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देश का विकास या धर्म का विकास

देश में धर्म का व्यापार तेजी से बढ़ रहा है. पुराने तीर्थस्थानों पर भीड़ बढ़ रही है व व्यवस्थाएं खराब हो रही हैं. धर्म के दुकानदारों की दुकानें कोने कोने में खुल रही हैं. मानो, देश में मेक इन इंडिया का मतलब फेक (नकली) इन इंडिया हो जहां सामान उत्पादित नहीं किया जाएगा बल्कि होगा सपनों, चमत्कारों के किस्सों, दान की महिमा का गुणगान और पंडों की भारीभरकम गाडि़यों का दिखावा. खुद को गैरधार्मिक कहने वाली सरकार अगर धर्म के नाम पर इस में लगातार पैसा लुटाए और जनता की जेब से वहां सीधे गए पैसों के अलावा वह टैक्स का पैसा भी लगाए तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता. रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने धार्मिक स्थलों को जोड़ने के लिए खास रेलें चलाने का वादा किया है और तीर्थस्थलों, चाहे वहां गंदगी व बदइंतजामी का राज हो, के स्टेशनों को सुंदर करने पर अरबों रुपए खर्च किए जाएंगे.

जहां यात्री जाएं वहां रेल पहुंचाने का काम रेल मंत्रालय का है चाहे यात्री गोआ में मौजमस्ती के लिए जाएं या हरिद्वार में पुण्य कमाने. पर यह हल्ला मचाने का काम सरकार का नहीं कि वह आस्था के व्यापार को चमकाने के लिए धार्मिक शहरों को विशेष सुविधा देगी. धार्मिक शहर नाम की कोई जगह रेल प्रबंधन की सोच में नहीं होनी चाहिए. उस के लिए हर वह शहर व उस का स्टेशन महत्त्व का होना चाहिए जहां यात्री आ व जा रहे हैं. देश को जरूरत तो यह है कि जहां उत्पादन हो रहा है, जहां से मजदूर, अफसर सफर कर रहे हैं, जहां विद्यार्थी आजा रहे हैं वहां वह पैसा खर्च करे, रेल की सुविधा मुहैया कराए. जहां उत्पादन होता है वहां चाहे सामान की लदाई का मामला हो या कामगारों के आनेजाने का, हर क्षण कीमती है, इसलिए वहां रेलें ढंग से चलनी चाहिए और सुविधाजनक होनी चाहिए. मुंबई की लोकल ट्रेनों में 2 घंटे का घिचपिच वाला सफर कर के आदमी की उत्पादकता क्या रह जाती है, यह रेल मंत्री की वरीयता होनी चाहिए न कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर में बेवकूफ, अंधविश्वासी तीर्थ करने वालों को कैसे आराम से पहुंचाया जाए, इस की चिंता करने की.

देश की सरकार का कर्तव्य देश का विकास है, मंदिर के धंधे का नहीं. पर अफसोस यह है कि कांगे्रस और भारतीय जनता पार्टी को तो छोडि़ए, समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियां भी धर्म के व्यापार में हाथ डाल कर ईश्वर के चमत्कारों का इंतजार करने लगती हैं. सुरेश प्रभु की निष्ठा तो मूर्तिपूजक है पर विपक्षी पार्टियों के नेता भी कौन से कम हैं? देश को गरीबी से निकालना है तो मंदिर बनाने से तो वह निकलने से रहा. मंदिर, मसजिद, चर्च विवाद तो देश को उसी दलदल में रखेगा जिस में वह रह रहा है. कोई ऐसी ट्रेन नहीं बन रही जो भक्ति,  अंधविश्वासों, दानदक्षिणा की अंधेरी गुफा से निकाल कर देश को विकास व सामाजिक समानता के प्लेटफौर्म पर ले आए.

विदेशी क्रिकेट लीग में खेलेंगी भारतीय महिला क्रिकेटर

बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट से जुड़ा हुआ एक अहम फैसला लेते हुए भारतीय महिला क्रिकेटरों को ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में होने वाले क्रिकेट लीग में खेलने की अनुमति दे दी है. ये फैसला बीसीसीआई की महिला क्रिकेट समिति के मीटिंग में लिया गया और अब भारतीय महिला क्रिकेटर ऑस्ट्रेलिया के बिग बैश लीग और इंग्लैंड के महिला सुपर लीग में खेल सकती हैं.

बोर्ड के इस कदम को महिलाओं के खेल के विकास के लिए उठाए गए कदम के तौर पर देखा जा रहा है. इससे पहले बोर्ड ने महिलाओं को केन्द्रीय अनुबंध में लाने का फैसला भी किया था.

इस साल इंग्लैंड का महिला सुपर लीग 30 जुलाई से 14 अगस्त तक खेला जाएगा. ये इस लीग का पहला संस्करण है और अब बीसीसीआई ने यह फैसला लिया है तो देखना है कि कितनी भारतीय महिला क्रिकेटर इस लीग में हिस्सा लेती हैं. हालांकि इस मामले में बीसीसीआई ने काफी देरी कर दी है क्योंकि इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी की पूर्ण सदस्य देशों को भागीदारी के लिए एक चिट्ठी लिखी थी जिसका जवाब बीसीसीआई ने अभी तक नही दिया है.

इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने अभी तक इस लीग में 18 विदेशी महिला खिलाड़ियों को शामिल किया है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड और वेस्टइंडीज की खिलाड़ी शामिल हैं. 6 टीमों वाले इस टूर्नामेंट के लिए हर टीम की घोषणा अप्रैल में ही कर दी गई थी और ऐसे में भारतीय महिला खिलाड़ियों का खेलना मुश्किल है.

इसके अलावा महिला बिग बैश लीग के पहले संस्करण में भी भारतीय महिला क्रिकेटर मौजूद नहीं थी और अब ये देखना काफी महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस साल के अंत में होने वाले इस लीग में भारतीय खिलाड़ी खेलती हैं या नही? अगर प्रमुख भारतीय महिला क्रिकेटर की बात करें तो टीमों को मिताली राज, हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधना और झूलन गोस्वामी को शामिल करने में दिलचस्पी होगी.

सुष्मिता मुखर्जी को है इन फिल्मों को करने का पछतावा

धारावाहिक ‘‘करमचंद’’ में पंकज कपूर के साथ किटी का किरदार निभाकर शोहरत बटोरने वाली अदाकारा सुष्मिता मुखर्जी के अभिनय करियर को 33 साल पूरे हो चुके हैं, मगर लोग उन्हे आज भी ‘किटी’ के नाम से ही पहचानते हैं. किटी यानी कि सुष्मिता मुखर्जी का अपना एक दर्शक वर्ग है. दर्शकों ने सुष्मिता मुखर्जी को निगेटिव व पॉजीटिव हर तरह के किरदारों में हमेशा पसंद किया, मगर कुछ माह पहले प्रदर्शित दो असफल एडल्ट फिल्मों ‘मस्तीजादे’ और ‘क्या सुपर कूल हैं हम 3’ में सुष्मिता मुखर्जी को अभिनय करते देख लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ. तमाम लोगों की राय रही कि कम से कम उन्हें सुष्मिता मुखर्जी से इस तरह के किरदार निभाने और इस तरह की फिल्मों का हिस्सा होने की उम्मीद नहीं थी.

हाल ही में फिल्म ‘‘दिल तो दीवाना है’’ के संगीत रिलीज समारोह के अवसर पर सुष्मिता मुखर्जी से जब हमारी एक्सक्लूसिव बातचीत हुई, तो हमने उनसे बिना किसी लाग लपेट के सीधा सवाल किया-‘‘पिछले दिनों आप दो एडल्ट कॉमेडी वाली फिल्मों ‘क्या सुपर कूल हैं हम’ और ‘मस्तीजादे’में नजर आयीं? क्या इन फिल्मों में अभिनय करना आपका सही कदम रहा?’’

हमारे सवाल को सुनकर उनके चेहरे पर दर्द के भाव उभरे और उन्होने दुबारा इस तरह की फिल्मों का हिस्सा न बनने का वादा करते हुए कहा-‘‘मुझे खुद समझ में नहीं आया कि मैने यह फिल्में कैसे कर ली. मुझे खुद नहीं पता था कि यह इस तरह की फिल्में होंगी. वास्तव में जब मिलाप झवेरी ने मुझे फिल्म ‘मस्तीजादे’ का आफर दिया था, तो मुझे बताया था कि यह एक सेक्स एडिक्ट औरत का किरदार है, मुझे लगा कि यह कोई मेरिल स्ट्रिप वाला किरदार होगा. जो कि अब तक हिंदी सिनेमा में दिखाते नहीं हैं. इस औरत के सेक्स एडिक्ट होने की कोई वजह होगी.

विदेशी फिल्मों में हमारी उम्र की औरतें इस तरह के काफी रोचक किरदारों में नजर आती हैं. तो मुझे इस किरदार को निभाने का लालच हुआ. मिलाप झवेरी ने मुझे स्क्रिप्ट भी नहीं दी थी. उनका कहना था कि मुझे उन पर यकीन करना चाहिए. मैने भी उनकी बात पर भरोसा कर लिया. शूटिंग के लिए हम लोग बैंकाक गए थे. जब हम वहां पहुंच गए, तो मुझे नहीं लगा कि अब मैं निर्देशक पर चिल्लाउं, उनसे झगड़ा करुं. ‘क्या सुपर कूल हैं हम’ और ‘मस्तीजादे’ दोनों के लेखक मिलाप झवेरी ही थे. उनके कहने पर ही मैंने यह दोनों फिल्में साइन की थीं. फिर मुझे लगा कि कलाकार को हर तरह के किरदार निभाने का स्वाद चखना चाहिए. पर मुझे नहीं पता था कि यह दोनो ही फिल्में इतनी वाहियात निकलेंगी. दूसरी बात यह दोनों ही फिल्में मेरे संस्कार के खिलाफ हैं. पर मैने निर्णय कर लिया है, कि चाहे जो हो जाए, अब इसके बाद इस तरह की फिल्में नहीं करुंगी.’’

आखिर किसके शुक्रगुजार हैं रणदीप हुड्डा

अमूमन देखा गया है कि हर कलाकार अपनी बेहतरीन परफार्मेंस या किसी खास किरदार के मिलने पर फिल्म के निर्देशक या अपने सह कलाकार की तारीफ करते हुए नजर आता है. लेकिन फिल्म ‘सरबजीत’ में सरबजीत की शीर्ष भूमिका निभाकर शोहरत बटोर रहे अभिनेता रणदीप हुड्डा इन दिनों अपनी दस जून को रिलीज होने वाली फिल्म ‘‘दो लफ्जों की कहानी’ के निर्देशक दीपक तिजोरी की बजाय फिल्म के निर्माता के अविनाश राय का शुक्रिया अदा करते हुए नजर आ रहे हैं. हाल ही में ‘‘सरिता’’ पत्रिका की रणदीप हुड्डा से खास मुलाकात हुई. इस मुलाकात में बातचीत करते हुए रणदीप हुड्डा ने कबूल किया कि उन्होने जितनी मेहनत फिल्म ‘‘सरबजीत’’ के लिए की थी, उससे कई गुना ज्यादा मेहनत उन्होने फिल्म ‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ में बाक्सर का किरदार निभाते हुए की. उन्होने छह माह तक सुबह और शाम दोनों वक्त दो दो घंटे की कठिन ट्रेनिंग ली. उनका दावा है कि इस ट्रेनिंग के दौरान फिल्म के निर्माता अविनाश राय भी उनके साथ मेहनत करते थे.

इसी बातचीत के दौरान जब हमने रणदीप हुड्डा से पूछा कि हर कलाकार अपनी फिल्म के निर्देशक की तारीफें करता नजर आता है, पर वह पहले अभिनेता हैं, जो कि फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ के निर्माता अविनाश राय की तारीफ कर रहा है. हमारे इस सवाल पर रणदीप हुड्डा ने कहा-‘‘मैं अपने निर्माता अविनाश राय का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मेरे साथ सुबह शाम ट्रेनिंग के दौरान मेरा साथ दिया. ऐसा बहुत कम होता है, जब कोई निर्माता अपने कलाकार द्वारा की जा रही मेहनत का सहभागी बनता है.’’

छात्रों के लिए एयर इंडिया का खास ऑफर

सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया ने छात्रों के लिए बेहतरीन ऑफर निकाला है. छात्रों को हवाई सफर का ऑफर देते हुए एयर इंडिया ने खास स्कीम लांच की है. इस ऑफर के मुताबिक अब छात्रों के लिए एयर इंडिया के घरेलू उड़ानों के टिकट 3500 रुपये से शुरू होंगे.

शैक्षिक कारणों से हवाई यात्रा करने वाले छात्र मात्र 3500 रुपये के टिकट पर हवाई सफर कर सकेंगे. इस कीमत में सभी टैक्स शामिल होंगे. यह ऑफर सीमित समय के लिए है. एयर इंडिया की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक ऑफर के तहत, 1000 किलोमीटर तक के सफर के लिए 3500 रुपये, जबकि 1000 किलोमीटर से ज्यादा के सफर के लिए 5500 रुपये का टिकट लेना होगा. एयर इंडिया के मुताबिक विभिन्न शैक्षिक कारणों मसलन-स्कूल या कॉलेज ज्वाइन करने, एंट्रेंस एग्जाम देने आदि के लिए सफर करने वाले छात्रों को इस स्पेशल ऑफर के तहत फायदा मिलेगा.

इस ऑफर के तहत टिकटों की बुकिंग अगले बुधवार से शुरू होगी जो 31 जुलाई तक चलेगी. ऑफर के तहत खरीदे गए टिकटों से 1 जुलाई से 31 अगस्‍त के बीच सफर किया जा सकेगा. बता दें कि पिछले हफ्ते सस्‍ती हवाई यात्रा मुहैया कराने वाली एयरलाइंस गोएयर ने भी छात्रों के लिए ऐसी ही स्‍कीम पेश की थी. इसके तहत, हवाई किराए और बैगेज एलाउंस में छूट दी गई थी.

टेस्ट क्रिकेट में होगा बदलाव, दो श्रेणी में होंगे मैच

टेस्ट क्रिकेट को बचाने के लिए और इसे पहले से ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) खेल के इस प्रारूप को दो श्रेणियों में लाने के बारे में विचार कर रही है. आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेविड रिचर्डसन ने कहा कि लॉडर्स मैदान पर इस सप्ताह होने वाली बैठक में टेस्ट क्रिकेट को दो श्रेणियों में लाने पर विचार किया जाएगा ताकि इसे दोबारा से रोचक बनाया जाए.

रिचर्डसन ने कहा कि 'यह अब आम धारणा है, अगर हम चाहते हैं कि टेस्ट क्रिकेट भविष्य में बनी रहे तो हम यह नहीं कह सकते की यह अपने दम पर बनी रहेगी.'

उन्होंने कहा, 'हम जब तक इन सीरीज को रैंकिंग और ट्रॉफी से ज्यादा महत्व नहीं देंगे तब तक टेस्ट क्रिकेट का पतन होता रहेगा. अगर हम चाहते हैं कि गैर प्रतिस्पर्धी टेस्ट क्रिकेट भी ज्यादा से ज्यादा खेली जाए तो उस पर भी यह बात लागू होती है.' उन्होंने कहा, 'अगर हम चाहते हैं कि टेस्ट क्रिकेट जीवित रहे तो हमें टेस्ट टीमों में गिरावट को रोकना होगा. हमें एक सही प्रतिस्पर्धात्मक सरंचना बनानी होगी जो खेल को बढ़ाने और इसे शीर्ष पर पहुंचाने के लिए मौके प्रदान करे.'

रिचडर्सन ने माना कि टेस्ट को अगर लंबे समय के लिए जीवित रहना है तो इसके लिए उसे पहले से ज्यादा संदर्भ की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'कई सदस्य देशों ने माना है कि उन्हें द्विपक्षीय क्रिकेट के टीवी अधिकारों से ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है और उन्होंने बदलाव की जरूरत को महसूस किया है. साथ ही नए अर्थपूर्ण संदर्भ को लाने की बात कही है.'

उन्होंने कहा, 'लीग की खासियत यह है कि यह काफी प्रतिस्पर्धी होती हैं और जो टीमें एक दूसरे के खिलाफ खेल रही होती हैं वह समान स्तर की होती हैं.' रिचर्डसन ने कहा, 'वह किसी न किसी चीज के लिए लड़ती हैं. उम्मीद है इससे वह अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रभावित होती हैं जिससे मैच ज्याता प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं.'

शहंशाह या प्रधान सेवक

अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में सोनिया गांधी ने एक ऐसी बात कही, जिसे पूरी दुनिया जानती है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, कोई शहंशाह नहीं, पर तब तक  जानने बाले यह भी जान गए थे कि ज्यादा नहीं एक दिन पहले ही यह खबर छन कर आई थी कि उनके दामाद राबर्ट बाड्रा का इंग्लैंड तरफ भी एक बेनामी गुमनामी मकान है. कहने को तो मोदी सरकार के 2 साल पूरे होने पर मनाए गए जश्न पर सोनिया ने यह कहते निशाना साधा था कि देश में सूखा पड़ा है और सरकार बेवजह योजनाओं की कामयबियों पर ढ़ोल पीट रही है, लेकिन लोगों ने देर सी दी गई इस  प्रतिक्रियानुमा भड़ास के माने यही निकाले कि दामाद जी पर थोड़ा सा शिकंजा क्या कसा, कि प्रधानमंत्री जो खुद को प्रधान सेवक कहते अघाते नहीं, शहंशाह नजर आने लगे. अभी सोनिया और कांग्रेस दोनों 4 राज्यों में हुई दुर्गति की समीक्षा भी ढंग से नहीं कर पाये थे यानि दुख नहीं मना पाये थे कि राबर्ट बाड्रा नाम की दुखती नस पर फिर हाथ रख दिया गया जिससे पूरी कांग्रेस दहल जाती है.

प्रियंका पर दबाव

पति संकट में हो तो भारतीय नारी शेरनी बन जाती है. यह वह वक्त है जब उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव पर सबकी नजरे हैं और हर कोई मान रहा है कि अपने इस पुराने गढ़ में कांग्रेस 30-40 सीटें भी ले जाए, तो बहुत है. कोई भारी उलटफेर या चमत्कार ही उसकी वापसी करा सकता है. उलटफेर आज कल होते नहीं और चमत्कार के नाम पर प्रियंका गांधी भर बची हैं, जिन्हें सीएम प्रोजेक्ट कर कांग्रेस दूसरे या तीसरे नंबर की सोच सकती है. हालांकि पान की गुमठियों और चाय ठेलों, जहां जमीनी राजनैतिक विश्लेषण होता है, के समीक्षक इसे अब गारंटी की नहीं बल्कि चांस की बात मानने लगे हैं पर इन लोगों की ही राय है कि अगर राबर्ट को ज्यादा परेशान किया गया, तो प्रियंका इन्दिरा गांधी सरीखे आक्रामक तेवर दिखाते राजनीति के मैदान में कूदकर हाहाकार मचा सकती हैं. वे मोदी को शहंशाह नहीं बल्कि तानाशाह करार देंगी.

कोई पत्नी लोगों के बीच जाकर पति की दुहाई दे तो भारतीय वोटर इतना निष्ठुर और संवेदनहीन भी नहीं हुआ कि उसे महज राजनीति मानते नजरंदाज कर दे, खासतौर से वह महिला गांधी नेहरू परिवार की बेटी हो तो उसके आँचल में वोट पड़ सकते हैं. जो हमदर्दी नरेंद्र मोदी ने चाय वाला के नाम पर बटोरी थी वही प्रियंका पति के नाम पर बटोर सकती हैं, वरना तो सीधे सीधे महज प्रियंका गांधी होने के नाम पर तो वोट झड़ने से रहे.

देखना दिलचस्प होगा कि प्रियंका क्या करती हैं और भाजपा राबर्ट बाड्रा को सिर्फ यूं ही हड़काती रहेगी या नरेंद्र मोदी किसी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के पहले अपने वादे के मुताबिक दामाद जी को जेल की हवा खिलाने की हिम्मत कर पाएंगे.  

 

जब पंजाबी हिमांश को सीखनी पड़ी गुजराती

दिव्या खोसला कुमार निर्देशित फिल्म ‘‘यारियां’’ से चर्चा में आए अभिनेता हिमांश कोहली को उसके बाद कोई फिल्म नहीं मिली. पूरे दो साल के बाद उन्हे हसनैन हैदराबादवाला के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘‘स्वीटी देसाई वेड्स एनआरआई’’ मिली. पर फिल्म के निर्देषक की शर्त थी कि उन्हे इस फिल्म में अभिनय करने के लिए पहले गुजराती भाषा सीखनी पडे़गी. बेचारे हिमांष ने अपने अभिनय करियर की रूकी हुई गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए गुजराती सीखी.

खुद हिमांष कोहली कहते हैं-‘‘मैं ठहरा दिल्ली में पला बढ़ा पंजाबी युवक. मेरे लिए गुजराती भाषा सीखना बहुत कठिन रहा. पर मैंने गुजराती भाषा सीखने के साथ साथ गुजारितयां के जो मैनेरिज्म होते हैं, वह भी सीख लिए. मैं तो सेट पर भी सबसे गुजराती भाषा में ही बात करता हूं. कुछ लोग मेरा मजाक भी उड़ाते है, पर मुझे चिंता नहीं. आखिर किरदार तो सही अदाज में निभाना ही है.’’

इस सपने को पूरा करना चाहते हैं रितेश देशमुख

हिंदी फिल्मों में अपनी एक अलग पहचान बनाने के बाद रितेश देशमुख ने अपनी मातृभाषा मराठी में ‘‘बालक पालक’’ व ‘‘लय भारी’’ जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं. फिल्म ‘लय भारी’ में रितेश देशमुख ही हीरो थे. इन दोनो ही फिल्मों ने बाक्स आफिस पर सफलता के नए रिकार्ड बनाए. ‘बालक पालक’ को तो कई अवार्ड भी मिल गए. इन दिनों वह अपनी हिंदी फिल्म ‘‘हाउसफुल 3’’ के प्रदर्शन को लेकर उत्साहित हैं, जिसमें उन्होने हास्य भूमिका निभायी है, तो दूसरी तरफ वह एक अन्य मराठी फिल्म ‘‘मौली’’ करने वाले हैं.

मगर रितेश देशमुख का सपना है कि वह अपनी पत्नी व अभिनेत्री जिनेलिया डिसूजा के साथ एक मराठी भाषा की फिल्म में अभिनय करें. खुद रितेश देशमुख कहते हैं-‘‘मैं अपनी पत्नी जिनेलिया के संग मराठी भाषा की फिल्म करना चाहता हूं. उन्होने हिंदी, कन्नड़, तमिल, तेलगू व मलयालम सहित पांच भाषाओं की फिल्मों में अभिनय किया है. पर अभी तक उन्होंने किसी मराठी भाषा की फिल्म में अभिनय नहीं किया है. इसलिए अब मैं उनके साथ मराठी भाषा की फिल्म करना चाहता हूं. पर मुझे इसके लिए कम से कम एक साल तक इंतजार करना पड़ेगा. क्योंकि उन्होंने 31 मई को ही दूसरी बार पिता बनाया है. मै दूसरी बार पिता बनकर बहुत खुश हूं. मेरा एक सपना एक कमर्शियल बौलीवुड फिल्म का निर्माण करना भी है, पर इसके लिए अभी मैं प्रोडक्शन मार्केट को समझ रहा हूं.’’

कंगना रानौट की पारिश्रमिक राशि का सच क्या है…?

पुरूष प्रधान बौलीवुड में कंगना रानौट ने अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर आतंक मचा रखा है. अजय देवगन, संजय दत्त से लेकर कई कलाकार उनके साथ काम करने से कतराते हैं. बालीवुड के तीनों खान भी कंगना रानौट के साथ काम करने से डरते हैं. बौलीवुड में अब तक माना जाता रहा है कि कंगना रानौट वह पहली अदाकारा हैं, जिन्हे एक फिल्म में अभिनय करने के लिए ग्यारह करोड़ रूपए मिलते हैं. जबकि उनकी फिल्में आम बौलीवुड कमर्शियल मसाला फिल्में नहीं होती है. यह एक अलग बात है कि आज तक खुद कंगना रानौट ने स्वीकार नहीं किया है कि उन्हे कितनी पारिश्रमिक राशि मिलती है. कंगना हमेशा दावा करती आई हैं कि उन्हें जितनी राशि मिलनी चाहिए, उतनी राशि मिल रही है.

पर बौलीवुड की वेबसाइट ने जो खुलासा किया है, वह तो आश्चर्यजनक है. इस वेबसाइट की माने तो कंगना रानौट को विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘‘रंगून’’ में अभिनय करने के लिए पारिश्रमिक राशि के तौर पर महज तीन करोड़ रूपए ही मिले हैं. जबकि कंगना रानौट ने फिल्म ‘रंगून’ की शूटिंग खत्म करने के बाद दावा किया है कि, फिल्म ‘रंगून’ में कंगना रानौट, सैफ अली खान व शाहिद कपूर यह तीन हीरो हैं.’’

सूत्रों के अनुसार फिल्म ‘रंगून’ में सैफ अली खान और शाहिद कपूर को भी कंगना रानौट के समान ही पैसे मिले हैं. यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि सैफ अली और शाहिद कपूर की पिछली कई फिल्में असफल रही हैं. बहरहाल, इस रहस्य के उजागर होने के बाद से कंगना रानौट के अलावा सैफ अली खान व शाहिद कपूर भी इस मसले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं.

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