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किसान का जीवन एक हवनशाला

भारत के गांवों में ज्यादातर लोग खेती पर ही निर्भर रहते हैं. हमारे देश के किसान कर्ज में ही जन्म लेते हैं और जिंदगीभर कर्जदार ही बने रहते हैं. किसान अपना खूनपसीना बहा कर अनाज पैदा करते हैं. पुराने समय में गांव के जमींदार लोग छोटेछोटे किसानों का खून चूस कर अपना पेट फुलाए बैठे रहते थे. तब सारा काम करने वाले किसानों को कपड़ा व भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था. मीठू का पिता धनो किसान था. वह अपनी जिंदगी को किसी तरह चला रहा था. वह दिनभर हल चलाता रहता और शाम को घर आने पर उस की बीवी चुनियां उसे कुछ खाने को देती. खाने के बाद वह अपने बैलों को खिलानेपिलाने में लग जाता. शाम को उस की हुक्का पीने की आदत थी. चुनियां हुक्का भर कर देती थी. एक दिन शाम को गांव का सेठ उस के दरवाजे पर आ गया और उस से बोला, ‘‘क्यों रे धनो, मेरा हिसाब कब करेगा?’’

उस बेचारे का हुक्का पीना बंद हो गया. वह बोला, ‘‘मालिक, अभी तो खाने के लिए भी पैसा नहीं है, हिसाब कैसे चुकता करूं? पैसा होने पर सब चुका दूंगा.’’ सेठ धनो को उसी समय अपने आदमियों से बंधवा कर साथ ले गया और उसे मारपीट कर वापस भेज दिया. मार खा कर धनो अधमरा हो गया. मीठू अपने पिता की हालत देख कर बहुत परेशान हो गया. वह डाक्टर को बुलाने गया, लेकिन डाक्टर के आने तक धनो मर गया. पिता की मौत के बाद मीठू गांव छोड़ कर शहर चला गया. उसे वहां नौकरी मिल गई. पैसा कमा कर उस ने वहीं अपना घर बसा लिया. यह किसानों के जीवन की एक आम झलक है.

सरकार द्वारा दिए गए अनुदान भी किसानों को नहीं मिल पाते हैं. सरकारी मुलाजिम सब खापी जाते हैं. ज्यादातर किसानों की सेहत दिनोंदिन गिरती जाती है. आखिर में वे भुखमरी या किसी बीमारी का शिकार हो कर  दुनिया से चले जाते हैं. वे खेत रूपी हवनशाला में अपनी जिंदगी को चढ़ा देते हैं. ज्यादातर किसान मवेशी भी पालते हैं. सुबह से ले कर शाम होने तक वे उन की देखभाल करते हैं और रात को जो कुछ रूखासूखा मिलता है, उसे खा कर सो जाते हैं. हमारे देश में कम जोत वाले किसानों को ज्यादा खराब समय बिताना पड़ता है. उन की सेहत तो ठीक रहती नहीं, उन्हें पेट भरने के लिए अलग से मजदूरी करनी पड़ती है.

किसानों के 3 तबके हैं. पहले तबके के किसानों के पास थोड़ी सी जमीन होती है. वे किसी तरह खेती कर के काम चलाने की कोशिश करते हैं. उन के पास काफी मात्रा में पूंजी व साधन नहीं होते हैं. वे खेती के अलावा मजदूरी भी कर लेते हैं. इस तबके के किसान जब बीमार पड़ते हैं, तो उन्हें गांव के महाजन से सूद पर पैसा लेना पड़ता है, जो जल्दी ही बढ़ कर बहुत ज्यादा हो जाता है. महाजन का कर्ज चुकाने के लिए ऐसे किसानों को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ती है, लेकिन उस से भी वे पूरा कर्ज नहीं चुका पाते. उन का न तो ढंग से इलाज हो पाता है, न ही समय पर कर्ज दे पाते हैं. नतीजतन, सही इलाज न हो पाने के चलते किसान मर जाते हैं और उन के बच्चे कर्जदार बने रहते हैं.

दूसरे तबके के किसानों के पास कुछ जमीन और पूंजी होती है. पूंजी से वे मवेशी पालते हैं. वे लोग खेती करने के लिए एक जोड़ी बैल रखते हैं, जिस से हल चला कर समय पर खेती कर लेते हैं. इन की जिंदगी कुछ हद तक ठीक रहती है. इस तरह के किसान दूध भी बेचते हैं, जिस से नकद आमदनी भी होती है. ऐसे किसान पैसे कमाने के चक्कर में खुद दूध का इस्तेमाल नहीं करते. अच्छा भोजन न मिल पाने के चलते ये बीमारी से पीडि़त हो जाते हैं. ऐसी हालत में ये जमीन बेच कर अपना इलाज कराते हैं. मजबूरी में इन्हें काफी कम दामों पर जमीन बेचनी पड़ती है. तीसरे तबके के किसान ज्यादा पैसे वाले होते हैं. ये मजदूरों से जम कर काम लेते हैं और समय पर पैसा भी नहीं देते. ये इन किसानों को दुत्कारते और ताने देते रहते हैं. इन की हालत पहले और दूसरे तबके के किसानों से काफीबेहतर होती है.

लेकिन कुलमिला कर सभी तबकों के किसानों की हालत खराब है. चूंकि तीसरे तबके के किसान खुद खेतों में काम नहीं करते हैं, इसलिए उन की फसल अच्छी नहीं हो पाती, जिस के चलते उन की घरगृहस्थी डूबने लगती है. आज किसानों को नएनए तरीके से खेती करनी पड़ रही है. इस के लिए उन्हें काफी पैसों की जरूरत होती है. जब समय पर पैसा नहीं जुट पाता है, तो किसान अपनी जमीन बेच कर पैसों का इंतजाम करते हैं. खेती के लिए हर किसान के पास अपने साधन होने बेहद जरूरी हैं, लेकिन सभी तबकों के किसानों के सामने पैसों की कमी की समस्या बनी रहती है. माली तंगी के चलते किसानों की हालत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है, जिस की वजह से हमारे देश के किसान मेहनती होते हुए भी कामयाब नहीं हो पाते हैं. सरकार किसानों को अनुदान के रूप में जो खादबीज देती है, वह भी उन्हें समय पर नहीं मिल पाता है और खेत खाली पडे़ रहते हैं.

आमतौर पर अनुदान की चीजों को बेच कर सरकारी मुलाजिम अपनी जेबें भर लेते हैं. बेचारे किसान दिनभर चिलचिलाती धूप, बरसात और ठंड सहने को मजबूर होते हैं. आमतौर पर भारतीय किसान बहुत ही मेहनती होते हैं. वे अपनी मेहनत के बल पर हम लोगों को अनाज मुहैया कराते हैं. वे खुद मामूली जिंदगी बिताते हैं, जिस के जरीए दूसरों का पेट भरते हैं. इस तरह यह सच ही कहा गया है कि भारत के किसान दूसरों की भलाई करतेकरते खुद को हवनशाला में झोंक देते हैं.

मेकअप फौर परफैक्ट सैल्फी

ब्यूटी क्वीन बनने की ख्वाहिश अब बीते दिनों की बात हो गई है. अब हर हसीन आंखों में एक नया ख्वाब करवटें लेता नजर आता है और वह है सैल्फी क्वीन का ताज हासिल करने का. सैल्फी खींचना, अपलोड करना और फिर फेसबुक, ट्विटर पर कितने लाइक्स मिले इस पर ही उन की जिंदगी का सारा दारोमदार टिका होता है और यह हाल महज टीनऐजर्स का नहीं है, गृहिणियां और कामकाजी महिलाएं भी सैल्फी क्रेजी बन चुकी हैं. लेकिन सैल्फी क्लिक करना जितना आसान है, परफैक्ट सैल्फी खींच पाना उतना ही मुश्किल है. मेकअप, कैमरा ऐंगल, बैकग्राउंड और ऐसी ही कई और बातों को सीखने और ध्यान में रखने से ही आप पाएंगी एक मैजिकल परफैक्ट सैल्फी. तो आइए, जानें कुछ मैजिकल टिप्स:

एसपीएफ युक्त ब्यूटी प्रोडक्ट्स से रहें दूर: सनस्क्रीन क्रीम, लोशन लगा कर सैल्फी ली तो चेहरा धुलाधुला सा नजर आएगा, क्योंकि ब्यूटी प्रोडक्ट्स में जो एसपीएफ इस्तेमाल होता है वह चेहरे पर एक लेयर औफ शाइन बना देता है ताकि सनलाइट रिफ्लैक्ट हो सके और आप सनटैनिंग से बच सकें.

मैट प्राइमर का इस्तेमाल करें: मैट प्राइमर का इस्तेमाल कर आप अपने टीजोन को चमकदार दिखने से रोक सकती हैं और इस से आप की स्किन औयली और पैची भी नजर नहीं आएगी. प्राइमर का एक फायदा यह भी होगा कि चेहरे के सारे पैचेज छिप जाएंगे और फिल्टर का इस्तेमाल किए बिना भी आप की सैल्फी फ्रैश, खूबसूरत व यंग नजर आएगी.

मसकारा ब्लैक ही चुनें: सैल्फी लेते वक्त मसकारा अवश्य लगाएं. यह आंखों को पूरी तरह खोल देता है और उन्हें बड़ा दिखाता है. बड़ीबड़ी कजरारी आंखों के जादू से कौन बच पाया है. मसकारा न सिर्फ पलकों को लंबा, घना दिखाता है, बल्कि उन की परफैक्ट शेप को भी हाईलाइट करता है. लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि सैल्फी लेते वक्त हमेशा ब्लैक मसकारा ही चुनें. ड्रैस के रंग के अनुसार ब्लू, ग्रीन, ब्राउन मसकारा नहीं, क्योंकि सैल्फी में ब्लैक मसकारा ही सब से बेहतर रिजल्ट देता है.

आईब्रोज: आईब्रोज के परफैक्ट शेप में होने से चेहरे को नीट ऐंड क्लीन लुक मिलता है. साथ ही आप आईब्रोज के गैप्स को भी आईब्रो पैंसिल से अच्छी तरह भर लें वरना आईब्रोज सैल्फी में हलकी नजर आएंगी या दिखेंगी ही नहीं. इसलिए आईब्रोज डार्क व मोटी रखें. पतली और हलकी आईब्रोज से आंखें खिंची हुई सी लगती हैं और फिर उम्र भी अधिक नजर आती है.

आईलैशेज: इन्हें लंबा, घना दिखाने के लिए क्रेयौन बेस्ड काजल पैंसिल अप्लाई करें.

लिप्स: फुलर लिप्स पाने के लिए क्यूपिड बो पर हाईलाइटर अप्लाई करें. परफैक्ट पाउट लुक के लिए सैंसुअस लिपग्लौस लगाएं और अगर क्लासिक फिनिश की चाहत रखती हैं तो मैट लिपस्टिक लगाएं. मैच्योर महिलाएं डार्क कलर लगाएंगी तो लिप्स सिकुड़े हुए यानी रिंकल्स वाले लगेंगे और वे उम्रदराज भी नजर आएंगी. और एक बात, अगर आप के लिप्स ही आप के चेहरे का सब से बड़ा आकर्षण हैं तो बिंदास बोल्ड कलर की लिपस्टिक विद लिपग्लौस लगाएं व प्रौपर फिल्टर के यूज से लिप्स को हाईलाइट भी करें.

ब्लशऔन: पिक्चर परफैक्ट सैल्फी के लिए हाई चीकबोंस जरूरी हैं. अपनी चीकबोंस को पीच या पिंक ब्लशर से हाईलाइट करें और सैल्फी में द बैस्ट नजर आएं.

इल्यूमिनेटर ट्रिक: यंग और ग्लोइंग स्किन पाने के लिए लिक्विड इल्यूमिनाइजर सब से अच्छा ब्यूटी प्रोडक्ट है. इसे अवश्य इस्तेमाल करें. अगर आप की चीकबोंस उठी नहीं हैं, तो इल्यूमिनेटर की सहायता से हाई चीकबोंस का भ्रम पैदा कर मैजिकल सैल्फी पा सकती हैं.

ब्रोंजर: सन किस्ड लुक पाना चाहती हैं, तो ब्रोंजर अप्लाई करें. लेकिन इस के चुनाव में सावधानी बरतें. याद रखें कि शिमरी ब्रोंजर सामने तो अच्छा लगता है, मगर सैल्फी में चिपचिपा, स्टिकी नजर आ सकता है. सैल्फी लेते वक्त मैट ब्रोंजर का इस्तेमाल सही औप्शन है.

स्माइल: सैल्फी में पाउटी फेस बनाना एक रूटीन और बोरिंग पोज हो गया है. बदलाव के लिए दिल लूट लेने वाली और कम से कम 500 लाइक्स पाने वाली मोहक स्माइली सैल्फी लें.

हेयरडू: बालों को क्राउनिंग ग्लौरी यों ही नहीं कहा गया है. प्रौपर हेयरस्टाइल से लुक्स में जमीनआसमान का फर्क पड़ता है. सैल्फी के लिए फैंसी बन हेयरडू अपनाएं या फिर बालों में वेव्स, कर्ल्स डालें. ये भी खूबसूरती बढ़ाते हैं. पिकनिक गैटटुगैदर हिली ऐरिया में हो या बीच पर सैल्फी तो ली ही जाती है. लेकिन तेज हवा खेल बिगाड़ सकती है. अच्छा हो अगर पर्स में हेयरस्प्रे कैरी करें. साथ ही हेयरपिन्स भी.

लाइटिंग: परफैक्ट सैल्फी वह होती है, जिस में लाइट इफैक्ट प्रौपर हो, उस में शैडो नहीं पड़नी चाहिए, न ही सैल्फी लेते वक्त आप के हाथ की ओर न ही सोर्स औफ लाइट की ओर. बेहतर होगा अगर प्राकृतिक रोशनी में सैल्फी लें. घर के अंदर भी हैं, तो खिड़की या दरवाजे के करीब जाएं ताकि सूर्य की किरणें चेहरे को नैचुरल ग्लो दे सकें. रात में सैल्फी क्लिक करें तो ध्यान रखें कि सोर्स औफ लाइट आप के सामने हो या फिर आप के सिर के ऊपर.

हाथ को स्थिर रखें: शेकी हैंड से ली गई सैल्फी क्लीयर नहीं आती. बेहतर हो अगर आप दोनों हाथों का इस्तेमाल कर सैल्फी खींचें. कुछ स्मार्टफोन में ऐंटीशेक फीचर आता है, जिस से यह प्रौब्लम पूरी तरह हल हो जाती है. एक और तरीका है कि आप बर्स्ट मोड में फोटो लें, जिस में औटोमैटिकली कई शौट्स शूट हो जाते हैं और बाद में आप उन में से सब से अच्छे फोटो को अपलोड कर सकती हैं.

बैकग्राउंड भी महत्त्वपूर्ण है: सैल्फी में महज आप का खूबसूरत दिखना ही काफी नहीं है. सूटेबल बैकग्राउंड का होना भी जरूरी है. अस्तव्यस्त बैडरूम या बाथरूम में खींची सैल्फी कभी ज्यादा लोगों को अपील नहीं करती. अपनी ड्रैस के रंग से मेल खाता बैकग्राउंड चुनें. आप की सैल्फी में चार चांद लग जाएंगे.

सही कैमरा ऐंगल चुनें: डबल चिन इफैक्ट से बचने के लिए कैमरे को अपनी चिन के नीचे कभी न रखें. सिर को हलका सा तिरछा कर पोज बनाएं, तो अकसर स्टाइलिश फोटो आता है. सैल्फी में कंप्लीट बौडी लेने की कोशिश न करें. अकसर बौडी थोड़ी डिफैक्टिव आती है. सैल्फी लेते वक्त आकर्षक ऐक्सैसरीज का इस्तेमाल ऐक्स्ट्रा ग्लैमर भर देता है जैसे स्कार्फ, औक्सीडाइज्ड ज्वैलरी पीस, गौगल्स या हैट. लेकिन एक समय में 2 से ज्याज ऐक्सैसरीज न पहनें.

सही फिल्टर का इस्तेमाल: इस का इस्तेमाल कम करें. चेहरे के दागधब्बे छिपाने या फिर खासतौर पर अपने होंठों या आंखों पर फोकस करने तक बात ठीक है, लेकिन बहुत ज्यादा फिल्टर से नैचुरैलिटी चली जाती है. सैल्फी अपनी खुशी और मजे के लिए खींचें. इसे अपना ऐडिक्शन न बनने दें और न ही अपलोड करने के बाद इस पर आए कमैंट्स से अपने ऊपर असर लें. और हां, सैल्फी के लिए अपनी जान को खतरे में कतई न डालें.

नंबर गेम की जगह टैलेंट को दें तरजीह

‘तारे ज़मीन पर’ फिल्म का ईशान तो याद होगा न आप सभी को. वही ईशान जिसके मम्मी पापा चाहते थे कि ईशान अपने होमवर्क में रूचि लें, परीक्षा में अच्छे नंबर लाएँ. लेकिन ईशान चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाता क्योंकि ईशान को अच्छा लगता है सिर्फ रंगों से खेलना. लाख समझाने के बावजूद भी जब ईशान अपने माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता, तो वे उसे बोर्डिंग स्कूल भेजने का निर्णय लेते हैं. वे ईशान की मनोस्थिति को समझने की कोशिश ही नहीं करते. आज के अधिकांश मम्मी पापा ईशान के मम्मी पापा की तरह बिहेव करते हैं. उनके लिए बच्चों का फर्स्ट आना ही सिर्फ माने रखता है. क्योंकि यह हमारा एजुकेशन सिस्टम है जो बौद्धिक क्षमता और सफलता को अंकों के पैमाने पर नापता है, जहां सिर्फ नंबर गेम चलता है. ये नंबर गेम का ही परिणाम है कि परीक्षा परिणाम आते ही चारों ओर बच्चों की आत्महत्या की खबरें आना शुरू हो जाती हैं.

यदि कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं है तो माना जाता है कि वह कुछ भी नहीं कर सकता. उसे नालायक व  नाकारा का तमगा दे दिया जाता है. हमारे बच्चों की आत्महत्या का दोषी हमारा एजुकेशन सिस्टम, स्कूल और पेरेंट्स ही हैं. हम बच्चों को उनके किसी खास टैलेंट के बजाय बार-बार उनकी कमियों के बारे में बताते हैं, जिससे वे निराश हो जाते हैं और किसी भी क्षेत्र में अपनी काबिलियत साबित नहीं कर पाते. इंग्लैंड में यदि कोई  बच्चा गणित में फेल  होता है और इतिहास में अच्छे नंबर लाता है तो रिपोर्ट कार्ड पर टीचर का कमेंट यह होता है कि बच्चा इतिहास में बहुत अच्छा कर सकता है, उसे इतिहास और ज्यादा पढ़ना चाहिए. जबकि भारत के स्कूल में कहा जाएगा गणित में मेहनत करने की ज़रुरत है. इसी तरह  ऑस्ट्रेलिया के स्कूलों में एक ऐसा  विभाग होता है, जो बच्चे को उनके खास टैलेंट पर फोकस करना सिखाता है.

पिछले दिनों कोटा की आईआईटी-जेईई की मुख्य परीक्षा पास करने वाली छात्रा कृति ने  आत्महत्या करने से पहले  सुसाइड नोट में कहा, कोचिंग संस्थान बंद हों. उसने लिखा कि यहां बच्चों पर पढ़ाई का अनावश्यक दबाव डाला जाता है. उस ने यह भी लिखा कि उसे इंजीनियर नहीं बनना था, वह एक वैज्ञानिक के तौर पर नासा जाना चाहती थी. पर उसकी मां का सपना था कि बेटी इंजीनियर ही बने. आखिर क्यों माता पिता बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपते हैं, जिसके चलते बच्चों को ऐसे भयावह कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ता है.

पेरेंट्स और समाज को यह समझना होगा कि हर बच्चे में कोई न कोई खासियत जरूर होती है, जिसे अगर बढ़ावा दिया जाए तो वह अपने क्षेत्र में अद्वितीय काम कर सकता है. ऐसे बहुत से लोग हैं जो शैक्षणिक स्तर पर सामाजिक पैमाने के अनुसार  भले ही सफल नहीं थे, पर अपनी फील्ड में बेहतरीन करियर बनाकर उन्होंने जिंदगी में सफलता हासिल की.

इंदौर शहर के आर्टिस्ट वाजिद खान जो जाने जाते हैं अपनी खास शैली की कला के लिए. वे कीलों, हथौड़ी और इसी तरह की चीजों से पेंटिंग बनाते हैं. आपको जानकार हैरानी होगी कि पांचवीं फेल आर्टिस्ट का जादू इस कदर सर चढ़ कर बोल रहा है कि वे अब फीफा वर्ल्ड कप के लिए स्कल्प्चर और एक हॉलीवुड फिल्म के लिए पेंटिंग तैयार कर रहे हैं..उनकी पहली पेंटिंग  20 लाख में बिकी. यह  संभव हुआ, सफलता को अंकों या पैसों से जोड़कर देखने की बजाय क्रिएटिविटी और इनोवेशन से जोड़ने के कारण.

मूवीज़ में हैरी पॉटर का रोल निभानेवाले क्यूज डेनियल रैडक्लिफ को स्कूली दिनों में ही समझ गए थे कि वे पढाई के लिए नहीं बने हैं. आपको जानकार हैरानी होगी कि क्यूज डेनियल रैडक्लिफ ने अपनी स्कूल की पढाई भी पूरी नहीं की थी. इसी तरह बॉक्सिंग में इंडिया के लिए ओलिंपिक मैडल लानेवालीं मैरी कॉम ने भी स्कूली पढ़ाई से ज्यादा महत्त्व अपने बॉक्सिंग प्रेम दिया और  आज उनकी गिनती दुनिया भर की टॉप महिला बॉक्सरों में होती है. और तो और उन पर फिल्म भी बन चुकी है.

मिस्टर परफेक्शनिस्ट यानी थ्री इडियट फिल्म में रणछोड़ दास चांचड़ का किरदार निभाने वाले अभिनेता आमिर खान को भी एक्टिंग से इतना प्यार था कि उन्होंने पढ़ाई में वक्त जाया न करने की बजाय एक्टिंग को ही अपना कैरियर बनाने का निर्णय लिया. दरअसल , हर बच्चे के भीतर अलग तरह की प्रतिभा होती है.मां-बाप को बच्चों की उस प्रतिभा को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए और बच्चे को अपने मन का काम करने की आज़ादी देनी चाहिये.

किसने सिखायी विद्या बालन को ड्रायविंग

इन दिनों विद्या बालन फिल्म ‘‘तीन’’ को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें उनके साथ अमिताभ बच्चन और नवाजुद्दीन सिद्दिकी हैं. यूं तो विद्या बालन को गाड़ी चलानी आती है, मगर भीड़ भाड़ वाली सड़क पर वह हमेशा कार चलाने से बचती रही है. मगर फिल्म ‘‘तीन’’ की शूटिंग के लिए उन्हे कलकत्ता की सड़कों पर कार चलानी थी. इसके लिए विद्या बालन को ड्रायविंग सीखनी पड़ी. मगर इस बार वह ड्रायविंग सीखने के लिए किसी ड्रायविंग स्कूल नहीं गयी. बल्कि इस बार कलकत्ता की सड़कों पर विद्या बालन को ड्रायविंग सिखायी फिल्म ‘तीन’ के निर्देशक सुजॉय घोष ने.

विद्या बालन कहती हैं-‘‘मेरे ड्रायविंग कोच बनकर सुजॉय घोष ने मेरे अंदर ड्रायविंग का आत्मविश्वास भर दिया. अब मैं कहीं भी किसी भी भीड़भाड़ वाले इलाके में भी फर्राटे से कार चला सकती हूं.’’

फिल्म ‘धनक’ पर लिखा गया बाल उपन्यास

अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में जबरदस्त शोहरत बटोर रही नागेश कुकनूर की बाल फिल्म ‘‘धनक’’ पर अब पुरस्कृत बाल उपन्यासकार अनुष्का रवि शंकर ने एक उपन्यास लिखा है. इसे पहला भारतीय फिल्म का उपन्यासीकरण माना जा रहा है. इस उपन्यास को भारतीय प्रकाशक ‘डकबिल बुक्स’ ने प्रकाशित किया है. सूत्रों की माने तो यह उपन्यास दस जून को बाजार में आएगा, जबकि फिल्म ‘‘धनक’’ सत्रह जून को रिलीज होगी. इस खबर की पुष्टि करते हुए नागेश कुकनूर कहते हैं-‘‘यह सुखद बात है कि अब भारत में बाल फिल्मों को महत्व दिया जा रहा है. बाल फिल्म ‘धनक’ अपने आप में एक नया अध्याय है.’’

फिल्म ‘‘धनक’’ की कहानी एक दस वर्षीय राजस्थानी लड़की परी की तपती गर्मी में पूरे राजस्थान की यात्रा करने की कहानी है, जो कि अपने आठ वर्ष के अंधे छोटे भाई से वादा करती है कि वह अपने अगले जन्मदिन से पहले देखने लगेगा. अपने इस मकसद में कामयाब होने के लिए परी अपनी मुहीम से अपने हीरो अभिनेता शाहरूख खान को जोड़ना चाहती है. पर उसके लिए सुपर स्टार शाहरुख खान तक पहुंचना टेढ़ी खीर है. एक दिन उसे पता चलता है कि राजस्थान में ही शाहरूख खान अपनी फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं. तब परी अपने भाई को साथ लेकर राजस्थान की चिलचिलाती तपती धूप व तपती रेत की परवाह न करते हुए पैदल ही उस जगह के लिए निकल पड़ती है, जहां शाहरूख खान शूटिंग कर रहे होते हैं. इस फिल्म में बाल कलाकारां कृष छाबरिया और हेतल गाड़ा मुख्य भूमिका में हैं.

सही वक्त पर सही आउटफिट

भारत विभिन्न परंपराओं के साथसाथ परिधानों के भी कई प्रकार समेटे हुए है. यह देश अलगअलग भाषा, संस्कृति और खानपान के साथसाथ अलगअलग पहनावे के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है. यह एक ऐसा देश है जहां कदमकदम पर फैशन के अनेक रंग और ढंग बिखरे हुए हैं. यदि सिर्फ परिधानों की बात की जाए तो भारत में हर मौके के लिए अलगअलग आउटफिट निश्चित हैं. लेकिन जब ट्रैंड और स्टाइल का संगम होता है तो आउटफिट की रूपरेखा बदल जाती है. पारंपरिक होते हुए भी उस में फैशनेबल का टैग लग जाता है.

परिधान पुराना अंदाज नया

दरअसल, भारत में अलगअलग समय पर अलगअलग देशों के राजाओं की हुकूमतें रही हैं और हर शासनकाल अपने साथ अलग पहनावा ले कर भारत आया. रजिया सुलतान के पहनावे से प्रभावित रजिया सूट और मुगल वंश की अनारकली के अनारकली सूट अब तक भारत में महिलाओं के फैशन का विस्तार कर रहे हैं. कहने के लिए यों तो ये बहुत ही पुराने परिधान हैं, लेकिन फैशन ने इन्हें चमका दिया है. इन की रूपरेखा में भी बदलाव किया गया है. अपने नए कलेवर में इस तरह के सूट शादी और छोटेमोटे फैमिली फंक्शनों के लिए उपयुक्त हैं. लेकिन आप किसी की बर्थडे पार्टी या औफिशियल पार्टी में इस तरह के सूट पहन कर जाएंगी तो यह फैशन ब्लंडर ही कहलाएगा.

वैस्टर्न फैशन

इस के साथ ही भारत में आए ब्रिटिश राज ने भी भारतीयों की फैशन सैंस को बढ़ाया है. यही वजह है कि आज भारतीय महिलाओं को वैस्टर्न फैशन में आसानी से लिपटा देखा जा सकता है. विनीता कहती हैं कि अब हर महीने नया फैशन मार्केट में देखने को मिल जाता है. हर नई चीज को एक बार खुद पर जरूर आजमाना चाहिए. लेकिन इस बात की सैंस बहुत जरूरी है कि कौन सा आउटफिट किस अवसर पर पहना जाए. कई लड़कियां दोपहर के समय हो रही पार्टी में ईवनिंग गाउन पहन कर चली जाती हैं जबकि नाम से ही साफ है ईवनिंग गाउन ईवनिंग पार्टी के लिए होते हैं. ईबे कंपनी द्वारा हाल ही में 1000 महिलाओं पर कराए गए सर्वे के अनुसार लगभग 15% महिलाएं यह गलती करती हैं.

फैशन जो बनाए जवां

फैशन यानी जो आप को अपटुडेट रखे. लेकिन अपटुडेट होने के चक्कर में कई बार महिलाएं इस बात का खयाल नहीं रख पातीं कि उन की उम्र के हिसाब से उन पर क्या जंचेगा. खासतौर पर घरेलू महिलाओं के लिए फैशन का मतलब रंगबिरंगी साड़ी या साधारण सी सलवारकमीज ही होती है. विनीता कहती हैं कि साड़ी तक सीमित महिलाओं को हम यह नहीं कह सकते कि वे फैशनेबल नहीं हैं. आजकल बाजार में साडि़यों के कई पैटर्न मौजूद हैं. उन्हें ट्राई किया जा सकता है. लेकिन जरूरी है पैटर्न के हिसाब से डै्रपिंग. जी हां, फैशन वर्ल्ड में साडि़यों के साथ बहुत प्रयोग हो रहे हैं. अब साडि़यों में डिजाइनर्स क्रिएटिविटी दिखते हैं. खासतौर पर ड्रैपिंग के अलगअलग तरीकों को ध्यान में रख कर साड़ी को डिजाइन किया जाता है. लेकिन महिलाएं उसी पुराने ढर्रे पर हर साड़ी ड्रैप कर लेती हैं और यहीं वे फैशन की दौड़ से बाहर हो जाती हैं.

आउटफिट्स ही नहीं ऐक्सैसरीज के मामले में भी महिलाएं कई बार गलतियां कर बैठती हैं. सिर्फ आउटफिट अच्छा होने से ही बात नहीं बनती. ऐक्सैसरीज आउटफिट के लुक को इनहैंस करती हैं. इसलिए इन का चुनाव सही और सीमित होना चाहिए. लेकिन बहुत महिलाएं आउटफिट और ऐक्सैसरीज के चुनाव में सही तालमेल नहीं बैठा पाती हैं जैसे जो हेयर ऐक्सैसरीज ट्रैडिशनल आउटफिट के साथ पहननी चाहिए उन इस्तेमाल कैजुअल वियर के साथ करना फैशन मिस्टेक ही है. बहुत अधिक फंकी लुक वाले फुटवियर पहनने से बचें. ये आप को फैशनेबल लुक से ज्यादा चाइल्डिश लुक देंगे. माना कि ऐनिमल प्रिंट ट्रैंड में हैं, लेकिन ध्यान रखें ये कैजुअल प्रिंट हैं. प्रोफैशनल और ट्रैडिशनल आउटफिट्स में इन का प्रयोग न करें. इनरवियर को आउटवियर पर फ्लौंट करने का फैशन अब पुराना हो चुका है और यह बहुत भद्दा भी लगता है, इसलिए ध्यान रखें कि आप की ब्रा की बैल्ट और पैंटी आउटवियर से ढकी रहे. ज्वैलरी पहनने की शौकीन हैं तो अवसर के अनुसार उस का चयन करें. बाजार में यों तो कई तरह की ज्वैलरी हैं लेकिन इस का चयन ड्रैस पैटर्न पर निर्भर करता है. आप कितनी भी अच्छी ड्रैस पहन लें, लेकिन मेकअप और हेयरस्टाइल पर ध्यान न दिया जाए तो आप फैशनेबल कम फूहड़ ज्यादा लगेंगी.

शराबबंदी के लिए चाहिए तगड़ी नाकाबंदी

शराब पर बैन लगने के बाद बिहार पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ बन गया है. इस के बाद जहां शराबियों की हालत डगमग है, वहीं राज्य के बौर्डर पार के इलाकों में शराब के नए बाजार सजने लगे हैं. बिहार से सटे नेपाल देश के बौर्डर वाले इलाकों में तो शराब का धंधा कई गुना बढ़ गया है, वहीं बिहार से सटे झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल वगैरह राज्यों के बौर्डरों पर भी शराब का धंधा दिन दूना रात चौगुना फलनेफूलने लगा है. लेकिन एक अच्छी बात यह भी है कि शराब पीने वाले मजबूरी में अब अपनी पीने की बुरी लत को छुड़ाने के लिए नशा मुक्ति केंद्रों में पहुंचने लगे हैं. राज्य के सभी 38 जिलों में 11 अप्रैल, 2016 तक तकरीबन डेढ़ हजार लोग ऐसे केंद्रों पर पहुंच चुके हैं.

राज्य में किसी भी तरह की शराब बेचने, खरीदने और पीने पर रोक लग गई है. होटलों, क्लबों, बारों और रैस्टोरैंटों में भी शराब बंद कर दी गई है. 1 अप्रैल, 2016 से देशी शराब पर रोक लगाई गई और 5 अप्रैल, 2016 से विदेशी शराब और ताड़ी पर भी पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई. इस से जहां सरकार को सालाना 4 हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ेगा, वहीं शराब की कुल 4,771 दुकानों पर ताले लटक गए हैं.

अप्रैल महीने के पहले हफ्ते तक देशी शराब बनाने वाली 15 हजार भट्ठियां तोड़ दी गईं. इस के साथ ही एक लाख, 65 हजार लिटर देशी और 12 हजार लिटर विदेशी शराब की बोतलों पर रोड रौलर चलवा कर उन्हें तोड़ दिया गया. इस के अलावा 9,140 लिटर स्पिरिट और 1,322 क्विंटल महुआ जब्त किया जा चुका है. बिहार में बेतिया, मोतिहारी, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज जिलों के बौर्डर नेपाल से सटे हुए हैं. मोतिहारी का रक्सौल शहर और नेपाल का वीरगंज शहर सटा हुआ है और दोनों देशों के लोग बेरोेकटोक आतेजाते हैं. शराबबंदी के बाद अब रक्सौल के लोग आसानी से वीरगंज जा कर शराब पीने का मजा ले रहे हैं. वीरगंज के एक शराब कारोबारी ने बताया कि 1 अप्रैल से पहले वह तकरीबन एक हजार लिटर शराब हर महीने बेचता था, पर बिहार में शराब पर रोक लगने के बाद यह आंकड़ा ढाई से 3 हजार लिटर तक पहुंचने का अंदाजा है.

बिहार के उत्पाद मंत्री अब्दुल जलील मस्तान कहते हैं कि शुरू में कुछ दिक्कतें आएंगी, लेकिन हर हाल में शराबबंदी को कामयाब बनाया जाएगा. शराबबंदी को कारगर बनाने के लिए पड़ोसी राज्यों और नेपाल के बौर्डर पर चौकसी बढ़ा दी गई है. राज्य सरकार ने भारतनेपाल बौर्डर पर तैनात सशस्त्र सीमा बल को चिट्ठी लिख कर बिहार से नेपाल आने वाली तमाम गाडि़यों की अच्छी तरह जांच कर मदद करने की गुजारिश की है. बिहार विधानसभा का पिछला चुनाव जीतने के बाद 20 नवंबर, 2015 को नीतीश कुमार ने ऐलान किया था कि 1 अप्रैल, 2016 से बिहार में शराब पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाएगी. बिहार में औरतें काफी दिनों से शराब पर रोक लगाने की मांग करती रही हैं. मर्द शराब पीते हैं और उस का खमियाजा औरतों व बच्चों समेत समूचे परिवार को उठाना पड़ता है. शराबबंदी के फैसले से सरकार के सामने कई चुनौतियां और मुश्किलें खड़ी होने वाली हैं, जिन से निबटना आसान नहीं होगा. जहां भी शराब पर रोक लगी है, वहां शराब माफिया और तस्करों का बड़ा नैटवर्क खड़ा हो जाता है और सरकार के मनसूबे फेल हो जाते हैं. रिटायर्ड ऐक्साइज सुपरिंटैंडैंट त्रिभुवन नाथ कहते हैं कि नीतीश कुमार ने शराब पर पूरी तरह से रोक लगा कर अपने मजबूत इरादे तो जता दिए हैं, पर उन का यह फैसला तभी कामयाब होगा, जब अफसर और मुलाजिम पूरी ईमानदारी से उन का साथ दें.

ज्यादातर राज्यों में सरकारी अफसरों और जनता की मदद नहीं मिलने की वजह से शराबबंदी नाकाम साबित हुई है. हरियाणा में बंसीलाल सरकार ने शराब पर रोक लगाई थी, पर उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी. एनटी रामाराव ने आंध्र प्रदेश में शराबबंदी लागू की, पर कुछ समय बाद ही वापस लेनी पड़ी. शराबबंदी लागू होने से गैरकानूनी नैटवर्क पैदा हो जाता है और इस से संगठित अपराधी व दबंग समूह काफी ताकतवर हो जाते हैं. गुजरात में साल 1960 से ही शराब पर रोक लगी हुई है, इस के बाद भी अपराधी समूह सरकार और कानून को ठेंगा दिखाते हुए गैरकानूनी शराब का धंधा चला रहे हैं. इस से पहले बिहार में साल 1977 में जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने शराब पर रोक लगा दी थी. उस के बाद शराब की तस्करी बढ़ने और गैरकानूनी शराब का कारोबार करने वाले अपराधियों के पनपने के बाद शराबबंदी को वापस ले लिया गया था. हरियाणा, आंध्र प्रदेश, मिजोरम में भी शराबबंदी कामयाब नहीं हो सकी और वहां शराब की बिक्री जारी है. केरल में 30 मई, 2014 से शराब की दुकानों को लाइसैंस देने का काम सरकार ने बंद कर दिया है.

शराब तस्करों और माफिया से निबटना सरकार के लिए जहां सब से बड़ी चुनौती है, वहीं शराबबंदी के बाद सैरसपाटे के लिए बिहार आने वाले देशीविदेशी सैलानियों की तादाद में भी काफी कमी आएगी. रिटायर्ड सचिव बीएस दुबे कहते हैं कि शराब पर पूरी तरह से रोक लगाना सरकार का काफी अच्छा फैसला है, पर यह तभी कामयाब हो सकेगा, जब पुलिस दारोगा और आबकारी दारोगा पर पूरी तरह जवाबदेही डाली जाएगी. गैरकानूनी शराब की तस्करी को रोकने के लिए पड़ोसी राज्यों के बौर्डर पर ठोस निगरानी तंत्र बनाने होंगे. कई गैरजरूरी मदों में खर्च को कम कर आमदनी की कमी को दूर किया जा सकता है. नीतीश कुमार को पता है कि उन के शराबबंदी के फैसले को सब से बड़ा खतरा पुलिस से ही है, इसलिए उन्होंने हर थाने के थानेदारों से लिखित शपथपत्र ले लिया है कि अगर उन के इलाके में चोरीछिपे शराब बिकते, खरीदते या पीते पाई जाती है, तो सीधा थानेदार ही जवाबदेह होगा.

बिहार में शराब पर पूरी तरह से रोक लगने से सरकार को तकरीबन 4 हजार करोड़ रुपए का सालाना नुकसान होगा. देशी शराब से 2,300 हजार करोड़ और विदेशी शराब से 1,700 करोड़ रुपए का राजस्व सरकार को मिलता था.

1 अप्रैल, 2016 से पहले तक बिहार में 1,410 लाख लिटर शराब की खपत होती थी. इस में 990.36 लाख लिटर देशी शराब, 420 लाख लिटर विदेशी शराब और 512.37 लाख लिटर बीयर की खपत थी. बिहार में प्रति व्यक्ति प्रति सप्ताह देशी शराब और ताड़ी की खपत 266 मिलीलिटर और विदेशी शराब और बीयर की खपत 17 मिलीलिटर थी. रिटायर्ड डीजीपी डीपी ओझा कहते हैं कि सरकार के इस फैसले को जनता की मदद मिल रही है और शराबबंदी के लिए जवाबदेह बनाए गए अफसरों और मुलाजिमों को भी इसे कड़ाई से लागू करने की जरूरत होगी. सरकार को कई तरह के सियासी दबावों और गैरकानूनी नैटवर्क से निबटना होगा.

बिहार में लाइसैंसी दुकानों के अलावा बड़े पैमाने पर शराब का धंधा गलियों, ठेलों, सब्जी की दुकानों, छोटेमोटे ढाबों पर धड़ल्ले से चलता रहा है. सुबह उठते ही शराब से कुल्ला करने वालों और रात को सोते समय भी शराब गटकने वालों की काफी बड़ी तादाद है. ऐसे लोगों के मुंह से शराब को छुड़ाना सरकार के लिए मुसीबत बन रहा है. बिहार सरकार ने केंद्र सरकार से मांग की है कि शराबबंदी से होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई की जाए. गुजरात में शराब नहीं बिकने देने के एवज में केंद्र सरकार हर साल राज्य सरकार को सौ करोड़ रुपए देती है. सरकारी फाइलों में समूचे गुजरात में 61 हजार, 535 लोगों के पास शराब पीने का परमिट है. इस में से 12 हजार, 803 केवल अहमदाबाद में हैं.

उत्पाद विभाग से यह परमिट यह कह कर हासिल किया जाता है कि शराब उन के लिए दवा है. इस के लिए डाक्टर से सर्टिफिकेट देने की जरूरत होती है. डाक्टर जब सर्टिफिकेट देता है कि परमिट मांगने वाले की दिमागी और जिस्मानी हालत को ठीक रखने के लिए शराब जरूरी है. डाक्टर ही शराब पीने की लिमिट तय करता है और उसी हिसाब से उसे शराब मिल सकती है. अगर परमिट मांगने वाला सरकारी मुलाजिम है, तो उसे अपने सीनियर से एनओसी लेना होता है. नीतीश कुमार की शराबबंदी के फैसले को कई लोग गलत ठहराने की कवायद में भी लग गए हैं और इसे उन की बड़ी गलती करार देने लगे हैं. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देशभर में शराब की लौबी काफी मजबूत है. शराबबंदी के बाद सरकार के लिए सब से बड़ी चुनौती कालाबाजारी और तस्करी से निबटना होगा. गैरकानूनी रूप से देशी शराब के बनने और बिकने में तेजी आने का खतरा भी है. शराब पीना कितना खतरनाक और जानलेवा है, इस के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर गौर किया जा सकता है.

संगठन के आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल आबादी के 30 फीसदी लोग शराब पीते हैं, जिन में से 13 फीसदी लोग रोज शराब पीने के आदी हैं. हर साल शराब पीने वालों का आंकड़ा 8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है. इस के अलावा गांवों के रहने वाले 45 फीसदी लोग शराब के आदी हैं और सड़क हादसों में होने वाली कुल मौतों में से 20 फीसदी मौतें शराब पीने की वजह से होती हैं. नीतीश कुमार ने शराबबंदी पर रोक लगा कर मजबूत इरादे जता दिए हैं और सियासी हालत भी उन के पाले में है, इसलिए वे शराबबंदी के अपने वादे को सच में बदलने के लिए कमर कस चुके हैं. शराबबंदी के फैसले की वाहवाही हो रही है, पर कुछ आलोचनाएं भी हो रही हैं. भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि शराबबंदी लागू करना सरकार का अच्छा फैसला है, पर इसे कामयाब बनाने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की दरकार है. मिसाल के तौर पर बिहार में गुटका और काली पौलीथिन पर भी रोक लगी हुई है, इस के बाद भी गुटका खुलेआम बिक रहा है और काली पौलीथिन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. इस बात की क्या गारंटी है कि शराबबंदी का लागू होना भी गुटका और काली पौलीथिन की तरह नहीं होगा?

औरतों से किया वादा निभाया

शराबबंदी के पीछे गांव की औरतों का दुखड़ा है, जिसे उन्होंने मुख्यमंत्री को सुनाया था और शराब पर रोक लगाने की गुहार लगाई थी. 9 जुलाई, 2015 को ‘मद्य निषेध दिवस’ के मौके पर पटना के श्रीकृष्ण मैमोरियल हाल में हुए एक समारोह में स्वयं सहायता समूह की औरतों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने कड़वे अनुभव सुनाए थे. खगडि़या के चौथम गांव की आशा देवी, गया के खिजसराय गांव की रेखा देवी और मुजफ्फरपुर की गीता ने मुख्यमंत्री को बताया था कि किस तरह से उन्होंने गांव की औरतों के साथ मिल कर अपने इलाकों में शराब पर रोक लगा दी है. समारोह में पहुंचीं हजारों औरतों ने एकसाथ आवाज लगाई कि मुख्यमंत्रीजी, शराब को बंद कराइए. इस से हजारों घरपरिवार बरबाद हो रहे हैं. उन्हीं औरतों के किस्सों को सुन कर नीतीश कुमार ने उसी समय ऐलान कर दिया था कि अगर वे दोबारा सत्ता में आएंगे, तो शराब पर पूरी तरह से रोक लगा देंगे.

नीतीश कुमार के इसी भरोसे पर यकीन कर के पिछले विधानसभा चुनाव में औरतों ने बढ़चढ़ कर वोट डाले थे. उन का वोट फीसदी 52.85 रहा था. साल 2000 के चुनाव में मर्दों के मुकाबले 20 फीसदी औरतों ने वोट की ताकत का इस्तेमाल किया था. शराबबंदी के ऐलान के साथ ही पंचायत चुनाव में औरतों को 50 फीसदी रिजर्वेशन दे कर नीतीश कुमार ने औरतों को गोलबंद कर लिया था. इस वजह से नीतीश कुमार के लिए शराब पर पाबंदी लगाना जरूरी हो गया था. हां, इतना जरूर है कि शराब माफिया, शराबी और शराब से कमाने वाले पुलिस और आबकारी अफसर 2-4 महीनों में शराबबंदी पर काला रंग पोतने लगेंगे. टैलीविजन की स्क्रीनें और अखबारों के पन्ने शराबबंदी के खिलाफ मुहिम छेड़ देंगे. राजस्व की हानि, जहरीली नकली शराब, कालाबाजारी का गुणगान होने लगेगा. अगर नीतीश कुमार की खाल नरेंद्र मोदी जैसी मोटी है तो ही वे उसे झेल पाएंगे.

मुझे फाइब्रौयड है. अगर मैं सर्जरी करा लूं तो क्या मुझे फिर से इसके होने का खतरा है.

सवाल

डायग्नोसिस में पता चला है कि मुझे फाइब्रौयड है. अगर मैं एक बार सर्जरी करा लूं तो क्या मुझे फिर से इस के होने का खतरा है?

जवाब

एक बार सर्जरी कराने के बाद दोबारा फाइब्रौयड होगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि आप ने कौन सी सर्जरी कराई है. अगर सर्जरी के द्वारा पूरे गर्भाशय को निकाल दिया गया है, तो दोबारा फाइब्रौयड के बनने की आशंका पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. लेकिन जब सर्जरी के द्वारा गर्भाशय की आंतरिक दीवार को निकाला जाता है तब इस के फिर से विकसित होने की आशंका बनी रहती है.

 

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क्या मेनोपौज के बाद भी फाइब्रौयड का खतरा बना रहता है?

सवाल

क्या मेनोपौज के बाद भी फाइब्रौयड का खतरा बना रहता है?

जवाब

वैसे तो फाइब्रौयड किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन 30 से 50 वर्ष के बीच की महिलाओं में अधिक देखा जाता है. प्रोडक्टिव उम्र में ही महिलाओं में ऐस्ट्रोजन का स्तर अधिक होता है और इस का आकार तभी बढ़ता है जब ऐस्ट्रोजन का स्तर बढ़ता है. मेनोपौज के बाद फाइब्रौयड के बनने का खतरा लगभग समाप्त हो जाता है, क्योंकि शरीर में ऐस्ट्रोजन का स्तर बहुत कम हो जाता है. यहां तक कि अगर किसी महिला को प्रोडक्टिव उम्र में यह समस्या है तो मेनोपौज के बाद फाइब्रौयड सिकुड़ जाता है या समाप्त हो जाता है.

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मैं 24 वर्षीय युवती हूं. चेहरे की रंगत निखारने का कोई घरेलू उपाय बताएं.

सवाल

मैं 24 वर्षीय युवती हूं. मेरे चेहरे का रंग सांवला है. कुछ महीनों बाद मेरा विवाह होने वाला है. मैं चाहती हूं कि तब तक मेरे चेहरे की रंगत में निखार आ जाए और मैं खूबसूरत दिखूं. मैं अनेक तरह की क्रीमें व कौस्मैटिक्स प्रयोग कर चुकी हूं पर कोई लाभ नहीं हुआ. चेहरे की रंगत निखारने का कोई घरेलू उपाय बताएं?

जवाब

चेहरे की रंगत निखारने के लिए आप चेहरे पर ठंडे दही को पैक की तरह लगाएं व 15 मिनट बाद धो लें. ऐसा नियमित रूप से करें. इस के अलावा कच्चे आलू का रस भी चेहरे की त्वचा की रंगत को निखारने में मदद करता है. अन्य घरेलू उपाय के रूप में आप बादाम पाउडर में मिल्क पाउडर व रोजवाटर मिला कर पैक बनाएं और चेहरे पर लगाएं. फिर जब पैक सूख जाए तो उसे कच्चे दूध से छुड़ाएं. ऐसा नियमित रूप से करने से आप के चेहरे की रंग में धीरेधीरे निखार आ जाएगा.

 

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