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मायावती की दहाड में इस बार जोश नहीं

14 अप्रैल 2016 को लखनऊ के डाक्टर अंबेडकर सामाजिक परिर्वतन स्थल पर जुटी भीड पहले के मुकाबले काफी कम थी. उम्मीद की जा रही थी कि 2017 के विधानसभा चुनावों को देखते हुये मायावती विरोधी दलों को करारा जवाब देने के लिये भारी भीड जुटायेंगी. रैली में आये ज्यादातर लोग बसपा के अगडे नेताओं द्वारा बसों से लाये गये लोग थे. पहले मायावती शक्ति प्रदर्शन करने के लिये रमा देवी पार्क में रैली करती थी. वह बडा पार्क है. इस बार भीड में कमी का अंदाजा बसपा के लोगों को पहले लग गया था, इसलिये रैली के लिये दूसरी जगह चुनी गई. 

उत्तर प्रदेश जैसे बडे प्रदेश का 4 बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती राजनीति में वो मुकाम हासिल नहीं कर पाई जिसकी उम्मीद कांशीराम ने की थी. उत्तर प्रदेश के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर बसपा का संगठन धारदार नहीं बन सका. इसकी मूल वजह उसका दलित मुद्दों से कट जाना, कुरीतियों और रूढिवादी सोंच का विरोध बंद कर देना, मूर्तियां लगवाकर पूजा पद्वति का समर्थन करना और भ्रष्टाचार में डूब जाना रहा है. संगठन को विस्तार देने के लिये दूसरे नेताओं पर भरोसा करना पडता है. मायावती ने पार्टी को अपने आसपास ही समेट कर रख दिया. सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर बसपा में वह नेता आ गये, जिनका कभी  बसपा विरोध करती थी. मायावती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि को बहुत कमजोर कर दिया.

इस बात का अहसास खुद मायावती को अब हो रहा है. मायावती कहती हैं ‘अब स्मारक नहीं बनवाऊंगी. प्रदेश में विकास और कानून का राज स्थापित करूंगी.’ मायावती को दलित राजनीति की कुंजी मिली थी. जिसका प्रयोग करके वह देश की राजनीति में दलितों को मजबूत कर सकती थी. राजनीति में आज गठबंधन का दौर है. मायावती इस बात को भी सीखने को तैयार नहीं है. देश के अलग अलग हिस्सों में काम कर रहे दलित नेताओं, उनकी पार्टियों और दूसरे संगठनों के साथ तालमेल बनाने में मायावती असफल रही हैं.

पिछले 20 सालों में दलितों की सोच में बदलाव आया है. अब वह केवल जाति के नाम पर बसपा के पीछे खड़े होने को तैयार नहीं हैं. बसपा दलित विकास के बजाये केवल दलित स्वाभिमान की बात करती है. मायावती के विपरीत दूसरे दलों ने दलित वर्ग को अपने से जोडने और पार्टी में जगह देने की शुरूआत की है. 

50 रूपये में अपना जिस्म बेच रहीं सेक्स वर्कर

मंहगाई के इस दौर में 50 रूपये की कोई कीमत नहीं रह गई है. आपको यह जानकार हैरानी होगी की उत्तर प्रदेश के बस्ती शहर के सेक्स बाजार में 50 रूपये में सेक्स वर्कर अपना तन बेच रही हैं. इस कमाई से उनके मेकअप का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया है. बस्ती रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही यह वेश्या बाजार दिखने लगता है. यहां सडक पर ही खडी औरतों को देखकर इस इलाके की पहचान हो जाती है. इस बाजार में 500 के करीब सेक्स वर्कर रहती हैं. 18-20 साल से लेकर 40-45 साल की उम्र वाली औरतें सीधे तौर पर इस बाजार से जुडी हुई है. ज्यादातर सेक्स वर्कर नेपाल और पश्चिम बंगाल से हैं.

यहां यह लोग किराये के कमरे लेकर रहती है. सुविधा के नाम पर इन कमरों में कोई व्यवस्था नहीं होती. कमरे में 5 किलो वाले गैस के चूल्हे रखकर यह अपना खाना बनाती हैं. 30 साल से उपर वाली सेक्स वर्कर इस कोशिश में रहती हैं कि उनका राशन कार्ड और वोटर कार्ड बन जाये, जिससे वह गरीबों को मिलने वाली सरकारी योजना का लाभ उठा सके. कस्टमर के साथ सेक्स करने के लिये अलग से कमरे होते हैं. दोनों का किराया सेक्स वर्करों को देना होता है. सेक्स वर्कर के पूरे दिन की कमाई में दलाल का भी हिस्सा होता है. रोज कमाना इनकी मजबूरी होती है. ऐसे में 35 से 45 साल की उम्र की सेक्स वर्कर 200 सौ रूपये से लेकर 50 रूपये तक में तन बेचने को मजबूर हो जाती हैं.

इस उम्र वर्ग की करीब 40 फीसदी महिलायें यहां है. सेक्स वर्करों में केवल 5 फीसदी ही ऐसी है जो 12 सौ से 2 हजार तक कस्टमर से लेती हैं. कम उम्र की सेक्स वर्कर समय समय पर यहां से बाहर भी जाती रहती हैं. ज्यादातर ऐसी सेक्स वर्कर हैं जो 500 से 700 के करीब वसूल करती हैं. कम पैसे कमाने वाली एक के अलावा कई कस्टमर के साथ समय बिताती हैं. जिससे उनकी कमाई ज्यादा हो जाती है. 50 रूपये से 100 रूपये देने वाले ग्राहकों में रिक्शा चलाने वाले या बाहर से आने वाले मजदूर ज्यादा रहते हैं.

सेक्स वर्करों में ज्यादातर 15-16 साल की उम्र में ही इस धंधे में आ जाती हैं. सेहत और शरीर का सही से रखरखाव न कर पाने के कारण यह 25-30 साल में ही बूढी नजर आने  लगती हें. ऐसे में इनको कम पैसे में तन बेचने को मजबूर होना पडता है. नेपाल के करीब होने के कारण वहां की लडकियां यहां आ जाती हैं. इनके काम का समय 9 बजे सुबह से ही शुरू हो जाता है. ज्यादातर कस्टमर शाम आते है और रात शुरू होने तक यहां से बाहर चले जाते है.

बच्चों का मजाक न बनाएं

अधिकांश मातापिता अपने बच्चों से प्यार तो खूब करते हैं लेकिन उन की शैतानियों से तंग आ कर अकसर घर आए मित्रों, मेहमानों या रिश्तेदारों से मजाकमजाक में उन की ढेर सारी शिकायतें कर देते हैं. निश्छल और कोमल मन के बच्चों को ये बातें बिलकुल अच्छी नहीं लगतीं. कई बार तो इन बातों का उन पर ऐसा गहरा असर पड़ता है कि वे अंतर्मुखी हो जाते हैं, खुद में सिमट कर रह जाते हैं और धीरेधीरे उन की सामान्य गतिविधियां और खिलंदड़पन कुंद पड़ने लगते हैं. बच्चे आप की बातों का बुरा न मान जाएं, इस के लिए आप को उस की अग्रलिखित बातों की चर्चा दूसरों के सामने कतई नहीं करनी चाहिए.

बोलचाल पर आक्षेप

बहुत से बच्चे शुरूशुरू में तुतला कर बोलते हैं. यह स्वाभाविक है क्योंकि स्वरों और शब्दों पर उन की सही पकड़ तब नहीं हो पाती. ज्यादातर मामलों में लगातार दूसरों से सही उच्चारण सुनने और अभ्यास के बाद उन की यह कमजोरी खुद ही दूर हो जाती है. लेकिन जब मातापिता या बडे़ भाईबहन दूसरों के सामने उन की खिल्ली उड़ाते हैं और नकल करते हुए तुतला कर बोलते हैं तो बालमन आहत हो जाता है. इस से बच्चे का आत्मविश्वास डगमगा जाता है और वह बोलने से कतराने लगता है. नतीजतन, वार्त्तालाप करने का उस का अभ्यास भी कमजोर पड़ने लगता है और यह कमजोरी कई बार बड़े होने तक बनी रह जाती है.

बच्चे की समझ को समझें

कुछ ओवरस्मार्ट मातापिता अपने बच्चे से वयस्कों जैसी त्वरित प्रतिक्रिया और परिपक्व विचारों की उम्मीद करते हैं. जबकि बच्चा तो अपनी समझ के अनुसार ही रिऐक्ट करेगा. कई बार उसे बातें समझने में देर लग जाती है और फिर जवाब या प्रतिक्रिया के लिए सही जवाब या शब्द ढूंढ़ने में भी वक्त लगता है. यह सहज बात है क्योंकि वह इस दुनिया में नया है, उस का शब्द भंडार सीमित है और अनुभव भी बहुत कम होता है. स्वाभाविक है कि उस की संप्रेषण क्षमता बड़ों जैसी नहीं हो सकती. बच्चे बड़ों की तरह बातों को मौनिटर नहीं करते और अपनी बात अलग तरीके से कहते हैं. कई मातापिता इस बात को नहीं समझते और बच्चे को ‘ट्यूबलाइट’ का दरजा दे डालते हैं. ऐसा करना अपने बच्चे की मानसिक क्षमता के साथ खिलवाड़ करना है. उन पर टौंट करने के बजाय उन से ज्यादा से ज्यादा संवाद करें ताकि उन की संवाद क्षमता में निखार आए.

अस्तित्व को न नकारें

कुछ लोग बच्चों द्वारा बालसुलभ शैतानी या जानेअनजाने में की गई गलतियों पर बहुत जल्दी धैर्य खो देते हैं और हताश व क्रोधित हो कर बिना आगापीछा सोचे झट कह देते हैं, ‘तुम जैसी औलाद पैदा ही नहीं होती तो अच्छा रहता.’ इसी प्रकार के मातापिता बच्चे के नहाने में देर होने, सही ढंग से कपड़े न पहनने, बाल न संवारने या अनजाने में कुछ गिरा देने पर कहने लगते हैं, ‘इसे तो शर्म ही नहीं आती. सारी शर्म बेच कर खा गया…’ या ऐसे ही अनापशनाप जुमले. हो सकता है आप ने ये बातें क्षणिक आवेश में ही कह दी हों पर बालमन पर लंबे समय तक इस बात का असर रहता है.

शर्मिंदगी का एहसास

बहुत से बच्चे सीरियल, फिल्म या गानों के बजाय बड़े होने पर भी कार्टून चैनल देखना ज्यादा पसंद करते हैं. बच्चों के पीछे पड़े रहने वाले पेरैंट्स को यह कतई अच्छा नहीं लगता. जब बच्चा उन के बारबार मना करने पर भी नहीं मानता तो उसे प्रैशर में लाने के लिए घर आए मेहमानों के सामने या उस के दूसरे साथियों के सामने मातापिता उस पर तंज कसने लगते हैं, ‘हमारा डब्बू तो पोंगा है, पोगो देखता है.’ इस से बच्चे को अनावश्यक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है. पेरैंट्स के साथसाथ जब दूसरे लोग या उस के हमउम्र बच्चे जब उस बच्चे का मजाक उड़ाते हैं तो उस के मन में आप के प्रति रोष की भावना आती है.

खानपान पर अटैक

बच्चे तो बच्चे हैं?, जब मन किया, जो मन किया, खा लेते हैं. उन की पसंदीदा चीज फ्रिज में रखी हो, फ्रूट बास्केट में अंगूर, चेरी, केला, सेब जैसे फल रखे हों या केकपेस्ट्री, बिस्कुट, टौफी आदि उन की पहुंच में हों तो वे खा लेते हैं. यह एक सहज सी बात है. लेकिन कई पेरैंट्स अपने बच्चों की इस आदत का मजाक उड़ाते हैं. घर आए मेहमानों के सामने बच्चे की इस आदत को बढ़ाचढ़ा कर बोलते हैं और उसे ‘पेटूराम’ का दरजा दे बैठते हैं. इस से बच्चा बुरी तरह शरमा जाता है. उस के मानसम्मान को चोट पहुंचती है और बहुत संभव है कि वह खाने से कतराने लगता है. नतीजतन, बच्चे का शारीरिक विकास बाधित होता है.

असलीनकली का सवाल

कभीकभी मातापिता बच्चे को छेड़ने के लिए मजाक में तो कभीकभी रोष में कह देते हैं, तुम हमारी औलाद ही नहीं, लगता है अस्पताल में बदल दिए गए हो या फिर तुम्हें तो हम रास्ते से उठा कर लाए हैं. इन बातों का बच्चों के कोमल मन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. कभीकभी तो वे जिंदगीभर इस बात को मन से नहीं निकाल पाते हैं कि वे आप की असल औलाद नहीं. वे मन में बिठा लेते हैं कि वे किसी और के बच्चे हैं. कई बार ऐसे भी मामले देखने में आए हैं कि जब बच्चा दुखी हो कर सचमुच घर से निकल गया, अपने कथित ‘असली’ मातापिता को ढूंढ़ने के लिए.

झिझक न बने प्रैस्टिज इश्यू

बच्चे अबोध होते हैं. वे मातापिता या दादादादी के अलावा अकसर नए लोगों से मिलने में संकोच करते हैं क्योंकि उन्हें संवाद की कला नहीं आती. साथ ही, नए लोगों के सामने वे असहज महसूस करते हैं. यह एक सहज बात है. लेकिन कई मांबाप दूसरों के सामने उसे ‘शर्माऊ दुलहन’ का दरजा दे डालते हैं. कई पेरैंट्स तो बच्चे को नए लोगों से मिलवाने का प्रयास ही छोड़ देते हैं. जब बच्चा बारबार अपमान और उपेक्षा महसूस करने लगता है तो पेरैंट्स के प्रति उस के मन में सम्मान तो घटता ही है, वह आगे चल कर भी नए लोगों के समक्ष सहज नहीं हो पाता.

बीमारी का इलाज कराएं

बहुत सारे बच्चे रात में बिस्तर गीला कर देते हैं. कुछ बच्चे जरा बड़े होने तक भी ऐसा करते हैं. यह बहुत गंभीर बात नहीं है. शिशु रोग विशेषज्ञ आसानी से इस का इलाज कर देते हैं. लेकिन कुछ नासमझ मातापिता इस बात का जिक्र उस के सहपाठियों, पड़ोसियों या घर आए मेहमानों के सामने कर देते हैं. ऐसे में बच्चा बुरी तरह शर्मिंदा हो जाता है. वह खुद को ‘गंदा’ और ‘बीमार’ समझने लगता है. पेरैंट्स को समझना चाहिए कि इस समस्या में बच्चे का कोई नियंत्रण नहीं होता, इसलिए दूसरों के सामने उसे लज्जित करने के बजाय उस पर समुचित ध्यान दें और चिकित्सक से इलाज कराएं.

नीचा न दिखाएं

कई पेरैंट्स बातबात में बच्चे को एक ही डायलौग सुनाते हैं, ‘हम तुम्हारी उम्र के थे तो ये कर लेते थे, इतने बजे उठते थे…एक तुम, कितने नालायक हो.’ ऐसी बातों से न सिर्फ बच्चे के मन में दुख होता है बल्कि वह आप की बातों को गप भी मानने लगता है. आप के द्वारा बातबात में डींग हांकने और बच्चे को नीचा दिखाने की कोशिश करने पर बच्चा आप की बातों पर ध्यान देना बंद कर देता है और दिनपरदिन आप की अवहेलना कर के ढीठ होता जाता है. हो सकता है, कभी वह पलट कर ऐसा भी जवाब दे दे कि आप की उम्र में तो बहुत सारे लोग उद्योगपति, फिल्मकार और खिलाड़ी बने बैठे हैं, फिर आप इतनी लोप्रोफाइल जिंदगी क्यों जी रहे हैं.

तसवीरें जो न पोस्ट करें

नंगी तसवीर : कई पेरैंट्स अति उत्साह में अपने बच्चों की बाथरूम में नहाते समय, पालने में लेटे हुए या मगबाल्टी से खेलते हुए नंगे पोज की तसवीरें ही फेसबुक या वाट्सऐप पर डाल देते हैं. ध्यान रहे, ये तसवीरें आप के हाथ से निकलते ही दूसरों की संपत्ति बन जाती हैं और वे इन्हें सेव कर के भविष्य में दुरुपयोग कर सकते हैं. बच्चा जरा बड़ा होने पर अपनी ऐसी तसवीरें देखता है तो उसे भी शर्मिंदगी महसूस होती है.

शर्मिंदगी के क्षण : कई बार बच्चा चलतेचलते गिर गया हो, फ्रिज से चुरा कर कुछ खा रहा हो, खाने की टेबल पर सो गया हो या नींद में बड़बड़ा रहा हो, तो मोबाइल कैमरे से पेरैंट्स झट उस का वीडियो बना लेते हैं या तसवीरें ले लेते हैं और फेसबुक पर पोस्ट कर देते हैं. ऐसी नकारात्मक तसवीरें बच्चे को शर्मिंदा कर देती हैं और उस का बालमन बुरी तरह आहत हो जाता है. वह एंग्जाइटी या लौंगटर्म स्ट्रैस का शिकार हो सकता है और आगे चल कर बुरी संगत में भी पड़ सकता है.

औपरेशन फेसबुक

मेरा विश्वास है कि अब तक आप सभी लोग आधुनिक युग के चेहरे की किताब यानी कि फेसबुक से तो अवश्य ही परिचित हो गए होंगे और आप के फेस की खुशी भी इसी बात में निहित होगी कि आप फेसबुक पर बने रहें. परिणामस्वरूप, आप को लोग जम कर लाइक करें. यहां पर दुनियाभर से प्राप्त रिपोर्ट्स के आधार पर मैं यह बात बहुत आसानी से कह पाने में समर्थ हूं कि फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइट्स के माध्यम से दुनियाभर के लोगों के मूड को दुनियाभर में आसानी से फैलाया जा सकता है. फेसबुक लोगों के इमोशंस को फेसटूफेस स्क्रीन के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में फैलाता है. फेसबुक पर पोस्ट किए गए अरबोंखरबों अपडेट्स में इमोशनल पुट मिलता ही है. जब वह तरोताजा बादलों के मूड और उन के बरसने का व्याख्यान होता है तो दिल्ली शहर की चिलचिलाती गरमी में भी दिल्ली वालों को मौसम में नमी का एहसास होने लगता है. मन, बिन बरसात नाचे मयूरी, हो जाते देर नहीं लगती. क्या कहें जनाब, कवि निराला ने भी बादलों और बरसात पर इतनी कविताई नहीं की जितनी कविताई आधुनिक अतुकांत कविताई आजकल के युवकयुवतियां फेसबुक पर डाल कर अपने हिस्से में एक ही क्लिक पर तमाम सारे लाइक एकसाथ बटोर लेते हैं. निराला जिंदा होते तो आधुनिक अक्ल से पैदल इन कवियों से ईर्ष्या किए बिना नहीं रहते.

फेसबुक अकाउंट पर बादल के संबंध में यदि आप अपडेट पोस्ट करें, तो भला जिन शहरों में बारिश नहीं होने के आसार भी होंगे तो वहां भी कम से कम इमोशनल बारिश तो हो ही जाती है, वास्तविकता में भले ही धरती आग उगल रही हो. जी हां, ऐसा है हमारा आधुनिक दौर का फेसबुक कनैक्शन और इमोशन. पुराने समय में फेसबुक नहीं था तो प्रेमी अपनी प्रेमिका का चुंबन लेने के नायाब तरीके खोजता था. आजकल फेसबुक है, उस पर प्रेमिका का फोटो भी मौजूद है. कितना आसान है उस का चुंबन लेना. फोटो डाउनलोड करो, क्रोप करो और उस के गाल पर अपनी फोटो के होंठों को सटाओ, चिपका कर नजदीक ले आओ और चुंबन लो और फिक्स कर के कर दो पोस्ट. और तो और, इस नई फोटो के बारे में दुनियाभर से पूछ लो लाइक किया या नहीं?

प्रेमिका भी आधुनिक है. उसे अल्ट्रा माइल्ड सिगरेट पीने की लत है, इसलिए आधुनिक है. चुंबन लेने व देने से वह अब जरा भी नहीं शरमाती बल्कि गालों पर क्या शरीर के प्रत्येक अंग पर चुंबन करते हुए फोटो को पोस्ट करने की रिक्वैस्ट करने के बाद ही सिगरेट का दूसरा दम भरती हुई देखी जाती है.

आजकल आप ‘लेखक’, ‘चिंतक’, ‘राजनीतिज्ञ’, ‘डाक्टर’, ‘इंजीनियर’ या फिर ‘प्रोफैसर’ कुछ भी हों मगर फेसबुकिया न हुए तो कुछ भी न हुए. ‘शेयर’, ‘लाइक’, ‘कमैंट’ को यदि आप नहीं जानते तो आप अशिक्षित व पिछड़े हुए प्राणी की श्रेणी में ही रखने योग्य कहलाएंगे. आजकल आप ‘इंटरनैट’, ‘गूगल’, ‘याहू’, ‘औरकुट’, ‘ट्विटर’ नहीं जानते तो आप को शायद मनुष्य होने का अधिकार ही नहीं है. समाज आप को पशु के समान देखेगा. आप पशु कहलाएंगे, पशु. भाइयो और बहनो, इस दुनिया में तरहतरह की जनजातियां पाई जाती हैं. उन्हीं जातियों, जनजातियों और उपजातियों में से एक नई जाति पैदा हुई है वह है- फेसबुकिया. इसलिए कुछ भी न बन सको तो ‘फेसबुकिया’ अवश्य बनो

अपनी जिंदगी को बेकार और बोझिल समझने वाले अभी तक कुंआरे गुप्ताजी ने सोचा कि सक्सेनाजी लेखक हैं, जो भी कहेंगे या जो भी लिखेंगे, सच ही होगा, इसलिए उन्होंने ‘फेसबुकिया’ बनने के लिए दी गई मेरी नेक सलाह को सिरआंखों पर रख कर तुरंत खोल लिया अपना फेसबुक अकाउंट और लगे नएनए फ्रैंड्स बनाने. गुप्ताजी थे तो बहुत समझदार इंसान मगर उन के अंदर लड़कियों का सामना करने की हिम्मत बिलकुल भी नहीं थी. जिस को वे चाहते, उस के सामने आने पर प्रत्यक्षरूप से ‘आई लव यू’ बोलने और उस से शादी करने की हिम्मत जुटा पाना उन के बस की बात नहीं थी. किसी भी लड़की के सामने पड़ते ही उन के होंठ आपस में फैवीकोल का जोड़ हो जाते और हाथ भी बहनजी कह कर नमस्कार की मुद्रा में जुड़ने लगते. कृतज्ञता से ओतप्रोत हो कर वे किसी भी लड़की से अपने मन की बात कभी न कह पाते. ऐसी अवस्था में उन्हें ज्यों ही फेसबुक का सहारा मिला तो 2-4 नहीं, अनेक फ्रैंड्स बना डाले. चंद दिनों में ही उन्होंने कई दर्जन हसीनाओं को अपनी फ्रैंडलिस्ट में शामिल कर लिया.

फेसबुक अकाउंट पर लगी उन की प्रोफाइल व कई अंदाज में रंगीन फोटो के अपलोड्स को देख कर एक के बाद एक मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बनारस आदि से फ्रैंड रिक्वैस्ट आने लगीं तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. अब गुप्ताजी को एहसास के साथ विश्वास हो चला कि ‘साला, कुछ भी हो, हैं तो हम भी बहुत ऊंची चीज. अमा यार, ऐसे ही नहीं इतने लोग हमें अपना फ्रैंड बनाने के लिए उतावले हैं.’

पुराने दिनों की याद करते हुए वे अपनेआप को कोसते और मन ही मन कहते, ‘यार, खामखां ही इतने दिन बेकार किए. आखिर, कितनी बेचैन हैं ये लड़कियां मुझे अपना फ्रैंड बनाने के लिए. आखिर यह सब मेरा प्रोफाइल देख कर ही तो मुझ से फ्रैंडशिप करने की रिक्वैस्ट भेजती होंगी. मैं कोई ऐरागैरा नत्थूखैरा थोड़े ही हूं. साक्षात दिखने में सुंदर जरूर नहीं हूं मगर फोटो में तो मैं किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं दिखता. इसीलिए वे सब मेरी बनना चाहती हैं. अब मेरी मरजी जो इन में से मैं किस से, कब और कहां मिलूं.’ उन्होंने फिर अपनेआप को शाबाशी देते हुए अपनी मुट्ठी बांध कर जोर से आसमान में लहराई और कहा, ‘यस, आई एम ग्रेट.’ उन्हें लगा जैसे अब उन का जीवन पूर्ण हो गया. उन्हें सारे जहां की खुशियां मिल गईं.

एक दिन फेसबुक पर अपनी मनचाही लड़की की फ्रैंड रिक्वैस्ट पा कर गुप्ताजी ने फ्रैंडशिप स्वीकारते हुए पहली बार चैट शुरू की और महसूस किया कि वह उन के सामने बैठी है और वे उस का हाथ अपने हाथों में ले कर उस की सांसों की गरमाहट को महसूस भी कर रहे हैं. मन ही मन में उस के साथ अंतरंग क्षण में वे अपनेआप को समाहित भी महसूस करने लगे. वैसे गुप्ताजी सभ्य थे, इसलिए उन्होंने कभी भी अपनी पोस्ट लिखते समय या चैट करते समय अपने विचारों की लक्ष्मणरेखा पार नहीं की. हां, मन ही मन उतावले जरूर बने रहे. वे गिरना तो चाहते थे लेकिन ‘अभी नहीं, अभी नहीं’ कह कर वे खुद को सदा ही रोक लेते. लेकिन एक दिन वह अपनेआप को रोक नहीं पाए और उन्होंने उस मनचाही लड़की को लिखा, ‘‘मैं आप से मिलना चाहता हूं. कुछ बातें ऐसी होती हैं जो लड़कालड़की साक्षात आमनेसामने बैठ कर ही करें तो बेहतर रहता है. क्या आप मुझे अपना कीमती वक्त देंगी?’’

जवाब मिला, ‘‘मैं आप की फेसबुक फ्रैंड हूं और फेसबुक फ्रैंड ही रहना चाहती हूं. मुझे स्क्रीन पर आसानी से उपलब्ध फ्रैंड पसंद हैं. मैं साक्षात फ्रैंड बनाने में विश्वास नहीं रखती हूं क्योंकि मेरे मित्र, मैं भी आप के ही लिंग की हूं. वह तो मेरी मजबूरी थी कि मुझे आप से दोस्ती करने के लिए फेसबुक पर अपना लिंग परिवर्तित कर स्त्रीलिंग में आप से बातचीत करनी पड़ी. यही तो फेसबुक पर स्क्रीनमय फेसटूफेस होने का असली मजा है. बुरा न मानना मेरे प्यारे मित्र. फेक अकाउंट बना कर लड़कों को बेवकूफ बनाना मेरा शौक है. वादा करो कि यह सब जान कर तुम आत्महत्या नहीं करोगे. मेरे फेसबुकिया फ्रैंड, मेरी राय मानो तो जल्दी ही ‘शादी डौट कौम’ पर जा कर अच्छी सी लड़की ढूंढ़ कर शादी कर लो और प्रत्येक रात अपनी नईनवेली पत्नी के साथ भविष्य के नएनए पुल्लिंग और स्त्रीलिंग तैयार करने में व्यस्त हो जाओ.’’

इतना लिख कर वह सदा के लिए औफलाइन हो गई. गुप्ताजी ने भी तुरंत कंप्यूटर को शटडाउन किया और आंखें मूंद कर थोड़ी देर के लिए ध्यानमुद्रा में बैठ कर भविष्य में फिर से मन की शांति के लिए गहरी सांस ली. हम ने गुप्ताजी के टूटे हुए दिल पर अपनी संवेदनाएं प्रकट करनी चाहीं कि तभी शर्माजी आ धमके और बोले, ‘‘यार, सक्सेना साहब, आप को कब फुरसत मिलेगी मुझे लाइक करने की? मैं ने आज सुबह ही फेसबुक पर अपनी नई फोटो लगाई है. सुबह से 50 बार कंप्यूटर पर फेसबुक खोल कर देख चुका हूं. 5 हजार लोगों ने मुझे लाइक किया है, मगर आप की लाइक गायब है. कैसे परममित्र हो यार?’’

मैं ने कहा, ‘‘शर्माजी, मैं आप का परममित्र हूं, इसलिए फेसबुक पर आप के द्वारा लगाई गई फोटो को लाइक करूं या न करूं, क्या फर्क पड़ता है. रहूंगा तो आप का मित्र ही न.’’

‘‘नहीं यार, इस तरह बात नहीं बनेगी. अभी कंप्यूटर औन करो और फेसबुक खोल कर मेरी फोटो को लाइक करो. आप के लाइक करते ही मैं सब से कह सकूंगा कि पूरे 5001 लोगों ने मुझे लाइक किया है.’’

मैं ने भी सोचा कि जब ‘हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा ही आए’ तो फिर कंप्यूटर औन कर के शर्माजी की फोटो को लाइक कर ही देता हूं. करना ही कितना होता है फेसबुक औन किया, माउस घुमाया, क्लिक किया और बस हो गया एक और लाइक. सो, तुरंत कर दिया. मेरे लाइक को प्राप्त करते ही शर्माजी बल्लियों उछलते हुए मेरे कक्ष की तरफ दौड़े तो अचानक उन का पैर मुड़ गया और वे सीढि़यों से फिसल कर गिर पड़े और बेहोश हो गए. उन्हें तुरंत पास के अस्पताल में भरती करवाया गया. होश आने पर अपने एक पैर और एक हाथ पर चढ़ा हुआ प्लास्टर देख कर बोले, ‘‘एक लाइक के चक्कर में मेरी यह हालत हो गई.’’ मैं ने मुसकरा कर अपना स्मार्ट फोन देते हुए कहा, ‘‘शर्माजी, जो हुआ सो हुआ. लो कर लो फिर से अपना फेसबुक अकाउंट अपडेट.’’

उन्होंने पहले तो मना किया लेकिन फेसबुक की लत के शिकार थे, इसलिए शीघ्र ही उन की उंगलियां मेरे दिए हुए स्मार्ट फोन पर थिरकने लगीं तो उन के फेसबुक अकाउंट पर उन के दुर्घटनाग्रस्त हो कर हाथपैर टूट जाने की तमाम सारी संवेदनाएं व सांत्वनाएं और जल्दी स्वस्थ हो जाने की ढेरों शुभकामनाएं तो थीं मगर प्रत्यक्षरूप से उन से मिलने कोई भी फ्रैंड अस्पताल में मौजूद नहीं था सिवा मेरे. यह देख कर उन्होंने मन ही मन कुछ सोचा और थोड़ा सा बुदबुदाए, मानो किसी को गाली दे रहे हों और तत्काल उन्होंने मोबाइल को स्विचऔफ कर मुझे वापस कर दिया. और बोले, ‘‘खबरदार, जो अब कभी मुझ से फेसबुक के बारे में बात भी की. मैं ने फेसबुक और उस पर आसानी से उपलब्ध अपने सभी 5 हजार फ्रैंड को सदा के लिए छोड़ दिया है. जो दुख में काम न आए वह फ्रैंड कैसा? यह बात अब मुझे अच्छी तरह से समझ आ गई है.’’

फेसबुक पर बढ़ती उम्र की महिलाओं को भी फ्रैंडबाजी का रोग लग जाता है कि वे आव देखती हैं न ताव, न उम्र देखती हैं न अपने बूढ़े अंग, न रूप देखती हैं न रंग. ये भी अपनेआप को भूखप्यास की चिंता किए बिना रोजाना ही 2-2, 3-3 घंटे लगातार कमैंट करने और लाइक करने के चक्कर से बाहर ही नहीं निकल पातीं. ऐसे में एक 50 वर्षीय महिला रीटा को जब अपनेआप को लाइक करवाने का चस्का लगा तो उस ने अपनी जवानी की फोटो फेसबुक पर लगा दी. उस की लिस्ट में तुरंत तमाम सारे युवा शामिल हो गए. एक युवक तो उस के चक्कर में ही पड़ गया और कमैंट करने लगा, ‘‘जवानी जाने मन, हसीन दिलरुबा, मिले दो दिल जहां, निसार हो गया.’’ बस, एक लाइक के चक्कर में वह युवक तो पागल हो गया और पागलखाने में उसे भरती करवाया गया. ऐसा होने पर भी उस की मम्मी अपने घर वालों को यह नहीं बता पाई कि वह पागलखाने में भरती किए जाने वाले पागल युवक की सगी मां है.

फेसबुक पर अपने ढेरों ‘लाइक’ और ‘कमैंट्स’ के चक्कर में अपने सगे बेटे को ही पागल करवा चुकी इस मां को अभी भी फेसबुक से दूरी बनाए रखने की बिलकुल तमन्ना नहीं थी क्योंकि उसे अपने बेटे के साथ रहने के सुख से ज्यादा फेसबुक पर बने रहने और कमैंट पढ़ कर मन ही मन खुश रहने में बहुत मजा आने लगा था. लेकिन, ऐसी आधुनिक महिलाओं के बारे में सोचसोच कर मैं तो बहुत परेशान था कि कैसा जमाना आ गया है, जो बेटे से ज्यादा फेसबुक प्यारा हो गया.

बच्चों के मुख से

मेरी बहन और उस का 5 वर्षीय बेटा मेरे पास आए हुए थे. उन दिनों आम का मौसम लगभग समाप्ति पर था. मेरे पति आम ले कर आए थे जिन में से एक आम, जो सब से बड़ा था, मैं ने बचा कर रख दिया ताकि खाने के समय काट कर सब को दे सकूं. बहन का लड़का बारबार फ्रिज के पास जाता, उसे खोल कर देखता और फिर बंद कर देता. यह क्रम वह लगभग हर 5 मिनट बाद दोहरा रहा था. मैं उस की इस हरकत को देख रही थी. आखिर मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘फ्रिज में से कुछ चाहिए, बेटा?’’ बच्चे ने तपाक से कहा, ‘‘बड़ी मम्मी, क्या इस आम का झाड़ उगाओगी?’’ बच्चे द्वारा मासूमी से कही बात पर मेरी हंसी छूट गई. बात 18 साल पुरानी हो चुकी है लेकिन आज भी फ्रिज में आम रखे देखती हूं तो घटना ताजी हो जाती है.

– विमला ठाकुर, महेंद्रगढ़ (हरि.)

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मैं मायके गई हुई थी. मेरा बड़ा बेटा तब ढाई साल का था. उसे हिंदी, इंगलिश का फर्क भी नहीं मालूम था. छोटी बहन दीवार पर कील ठोंकने का काम कर रही थी. उस ने मेरे बेटे से कहा कि अनुज, जरा वह हथौड़ी मुझे पकड़ा दो. बेटे ने पास ही पड़ी हथौड़ी बहन को दी और कहने लगा, ‘‘मौसी, आप लोग तो बड़े अंगरेज हो, हम लोग तो इसे हैमर कहते हैं.’’ यह सुन कर हम सब खूब हंसे.

– कीर्ति सक्सेना, बेंगलुरु (कर्नाटक)

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मेरी भतीजी की 4 साल की बेटी है. वह बहुत ही चंचल है. एक दिन उस की मौसी की शादी में लेडीज संगीत हो रहा था. वह भी डांस करने के लिए तैयार हो कर आ गई. फिर उस ने डांस किया. उस के डांस को सब लोगों ने बहुत पसंद किया. डांस कर के उस ने आ कर हम लोगों से पूछा, ‘‘बताइए, मैं ने कैसा डांस किया?’’ फिर थोड़ी देर बाद अपनी मम्मी से बोली, ‘‘मैं ने तो वह वाला पोज ही नहीं किया, मैं फिर से जा कर कर लूं?’’ यह सुन कर सभी हंसे बिना न रह सके.

– नीलिमा रायजादा, लखनऊ (उ.प्र.)

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मेरी बहन आभा अपनी बेटी की डिलीवरी के लिए अमेरिका गई थी. बेटी के बेटा हुआ. वह 4 दिन के बच्चे से प्यार से हिंदी में बोल कर उस के साथ दुलार कर रही थी, तभी उस की 4 वर्षीया नातिन बोली, ‘‘नानी, ही डज नौट नो हिंदी, स्पीक इन इंगलिश.’’ उस की बात सुन कर वहां पर उपस्थित सभी लोग हंस पड़े.

– अरुणा रस्तोगी, मोतियाखान (न.दि.)

भवन निर्माताओं की दिक्कतें

भवन निर्माताओं को कठघरे में खड़ा करने की आदत देशभर में बुरी तरह फैली हुई है. लोगों को मकान चाहिए पर वे मकान बनाने की दिक्कतों को न तो समझने को तैयार हैं और न ही सरकार पर दबाव बनाने को. आम लोग अब जमीन खरीद कर मकान बनाने से कतराते हैं क्योंकि वे मकान बनाने में आने वाली अड़चनों का सामना नहीं कर सकते. पर जब वे पैसे ले कर भवन निर्माता के पास जाते हैं तो उन्हें लगता है कि सैकंडों में वह काम हो जाएगा जो वे वर्षों में नहीं कर पाते. भवन निर्माण में सरकारी अड़चनों की कोई सीमा नहीं है. जमीन खरीदी से ले कर अंत तक न जाने कितने फौर्म भरने पड़ते हैं. तब कहीं जा कर खरीदार उस में रह पाता है. ऊपर से जब से भवन निर्माण में तेजी आई है, मजदूर मिलने कम हो गए हैं. बैंक कर्ज देते हैं पर वह स्रोत कहीं बीच में न रुक जाए, यह डर बना रहता है.

मकानों के बाजार में ऊंचनीच चलती रहती है. लोगों की पसंद कब बदल जाए, पता नहीं चलता. जो इलाके शहर के अच्छे माने जाते थे और जहां दाम कुछ ज्यादा थे, देखतेदेखते स्लम और ट्रैफिक की चपेट में आ कर कब खराब हो जाएं, पता नहीं चलता. एक बाग के सामने बना मकान अच्छे पैसे देता है पर बाग की जगह पर कब कारखाना, स्कूल, मंडी या डंप उग आएं, कहा नहीं जा सकता. भवन निर्माताओं की इन दिक्कतों को कोई नहीं देखता. सरकार भवन निर्माताओं पर पेंच कसने के नियमकानून बना रही है. उपभोक्ता अदालतें लगातार भवन निर्माताओं के विरुद्ध फैसले देती रहती हैं. सुप्रीम कोर्ट में अकसर भवन निर्माताओं को फटकार पड़ती है, बनेबनाए मकानों को तोड़ने के आदेश दे दिए जाते हैं.

जिस देश में सड़कों पर कब्जा कर दुकान चलाना मौलिक हक सा बन गया हो, जहां सैकड़ों एकड़ खाली जगह पर दशकों से झुग्गीझोंपडि़यां बसी हों, जहां कोई नगरनिगम, राज्य सरकार या केंद्र सरकार 5 मील लंबी साफ व बाधारहित सड़क नहीं बना सकती हो, जहां सरकारी मकान भद्दे व कच्चे बनते हों, वहां भवन निर्माताओं को खलनायक सिद्ध करना कैसे सही कहा जा सकता है. ठीक है कि भवन निर्माताओं ने पिछले दशकों में बहुत कमाई की है पर उस तरह की कमाई किसानों और मकानमालिकों ने भी की है. उन दोनों की कमाई सिर्फ इस बात पर हुई है कि शहरीकरण तेजी से बढ़ा और कौडि़यों की जमीनों के दाम करोड़ों तक पहुंच गए. इस गुनाह के साझेदार सारे ही लोग हैं, सरकार सब से बड़ी.

भवन निर्माण आवश्यकता है. रोटीकपड़े के बाद मकान की जरूरत अहम है. उसे बनाने वाला पैसे के साथ सम्मान चाहता है, कोरी गालियां नहीं. नए कानून जो बनाए जा रहे हैं उन में सभी दिक्कतों का खयाल रखा जाए. भवन निर्माण में आने वाली सरकारी रुकावटें पहले दूर हों. और तब भी अगर भवन निर्माताओं की ओर से गड़बड़ी हो तो ही उन्हें कठघरे में खड़ा किया जाए.

कहानी पर तकनीक हावी न हो: इम्तियाज अली

झारखंड के जमशेदपुर के रहने वाले निर्देशक इम्तियाज अली का मानना है कि फिल्म बनाने के लिए सब से जरूरी चीज कहानी है. आप के पास दर्शकों से कहने के लिए कुछ होना चाहिए. कहानी ऐसी होनी चाहिए जो जिंदगी से मिलतीजुलती हो. वे बताते हैं कि वे कहानी की खोज में खूब घूमते हैं और कई लोगों से मिलते हैं. एक लेखक और निर्देशक को समाज व उस की समस्याओं से रूबरू होना बहुत जरूरी है. आज फिल्म इंडस्ट्री में कहानी पर तकनीक हावी हो गई है. कहानी फिल्म की जान होती है और जब किसी चीज में जान ही न हो तो उस से क्या उम्मीद की जा सकती है. पिछले दिनों उन से हुई मुलाकात के दौरान उन्होंने बताया कि तीसरी क्लास से 8वीं क्लास तक की पढ़ाई उन्होंने पटना में की थी. 44 साल के इम्तियाज कहते हैं कि बिहार की किसी थीम पर वे फिल्म बनाना चाहते हैं और इस के लिए वे अच्छी कहानी की तलाश में हैं. पटना के नेट्रोड्रम और सैंट माइकल स्कूल से पढ़ाई करने के बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने जमशेदपुर में की और उस के बाद दिल्ली के हिंदू कालेज से ग्रेजुएशन किया. जल्द ही उन की किसी फिल्म में बिहार या झारखंड नजर आ सकता है.

वे कहते हैं कि पढ़ाई के दौरान उन्होंने फिल्म के बारे में कुछ नहीं सोचा था और इस बारे में कुछ जानकारी भी नहीं थी. स्कूल में पढ़ाई के दौरान नाटक करते थे. पिता ने कभी भी उन्हें नाटक करने से मना नहीं किया. नाटक की पटकथा लिखने और निर्देशन का काम वे खुद ही करते थे. पढ़ाई के दौरान काफी कविताएं भी लिखीं. लेखन से ले कर टैलीविजन के कई शो को डायरैक्ट किया. युवाओं की थीम पर फिल्में बनाने के लिए मशहूर इम्तियाज अली कहते हैं कि उन का जैसा मन करता है, वैसी फिल्में बना देते हैं. फिल्में सफल होंगी या नहीं, इस की चिंता नहीं करते हैं. आगे वे कहते हैं कि जब किसी चीज को पूरे मन और मेहनत से किया जाए तो उसे कामयाबी मिलती ही है.

साल 2004 में फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ में ऐक्ंिटग कर अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत करने वाले इम्तियाज का मन ऐक्ंिटग में नहीं रमा और साल 2005 में उन्होंने ‘सोचा न था’ फिल्म का निर्देशन किया. उस के बाद साल 2007 में फिल्म ‘जब वी मेट’ की कामयाबी ने हिंदी सिनेमा में निर्देशक के तौर पर उन के पांव जमा दिए. उस के बाद तो इम्तियाज कामयाब फिल्मों की गारंटी ही बन गए. ‘लव आजकल’, ‘रौकस्टार’, ‘कौकटेल’, ‘हाइवे’, ‘तमाशा’ आदि फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें बेहतरीन निर्देशकों की कतार में खड़ा कर दिया. उन की हर फिल्म के केंद्र में प्रेम के होने के सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि मोहब्बत ही उन की फिल्मों की यूएसपी है. प्रेम कहानियों में हर मोड़ पर नयापन और बदलाव आता रहता है और दर्शक उस से बंधे रहते हैं. वे कहते हैं कि निर्देशक को काफी और लगातार पढ़ते रहने की दरकार है, तभी वह अपनी फिल्मों में नयापन और सचाई पेश कर सकेगा. ज्यादातर फिल्म निर्देशकों को कहानी, कविता, गीत, संगीत आदि की कोई समझ ही नहीं होती है, जिस का असर उन की फिल्मों पर साफतौर पर दिखाई देता है.

आर्ट और कमर्शियल फिल्म के अंतर के बारे में इम्तियाज का मानना है कि कोई अंतर नहीं है. हर फिल्म बनाने वाला चाहता है कि उस की फिल्म बौक्स औफिस पर चले. कोई भी नुकसान उठाने के लिए फिल्म नहीं बनाता. फिल्ममेकर अपनी सोच के हिसाब से फिल्में बनाते हैं और क्रिटिक ही उसे आर्ट और कमर्शियल फिल्मों के खांचे में बिठा देते हैं. फिल्म बनाना ही एक बहुत बड़ा आर्ट है और हर फिल्म में आर्ट होता ही है.

ओडिशा बुलाते समुद्र तट, लुभाते आकर्षक मंदिर

500 किलोमीटर लंबे समुद्रतट से घिरा ओडिशा दुनिया का सब से बेहतरीन समुद्रतट माना जाता है जो पर्यटकों को सदियों से अपनी ओर लुभाता रहा है. पुरी, चांदीपुर, गोपालपुर, कोणार्क, पारादीप, बालेश्वर, चंद्रभागा, पाटा सोनापुर, तलसारी जैसे समुद्रतटों की खूबसूरती और कोणार्क, लिंगराज, जगन्नाथ जैसे ऐतिहासिक मंदिर पर्यटकों को बारबार आने के लिए मजबूर करते रहे हैं. ओडिशा में एक नया टूरिस्ट स्पौट लवर्स पौइंट पर्यटकों के लिए खासा आकर्षण बन गया है. इसे ओडिशा पर्यटन की ओर से बनाया गया है. इसे एडल्ट टूरिस्ट स्पौट भी कहा जाता है. पुरी समुद्रतट और चंद्रभागा समुद्रतट के बीच विकसित किए गए लवर्स पौइंट पर रोज हजारों एडल्ट पर्यटक पहुंचते हैं और जीवन की रंगीनियों का खुल कर लुत्फ उठाते हैं. पुरी समुद्रतट से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर बने इस पौइंट पर बड़ेबड़े पत्थरों को रखा गया है और काफी घने पेड़ लगाए गए हैं. पेड़ों, पत्थरों और समुद्र की गर्जना के बीच दुनिया के कोलाहल से दूर प्रेमी जोड़े यहां मुहब्बत का अनोखा आनंद महसूस करते हैं.

ओडिशा की मशहूर चिल्का झील भारत की सब से बड़ी और दुनिया की दूसरी सब से बड़ी समुद्री झील है. इसे चिलिका झील के नाम से भी पुकारा जाता है. 70 किलोमीटर लंबी और 30 किलोमीटर चौड़ी चिल्का झील पर मानो प्रकृति कुछ खास ही मेहरबान रही है. इस झील की प्राकृतिक सुंदरता के साथ एक बड़ी खासीयत यह है कि दिसंबर से जून महीने तक इस का पानी खारा रहता है और बारिश के मौसम में इस का पानी मीठा हो जाता है. इस झील में बोटिंग का आनंद लिया जा सकता है.

पर्यटकों को लुभाने वाली जैव संपदाओं और समुद्री मछलियों से भरपूर चिल्का झील से करीब डेढ़ लाख मछुआरों की रोजीरोटी चलती है. ओडिशा के तकरीबन 150 गांवों के लोगों का गुजारा इसी झील के जरिए चलता है. चिल्का झील समुद्री मछलियों, झींगा मछली, केकड़ा, समुद्री शैवालों, समुद्री बीजों और लघु शैवालों से भरी पड़ी है. इस झील के आसपास 160 प्रजातियों के पक्षियों का विचरण स्थल है. कैस्पियन सागर, अरब सागर, मंगोलिया, रूस, मध्य एशिया, लद्दाख समेत कई देशों से आए पक्षियों के झुंड चिल्का झील की खूबसूरती में चारचांद लगा देते हैं. यह भुवनेश्वर से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. रहने के लिए कई रिजौर्ट हैं, नीलाद्रि रिजौर्ट उन में से एक है.

ओडिशा के गोल्डन तट से 50 किलोमीटर की दूरी पर बसे नीलाद्रि रिजौर्ट में पर्यटकों के लिए हर सुविधाएं मौजूद हैं और वहां से ओडिशा के कई पर्यटनस्थलों की दूरी काफी कम है. करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर जगन्नाथ टैंपल है तो कोणार्क सूर्य मंदिर 37 किलोमीटर की दूरी पर है. ओडिशा का पुरी समुद्रतट देशविदेश के टूरिस्टों का पसंदीदा टूरिस्ट स्पौट है. जगन्नाथपुरी मंदिर से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पुरी समुद्रतट पर फैली बालू पर बैठ कर समुद्र की अठखेलियों के साथ सूर्योदय व सूर्यास्त के विहंगम दृश्य का लुत्फ उठाया जा सकता है. पुरी के समुद्रतट की खूबसूरती पर्यटकों को लुभाती रही है. पुरी का जगन्नाथपुरी मंदिर का परिसर 4 लाख वर्गफुट में फैला हुआ है. मंदिर का मुख्य ढांचा 65 मीटर ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर बना हुआ है. हर साल जूनजुलाई में होने वाली रथयात्रा पर्यटकों को आकर्षित करती रही है. पुरी रेलवे स्टेशन से पुरी समुद्रतट महज 2 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां का सब से नजदीकी हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक एअरपोर्ट 60 किलोमीटर दूर है.

कोणार्क सूर्य मंदिर भी ओडिशा का मुख्य पर्यटनस्थल है. यूनेस्को ने इसे साल 1884 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था. लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट से बना यह मंदिर कलिंगा स्थापत्यकला का अद्भुत नमूना है और इसे ब्लैक पैगोडा के नाम से भी जाना जाता है. रथ के रूप मेें बने इस मंदिर में 7 घोड़े और 12 जोड़े पहिए बने हुए हैं. 13वीं सदी में बने इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर स्त्रियों व पुरुषों की कई काम मुद्राएं उकेरी हुई हैं. यह भुवनेश्वर से करीब 40 किलोमीटर और पुरी से 35किलोमीटर की दूरी पर है. बस और टैक्सी के जरिए आसानी से कोणार्क पहुंचा जा सकता है.

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में 990 एकड़ यानी 400 हेक्टेअर में फैले नंदन कानन बोटैनिकल गार्डन में हर तरह के जंगली जानवरों व पक्षियों को नजदीक से देखने का आनंद लिया जा सकता है. 1979 में आम लोगों के लिए खोले गए इस बोटैनिकल गार्डन में 67 स्तनधारी जानवरों की प्रजातियों, 81 पक्षियों की प्रजातियों, 18 सरीसृप प्रजातियों समेत 166 प्रजातियों के जानवरों की भरमार है. सफेद बाघ और घडि़याल इस के रोमांच व सुंदरता को कई गुना ज्यादा बढ़ा देते हैं. यह गार्डन भुवनेश्वर स्टेशन से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर है. सिमलीपाल नैशनल पार्क घने जंगल और जंगली जानवरों से भरा पड़ा है. ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित यह पार्क 845.70 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. इस नैशनल पार्क में सिमल यानी लाल कपासों की भरमार है, इसलिए इसे सिमलीपाल नाम दिया गया है. इस पार्क में हर समय हाथियों की चिंघाड़ और बाघों की गर्जना सुनाई देती है. इस में 432 हाथी और 99 बाघों का डेरा है. इस के अलावा हिरण, गौर और चौसिंगे इस नैशनल पार्क में भरे हुए हैं. सिमलीपाल नैशनल पार्क की एक ओर बड़ी खूबसूरती जोरांडा और बरेहीपानी जैसे कलकल- छलछल करते झरने हैं. दोनों झरने पर्यटकों को अपने पास ठहरने को मजबूर कर देते हैं. इस नैशनल पार्क में रात गुजारने के लिए पर्यटकों के लिए तंबुओं का भी इंतजाम किया गया है. घना रहस्यमयी जंगल, झरने और पहाडि़यां इस नैशनल पार्क को दुनिया के बाकी नैशनल पार्कों से अलग खड़ा करते हैं. यह नैशनल पार्क भुवनेश्वर से 200 किलोमीटर और बालेश्वर से 400 किलोमीटर की दूरी पर है.

इन टूरिस्ट स्पौटों के अलावा लिंगराज मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, राजारानी मंदिर, धौलागिरी हिल्स, उदयगिरी, हीराकुंड बांध, भीतर कनिका राष्ट्रीय उद्यान भी ओडिशा के पर्यटन की पहचान हैं. मंदिर अंधविश्वास को तो जगाते हैं पर अपनी वास्तुकला के लिए इन्हें देखना तो अनिवार्य सा ही है. जहां मंदिर पूजापाठ का केंद्र हैं वहीं बेहद भीड़ और गंदगी है पर बहुत से मंदिर सिर्फ अपनी सुंदर मूर्तियों व सांस्कृतिक कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध हैं. पर्यटन के तौर पर आप यह भी देखें कि हमारी वास्तु धरोहर कैसी है और यह भी कि आज भी हमारा समाज कैसे अंधभक्ति पर पैसे लुटा रहा है.

शिमला जैसा कोई नहीं

शिमला खूबसूरत हिल स्टेशन है. यह हिमाचल प्रदेश की राजधानी है. यह समुद्र की सतह से 2,202 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. हिमालय पर्वत की निचली शृंखलाओं में बसा यह शहर देवदार, चीड़ और माजू के जंगलों से घिरा है. आप शिमला घूमने जा रहे हैं तो वहां रुकने की व्यवस्था पहले ही कर लें ताकि वहां पहुंचने के बाद ठहरने की व्यवस्था करने में समय बरबाद न करना पड़े. यहां छोटेबड़े कई रिजौर्ट हैं जहां सभी तरह की सुविधाएं मुहैया हैं. वहां ठहर कर आप अपनी छुट्टी का मजा दोगुना कर सकते हैं.

शिमला में एक ऐसा ही रिजौर्ट शिमला हैवेंस है. देवदार व चीड़ के पेड़ों से घिरा यह रिजौर्ट 6 एकड़ जमीन पर फैला है. यह शिमला के आईएसबीटी से 4 किलोमीटर और समर हिल रेलवे स्टेशन से 1 किलोमीटर की दूरी पर है. इस रिजौर्ट को शिमला की पारंपरिक वास्तुकला को ध्यान में रख कर बनाया गया है ताकि यहां आने वाले पर्यटक शिमला की संस्कृति से रूबरू हो सकें. शिमला हैवेंस के सीईओ संजय शर्मा बताते हैं कि यहां टीवी, वाईफाई व अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं. साथ ही, यहां रेस्तरां भी है जिस में कई तरह के व्यंजन मिलते हैं. खास बात यह है कि इस के सभी कमरों से देवदार व चीड़ के पेड़ों व पहाड़ों का खूबसूरत नजारा दिखता है.

रिजौर्ट में जिम की सुविधा है. रिजौर्ट में कैरेम बोर्ड, टेबल टैनिस, बास्केटबौल, बैडमिंटन जैसे खेल भी खेल सकते हैं. शिमला आएं तो आसपास के स्थानों को देखने के साथसाथ, आप को एडवैंचर का शौक है तो यहां साहसिक खेलों का भी आनंद उठाएं. पर्यटकों के अलावा भी कुछ है. बर्फ पर स्कीइंग करने वालों को जनवरी से मार्च मध्य के बीच यह मौका मिल जाता है. फिश्ंिग व गोल्फ के साथ ही आप यहां ट्रैकिंग का मजा भी ले सकते हैं. शिमला-किन्नौर क्षेत्र में नरकंडा से बंजर और सराहन से सांगला यहां के मशहूर ट्रैक रूट हैं. दोनों ही रूट 3 किलोमीटर की दूरी पर हैं.

कब जाएं

वैसे तो शिमला किसी भी मौसम में घूमने जाया जा सकता है. लेकिन यहां आने का सब से अच्छा समय अप्रैल से जून और अक्तूबर से नवंबर का होता है. अगर आप को बर्फ पर स्कीइंग का शौक है तो जनवरी से मार्च मध्य तक का समय अच्छा है. सर्दी का मौसम स्कीइंग और आइस स्केटिंग का आनंद उठाने के लिए सब से अच्छा होता है जबकि दर्शनीय स्थलों की यात्रा और ट्रैकिंग के लिए गरमी का मौसम आदर्श होता है.

क्या खाएं : शिमला में अधिकांश रेस्तरां माल रोड के साथसाथ हैं. यहां का खाना विशेष हिमाचली नहीं होता, बल्कि इन का स्वाद पंजाबी खाने की तरह होता है. यहां पंजाबी खाने के साथसाथ साउथ इंडियन, चाइनीज, कौंटिनैंटल आदि तरह के व्यंजन मिलते हैं. माल रोड पर कई बेकरियां भी हैं जो फास्ट फूड बेचती हैं जहां पिज्जा, बर्गर व पैटीज उपलब्ध होते हैं. यहां के स्ट्रीट फूड भी लाजवाब होते हैं. यहां आएं तो मशहूर फू्रट चाट व बटरबिस्कुट के साथ चाय जरूर ट्राई करें.

दर्शनीय स्थल

माल रोड : शिमला घूमने जाएं तो माल रोड जाना न भूलें. बौलीवुड की कई फिल्मों में इस जगह को दिखाया गया है. यह रोड शहर के बीच में है. यह शिमला का मुख्य शौपिंग सैंटर है. यहां ब्रिटिश थिएटर भी है जो अब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है. यहां कई अच्छे रेस्तरां, बेकरी और आइसक्रीम पार्लर हैं.

स्कैंडल पौइंट : माल रोड पर सब से ऊंचा पौइंट माना जाने वाला स्थान स्कैंडल पौइंट कहलाता है. यहां से माल रोड का नजारा देखते ही बनता है.

राज्य संग्रहालय : यहां हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति, परिवेश, लोककलाओं, लघु पहाड़ी चित्रों, पुस्तकों, मुगल, राजस्थानी और समकालीन पेंटिंग्स, विभिन्न कांस्य कलाकृतियां, टिकट संग्रह, मानवविज्ञान संबंधित चीजें देखने को मिलती हैं.

रिज : शहर के बीच में एक बड़ा और खुला स्थान है, जिसे रिज कहते हैं. यहां से पर्वत शृंखलाओं का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है. यह शिमला की सभी सांस्कृतिक गतिविधियों का हब है. यह माल रोड के साथ ही है. आसपास के क्षेत्रों में जाने के लिए आप सुबह 7 बजे से 9 बजे के बीच उपलब्ध स्थानीय बस सेवा का उपयोग कर सकते हैं. स्थानीय यात्रा और साइट सीइंग के लिए टैक्सियां भी उपलब्ध हैं. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा टूरिस्ट बसें भी चलाई जाती हैं जिन की बुकिंग माल रोड पर स्थित पर्यटक सूचना केंद्र से होती है.

चैल : शिमला के निकट बसा एक छोटा सा गांव चैल है. इस के चारों ओर घने वन हैं. यहां से हिमाचल की चोटियों पर हिम को देखा जा सकता है. सतलुज नदी के दोनों ओर स्थित कसौली और शिमला से इस की दूरी बराबर है. चैल का सब से आकर्षक क्षेत्र पहाड़ी के ऊपर बना क्रिकेट का मैदान है जिसे विश्व का सब से ऊंचाई वाला स्टेडियम माना जाता है.

कुफरी : यहां की खूबसूरती देखते ही बनती है. यह स्थान शिमला से 16 किलोमीटर दूर 2,510 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां पर कई तरह के बर्फ के खेल खेले जाते हैं. पर्यटकों के लिए यहां स्कीइंग की विशेष व्यवस्था है.

जाखू पहाड़ी : यह शिमला से 2 किलोमीटर दूर है जो 2,455 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां से सूर्योदय का दृश्य अत्यंत खूबसूरत दिखाई देता है.

तत्तापानी : शिमलामनाली मार्ग पर बरास्ता नालदेहरा सड़क पर स्थित तत्तापानी में गरम पानी के झरने हैं, जिन का पानी सल्फर मिश्रित है.

चाडविक फौल्स : शिमला से 7 किलोमीटर दूर 1,586 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह झरना पर्यटकों को खास आकर्षित करता है. अगर आप को पैदल घूमने का शौक है तो समर हिल चौक से लगभग 45 मिनट की पैदल दूरी से यहां पहुंचा जा सकता है. यह हरीभरी झाडि़यों से घिरा एक आकर्षक झरना है. इस झरने की संगीतमय मनमोहक ध्वनि सैलानियों के दिलोदिमाग में ताजगी भर देती है. यहां सैलानी प्रकृति के विभिन्न रूपों से रूबरू होते हैं.

नारकंडा : हिंदुस्तानतिब्बत मार्ग पर स्थित नारकंडा के बर्फ से ढकी पर्वत शृंखला के सुंदर दृश्य देखे जा सकते हैं. देवदार के जंगलों से घिरा ऊपर की ओर जाता मार्ग हाटु चोटी तक जाता है.

नालदेहरा : यह शिमला से 23 किलोमीटर दूर 2,044 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां गोल्फ का मैदान है. अप्रैलमई का महीना इस जगह को देखने के लिए सब से अच्छा समय है. नालदेहरा पिकनिक स्पौट और घुड़सवारी के लिए भी प्रसिद्ध है.

रामपुर : यह शहर सतलुज नदी के किनारे स्थित है. यह एक बड़ा वाणिज्यिक केंद्र है जो प्रतिवर्ष नवंबर में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय लाबी मेले के लिए प्रसिद्ध है.

कसौली : कालकाशिमला मार्ग पर स्थित कसौली काफी खूबसूरत है. कसौली में कई दर्शनीय स्थल हैं जहां प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा देखा जा सकता है. बलूत, चीड़ और घोड़ों के लिए बनी सुरंगों से संपूर्ण क्षेत्र अत्यंत खूबसूरत लगता है.

क्या खरीदें

शिमला घूमने जाएं और वहां से खरीदारी न करें, भला ऐसा कैसे हो सकता है. शिमला में लोअर बाजार, लक्कड़ बाजार और तिब्बतियन बाजार से खरीदारी की जा सकती है. लक्कड़ बाजार में लकड़ी से बने खिलौने पर्यटकों को खूब लुभाते हैं. इस बाजार में लकड़ी की बनी स्थानीय हैंडीक्राफ्ट की कई चीजें सस्ते दामों पर मिलती हैं. यहां लकड़ी के टेबल व बौक्स, हैंडीक्राफ्ट ज्वैलरी के अलावा ऊनी कपड़े व शौल भी अच्छी क्वालिटी के मिलते हैं. इन बाजारों से आप हिमाचली टोपी भी याद के तौर पर खरीद सकते हैं. यहां के बाजारों में खरीदारी करते समय मोलभाव करना न भूलें.

वैज्ञानिकों को चुनौती देता दुबई का मौसम

तकरीबन 10 वर्षों के अंतराल में मुझे एक बार फिर दुबई जाने का मौका मिला. हमारा हवाई जहाज ‘फ्लाई दुबई’ दुबई एअरपोर्ट की ओर बढ़ रहा था. दुबई के समयानुसार सुबह के 8 बज रहे थे. हवाई जहाज की खिड़की से देखने पर समुद्र के कोने से सूर्य अपनी रोशनी से आसमान और धरती पर एकछत्र राज जमाने के लिए धीरेधीरे निकल रहा था. अरेबियन और परशियन समुद्र के किनारे बसे दुबई की मटमैले भूरे रंग की इमारतें (अरब देशों में सभी इमारतों का रंग मटमैला भूरा या इस से मिलताजुलता रखना सरकारी आदेश के अनुसार अनिवार्य है तथा इन देशों में इमारतों पर रंगबिरंगे चटकीले रंग किए जाने की मान्यता नहीं है) भूरे ही रंग के रेगिस्तान को मुंह चिढ़ाती हुई स्पष्ट होती जा रही थीं. आसमान से दिखाई दे रहे छोटेछोटे चौकोर घेरों में से झांकती ये इमारतें ऐसी लग रही थीं जैसे बच्चों ने रेत पर अपने खेलने के लिए नन्हेंनन्हें घर बना दिए हों, जिन के आसपास छोटीछोटी सड़कों पर वे अपनी खिलौनागाडि़यों को सरपट दौड़ा कर आनंदित हो रहे हों. और फिर देखते ही देखते हमारा हवाई जहाज दुबई एअरपोर्ट पर लैंड कर गया.

एअरपोर्ट से अपना सामान इत्यादि ले कर बाहर निकलते ही और घर तक यानी पूरे रास्तेभर पिछले लगभग 10 वर्षों में हुए दुबई में प्रगति के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे. दुबई, रेगिस्तान की बंजर जमीन पर बसा एक सुव्यवस्थित और चमचमाता शहर है. उस की इसी चकाचौंध प्रगति ने विश्व के कोनेकोने से लोगों को अपने यहां रोजगार के नए से नए अवसर प्रदान कर उन्हें इस भीषण गरमी वाले शहर में आने के लिए मजबूर किया है, खासकर भारतीयों को. दुबई, मिनी इंडिया के नाम से भी जाना जाता है. इस का प्रमाण इस बात से स्पष्ट मिलता है कि यहां लगभग सभी हिंदी भाषा बोलते मिल जाएंगे, यहां तक कि स्थानीय लोग भी भारतीयों के साथ रह कर हिंदी सीख जाते है और वे हिंदी भाषा समझते व बोलते भी हैं. यहां बसे भारत के केरल राज्य के लोगों की संख्या को देख कर तो ऐसा लगता है मानो पूरे के पूरे केरल राज्य के लोग यहां आ कर बस गए हैं.

बड़ी संख्या में आ कर बसने वाले बाहरी लोगों के कारण दिनप्रतिदिन पैदा होती जा रही यातायात की समस्या से निबटने के लिए यहां की सरकार ने फ्लाईओवर, मैट्रो और ट्राम जैसी सुविधाएं अपना कर दुबई को एक नए रूप से संवारा है. दुबई मैट्रो को बनाने में तो भारतीय इंजीनियरों ने योगदान भी दिया है. इस के अलावा शेख जायदा रोड पर बसे ‘डाऊन टाउन दुबई’ जो पिछले 10 वर्षों से बनी गगनचुंबी इमारतों ने पुराने बसे ‘बर दुबई’ और ‘डेरा’ जैसे स्थानों के मध्य, नए व पुराने दुबई की रेखा ही खींच दी है. ‘डाऊन टाऊन दुबई’ में विश्व की सब से ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा, जिस की ऊंचाई 828 मीटर है, विश्व के लोगों के लिए मुख्य आकर्षण केंद्र है. इस ऊंची गगनचुंबी इमारत को भीतर से देखने के लिए 200 से 400 दिरहम, मौसम के अनुसार यहां आने वाले पर्यटकों की भीड़ को देखते हुए, प्रति व्यक्ति टिकट से प्रवेश मिलता है. दिरहम यहां की करैंसी है. भारतीय रुपए की तुलना में यह टिकट क्रमश: 3,400 रुपए से 6,800 रुपए के बराबर होता है.

 ऐसा माना जाता है कि आजकल दुबई सिंगापुर से भी बड़ा बिजनैस सैंटर बन चुका है. यहां कई विश्वप्रसिद्ध मौल हैं जिन में ‘दुबई मौल’ विश्व का सब से बड़ा मौल है. इस के अलावा चाइना मौल, मौल औफ एमिरेट्स, अल गुरैर, सिटी सैंटर जैसे कई प्रसिद्ध मौल हैं.

ग्लोबल वार्मिंग की मार

दुबई आने वाले हर व्यक्ति को यहां की प्रगति चारों ओर नजर आती है. लेकिन साथ ही एक सब से महत्त्वपूर्ण बात जो देखने को मिलती है वह है यहां का मौसम, जो विश्व के पर्यावरण वैज्ञानिकों को खुली चुनौती देता नजर आता है. जहां एक ओर विश्व के पर्यावरण वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए तरहतरह के तरीके अपनाते हुए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं वहीं दुबई और उस के संलग्न एमिरेट्स के मौसम में अभूतपूर्व बदलाव आ चुका है, जिस का मुख्य श्रेय यहां चारों ओर तेजी से उगाए जा रहे पेड़पौधों को जाता है.

वर्ष 1991-92 में जब मुझे पहली बार दुबई आने का मौका मिला था तब यहां कहींकहीं खजूर के पेड़ लगे दिखाई देते थे. तब यहां वर्षा की एक बूंद भी नहीं बरसती थी. जिस का ज्वलंत उदाहरण सड़कों के किनारों पर वर्षा के पानी के निकास के लिए नालियों का कभी न रखा जाना है. यहां बादल आते तो थे लेकिन वे इन इलाकों को मुंह चिढ़ाते यों ही बिना बरसे उड़ जाते थे. नतीजा वर्षभर यहां लोग भयंकर गरमी से त्रस्त रहते थे और अपने को वातानुकूलित घरों, दफ्तरों, दुकानों, गाडि़यों में बंद रखने के लिए मजबूर होते थे. दिनरात भयंकर गरमी और गरम हवाओं का यहां साम्राज्य रहता था पर अब काले बादल जब भी आते हैं तो वे यहां बरसने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जिस का नतीजा यह होता है कि यहां सड़कें लबालब पानी से भर जाती हैं. वर्षा के जल निकास का प्रबंधन न होने से सरकार को पंप लगा कर इस समस्या का निबटारा करना पड़ता है.

दुबई में अब सितंबर से मार्च तक के मौसम में अत्यधिक बदलाव देखने को मिलता है. इन महीनों में सुबह व शाम का मौसम तो इतना सुहावना हो जाता है कि छुट्टी वाले दिन लोग पार्को में, समुद्र के किनारे बनाए गए कृत्रिम बीचेज पर और खुले रैस्टोरेंट्स में बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं. दिसंबरजनवरी में तो लोग यहां गुलाबी ठंड का भी आनंद उठाते हैं. अप्रैल से अगस्त तक अब गरमी का मौसम रहता है जिस में तापमान 50 डिगरी तक पहुंच कर अपना कहर अब भी बरपाता है.

पेड़पौधे लगाने पर जोर

नए बसाए जा रहे दुबई में हमें हर तरह के पेड़पौधे लगे देखने को मिले. नीम और पीपल जैसे वृक्षों के साथसाथ फूलों में बोगेनबेलिया, सदाबहार, मधुमालनी, गेंदा, चमेली, कनैर इत्यादि बहुत से जानेपहचाने पौधों को यहां की जलवायु में फलतेफूलते देख कर हैरानी होती है. सड़कों के किनारे बिल्ंिडग के आसपास घनेघने ऊंचेऊंचे वृक्ष घने जंगलों जैसा आभास कराते हैं.

रेगिस्तान में जहां भयंकर गरमी पड़ती है और पानी की बेहद कमी होती है वहां इन पेड़पौधों को जीवित रखना भी बहुत बड़ी चुनौती होती है. इस बात की तहकीकात करने पर  हम ने पाया कि पौधों की सिंचाई के लिए सीवर के पानी और समुद्र के पानी (दुबई समुद्र के किनारे बसा होने के कारण) को साफ कर उपयोग में लाया जाता है. पेड़पौधों को उचित खाद दिए जाने के साथसाथ पूरे वर्षभर दिन में 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) नियमित पानी दिया जाता है. इस में बिलकुल भी ढिलाई नहीं दी जाती है. पौधों की सिंचाई करने का ड्रिप इरीगेशन का वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है. इस तकनीक में हर पेड़पौधे के पास प्लास्टिक की बनी पानी की पाइपें बिछा दी जाती हैं जिन में थोड़ीथोड़ी दूरी पर छेद होते हैं जिन में वौल्व लगे होते हैं जो पानी की मात्रा को रैगुलेट भी करते हैं. इन पाइपों में समयानुसार पौधों को सींचने के लिए पानी छोड़ा जाता है. फूलों के छोटे पौधों के साथसाथ बड़ेबड़े वृक्षों की पत्तियों को भी धोया जाता है. पौधों के बीच फौआरे लगा कर सुंदरता बढ़ाने के साथ आसपास के तापमान को संतुलित भी किया जाता है.

नए भवनों का निर्माण करने से पहले सरकारी आदेश के अनुसार इलाके को पहले ही पेड़पौधे लगा कर हराभरा बनाना अनिवार्य है. समुद्र के भीतर पाम जुमैरा जैसी सिटी बनाने का अद्भुत कार्य भी यहां देखने को मिलता है. इस नगर को पाम वृक्ष की पत्तियों जैसा रूप दिया गया है जिस में दोनों ओर 8-8 पत्तियों जैसा कटाव बना कर उसे बीच सड़क से जोड़ कर आकार दिया गया है और इस कटाव के साथसाथ समुद्र के पानी को नगर के भीतर तक लाया गया है, और इसी पानी का उपयोग कर यहां पेड़पौधे उगा कर खूब हरियाली की गई है. ऐसी खूबसूरत जगह में भारत की नामीगिरामी हस्तियों ने भी बंगले खरीदे हुए हैं. दुबई में दुबई वाटर कैनाल प्रोजैक्ट पर इन दिनों बड़े जोरशोर से कार्य चल रहा है, जिस के अंतर्गत समुद्र के पानी को शहर के भीतर तक ला कर पेड़पौधे उगा कर उसे हराभरा व खूबसूरत बनाया जाएगा.

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