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ICC में अपना रुख बदल सकता है BCCI

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष शशांक मनोहर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आइसीसी) का मुखिया बनने के बाद 'बिग थ्री' को बदलने का प्रस्ताव दिया था. एन श्रीनिवासन के कार्यकाल के दौरान आइसीसी में तीन बड़े देश भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड को कार्यकारी और वित्तीय अधिकार मिल गए थे. श्रीनि के धुर विरोधी मनोहर ने आइसीसी अध्यक्ष बनने के बाद पहली ही बैठक में मौजूदा ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव दिया था.

इसके बाद भारत को आइसीसी से मिलने वाले राजस्व में बड़ी कमी होने का अनुमान लगाया गया था, इसके बावजूद भी बीसीसीआई इसको मानने को तैयार था. अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने के संकेतों के बाद से बोर्ड ने अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया है. अगर लोढ़ा समिति की सिफारिशें हूबहू लागू होती हैं तो बीसीसीआई को विज्ञापन के जरिये मिलने वाले राजस्व में जबरदस्त कमी आएगी और इस कमी को दूर करने के लिए बोर्ड बिग थ्री पर लिए अपने फैसले पर पुनर्विचार कर रहा है.

…तो होगी राजस्व में गिरावट

बीसीसीआई के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से हमें जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी. अगर लोढ़ा समिति की मैच के ब्रेक के दौरान ही विज्ञापन दिखाने की सिफारिश लागू होगी तो हमारे राजस्व में जबरदस्त गिरावट आएगी. जब उनसे पूछा गया कि बोर्ड अध्यक्ष शशांक मनोहर ने ही आइसीसी से बिग थ्री व्यवस्था खत्म करने का प्रस्ताव दिया था तो बोर्ड ने कहा कि इसको लेकर जून में फैसला होना है.

हम बिग थ्री व्यवस्था खत्म करने पर अडिग हैं, लेकिन ये प्रशासनिक स्तर के होंगे. मतलब अभी सिर्फ भारत, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया को आइसीसी के फैसले लेने का अधिकार है. बीसीसीआई इस पक्ष में है कि आइसीसी के दस टेस्ट खेलने वाले देश उसके फैसले में भागीदार हों और इसको लेकर हमारे मत में कोई बदलाव नहीं है, लेकिन जहां तक राजस्व में हिस्सेदारी की बात है तो उसमें हम अब कोई कमी झेलने की स्थिति में नहीं हैं.

हम नहीं चाहेंगे कि आइसीसी से मिलने वाले राजस्व में कमी आए. हमने कुछ इस तरह का प्रस्ताव तैयार किया है जिससे टेस्ट खेलने वाले दस देशों, एसोसिएट देशों को तो आइसीसी से पर्याप्त धन मिले, लेकिन भारत को पहले की तरह मिल रहे राजस्व में कमी नहीं आए. इसके लिए बीसीसीआई ने एक फॉर्मूला तैयार किया है जिसे आइसीसी के समक्ष रखा जाएगा.

पवार ले सकते हैं मनोहर की जगह

लोढ़ा समिति की सिफारिशों और आइसीसी के स्वतंत्र अध्यक्ष पद के चुनाव के कारण शशांक मनोहर अगर बीसीसीआई अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हैं तो उनकी जगह पूर्व बीसीसीआई व आइसीसी अध्यक्ष शरद पवार इस पद के दावेदार हो सकते हैं. फरवरी में आइसीसी ने कहा था कि बोर्ड ने सर्वसम्मति से पूर्ण परिषद के सामने यह प्रस्ताव रखने पर रजामंदी जताई कि जून 2016 से दो साल के लिए नए अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा. इसके लिए आइसीसी की स्वतंत्र ऑडिट कमेटी के अध्यक्ष की निगरानी में गुप्त मतदान की प्रक्रिया होगी. आइसीसी अध्यक्ष किसी सदस्य बोर्ड में कोई पद नहीं ले सकेगा और कार्यकाल खत्म होने के बाद फिर चुना जा सकता है, लेकिन अधिकतम कार्यकाल तीन बार का होगा.

क्या है बिग थ्री

2014 में एन श्रीनिवासन के अध्यक्ष रहते हुए आइसीसी में संवैधानिक बदलाव किए गए थे जिसमें सारे अधिकार 'बिग थ्री' के पास चले गए थे. मनोहर के आते ही आइसीसी ने वित्त और व्यावसायिक मामलों की समिति और कार्यकारी समिति के नियम और शर्तो में भी बदलाव को मंजूरी दी, ताकि बीसीसीआई, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड तथा वेल्स क्रिकेट बोर्ड के प्रतिनिधियों को स्थायी पदों से हटाकर सभी पूर्ण और सहायक निदेशकों को सदस्यता पाने की पात्रता दी जा सके.

इसका एकमात्र मानदंड संबंधित निदेशक की दक्षता, योग्यता और अनुभव होगा. आइसीसी ने कहा, बोर्ड ने 2014 में किए गए संवैधानिक बदलावों की संपूर्ण समीक्षा पर मंजूरी जताई. अब आइसीसी के संविधान की समीक्षा की जा रही है और सभी सदस्य आइसीसी प्रबंधन को फीडबैक दे रहे हैं. जून, 2016 में आइसीसी के सालाना सम्मेलन में इस पर अंतिम फैसला होगा.

शिकंजे में आयेंगी मायावती

चुनावी बिसात पर भ्रष्टाचार का दांव नेताओं को पटखनी देने का सबसे कारगर हथियार होता है.कांग्रेस से बाहर आकर नया दल बना कर बोफोर्स कांड के अस्त्र से विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर अपनी सरकार बनाई थी. बिहार में लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक को खत्म करने में चारा घोटाले का बडा हाथ था. कांग्रेस की डाक्टर मनमोहन सरकार के जाने में भी घोटालों का प्रमुख हाथ था. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव को आय से अधिक जायदाद का भूत अभी भी परेशान करता है. बसपा नेता मायावती को ताज घोटाले ने बहुत परेशान किया. भ्रष्टाचार का ही डर था जिसने सपा और बसपा दोनो को कांग्रेस का समर्थन देने का लिये मजबूर किया था.उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचंल प्रदेश, तमिलनाडु सभी प्रदेशों में नेताओं को भष्टाचार ने तगडा डंक मारा है. अब एक पार्टी को दबाव में लाने के लिये दूसरी पार्टी इस हथियार का इस्तेमाल करने लगी है.ऐसे ही हालातों को देखते हुये अदालत तक ने सीबीआई को पिंजरें में बंद तोता कहा था.केवल सीबीआई ही नहीं बहुत सारी जांच संस्थायें है जो नेताओं को शिकजें में कसने का काम करती है.
 
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की बढती ताकत को देखते हुये मायावती कार्यकाल में हुये  घोटालों की फाइल खुलने वाली है. साल 2007 से लेकर 2012 के बीच बसपा सरकार के समय बने स्मारकों में सरकारी पैसे के दुरूपयोग का आरोप लगा था. इन स्मारको में साढे 4 हजार करोड की रकम के खर्च करने का काम हुआ था. इसकी जांच का काम उस समय के लोकआयुक्त एनके मल्होत्रा ने किया. लोकआयुक्त की जांच रिपोर्ट में यह माना गया कि बसपा सरकार के समय स्मारक बनवाने में 1488 करोड का घोटाला किया गया.199 लोगों को इस घोटाले में लिप्त बताया गया. जांच रिपोर्ट फरवरी 2013 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्राी अखिलेश यादव को सौंपी गई. अखिलेश यादव ने इस मुददे पर कोई काम नहीं किया तो अब एक विशेष रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी गई है. इस रिपोर्ट में बसपा के उस समय के कई कददावर नेता, मंत्राी, इंजीनियर और ब्यूरोक्रेट शामिल है.
 
उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनावों को देखते हुये यह मुददा फाइलों से बाहर आ सकता है. जिससे बसपा नेता मायावती को परेशानी हो सकती है. मायावती के खिलाफ भ्रष्टाचार एक बडे हथियार के रूप में काम कर सकता है. ऐसे में ताज घोटाले से बची मायावती स्मारक घोटाले की नई मुसीबत में फंस सकती है. वैसे मायावती इन बातों को मनुवदियों की चाल मानती है. जब से अमीरगरीब की खांई चैडी हुई है भ्रष्टाचार के मुददे संवेदनशील होने लगे है. ऐसे में केवल खुद को दलित के बेटी कहने से काम नहीं चलने वाला. ऐसे में भ्रष्टाचार का मुददा मायावती को नुकसान और विरोध्यिों को ताकत दे सकता है. सोशल मीडिया के जमाने में ऐसे आरोपों के वायरल होने में समय नहीं लगता है. कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को हथियार बना कर सत्ता हासिल करने वाली भाजपा सरकार नये मुददों से कांग्रेस की तरह मायावती को भी उलझा सकती है. 

…अब सीरियल किलर बनेंगे नवाजुद्दीन सिद्दीकी

बॉलीवुड अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी का कहना है कि निर्देशक अनुराग कश्यप फिल्म ‘रमन राघव 2.0' से जबरदस्त धमाल करेंगे. अनुराग की पिछली फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट' बडे़ पर्दे पर कोई कमाल नहीं कर पाई थी. ‘रमन राघव 2.0' साइको रमन के नाम से भी पहचानी जाती है.

यह एक मनोरोगी सीरियल किलर की कहानी है जिसने 1960 दशक के मध्य में मुंबई की सडकों को आतंकित कर दिया था. ‘बजरंगी-भाईजान' के अभिनेता फिल्म में कुख्यात सीरियल किलर की भूमिका निभाते नजर आएंगे. अभिनेता का कहना है कि यह फिल्म अनुराग की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक होगी.

नवाजुद्दीन ने कहा, ‘ अनुराग रमन राघव से एक जबरदस्त वापसी करेंगे. मुझे इस बात का यकीन है. मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यह अनुराग की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक होगी. इस पर उन्होंने काफी मेहनत भी की है.'

नवाजुद्दीन फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे' और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर' के दोनों भागों में भी अनुराग के साथ काम कर चुके हैं. ‘रमन राघव 2.0' को कान फिल्म उत्सव में भी प्रदर्शित किया जाएगा. यह नवाजुद्दीन की आठवीं फिल्म है जिसे उत्सव में प्रदर्शित किया जाएगा. ‘रमन राघव 2.0' भारत में 24 जून को रिलीज होगी.

“सुल्तान ब्लॉकबस्टर ही होगी!” – सलमान खान

सलमान खान की सुल्तान को लेकर धीरे धीरे माहौल बन रहा है लेकिन अब सलमान खान खुद सुल्तान के लिए माहौल बनाने लगे हैं. उनकी फिल्म और रियो ओलंपिक्स 2016 को लेकर भले ही जितना विवाद हो रहा हो, लेकिन सलमान खान सुल्तान को लेकर अलग सुर ताल छेड़ चुके हैं. अब उन्होंने हाल ही में कहा कि सुल्तान का ब्लॉकबस्टर होना तय है, कोई रोक ही नहीं सकता. क्योंकि सुल्तान एक स्पोर्ट्स फिल्म नहीं बल्कि एक रोमांटिक फिल्म है. और बॉलीवुड में रोमांस का हिट होना तय है. इसलिए वो जानते हैं कि सुल्तान भी सुपरहिट होगी.

गौरतलब है कि सुल्तान में सलमान खान एक हरियाणवी पहलवान बने हैं और फिल्म में उनका साथ दे रही हैं अनुष्का शर्मा. सबको लग रहा है कि सुल्तान सलमान खान और उनके अखाड़े की कहानी है लेकिन सलमान ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि सुल्तान दरअसल उनकी और अनुष्का की लव स्टोरी है.

इधर सलमान खान की फिल्म 'सुल्तान' के रिलीज डेट की आधिकारिक घोषणा कर दी गई है. जैसा कि कहा जा रहा था, फिल्म ईद के मौके पर ही रिलीज होगी. लेकिन बता दें, फिल्म शुक्रवार यानि की 8 जुलाई को नहीं, बल्कि 6 जुलाई (बुधवार) को ही रिलीज कर दी जाएगी. कोई शक नहीं कि ईद पर मौके पर 5 दिनों का पूरा वीकेंड फिल्म को धमाकेदार ओपनिंग देगा. एक तो ईद रिलीज.. ऊपर से 5 दिनों का स्लॉट.. लगता है निर्माता सलमान खान को एक और 300 करोड़ की फिल्म देने वाले हैं.

अली अब्बास जफर के निर्देशन में बनी फिल्म 'सुल्तान' का टीजर भी रिलीज हो चुका है और सुपरहिट भी. फिल्म में सलमान खान, अनुष्का शर्मा और रणदीप हुडा मुख्य किरदारों में हैं. सुल्तान यशराज बैनर के तले रिलीज हो रही है. लिहाजा, फिल्म को वर्ल्डवाइड शानदार रिलीज मिलेगी. बता दें, फिल्म को उत्तरप्रदेश में टैक्स फ्री घोषित कर दिया गया है.

चुनावी घोषणापत्र में शामिल होगें बच्चों के मुददे

वैसे तो उत्तर प्रदेश में विधनसभा चुनावों का समय आ रहा है. सभी राजनीतिक दल इसकी तैयार में लग गये है. उत्तर प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग भी चुनावी तैयारी में जुट गया है. बाल आयोग ऐसे 50 बच्चों को तैयार कर रहा है जो अपने अधिकार और मुद्दों को लेकर जागरूक है. यह बच्चे अपनी मांगों को लेकर एक ड्राफ्ट तैयार कर रहे है. इसे लेकर यह बच्चे हर राजनीतिक दल के प्रमुखों लोगों से मिलेगे. बच्चों मांग वाले बिन्दुओं को चुनावी घोषणापत्रा में शामिल करने की मांग करेगे. उत्तर प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ‘एवरी लाॅस्ट चाइल्ड मिशन’ पर काम कर रहा है. जिससे समाज के अंतिम बच्चे तक को उसका अधिकार दिलाया जा सके. इस मिशन में शामिल बच्चे बाल आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह के साथ उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक से मिलने राजभवन गये. बच्चों ने अपना मांग पत्रा राज्यपाल को दिया.
 
बाल आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह ने जब से अपना पदभार संभाला बच्चों को लेकर नयेनये काम करने में लगी रही. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्राी अखिलेश यादव के साथ बच्चों की बाल संसद का आयोजन किया. संसद डिपंल यादव के साथ बच्चों के न्यूट्रीशन, पोषण कार्यक्रम को आगे बढाया. जूही सिंह ने बाल संरक्षण गृहों का निरीक्षण करने के काम को पूरे प्रदेश में किया. जूही सिंह उत्तर प्रदेश के जिस शहर जाती थी वहां की संस्थाओं से मिलकर बच्चों की बेहतरी के लिये काम करती थी. कम समय में बाल आयोग की पूरी टीम के साथ बच्चों को एक मुकाम दिलाने का काम किया. ‘सेव द चिल्ड्रेन’ संस्था ने एक साल की सर्वे रिपोर्ट में पाया कि केवल राजधनी लखनउ में ही 10 हजार 771 स्ट्रीट चिल्ड्रेन है. इनमें 30 प्रतिशत लडकियां है. इनमें से 13 से 18 साल की बच्चियां हयूमन ट्रैफकिंग गिरोह के निशाने पर रहती है.
 
 
‘सेव द चिल्ड्रेन’ संस्था की अंजलि सिंह ने कहा कि इन बच्चों को समाज की मुख्यधरा में शामिल करना किसी चुनौती जैसा है.बाल आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह ने कहा कि इतने सारे बच्चों को सडक पर होना चिंता का विषय है. मुख्यमंत्राी ने इसको संज्ञान में लिया है. सरकार बहुत सारी योजनाओं में इनको अधिकार देने का काम कर रही है. यह समस्या एक दिन की नहीं है.अगर पहली की सरकारों ने बच्चों के मुददो पर काम किया होता तो हालात यह नहीं होते. जूही सिंह ने ‘एवरी लाॅस्ट चाइल्ड मिशन’ का ब्रांड एम्बेंसडर मिस ग्रैंड इंटरनेशनल वर्तिका सिंह को बनाया है. राज्यपाल ने बाल आयोग की इस पहल की सराहना की. बाल आयोग से तैयार 50 बच्चे अपनी मांगों को लेकर चुनाव के पहले सभी नेताओं से मिलकर बच्चों की मांग को चुनावी मुददा बनाने का दबाव बनायेगे.
                            
 

कृषि वानिकी खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाएं ज्यादा कमाएं

वक्त के साथसाथ खेती का नक्शा भी बदल रहा है. लोग ज्यादा और जमीन कम, यानी पैदावार घटने के पूरेपूरे आसार. ऐसे में कृषि वानिकी एक बेहतर रास्ता साबित हो सकता है. इस में खेती के साथसाथ बागबानी का फायदा भी मिल जाता है और आमदनी में भी इजाफा हो जाता है. कहावत है कि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते, लेकिन अगर नए तरीकों से आम, अमरूद, जामुन, बेर, आंवला, सेब, लीची, नीबू, बेल, शहतूत व शीशम आदि की उम्दा किस्मों के पेड़ लगाए जाएं तो भरपूर कमाई की जा सकती?है. गांवों व खेतों का तिहाई हिस्सा अगर पेड़ों से भरा हो तो माहौल व आबोहवा भी अच्छी बनी रहती है.

दरअसल बदलते जमाने में खेतीबारी के पुराने तौरतरीकों के सहारे किसानों का गुजारा नहीं होता. लिहाजा आमदनी में इजाफा करने के लिए नई जुगत करना लाजिम है. मसलन फसलें उगाने के साथसाथ इलाकाई पेड़ लगाना काफी फायदे का सौदा है. इसलिए राज्यों व केंद्र की सरकारें कृषि वानिकी को बढ़ावा दे रही हैं. कृषि वानिकी का मतलब व मकसद फसलों के साथ पेड़ लगा कर जमीन का बेहतर इस्तेमाल करना है, ताकि कम जमीन में भी ज्यादा आमदनी मुमकिन हो सके. कृषि वानिकी के तहत खेतों के आसपास खाली पड़ी जमीन व मेड़ों आदि पर पेड़ उगाए जाते हैं, साथ ही साथ बेहतर ढंग से फसलों, पेड़ों व जानवरों का इंतजाम किया जाता है. कृषि वानिकी वह जरीया है, जिस से किसी हद तक जंगलों के अंधाधुंध कटान की भरपाई हो सकती है. इसी की बदौलत घटते पेड़ों को बचाया व बढ़ाया जा सकता?है. साथ ही साथ किसान भी कृषि वानिकी की राह अपना कर खुद को माली तौर पर मजबूत कर सकते?हैं, क्योंकि लकड़ी, चारे व ईंधन आदि की मांग लगातार बहुत तेजी से बढ़ रही है. इस के अलावा कागज, लुगदी, माचिस, प्लाईवुड व नई तकनीक से बनी कंपोजिटवुड यानी बनावटी लकड़ी आदि के लिए पूरी जमीन का बेहतर इस्तेमाल करना जरूरी?है. जिस रफ्तार से पेड़ काटे जा रहे?हैं, उतने पेड़ लगाए नहीं जा रहे?हैं. लिहाजा जंगलात के महकमों ने सामाजिक वानिकी के साथ कृषि वानिकी को भी खास अहमियत देना तय किया है.

अहम मुद्दा

केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्रालय ने किसानों को बढ़ावा देने के लिए एग्रो फारेस्ट्री यानी कृषि वानिकी को राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) में शामिल कर लिया?है. इसी गरज से पिछले दिनों राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति 2014 जारी की गई थी. इस नीति के तहत देश भर में सभी खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने का मकसद तय किया गया है. दरअसल परंपरागत खेती में प्रति हेक्टेयर लागत बढ़ने से किसानों की आमदनी कम हो रही है. लिहाजा आम फसलें, फूल, सब्जी, मसाले या जड़ीबूटी आदि के साथ मेड़ों पर या खेतों के अंदर लाइनों में पेड़ लगाए जा सकते?हैं. लेकिन ध्यान रहे कि अपने इलाके की मिट्टी व आबोहवा के मुताबिक अच्छी बढ़वार वाली किस्मों के पेड़ ही लगाने चाहिए. इस के लिए सब से पहले बागबानी या जंगलात महकमे से अपने इलाके के लिए मुफीद पेड़ों के बारे में तकनीकी जानकारी व ट्रेनिंग लें. उस के बाद माकूल जगह चुनें. बीज हों तो उन्हें थैलियों में उगाएं या जंगलात महकमे की सरकारी नर्सरी से पौध लाएं. कृषि वानिकी के अलावा तजरबेकार किसान खेत के किसी हिस्से में नर्सरी लगा कर पौध बेचने का काम भी कर सकते हैं.

जानकारी हासिल करें

आमतौर पर किसान यूकेलिप्टस, पौपलर, सुबबूल, शीशम, बांस, आंवला, सागौन व जैट्रोफा आदि के पेड़ लगाते?हैं. वैसे नई किस्मों के पेड़ व उन्हें लगाने की तकनीकों पर वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई), देहरादून व राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के माहिरों ने काफी खोजबीन की है. उन्होंने कम लागत में उम्दा पेड़ लगा कर धन कमाने के कई नायाब तरीके निकाले?हैं. उन्हें अपना कर फायदा उठाया जा सकता है. मसलन बर्मा ड्रेक नाम के पेड़ किसानों के लिए सोने की खान साबित हो सकते हैं. इन की छंटान से जलाऊ लकड़ी व तैयार पेड़ से उम्दा किस्म की कीमती इमारती लकड़ी मिलती?है. इस के बीजतेल का इस्तेमाल साबुन बनाने में व दूसरे हिस्सों का इस्तेमाल दवाएं आदि बनाने में किया जाता है. इस बारे में तजरबेकार जानकारों से सलाहमशविरा किया जा सकता है. कृषि वानिकी को?बढ़ावा देने, उस पर खोजबीन करने व किसानों को बीज, पौध, सलाह व ट्रेनिंग देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक केंद्र झांसी (उत्तर प्रदेश) में काम कर रहा है. इस केंद्र के माहिरों ने किसानों के लिए बहुत सी ऐसी फायदेमंद तकनीकें निकाली हैं, जिन से खेती के साथ पेड़ लगा कर या बागबानी कर के आमदनी में खासी बढ़ोतरी की जा सकती है.

खेती संग पेड़ों से फायदे

बाढ़ व सूखे आदि में फसल खराब होने से हुए नुकसान की पूरी भरपाई तो पेड़ नहीं कर पाते, लेकिन फिर भी वे अपने उगाने वाले किसानों को सहारा जरूर देते हैं. पेड़ों से जलावन मिल जाता है, लिहाजा गोबर ईंधन बनने से बच जाता है व खाद बनाने में काम आता है. ऐसे में महंगी रासायनिक खाद कम डालनी पड़ती है. पेड़ों से खेती में काम आने वाले औजारों व इमारतों के लिए लकड़ी व जानवरों के लिए चारा मिलता है. साथ ही पेड़ों की गिरी हुई पत्तियों को सड़ा कर खाद बनती है. खेतों के आसपास पेड़ होने से कई फायदे हैं. मसलन पेड़ तेज हवाओं से फसलों को बचाते हैं. पेड़ों पर मधुमक्खियों को छत्ते लगाने की जगह आसानी से मिल जाती है. उन से मोम व शहद मिलता है. साथ ही जिन फसलों पर मधुमक्खियां बैठती हैं, उन में परागण अच्छा होता है. लिहाजा उपज बढ़ती है. पेड़ की जड़ों से जमीन का कटाव रुकता है और मिट्टी व पानी की बचत होती है. साथ ही पेड़ों की बिक्री से किसानों को एक मुश्त पैसा मिल जाता है. उत्तर प्रदेश में तैनात एक वन अधिकारी के मुताबिक किसानों को बगैर सोचेसमझे नहीं, बल्कि खासतौर पर ऐेसे पेड़ लगाने चाहिए, जो तेजी से बढ़ने वाले हों, ताकि कम वक्त में ही किसान उन से पक्की आमदनी हासिल कर सकें. पेड़ों की जड़ें लंबीगहरी और उन के तने सीधे होना बेहतर होता?है.

खेती महकमे के एक अफसर ने बताया कि जिन पेड़ों के बीज 2 दल के होते हैं, उन्हें उगाना किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद रहता है, क्योंकि ऐसे पेड़ जमीन में कुदरती नाइट्रोजन जमा करते हैं. उन से मुफ्त में मिली नाइट्रोजन फसलों के काम आती है. औषधीय पौधों से भी आमदनी ज्यादा होती है. इन की पौध वन विभाग की नर्सरी से ली जा सकती है. जनवरी में किसान पौपलर की पौध लगा सकते हैं. जनवरी में ही खैर, सिरस, आंवला, हरड़, सागौन, शीशम, सुबबूल, कदंब व आकाशमोनी के बीज जमा कर सकते हैं. पाली बैग में बीज बोने के लिए 4 हिस्से छनी मिट्टी में, 2 हिस्से बालू व 1 हिस्सा गोबर की सड़ी खाद मिलाएं व 4-6 इंच चौड़ी, 7-9 इंच लंबी थैली के 3 चौथाई हिस्से तक भरें. पौध रोपते वक्त लाइनों व पौधों की दूरी पेड़ की किस्म के हिसाब से 1 से 6 मीटर तक रखें.

जानकारी रखें

हालांकि राज्यों में जंगलात के महकमे वानिकी, सामाजिक वानिकी व कृषि वानिकी को बढ़ाने देने की स्कीमों के तहत तकनीक, बीज व पौध आदि मुहैया कराने और जंगली जानवरों से हुए नुकसान का मुआवजा देने आदि की सहूलियतें भी देते?हैं. यह बात अलग है कि ज्यादा किसानों तक उन की जानकारी नहीं पहुंचती. चूंकि सरकारी मुलाजिम किसानों के फायदे व नियमकायदे की बातें हर किसी को आसानी से नहीं बताते, लिहाजा किसानों का जागरूक रहना बेहद जरूरी?है. ज्यादातर किसान नहीं जानते कि उत्तर प्रदेश में मगरमच्छ, घडि़याल, बाघ, भेडि़या, हाथी व तेंदुआ आदि जंगली जानवरों द्वारा जख्मी किए गए लोगों को 1 लाख रुपए, मारे गए लोगों के वारिसों को 5 लाख रुपए व गाय, भैंस, घोड़ा, खच्चर, ऊंट या बैल आदि पालतू जानवरों द्वारा मारने पर 40 हजार रुपए तक मुआवजा वन विभाग द्वारा दिया जाता है.

जंगली जानवर अगर किसानों की फसल को नुकसान पहुंचाते?हैं, तो खेती या गन्ना महकमे से तय रकम किसानों को मुआवजे में दी जाती है. यदि जंगली जानवरों से किसानों के मकान को नुकसान होता?है, तो 5 से 25 हजार रुपए तक का मुआवजा उत्तर प्रदेश के वन विभाग से पीडि़तों को दिया जाता है, बशर्ते 24 घंटे में ऐसी घटना की सूचना वन विभाग के नजदीकी दफ्तर को दे दी जाए.

इस स्कीम में एक अजीब पेंच है कि इस में केवल जंगली हाथियों व गैंडों से हुआ नुकसान ही माना जाता है, जबकि नीलगाय, जंगली सुअर, बंदर फसलों को सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. लिहाजा उन्हें भी स्कीम में शामिल करना जरूरी है, लेकिन ज्यादातर किसानों को ऐसी इमदाद व मुआवजे आदि की भनक तक नहीं लगती. सरकारी महकमों के ज्यादातर मुलाजिम अपनी जेबें भरने के लिए किसानों की मदद करने की बजाय उन्हें तंग करते हैं.

पेड़ों का कटान

मेरठ के किसान रामपाल का कहना?है कि वे चाह कर भी अपने खेतों के आसपास पेड़ नहीं लगाते, क्योंकि राज्य सरकारों ने निजी पेड़ काटने के नियम बड़े टेढ़े बना रखे हैं. पेड़ काटने या हटाने की मंजूरी वन विभाग से लेनी पड़ती है. लकड़ी लाने व ले जाने के लिए भी अलग से परमिट लेना पड़ता है, जो घूस दिए या धक्के खाए बगैर आसानी से नहीं मिलता.

बहुत से किसान नहीं जानते कि उत्तर प्रदेश में पेड़ बचाने के कानून 1976 और वन उपज नियमावली 1978 को आसान बना कर कई बदलाव किए गए हैं. आम, नीम, पीपल, बरगद, महुआ व साल के कटान पर साल 2020 तक पाबंदी है. इन्हें काटने की मंजूरी के लिए अर्जी देने के 35 दिनों तक जवाब न मिलने पर किसान पेड़ काट सकते?हैं.

इन के अलावा उत्तर प्रदेश में अगस्त, अरू, उत्तीस, कैजूरिना, जंगल जलेबी, पापुलर, फराश बकाइन, विलायती बबूल, बबूल, सूबबूल, अयार, कठबेर, यूकेलिप्टस, रोबिनिया, बाटल, विलो, सिरिस, खडि़क, जामुन, ढाक, पेपर मलबरी, बेर, सहजन, शहतूत व आंवले सहित 28 किस्म के पेड़ काटने व उन्हें लाने ले जाने पर पाबंदी नहीं?है. ऐसी बातों की जानकारी किसानों को जरूर होनी चाहिए.

बिक्री नहीं प्रोसेसिंग करें

पेड़ तो हर कोई उगा सकता?है, लेकिन असल बात है उस की मार्केटिंग करना. तैयार पेड़ों की बिक्री किसानों को इस तरह करनी चाहिए कि उन्हें उन के पेड़ों की वाजिब कीमत ही नहीं भरपूर मुनाफा भी मिले. इस के लिए किसी खरीदार कंपनी से करार भी किया जा सकता है, क्योंकि माचिस व प्लाई बोर्ड आदि बनाने वाली कंपनियां किसानों से पहले ही पेड़ खरीद का कांट्रैक्ट कर लेती हैं.

इस के अलावा राज्यों के वन निगम भी तयशुदा कीमतों पर बहुत से पेड़ों की खरीद करते?हैं. लकड़ी की कीमत पेड़ों की किस्म, उन की क्वालिटी, गोलाई व ऊंचाई के मुताबिक मिलती?है. लेकिन ज्यादातर किसान कटान, चीरान व ढुलान आदि के झंझटों से बचने के लिए खड़े पेड़ों का ही सौदा कर देते हैं. बहुत से किसान अपने पेड़ों को कटवा कर खुद डिपो या कारखानों तक ले जाते हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर व सहारनपुर आदि जिलों में पापुलर की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है, लेकिन किसान खुद अपनी लकड़ी की प्रोसेसिंग नहीं करते. इस से उन्हें कृषि वानिकी का पूरा फायदा नहीं मिल पाता. वे अपने पेड़ों के तने कटवा कर ट्रैक्टर ट्राली में भर कर उन्हें प्लाईवुड व बोर्ड आदि बनाने वाले कारखानों को बेचने के लिए ले जाते हैं.

किसानों को चाहिए कि वे तकनीक सीखें व अपने पेड़ों की कीमत व अपनी आमदनी बढ़ाएं. वे अकेले या मिल कर खुद अपनी उत्पादन इकाई लगाएं और प्लाई, बोर्ड, माचिस व लकड़ी के चम्मच व बरतन आदि बनाएं. वे लकड़ी आधारित सजावटी चीजें बनाने का उद्योग भी लगा सकते?हैं. इस से उन्हें ज्यादा फायदा होगा. उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद व रामपुर में ऐसी बहुत सी इकाइयां कामयाबी से चल रही हैं. किसान उन्हें देखें, काम सीखें व आगे आएं. इस बारे में ज्यादा जानकारी इस पते से ली जा सकती है: निदेशक, राष्ट्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान केंद्र, पाहुज बांध, झांसी 284003, उत्तर प्रदेश.

 

 

 

अब जनरल भी एससी, एसटी, ओबीसी के समान

 

गुजरात सरकार ने राज्य दिवस के मौके पर आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. इस फैसले के बाद गुजरात देश का पहला राज्य बन गया है जहां आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का फैसला किया गया है.

सरकार इसके लिए ऑर्डिनेंस लेकर आएगी. सरकार का ऑर्डिनेंस आने से शिक्षा और नौकरी में सवर्णों को भी लाभ मिलेगा. इस आदेश का फायदा पाटीदार समुदाय को भी मिलेगा जो आरक्षण की मांग को लेकर काफी दिनों से आंदोलन कर रहे हैं.

यह फैसला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की मौजूदगी में लिया गया. गुजरात सरकार के मंत्री विजय रूपानी ने बताया कि ऐसे परिवार जिनकी सालाना आय 6 लाख से कम है वह इस आरक्षण के दायरे में होंगे. जनरल कैटिगरी में आने वाले आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को भी आरक्षण का मिलेगा. 1 मई को इस पर नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा.

हम आपको बता दें कि सबसे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की पैरवी की थी. अब गुजरात से इसकी शुरुआत ने एक अलग तरह का संकेत देने का काम किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह क्षेत्र में इस फैसले के लागू होने के बाद देश में इसकी दिशा तय होगी.

किसान की कहानी उन्हीं की जबानी

ग्राम मिलक रावली निवारी के 55 साल के किसान देवेंद्र सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद के कृषि वैज्ञानिकों से मधुमक्खी पालने के तरीकों के बारे में साल 2005 में जानकारी प्राप्त की और एक मधुमक्खी पालने का केंद्र शुरू किया. उस केद्र में पहले साल मधुमक्खी के 5 बक्से रखे. 1 बक्से की कीमत 2 हजार रुपए फ्रेम के साथ थी.

उन्होंने सिर्फ 10 हजार रुपए में मधुमक्खी पालने का काम शुरू किया. इस काम से देवेंद्र सिंह को 15 हजार रुपए की कीमत का शहद प्राप्त हुआ और साल 2006 में उन्होंने 10 बक्से तैयार किए. उन 10 बक्सों से देवेंद्र सिंह ने 36 हजार रुपए का शहद बेचा. साल 2007 में उन्होंने 30 बक्से तैयार किए, जिन से उन को 72 हजार रुपए की आमदनी हुई थी.

मधुमक्खी पालने के काम से?ज्यादा आमदनी देख कर उन की इस काम में रुचि बढ़ गई. साल 2008 में उन्होंने 60 बक्से तैयार किए, जिन से उन्हें 1 लाख, 36 हजार रुपए की अमादनी हुई थी. साल 2009 में उन्होंने 120 बक्से तैयार किए. उस से उन्हें 2 लाख 88 हजार रुपए की आमदनी हुई.

देवेंद्र सिंह ने बताया कि साल 2009 में 2 लाख 88 हजार रुपए की आमदनी होने के बाद उन के मधुमक्खी के बक्से चोरी हो गए थे. केवल 10 बक्से बचे थे. साल 2010 में देवेंद्र सिंह को काफी नुकसान हुआ, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने मधुमक्खी पालने के काम को फिर से शुरू किया. आज देवेंद्र सिंह के पास 150 बक्से तैयार?हैं, जिन से उन्हें करीब 3 लाख रुपए की आमदनी होती है. देवेंद्र सिंह ने दावा किया है कि इस काम में कम खर्च से?ज्यादा आमदनी होती है. यह काम बेरोजगारों के लिए बहुत ही फायदेमंद है.

कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद के वैज्ञानिकों से देवेंद्र सिंह ने मधुमक्खी पालने के तरीके के साथ पशु पालने की जानकारी भी साल 2005 में ली थी. पशु पालने के तरीके की जानकारी के बाद देवेंद्र ने 1 गाय व 1 भैंस पालना शुरू किया. वैज्ञानिकों से मिली जानकारी व पशुओं के रखरखाव की जानकारी का इस्तेमाल कर के पशुओं के दूध के धंधे से उन्हें हर साल 65 हजार रुपए से?ज्यादा की आमदनी हुई. देवेंद्र सिंह के बड़े बेटे गौरव इस काम में उन की मदद करते?हैं.

देवेंद्र सिंह ने बताया कि उन के पास 1 हेक्टेयर जमीन?है. उस जमीन में वे खरीफ व रबी की फसल में मक्का (हरा चारा), उड़द, गेहूं व गन्ने की खेती करते हैं. उन्होंने केंचुआ खाद तैयार करने का काम भी शुरू किया है.

देवेंद्र सिंह ने केंचुए पालने की जानकारी कृषि वैज्ञानिकों से साल 2008 में ली थी और अपने खेत में केंचुआ खाद तैयार करने का काम शुरू किया था. उन्होंने कुल 5 हजार रुपए के केंचुए खरीद कर इस काम को शुरू किया. इस काम से उन्होंने 25 हजार रुपए के केंचुए बेचे और 60 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची, जिस में घर के पशुओं के गोबर की खाद का इस्तेमाल किया गया था.

साल 2009 में देवेंद्र सिंह ने 75 हजार रुपए के केंचुए और 80 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची?थी, जिस से उन्हें 67 हजार रुपए की कुल आमदनी हुई. साल 2010 में देवेंद्र सिंह ने 1 लाख 50 हजार रुपए के केंचुए और 1 लाख रुपए की केंचुआ खाद बेची?थी, जिस में उन्हें 1 लाख 62 हजार रुपए की आमदनी हुई थी. साल 2011 में देवेंद्र सिंह ने 2 लाख रुपए के केंचुए और 2 लाख 30 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची, जिस से उन्हें 2 लाख 42 हजार रुपए का फायदा हुआ.

साल 2012 में उन्होंने 2 लाख 50 हजार रुपए के केंचुए और 1 लाख 50 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची?थी, जिस से उन्हें 3 लाख 2 हजार रुपए की शुद्ध आमदनी हुई थी. साल 2013 में देवेंद्र सिंह ने 2 लाख 25 हजार रुपए के केंचुए और 1 लाख 80 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची थी, जिस से 2 लाख 97 हजार रुपए की कुल आमदनी हुई. साल 2014 में देवेंद्र सिंह ने 2 लाख 75 हजार रुपए के केंचुए और 2 लाख रुपए की केंचुआ खाद बेची, जिस से उन्हें 3 लाख 70 हजार रुपए का फायदा हुआ.

साल 2015 में देवेंद्र सिंह ने 1 लाख 25 हजार रुपए के केंचुए और 90 हजार रुपए की केंचुए खाद बेची, जिस से उन्हें 1 लाख 70 हजार रुपए की आमदनी हुई, जबकि उन के पास 500 क्विंटल केंचुआ खाद अभी बेचने के लिए रखी है.

देवेंद्र सिंह ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद उन के लिए एक वरदान साबित हुआ है, क्योंकि इस से पहले उन्हें जानकारी के लिए पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में जाना पड़ता था. देवेंद्र सिंह का कहना है कि फसलों के लिए बीज के रखरखाव, मिट्टी की जांच, अच्छे बीज, पशुपालन, मुरगीपालन, बकरीपालन, सुअरपालन के बारे में जानकारी किसानसभा द्वारा दी जाती है. वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के उन की आमदनी दोगुनी हो गई है. उन का परिवार अब बहुत सुखी है.           

– डा. प्रमोद मडके, डा. अनंत कुमार (कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद)

खेती से जुड़े मई के अहम काम

तपिश से भरा मई का महीना हर किसी की हालत खराब कर देता है. हर वक्त तो एसी की छांव तले रहना मुमकिन नहीं होता, लिहाजा गरमी का कहर झेलना लाजिम है. वैसे?भी हिंदुस्तान का हर घर अभी एसी के दायरे में नहीं आता. और जब बात खेती के होनहारों यानी किसानों की हो, तब तो आराम हराम होता है. किसान गरमी के थपेड़े व लपट झेलते हुए बदस्तूर अपना कर्म निभाते रहते हैं और धरती का दामन चीर कर अनाज व अन्य फसलें उगाते रहते हैं.

इस साल मार्च का मौसम खेती व किसानों को रास नहीं आया था. बिन बुलाई बरसात ने मार्च में किसानों का?भट्ठा बैठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और मौसम की उलटपलट का आलम यह रहा कि अप्रैल में भी दबा कर गरमी पड़ी.

बहरहाल, मौसम व हालात के झमेले के बीच कर्मयोगी किसान हमेशा डटे रहते?हैं और उन के कामों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता?है. पेश?है मई के दौरान किए जाने वाले खेती के कामों का एक बयोरा:

* गेहूं की कटाई की मुहिम खत्म होने के बाद खाली खेतों को अगली फसल के लिहाज से तैयार करना एक खास मकसद होता है.

* गेहूं के साथसाथ जई व जौ वगैरह फसलें दे चुके खेतों की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें ताकि पिछली फसल के बचेखुचे हिस्से खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएं और मिट्टी भी मुलायम हो जाए. पिछली फसल का मोटामोटा कचरा बटोर कर खेत से अलग कर देना चाहिए.

* मई की गरमी का खास फायदा यह होता?है कि इस के ताप से तमाम कीड़ेमकोड़े झुलस कर खत्म हो जाते?हैं. इसीलिए करीब 2 हफ्ते के अंतराल से खेतों की लगातार जुताई करते रहना चाहिए. ऐसा करने से गरमी व लू का असर मिट्टी में अंदर तक जाता?है और वहां मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया व फफूंदी खत्म हो जाते?हैं.

* मिट्टी को भरपूर धूप का सेवन कराना काफी मुफीद साबित होता?है. इस से मिट्टी का बाकायदा इलाज यानी उपचार हो जाता?है और मिट्टी अगली फसल के लिए उम्दा तरीके से तैयार हो जाती?है.

* मेहनत और होशियारी से तैयार किए गए खेतों में बारिश का मौसम शुरू होने के बाद खरीफ की फसलों की बोआई उम्दा तरीके से की जा सकेगी. कायदे से तैयार किए गए खेतों में दूसरे खेतों के मुकाबले बेहतर नतीजे मिलते?हैं.

* मई में अपने ईख के खेतों का भी खास खयाल रखें और 2 हफ्ते के अंतर से बराबर सिंचाई करते रहे, ताकि खेतों में नमी बरकरार रहे.

* गन्ने यानी ईख के खेतों में सिंचाई के साथसाथ निराईगुड़ाई भी करते रहें ताकि फालतू के खरपतवार न पैदा हो सकें.

* गन्ने की फसल में कीड़ों व रोगों का खतरा बराबर बना रहता?है, लिहाजा उन के मामले में सतर्क रहें. जरा भी जरूरत महसूस हो तो कृषि वैज्ञानिक की मदद ले कर कीटों व रोगों का इलाज कराएं.

* अगर धान की अगेती किस्म की नर्सरी डालने का इरादा हो, तो मई के आखिर तक डाल सकते?हैं. नर्सरी में कंपोस्ट खाद या गोबर की खाद का इस्तेमाल जरूर करें. इस के अलावा फास्फोरस व नाइट्रोजन का भी सही मात्रा में इस्तेमाल करें.

* धान की नर्सरी डालने में ध्यान रखने वाली बात यह है कि हर दफे जगह बदल कर ही नर्सरी डालें. धान की नर्सरी से अच्छा नतीजा पाने के लिए सिंचाई में कोताही न बरतें.

* अगर सिंचाई का पूरा इंतजाम हो तो चारे के लिहाज से ज्वार, बाजरा व मक्के की बोआई करें. पानी की किल्लत होने पर इन फसलों की बोआई न करें, क्योंकि इन फसलों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है.

* मई महीने के आसपास बरसीम, लोबिया व जई की बीज वाली फसलें तैयार हो जाती?हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम खत्म करें.

* मई के अंतिम हफ्ते में अरहर की अगेती किस्मों की बोआई करें, मगर बोआई से पहले जुताई कर के व खाद वगैरह मिला कर खेत ढंग से तैयार करना लाजिम है.

* तेल की खास फसल सूरजमुखी के खेतों की सिंचाई करें, क्योंकि मई के गरम मौसम में खेत में नमी रहना बेहद जरूरी?है.

* सूरजमुखी की सिंचाई के वक्त इस बात का खास खयाल रखें कि पौधों की जड़ें न खुलने पाएं. अगर पानी की धार से जड़ें खुल जाएं, तो उन पर मिट्टी चढ़ाना न भूलें. मिट्टी चढ़ाने से पौधों को मजबूती मिलती है और वे तेज हवाओं को भी झेल लेते हैं.

* मई के आसपास सूरजमुखी की फसल को बालदार सूंड़ी व जैसिड रोग का काफी खतरा रहता?है. ऐसा होने पर कृषि वैज्ञानिकों की राय ले कर माकूल इलाज करें.

* गाजर, मूली, मेथी, पालक, शलजम, पत्तागोभी, गांठगोभी व फूलगोभी की बीज वाली फसलें आमतौर पर मई तक तैयार हो जाती?हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम खत्म करें. बीजों को निकालने के बाद सुखा कर उन का कायदे से भंडारण करें.

* पहले डाली गई तुरई की नर्सरी के पौधे तैयार हो चुके होंगे, लिहाजा मई के आखिर तक उन की रोपाई करें.

* तुरई की नर्सरी डालने का इरादा हो, पर अभी तक डाली न हो, तो यह काम फौरन खत्म करें. ज्यादा देर करने पर नर्सरी डालने का समय बीत जाएगा.

* खेत को अच्छी तरह तैयार करने के बाद बरसात के मौसम वाली भिंडी की बोआई करें, बोआई से पहले निराईगुड़ाई कर के खेत के तमाम खरपतवार निकाल दें.

* अपने प्याज के खेतों का मुआयना करें. अगर खेत में नमी कम लगे तो तुरंत हलकी सिंचाई करें. मई के आखिर तक प्याज की पत्तियों को खेत पर झुका दें, ऐसा करने से?प्याज की गांठें उम्दा होंगी.

* अमूमन मई में लहसुन की फसल तैयार हो जाती?है, लिहाजा उस की खुदाई करें. खुदाई के बाद फसल को 3 दिनों तक खेत में सूखने दें. 3 दिन बाद लहसुनों को उठा कर साफ व सूखी जगह पर रखें.

* मई के आसपास अकसर लीची के फलों के फटने की शिकायत सामने आती?है. इस की रोकथाम के लिए लीची के गुच्छों व पेड़ों पर पानी का अच्छी तरह छिड़काव करना कारगर रहता है.

* अपने आम, अमरूद, नाशपाती, आलूबुखरा, पपीता, लीची व आंवला के बागों की 10-15 दिनों के अंतराल पर ढंग से सिंचाई करते रहें. मई के दौरान सिंचाई में लापरवाही बरतना ठीक नहीं?है, क्योंकि गरमी की वजह से बागों का पानी बेहद तेजी से सूखता है.

* अपने फलों के बगीचों की सफाई का पूरा खयाल रखें. सफाई न होने से फसल पर असर पड़ता है.

* अगर तुलसी की बोआई करनी हो तो इस के लिए मई का महीना मुफीद रहता?है.

* मई में ही औषधीय फसल सफेद मूसली की भी बोआई करें. यह काफी मुनाफे वाली फसल होती है.

* एक अन्य औषधीय फसल सर्पगंधा की नर्सरी डालने के लिहाज से भी मई का महीना बेहद मुनासिब होता?है.

* मई के तीसरे हफ्ते में पहाड़ी इलाकों में रामदाना की बोआई करें. बोआई से पहले बीजों को फफूंदीनाशक से उपचारित करना न भूलें.

* मई के आखिरी हफ्ते में पहाड़ी इलाकों में मंडुआ की बोआई भी की जा सकती?है.

* सूरजमुखी के खेत में मधुमक्खियों के बक्से रखें. बक्सों को छायादार जगह पर ही रखें. बक्सों के आसपास टबों में पानी भर कर रखें ताकि मधुमक्खियों को पानी की खोज में भटकना न पड़े.

* मई की गरमी में अकसर मछली पालने वाले तालाब सूखने लगते?हैं, लिहाजा उन की मरम्मत कराएं ताकि उन का पानी बाहर न निकल सके. तालाब की सफाई का भी खयाल रखें.

* मई में मवेशियों को लू लगने का खतरा रहता?है, लिहाजा उन्हें बारबार साफ व ताजा पानी पिलाएं. लू लगने पर पशु के सिर पर बर्फ की पोटली रखें व डाक्टर को दिखाएं.

* गरमी की वजह से गायभैंस के छोटे बच्चों को अकसर दस्त की शिकायत हो जाती है, ऐसे में उन्हें दूध कम पीने दें. बीमार बच्चे को दूसरे बच्चों से अलग रखें. जरूरी लगे तो डाक्टर को बुलाएं.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए उन के शेडों के अंदर कूलरों का इंतजाम करें या शेड की जालियों पर जूट के परदे लगा कर उन्हें पानी से भगोते रहें.

* मवेशियों के खाने का खास खयाल रखें. उन्हें बासी व खराब चारा न दें, वरना हैजा होने का खतरा रहता है.

धान में आईपीएम प्रदर्शनों की कामयाबी की कहानी

किसानों की जबानी

हाल ही में ‘वित्त पोषित, विज्ञान एवं प्रौद्यौगिक परिषद लखनऊ’ और ‘आयोजक कीट विज्ञान विभाग सरदार बल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ’ द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ‘राइस प्रोडक्शन एंड एक्सटेंशन स्ट्रेटेजीस फार सस्टेनेबल मैनेजमेंट आफ राइस पेस्ट्स इन वेस्टर्न प्लेन जोन आफ यूपी’ परियोजना के सौजन्य से प्रदर्शन लगाए गए और प्रशिक्षण दिए गए हैं, जिस में अच्छे नतीजे सामने आए. किसानों की जबानी पेश है इन नतीजों का खुलासा:

* मेरे पास 60 बीघे जमीन है, जिस में से 20 बीघे जमीन में मैं धान लगाता हूं. कीटोंबीमारियों की वजह से धान की उपज कम होती?थी. साल 2013-14 में मैं डा. राजेंद्र सिंह व उन के सहयोगियों के संपर्क में आया था. तब से मेरे व आसपास के सभी किसानों के खेतों पर प्रदर्शन होने व प्रशिक्षण दिए जाने से धान के कीड़ों व बीमारियों की जानकारी हासिल हुई. नतीजतन धान की उपज में 2-3 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से इजाफा हुआ.

-सत्तेंद्र सिंह पुत्र वीर सिंह, गांव सिवाया, दौराला, मेरठ.

* मेरे संपर्क में 20 किसान रहते?हैं. वे सभी धान की खेती करते हैं. हम सभी किसानों के धान की फसल में कीटों द्वारा सब से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता था. डा. राजेंद्र सिंह?द्वारा हमारे खेतों पर किए गए प्रदर्शनों व प्रशिक्षणों के जरीए हमें बहुत सारा ज्ञान प्राप्त हुआ. अभी तक हम बिना सोचविचारे कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल कर रहे थे, जिस वजह से खर्च बढ़ रहा था और लोगों की सेहत खराब होने के साथसाथ जमीन व वातावरण पर भी खराब असर पड़ रहा था. मैं डा. साहब से गुजारिश करता हूं कि वे ऐसे कार्यक्रम हमेशा चलाते रहें.

-मुस्तफा पुत्र मौम्हद यासीन, गांव समोली, दौराला, मेरठ.

* आईपीएम विधि क्या है, यह तो सभी किसान डा. राजेंद्र सिंह द्वारा लगाए गए प्रदर्शन व प्रशिक्षण के जरीए जान गए हैं. इस विधि द्वारा कम लागत से ज्यादा उत्पादन लिया गया?है. इस से साफ है कि पहले फेरोमोन ट्रैप से कीटों का पता लगाया गया और फिर अंड परजीवी ट्राईकोग्रामा से तनाछेदक व पत्तीमोड़क कीटों की रोकथाम की गई. इस के अलावा रस्सी घुमाने जैसी तकनीक से?भी पत्तीमोड़क कीटों का सफाया किया गया. नतीजतन बिना कीटनाशक दवाओं के धान का उत्पादन हुआ, जिस से उस चावल की मांग बढ़ गई.

-यामीन पुत्र कल्लू, गांव समोली, दौराला, मेरठ.

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