भारत के गांवों में ज्यादातर लोग खेती पर ही निर्भर रहते हैं. हमारे देश के किसान कर्ज में ही जन्म लेते हैं और जिंदगीभर कर्जदार ही बने रहते हैं. किसान अपना खूनपसीना बहा कर अनाज पैदा करते हैं. पुराने समय में गांव के जमींदार लोग छोटेछोटे किसानों का खून चूस कर अपना पेट फुलाए बैठे रहते थे. तब सारा काम करने वाले किसानों को कपड़ा व भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था. मीठू का पिता धनो किसान था. वह अपनी जिंदगी को किसी तरह चला रहा था. वह दिनभर हल चलाता रहता और शाम को घर आने पर उस की बीवी चुनियां उसे कुछ खाने को देती. खाने के बाद वह अपने बैलों को खिलानेपिलाने में लग जाता. शाम को उस की हुक्का पीने की आदत थी. चुनियां हुक्का भर कर देती थी. एक दिन शाम को गांव का सेठ उस के दरवाजे पर आ गया और उस से बोला, ‘‘क्यों रे धनो, मेरा हिसाब कब करेगा?’’

उस बेचारे का हुक्का पीना बंद हो गया. वह बोला, ‘‘मालिक, अभी तो खाने के लिए भी पैसा नहीं है, हिसाब कैसे चुकता करूं? पैसा होने पर सब चुका दूंगा.’’ सेठ धनो को उसी समय अपने आदमियों से बंधवा कर साथ ले गया और उसे मारपीट कर वापस भेज दिया. मार खा कर धनो अधमरा हो गया. मीठू अपने पिता की हालत देख कर बहुत परेशान हो गया. वह डाक्टर को बुलाने गया, लेकिन डाक्टर के आने तक धनो मर गया. पिता की मौत के बाद मीठू गांव छोड़ कर शहर चला गया. उसे वहां नौकरी मिल गई. पैसा कमा कर उस ने वहीं अपना घर बसा लिया. यह किसानों के जीवन की एक आम झलक है.

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