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वापस वतन की ओर

जनता दल (यूनाइटेड) के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव की अध्यक्ष पद की कुरसी अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ले ली है. जाहिर है, बदलाव की बयार और बूढ़ों की विदाई का प्रोग्राम हर दल में चल रहा है. लंबी सियासी पारी खेल चुके शरद यादव अब फुरसत में हैं और देशभर में घूमघूम कर अपनी पार्टी को मजबूती देने में जुट गए हैं. बीते दिनों शरद यादव भोपाल आए, तो खासा जोश में थे. इस की एक वजह यह भी है कि राजनीति की शुरुआत उन्होंने यहीं से की थी. जयप्रकाश नारायण ने उन्हें एकजुट विपक्ष की ओर से जबलपुर लोकसभा का उपचुनाव लड़वाया था, जिस में वे जीते थे, तो कांग्रेस को उखाड़ फेंकने का यह प्रयोग कामयाब रहा था.

अब उन की कोशिश यह है कि भाजपा को उखाड़ फेंकने में सभी पार्टियां एकजुट हो जाएं, तभी साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कामयाबी मिल पाएगी. लेकिन दिक्कत यह है कि जद (यू) का असर बिहार तक ही सिमटा है और अब सपाबसपा जैसी उस के बराबर की कई पार्टियां वजूद में हैं, जिन का किसी एक नेता के नाम पर राजी होना मुश्किल दिख रहा है.

अंधविश्वास की मारी गंवई आबादी

हाथों में लाठी, डंडा, फरसा, चाकू और अनेक धारदार हथियारों के साथ बच्चे, बूढ़े, जवान व औरतें गेहूं की फसल को रौंदते हुए ऐसे आगे बढ़ रहे थे, जैसे पूरा गांव किसी हमले की तैयारी में हो. उन के साथ कुछ लोग पीछे उलटी खटिया पर फूलमालाओं से लदे एक शख्स को बिठा कर आगे बढ़ रहे थे. पीछे बैंडबाजे की आवाज पर लोग थिरक रहे थे. सब से पीछे पुलिस के आला अफसरों के साथ भारी पुलिस बल चल रहा था. पता चला कि उस गांव के देवता के नाराज हो जाने से गांव के ऊपर प्रेतात्मा का साया मंडराने लगा था, क्योंकि उन के गांव के देवता को दूसरे गांव के लोग चुरा ले गए थे. लिहाजा, इस गांव के लोग दूसरे गांव वालों से अपने ग्राम देवता को छुड़ाने जा रहे थे.

यह वाकिआ उत्तर प्रदेश में बस्ती जिले के गांव दुधौरा का था. वहां एक दिन एक औरत की फिसल कर गिरने से मौत हो गई, तो गांव के लोगों में किसी ने यह अफवाह फैला दी कि उन के ग्राम देवता के चोरी हो जाने से ग्राम देवता नाराज हो गए हैं. तभी तो गांव पर भूतप्रेतों का साया मंडराने लगा है. इस अंधविश्वास के चलते गांव के लोग भूतप्रेतों से छुटकारा पाने के लिए गोरखपुर के हरपुर बुदहट नाम के एक तांत्रिक के पास गए, जहां श्यामनारायन नाम के उस तांत्रिक ने गांव वालों को बताया कि गांव के ग्राम देवता को दूसरे गांव के लोग चुरा कर ले गए हैं. तांत्रिक ने यह भी कहा कि भूतप्रेतों से छुटकारा दिलाने के लिए अब तो बस एक ही उपाय है कि वे फिर से ग्राम देवता की विधिविधान से स्थापना करें. इस के लिए गांव के लोगों को अपने ग्राम देवता को दूसरे गांव से छीन कर लाना होगा. उस ठग तांत्रिक के बताए मुताबिक लोग ग्राम देवता की स्थापना की तैयारी में जुट गए और तय दिन पर डीहराजा यानी उस तांत्रिक से दुधौरा गांव में भूत भगाने और ग्राम देवता को दोबारा लाने की तैयारी शुरू कर दी. उस ठग तांत्रिक को फूलमालाओं और रुपएपैसों से लाद कर उलटी खटिया पर बिठाया गया और पूरे गांव का चक्कर लगवाया. इस दौरान हजारों की तादाद में लोग हाथों में चाकू, कुल्हाड़ी, लाठी समेत कई धारदार हथियार ले कर एक जगह इकट्ठा हुए, जहां उस तांत्रिक द्वारा भूत पकड़ने का खेल शुरू किया गया.

उस जगह पर जोरजोर से ढोलनगाड़ों की थाप के साथ लोगों ने उछलनेकूदने का नाटक शुरू किया, जिस के बाद तांत्रिक एक जगह पर पूजापाठ के लिए ध्यान की मुद्रा में बैठ गया. लोगों ने उस बाबा के चरणों में रुपएपैसों की बरसात शुरू कर दी. गांव के लोगों का मानना था कि उस तांत्रिक के सामने नतमस्तक होने और चढ़ावा चढ़ाने से उन के ऊपर किसी भी तरह के बुरे साए का असर नहीं हो पाएगा. इस तरह के पाखंड के बाद उस तांत्रिक ने कहा कि उन के ग्राम देवता जाख और जखनी, जो गांव की हिफाजत करते थे, पास के कृष्णा भगवती गांव में हैं, जिसे अब इस गांव के सभी लोग मिल कर वापस ले आएं.

गांव के लोगों का इतना सुनना था कि वे सभी कृष्णा भगवती गांव में ग्राम देवता की पिंडी उखाड़ने चल दिए. जब इस बात की जानकारी उस गांव के लोगों को हुई, तो वे भी हाथों में लाठीडंडे ले कर अपने गांव की सीमा पर ग्राम देवता की हिफाजत के लिए खड़े हो गए. जब पुलिस को इस घटना की जानकारी मिली, तो उस के हाथपैर फूल गए और मौके पर पुलिस के आला अफसरों के साथसाथ भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया. पुलिस द्वारा दोनों पक्षों को समझानेबुझाने की कोशिश की जाने लगी. लेकिन जब पुलिस को मामला सुलझते नहीं दिखा, तो वह सख्ती से दोनों गांवों के लोगों को समझौता कराने पर उतर आई. तय हुआ कि दुधौरा गांव में नए तरीके से ग्राम देवता की स्थापना की जाए और कृष्णा भगवती गांव में बने ग्राम देवता को पहले जैसा ही रहने दिया जाए.

अंधविश्वास का यह खेल केवल दुधौरा व कृष्णा भगवती गांव में ही नहीं खेला जा रहा है, बल्कि ज्यादातर गंवई आबादी आज भी अंधविश्वास की बेडि़यों में जकड़ी हुई है. सामाजिक कार्यकर्ता श्रीधर पांडेय का कहना है कि जो ग्राम देवता अपनी हिफाजत खुद नहीं कर सकता, वह दूसरों की हिफाजत क्या करेगा? पत्थर की पिंडी के लिए आपस में मरमिटना दिमागी बीमारी के चलते ही मुमकिन है. ऐसे लोग अपनी परेशानियों का हल खुद न ढूंढ़ कर तांत्रिकों के पास जाते हैं, जिस का फायदा वे बखूबी उठाते हैं और गांव की किसी तरह की घटना को भूतप्रेत का साया बता कर दिमागी शोषण करते हैं. जिला स्काउट मास्टर कुलदीप सिंह का कहना है कि ज्यादातर गंवई आबादी पढ़ीलिखी है, इस के बावजूद भी भूतप्रेत का डर इन की रगरग में बसा हुआ है.ऐसे में लोगों को दकियानूसी खयालों से बाहर निकल कर अपने अंदर वैज्ञानिक सोच लानी होगी, तभी हम दुधौरा गांव जैसे हालात से बच सकते हैं.

देह धंधे की मजबूरी: एक तरफ बच्चा, दूसरी तरफ ग्राहक

‘‘साहब, यह बिलकुल नई है. कभी कोठे पर नहीं आई. बच्चा होने पर पति से झगड़ा हो गया. पति ने घर से निकाल दिया. अपना और बच्चे का पेट पालने के लिए कोठे पर आ गई. इस जगह ऐसी और कोई नहीं मिलेगी.’’

मीरगंज की सड़क पर अंदर घुसते ही सुभाष को एक लड़का मिल गया. 22 साल का यह लड़का मीरगंज में देह धंधा करने वालियों के लिए ग्राहक लाने का काम करता था. लड़के की बातों में फंस कर सुभाष उस कमरे में पहुंच गया, जहां वह थी. सीढि़यों से चढ़ कर जब सुभाष दूसरी मंजिल पर पहुंचा, तो उस ने एकजैसे कई कमरे देखे. कुछ कमरों के दरवाजे खुले थे, तो कुछ के बंद थे. लड़के ने एक कमरे का दरवाजा खोला और सुभाष को अंदर भेज दिया. अंदर एक 20-22 साल की लड़की थी. आपसी बातचीत के बाद लड़की ने कमरे में पड़े तखत पर बैठने का इशारा किया. सुभाष को लगा, जैसे वह लड़की वहां के माहौल से बहुत वाकिफ नहीं थी. थोड़ी देर में सुभाष ने उस लड़की के साथ जिस्मानी संबंध बनाने की शुरुआत की, तो उसे एहसास हुआ कि वह शायद हाल ही में मां बनी थी. लड़की बोली, ‘‘यह तो रोज का धंधा है. इसी से रोटी मिलती है, जिस से मेरा और बच्चे दोनों का पेट भरता है.’’

‘‘कभी ग्राहक के साथ समय बिताते समय तुम्हारा बच्चा रोता नहीं?’’ सुभाष ने ऐसे ही पूछ लिया

‘‘यह बच्चा यहीं का है. इसे यहां के हर कदम की आहट पता है. जब तक पराया मर्द यहां रहता है, तब तक यह सोता रहता है. आप इस की चिंता मत करो,’’ लड़की ने जवाब देते हुए कहा. सुभाष के लिए यह पहला अनुभव था, पर वह लड़की तो बच्चा पैदा होने के तीसरे दिन से ही यह सब कर रही थी. उस के लिए नया कुछ नहीं था. ‘‘बच्चा देख कर ग्राहक दूर नहीं हो जाते?’’ सुभाष ने पूछा.

‘‘ग्राहक को पता होता है कि कहां जा रहा है. कई बार तो ग्राहक ऐसी औरतों के पास ही जाना चाहते हैं. उन को यह अलग तरह का अनुभव होता है.’’ दरअसल, मीरगंज जैसे वेश्या बाजारों में बहुत सारी औरतें ऐसी होती हैं, जो न चाहते हुए भी पेट से हो जाती हैं. पेट से हो जाने के बावजूद भी ये देह धंधा करती रहती हैं. 7वें से 8वें महीने तक ये सैक्स कर लेती हैं. ऐसे ही बच्चे के साथ रह रही अनीता कहती है, ‘‘हम 1-2 महीने भी खाली नहीं बैठ सकते. बच्चा पेट में होने के समय ग्राहक कम पसंद करता है, पर जब बच्चा हो जाता है, तब उसे यह परेशानी नहीं रहती कि बच्चा छोटा है. ‘‘पेट से हो जाने के बाद सैक्स के दौरान कई बार कुछ परेशानियां आ जाती हैं. तब हमें संभल कर धंधा करना होता है. आखिरकार धंधा कर के पेट पालने ही तो यहां आए हैं.’’मीरगंज में अप्रैल, 2016 में जब पुलिस ने छापा मार कर देह धंधा करने वाली औरतों को पकड़ा, तो पता चला कि आधी औरतें ऐसी थीं, जिन के पास 3 महीने से ले कर 3 साल तक के छोटे बच्चे थे. पुलिस ने इन को बच्चों के साथ ही जेल भेज दिया. उस समय की बातचीत में इन बच्चे वाली औरतों ने बताया कि देह धंधे में किसी तरह की छुट्टी का रिवाज नहीं है. ऐसे में उन्हें दुधमुंहे बच्चे के साथ ही ग्राहक को भी संभालना पड़ता है. कई औरतों ने तो अपने 5-6 साल के बच्चे को ही ग्राहक लाने का काम सौंप दिया है. इस की वजह बताते हुए सरला कहती है, ‘‘ग्राहक से मिलने वाले पैसे में दलाल और कोठा मालकिन का हिस्सा होता है. अब ग्राहक से पहले की तरह ज्यादा पैसा नहीं मिलता. अपने खुद के खर्च भी बढ़ गए हैं. ऐसे में अगर बच्चा ग्राहक ले आता है, तो उन का हिस्सा बच जाता है और हमारी आमदनी भी बढ़ जाती है.’’मीरगंज ‘संगम की नगरी’ इलाहाबाद का एक खास इलाका है. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से महज 4 किलोमीटर दूर जानसनगंज होते हुए चौक इलाके के पास मीरगंज को रास्ता जाता है. मीरगंज से कुछ कदम पहले ही चौक कोतवाली पड़ती है. मीरगंज खास इसलिए है, क्योंकि यहां दिन में सर्राफा बाजार लगता है और रात में देह की सुनहरी आभा तनमन को जगमग कर देती है.  इस बाजार से 50 मीटर की सिक्योरिटी के लिए एक बादशाही मंडी पुलिस चौकी भी है. मीरगंज का इतिहास बहुत पुराना है. यहां बहुत पहले मुजरा होता था. दूरदूर से लोग मनोरंजन के लिए यहां आते थे. मुजरा करने वाली बंजारन होती थीं.

बंजारन एक ऐसी निचली जाति थी, जो शहरशहर घूम कर अपना पेट पालने के लिए छोटेमोटे काम करती थी. यहीं इन के संबंध गैर मर्दों से बनते थे. इन से पैदा होने वाली लड़कियों ने धीरेधीरे नाचगाने को अपना पेशा बना लिया. कई बार ये नाचने वालियां पैसे वालों से संबंध भी बना लेती थीं. इन से पैदा होने वाली औलादें रंगरूप से खूबसूरत होती थीं और उन को पैसा भी ज्यादा मिलता था. समय के साथसाथ मुजरा बीते जमाने की बात हो गई. पहले मुजरे की आड़ में देह धंधा होता था. अब देह धंधा करने के लिए किसी तरह की आड़ लेने की जरूरत भी खत्म हो गई है. पुलिस और इलाके के गुंडे इस बाजार से वसूली करते हैं. मीरगंज का यह इलाका पूरी तरह से देह धंधे की मंडी बन गया है. यहां पतली और ऊंचीऊंची 4 गलियां हैं. इन में रहने वाली ज्यादातर लड़कियां अब नेपाल से आती हैं. इस वजह से एक गली का नाम ही ‘नेपाली गली’ पड़ गया है.

इन 4 गलियों में सौ से ज्यादा कोठे हैं. एक कोठे में 5 से 6 औरतें रहती हैं. मीरगंज की इस देह मंडी में बड़ी तादाद में नाबालिग लड़कियां भी हैं.कुछ साल पहले इस देह मंडी से नाबालिग लड़कियों को आजाद कराने के लिए गुडि़या संस्था के अजीत सिंह ने छापा मारा था. उस समय यहां से सौ नाबालिग लड़कियों को उन के घर पहुंचाया गया था. अभी भी इस मंडी में नाबालिग लड़कियों की तादाद काफी है.  इस मंडी की हर गली के करीब चाय और पान बेचने वालों की खोखे टाइप  दुकानें हैं. इन पर वेश्याओं के दलालों की भीड़ लगी रहती है. ये दलाल हर आनेजाने वाले पर पैनी नजर रखते हैं. वेश्याएं गलियों के पास बने अपने कोठों के दरवाजों और खिड़कियों के पास खड़ी रहती हैं. कई बार पुलिस यहां पर छापेमारी भी करती है, पर उस के आने पर 2-4 लोग पकड़े जाते हैं, बाकी भाग जाते हैं. कुछ दिन पहले रेहाना नाम की एक औरत को पुलिस ने पकड़ा था. उसे आगरा के नारी सुरक्षागृह में भेज दिया. जेल जाने से पहले वह अपनी 8 साल और 10 साल की 2 लड़कियों को अपनी गली में रहने वाली नीमा के पास छोड़ गई थी.

नीमा से उस ने कहा था कि जब तक वह जेल में है, तब तक इन लड़कियों को अपने पास रख ले. 5 महीने बाद जब वह आई, तो नीमा उस की दोनों लड़कियों को ले कर गायब हो चुकी थी. रेहाना अब अपनी लड़कियों को तलाश रही है. उस ने पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई है, पर कोई फायदा नहीं हुआ. बादशाही मंडी पुलिस चौकी का चक्कर लगाती रेहाना अपना दर्द बताते हुए कहती है, ‘‘मैं जिसे हमदर्द समझ कर अपने बच्चों को उस के हवाले कर गई थी, वही अब बच्चों को ले कर गायब हो गई है. मुझे चिंता इस बात की है कि मेरे जैसा हाल मेरी बेटियों का भी न हो.’’मीरगंज की सड़क पर आगे बढ़ते हुए कुछ अलग सा दिखने लगता है. यहां पर तिमंजिला इमारतें बनी हैं. इन में ही औरतें जिस्मफरोशी का धंधा करती हैं. कोठे पर ऊपर की ओर जाने वाली सीढि़यां भी पतलीपतली हैं. ये काफी सीधी बनी हुई हैं, जिन से कोई आसानी से दौड़तेभागते इन सीढि़यों से नीचे नहीं उतरचढ़ सकता है.

कोठे का ऊपर का हिस्सा भी काफी बंदबंद सा होता है. बीच में एक आंगन और बरामदा होता है. इस के चारों ओर कमरे बने होते हैं. आंगन और बरामदों का इस्तेमाल बैठने और बात करने के लिए होता है. यहां आमतौर पर कोठा मालकिनें बैठी मिल जाती हैं. कमरों का इस्तेमाल देह धंधे के लिए होता है. मीरगंज में सब से ज्यादा रौनक ‘नेपाली गली’ में होती है. यहां धंधा करने वाली नेपाली लड़कियां होती हैं. ये ज्यादातर खुले गले का कुरता पहनती हैं. इन का यह कुरता स्लीवलैस होता है. कुरते के साथ पहनी जाने वाली सलवार को ये कमर में खोंस कर रखती हैं. ऐसे में इन के छोटेछोटे गोरेगोरे पैर घुटनों तक नंगे रहते हैं. मीरगंज में अभी भी इक्कादुक्का ऐसे मकान हैं, जिन में देह का धंधा नहीं होता. ऐसे लोग बड़ी मजबूरी में यहां रहते हैं. आने वाले ग्राहकों से बचने के लिए ये अपने घरों के बाहर एक बोर्ड लगा कर रखते हैं, जिस पर लिखा होता है, ‘यह फैमली क्वार्टर है’. यहां के रहने वाले लोग अपनी पहचान छिपाते हैं. कई बार तो ये अपने पहचानपत्र भी दूसरे महल्ले के नाम पर बनवाते हैं.  

यह ऐसा बाजार है, जहां देह बेचने और खरीदने वाले दोनों को ही बिचौलियों के भरोसे रहना पड़ता है. यही वजह है कि इस बाजार की रौनक खत्म हो गई है. किसी बाहर वाले के अंदर दाखिल होते ही गलियों में रहने वाली वेश्याओं और उन के दलालों में होड़ लग जाती है. कई बार तो कईकई दिन तक ग्राहक के दर्शन ही नहीं होते हैं. सुबह से ही वेश्याएं अपने कोठे में ग्राहक का इंतजार करती दिख जाती हैं. गली के कोने पर खुली चाय और पान की दुकानों के अपने बंधे ग्राहक होते हैं. वेश्या के साथ संबंध बनाने की रकम तय हो जाने के बाद भी दलाल और कोठा मालकिन ग्राहक से जोरजबरदस्ती करते हैं. कई बार तो अंदर कमरे में जाने वाली वेश्या भी ज्यादा पैसों की दरकार करने लगती है. नए ग्राहकों के साथ तो नजारा और भी बुरा होता है. अगर ग्राहक मजबूत हो और जोरजबरदस्ती करने पर उतर आए, तो मारपीट होना आम बात है.

मन को रखें प्रसन्न

नार्वे के यूनिवर्सिटी औफ बर्गेन के शोधकर्त्ताओं ने हाल ही में 16,426 लोगों पर किए गए अपने अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि अत्यधिक काम करने वालों में ध्यानाभाव (अटेंशन डेफिसिट) और अतिसक्रियता बीमारी (हाइपर एक्टिविटी डिसऔर्डर) का खतरा दूसरों की अपेक्षा 20% ज्यादा रहता है. इन में ओसीडी (औब्सेसिव कंपलसिव डिसऔर्डर) की आशंका भी तकरीबन 17% अधिक रहती है. दुश्चिंता 22% तक और अवसादग्रस्त होने की संभावना 9% तक ज्यादा रहती है यही नहीं, शारीरिक समस्याओं, उच्च/निम्न रक्तचाप, माईग्रेन, वगैरह भी होने की आशंका रहती है.

जिंदगी में काम जरूरी है पर एक सीमा तक. कहीं ऐसा न हो कि काम के बोझ तले आप जीवन की वास्तविक पूंजी से हाथ धो बैठें. पैसा कमाने, सब से बेहतर कर के दिखाने और दूसरों को खुश रखने की जद्दोजेहद में अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर बैठें. मन और तन का गहरा संबंध होता है. मन स्वस्थ है तभी तन स्वस्थ है.

यह जरूरी है कि काम करें तो पूरी तरह मन को केंद्रित कर के अपनी क्षमता क पूरा उपयोग करते हुए करें, मगर जरूरी यह भी है कि अपने मन की खुशी का भी खयाल रखें. उस पर इतना ज्यादा दबाव भी न डालें कि वह अवसादग्रस्त हो जाए और उसे रोग घेर लें.

औफिस में काम का दबाव

बी.एल.के सुपर स्पैशिएलिटी हौस्पीटल, नई दिल्ली के डा. एस सुदर्शनन कहते हैं कि हम जीवन का लंबा समय अपने कार्यस्थल पर बिताते हैं, इसलिए वहां का माहौल हमारे शारीरिक और मानसिक दृष्टि से बहुत महत्त्व रखता है. कार्यस्थल में काम के प्रेशर और मानसिक दबाव के कारण कार्य करने वाला व्यक्ति कई दफा औफिस में न हो कर भी तनावग्रस्त ही रहता है. इस समस्या का व्यक्ति के सामाजिक विशेष रूप से परिवार के सदस्यों के साथ संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ता है. काम के दबाव के अलावा कार्यस्थल का माहौल भी व्यक्ति के मानसिक रूप से रोगग्रस्त होने का कारण बन सकता है. कार्यस्थल पर व्यक्ति को प्रतिदिन कई तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिस से उन का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है. जैसेः

अत्यधिक कार्यभार

सहयोग और मान्यता की कमी

कार्यस्थल पर स्वायतता की कमी

मानसिक प्रताड़ना

वर्किंग वूमन्स का अपने शिशुओं के प्रति चिंता

नौकरी की असुरक्षा

 

कार्यस्थल के कारण होने वाले मानसिक रोग

 

तनाव या स्ट्रेस

मन की नौकरी न होना तनाव पैदा करता है. नौकरी होने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि इस से स्वास्थ्य बेहतर रहेगा. वास्तव में, कई बार लोग अनिच्छा वाली नौकरी में बेरोजगारी की अपेक्षा ज्यादा तनाव में जीते हैं.सच यह है कि यदि काम आप की पसंद का है तो आप औफिस आवर्स भी एंजोए कर सकेंगे. मगर सिर्फ पैसे कमाने के लिए मजबूरीवश किए जाने वाले काम और भी ज्यादा थका देते हैं और तब आप को आराम की ज्यादा जरूरत महसूस होती है.

 

बेहतर जिंदगी बिताने के लिए ऐसे काम करने की जरूरत है, जो उन के मन के हों और जिन में उन का विकास हो. यह नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए माहौल पर भी  तय करता है.

अवसाद या डिप्रेशन

कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें औफिस में देर तक बैठ कर काम करना अच्छा लगता है. लेकिन कई बार यह आदत खतरनाक भी साबित हो सकती है. दरअसल पाया गया है कि औफिस में देर तक काम करने वाले लोगों में अवसाद के लक्षण ज्यादा पाए जाते हैं. इस के अलावा कर्मचारी के काम का सही मूल्यांकन न होना, सहकर्मियों के बीच अच्छी पोजीशन न बना पाना या पदोन्नति में रुकावट भी अवसाद का कारण बन सकता है.

चिंता या एंजाइटी

छोटीछोटी बात पर घबरा जाना, दिल की धड़कन बढ़ जाना, पसीने छूटना, दिमाग काम नहीं करना, निर्णय नहीं ले पाना, बोलने में घबराहट आदि एंजाइटी डिसऔर्डर के लक्षण हैं. इंटरव्यू में या फिर बौस के आगे प्रेजेंटेशन देते वक्त घबरा जाना भी इस रोग का लक्षण हैं. जोकि धीरेधीरे फोबिया में परिवर्तित हो जाता है. सिर्फ वर्किंग पुरुष या महिलाएं ही अधिक काम की वजह से बीमार हों ऐसा जरूरी नहीं. कई दफा घर का काम संभालने वाली महिलाएं भी अवसाद की शिकार हो जाती हैं.

नेशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक हर घंटे करीब 15 लोग स्वयं को समाप्त कर लेते हैं और इस में हाउस वाइफ्स की संख्या 17% तक होती है.

कोलंबिया एशिया हौस्पीटल गुड़गांव की  डा. श्वेता शर्मा कहती हैं कि सुबह की पहली किरण के साथ ही उठ जाना, दिनभर घर के सभी काम संभालना, पूरे परिवार का खयाल रखना. यह सब एक हाउसवाइफ की जिम्मेदारी है. कई दफा महिलाओं को अपनी भूमिका अच्छी तरह निभाने के लिए अपने करियर को अलविदा भी कहना पड़ता है. संगीसाथी छूट जाते हैं. कुछ कर दिखाने का जज्बा मंदा पड़ जाता है. अंदर ही अंदर वह घुटती रहती है. फिर भी हंस कर सारी जिम्मेदारियां निभाती है. लेकिन ऐसी बहुत कम ही महिलाएं हैं जिन्हें इतने सारे काम करने का श्रेय मिल पाता है.

घरेलू महिलाएं और मांएं अक्सर उपेक्षित रहती हैं क्यांकि इन का काम लोगों को नजर नहीं आता. वे वर्कफोर्स का अहम हिस्सा हैं. घर और परिवार की रीढृ हैं. फिर भी अकसर घरेलू महिलाओं की अनदेखी कर दी जाती है. समाज में उन की पहचान धुंधली पड़ जाती है और वे मनोवैज्ञानिक समसयाओं से ग्रस्त हो जाती हैं. नतीजतन उन के व्यवहार में भी बदलाव आने लगता है.

आमतौर पर पुरुषों की तुलना में महिलाओं के अवसादग्रस्त होने का दोहरा खतरा रहता है जहां कामकाजी महिलाएं, घर और औफिस दोनों ही जगह की जिम्मेदारियां निभातेनिभाते एक काम करने वाली मशीन की भांति बन जाती है. वहीं घरेलू महिलाएं हमेशा ज्यादा असुरक्षित रहती हैं क्योंकि उन के पास कामकाजी महिलाओं जितने विकल्प नहीं होते.

घर वालों को लगता है कि वे दिनभर काम नहीं आराम करती हैं. परिवार के सदस्य उन के स्वास्थ्य और भावनात्मक समस्याओं की अनदेखी करते रहते हैं जिस से उन के आत्मसम्मान को चोट लगती है. इंसान भले ही कोई भी हो, वह मशीन बन कर नहीं रह सकता. उसे कभीकभी अपने मन की प्रसन्नता का खयाल जरूर रखना चाहिए. काम से हट कर चंद लमहे अपने साथ अपने लिए जरूर बिताने चाहिए. कुछ बातें जिन के साथ आप अपने मन को प्रसन्न रख सकते हैं. कभीकभी अल्हड़, अलमस्त बच्चों की तरह बिहेव कीजिए, खुले गगन के नीचे बारिश की बूंदों का आनंद लें. सिर्फ भीगे नहीं, बूंदों की सरगम को भी महसूस करें. उन की छुअन से मन को आनंदित होने दें ;

कभी बेवजह मुसकुराने, अजनबियों से दोस्ती करने, गुनगुनाने या म्यूजिक बजा कर बेपरवाह नाचने से स्वयं को न रोकें. खुद को लयताल या स्टेप्स में न बांधें. बच्चो के साथ हंसें, मुसकुराएं, खेलें, वक्त बिताएं. यह मन को आनंदित रखने का सब से अच्छा जरिया है. जिंदगी को बहुत सीरियसली न लें. प्रतियोगिता की भावना अच्छी है पर उसे 24 घंटे मन पर बिठाए रखना उचित नहीं. आगे बढ़ने का प्रयत्न निरंतर करें पर इसे जिंदगी और मौत का सबब न बनाएं. कभीकभी मन को हर चिंता और तनाव से आजाद कर दें. सप्ताह में एक दिन जरूर बाहर घूमने जाएं. प्रकृति के करीब हो कर देखें. हाउसवाइफ हैं तो भी पहले खुद से प्यार करें, अपने लिए समय निकालें. भावनाओं को मन के अंदर कैद रखना मानसिक सेहत के लिए नुकसानदेह है.अपने जैसों की मित्रमंडली बनाएं, कोई नया शौक पालें या पुराने शौक ही जिंदा रखें. नियमित रूप से व्यायाम करें.

मुंबई: महंगे शहर के सस्ते नजारे

‘सैर कर दुनिया की गाफ़िल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहां…’

वाकई यह उम्र होती ही घूमनेफिरने की है और मेरा भी शौक रहा है नईनई जगह देखने, वहां के लोगों से मिलने और नए, अनूठे अनुभवों को महसूस करने का. मेरा ऐसा ही एक यात्रा वृत्तांत है. लंबे समय से इच्छा थी मुंबई घूमने की, लेकिन मुंबई बहुत बड़ा और महंगा शहर है और मैं ठहरा एक स्टूडैंट, जिस का हाथ हमेशा तंग रहता है. होस्टल और कालेज फीस देने के बाद मेरे पास इतने रुपए नहीं बचते कि मुंबई जाना, रहना और घूमना अफोर्ड  कर सकूं. लेकिन कहते हैं न कि ‘जहां चाह वहां राह’ तो मैं ने 5-6 दोस्तों को तैयार किया जो मुंबई घूमना चाहते थे. हम पांचों फक्कड़ थे लेकिन सब ने कुछ न कुछ जुगाड़ लगाया और आनेजाने के टिकट के बाद हमारे पास 1 हजार रुपए जमा थे, लेकिन इतने में 2 दिन के लिए मुंबई प्रवास संभव नहीं था.

मन में खयाल आया कि अगर किसी तरह मुंबई में कोई जानपहचान वाला या फिर कोई यारदोस्त ऐसा निकल आए जिस के घर पर रुका जा सके और खानापीना भी हो जाए तो इतने कम बजट में भी मुंबई घूमने का अरमान पूरा हो सकता है. सोचविचार कर मैं ने तुरंत अपना फेसबुक अकाउंट खोला, काफी जद्दोजेहद के बाद मेरी स्कूल टाइम के फ्रैंड रवि से मुलाकात हुई, जो अब मुंबई में अच्छी जौब कर रहा था. उसे फोन मिलाया औैर पुराने दिनों की यादें ताजा करने के साथसाथ अपनी ख्वाहिश भी बताई. रवि ने मुझे अपने पूरे ग्रुप के साथ मुंबई आमंत्रित कर लिया. हम सब दोस्त नियत तिथि पर ट्रेन से मुंबई के लिए रवाना हुए. मुंबई सैंट्रल पर उतरे तो बेहिसाब भीड़ व शोरगुल से नर्वस हो गए. गनीमत थी कि रवि हमें लेने आ गया था.

मुंबई सैंट्रल से चैंबूर जहां रवि रहता था, तक का सफर हम ने लोकल ट्रेन से तय किया. खचाखच भरी लोकल ट्रेन में फुरती से चढ़नाउतरना भी अपनेआप में अनोखा अनुभव रहा. रवि ने हमें बताया कि लोकल टे्रन ही मुंबई की लाइफलाइन है. आम आदमी इन के जरिए ही यात्रा कर अपने गंतव्य तक कम से कम समय और खर्च में पहुंच पाता है. रवि के घर पहुंच कर ही हम सब ने नाश्ता किया. हम रवि को बजट के बारे में तो पहले ही बता चुके थे, लेकिन कहां, कैसे जाना है, इस बारे में कोईर् नहीं जानता था. तभी रवि हमें चिंतित देख कर बोला कि चिंता मत करो, मैं कुछ ऐसा प्लान करता हूं जिस से कम खर्च में तुम ज्यादा से ज्यादा घूम सको और भरपूर ऐंजौय कर सको.

सब से पहले हम ने विक्टोरिया टर्मिनस देखने का प्लान बनाया, जिस के लिए हम लोकल ट्रेन पकड़ कर चैंबूर से कुर्ला उपनगर पहुंचे. यहां से विक्टोरिया टर्मिनस तक लोकल टे्रन से ही गए, जिस का किराया मात्र 15 रुपए था. विक्टोरिया टर्मिनस का नया नाम छत्रपति शिवाजी टर्मिनस है. यह एक हैरिटेड बिल्डिंग है. हम ने यहां उतर कर सब से पहले इसे ही देखा. इस के रखरखाव व साफसफाई ने इस की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए थे. विक्टोरिया टर्मिनस से बाहर निकले तो रवि ने हमें फेमस मनीष मार्केट में घुमाया, जो यहां की बड़ी सस्ती मार्केट थी. कुछ आगे बहुप्रसिद्घ जहांगीर आर्ट गैलरी थी, जिसे हम ने बाहर से ही देखा. इसी क्षेत्र में मशहूर फैशन स्ट्रीट भी है, जिस के बारे में अधिकांश लोग जानते हैं. यहां लेटैस्ट टैं्रड के कपड़े बहुत कम कीमत पर मिलते हैं. हम ने भी यहां से थोड़ी शौपिंग की.

रवि ने मसजिद बंदर नाम की मार्केट का भी जिक्र किया, जहां सस्ते में अच्छा सामान मिलता था, लेकिन हम सब को जुहू बीच जाने की जल्दी थी. सो हम वापस विक्टोरिया टर्मिनस आए और लोकल टे्रन पकड़ कर मैरीन लाइंस स्टेशन पहुंचे. वहां से जुहू बीच चौपाटी पहुंचे. दोपहर का समय था और उस पर मुंबई का हौट और उमस भरा मौसम. सारा बदन चिपचिप कर रहा था. मगर बीच पर पहुंचते ही जब नजर पड़ी दूर तक फैले विशाल समुद्र पर तो गरमी में भी ठंडक का एहसास होने लगा. हम दौड़ते हुए लहरों से जा मिले. जी भर कर नहाए व सैल्फी ली. फिर हम चौपाटी पहुंच गए, वहां की रौनक भी देखने लायक थी. मुंबई के फेमस पावभाजी, सेवपूरी व पानीपूरी के स्टौल देख कर हमारे मुंह में पानी आने लगा. भले ही पावभाजी थोड़ी महंगी थी लेकिन उस का टेस्ट इतना बढि़या था कि पैसे वसूल हो गए. अब हम सब थकान महसूस करने लगे, सो कुछ देर रेत पर लेट कर आराम किया.

अब हमें मैरीन ड्राइव व नरीमन पौइंट जाना था जो यहां से आधे घंटे के वौकिंग डिस्टैंस पर थे. रवि ने बताया कि बस हमें जल्दी पहुंचा सकती है, लेकिन हम ने पैदल ही चलने का निर्णय लिया, क्योंकि शाम होने से मौसम सुहाना हो गया था औैर फिर बजट का भी खयाल रखना था. चारों ओर के नजारे देखते हुए हम नरीमन पौइंट पहुंचे. यहां बड़ीबड़ी कंपनियों के शानदार औफिस और फाइव स्टार होटल देखने को मिले. कतार में चलती देशीविदेशी महंगी कारों का सैलाब भी था. यहां की हवा में ही जैसे अमीरी की महक रचीबसी थी. सड़क के दूसरी तरफ रोशनी से जगमगाता मैरीन ड्राइव, रात को भी दिन का नजारा पेश कर रहा था. अधिकतर लोग मैरीन ड्राइव की चौड़ी मुंडेर पर बैठे सड़क की रौनक देख रहे थे, तो कई कपल समुद्र की ओर मुंह किए बैठे थे. हम भी यहीं बैठ गए और चारों ओर बिखरी खूबसूरती को देखने लगे. फिर हम मैरीन लाइंस स्टेशन से लोकल ट्रेन पकड़ कर चर्चगेट स्टेशन पहुंचे और फिर वहां से 20 मिनट कदमताल कर विश्वप्रसिद्ध गेट वे औफ इंडिया पहुंचे. चांदनी रात में इस की भव्यता औैर खूबसूरती देखते ही बनती थी, रात में भी यहां काफी पर्यटक मौजूद थे.

गेट वे औफ इंडिया से ही एलीफेंटा केव्स के लिए समुद्र के बीचोंबीच से फेरी बोट जाती है. इस में आनेजाने व केव्स घूमने में आधे दिन से भी ज्यादा समय लगता है. इसी क्षेत्र में कोलाबा कासवे नामक मशहूर मार्केट है, जहां शौपिंग के शौकीन लोग हमेशा जाते हैं. लेकिन हम गेट वे औफ इंडिया का लुत्फ ले कर चर्चगेट स्टेशन आए औैर वहां से लोकल ट्रेन पकड़ कर चैंबूर वापस आ गए.

अगले दिन चैंबूर से सिद्धिविनायक मंदिर तक हम बस में आए और फिर दादर उपनगर की ओर रुख किया, जो शौपिंग के लिए काफी फेमस है. यहीं पर जंबो किंग के नाम से फेमस शौप है, जहां हम ने जंबो वड़ापाव खाया जो काफी स्वादिष्ठ और बड़ा था. पेट भर गया. रवि ने कहा कि वड़ापाव मुंबई के लोकप्रिय रोड साइड स्नैक्स में से है. अब हम ने हाजी अली दरगाह का रुख किया. यहां पहुंचने का रास्ता बड़ा ही मनमोहक है. समुद्र के बीचोंबीच रास्ता है, जब उस पर चलते हैं तो दोनों तरफ उछाल मारती लहरें हमारा स्वागत करती प्रतीत होती हैं. यह रास्ता थोड़ा गीला होने के कारण फिसलन भरा भी था. दरगाह भव्य थी. यहां कई हिंदी फिल्मों के मशहूर दृश्य फिल्माए गए हैं. हम ने वहां जा कर मस्ती की. फिर रवि हम सब को 80 नंबर की बस में बैठा कर बांद्रा, जोकि अमीरों का इलाका है, ले गया. यहां लिंकिंग रोड खरीदारी के लिए मशहूर है, खासतौर पर फुटवियर औैर कपड़ों के लिए. मेरे कुछ दोस्तों ने यहां थोड़ीबहुत खरीदारी की.

फिर हम बैंड स्टैंड पहुंचे. यह भी काफी खूबसूरत जगह है. जहां रात को लोगों का हुजूम उमड़ता है. हमें तो देखना था शाहरुख खान का बंगला मन्नत, जो बैंड स्टैंड के पास ही है. बंगले को देख कर लगा जैसे शाहरुख खान को ही देख लिया. हम ने सिक्योरिटी गार्ड को पटा कर मन्नत के सामने सैल्फी भी ली. फिर सलमान खान का गैलेक्सी अपार्टमैंट भी देखा. यह सब देख हम वापस चैंबूर पहुंचे. यहां रवि ने हमें मोनोरेल में सफर करवाया. रवि ने हमें बताया कि देश की प्रथम मोनोरेल मुंबई में चैंबूर से वडाला के बीच चली है. हम भी चैंबूर से वडाला गए. इस का टिकट मात्र 12 रुपए था. अगले दिन सुबह ही हमें अपने घर के लिए रवाना होना था, रवि ने हमें मुंबई सैंट्रल पहुंचाया. उसे धन्यवाद दे कर हम सब ट्रेन में चढ़ गए. रवि जैसे दोस्त की वजह से ही हम कम बजट में मुंबई घूम पाए.मुंबई शहर की जिंदादिली, यहां के लोगों का दोस्ताना व्यवहार, अनुशासन हमें बहुत अच्छा लगा. मीठी, खूबसूरत यादों की पोटली साथ लिए हम वापस आ गए.

हवाई यात्रियों के लिए खुशखबरी

हवाई यात्रियों को ऊंची कैंसलेशन फीस से जल्द राहत मिल सकती है. डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) ने एयरलाइंस से कहा है कि कैंसलेशन चार्ज बेस फेयर से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

सिविल एविएशन मिनिस्ट्री के एक सीनियर अधिकारी ने बताया, 'ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां कैंसलेशन फीस कुल किराए से ज्यादा हो जाती है और टिकट रद्द होने पर पैसेंजर्स को कुछ नहीं मिलता है. पैसेंजर जो किराया देते हैं, उसमें सर्विस टैक्स और एयरपोर्ट से जुड़े चार्जेज भी शामिल होते हैं. टिकट कैंसल होने पर अगर इन्हें नहीं लौटाया जाता है तो इससे कानूनी मुद्दे खड़े हो सकते हैं.' उनका यह भी कहना था कि डीजीसीए नए नियमों पर पहले ही एयरलाइंस के साथ बात कर चुका है. इस बारे में जल्द ऐलान किया जाएगा.

उन्होंने बताया, 'यह पाया गया है कि कैंसलेशन फीस का एक हिस्सा ऑनलाइन ट्रैवल एजेंसियों को भी जाता है, बशर्ते टिकट की बुकिंग उनकी तरफ से हुई हो. एयरलाइंस से कहा गया है कि एजेंट की फीस समेत कैंसलेशन फीस बेस फेयर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.' एक ऑनलाइन ट्रैवल पोर्टल पर 7 जून को बुक किए गए और 7 जुलाई की यात्रा वाले दिल्ली-मुंबई का टिकट 2,419 रुपये का था, जबकि इसका बेस फेयर 1,559 रुपये था.

अगर यही टिकट कैंसल कराया जाता है, तो पैसेंजर को सिर्फ 404 रुपये मिलेंगे, क्योंकि बाकी रकम कैंसलेशन फीस के तौर पर काट ली जाती है. एविएशन इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक, एयरलाइन कंपनियां किराया नहीं बढ़ा सकतीं. ऐसे में अधिक रेवेन्यू के लिए वे कैंसलेशन चार्ज में बढ़ोतरी जैसे उपायों का सहारा लेती हैं.

एसटीआईसी ट्रैवल ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन और इंडियन असोसिएशन ऑफ टूर ऑपरेटर्स (आईएटीओ) के अधिकारी ने बताया, 'मेरे हिसाब से कैंसलेशन चार्ज बेस फेयर के 10% से ज्यादा नहीं होना चाहिए. मैं भी मानता हूं कि सरकार को हवाई किराए और कैंसलेशन चार्ज को रेग्युलेट करना चाहिए. अगर सरकार टैक्सी किराए को रेग्युलेट कर सकती है, तो हवाई किराए को रेग्युलेट नहीं करने की कोई वजह नहीं बनती है.'

इस बीच, सिविल एविएशन मिनिस्ट्री इमरजेंसी या किसी प्राकृतिक आपदा की हालत में हवाई किराए की सीमा तय करने या इसके रेग्युलेशन का मॉडल तैयार करने पर काम कर रही है. चेन्नैई में आई बाढ़ और हरियाणा में जाट आंदोलन के कारण फ्लाइट्स की डिमांड और सप्लाई में गड़बड़ी से टिकटों की कीमत आसमान छूने के कारण इसकी जरूरत महसूस हुई है.

आओ बीमारी कैश करें

इधर घर का बोझ ढोतेढोते जब से मेरा हीमोग्लोबिन कम और ब्लडप्रैशर हाई हुआ, तो घर में कुहराम मच गया. घर में सभी लोग मुझे एक से बढ़ कर एक कभी न सुने सुझाव देने लगे. मैं ने पहली बार ऐसा महसूस किया कि घर के लोग मेरे लिए भी परेशान होते हैं. घर वालों का अपने प्रति इतना लगाव देखा, तो मेरी आंखोें में पानी न होने के बाद भी आंसू छलक पड़े. कोई कहता कि तुम मीठा कम खाओ, तो कोई कहता कि हंसना बंद कर दो. कोई आ कर मुझे नमक न खाने की सलाह दे जाता, तो कोई रिश्वत न खाने की. दरअसल, हाई ब्लडप्रैशर उन लोगों के पास ज्यादा रहता है, जो हरदम हंसते रहते हैं. मुरदा चेहरों से उसे भी नफरत है.

मेरे एक रसिया दोस्त को जब पता चला कि मैं हाई ब्लडप्रैशर का शिकार हो गया हूं, तो वह आते ही मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोला, ‘‘मेरे दोस्त, अब वक्त आ गया है कि इधरउधर ताकझांक बंद कर दो. इस उम्र में हाई ब्लडप्रैशर होने की असली वजह बस एक यही होती है.’’ ऐसी सलाह पर मुझे उस दोस्त पर इतना गुस्सा आया कि…

पत्नी ने मेरी हालत देख कर मुझे कई बार अस्पताल जाने को कहा, पर मैं हर बार टाल गया. मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं कि एक बार जो डाक्टर के चुंगल में फंस गया तो समझो कि मारने के बाद भी जो डाक्टर मरीज को छोड़ दे, वह डाक्टर ही किस बात का. आखिरकार पाउडरशाउडर से प्यार करने वाली मेरी पत्नी उस दिन मुझे जबरदस्ती अस्पताल ले ही गई. अस्पताल जाते ही मैं ने देखा कि डाक्टर साहब मरीजों का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. मुझे अपने सामने पा कर वे मुझ पर ऐसे झपटे, जैसे चील अपने शिकार पर झपटती है. मुझ से ज्यादा परेशान होते डाक्टर साहब ऐसे बोले, जैसे ब्लडप्रैशर मेरा नहीं, बल्कि उन का बढ़ा हो. सच्चे डाक्टर की आज की तारीख में यही पहचान है कि वह मरीज को देख कर मरीज से ज्यादा परेशान हो जाता है. होना भी चाहिए. एक सच्चा पंडित और एक सच्चा डाक्टर अगर अपने यजमान और मरीज को डराएगा नहीं, तो खाएगा क्या?

उन की अपने धंधे के प्रति ऐसी लगन देख कर मैं खुश हो गया. मेरी बीमारी की परेशानी को डाक्टर साहब अपने चेहरे पर लाते हुए बड़ी मायूसी से  बोले, ‘‘ओ मेरे धंधे के बकरे, तुम्हें आखिर हुआ क्या है? अब तुम सही जगह पहुंच गए हो. अब अगर तुम चाहो, तब भी हम तुम्हें चैन से मरने नहीं देंगे.’’ ‘‘पता नहीं सर. यह मेरी घरवाली है कि मुझे आप के पास जबरदस्ती ले आई है. यह कहकह कर मेरा ब्लडप्रैशर हाई कर दिया है कि आजकल मेरा ब्लडप्रैशर बढ़ गया है.

‘‘अब आप ही बताइए कि इस उम्र में ब्लडप्रैशर नहीं बढ़ेगा तो और क्या बढ़ेगा? घर में जब शादी करने लायक जवान बेटी हो, तो किस समझदार बाप का ब्लडप्रैशर नहीं बढ़ेगा?

‘‘घर में पढ़ालिखा जवान बेटा बाप की जेब से बीडि़यां तक चुराचुरा कर पीने को मजबूर हो, तो भला किस बाप का ब्लडप्रैशर ठीक रहेगा?

‘‘बाजार जाने के लिए मैं झोला उठाता हूं कि चक्कर आने लगता है. दूध वाले का हर महीने पहली तारीख को बिल देखता हूं, तो दूध पीने से जो थोड़ाबहुत अपने को फिट महसूस करने की कोशिश करता हूं, फिर अपने को वहीं पाता हूं.

‘‘अब आप ही बताइए कि ऐसे में ब्लडप्रैशर हाई नहीं होगा, तो और क्या होगा?’’ मैं ने डाक्टर से कुछ न छिपाते हुए सब साफसाफ कहा, तो पत्नी को गुस्सा आ गया, पर मैं ने उस के गुस्से की कोई परवाह नहीं की. ‘‘कोई बात नहीं. अगर देश में लोग बीमार नहीं होंगे, तो भाई साहब हम डाक्टर लोग कहां जाएंगे? इसलिए हमारे सेहतमंद रहने के लिए देश की जनता का बीमार होना बेहद जरूरी है,’’ यह कह कर वे मेरी बाजू में ब्लडप्रैशर चैक करने की पट्टी सी बांध कर उस में हवा भरने लगे.

मेरी पत्नी की नजर डाक्टर से ज्यादा ब्लडप्रैशर चैक करने वाली मशीन पर इस तरह जमी थी, जैसे पिछले जन्म में वही डाक्टर रही हो और इस जन्म में अपने पिछले कर्मों का फल भोगने के लिए मुझ चपरासी की घरवाली जा बनी हो.

‘‘कितना ब्लडप्रैशर है इन का?’’ मेरी पत्नी ने सांसें रोक कर डाक्टर से पूछा, तो वे बड़ी लंबी सांस लेते हुए ऐसे बोले, मानो फेफड़ों को सेहतमंद रखने की कसरत कर रहे हों, ‘‘खतरे के निशान से 4 गुना ज्यादा…’’ इतना कहते हुए वे मेरे चेहरे की ओर मायूस हो कर देखने लगे, जैसे किसी मनहूस का चेहरा देख लिया हो. वे बड़ी देर तक मुझे घूरते रहे, तो मुझे उन के सामने अपने को बीमार की तरह पेश करना ही पड़ा. ‘‘ऊपर का लैवल कितना है?’’

‘‘210…’’ कह कर डाक्टर मेरा चेहरा फिर देखने लगे, मानो जैसे वे जानना चाह रहे हों कि मैं डरा या नहीं. ‘‘और नीचे का?’’ ‘‘120… पर भाई साहब, आप को डरने की कोई बात नहीं. हम डाक्टर हैं किस खेत की मूली?

‘‘अब आप सही जगह पर अपने पति को ले आई हैं मैडम? हम तो वे डाक्टर हैं, जो अपने मरीज की दवाओं से मिल रहे कमीशन के लिए यमराज तक से भिड़ जाते हैं.

‘‘हमारा बस चले तो हम मुरदे तक को भी दवाएं खिलाते रहें और कंपनियों से अपना कमीशन पाते रहें. ‘‘पर आप चिंता न कीजिए. हर महीने दवाएं लेते रहिए और मजे से जीते रहिए. पर आप करते क्या हैं? सरकारी मुलाजिम हैं या…’’

‘‘साहब, मैं माल महकमे में अदना सा चपरासी हूं…’’ मैं ने पहली बार सच कहा, तो डाक्टर साहब हंसते हुए बोले, ‘‘कोई बात नहीं. माल महकमे का तो चपरासी भी राजा भोज से कम नहीं होता. हम तुम्हारा ऐसा इलाज करेंगे कि…रीइंबर्समैंट तो लेते ही हो न?’’ ‘‘हां साहब, वह तो बीमार न होने पर भी पत्नी की बीमारी के झूठे बिल बनवा कर उस के शैंपूपाउडर के लिए ले ही लेता हूं. अपना क्या… पत्नी जवान रहे बस. मर्द तो अपनी पत्नी को देख कर जवान बना ही रहता है.’’ ‘‘तो ऐसा करते हैं कि…’’ डाक्टर साहब जरा रुके और उन्होंने दरवाजे की ओर देखा. जब दरवाजे के बाहर उन्हें किसी के न होने का एहसास हो गया, तो वे मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोले, ‘‘कुछ प्रोडक्ट आजकल पूरे देश में धूम मचा रहे हैं. उन को लेने वाला 60 में भी 20 का ही लगता है. तुम चाहो तो… बीमारी को कैश कर सकते हो.

‘‘डरो मत. आजकल हर ईमानदार मुलाजिम ऐसा ही कर रहा है, इसलिए आज बीमारी से घबराते नहीं, बल्कि उसे लगने पर जश्न मनाते हैं.’’

‘‘पर डाक्टर साहब, किट है कितने की?’’

मैं डरा. अगर माना तो कुछ दवा न ही दे मारे. अभी ब्लडप्रैशर ही बढ़ा है, कल को दवा खा कर कुछ और ही न बढ़ जाए. ‘‘अच्छा, तो मैं ऐसा करता हूं कि तुम्हें 5 हजार की दवा लिख देता हूं. रीइंबर्स तो हो ही जाएगा न सारा पैसा?’’ ‘‘मुझे अपने नीचे एक मैंबर मिल गया और तुम्हें हमेशा के लिए एक जवान पत्नी और कमाई का एक और जरीया,’’ डाक्टर ने मुसकराते हुए कहा, तो पत्नी के चेहरे पर आती रौनक देखने लायक थी. सच कहूं, उस वक्त जो कोई फिल्म का डायरैक्टर उसे देख लेता, तो अपनी फिल्म के लिए साइन कर बैठता. खैर, ब्लडप्रैशर की बात किनारे हो गई और उन प्रोडक्टों को ले कर हम दोनों के बीच एक समझौता हुआ और मैं 5 हजार रुपए की ब्लडप्रैशर की दवा लिखवा कर शान से घर आ गया.

पत्नी उन प्रोडक्टों को देखने और इस्तेमाल करने को इतनी बेचैन कि…उन प्रोडक्टों के प्रति उस की इतनी उत्सकुता देखी, तो आखिर मैं ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘हे मेरी सूरजमुखी, लगता है कि अब तुम मेरा नहीं, बल्कि इन प्रोडक्टों का पलकें बिछाए इंतजार करती रहती हो…’’ वह तुनकते हुए बोली, ‘‘अब तुम में इस्तेमाल करने को बचा ही क्या है?’’ पर मैं इसलिए चुप हूं कि घर में अगर पत्नी खुशी रहे, तो घर वाले का आधा ब्लडप्रैशर तो अपनेआप ही ठीक हो जाता है.

यहां खेला जाएगा देश का पहला डे-नाइट टेस्ट मैच

ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स स्टेडियम एक और इतिहास रचने जा रहा है. यहां गुलाबी गेंद से देश का पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला जाना तय हो गया है. बंगाल के घरेलू टूर्नामेंट सुपर लीग का फाइनल्स 17 से 20 जून तक फ्लड लाइट्स में गुलाबी गेंद से ही खेला जाएगा.

टीम इंडिया के पूर्व कप्तान एवं क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल के अध्यक्ष सौरव गांगुली ने इसकी जानकारी दी. गांगुली ने कहा कि टेस्ट क्रिकेट की लोकप्रियता धीरे-धीरे घटती जा रही है. हमें इसे बचाने की कोशिश करनी होगी. ऑस्ट्रेलिया में पिछले साल खेले गए पिंक बॉल टेस्ट को जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली थी और हमें इस बदलाव को अपनाना चाहिए.

सौरव गांगुली ईडन गार्डन्स पर सब कुछ सही रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं जो दूधिया रोशनी में गुलाबी गेंद से देश के पहले चार दिवसीय क्रिकेट मैच की मेजबानी की तैयारी कर रहा है. ईडन की फ्लडलाइट की रोशनी में गांगुली को गुलाबी कूकाबूरा गेंद के साथ शूटिंग करते देखा गया.

गुलाबी गेंद से मैच होने से भारत को भविष्य में डे-नाइट टेस्ट का आयोजन करने में मदद मिलेगी. सुपर लीग फाइनल लाइट्स में खेलने के लिए एक प्रयोग है, जिससे भारत डे-नाइट टेस्ट के लिए तैयार हो जाए.

कमेटी ने इंटर जोनल फर्स्ट क्लास टूर्नामेंट दलीप ट्रॉफी में भी गुलाबी गेंद आजमाने की सिफारिश की थी और इसके बाद बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने इस साल न्यूजीलैंड के खिलाफ फ्लड लाइट में टेस्ट खेलने की योजना की घोषणा की थी. हालांकि न्यूजीलैंड क्रिकेट ने कहा कि डे-नाइट टेस्ट से पहले कई पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है.

गांगुली ने इसमें कहा, ‘‘ईडन गार्डन भारत में पहले दिन-रात्रि (चार दिवसीय) मैच की मेजबानी करेगा. इसने हमें जश्न के कई मौके दिए, अब यह एक और यादगार लम्हें की मेजबानी के लिए तैयार हो रहा है.’’

बाद में मीडिया से बात करते हुए बीसीसीआई की तकनीकी समिति के भी अध्यक्ष गांगुली ने कहा, ‘‘गुलाबी गेंद भविष्य है. यह टेस्ट क्रिकेट का सर्वोच्च प्रारूप होगा.’’ देश के पहले दिन-रात्रि टेस्ट की मेजबानी पर नजरें टिकाए बैठा कैब स्थानीय लीग के फाइनल को सफल बनाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा.

गांगुली ने कहा, ‘‘मैच के टिकट मुफ्त होंगे और आधिकारिक प्रसारणकर्ता स्कूलों में मुफ्त टिकट बांट रहा है.’’ मैच दोपहर ढाई बजे शुरू होगा. भारत और न्यूजीलैंड के बीच देश में पहले संभावित दिन रात्रि टेस्ट की मेजबानी पर गांगुली ने कहा कि यह बीसीसीआई के कार्यक्रम पर निर्भर करेगा.

प्रभु लाए मांओं के लिए तोहफा…!

छोटे बच्चों को साथ लेकर चलने वाली महिलाओं के लिए ट्रेन का सफर अब कुछ आसान होने जा रहा है. रेल मंत्री सुरेश प्रभु आज एक समारोह में जननी सेवा का उद्घाटन करने जा रहे हैं. जननी सेवा के तहत चुनिंदा ट्रेनों के अलावा स्टेशन्स पर भी दूध, गर्म पानी, बेबी फूड, चॉकलेट बिस्किट की उपलब्धता रहेगी.

निश्चित तौर पर बच्चों को साथ लेकर चलते समय अब महिलाओं को उनके खान पान को लेकर चिंता नहीं करनी पड़ेगी. प्रभु ने 2016-17 के रेल बजट में इस योजना का ऐलान किया था. ऐलान के तीन महीने बाद प्रभु इसे लागू करने जा रहे हैं.

रेलवे स्टेशनों पर जोनल रेलवे, भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) के स्टॉल्स पर अब अनिवार्य रूप से गर्म दूध, गर्म पानी, चॉकलेट बेबी फूड आदि उपलब्ध कराया जाएगा.

'दो साल में हमने साठ साल के बराबर काम करने की कोशिश की'

प्रभु ने सोमवार को कहा था कि दो साल में हमने साठ साल के बराबर काम करने की कोशिश की है. गाजियाबाद, मेरठ, सहारनपुर विद्युत रेल खंड का लोकार्पण करने आए सुरेश प्रभु ने केंद्र सरकार की उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया था कि पहले हर दिन चार किलोमीटर रेल लाइन बिछती थी. अब हमने 19 किलोमीटर प्रतिदिन रेल लाइन बिछाने का कार्य शुरू किया है. उन्होंने कहा कि विकास को गति देने के लिए हर राज्य में संयुक्त उपक्रम कंपनी बनाकर रेल लाइन का निर्माण होगा.

रेल मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार जो काम कर रही है, उसका फायदा अगले तीन साल में लोगों को मिलने लगेगा. पिछले सालों में निविदा प्रक्रिया तेजी से बढ़ी है.

 

 

कभी पत्नी की भी सुध लें साहब

नरेंद्र मोदी का यह मां के प्रति प्यार है या फिर इस बहाने फालतू की पब्लिसिटी पाने का जरीया. 15 मई को नरेंद्र मोदी की मां हीराबेन जब पहली बार 7 रेसकोर्स रोड बेटे के पास आईं, तो उन्हें व्हील चेयर पर ले जाते हुए मोदी के कई फोटो लगभग सभी समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए, कई चैनलों पर दिखाए गए. जाहिर है कि ये फोटो खुद नरेंद्र मोदी ने दिए थे, क्योंकि उस जगह तो प्रैस फोटोग्राफर जा ही नहीं सकते. वहां तो केवल प्रधानमंत्री के सुरक्षा घेरे की नजर वाले फोटोग्राफर जाते हैं और हर रिलीज किए गए फोटो की बारीकी से जांच होती है कि कहीं ऐसा कोई सुराग न छूटे जिस का कोई गलत फायदा उठा सके.

मां के प्रति इस तरह का प्रेम दर्शाना एक स्वाभाविक बात है पर इस का राजनीतिक फायदा नरेंद्र मोदी को उठाने की जरूरत हो गई हो, यह कुछ अजबगजब लगता है. एक तरफ तो नरेंद्र मोदी को लाल बहादुर शास्त्री या गांधी जैसा या उन से ऊपर वाला दर्शाने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ मातृत्व प्रेम का यह सार्वजनिक प्रदर्शन हो रहा है. क्या नरेंद्र मोदी अब खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं? नरेंद्र मोदी को सत्ता में आए 2 साल से ज्यादा समय हो चुका है पर राजनीतिक व प्रशासनिक तौर पर वे कुछ बड़ा कर पाए हों दिखता नहीं. इस दौरान उन की पार्टी बिहार में पिटी, दिल्ली में पिटी, दक्षिण में 19 मई के नतीजों के अनुसार पार्टी कोई खास जगह नहीं बना पाई. पश्चिम बंगाल में केवल 6 सीटें मिलीं. हां, असम ऐसा अकेला राज्य रहा जहां भाजपा 86 सीटें जीत कर बहुमत में आई.

नरेंद्र मोदी के शासन में भले भ्रष्टाचार के मामले सामने नहीं आ पाए हों पर वे पिछली सरकार के मंत्रियों में से एक को भी सजा नहीं दिलवा पाए और पिछले कंपट्रोलर जनरल विनोद राय ने 2 साल पहले जो आंकड़े पेश किए थे, जिन्हें मीडिया ले उड़ा था, उसी विनोद राय को पद्म पुरस्कार से ही सम्मानित नहीं किया गया, राज्य सभा में भी ला बैठाया गया. नरेंद्र मोदी का दिल मां के प्रति कितना कोमल है यह तो फोटो दिखाते हैं पर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के ललित मोदी के मामले में भी कोमल है यह भी दिखा. भ्रष्टाचार पर काबू करने का दंभ भरने वाले नरेंद्र मोदी की नाक के नीचे से विजय माल्या 9,000 करोड़ बैंकों के गंवा कर गायब हो गया और वे कुछ न कर पाए. जो कर रहा है वह सर्वोच्च न्यायालय कर रहा है. नरेंद्र मोदी ने मां के प्रति तो अपना प्यार दिखा दिया पर पत्नी यशोदा बेन का क्या हाल है, यह जगजाहिर है. रिटायर्ड शिक्षिका अकेलेपन से जूझ रही है, जबकि पति ठाट से बड़े मकान में रह रहा है, रोज 3 बार कपडे़ बदलता है. मां की सेवा फर्ज है, जिम्मेदारी है इसे निभाने वाले प्रधानमंत्री पर देश को फख्र है पर अपनी पत्नी को अकारण छोड़ देने वाले को महानता के पद पर नहीं बैठाया जा सकता.

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