसे में फंस जाते हैं. इन के गीत गाने लगते हैं और इन के लिए जान देने को तैयार रहते हैं. आखिर किस तरह रामपाल ने भक्तों पर अपना प्रभाव जमा रखा था. 1995 में राज्य के सिंचाई विभाग में जेई की नौकरी छोड़ कर रामपाल ने अपने गांव घनाना में ही सत्संग की शुरुआत की थी. शुरू में यहां 10-12 परिवार उस के साथ जुड़े लेकिन गांव के दूसरे परिवार उस के विरुद्ध हो गए. इस के बाद रामपाल को वहां से जाना पड़ा.

हत्या के मुकदमे के बाद रामपाल धर्म की ओट में झूठे चमत्कारों के दिखावे और फर्जी किस्सों के जरिए भोलीभाली जनता की भीड़ जुटाने में लग गया. इस के लिए वह तरहतरह के टोटके आजमाने से नहीं चूका. गुफा के जरिए लोगों में अंधविश्वास फैलाने में कामयाब हो गया और उस के अनुयायियों की भीड़ बढ़ती गई. रामपाल एक ट्रौलीनुमा हाइड्रोलिक लिफ्ट के जरिए एक जगह से दूसरी जगह अनुयायियों के बीच प्रकट होता था. इसी अंधविश्वास के कारण लोग उसे चमत्कारी, भगवान का अवतार समझने लगे थे.

वह अपने सिंहासन के पास बने कमरे में हजारों शीशियां रखता था, जो तलाशी में बरामद हुई हैं. पूछताछ में उस के समर्थक बताते हैं कि वह भक्तों को जो पानी चमत्कारी तथा दुख निवारक बता कर चरणामृत के रूप में देता था वह असल में ट्यूबवैल का पानी होता था. इन शीशियों में वह यही पानी भर कर रखता था. रामपाल टैलीविजन पर धार्मिक चैनलों में भी अपने प्रवचनों के माध्यम से लोगों को आकर्षित करता था. टीवी के अलावा खुद की साहित्य प्रचार सामग्री के जरिए वह लोगों तक पैठ बनाता था. वह आश्रम में अपने भक्तों को अपनी फोटो वाले स्टिकर, तसवीर वाले लौकेट, अंगूठी बेचता था. आश्रम की दीवारों पर उस के छोटेबड़े पोस्टर, बोर्ड लगे हैं जिन में उसे जगद्गुरु, भगवान बताया गया है. अनेक लोग चैनल पर उस के प्रवचन सुन कर आश्रम से जुड़ गए. इस तरह उस के भक्तों की तादाद बढ़ती गई. रामपाल के विभिन्न राज्यों में 12 लाख से ज्यादा अनुयायी बताए जाते हैं. उस के एजेंट अनुयायियों को खराब किडनी, कैंसर से ठीक करने और मृत अवस्था में पहुंच चुके व्यक्ति को जीवित करने जैसे चमत्कारी किस्से सुनाते हैं. बलबीर सिंह के अनुसार, रामपाल खुद को कबीरपंथी बताता है लेकिन कबीर ने अपने साहित्य में जो मानवता की सीख दी थी, रामपाल के प्रवचनों में वे बातें कहीं नहीं कही जातीं. वह तो कबीर की आड़ में धर्म की दुकान चला रहा था.

और भी हैं ऐसे बाबा  

हरियाणा में यह पहला मामला नहीं है. इस से पहले भी बाबाओं और उन के विरोधियों तथा बाबाओं में ही आपस में गैंगवार चलती रही है. डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम सिंह और सिखों के बीच काफी समय से तनाव के हालात हैं. खूनी संघर्ष भी हो चुके हैं. राम रहीम पर कई मामले दर्ज हैं. उस के भक्तों की तादाद भी हजारों में है. डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम सिंह को अंबाला कोर्ट में पेश करने में पुलिस प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी. उस के समर्थक भी बाबा को अदालत से  बड़ा मानते थे. एक  वक्त लोगों की नजरों में कथित भगवान का अवतार बन चुका आसाराम जब बलात्कारी का रूप निकला तो भक्तों की आंखें खुलीं. आसाराम को भी इंदौर आश्रम में राजस्थान और गुजरात पुलिस पकड़ने गई तो विरोध में उस के हजारों समर्थक सड़कों पर उतर आए थे. आखिर वह पकड़ा गया और उस के ईश्वरत्व का मुलम्मा उतर गया. उस के लाखों भक्तों की आंखों पर पड़ा श्रद्धा का परदा भी हट गया. आज 1 साल से अधिक समय बाद भी आसाराम जेल के सीखचों से बाहर नहीं आ पाया है.

कुछ समय पहले निर्मल बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी के मामले ने तूल पकड़ा था. वह चुटकुलेनुमा टोटके बता कर लोगों से करोड़ों रुपए ऐंठ चुका है और अब फिर टैलीविजन चैनलों पर बेशर्मी के साथ धर्मांधों को बेवकूफ बना रहा है. वह अपने दरबार में प्रवेश की 2 हजार रुपए फीस वसूलता है. संत की शक्ल में आज जो रामपाल गिरफ्तार किया गया है वह एक इंजीनियर था. एक मामूली से इंजीनियर का इस वक्त 250 करोड़ रुपए से ऊपर का टर्नओवर बताया जाता है. इसी तरह, स्वामी नित्यानंद की रंगीन लीलाओं से कौन परिचित नहीं है. शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती पर अपने मठ के मैनेजर की हत्या का मामला चला था और वह जेल में रहा था. योग और आयुर्वेद के नाम पर रामदेव का धार्मिक कारोबार अरबों में पहुंच गया है और सरकार की जेड प्लस सुरक्षा हासिल कर वह वीवीआईपी बाबा कहलाने का गौरव हासिल कर चुका है.

सरकारें अदालतों के भय से रामपाल, आसाराम जैसे बाबाओं को चाह कर भी नहीं बचा पा रही हैं. रामपाल की घटना के बाद पंजाबहरियाणा हाईकोर्ट को इन दोनों राज्य सरकारों को आदेश देना पड़ा कि वे अपने यहां के आश्रमों, डेरों का जायजा ले कर एक मुकम्मल रिपोर्ट पेश करें. उत्तर भारत में छोटेमोटे हजारों आश्रम, डेरे हैं और इन के अनुयायियों की संख्या लाखोंकरोड़ों में है. हर समय एक न एक बाबा लोगों के दिलोदिमाग पर छाया रहता है. फिर कुछ समय बाद उस की पोल खुलती है तो कोई दूसरा उठ खड़ा होता है. तब लोग उस की ओर भागने लगते हैं. यह सिलसिला चलता आया है. एक ही धर्र्म के बाबाओं के बीच आए दिन भिडं़त होती रहती है. हिंसा, मारपीट, मुकदमेबाजी आम बात है. ये बाबा अपने प्रवचनों में भी एकदूसरे की निंदा करते नहीं थकते. खुद को धर्म का असली अलंबरदार, बाकी को नकली साबित करने पर तुले देखे जा सकते हैं.

सवाल उठता है कि देश भर में इस तरह के आश्रम चलते कैसे हैं? असल में संत बन कर आश्रम को संचालित करना एक गजब की कला है. बाबा, संत, गुरु लोग तिकड़मों के उस्ताद होते हैं. हजारोंलाखों लोगों के बीच ढोंग, पाखंड का प्रचारप्रसार करना और झूठ को सच के रैपर में पैक कर के बेचना किसी कुशल प्रबंधक के ही वश की बात है. बाबा के साथ ऐसे कई लोग होते हैं जो तमाम तरह के प्रबंधन में कुशल होते हैं. उन में चतुराई, शातिरपन, कुटिलता, बेईमानी, झूठ, पैसा बटोरने की कला, माफियागीरी, गुंडागर्दी जैसे हर तरह के गुण होते हैं.

कैसे मिले निजात

बाबा लोग लोगों की अज्ञानता की वजह से पनपते हैं क्योंकि सुख, शांति, समृद्धि की कामना के लिए और दुख, अभाव, असुरक्षा से निजात पाने के लिए भोली जनता इन के पास जाने को मजबूर महसूस करती है. बाबाओं को नेताओं और शासन का पूरा संरक्षण मिलता है. ये आश्रम इन के वोटबैंक बन चुके हैं. यही वजह है कि रामपाल ने अपने कारोबार का विस्तार हरियाणा से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा नेपाल व भूटान तक फैला लिया था. यह हालत विश्वव्यापी है. अमेरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी चमत्कारी संत, छोटेछोटे अलगअलग कल्ट यानी पंथ के लोगों के मनमस्तिष्क पर छाए रहते हैं. यहां भी धार्मिक ढकोसलों की पोल खुलती रहती है. पादरी, मुल्ला, ग्रंथी खुद को कथित ईश्वर का एजेंट बता कर, लोगों को मुक्ति, सुखसमृद्धि का मार्ग बताते  अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं. इन सब में एक समानता जरूर है और वह यह कि ये तिकड़मों में माहिर होते हैं. जनता को बेवकूफ बनाने की कला इन में कूटकूट कर भरी होती है. ये आश्रम, बाबा तब तक फलतेफूलते रहेंगे जब तक जनता अज्ञानता के कुएं से बाहर नहीं निकल आती.

गोद ली अर्पिता राजकुमारी की तरह हुई विदा

हर तरफ बहती बदलावों की बयार के बीच भारत में शादियों के आयोजनों में भी बदलाव दिख रहे हैं. शादी केवल पतिपत्नी के बंधन तक  सीमित नहीं रह गई है. शादियों के मौकों पर होने वाले आयोजनों की एक नई कारोबारी दुनिया बन गई है. अब शादियां किसी इवैंट सी हो गई हैं. वे दिन लद गए जब दुलहन के घर वाले शादी के आयोजन में पूरी तरह से व्यस्त नजर आते थे जबकि दूल्हा पक्ष वाले जेब में हाथ डाले नजर आते थे. अब दुलहन और दूल्हा दोनों ही पक्ष वाले शादी समारोह में केवल शामिल होने पहुंचते हैं. जबकि आयोजन का सारा काम इवैंट कंपनियां देख रही होती हैं. अब यह भी जरूरी नहीं कि शादी वहीं हो जिस शहर में लड़की रहती हो. शादी वहां भी हो सकती है जहां लड़की चाहती हो.

देश में शादियों के भव्य से भव्य आयोजन होने लगे हैं. शादियों के इन आयोजन से एक अलग तरह का व्यवसाय तैयार हो गया है. शादी के भव्य आयोजन के जरिए भी कुछ सामाजिक संदेश मिलते हैं. शादी का आयोजन कैसा भी हो, इस की सफलता आपसी प्यार और विश्वास पर टिकी होती है. फिल्म अभिनेता सलमान खान ने अपनी बहन अर्पिता की शादी जिस तरह से पूरे शाही अंदाज में की है उस से गोद लिए बच्चों के प्रति एक अहम सामाजिक संदेश भी लोगों तक पहुंचा है. फिल्म अभिनेता सलमान खान की बहन अर्पिता खान के बारे में शादी के पहले कम ही लोगों को पता था. ज्यादातर लोग अर्पिता खान को सलमान खान की बहन के रूप में ही पहचानते थे. हर भाई की तरह सलमान खान ने अपनी बहन ही शादी पूरी धूमधाम से की.

इस शादी के होने से पहले ही इस की काफी चर्चा हो रही थी. लेकिन जब यह शादी संपन्न हुई तब यह बात आम हुई कि अर्पिता बौलीवुड ऐक्टर सलमान खान के पिता सलीम खान की गोद ली बेटी हैं. सलीम खान ने 1981 में हेलन से शादी के बाद बहुत कम उम्र में अर्पिता को गोद लिया था. 5 भाईबहनों में अर्पिता सब से छोटी हैं. वे सलमान खान, अरबाज खान, सोहेल खान और अलवीरा से छोटी हैं. अर्पिता ने लंदन कालेज औफ फैशन से मार्केटिंग और मैनेजमैंट की डिगरी ली है. इस के बाद वे मुंबई में एक आर्किटैक्ट के रूप में इंटीरियर डिजाइनिंग फर्म में जौब करती हैं.

अर्पिता अपने भाइयों की लाड़ली हैं. वे भविष्य में फिल्म प्रोडक्शन में काम करना चाहती हैं. अर्पिता की इच्छा है कि वे खुद का अपना फैशन ब्रैंड लौंच करें. अर्पिता की दोस्ती हिमाचल प्रदेश के रहने वाले आयुष शर्मा के साथ हो गई. दोनों दोस्ती के रिश्ते को शादी में बदलना चाहते थे. आयुष दिल्ली में रहते हैं. वे हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर के रहने वाले हैं. आयुष एक राजनीतिक परिवार से हैं. उन के पिता अनिल शर्मा हिमाचल में मंत्री रहे हैं. आयुष के दादा सुखराम हिमाचल के जानेमाने नेता हैं. वे क ांग्रेस के मशहूर नेता रहे हैं. वे कई बार लोकसभा के सदस्य रहे और केंद्र में मंत्री भी रहे हैं.

आयुष दिल्ली में रह कर अपने परिवार का बिजनैस संभाल रहे हैं. आयुष पर फिल्मी दुनिया का रंग चढ़ा हुआ है. वे मुंबई में रह कर फिल्मों में अपना कैरियर भी बनाना चाहते हैं. अर्पिता के साथ आयुष की दोस्ती ने रंग पकड़ा और लोगों ने बातें करनी शुरू कीं तो सलमान खान ने दोनों परिवारों को एक जगह बैठा कर उन की शादी की बात तय कर दी.

बहन की हसरत का खयाल

सलमान खान का परिवार मुंबई में रहता है और आयुष का परिवार दिल्ली में रहता है. अर्पिता की हसरत थी कि उस की शादी दिल्लीमुंबई से दूर हैदराबाद में होटल ताज के फलकनुमा पैलेस में हो. अर्पिता ने यह बात अपनी भाभी सीमा खान से कही. सीमा, सलमान खान के छोटे भाई सोहेल खान की पत्नी हैं. अर्पिता और सीमा छुट्टियां मनाने के लिए हैदराबाद गई थीं. वहां उन्होंने जब फलकनुमा पैलेस देखा तो उसे बहुत पसंद किया. अर्पिता की पसंद का पता जब भाई सलमान खान को चला तो उन्होंने अर्पिता और आयुष की शादी फलकनुमा पैलेस में करने की तैयारी की. इस के लिए 1 करोड़ रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 2 दिन के लिए फलकनुमा पैलेस को बुक किया. फिल्मी दुनिया की ही नहीं, दूसरे क्षेत्र की बड़ी हस्तियों को भी इस में बुलाया गया. हैदराबाद में शादी के बाद रिसैप्शन मुंबई में देने का फैसला किया गया.

शादी की तैयारी में सलमान खान ने ड्रैस से ले कर खानपान तक में शाही अंदाज को दिखाने का पूरा प्रयास किया. दुलहन बनी अर्पिता राजकुमारी की तरह विदा हुईं. सलमान खान ने एक भाई की तरह अर्पिता की शादी में हर रस्म अदा की तो उन के पिता सलीम खान ने शादी में ठुमके लगाए. सलमान खान ने एक बहन की शादी में शानदार आयोजन किया जो लोगों के लिए भाईबहन के स्नेह का स्मरणीय उदाहरण बन गया. इसे लोग सालोंसाल याद रखेंगे. अर्पिता की शादी में हैदराबाद को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कि वह मिनी मुंबई हो गया हो. अर्पिता ने गोल्डन ड्रैस पहन रखी थी जिस में वे किसी परी को भी मात दे रही प्रतीत हो रही थीं.

जानकारों का मानना है कि इस शादी में 50 करोड़ रुपए से ऊपर का खर्च आया होगा. देश और समाज में अभी तक गोद लिए बच्चों को एक अलग नजर से देखा जाता था. उन को बहुत अच्छी सामाजिक स्वीकृति नहीं थी. अर्पिता के प्रति सलमान खान और उन के परिवार का व्यवहार देख कर समाज में एक संदेश गया कि गोद  लिए बच्चों का भी अपने बच्चों के साथ पालनपोषण किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए. गोद लिए बच्चों को अगर सामाजिक स्वीकृति हासिल हो जाए तो समाज की एक बड़ी परेशानी दूर हो सकती है. देश में बच्चों को गोद लेने के संबंध में कानून को भी सरल करना पडे़गा. अभी गोद लेने का कानून बहुत पेचीदा है, जिस के चलते लोग बच्चा गोद लेने से बचने की कोशिश करते हैं.

संदेश दे रही फिल्मी हस्तियां

फिल्मी हस्तियों में सलीम खान के अलावा दूसरे तमाम लोग और भी हैं जो बच्चों को गोद ले कर उन का पालनपोषण कर रहे हैं. 39 साल की अभिनेत्री और मिस यूनिवर्स का खिताब पा चुकीं सुष्मिता सेन ने 2 लड़कियों को गोद ले रखा है. सुष्मिता सेन ने शादी नहीं की है. वे सिंगल मदर के रूप में अपनी 2 गोद ली बेटियों का पालनपोषण कर रही हैं. सुष्मिता सेन की बड़ी बेटी रिनी करीब 14 साल की हो चुकी है. उस को सुष्मिता ने साल 2000 में गोद लिया था. सुष्मिता ने साल 2010 में दूसरी बेटी अलीशा को गोद लिया. उस समय वह 3 माह की थी.  

फिल्मी अभिनेत्री रवीना टंडन ने 21 साल की उम्र में 1995 में 2 लड़कियों को गोद लिया.  गोद लेते समय छाया 8 साल की और पूजा 11 साल की थीं. रवीना टंडन का कहना है कि ये बच्चियां उन की छोटी बहनों की तरह हैं. पहले लोग बाहर के बच्चों को गोद लेने से बचते थे. लोगों का प्रयास होता था कि किसी अपने सगेसंबंधी के बच्चे को गोद लें. उस समय फिल्म डायरैक्टर सुभाष घई ने अपने छोटे भाई की बेटी मेघना को गोद लिया था. वे इस बात को सभी से छिपा कर रखना चाहते थे. मेघना अब सुभाष घई के फिल्म इंस्टिट्यूट में काम करती हैं.

फिल्म ‘सलामे इश्क’ बनाने वाले निखिल आडवाणी ने दिसंबर 2006 में एक बेटी को गोद लिया. ‘खोसला का घोसला’ और ‘ओय लकी लकी ओय’ फिल्म बनाने वाले दिबाकर बनर्जी ने मुंबई के अनाथालय से एक लड़की को गोद लिया और उस का नाम ईरा रखा. कोरियोग्राफर संदीप सोपारकर ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बेटे अर्जुन को गोद लिया. पुरुष होने के कारण बच्चा गोद लेने में उन को परेशानी आई. अर्जुन को संदीप ने शादी होने से पहले गोद ले रखा था. संदीप के परिवार में कई गोद लिए बच्चे हैं. वे कहते हैं, ‘‘गोद लेने में कोई बुराई नहीं है. यह अच्छी बात है.’’

गोद लेने में संकोच कैसा

बांझपन समाज की सब से बड़ी समस्या है. एक ओर समाज की दकियानूसी सोच के कारण लोग बच्चे गोद लेने से परहेज करते हैं तो दूसरी ओर देश में बच्चा गोद लेने का कानून इतना जटिल है कि लोग इस से बचने की कोशिश करते हैं. इस कारण बच्चा पैदा करने के लिए लोग साधुसंत, बाबा, नीमहकीम सभी की चौखट पर पहुंच जाते थे. कई बार पत्नी को तलाक देने का यह सब से बड़ा कारण होता था कि वह बच्चे पैदा नहीं कर पा रही है. अगर देश में गोद लेने को सामाजिक स्वीकृति मिल जाए तो बहुत सारी कुरीतियों को दूर किया जा सकता है. गोद लेने के 2 लाभ होते हैं. एक, मांबाप को संतान मिल जाती है, दूसरे, बिना मांबाप के बच्चे को मातापिता मिल जाते हैं. 

सामाजिक स्वीकृति न मिलने के कारण मातापिता चोरी हो चुके बच्चों को गोद लेने की कोशिश करते हैं. इस कारण समाज में नवजात बच्चों की चोरी की घटनाएं बढ़ने लगी हैं. कई बार मातापिता बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर कानूनी परेशानी की वजह से वे बच्चे को खुले तौर पर गोद न ले कर गैरकानूनी रूप से गोद लेते हैं. इस के बाद उसे वे समाज के सामने ऐसे पेश करते हैं जैसे वह उन का अपना खुद का बच्चा हो.

मिले सामाजिक स्वीकृति

लखनऊ में रहने वाले दंपती ने इस का कारण बताते हुए कहा, ‘‘शादी के 9 साल के बाद जब हमारे कोई बच्चा नहीं हुआ और डाक्टरों ने बच्चा होने की संभावना से इनकार कर दिया तो हम ने बच्चा गोद लेने की सोची. हमारे घरपरिवार वालों का दबाव था कि हम अपने ही सगेसंबंधी के बच्चे को गोद लें. हम इस से बचना चाहते थे. हमें लगता था कि ऐसे में बच्चे पर केवल हमारा अधिकार नहीं होगा. बड़ा हो कर बच्चा अपने असली मातापिता से भावनात्मक रूप से जुड़ जाएगा. ‘‘एक दिन हम लोगों ने तय किया कि हम नवजात बच्चा गोद ले लें और उसे अपना बच्चा कह कर ही पालें. इस के लिए हम दोनों अपने शहर से दूर गए. वहां एक अस्पताल में संपर्क किया. अस्पताल वालों के पास एक औरत थी जो बच्चे को जन्म दे कर पालना नहीं चाहती थी. हम ने वहां से बच्चा लिया. कुछ माह बाहर रहे. इस के बाद अपने बच्चे की तरह उसे ले कर घर आए. आज हम उसे अपने बच्चे की तरह ही पाल रहे हैं. समाज भी उसे हमारा बच्चा ही मानता है.

हम जानते हैं कि यह गैरकानूनी था पर हमारे सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था. आज मेरा मानना है कि समाज को न केवल गोद लिए बच्चे को बल्कि बच्चा गोद लेने वाले मातापिता को भी सम्मान की नजरों से देखना चाहिए.

सीख लेने की जरूरत

समाज की सोच बदलने से एक नया बदलाव होगा, जो तमाम दूसरी बुराइयों को खत्म कर देगा. सलमान खान ने जिस तरह से अपनी बहन अर्पिता की शादी की उस से गोद लिए बच्चों के प्रति समाज की धारणा बदलने में मदद मिल सकेगी. लखनऊ के गोमतीनगर इलाके में मनीषा मंदिर है. यहां पर लोग उन छोटी बच्चियों को छोड़ जाते हैं जिन्हें वे अपने पास नहीं रखना चाहते. लखनऊ में ऐसे कई शिशुकेंद्र हैं. इस तरह के केंद्र देश के दूसरे शहरों में भी हैं. इन केंद्रों में बहुत सारे ऐसे बच्चे होते हैं जिन को कोई गोद नहीं ले पाता. ऐसे में समाज की मदद से इन की शादी की जाती है. ‘अपना घर’ नाम से सामाजिक संस्था चला रही डा. निर्मला सक्सेना कहती हैं, ‘‘गोद लेने को सामाजिक स्वीकृति मिल जाए तो अनाथ बच्चों को मातापिता मिल सकते हैं. बड़ेबडे़ लोगों के सामने आने से दूसरों की सोच भी बदलती है. इस माने में देखें तो सलमान खान की शाही शादी से सामाजिक उद्देश्य को भी पूरा किया जा सकता है.’’

सरकारी मनमानी

हमारी सरकारों की आदत बन गई है कि वे किसी न किसी तरह आम आदमी की राह में रोड़े अड़ाएं. गनीमत है कि अदालतें इन रोड़ों को अभी तक हटाने में सक्षम हैं. पर पता नहीं कब केंद्र की गुस्सैल सरकार अपनी धौंस जमाने लगे और संविधान ही बदलने लगे, जैसा इंदिरा गांधी ने कई बार किया. भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी धीरेधीरे उस बहुमत की ओर बढ़ रहे हैं कि जिस से सरकार अपनी मनमानी कर सके.हाल में शिक्षा के मामलों में सरकार की मनमानी दिखी भी. पंडितों को नौकरियां उपलब्ध कराना सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने फरमान जारी कर दिया कि केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत अनिवार्य होगी. गनीमत है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी कि कम से कम मार्च तक संस्कृत को न थोपा जाए. उम्मीद की जाए कि तब तक सरकार का जोश ठंडा पड़ जाएगा.

वहीं, पिछली निकम्मी, भ्रष्ट सरकार की तरह नई सरकार भी दिल्ली में नर्सरी स्कूलों में प्रवेश के मनमाने नियम थोपने पर अड़ी थी. नर्सरी स्कूल निजी संस्थाओं द्वारा चलाए जाते हैं और एक तरह से ये दुकानें हैं जहां बच्चे कुछ घंटे खेलने, बात करने, पढ़ने, ड्राइंग करने के लिए मिलते हैं और उतनी देर मांएं अपना काम कर सकती हैं. उन में प्रवेश को ले कर धांधलियां होती हैं. पर वे ऐसी हैं जैसी सिनेमाहाल में नई फिल्म के लिए टिकटें ब्लैक की जाती थीं. यह कोरा व्यापारिक मामला है. इस का शिक्षा से कोई लेनादेना नहीं. नर्सरी स्कूल तो मुख्यतया आयागीरी का काम करते हैं. फिर भी सरकार अड़ी थी कि नियम उस के चलेंगे. अब उच्च न्यायालय ने सभी नियमों को गैरकानूनी करार दे दिया है. यह सही निर्णय है जो मातापिता को भटकाएगा नहीं और प्रबंधकों को राहत देगा.

सरकारें हर रोज जीवन के रोजमर्रा तौरतरीकों पर नियम बनाती रहती हैं. घर में पत्नी को कैसे रखें से ले कर हवाई जहाज में कैसे बैठें तक के लिए नियम बना डाले गए हैं और हर नियम का अर्थ है किसी सरकारी अफसर को अतिरिक्त अधिकार देना. शिक्षा के क्षेत्र में अधपढ़े लोग मंत्रालयों में भी अपनी चला रहे हैं और कुकुरमुत्तों की तरह उगे निजी संस्थानों में भी. इन की जुगलबंदी सरकारी नियमों की आड़ में शिक्षा और छात्रों का बेड़ा गर्क कर रही है. शायद, सब यही चाहते हैं कि हमेशा की तरह इस देश की जनता अनपढ़ या अशिक्षित ही रहे.

रामपाल की गिरफ्तारी

हरियाणा में हिसार जिले के बरवाला गांव स्थित रामपाल के किलेनुमा आश्रम पर पुलिस को धावा बोलने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी जैसे कि ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ में भिंडरावाले को पकड़ने के लिए फौज की बटालियन को करनी पड़ी थी जिस का नतीजा यह हुआ था कि खालिस्तान का आंदोलन तो खत्म हो गया पर इंदिरा गांधी को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. रामपाल अभी तक भिंडरावाला बना नहीं था पर वह कुछ उन्हीं कदमों पर चल रहा था. उस ने लाखों लोगों को भक्त बना डाला जो पैसा तो देते ही हैं, जान तक देने को तैयार हैं. उन्हीं के बलबूते वह अदालती आदेशों की अवहेलना कर रहा था पर उच्च न्यायालय की सख्ती के कारण पुलिस को हिचकिचाते हुए ही सही, आश्रम पर धावा बोलना पड़ा.

इस तरह के गुरु देशभर में फैले हैं और आश्रमों में शहंशाहों की तरह रह रहे हैं. ये देश के नए जागीरदार और छोटे राज्य बने हुए हैं. किसी भी सड़क पर चले जाइए, हर 20-25 किलोमीटर की दूरी पर एक भव्य इमारत किसी आश्रम की दिख जाएगी. धर्म को बेचने का जो संगठित षड्यंत्र रचा जा रहा है, रामपाल उसी की देन है और उसे एक अति महत्त्वाकांक्षी की खप्ती समझना गलत होगा.

मानवता की रक्षा के लिए भगवान ने धर्म को बनाया है, धर्म के दुकानदार इन झूठे बोलों को इतनी बार बोलते हैं कि वे सच लगने लगते हैं. धर्म की दुकान पर सदाचार, भाईचारा, परिश्रम, दया, भक्ति, दान, बराबरी बिकते हैं, यह सोच कर लोग अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करते रहते हैं और धीरेधीरे उस के मकड़जाल में इतने फंस जाते हैं कि मारनेमरने को पुण्य कार्य समझने लगते हैं. रामपाल ने जो किया वह विश्वभर में हो रहा है, हमारे यहां कुछ ज्यादा हो रहा है. यहां अब हर जाति अपना गुरु खोजखाज कर पेश कर रही है और उसे स्वर्णजडि़त सिंहासनों पर बिठा कर खुद को धन्य मान रही है.

रामपाल और आसाराम जैसे तो कानूनी गिरफ्त में आ गए हैं पर उन्हें अपवाद मानें. धर्मों का धंधा अभी भी जोरों पर है और धड़ाधड़ नए आश्रम बन रहे हैं व पुराने फैल रहे हैं. धर्मप्रचार का यह काम सदियों से हो रहा है. हाल के दशकों में इस ने कुछ ज्यादा जोर पकड़ा है. अफसोस यह है कि यह जानते हुए भी कि धर्म के नाम पर ही देश का विभाजन हुआ, धर्म के चलते ही हुए सैकड़ों दंगों में लाखों मारे गए फिर भी धर्म को महत्त्व देने का काम बंद नहीं हो रहा. उलटे धर्म की पोल खोलने, उस में पोल के अलावा है ही क्या, वालों पर सरकार हावी होती है और उसी से रामपाल व आसाराम जैसों को शह मिलती है.

धर्म की रक्षा का संवैधानिक अधिकार मौलिक मानव अधिकारों के विरुद्ध है क्योंकि धर्म मानव अधिकारों व मानव स्वतंत्रता पर अंकुश लगाता है. हर भक्त अपने धर्म का मानसिक व शारीरिक गुलाम बन जाता है. इसी गुलामी का फायदा धर्मगुरु उठाते हैं. वे भक्तों को वृहत धर्म से, गुलामों की खरीदफरोख्त की तरह, किराए पर या खरीद कर अपने पंथ या आश्रम में ले आते हैं.

रामपाल ने सत्ता को चुनौती दी थी. अदालतों ने न जाने क्यों उसे गंभीरता से लिया. अदालत रामपाल को सत्ता और भीड़ से अलग कर देखने को अड़ गई और सत्ता की हिम्मत नहीं हुई कि वह देश की न्यायव्यवस्था से कोरे शब्दों में कह सके कि हम आप की नहीं सुनते. अदालत की सख्ती का ही नतीजा है कि रामपाल को गिरफ्तार किया गया वरना पूर्र्र्र्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के लिए रामपाल जैसे गुरुओं को गिरफ्तार करना तो दूर, उन को किसी तरह का नोटिस भी भेजने की भी मजाल नहीं है.

सरकारी रिश्वतखोरी

सरकारी आदमी हर गुनाह से ऊपर होता है. वह तो नेताओं से भी ऊपर है. वह ग्रंथों में वर्णित श्रेष्ठों की तरह है जिन्हें कोई दंड नहीं दिया जा सकता. स्मृतियों में निर्देश है कि श्रेष्ठ को तो हत्या का भी पाप नहीं लगता. हत्या के अपराध में उस का अपमान करना ही काफी दंड होता है. इसलिए जब नोएडा के एक इंजीनियर यादव सिंह के घर पर छापे में 1,000 करोड़ रुपए की संपत्ति मिलने की खबर आई तो मोटे शब्दों में छपा था कि दंड के नाम पर उन का पद छीन लिया गया है और उन्हें सूखी जगह पर भेज दिया गया है.

सुब्रत राय को सुप्रीम कोर्ट ने बंद कर रखा है. ओमप्रकाश चौटाला बंद हैं. जयललिता जेल में रहीं और अब जमानत पर हैं. कितने ही व्यापारी जेलों में हैं. आम आदमी तो सरकारी ईंट उठाने के जुर्म में भी महीनों की कैद काट आते हैं पर सरकार के आदमी को कोई छू नहीं सकता. सरकारी नौकर, पुलिस वाला व सैनिक सब इन गुनाहों से ऊपर दिखते हैं. अमेरिका में भी कुछ ऐसा ही है. वहां की अदालत ने एक गोरे पुलिस अधिकारी को बरी कर दिया जिस ने निहत्थे अश्वेत युवा को गोली मार दी थी क्योंकि अफसर के अनुसार वह भागने की कोशिश कर रहा था. सरकारें अपने आदमियों के प्रति इतनी संवेदनशील रहती हैं कि कहीं उन्होंने विद्रोह कर दिया तो पूरा शासन ही बिगड़ न जाए. यही नहीं, उन्हें यह डर भी होता है कि कहीं सरकारी अफसर सरकार की निरंकुशता की पोल न खोल दें. अदालतें रामपाल जैसे ढोंगी के लिए तो गिरफ्तारी के आदेश दे सकती हैं पर एक रिश्वतखोर जज, आईएएस अफसर, पुलिस आयुक्त को अदालत में पेश होने तक के आदेश देने से कतराती हैं.

इस अफसर के पास नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना ऐक्सप्रैसवे प्राधिकरणों का चार्ज था और यह मायावती के करीबी लोगों में था. इस अफसर के समय लाखोंकरोड़ की जमीनें दिल्ली व आगरा के बीच किसानों से जबरन ली गईं और उन्हें बिल्डरों को बेचा गया. इस छीनाझपटी में लेनदेन तो होना ही था. गरीब किसानों की जमीनों पर अब रेस ट्रैक बन रहे हैं, होटल बन रहे हैं, कीमती मकान बन रहे हैं, फर्राटे से गाडि़यां दौड़ सकें ऐसी सड़कें बन रही हैं. ये सब मुफ्त में तो नहीं होता. सैकड़ों को नजराने देने होते हैं. चूंकि अंत में जनता इस नजराने को जमीन की कीमत का हिस्सा मान लेती है, इसलिए वह कोई आपत्ति नहीं करती. बात आईगई, हो जाती है.

इस अफसर पर गाज क्यों गिरी, यह तो शायद कभी पता न चले क्योंकि सरकार कभी ही अपने लोगों पर पर भी छापा मारने की कार्यवाही करती है. चाहे लोकपाल बनवा लो, लोकायुक्त बनवा लो या केंद्रीय जांच ब्यूरो लगवा लो, जब केंद्रीय ब्रांच ब्यूरो के प्रमुख पाकसाफ न साबित हो रहे हों, फिर भी खुले घूम रहे हों तो अदने से अफसर पर छापा मारा जाना किसी रंजिश का नतीजा ही है, रिश्वतखोरी दूर करने का प्रयास नहीं, यह समझ लें.w

नए साल का अंदाज-ए-स्वागत

नया साल हर किसी के लिए ढेरों खुशियां व समृद्धि ले कर आए इस के लिए हर कोई नए साल का स्वागत अलगअलग तरीके से, हर बार नए अंदाज में करना चाहता है. लोग नए साल का स्वागत पूरी मौजमस्ती के साथ कर सकें इस के लिए नाइट क्लब, मूवी थिएटर, रिसौर्ट, रैस्तरां, एम्यूजमैंट पार्क आदि सभी जगहों पर खास इंतजाम किए जाते हैं जहां नाचगाने के साथ खानेपीने का भी अनोखा इंतजाम किया जाता है. वहां हर उम्र के लोग साल के अंतिम दिन को खुशीपूर्वक विदाई देते हैं और नए साल का जोशपूर्ण स्वागत करते हैं.

इवैंट मैनेजमैंट का सहारा

आज की भागदौड़ भरी जीवनचर्या में लोग एकदूसरे से मिल कर उत्सव नहीं मना सकते, इसलिए वे अधिकतर मैसेज और फोन कौल को सहारा बना लेते हैं. पिछले 5 वर्षों से नया साल अलगअलग क्रेजी तरीके से मनाया जाने लगा है. इस के लिए लोग इवैंट मैनेजमैंट का सहारा लेते हैं. इस बारे में मुंबई की क्राफ्ट वर्ल्ड के इवैंट और्गेनाइजर मनोज महाले बताते हैं कि नए साल की शुरुआत के 1 महीने पहले से ही लोग उन्हें कौंटैक्ट करने लगते हैं. इस साल करीब 15 पार्टियां अरेंज करनी हैं. ये पार्टियां इसलिए अच्छी होती हैं कि इन में कई परिवार मिल कर पैसे खर्च करते हैं. जिस में लाइट, खाना, डांस शो या किसी कलाकार को आमंत्रित करना भी शामिल होता है. करीब 40 लोगों की टीम मनोज के साथ काम करती है. पार्टी स्थल में लाइट का प्रबंध खास होता है. ये पार्टियां बजट के अनुसार आयोजित की जाती हैं.

आजकल टाटा स्काई की ओर से कराओके सर्विस भी उपलब्ध है जिसे ले कर आप घर पर खुद गाना गा सकते हैं. दरअसल, बड़े शहरों में भीड़भाड़ भरे रास्ते से जा कर कहीं पार्टी मनाना एक समस्या होती है. वहां रात को घर वापस आना भी मुश्किल होता है. ऐसे में घर पर अगर सुकून के कुछ पल अपनों के साथ बिता लिए जाएं तो क्या कहने.

सितारों की खास तैयारी

टीवी अभिनेत्री जिया मानेक अपने नववर्ष के प्लान के बारे में बताती हैं, ‘‘इस बार मैं घर पर ही अपने परिवार के साथ नया साल मनाने वाली हूं. मेरा घर 16वीं मंजिल पर है, इसलिए वहां से पटाखे छोड़ने की खूबसूरती बालकनी से देख सकूंगी.’’

अभिनेत्री श्रद्धा आर्या का कहना है, ‘‘मैं दिल्ली जा रही हूं. वहां मेरे सारे कजिंस रहते हैं. पूरा परिवार एकसाथ होने वाला है और मैं दिल्ली की ठंड का स्वागत घर पर रह कर करूंगी.’’

कुछ कलाकार नए साल का स्वागत मुंबई से बाहर या विदेशों में जा कर करने वाले हैं. उन का कहना है कि मुंबई उन की कर्मभूमि है जहां रिलैक्स करना मुश्किल होता है. ऐसे में बाहर किसी प्राकृतिक स्थान पर जा कर नए साल को मनाना सुखद होता है.

अभिनेत्री दिव्यंका त्रिपाठी कहती हैं कि इस बार वे अपने मंगेतर शरद मल्होत्रा के साथ विदेश घूमने जा रही हैं. अगले साल वे शादी के बारे में सोचेंगी. नए साल का वे खुशियों के साथ स्वागत करेंगी.

कोरियोग्राफर और फिल्म निर्माता फराह खान के लिए 2014 काफी सफल रहा. उन की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ ने उन्हें अच्छी कामयाबी दिलाई, वे इस का ही सैलिब्रेशन अपने परिवार और दोस्तों के साथ करने वाली हैं.

टीवी अभिनेता रित्विक धनजानी भी नए साल के शो में व्यस्त रहते हैं. वे कहते हैं, ‘‘अगर इस साल समय मिला और कोई काम नहीं रहा तो पत्नी आशा नेगी और दोस्तों के साथ मुंबई से बाहर घूमने जाऊंगा क्योंकि इस समय मौसम खुशनुमा रहता है. परिवार व दोस्त साथ हों, तो घूमने का मजा दोगुना हो जाता है.’’

नए साल में केवल खुशियां पाना ही नहीं, बल्कि आने वाले हर काम का भी स्वागत करना चाहिए. टीवी अभिनेत्री रतन राजपूत कहती हैं कि मैं मुंबई में रहूंगी. उस दौरान अपने मातापिता, दोस्तों के बीच रहना चाहती हूं. इस के अलावा नए साल में जो भी काम मुझे मिलेगा. उस का स्वागत करने के लिए मैं तैयार हूं.

अभिनेता करन कुंद्रा नए साल की शुरुआत अपनी मेहनत और उद्देश्य पूर्ति के साथ करना चाहते हैं. उन का कहना है कि इस के लिए मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना जरूरी है. इस के लिए वे सही डायट लेंगे और नियमित जिम जाने की कोशिश करेंगे.

अभिनेत्री पायल के नए शो ‘महाकुंभ’ की इन दिनों शूटिंग चल रही है. वे व्यस्त हैं लेकिन नए साल का स्वागत वे अपने भाई और मातापिता के साथ बाहर जा कर करेंगी. उन की मां दिल्ली से मुंबई आ रही हैं, इस तरह वे नए साल के मौके पर काफी दिनों बाद मां के हाथ का बना खाना खाएंगी.

बहरहाल, नए साल को मनाने का जश्न हर किसी को अच्छा लगता है क्योंकि इस अवसर पर आप अपने मित्र, परिजन से मिल पाते हैं, उन के साथ अपने पूरे साल के कार्यकलापों का आदानप्रदान कर सकते हैं. कुछ समय उन के साथ बिताते हैं. इन सब से हर रिश्ता फिर से नया हो जाता है. साथ ही, पुराने साल को विदा कर आप नए साल में ऊर्जावान हो कर प्रवेश करते हैं.

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