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शोर न मचायें, स्वागत करें

असम की नव निर्वाचित विधायक अंगूर लता डेका की खूबसूरती अब हर कोई देख रहा है और एक अलग सी फीलिंग लोगों को हो रही है, क्योंकि भाजपा की यह विधायक सफल अभिनेत्री भी है और कामयाब मॉडल भी, जिसके कई फोटो वायरल हो चुके हैं, जिनमे वह ब्रेस्ट और हिप्स दिखाते नज़र आ रही हैं. एक मॉडल और अभिनेत्री के लिये ऐसे फोटो खिचाना शर्म की नहीं, बल्कि शान की बात होती है और कामयाबी की गारंटी भी. यह उसकी व्यवसायिक ज़रूरत भी होती है.

फिल्मकार राम गोपाल वर्मा ने अंगूर लता को लेकर ट्वीट किया कि अगर एमएलए ऐसे दिखने लगें, तो समझो राजनीति मे अच्छे दिन आ गये. थेंक यू अंगूर लता जी. थेंक यू मोदी जी. पहली वार मुझे राजनीति अच्छी लगी. इस ट्वीट को अन्यथा लेते हुये कइयों ने राम गोपाल वर्मा को आडे हाथो लिया. कुछ ने तो उन्हे पागल तक कह दिया. देखा जाये तो रामगोपाल ने कोई आपत्तिजनक बात नहीं की है, बल्कि एक बेइंतिहा और आकर्षक युवती की खूबसूरती की तारीफ करते राजनीति मे आने पर उसका स्वागत ही किया है, जिसमे प्रयुक्त शब्दों मे कोई छिछोरापन या सस्तापन नहीं है. ना ही रामगोपाल की मंशा घटिया लग रही है.

दरअसल मे अंगूर लता को लेकर ही लोग कुंठित हैं और भगवावादी उसे दीपिका चीखलीया जैसा माता सीता सरीखा ट्रीटमेंट देना चाह रहे हैं. पर अंगूर लता उनके पौराणिक पैमाने पर खरी नहीं उतर रही. इसलिये परम्परा वादी बौखलाए हुये हैं. मानो अंगूर लता पर उनका कापीराइट हो गया हो. अक्सर युवतियों के कथित उत्तेजक पहनावे को लेकर आपत्तियों जताने और फतवे जारी करने वाले धर्म के ठेकेदारों के गले की हड्डी यह नई विधायक बन गई है, तो भड़ास किसी बेचारे रामू पर निकालने से क्या फायदा. सच तो यह कि वाकई अंगूर लता सुंदर है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिये. वजह मौजूदा राजनीति मे आकर्षक युवतियों का टोटा है और जो हैं, वे बूढ़ी हो चली हैं.

VIDEO: जब कोहली, मनदीप ने सिखाया गेल को भंगड़ा डांस

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर इन दिनों पूरी तरह पार्टी के मूड में है और हो भी क्यों न आख़िर आईपीएल के इस सीज़न में फ़ाइनल में जो पहुंच गई है. दो दिन पहले भी एक ऐसी ही पार्टी थी जिसमें विराट कोहली, मनदीप सिंह और क्रिस गेल ने ख़ूब भंगड़ा किया.

गेल तो ख़ैर पार्टीबाज़ के रुप में मशहूर हैं ही और कोहली भी इस मामले में उनसे पीछे नहीं हैं. पार्टी के बाद मनदीप सिंह ने अपने फ़ेसबुक एकाउंट में पार्टी का वीडियो पोस्ट किया है जिसमें वह गेल को भंगड़ा डांस के स्टेप्स सिखा रहे हैं. गेल ने भी भंगड़ा सीखने में देर नहीं लगाई और बाक़ायदा पंजाबियों के अंदाज़ में डांस करने लगे. बाद में कोहली भी उनके साथ भंगड़ा करने लगे.

जानवरों के लिए भी हो पुलिस

कुछ समय पहले मैं ने पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले ऐसे लोगों के बारे में लिखा था, जो चुनाव जीत कर डच संसद में भी पहुंचे थे. जानवरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली दुनिया की यह पहली राजनीतिक पार्टी थी, जो संसद में जगह बना पाई. यह पार्टी 2006 में पहली बार संसद पहुंची थी और अब 150 सीटों वाली डच संसद में इस की 2 सीटें हैं. इस की 1 सीट डच सीनेट में व 9 सीटें 8 प्रांतीय सरकारों में हैं. इस पार्टी की चेयरपर्सन मैरिएन थीम हैं.

इन लोगों ने एक और अभूतपूर्व सफलता हासिल कर ली है, जिस से मुझे ईर्ष्या भी होती है और हो सकता है कि मैं रो भी दूं. डच सरकार ने 500 पुलिस अफसरों की स्पैशल फोर्स तैयार करने का फैसला किया है, जो जानवरों की सुरक्षा और उन के अधिकारों के लिए हर पल तत्पर रहेगी. यह आइडिया दरअसल टीवी चैनल ‘ऐनिमल प्लानेट’ के एक शो ‘ऐनिमल कौप्स’ से आया था. यह शो अमेरिका के अलगअलग शहरों के उन लोगों के बारे में विस्तार से बताता है, जो जानवरों की देखरेख में लगे रहते हैं.

और बन गई बात: देखते ही देखते कुछ ही समय में जानवरों के अधिकारों की रक्षा करने वाली राजनीतिक पार्टी आश्चर्यजनक रूप से शक्तिशाली बन गई और वह भी एक ऐसे देश में जहां का मुख्य भोजन ही मांस और अन्य दूध से बनने वाले उत्पाद हैं. इन लोगों ने जानवरों की रक्षा का जो सुझाव दिया वह गीर्ट विल्डर्स की पार्टी ‘पार्टी फौर फ्रीडम’ (पीवीवी) के द्वारा अमल में लाया गया. गीर्ट यूरोप के जानेमाने मुखर स्वभाव के नेता हैं और पीवीसी के अध्यक्ष भी. सच, अगर कुछ करने की ठान ली जाए तो रास्ते खुदबखुद बन जाते हैं. यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ. पार्टी फौर फ्रीडम डच सरकार के साथ गठबंधन में है. पशु अधिकारों की रक्षा करने वाली पार्टी के ऐनिमल पुलिस वाले सुझाव को अमल में लाने के लिए पुलिस फोर्स के 3000 जवानों की एक सूची तैयार की गई. पीवीवी पार्टी के एक संसद सदस्य ने डिओन ग्रास से बात की और अपनी पार्टी पर यह सुझाव अमल में लाने का दबाव बनाया. डिओन राजनीति में आने से पहले पशु चिकित्सा के उत्पादों को बेचने का काम करते थे. तब गीर्ट विल्डर्स ने 3000 में से 500 पुलिसकर्मियों को चुना, जिन्हें प्रशिक्षण के बाद ऐनिमल पुलिस में शामिल करना था.

क्या है ऐनिमल पुलिस: ऐनिमल पुलिस को सामान्य पुलिस वाले ही अधिकार प्राप्त हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि उन्हें विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया है. यह पुलिस सिर्फ पशुओं पर होने वाली हिंसा की रोकथाम या उन के अधिकारों की सुरक्षा ही सुनिश्चित नहीं करेगी, इन्हें यह भी देखना होगा कि पशुओं की जनसंख्या दर क्या है, कितने जानवरों का इस्तेमाल मांस के व्यवसाय में किया जा रहा है और कसाईखाने में जानवरों के साथ कितनी क्रूरता बरती जाती है. प्रवक्ता जैली इगास का कहना है कि डच पुलिस मुख्यालय नई पुलिस फोर्स को गंभीरता से ले रहा है. इस की मांग आम जनता के साथसाथ राजनेताओं की तरफ से भी आई है, इसलिए हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते.

हालैंड में पशुओं पर क्रूरता के सर्वाधिक मामलों को अभी तक एक प्राइवेट संस्था ही सामने लाती रही है. इस संस्था का नाम ‘डच सोसायटी फौर द प्रोटैक्शन औफ ऐनिमल्स’ है. 1865 में स्थापित हुई इस संस्था में 2 लाख से अधिक सदस्य और 14 फुलटाइम जांचकर्ता हैं. 150 स्वयंसेवी सदस्यों के साथ ये जांचकर्ता 1 साल में लगभग 8,000 मामलों को देखते हैं. एसपीसीए इस पहल से खुश है. लेकिन पशुओं को क्रूरता से बचाने वाली इस सोसायटी का कहना है कि पशु रक्षा के लिए कानून में भी फेरबदल की आवश्यकता है ताकि पशुओं से जुड़े अपराधों को अंजाम देने वालों पर सख्त कार्यवाही की जा सके. ऐसा करने से आम लोगों का समर्थन भी मिलेगा, क्योंकि 60% डच लोग पशु अधिकारों की रक्षा को महत्त्वपूर्ण विषय मानते हैं.

अन्य देशों में ऐसा होगा क्या: क्या ऐनिमल पुलिस अन्य देशों में भी बनाई जाएगी? जरमनी के एक अखबार ने अपने 74% पाठकों पर सर्वे किया, जिस में सभी पाठकों का कहना था कि जरमनी में भी ऐनिमल पुलिस होनी चाहिए.

भारत में सड़कों पर तो पशुओं के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गई हैं.

– भैंसों पर इतना सामान लाद दिया जाता है कि कई बार वे बोझ से गिर कर, दब कर मर जाते हैं.

– कुत्तों को बालकनी में बांध कर रखा जाता है, फिर चाहे बारिश हो या तेज धूप. पासपड़ोस के लोग बिल्लियों को जहर पिला देते हैं.

– कसाईखानों में जानवरों के बछड़ों को हथौड़े से मार कर मौत के घाट उतार दिया जाता है.

– ट्रकों में गायभैंसों को इस कदर ठूंस दिया जाता है कि इन में से कई अपनी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही कुचल जाने की वजह से दम तोड़ देती हैं.

– शार्क को उस के फिन निकाल कर जीवित ही तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता है.

– मुरगों और बकरों की लड़ाई पर सट्टा लगाया जाता है.

– गायों और घोड़ों की रेस कराई जाती है.

– पशु बलि दी जाती है.

– हाथियों की झुलसा देने वाली गरमी में परेड कराई जाती है.

– बूढ़े व बीमार हो चुके जानवरों को तड़पने के लिए सड़कों पर छोड़ दिया जाता है.

– सांप नेवले की लड़ाई पैसा कमाने के लिए करवाई जाती है.

– बंदरों को नचाया जाता है और लंगूरों को दूसरे जानवरों से बचाने के काम में लाया जाता है.

इस तरह की लिस्ट इतनी लंबी है कि खत्म ही न हो.

इस हिंसा को रोका जा सकता है, यदि हमारे पास भी अच्छे और प्रशिक्षित पुलिसकर्मी हों. हमारी पुलिस सिर्फ नकारा ही नहीं, बल्कि पैसे ले कर पशुओं पर हिंसा भी होने देती है. खासतौर पर तब जब पशु अवैध तरीके से कसाईखाने ले जाए जा रहे हों. कानूनी तौर पर तो हर जिले में एसपीसीए (सोसायटी फौर द प्रिवैंशन औफ क्रूएलटी टू ऐनिमल्स) है पर असलियत में यह सिर्फ दिल्ली में ही सक्रिय है और यहां का हाल यह है कि पशु तस्करी पर निगरानी रखने के लिए तैनात कर्मी तस्करों से हफ्ता ले कर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं. इन्होंने 30 सालों में तस्करी या पशु हिंसा की किसी भी वारदात को नहीं रोका, क्योंकि दरअसल ये काम पर जाते ही नहीं. ये रात को काम पर जाते हैं ताकि पशुओं से लदे ट्रकों को अवैध व सुरक्षित तरीके से कसाईखाने पहुंचाने में सहायता कर सकें. कहने को ये कर्मी चेन्नई में भी हैं, लेकिन वहां इन का काम बस इतना है कि तस्करों से जब्त की गई गायों को वापस अवैध कसाईखानों में बेच सकें.

हमारे देश में भी जानवरों के लिए पुलिस की व्यवस्था हो तो बहुत सारी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी. जब नीदरलैंड में ऐसा हो सकता है तो सहानुभूति की परंपरा में विश्वास रखने वाले भारत में तो और भी आसानी से हो सकता है.

विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप के फाइनल में पहुंची सोनिया

भारत की महिला मुक्केबाज सोनिया लाथेर ने गुरुवार को महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप के 57 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में जगह बनाकर भारत के लिए रजत पदक सुनिश्चित किया. सोनिया ने कजाखिस्तान की एझान खोजावेकोवा को 3-0 से हराकर फाइनल में जगह बनाई.

सोनिया मुकाबले में पूरी तरह अपनी विपक्षी पर हावी रहीं. सोनिया जिस वर्ग में खेलती हैं वह ओलम्पिक का हिस्सा नहीं है. ओलम्पिक में सिर्फ 51 किलोग्राम, 60 किलोग्राम, और 75 किलोग्राम वर्ग में ही मुकाबले खेले जाते हैं.

इससे पहले, इस चैम्पियनशिप में भारत की एम.सी मैरीकॉम, एल.सरिता देवी और पूजा रानी ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने में असफल रही थीं.

महिलाओं को अछूत बनाता धर्म

साल 2015 में केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर के त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के नवनिर्वाचित अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन ने मीडिया से बात करते हुए कथित तौर पर यह कहा था कि जब तक एअरपोर्ट पर हथियार चैक करने जैसी कोई स्कैन मशीन महिलाओं की पवित्रता जांचने के लिए उपलब्ध नहीं होती, तब तक महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित रहेगा. केरल के इस प्रसिद्ध तीर्थस्थल पर 10 से 50 साल की उम्र तक की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. ऐसी मान्यता है कि मंदिर में प्रतिष्ठित देव अयप्पा ब्रह्मचारी थे. इसीलिए महिलाएं जिन्हें मासिकस्राव होता है, मंदिर में नहीं जा सकतीं. बात गोपालकृष्णन की सोच तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के सभी बड़े धर्म और क्षेत्रीय धर्म हमेशा से ही आदमियों को औरतों से बचने के निर्देश देते हैं. 7वीं सदी के कवि सेमुरीदास का कहना है कि यहूदी के लिए औरत सब से बड़ा पाप है और आदमी उस से इच्छा और आवश्यकता से जुड़ा है. 125 ई. पूर्व की मनु स्मृति कहती है कि मर्द को फुसलाना औरत की आदत है और समझदार आदमी कभी इस के साथ बिना सुरक्षा के नहीं रह सकता. इस संसार में औरतें केवल मूर्खों को ही नहीं, बड़े से बड़े विद्वान को भी इच्छा और आशा का गुलाम बना देती हैं.

बाइबिल में वर्णित आदम और ईव की कहानी किस ने नहीं सुनी. यह कहानी चमकता उदाहरण है, जिस में आदमी को औरत के संसर्ग से बचने को कहा गया है. हम जानते हैं कि ईव आदम के लिए बनाई गई थी. आदम का जन्म मिट्टी से हुआ और ईव का गंदगी से. जब आदम ने ईव को दबाना चाहा तो वह चिल्ला पड़ी कि मैं भी मिट्टी से बनी हूं तो मैं नीचे क्यों लेटूं. तब लिलिथ शुरू हो गई और संसार की उत्पत्ति हुई. पश्चिम में लिलिथ को यौन संबंधों से नहीं, बल्कि मानव उत्पत्ति से जोड़ा गया है. प्रत्येक धर्म में औरत को गंदा और कामी माना गया है. इस का मुख्य श्रोत मासिकधर्म से जुड़ा है, जो केवल महिलाओं की यौन विशेषता है. अब तक के मानव इतिहास में आदमी औरत के मासिकधर्म को दया, घृणा और डर की नजर से देखता रहा है. धर्म ने तो औरत के खिलाफ और भी क्रूरता बरती है. कुछ पुराने धर्मग्रंथों में तो यहां तक कहा गया है कि मासिकधर्म के दौरान औरत का आदमी को छूना भी निषेध है. कुछ हिंदू धर्मग्रंथों में तो मासिकधर्म के दिनों में औरत को अपने बच्चों को देखने से भी मना किया गया है. इसलाम धर्म तो स्त्री को प्रदूषित (अपवित्र) तक मानता है. अन्य सभी धर्मग्रंथ भी मासिक के समय औरत को सब से अलग रखने की हिदायत देते हैं.

यौन इच्छाओं का दमन

राज्य चलाने और युद्धों से महिलाओं को हमेशा वंचित रखा गया. इस का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की यौन इच्छाओं को दबाना ही था, परंतु हम प्रकृति का नियम भूल जाते हैं कि प्रकृति समानता बनाए रखती है. इस प्रकार की बंदिशें उलटा असर डालती हैं. इस प्रकार से पृथ्वी पर जनसंख्या और व्यभिचार का बोलबाला होने लगता है. औरत जितनी समाज में पूजी जाती है उतना ही समाज उसे गिरी नजरों से देखता भी है. पश्चिमी सभ्यता के अनुसार औरत केवल चंचल है. संसार में और किसी बात पर इतना विरोध नहीं है जितना कि इस बात पर है कि एक व्यक्ति या समूह दूसरे व्यक्ति या समूह पर सैक्स या धर्म के आधार पर सब तरह से हावी होना चाहता है. इन मतभेदों का मूल कारण आदमी और औरत की यौन प्रवृत्ति ही है. अब तक के इतिहास में औरत की यौनेच्छा को किसी भी धर्म ने सम्मान नहीं दिया.

प्रताड़ना की शिकार क्यों

यह ठीक है कि भारत में कोई ईव या लिलिथ नहीं है, परंतु यहां भी औरत को मर्द के बाद ही स्थान दिया गया है तथा सदैव औरत को कमजोर सैक्स माना गया है. आज भी बेटियां भारत में अमान्य हैं. उन्हें बोझ समझा जाता है. कुछ समय पहले तक तो उन्हें जन्म के तुरंत बाद मौत के घाट उतार दिया जाता था. इन्हें मौत के घाट उतारने में बहुत ही वहशियाना तरीके इस्तेमाल किए जाते थे. लेकिन अब आधुनिक तकनीकों के आ जाने के कारण उन की भ्रूण हत्या कर दी जाती है और जो औरतें किसी कारणवश इस पुरुष वर्चस्व वाले संसार में जीवित रह जाती हैं उन्हें भी घृणा की दृष्टि से देखा जाता है तथा उन्हें विभिन्न तरीकों से प्रताडि़त किया जाता है. अपनी यौनता के कारण ही औरतें घर में, परिवार में, कार्यस्थल पर और गलियों में भी प्रताड़ना झेलती हैं.

एकतरफा सोच

घिसेपिटे विचार पुरुषत्व को ही ठीक लगते हैं, क्योंकि पुरुष अपना रुतबा बनाए रखना चाहते हैं. इस का प्रभाव औरतों पर ही नहीं पुरुषों पर भी पड़ता है. इस के परिणामस्वरूप औरतों का एक नया अवतार फिल्मी परदे व टीवी स्क्रीन पर दिखाई देता है. अब हेलन या कोंडू के डांस नहीं वरन अब हम ऐसी औरतों को देखते हैं, जो शांत, सख्त और बोल्ड भी हैं और नियंत्रित भी. वे अपनी जांघें दिखाती हैं और उरोजों को भी दर्शाती हैं. इस से पहले कि वे कुछ और कर पाएं पुरुष वर्ग इस का उत्तर ढूंढ़ लेता है. जैसेकि एक फिल्मी गाने के बोल हैं, ‘यह लड़की बड़ी मगरूर है, इसे अपनी जवानी पर गरूर है, हम इस का गरूर तोड़ेंगे, इस को कहीं का न छोड़ेंगे…’ यह गाना पुरुषों के एक समूह द्वारा गाया गया है, जिस में एक लड़की के प्रति पुरुषों के आक्रामक हावभाव दिखाए गए हैं.

ताकि कोई भेदभाव न हो

इस तरह के गानों तथा इसी प्रकार के कुछ धारावाहिकों से हम अपराधों को बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि इलैक्ट्रौनिक या प्रिंट मीडिया में जो भी औरत हम देखते हैं वह अधिकतर पुरुषों के दृष्टिकोण से ही देखते हैं. इस समस्या का समाधान औरत को यौन आकर्षक बना कर दिखाना या पुरुषों के विरोध में खड़ा करना नहीं, बल्कि हमें अपनी फिल्मों में, धारावाहिकों में, इलैक्ट्रौनिक तथा प्रिंट मीडिया में औरतों के बारे में सत्य व सही दृष्टिकोण दिखाना चाहिए. औरतों को केवल देह के रूप में नहीं देखना चाहिए. उन की एक सही इमेज बनानी चाहिए ताकि पुरुषत्व व नारीत्व का दुरुपयोग न हो. यदि ऐसा हुआ तो समाज में औरत बन कर पैदा होना कोई दोष नहीं माना जाएगा.

इस की शुरुआत पटियाला से स्नातक कर रही 20 वर्षीय निकिता आजाद ने एक औनलाइन यूथ मंच से की है, जिस में उन्होंने महिलाओं के साथ हो रहे भेदभावों, इस से फैलने वाली भ्रांतियों और तमाम तरह की सामाजिक वर्जनाओं का विरोध किया है. इस में उन्होंने महिलाओं से इस तरह के सामाजिक टैबू को तोड़ कर सामने आने की बात भी कही है. साथ ही ‘हैपी टु ब्लीड’ लिखे सैनिटरी नैपकिन के साथ अपनी तसवीर पोस्ट करते हुए लोगों से इस तरह के पितृसत्तात्मक रवैए के खिलाफ खड़े होने की अपील की तो सोशल मीडिया पर ‘हैपी टु ब्लीड’ मुहिम को लोगों ने हाथोंहाथ लिया. इस से उम्मीद बंधती है कि समाज में काफी जाग्रति आई है. 

बाज़ार के बादशाह हैं कोहली, मेसी-जोकोविच को पछाड़ा

IPL के फ़ाइनल में पहुंचने वाली रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर के कप्तान विराट कोहली का सितारा इन दिनों बुलंदियों पर है. एक तरफ जहां उनका बल्ला रन उगल रहा है और वह क्रिकेट के बेताज बादशाह बनने की तरफ अग्रसर हैं, वहीं अब उन्होंने फुटबाल के किंग लियोनेल मेस्सी और दुनिया के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच को भी पीछे छोड़ दिया है.

स्पोट्र्सप्रो के एक सर्वे के अनुसार कोहली दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा मार्केटेबल खिलाड़ी बन गए हैं. कोहली इस सर्वे में एनबीए के सबसे कीमती खिलाड़ी स्टीफन करी और युवेंटस के फ्रांसीसी फुटबालर पाल पोगबा से आगे हैं. कोहली गोल्फर जोर्डन स्पियेथ से भी आगे हैं. जोकोविच 23वें और मेस्सी 27वें स्थान पर हैं जबकि फर्राटा किंग उसेन बोल्ट 31वें स्थान पर हैं.

शीर्ष 50 में भारतीय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा भी हैं. स्पोट्र्सप्रो के अनुसार रैंकिंग का आधार तीन साल की अवधि में बाजार में खिलाड़ी की क्षमता है . इसमें पैसा, उम्र, घरेलू बाजार, करिश्मा, बाजार में उतरने की इच्छा शामिल है. फार्मूला वन चैम्पियन लुईस हैमिल्टन 2014 में शीर्ष पर थे. ब्राजीली फुटबाल स्टार नेमार आठवें स्थान पर हैं. कोहली 919 रन बनाकर IPL-9 में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाली फ़ेहरिस्त में टॉप पर हैं. इसमें चार शतक भी शामिल हैं.

140 अक्षर की सीमा से ज्यादा कर पाएंगे ट्वीट

माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर एक नया फीचर लाने जा रहा है जिसकी मदद से इसके 30 करोड़ प्रयोक्ता 140 अक्षरों की सीमा से ज्यादा की ट्वीट कर पाने में सक्षम होंगे. ट्विटर ने कहा, "अब किसी ट्वीट का जवाब देने पर प्रयोक्ता का नाम 140 अक्षरों की सीमा में शामिल नहीं होगा. इससे ट्विटर पर बातचीत आसान और अधिक स्पष्ट बनेगी. अब आपको अपनी बात पहुंचाने के लिए शब्दों को तोड़ने की जरुरत नहीं है. इसके अलावा जब आप फोटो, जीआईएफ फाइलों, वीडियो, सर्वेक्षण आदि को अपनी ट्वीट में जोड़ेगे तो उसे भी 140 अक्षरों की सीमा में नहीं गिना जाएगा."

पिछले एक दशकों से ट्विटर पर ट्वीट करने की सीमा महज 140 अक्षर ही थी. लेकिन अब इसमें बड़ा बदलाव होने जा रहा है. ट्विटर ने घोषणा की है, "यह अपडेट आने वाले महीने में उपलब्ध हो जाएगा. हालांकि 140 अक्षरों वाली सीमा भी बनी रहेगी. हम काफी बदल रहे हैं. हम हमेशा ट्विटर को बेहतर बनाने के प्रयास में जुटे रहते हैं."

ये मोबाइल ऐप आपको देगा भूकंप की चेतावनी

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा एंड्रॉयड एप लॉन्च किया, जो स्मार्टफोन से सूचनाएं इकट्ठा कर संभावित भूकंप का पता लगा सकता है. यह एप आपको भविष्य में आने वाले भूकंप के बारे में आगाह करेगा. बर्कले स्थित कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के एक दल की ओर से विकसित 'माइशेक' एप गूगल प्ले स्टोर से हासिल किया जा सकता है.

एप उपयोगकर्ता के फोन में काम करता रहता है और फोन में मौजूद एक्सेलरोमीटर हर वक्त कंपन को रिकॉर्ड करता रहता है. यदि यह कंपन भूकंप की प्रकृति का होता है, तो इस कंपन के आंकड़े कैलीफोर्निया स्थित बर्कले सिस्मोलॉजिकल लैबोरेटरी के पास विश्लेषण के लिए चले जाते हैं.

अंग्रेजी भाषा में यह ऐप 12 फरवरी को लॉन्च किया गया था और तब से अब तक दुनियाभर में 1,70,000 लोगों ने इस ऐप को डाउनलोड किया है. बर्कले सिस्मोलॉजिकल लैबोरेटरी के निदेशक और विश्वविद्यालय के पृथ्वी और ग्रह विज्ञान विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष रिचर्ड एलेन ने कहा, 'हमें लगता है कि माइशेक से भूकंप की चेतावनी और तीव्र तथा अधिक सटीक हो सकती है.'

फरवरी से अब तक इस ऐप के नेटवर्क ने चिली, अजेंटीना, मेक्सिको, मोरक्को, नेपाल, न्यूजीलैंड, ताईवान, जापान में भूकंप का पता लगाया है. इस नेटवर्क ने 2.5 तीव्रता जैसे छोटे और इक्वोडोर में 16 अप्रैल, 2016 को आए 7.8 तीव्रता जैसे बड़े भूकंपों को दर्ज किया है.

जल्द ही यह ऐप स्पेनिश और चीनी भाषा में भी लॉन्च किया जाएगा और जल्द ही आईफोन के लिए भी 'माइशेक' लॉन्च किया जाएगा. यह एप 93 फीसदी मामलों में भूकंप के कंपन और जीवनचर्या की अन्य गतिविधियों, जैसे- चलने, नृत्य करने या फोन गिरने के दौरान होने वाले कंपन में अंतर को सही-सही पहचान लेता है.

डिग्री का शगूफा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितने पढ़े हैं, यह विवाद रोचक बन रहा है. साफसफाई और ट्रांसपेरैंसी के पैरोकार नरेंद्र मोदी को अपनी डिग्री के बारे में चुप्पी साधनी पड़ रही है और विश्वविद्यालयों को रिकौर्ड खंगालने पड़ रहे हैं कि उन के यहां कोई नरेंद्र मोदी तो नहीं था. दिल्ली का एक और नरेंद्र मोदी तो सकते में है कि लोग उस के पास पहुंच गए कि कहीं वही तो असल नरेंद्र मोदी नहीं. डिग्री होना या न होना कोई विशेष योग्यता नहीं है पर अगर नहीं है तो छिपाने की बात क्या है, यह समझ से परे है. नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे तो केवल 10वीं पास हैं पर बाद में उसी इंटरव्यू में कहा था कि पत्राचार से आगे की पढ़ाई की पर कहां से कब कैसी डिग्री ली, यह नहीं बताया. उस समय उन्हें मालूम नहीं था कि कभी प्रधानमंत्री बनेंगे.

डिग्री को महत्त्च देना अच्छी बात नहीं है पर कठिनाई यह है कि डिग्री ही बताती है कि व्यक्ति से किस तरह की अपेक्षा की जाए. यदि डिग्री न हो तो डाक्टर या वकील से क्या पूछा जाए, यह कभी साफ न होगा. उसे क्या काम सौंपा जाए, यह पता नहीं चलेगा. माना कि देश के स्कूलकालेज लाखों ऐसे डिग्रीधारी निकालते हैं जिन्हें कुछ आताजाता नहीं है, पर यह भी सच है जो भी जहां कहीं अच्छा काम कर रहा है, उस के पास कोई अच्छी डिग्री होती ही है. सफल नेता, जज, अफसर, पत्रकार, उद्योगपति डिग्रीधारी ही होते हैं. कुछ अधपढ़े नेता होते हैं पर वे बाद में अपनी कमजोरियों से मारे जाते हैं. कई बार सफल लोग बनावटी डिग्रियां खरीदते हैं ताकि थ्री इडियट की तरह अपने को योग्य साबित कर सकें. नरेंद्र मोदी इस विवाद को उछलने दे रहे हैं उस से साफ है कि कहीं दाल में काला है. जैसे वे चाय बेचने पर शर्मिंदा नहीं हैं, उन्हें अपनी डिग्री के होने या न होने पर शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं. प्रधानमंत्री के तौर पर वे कमजोर नहीं दिख रहे और डिग्री का शगूफा बेकार का है.

श्रीदेवी के साथ काम कर क्यों खुश हैं अभिमन्यु सिंह

‘‘गुलाल’’, ‘‘रामलीला’’, ‘‘जज्बा’’, ‘‘ग्लोबल बाबा’’ सहित कई फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुके अभिनेता अभिमन्यु सिंह अब बोनी कपूर द्वारा बनाई जा रही फिल्म ‘‘मॉम’’ में श्रीदेवी के साथ खलनायक का किरदार निभाते हुए अति उत्साहित हैं. वास्तव में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान अभिमन्यु सिंह ने श्रीदेवी के साथ काम करने का सपना देखा था. उनका यह सपना अब पूरा हो गया है.

खुद अभिमन्यु सिंह कहते हैं-‘‘मैं श्रीदेवी का प्रशंसक हूं. वह बेहतरीन कलाकार के साथ साथ बेहतरीन इंसान भी हैं. हम कुछ समय पहले सात डिग्री से भी कम तापमान में जॉर्जिया में श्रीदेवी के साथ इस फिल्म के कई महत्वपूर्ण दृश्यों की शूटिंग कर वापस लौटे हैं. वहां पर रात में साढ़े आठ बजे सूर्य डूबता था. बर्फ से पूरी तरह से ढंकी धरती पर भीषण ठंड में शूटिंग करना हम सभी के लिए काफी मुश्किल था. पर श्रीदेवी पूरी यूनिट का ख्याल रख रही थी. वह मुझसे कहती थीं कि, ‘हर आधे या एक घंटे के अंदर मोजे बदलते रहो, जिससे ठंड न लगने पाए. वह तो अपने आप में अभिनय का विश्वविद्यालय हैं. मैं तो कॉलेज दिनों से ही श्रीदेवी का फैन रहा हूं, और अब उनके साथ सिल्वर स्क्रीन पर नजर आउंगा. इससे मेरा सपना पूरा हो गया.’’

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