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PF के ब्याज पर वित्त-श्रम मंत्रालय आमने-सामने

कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) जमाओं के ब्याज दर को लेकर वित्त और श्रम मंत्रालयों के बीच लड़ाई छिड़ती नजर आ रही है. वित्त मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2015-16 के लिए इन जमाओं पर 8.7 प्रतिशत ब्याज देने का फैसला किया है जबकि ईपीएफओ ने 8.8 प्रतिशत की सिफारिश की थी. 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित भारतीय मजदूर संघ सहित अन्य श्रमिक संगठनों ने ब्याज दर में इस कटौती की आलोचना की है. वहीं श्रम मंत्रालय इस बारे में वित्त मंत्रालय के फैसले की समीक्षा करवाने की योजना बना रहा है.

सीबीटी का प्रस्ताव था अलग

श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में कहा,‘ईपीएफओ के निर्णय लेने वाले शीर्ष निकाय सीबीटी की फरवरी, 2016 में हुई बैठक में 2015-16 के लिए केंद्रीय भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के 5 करोड़ से अधिक अंशधारकों के लिए 8.8 प्रतिशत की अंतरिम दर से ब्याज दिए जाने का प्रस्ताव रखा था. हालांकि, वित्त मंत्रालय ने 8.7 प्रतिशत की ब्याज दर मंजूर की है.’ दत्तात्रेय सहित श्रम मंत्रालय के आला अफसरों ने इस मुद्दे पर दो घंटे से भी अधिक समय तक विचार विमर्श किया.

श्रम मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि मंत्रालय, वित्त मंत्रालय के फैसले की समीक्षा चाहेगा क्योंकि ईपीएफओ के पास 2015-16 के लिए ऊंचा रिटर्न देने के लिए पर्याप्त आय है. संभवत: यह पहला अवसर है जब वित्त मंत्रालय ने ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) के फैसले को दरकिनार करते हुए अंशधारकों को देय ब्याज में कमी की है. यानी उसने श्रम मंत्री की अध्यक्षता वाले सीबीटी की सिफारिश को नहीं माना है.

यह ईपीएफओ की स्वायत्ता में हस्तक्षेप

वहीं श्रमिक संगठनों की लगभग एक राय है कि वित्त मंत्रालय का उक्त फैसला कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईएफओ) की स्वायत्ता में हस्तक्षेप है. भारतीय मजदूर संघ के महासचिव वृजेश उपाध्याय ने कहा, बीएमएस कर्मचारी भविष्य निधि ब्याज दरों में कटौती की पुरजोर आलोचना करता है और 27 अप्रैल को ईपीएफओ कार्यालयों पर प्रदर्शन करेगा.

उन्होंने यह भी कहा कि कोष का प्रबंधन केंद्रीय न्यासी बोर्ड(सीबीटी)करता है, जो एक स्वतंत्र तथा स्वायत्त निकाय है. उन्होंने कहा कि वित्त मंत्रालय का कोष के कामकाज से कुछ भी लेना-देना नहीं है, क्योंकि न तो उसका वित्त पोषण करता है और न ही उसका प्रबंधन.

 

खूबियों से भरपूर सोलर सिस्टम स्प्रे मशीन

सरकार व वैज्ञानिक किसानों की खुशहाली के लिए मशीनों से खेती करने की बात करते हैं. मगर छोटी या मध्यम जोत के किसान यदि मशीनी खेती करना भी चाहें, तो ज्यादातर मशीनों के बिजली या ईंधन चालित होने की वजह से लागत बढ़ जाती है. इतना सब होने के बावजूद अगर मशीन बिजली चालित है, तो ग्रामीण इलाकों में बिजली की कटौती एक बड़ी समस्या बन कर उभरती है. ऐसे में किसानों द्वारा सूर्य की रोशनी से चलने वाले कृषि यंत्रों को अपनाना बेहतर साबित होगा. इस से न सिर्फ बिजली या ईंधन पर आने वाली लागत शून्य होगी, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा. हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित एक फर्म ने सूरज की रोशनी से चलने वाली एक स्प्रे पंप मशीन ईजाद की है, जो बिक्री के लिए बाजार में आ चुकी है. फर्म ने इसे ‘धूप सोलर स्प्रे पंप 999’ के नाम से बाजार में उतारा है. यह मशीन इनबिल्ट बैटरी से लैस होने के कारण डीसी पावर से चलती है और जरूरत पड़ने पर छोटे इन्वर्टर के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है.

खूबियां : फर्म के दावों के मुताबिक इस सोलर सिस्टम स्प्रे मशीन की निम्न खूबियां हैं:

* खेतों व बागों में पोशक तत्त्वों व दवाओं के छिड़काव के लिए ज्यादातर किराए पर मशीन ली जाती है या बिजली और ईंधन द्वारा चालित मशीनें इस्तेमाल होती हैं, जिन पर काफी लागत आती है. यह सोलर सिस्टम स्प्रे पंप मशीन पूरी तरह से सूरज की रोशनी से चलती है. लिहाजा शुरुआती लागत के बाद कोई खर्च नहीं होता है.

* इसे किसान पीठ पर लाद कर या किसी जगह रख कर इस्तेमाल कर सकते हैं.

* एकसाथ 2 फव्वारा प्रेशर की कूवत.

* 100 पीएसआई की प्रेशर मोटर.

* 16 लीटर स्प्रेयर पंप का टैंक.

* उच्च गुणवत्ता वाला स्प्रे पाइप.

* उच्च गुणवत्ता का बैटरी बैकअप सिस्टम.

* पंप सेट का कुल वजन 7 किलोग्राम से कम.

* अच्छी गुणवत्ता वाली सिलिकान सोलर प्लेट.

* रात में छिड़काव के लिए लेड लाइट का इंतजाम.

* मशीन में मोबाइल चार्जिंग की भी सुविधा.

* बैटरी चार्जिंग सुविधा होने के कारण छिड़काव के साथसाथ चार्जिंग होने और 1 बार चार्ज कर लेने पर दिन भर छिड़काव करने की सुविधा.

* सौ फीसदी ईंधन या बिजली की बचत.

कीमत : बाजार में इस की कीमत 6 हजार रुपए है. सोलर प्लेट और पंप की कुछ सालों की गारंटी भी है.

मौजूदगी : कंपनी के लखन पाटीहार का दावा है कि यह मशीन मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात व राजस्थान सूबों के खास शहरों में भी मिलती है.

ज्यादा जानकारी के लिए कंपनी के मोबाइल नंबरों 07316999950, 09165416309 व 09009354050 पर संपर्क किया जा सकता है.

कंपनी के दफ्तर का पता है : 7, पटेल विहार कालोनी, कनाडिया रोड, बंगाली चौराहा, इंदौर, मध्य प्रदेश.

खेती जगत से जुड़े अप्रैल के जरूरी काम

गरमी से भरपूर अप्रैल का महीना भी खेतीकिसानी के लिहाज से अन्य महीनों की तरह ही खास होता है. अप्रैलफूल से शुरू होने वाले इस महीने के मूर्ख बनाने वाले मकसद में ज्यादा किसानों की दिलचस्पी नहीं होती, मगर इस महीने का बैसाखी का त्योहार उन के लिए खास होता है. वैसे भी कुछ ही अरसा पहले आई होली को भी वे इतनी जल्दी नहीं भूलते और उसी नशे में अपने कामों में जुटे रहते हैं. जश्न और मौजमजे से हट कर अप्रैल में रबी की तमाम फसलों की कटाई चालू हो जाती है और जायद की फसलें खेतों में शबाब पर पहुंच रही होती हैं. पेश है एक ब्योरा अप्रैल के दौरान होने वाले खेती से जुड़े खासखास कामों का :

* शुरुआत रोटी की फसल यानी गेहूं से करें तो अप्रैल तक गेहूं की फसल पक कर तैयार हो चुकी होती है. ऐसे में अप्रैल में गेहूं की कटाई का काम ही सब से ज्यादा जरूरी माना जा सकता है. गेहूं की कटाई खत्म करने के बाद जो सुकून किसानों को मिलता है, वह अनोखा होता है.

* बात गेहूं की कटाई पर ही नहीं थम जाती. गेहूं की फसल को बाकायदा सुखा कर उस की गहाई करना भी बेहद अहम होता है.

* आमतौर पर अपने गेहूं को किसान जल्दी से जल्दी बेच कर पैसे खड़े करने में यकीन करते हैं. सरकार भी बड़े पैमाने पर गेहूं की खरीद करती है. मगर दाम कम होने या किसी दूसरी वजह से गेहूं को फौरन न बेच कर उस का भंडारण करना पड़े तो उस के लिए नवीनतम तकनीक को अपनाना चाहिए.

* एक जमाने में भले ही चने की इज्जत नहीं थी और उसे नौकरचाकरों व गरीबों का अन्न माना जाता था, मगर अब चने के दिन फिर चुके हैं और उस की हैसियत किसी सुपर स्टार अनाज जैसी है. यह स्टार अनाज भी अप्रैल तक पक कर कटाई के लिए तैयार हो जाता है, लिहाजा इस की कटाई भी फटाफट निबटा लेनी चाहिए. आजकल कमाई के लिहाज से चने की फसल का गेहूं से कहीं ज्यादा रुतबा है.

*  चने की समय से बोई गई फसल तो अप्रैल में कटाई लायक हो जाती है, पर देरी से बोई गई फसल काटने लायक होने में कुछ और वक्त लगता है. अप्रैल के आसपास इस में दाने तो पड़ने लगते हैं, मगर कटाई की नौबत अगले महीने तक आती है.

* चने की देरी से बोई जाने वाली फसल की कटाई तो देरी से ही होगी, लेकिन इस की देखभाल में कोताही न बरतें. इस दौरान इस में फलीछेदक कीट के हमले का डर रहता है. अगर ऐसा अंदेशा लगे तो कृषि वैज्ञानिकों से राय ले कर मुनासिब दवा का इस्तेमाल करें.

* वैसे तो आजकल मौसम का कोई दीनईमान नहीं रह गया है यानी कभी भी जाड़ा, गरमी या बरसात का नजारा देखने को मिल सकता है, लेकिन मोटे तौर पर अप्रैल में बारिश नहीं होती है. अकसर अप्रैल के दौरान खेत सूखने लगते हैं, ऐसी हालत में गन्ने के खेतों में सिंचाई करते रहना चाहिए.

* सिंचाई के अलावा अपने गन्ने के खेत में सही तरीके से निराईगुड़ाई करें और खरपतवारों के प्रति सजग रहें, क्योंकि खरपतवार गन्ने की खुराक में हिस्सा बंटा लेते हैं.

* गन्ने के खेत की निराईगुड़ाई से पहले खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद व कंपोस्ट खाद डालें. केंचुआ खाद का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. खाद डालने के बाद कायदे से निराईगुड़ाई करने से तमाम किस्म की खादें खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाती हैं. इस से मिट्टी की पानी सोखने की कूवत में खासा इजाफा होता है. नतीजतन गन्ने ज्यादा बेहतर और रसीले होते हैं और उपज में भी इजाफा होता है.

* अप्रैल के दौरान ही बैसाखी की मूंग बोने का भी माकूल समय होता है. बोआई का यह काम मध्य अप्रैल तक निबटा लेना मुनासिब होता है.

* पिछले महीने बोई गई मूंग की भी खोजखबर लेते रहना चाहिए. आमतौर पर इस दौरान इसे सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है. अगर मूंग के खेत सूखे होते नजर आएं तो बगैर वक्त बरबाद किए सिंचाई करें.

* गेहूंचना, दालचावल वगैरह इनसानों के लिए जरूरी होते हैं, तो जानवरों यानी मवेशियों को भी हमेशा चारे की दरकार रहती है. मवेशियों के चारे के लिए अप्रैल में बाजरा, मक्का व लोबिया वगैरह की बोआई की जा सकती है.

* 2 महीने पहले बोई गई चारे की फसलों को नाइट्रोजन की खुराक मुहैया कराएं. इस के लिए खेत में यूरिया खाद का इस्तेमाल करें और खेत में नमी बराबर बरकरार रखें.

* सूरजमुखी की फसल में अप्रैल तक फूल आने लगते हैं. इस दौरान खेत की निराईगुड़ाई करना बेहद जरूरी होता है. निराईगुड़ाई करने से फूलों की तादाद व क्वालिटी पर काफी असर पड़ता है.

* सूरजमुखी के खेत अगर सूख रहे हों, तो फौरन सिंचाई करें. पौधों की बढ़वार में कोई कसर नजर आए, तो यूरिया खाद का छिड़काव करें.

* अप्रैल के पहले हफ्ते के दौरान तुरई की नर्सरी डालें, ताकि सही वक्त पर पौध तैयार हो सकें. पिछले महीनों के दौरान डाली गई नर्सरी की पौध तैयार हो चुकी होगी, लिहाजा रोपाई का काम निबटाएं. रोपाई 50×100 सेंटीमीटर के फासले पर करें. रोपाई के बाद हलकी सिंचाई जरूर करें.

* अप्रैल में अरवी की अगेती किस्मों की बोआई का काम निबटा दें, ताकि समय पर फसल हाथ आ सके.

* अप्रैल में फूलगोभी की बीज वाली फसल कटाई लायक हो जाती है, लिहाजा इस की कटाई का काम खत्म करें. काटने के बाद फसल को सुखा कर बीज निकालें. बीजों को बाकायदा पैक कर के उन का भंडारण करें.

* साल की शुरुआत में नर्सरी में तैयार किए गए लौकी व करेले के पौधों की रोपाई करें. लौकी के पौधों की रोपाई 2×1 मीटर दूरी पर और करेले के पौधों की रोपाई 150×60 सेंटीमीटर के फासले पर करें.

* पिछले महीने रोपी गई बैगन की क्यारियों में निराईगुड़ाई करें. नमी कम लगे तो सिंचाई भी जरूर करें. बेहतर फसल के लिए यूरिया खाद का इस्तेमाल करें.

* अप्रैल तक गाजर व मूली की बीज वाली फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है, लिहाजा उस की कटाई करें. फिर फसल को सुखा कर बीज निकालें. बीजों को सही तरीके से सुखा कर पैक करें और फिर भंडारण करें.

* शिमला मिर्च के खेतों में निराईगुड़ाई कर के जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें. नाइट्रोजन की कमी दूर करने के लिए यूरिया खाद का इस्तेमाल करें. इस से फसल उम्दा होगी.

* इसी महीने अदरक की बोआई का काम भी निबटाएं. बोआई के लिए करीब 20 ग्राम वजन के कंदों का इस्तेमाल करें. अदरक की बोआई 30-40 सेंटीमीटर की दूरी पर मेड़ें बना कर करें. 2 कंदों के बीच करीब 20 सेंटीमीटर का फासला रखें.

* अप्रैल के दौरान ही लहसुन की फसल की खुदाई का काम भी निबटाएं. खोदने के बाद फसल को 3 दिनों के लिए खेत में ही छोड़ दें. चौथे दिन फसल को छायादार जगह पर रखें और ठीक से सुखाएं. पूरी तरह सूखने के बाद ही लहसुन का भंडारण करें.

* आमखोर लोग अप्रैल से ही आमों की बाट जोहने लगते हैं. अपने आम के बागों की सिंचाई करें, ताकि नमी कायम रहे. पेड़ों पर बीमारियों या कीड़ों के लक्षण दिखाई दें तो फौरन कृषि वैज्ञानिक की राय से बचाव का इंतजाम करें.

* अपने अमरूद के बागों  की भी सफाई करें और जरूरत के हिसाब  से निराईगुड़ाई व सिंचाई करें. कीटबीमारियों के हमले नजर आएं तो उन का भी इलाज करें.

* ठंड का दौर थमने से मवेशियों को बेहद राहत मिलती है, मगर उन के प्रति लापरवाही न बरतें. कोई भी मौसम पशुओं को अपनी चपेट में ले सकता है, लिहाजा मौका निकाल कर माहिर डाक्टर से अपने मवेशियों की जांच कराएं.

* पशुओं का डाक्टर कोई दवा वगैरह बताए, तो उस के इस्तेमाल में लापरवाही न बरतें. पशुओं को जरूरी टीके वगैरह लगवाने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

* भारीभरकम मवेशियों के साथसाथ छोटेमोटे मुरगामुरगी व चूजों का भी पूरा खयाल रखना लाजिम है, लिहाजा पशुओं के डाक्टर से उन की भी जांच कराएं.

कम लागत में फलों व सब्जियों का रखरखाव

खाने में शमिल पोषक कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज इनसानों के विकास के लिए बहुत जरूरी?हैं.

ये शरीर के ऊतकों की देखभाल व मरम्मत, जीवन प्रक्रिया को बनाए रखने और शरीर को ताकत देने के लिए जरूरी हैं. लिहाजा अच्छी सेहत के लिए हमारे खाने में इन का होना बहुत जरूरी है. ताजे फलों व सब्जियों को रक्षा करने वाला खाना माना गया है. सब्जियां और फल हमारे शरीर में विटामिनों व खनिज तत्त्वों की कमी पूरी करते?हैं. तोड़ने के बाद भी फल व सब्जियां जीवित रहते हैं और उन में सांस लेने की क्रिया होती रहती है. रासायनिक कारणों से फल व सब्जियों में सड़नगलन हो सकती?है. इसलिए इन्हें खराब होने से बचाने के लिए सावधानी से तोड़ना व संभाल कर रखना जरूरी?है. तोड़ाई के समय ध्यान रखना चाहिए कि फल और सब्जी को किसी प्रकार का नुकसान न होने पाए.

तोड़ाई व कटाई के बाद से इस्तेमाल में लाने तक हर साल तकरीबन 25-40 फीसदी तक फलों व सब्जियों का नुकसान हो जाता है. लिहाजा सब्जियों और फलों की कीमत बढ़ जाती?है, जिस का असर खरीदार पर पड़ता है. मौसम में कई सब्जियां और फल काफी मात्रा में पैदा होते?हैं, जिस से किसानों को मजबूरन उन्हें सस्ता बेचना पड़ता है, क्योंकि उन के पास उन्हें रखने के सही साधन नहीं होते.

मौसम की सस्ती सब्जियों व फलों और घर के बगीचे के ताजे फलों व सब्जियों को तमाम उपायों द्वारा सुरक्षित रखा जा सकता है. ये उपाय हैं डब्बाबंदी, बर्फ में जमा कर रखना, पानी निकालना, मशीनों द्वारा सुखाना, ठंडे गोदामों में रखना वगैरह. लेकिन ये सब उपाय महंगे पड़ते हैं. लिहाजा जरूरत इस बात की है कि फलों व सब्जियों का रखरखाव करने के लिए आसान व सस्ते तरीके अपनाए जाएं. फलों व सब्जियों को रासायनिक घोल में रखना, रसायनों द्वारा देखभाल, धूप में सुखाना, अचार, चटनी, जैम, रस व शर्बत बनाना, फर्मेंटेशन आदि रखरखाव के सब से सरल और सस्ते तरीके हैं, जिन से फलों और सब्जियों को कुछ समय तक टिकाऊ बनाया जा सकता है. इन उपायों द्वारा रखरखाव के फायदे निम्नलिखित हैं:

* इस से सब्जियों व फलों के पौष्टिक तत्त्वों को नुकसान से बचाया जा सकता?है.

* सरल व सस्ते तरीकों से रखरखाव करने से किसानों को मौसम के दौरान अपने उत्पादों को सस्ता नहीं बेचना पड़ेगा.

* रखरखाव लागत कम आने से ग्राहक को भी सस्ते दामों पर सब्जी व फल मुहैया होंगे.

* मौसम की सब्जियों व फलों को साधारण रखरखाव द्वारा स्टोर कर के मौसम न होने पर भी इस्तेमाल किया जा सकता?है.

सब्जियों और फलों का रासायनिक रखरखाव

सब्जियों और फलों की देखभाल करने के लिए तमाम खाद्य रसायनों और रासायनिक घोलों का इस्तेमाल किया जाता?है. साधारण रसायन जैसे नमक, ग्लेशियल ऐसेटिक एसिड, पोटेशियम मेटाबाइसल्फाइट और सोडियम बेंजोएट आसानी से बाजार में मिल जाते?हैं और महंगे भी नहीं होते हैं. इन का प्रयोग फलों और सब्जियों की देखभाल करने के लिए किया जाता है. सब्जियों और फलों को कांच या चीनीमिट्टी के जार में सुरक्षित रखा जा सकता?है.

रासायनिक घोल द्वारा रखरखाव के लाभ

* यह विधि बहुत सरल व सस्ती है.

* इस तरीके से डब्बाबंदी या बोतलबंदी करने से सब्जियां व फल गलते व सड़ते नहीं हैं,?क्योंकि डब्बाबंदी व बोतलबंदी में ज्यादा तापमान दे कर रखे गए पदार्थों को जीवाणुरहित किया जाता है. इस से कभीकभी उन के रंगरूप में थोड़ा बदलाव हो जाता?है.

* इस विधि में मटर वगैरह को सुरक्षित रखने के लिए बनावटी रंग डालने की जरूरत नहीं पड़ती, जबकि डब्बाबंदी के लिए मटर में हरा रंग डाला जाता?है.

* सल्फर डाईआक्साइड (जो पोटेशियम मेटाइबाइसल्फाइट से मिलती है) सब्जियों के विटामिनों और अन्य पौष्टिक तत्त्वों को सुरक्षित रखने में सहायता करती है.

* रासायनिक घोल द्वारा सब्जियों को तकरीबन 6 महीने तक सुरक्षित रख सकते?हैं. कम तापमान (1.3 डिगरी सेंटीग्रेड) पर फलसब्जियां 1 साल से भी ज्यादा समय तक सुरक्षित रह सकती?हैं.

इस प्रकार इस विधि द्वारा मौसम न होने पर भी जब भी चाहें फल या सब्जी का स्वाद ले सकते?हैं.

सब्जियों और फलों का किण्वन द्वारा रखरखाव

किण्वन विधि से भी सब्जियों को काफी समय तक सुरक्षित रख सकते?हैं. इस विधि से न केवल सब्जियों को नष्ट होने से बचा सकते?हैं, बल्कि इस से उन के पौष्टिक और खनिज तत्त्व भी नष्ट नहीं होते हैं.

किण्वन के दौरान सब्जियों में लैक्टिक अम्ल बनाने वाले जीवाणुओं द्वारा सब्जियों की प्राकृतिक शक्कर लैक्टिक अम्ल में बदल जाती?है. यह लैक्टिक अम्ल सब्जियों की सुरक्षा करने में सहायक होता है.

किण्वन के लिए सब्जियों का चुनाव करते समय यह ध्यान रखें कि सब्जियां ताजी हों और सड़ीगली व ज्यादा पकी हुई न हों. सब से पहले सब्जियों को साफ पानी से धो लें. काटने के लिए केवल स्टील के चाकू का ही इस्तेमाल करें.

पत्तागोभी के बाहर के पत्ते व अंदर का डंठल हटा कर बारीक काट लें. मटर को छील कर दाने निकाल लें. मूली, गाजर, शलजम को छील कर छोटेछोटे टुकड़ों में काट लें. फूलगोभी, अधपके टमाटर और सेम को भी छोटेछोटे टुकड़ों में काट लें. फलों में अधपके पपीते का किण्वन किया जा सकता?है. किण्वन के लिए 2-3 फीसदी नमक और 1.0 से 1.5 फीसदी राई का प्रयोग किया जाता है.

चूंकि पत्तागोभी, मूली व गाजर में किण्वन करने वाले जीवाणु अधिक संख्या में पाए जाते?हैं, इसलिए ये सब किण्वीकरण के लिए ज्यादा उपयोगी?हैं. इन में से पत्तागोभी सब से बढि़या है. लिहाजा अन्य सब्जियों, अधपके पपीतों व टमाटरों को पत्तागोभी के साथ किण्वित किया जा सकता है. अन्य सब्जियों को पत्तागोभी के साथ किण्वित करने के लिए इन की मात्रा पत्तागोभी के बराबर या कम होनी चाहिए. उपरोक्त सामग्री को अच्छी प्रकार मिला कर कांच के जार में गरदन तक भर दें. जार में सब्जियां भरने से पहले जार को अच्छी तरह धो कर सुखा लें व पोंछ लें. रोज एक बार जार को अच्छी तरह हिलाते रहना चाहिए ताकि सब्जियों का किण्वन ठीक प्रकार से हो सके और वे खराब न हों. किण्वित पदार्थों को?छायादार स्थान पर रखें. जहां तक हो सके इन्हें कम तापमान वाले?ठंडे स्थान पर रखें. किण्वित पदार्थ डेढ़ से 2 महीने तक सामान्य तापमान पर बिना किसी रसायन के रखे जा सकते?हैं. कम तापमान पर (4 से 5 डिगरी सेंटीगे्रड) इन को 4-5 महीनों तक रख सकते?हैं.

फलों के गूदे व रस का रखरखाव

सब्जियों की तरह फल भी हमारे दैनिक संतुलित आहार का आवश्यक अंग हैं. ये हमारे खाने में विटामिनों व खनिज लवणों की कमी पूरी करते?हैं. फल हमारी पाचनशक्ति ठीक रखते हैं और भूख बढ़ाते हैं. मौसमी फलों का रखरखाव कई प्रकार से किया जा सकता है. सब से सरल व सस्ता तरीका है, उन के गूदे व रस को रसायनों के इस्तेमाल द्वारा सुरक्षित रखना ताकि जब भी चाहें इन का इस्तेमाल तरहतरह के ठंडे पेय जैसे जूस, स्क्वैश, शर्बत आदि बनाने में किया जा सके. इस से जैम और चटनी भी तैयार की जा सकती?है.       

रखरखाव (परिरक्षण) के निम्नलिखित लाभ हैं

* मौसमी फलों के गूदे व रस को स्टोर करना ज्यादा उपयोगी है,?क्योंकि 1 बोतल गूदे या रस से 3 बोतल स्क्वैश बनाया जा सकता?है. इस तरह से बोतलें भी कम खर्च होंगी और स्टोर करने के लिए जगह भी कम लगेगी.

* रासायनिक विधि द्वारा परिरक्षित करने से लागत भी कम आती?है (25-30 पैसे प्रति किलोग्राम) और फलों के गूदे व रस का रंग, स्वाद व पौष्टिकता भी बनी रहती?है.

* ताजे फल तोड़ने के बाद जल्दी ही खराब हो जाते?हैं. इसलिए इस विधि से इन्हें गूदे व रस के रूप में टिकाऊ बना कर नष्ट होने से बचा सकते?हैं. इच्छानुसार या आवश्यकता पड़ने पर इन का इस्तेमाल स्क्वैश, शर्बत, जैम, चटनी आदि बनाने में कर सकते हैं. इस प्रकार हम पूरे साल विभिन्न फलों के स्वाद का आनंद उठा सकते हैं.

अचार व चटनी को टिकाऊ बनाने के तरीके

भारतीय भोजन में अचार व चटनी का विशेष स्थान है. देश के अलगअलग भागों में अचार व चटनी बनाने के अलगअलग तरीके हैं. फलों जैसे आम, नीबू, कटहल व करौंदा और सब्जियों जैसे गाजर,  फूलगोभी, शलजम, टमाटर व मिर्च आदि में नमक, मिर्च, चीनी, मसाले व तेल आदि डाल कर अचार व चटनी बनाई जा सकती?है. अमूमन सभी घरों में अचार व चटनी बनाए जाते हैं, लेकिन कई बार बहुत सावधानी बरतने के बाद भी ये पदार्थ खराब हो जाते?हैं. इन का रंग बदल जाता है या फफूंदी आदि लग जाती है. इन को खराब होने से बचाने और अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते?हैं:

* अचार या चटनी बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि फल या सब्जी का चुनाव ठीक से किया जाए. कोई भी खराब फल या सब्जी नहीं लेनी चाहिए और काटने से पहले उन्हें साफ पानी से अच्छी तरह धो लेना चाहिए.

* अमूमन नमक कम मात्रा में डालने से अचार खराब हो जाता?है, लिहाजा अचार में नमक की मात्रा ठीक होनी चाहिए. खट्टे फलों के लिए 15-20 फीसदी और सब्जियों के लिए 8-10 फीसदी नमक डालना चाहिए.

* कुछ रसायनों का प्रयोग कर के अचार व चटनी को टिकाऊ बनाया जा सकता?है. ऐसा ही एक रसायन ग्लेशियल ऐसेटिक एसिड है, जो फफूंदी व कीटाणुनाशक है. अचार तैयार हो जाने पर इसे तेल डालने से पहले अचार में 0.5 फीसदी तक मिलादें. नीबू के अचार में इस की जरूरत नहीं?है, क्योंकि नीबू में कुदरती रूप से ही अम्ल की मात्रा ज्यादा होती है. सौस या चटनी में?ग्लेशियल ऐसेटिक एसिड (0.5 फीसदी) डाल कर 5 मिनट तक उबालना चाहिए.

* अचार व चटनी वगैरह में 200 मिलीलीटर पोटेशियम मेटाबाइसल्फाइट या 300 मिलीलीटर सोडियम बेंजोएट प्रति किलोग्राम के हिसाब से थोड़े से पानी में घोल कर मिलाने से भी इन्हें खराब होने से बचाया जा सकता?है.

* अचार में तेल को गरम कर के?ठंडा करने के बाद ही मिलाएं.

* अचार व चटनी में पिसे हुए मसालों को हलका सूखा भून कर डालें. इस से?भी अचार व चटनी जल्दी खराब नहीं होते. अचार में मसालों को गरम तेल में?भून कर भी डाल सकते हैं. इस से इन पदार्थों का रंग व स्वाद ठीक रहेगा और ये जल्दी खराब भी नहीं होंगे

– अनिता यादव, डा. अनंत कुमार, डा. बीना यादव

(कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद)

 

आखिर क्यों हुए ‘भाईजान’ भावुक…

बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान भले ही अपनी आने वाली फिल्म 'सुल्तान' में एक मजबूत इरादों वाले रेसलर की भूमिका निभा रहे हों लेकिन असल जिंदगी में सलमान बहुत भावुक हैं.

हाल ही में सुल्तान के सेट पर कुछ ऐसा हुआ जिससे सलमान भावुक हो गए और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. दरअसल फिल्म का एक चार्टबस्टर सॉन्ग 'जग घूमिया' जिसे सलमान ने खुद अपनी आवाज में रिकॉर्ड किया है. इस गाने के लिरिक्स से सलमान खुद को बहुत जुड़ा हुआ महसूस करने लगे जिसके बाद वह अपने आंसू रोक नहीं पाए. यह गाना एक ऐसे इंसान की जिंदगी पर फिल्माया गया है जो पूरी दुनिया घूमता है और अंत में शांति उसे खुद अपने अंदर ही मिलती है.

दरअसल यह गाना न सिर्फ फिल्म का एक हिस्सा है बल्कि फिल्माया भी सलमान पर ही गया है. सॉन्ग की रिकॉर्डिंग पूरी हो चुकी है. इससे पहले सलमान का गाया सॉन्ग 'मैं हूं हीरो तेरा' एक बड़ा हिट साबित हुआ. यह सॉन्ग सलमान की होम प्रोडक्शन फिल्म 'हीरो' से था जिसमें सूरज पंचोली और अथिया शेट्टी ने अपना डेब्यू किया था. उस फिल्म में भले ही सलमान नहीं थे, लेकिन उनका गाया यह प्रमोशनल ट्रैक सुपरहिट रहा था.

इसके अलावा सलमान 'वॉन्टेड', 'दबंग' और 'किक' जैसी फिल्मों के सॉन्ग्स में भी अपनी आवाज दे चुके हैं. अब फिल्म 'सुल्तान' के लिए गाया सॉन्ग 'जग घूमिया' ऑडियंस को कितना दीवाना बनाता है, यह तो फिल्म के म्यूजिक लॉन्च के बाद ही पता चलेगा. फिलहाल सलमान अपनी को-स्टार अनुष्का शर्मा के साथ दिल्ली में सुल्तान की शूटिंग में व्यस्त हैं. यह फिल्म इस साल ईद पर रिलीज होगी.

‘फार्म एन फूड’ किसान सम्मान बढ़ी जानकारी मिला इनाम

भारत की सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन समूह की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ द्वारा जान डियर ट्रैक्टर के साथ मिल कर बस्ती में स्थित ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ पर ‘फार्म एन फूड किसान अवार्ड समारोह’ का आयोजन किया गया. इस समारोह में बस्ती, संतकबीर नगर, सिद्धार्थनगर और गोरखपुर के 400 से ज्यादा किसानों ने हिस्सा लिया. इस सम्मान समारोह में 55 प्रगतिशील किसानों को ‘नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज फैजाबाद’ के कुलपति प्रो. अख्तर हसीब के हाथों सम्मानित किया गया.

इस मौके पर मुख्य मेहमान अख्तर हसीब ने कहा कि अब तक बहुत सारे कृषि मेले सरकारी लेवल पर आयोजित होते रहे हैं. यह पहला मेला है, जिसे गैर सरकारी लेवल पर लगाया गया है. आयोजन से खुश हो कर प्रोफेसर हसीब अख्तर ने सुझाव दिया कि ‘फार्म एन फूड’ का यह आयोजन ‘आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय कुमारगंज, फैजाबाद’ में भी किया जाए. अख्तर हसीब ने सरकार द्वारा चलाई जा रही किसानों की योजनाओं में होने वाले भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए कहा कि देश के अन्नदाता किसानों के लिए बनने वाली योजनाओं में गोलमाल खेती के लिए खतरा बन चुका है. उन्होंने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद के तहत आने वाले कृषि विज्ञान केंद्रों के जरीए किसानों को फील्ड लेवल पर बड़े पैमाने पर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा जानकारी दी जा रही है, जिसे और मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है.

संयुक्त निदेशक उद्यान, बस्ती मंडल आरके सिंह तोमर ने मेले में किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी दी, जिन में सब्जी की खेती, मसाले की खेती, केले की खेती, औषधीय खेती, पौलीहाउस, ग्रीनहाउस, पौधों की नर्सरी सहित तमाम योजनाएं शामिल थीं. जान डियर ट्रैक्टर के क्षेत्रीय प्रबंधक अवनींद सिंह ने जान डियर ट्रैक्टर की खूबियों की जानकारी दी. उन्होंने जान डियर ट्रैक्टर के विभिन्न माडलों की भी जानकारी दी. एसपी आटोमोबाइल्स के मालिक अखिलेश दुबे ने किसानों से कहा कि जान डियर ट्रैक्टर दुनिया के कई देशों में किसानों को बेहतर सेवाएं दे रहा है.

‘कृषि विज्ञान केंद्र’ के प्रभारी डा. एसएन सिंह ने ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ के माध्यम से किसानों को मुहैया कराई जा रही सेवाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र के द्वारा जिले के किसानों के खेतों तक कृषि वैज्ञानिकों की सेवाएं मुहैया कराई जा रही हैं, ताकि किसानों को तकनीकी जानकारी मिल सके. उन्होंने ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका को धन्यवाद देते हुए कहा कि इस में छपे लेखों से देश के तमाम किसान लाभ ले रहे हैं. उन्होंने कहा कि ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका ने किसानों व कृषि वैज्ञानिकों को एक मंच मुहैया कराया है, जहां से किसान वैज्ञानिक जानकारी हासिल कर सकते हैं. केंद्र के वरिष्ठ पशु वैज्ञानिक डा. एसएन लाल ने किसानों को पशुपालन के बारे में जानकारी दी और विषय विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह ने किसानों के सवालों के जवाब दिए.

किसानों के उत्पादों की प्रदर्शनी से दिखी किसानों की तरक्की

‘कृषि विज्ञान केंद्र’ के जरीए तरक्की कर रहे किसानों की खोजों और उत्पादों की प्रदर्शनी ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा. इस प्रदर्शनी में राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चुने गए किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा खोजी गई गन्ने की नई प्रजाति कप्तान बस्ती, मोबाइल सोलर पंप व न्यूनतम लागत से तैयार एकसाथ गेहूं व भूसा काटने वाली कंबाइन को पेश किया गया. युवा किसान जय सिंह की बतख व उस के अंडे और राममूर्ति मिश्र द्वारा तैयार राजमा, धान व अन्य फसलों के बीजों ने भी लोगों का ध्यान खींचा.

किसान ध्रुवनारायण चौधरी द्वारा तैयार किए गए डेरी उत्पादों व जैविक खाद ने भी लोगों का ध्यान खींचा. इस के अलावा किसान अरविंद सिंह द्वारा पेश की गई सब्जियों के बीज उत्पादन की विधि, मोहम्मद आमिर व राधेश्याम यादव की मछली प्रदर्शनी भी काफी पसंद की गई. राजेश कुमार मौर्या की मशरूम प्रदर्शनी, हसन रजा की बकरी प्रदर्शनी, दिनेश कुमार सिंह की पपीता प्रदर्शनी, रामचंद्र मौर्या की सब्जी प्रदर्शनी, राम जनक मौर्या की सब्जी प्रदर्शनी, हरिश्चंद्र सिंह द्वारा तैयार की गई वर्मी कंपोस्ट, महिला किसान आकांक्षा पांडेय के डेरी उत्पाद, सरोज शुक्ला द्वारा तैयार किए जा रहे अचारमुरब्बे के स्टाल भी आकर्षण के केंद्र रहे. इस अवसर पर मेले में आए अन्य किसानों ने इन किसानों द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पादों को अपनाने की बात कही.

किसानों ने अपनी सफलता की कहानियों से कराया रूबरू

इस आयोजन में आसपास के जिलों से आए कई किसानों ने अपनी सफलता की कहानियां लोगों के सामने रखीं. डेरी व्यवसाय से जुड़ी आकांक्षा पांडेय ने कहा कि वे एक पढ़ीलिखी महिला हैं और उन्होंने बिना किसी मदद के खुद ही डेरी की शुरुआत की थी. आज उन की डेरी में तमाम प्रोडक्ट बनते हैं, जिन में खोया, पनीर व दही वगैरह शामिल हैं. उम्दा किसम के होने की वजह से उन के उत्पादों की दूसरे जिलों में भी खूब मांग है. संतकबीर नगर जिले के सांडेकला गांव की महिला किसान रामरती ने बताया कि वे जैविक खेती कर के लागत मूल्य में कमी लाने में कामयाब हुई हैं. उन की फसल जैविक होने के कारण महंगे दामों पर बिकती है, जिस से उन को पहले के मुकाबले ज्यादा फायदा मिल रहा है. बस्ती जिले के भेलवल गांव के रहने वाले किसान अरविंद सिंह ने कहा कि किसान अपनी फसल से बीज तैयार कर के अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

महिला किसानों का हुआ विशेष सम्मान

‘फार्म एन फूड’ व जान डियर ट्रैक्टर द्वारा आयोजित ‘फार्म एन फूड किसान अवार्ड समारोह’ में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर महिला किसानों को खासतौर पर सम्मानित किया गया. डेरी कारोबार से जुड़ी किसान आकांक्षा पांडेय व संजू चौधरी, फल संरक्षण के लिए सरोज शुक्ला, जैविक खेती के लिए उमा देवी किरन, ज्ञानमती, राजमती, संतकबीर नगर जिले की सब्जी उत्पादक रामरती व समुन, गोरखपुर की आरती देवी, प्रेमशिला, राजमती व आशा देवी, सिद्धार्थनगर जिले की गुजराती व इसरावती को कुलपति प्रो. अख्तर हसीब ने सम्मानित किया.

खेती में खास काम करने वाले किसान व पत्रकार भी हुए सम्मानित

कुलपति ने कृषि क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले 55 किसानों व पत्रकारों वगैरह को भी सम्मानित किया. इन में किसान आज्ञाराम वर्मा, गोमती प्रसाद कन्नौजिया, अरबिंद पाल, अरबिंद कुमार सिंह, केसी मिश्र भानवाती, इलाइची देवी, इसरावती देवी, गुजराती, गौरा पार्वती, आत्माराम पाठक, राकेश सिंह, अशोक सिंह, महेश सिंह, शीतला दुबे, भगवानदीन, विजयनाथ पांडेय, राजेंद्र पाल, मनोज, अतींद्र सिंह, कृष्णा चौधरी, रक्षा राम चौधरी, राम परिखन, आशा देवी, राजमती, ज्ञानमती, किरन, उमा देवी, गिरीश चंद्र शुक्ल, रामरती, श्रीधर पांडेय, फिरोज अहमद, रामचंद्र यादव, श्रीमती सरोज शुक्ला, श्रीमती संजू चौधरी, श्रीमती आकांक्षा पांडेय, राधेश्याम यादव, शिव मूरत सिंह, हसन रजा, राम भवन यादव, राम चंद्र सिंह, राम तौल, सतीश चंद्र शर्मा, राजेश कुमार मौर्या, बीर सिंह, रूप नारायण चौधरी, मो. आमीर अली, राममूर्ति मिश्र, लाल पुष्पेंद्र बहादुर पाल, दिनेश कुमार सिंह, विजय कुमार सिंह, राम चंद्र मौर्या, परमानंद सिंह, राम मनोहर चौधरी, योगेंद्र सिंह, राम जनक मौर्या, राममणी तिवारी, जय सिंह, सत्य प्रकाश सिंह, हरिश्चंद्र सिंह, मो. इल्माल खान व सैनुल्लाह खान के साथ ही ‘संयुक्त निदेशक उद्यान’ आरके तोमर, कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी डा. एसएन सिंह, कृषि वैज्ञानिक डा. राघवेंद्र सिंह, डा. दिनेश कुमार यादव, डा. प्रेमशंकर, श्रीमती बीना सचान, इंजीनियर वरुण कुमार, डा. एसएन लाल, डा. राकेश शर्मा व जान डियर के एरिया मैनेजर अवनेंद्र सिंह भी शामिल थे.

इस मौके पर समाजसेवा के क्षेत्र में डा. कुलदीप सिंह, संजय द्विवेदी, मंगेश दुबे, राधेश्याम चौधरी, पत्रकार विनोद उपाध्याय, सतीश श्रीवास्तव, जीतेंद्र द्विवेदी, अमित सिंह, कमलेश सिंह, रजनीश त्रिपाठी, मेहताब आलम, सिम्मी भाटिया, हिफजुर्रहमान, सुप्रिया सिंह, विवेक श्रीवास्तव, शिक्षक सर्वेष्ट मिश्र, गुलाम नबी अहमद के साथ ही अनेक लोगों को सम्मानित किया गया. इस कार्यक्रम को कराने में दिल्ली प्रेस के उत्तर प्रदेश सरकुलेशन प्रबंधक ऋषि श्रीवास्तव, बृहस्पति पांडेय, पंकज त्रिपाठी व सचिंद्र शुक्ल का खास योगदान रहा.

छेने और चीनी का स्वाद सफेद रसगुल्ला

सफेद रसगुल्ला बंगाली मिठाई है. यह छेने और चीनी से तैयार होती है. अच्छे रसगुल्ले की पहचान यह होती है कि वे एकदम मुलायम होते हैं. रसगुल्ले सफेद और हलका पीलापन लिए बनाए जाते हैं. इन का साइज भी अलगअलग हो सकता है. छोटेछोटे साइज वाले रसगुल्ले ज्यादा पसंद किए जाते हैं. अब डब्बाबंद रसगुल्ले ज्यादा बिकते हैं, जिन को महीनों महफूज रखा जा सकता है. मिठाई के बाजार को देखें तो रसगुल्ले सब से खास जगह रखते हैं. रसगुल्ला भले ही बंगाली मिठाई हो, पर इसे पूरे देश के लोग स्वाद ले कर खाते हैं. यही वजह है कि लगभग हर शहर में बंगाली मिठाइयों की दुकानें मिल जाती हैं.

रसगुल्ला कारोबार में हुनर और रखरखाव का खास योगदान होता है. जो कारीगर इसे सही तरह से बनाते हैं, उन की दुकान पर रसगुल्ले खरीदने वालों की भीड़ लगी होती है. हर शहर में ऐसी मिठाई की दुकानें होती हैं, जिन के रसगुल्ले सभी पसंद करते हैं. इन को खरीदने के लिए दूरदूर से चल कर लोग आते हैं. यही वजह है कि रसगुल्ले की कीमत में भी अंतर होता है. 160 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 350 रुपए प्रति किलोग्राम तक की कीमत में रसगुल्ले बिकते हैं. खानपान की चीजों में लोग इस बात का पूरा खयाल रखते हैं कि उन को सफाई से बनाया जाए और उन्हें सही तरह से रखा जाए. जिस दुकान में गंदगी होती है, वहां लोग कम जाते हैं. रसगुल्ला निकालने के लिए भी हाथ के बजाय चम्मच का इस्तेमाल करना चाहिए.

कैसे तैयार करें रसगुल्ला

रसगुल्ला बनाने के लिए 150 ग्राम छेना लें. इस के बाद किसी साफ बरतन में 2 कप पानी में छेना डाल कर करीब 10 मिनट तक उबालें. इस के बाद इसे ठंडा होने दें. फिर छेना बाहर निकाल लें. छेना दोनों हाथों में ले कर मसल लें. छेना  तब तक मसलें, जब तक वह पूरी तरह चिकना न हो जाए. छेना जितना चिकना होगा, रसगुल्ले उतने ही मुलायम बनेंगे. इस छेने से 10 गोलगोल रसगुल्ले तैयार करें. ध्यान रखें कि रसगुल्ले एक ही साइज के हों. साइज अलगअलग होगा तो ये देखने में अच्छे नहीं लगेंगे. रसगुल्ले भिगोने के लिए चाशनी तैयार करनी होगी. चाशनी तैयार करने के लिए कड़ाही में 2 कप चीनी डाल कर उस में 4 कप पानी डालें और मध्यम आंच पर उबालें. जब यह मिश्रण थोड़ा गाढ़ा हो जाए तो उसे उंगली में लगा कर देखें. उस में तार बनने लगें तो उसे आंच से उतार लें. उस में 2 छोटे चम्मच गुलाबजल और इलायची पाउडर खुशबू के लिए डालें. चाशनी में रसगुल्ले डालें और 20 मिनट तक उबालें. हर 5 मिनट उबालने के बाद उस में थोड़ाथोड़ा पानी डालते रहें. पानी नहीं डालेंगे तो चाशनी कम हो जाएगी और रसगुल्ले जल भी सकते हैं.

तैयार रसगुल्लों को कुछ देर ठंडा होने के लिए रख दें. हलके मुलायम रसगुल्ले चाशनी में ऊपर तक आ जाते हैं. जो रसगुल्ले ठीक नहीं होते वे नीचे बैठ जाते हैं.छेना बनाने वाले कारीगर निखिल गुप्ता कहते हैं, ‘छेने की मिठाई में रसगुल्ले सब से खास होते हैं. इन्हें बनाने में समय का सब से ज्यादा ध्यान रखना चाहिए. छेना अगर सही नहीं बनता तो रसगुल्ले भी सही नहीं बनते हैं. छेना बनाने के लिए दूध को फा ड़ना पड़ता है. अगर घर पर छेने के रसगुल्ले बनाने हों, तो छेना बाजार से खरीदा जा सकता है.’

डेरी किसान उठा सकते हैं लाभ

जो किसान डेरी का काम करते हैं, वे रसगुल्ला कारोबार का हिस्सा बन सकते हैं. वे अच्छे किस्म के दूध से छेना तैयार कर के उसे बाजार में रसगुल्ले का कारोबार करने वाले दुकानदारों को बेच सकते हैं. इस से उन का मुनाफा कई गुना बढ़ सकता है. ऐसे में डेरी उद्योग ज्यादा किसानों के बीच फैल सकेगा. किसान यह न मानें कि मिठाई बनाना केवल हलवाई का काम है. आज शहरों में मिठाई का काम एक कारोबार की तरह हो गया है. वहां तमाम जातियों के लोग यह काम करते हैं. किसान भी गांवों और शहरों में मिठाई बना कर बेच सकते हैं. इस काम को शुरू करने में बहुत पूंजी की जरूरत नहीं पड़ती है. शादी के मौसम में यह कारोबार ज्यादा मुनाफा देने वाला साबित हो सकता है.

तंबाकू सेक्टर में एफडीआई पर पूरी तरह रोक!

तंबाकू सेक्टर में विदेशी निवेश पर पूरी तरह पाबंदी लग सकती है. इसके लिए उद्योग मंत्रालय ने कैबिनेट ड्राफ्ट नोट तैयार किया है और इसे संबंधित मंत्रालयों को सलाह के लिए भेजा गया है.

संभावना जताई जा रही है कि इस प्रस्ताव को अगले एक महीने में हरी झंडी मिल सकती है.

सरकार के इस फैसले पर आईटीसी और दूसरे सिगरेट उत्पादकों ने चिंता जताई है. हम आपको बता दें कि अभी सिगरेट की मार्केटिंग, ब्रांडिंग और फ्रैंचाइजी में विदेशी निवेश की छूट है, और सिर्फ सिगरेट की मैन्युफैक्चरिंग में विदेशी निवेश पर पाबंदी है.

हालांकि, अब ये माना जा रहा है कि सिगरेट के मार्केटिंग, ब्रांडिंग और फ्रैंचाइजी में विदेशी निवेश पर पाबंदी संभव है. बताया जा रहा है कि घरेलू सिगरेट कंपनियां किसी भी रास्ते से एफडीआई नहीं ला सकेंगी.

वासेपुर से सीधा हॉलीवुड का टिकट

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण के बाद अब फिल्म इंडस्ट्री की एक और हसीना हॉलीवुड में एंट्री करने जा रही हैं. हम बात कर रहे हैं 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' फेम हुमा कुरैशी की.

खबरों की मानें तो यह खूबसूरत अदाकारा जल्द ही हॉलीवुड के मशहूर एक्टर टॉम क्रूज के साथ स्क्रीन शेयर करती नजर आ सकती है. यह फिल्म 'द ममी' का सीक्वेल होगा. इस बार फिल्म में पुराने स्टार कास्ट की जगह टॉम क्रूज और सोफिया को साइन किया गया है.

सूत्रों का कहना है कि हुमा ने हाल में इस फिल्म का ऑडिशन दिया है. बता दें कि बॉलीवुड की खुबसुरत अदाकारा हुमा कुरैशी जल्द ही साऊथ के मशहूर सुपरस्टार ममूटी के साथ मलयालम फिल्म 'व्हाइट' में नजर आएंगी.

दक्षिण अफ्रीका नहीं कर पायेगा इन टूर्नामेंटों की मेजबानी

दक्षिण अफ्रीका ने देश के बड़े खेल महासंघों क्रिकेट, एथलेटिक्स, रग्बी और नेटबॉल में अश्वेत खिलाड़ियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने का हवाला देते हुए इन महासंघों द्वारा किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट की मेजबानी करने पर कम से कम एक साल का प्रतिबंध लगा दिया है.

सरकार के इस फैसले के बाद अब ये महासंघ कम से कम एक साल के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट की न तो मेजबानी कर पाएंगे और न ही उसके लिए दावेदारी कर पाएंगे. सरकार देश के सबसे अधिक लोकप्रिय खेलों में ज्यादा से ज्यादा अश्वेत खिलाड़ियों की भागीदारी चाहती थी लेकिन रंगभेद समाप्त होने के दो दशक से ज्यादा समय के बाद भी श्वेत खिलाड़ियों का ही एथलेटिक्स, क्रिकेट, नेटबॉल और रग्बी टीमों में बोलबाला है.

खेल मंत्री फिकिले एमबालुला ने एक बयान में कहा, 'मुझे एथलेटिक्स दक्षिण अफ्रीका (एएसए), क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका (सीएसए), नेटबॉल दक्षिण अफ्रीका (एनएसए) और दक्षिण अफ्रीका रग्बी (एसएआर) को प्रतिबंधित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है और वे अब बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट की मेजबानी और दावेदारी नहीं कर पाएंगे.'

एमबालुला ने साथ ही कहा कि एथलेटिक्स और नेटबॉल महासंघों को वैश्विक टूर्नामेंट की दावेदारी करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है. खेल मंत्री ने यह फैसला उस रिपोर्ट के बाद लिया है जिसमें कहा गया है कि पांच बड़े खेल महासंघों में से चार महासंघ अश्वेत खिलाड़ियों को पर्याप्त मौके देने में विफल रहे हैं. इस फैसले से रग्बी महासंघ की 2023 रग्बी वर्ल्ड कप की दावेदारी करने की इच्छा को गहरा झटका लगा है.

यह प्रक्रिया जून में शुरु होनी है और अगले साल तक चलनी है. ऐसे में एसए रग्बी उम्मीद नहीं कर सकता है कि उसके लिए वर्ल्ड कप की दावेदारी का मौका बन जाए. देश के एथलेटिक्स और क्रिकेट महासंघों का कहना है कि वे इस रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद इस मामले पर कोई टिप्पणी कर पाएंगे. दक्षिण अफ्रीका को 2020 में अंडर 19 क्रिकेट वर्ल्ड कप का आयोजन करना है.

खेल मंत्री ने कहा कि वह 2016-17 में सुधार लक्ष्यों के परिणाम देखने के बाद अपने इस फैसले की समीक्षा करेंगे.  एमबालुला ने साथ ही कहा कि केवल फुटबॉल महासंघ ही इन पांचों में एकमात्र महासंघ है जिसने सुधार के लक्ष्यों को पूरा किया है.

 

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