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#Sixwordstories का ट्रैंड

फेसबुक पर आजकल आप को एक नई चीज दिखाई दे रही होगी #Sixwordstories. आप सोच रही हैं कि आखिर ये #Sixwordstories है क्या? आप को इस की जानकारी नहीं होगी लेकिन फिर भी आप इस का इस्तेमाल कर रही हैं क्योंकि आप की फ्रैंड ने अपनी वौल पर पोस्ट किया है तो भला आप उस से पीछे कैसे रह सकती हैं.

क्या है #Sixwordstories

#Sixwordstories कहानी को मात्र छह शब्दों में कहने की एक कला है जिस में सिर्फ छह शब्दों में पूरी कहानी को बयां किया जाता है.

कैसे हुई शुरुआत

अर्नेस्ट हेमिंग्वे अमेरिका के मशहूर उपन्यासकार लेखक और पत्रकार थे उन्हें एक बार चैलेंज दिया गया छह शब्दों में कहानी कहने का. हेमिंग्वे ने लिखा "For Sale : Baby Shoes, Never Worn". ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने दस डौलर की शर्त के लिए एक रेस्टोरेंट में एक नैपकीन पर यह लाइन लिखी थी. कुछ लोग ऐसा भी कहते है कि उन्होंने अपने बेटे की याद में लिखी थी.

अब क्यों है ट्रैंड में

वैसे तो ये कौंसेप्ट 90 के दशक का है लेकिन एक बार फिर से ट्रैंड में आने के पीछे वजह है अर्नेस्ट हेमिंग्वे जिन्होंने यह ट्रैंड शुरू किया था, उन का जन्मदिन 2 जुलाई को हेमिंग्वे का जन्मदिन है. ऐसा कहा जा रहा है कि उन की याद में यह सिलसिला फिर से शुरू हुआ है. हालांकि हेमिंग्वे एक अंग्रेजी राइटर थे पर लोग बड़े जोरों से हिंदी में भी इस ट्रैंड को फोलो कर रहे हैं. शुरुआत में इस का ट्रैंड केवल ट्विटर पर था लेकिन पिछले कुछ दिन से फेसबुक पर जोरों से चल रहा है. #Sixwordstories नाम से एक साइट भी है जिसे दिसंबर 2008 में पीट बर्ग ने शुरू किया था. इस साइट का उद्देश्य था इस शृंखला को आगे बढ़ाना.

दिमाग में एक प्रश्न अवश्य उठ रहा होगा कि लोगों के पास अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए पहले से ही शब्द कम थे, ऐसे में #Sixwordstories की वजह से कुछ भी नहीं बचेगा. लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि इस से आप की लेखन कला में सुधार होगा. आज किसी के पास इतना समय नहीं है कि वे लंबीलंबी कहानियां पढ़े, उन्हें हर चीज मैगी की तरह बस 2 मिनट में खत्म करनी होती है. ऐसे में आप अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से कह पाएंगे.

प्ले स्टोर पर नहीं मिलेंगे ये बेस्ट एंड्रॉयड एप्स

एंड्रॉयड यूजर्स के लिए गूगल प्ले स्टोर पर लाखों एप्स मौजूद हैं. लेकिन, कुछ ऐसे भी  एप्स  हैं जो यहां अवेलेबल नहीं हैं पर यूजर्स के लिए बहुत यूजफुल साबित हो सकते हैं. हम आपको बता रहे हैं बेस्ट एंड्रॉयड   एप्स  के बारे में जो प्ले स्टोर पर आपको नहीं मिलेंगे.

1. VideoMix

ये वीडियो स्ट्रीमिंग एप है. वीडियो मिक्स एप की मदद से आप वीडियोज, टीवी शो और काफी कुछ स्ट्रीम कर सकते हैं और वो भी फ्री ऑफ कॉस्ट. इसके अलावा इस्तेमाल करने में भी ये  एप काफी आसान है इसमें साइन इन या कोई अकाउंट बनाने की जरूरत नहीं पड़ती. सिर्फ  एप को डाउनलोड कर ओपन करें, अपना फेवरेट वीडियो सर्च करें और स्ट्रीमिंग स्टार्ट करें.

2. Videoder

इस एप पर लगभग वो सभी वीडियोज अपलब्ध हैं जो आपको यूट्यूब पर मिलते हैं. आपको यूट्यूब का जो भी वीडियो चाहिए उसे सर्च करें. ये  एप वीडियो के कई सारे फॉर्मेट डिस्प्ले करेगा आपको जिस फॉर्मेट में वीडियो चाहिए उसे डाउनलोड कर सकते हैं.

3. Amazone App Store

शॉपिंग नेटवर्क अमेजन का अपना  एप स्टोर भी है जहां आपको लाखों फ्री  एप्स  मिल सकते हैं जो कि प्ले स्टोर में भी उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए इसे गूगल प्ले स्टोर के ऑल्टरनेटिव के तौर पर भी देखा जाता है. आप भी इस एप का इस्तेमाल कर सकते हैं.

4. Tubemate

प्ले स्टोर में कई ऐसे एप्स हैं जिनकी मदद से आप फ्री में यूट्यूब वीडियो डाउनलोड कर सकते हैं. लेकिन, ट्यूबमेट एप को बनाने वालों का दावा है कि कोई भी  एप इसके मुकाबले का नहीं है. इस एप की खास बात ये है कि यूट्यूब से हाई क्वालिटी वीडियोज को भी ये मिनटों में डाउनलोड कर देता है.

5. Media river

ये उन बेस्ट एप्स  में से एक है जिसे आप अपने फोन में रखना चाहेंगे. इस  एप की मदद से आप म्यूजिक, बुक्स और एंड्रॉयड एप्स  को आसानी से ढूंढ कर अपने फोन में डाउनलोड कर सकते हैं.

6. GB WhatsApp

वॉट्स एप अपने यूजर्स को एक फोन में एक से ज्यादा वॉट्स एप अकाउंट चलाने की परमीशन नहीं देता. हालांकि, इंटरनेट पर कुछ ऐसे  एप्स  हैं जिनकी मदद से एक से ज्यादा वॉट्स एप अकाउंट चलाया जा सकता है. GB WhatsApp भी उनमें से एक है. ये प्ले स्टोर पर अवेलेबल नहीं है.

राजन के बचाव में बोले उनके पूर्व सहकर्मी

आईबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर हो रहे लगातार हमलों के बीच उनके शिकागो यूनिवर्सिटी के कॉलीग लुइगी जिंगल्स राजन के बचाव में आ गए हैं. जिंगल्स ने कहा है कि राजन पर निशाना इसलिए साधा जा रहा है क्योंकि राजन 'बैंकिंग सिस्टम की अकुशलता से लड़ रहे हैं.'

गौरतलब है कि इस साल सितंबर में राजन का कार्यकाल खत्म हो रहा है और देश में उनके दूसरे कार्यकाल को लेकर बहस छिड़ी हुई है. ऐसे में जिंगल्स ने अपने आर्टिकल में लिखा, 'राजन का एक नए इंडिया का सपना है. उन्होंने आरबीआई को जहां पहुंचाया है, वह उनकी कुशलता का परिचायक है न कि किसी राजनीतिक संबंधों की देन.' आरबीआई गवर्नर के रूप में राजन के दूसरे टर्म पर लुइगी ने लिखा कि राजन ने जिस तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काम किया है, कोई और देश होता तो उनके दूसरे टर्म पर सवाल ही नहीं उठता.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व मुख्य और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनस से फ़ाइनैंस के ऑन लीव प्रफेसर रघुराम राजन पर सत्ताधारी पार्टी के सांसद सुब्रमण्यन स्वामी सहित कई अन्य लोग लगातार हमले कर रहे हैं. राजन पर लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक ब्याज दर में कटौती करने में वह विफल रहे हैं. राजन के कॉलीग जिंगल्स ने लिखा है कि राजन के आरबीआई गवर्नर रहते भारत में महंगाई दर 11% से अर्थशास्त्री घटकर 5% पर आ गया है. वहीं, देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 5 फीसदी से बढ़कर 8% तक पहुंच गई है.

जिंगल्स ने लिखा है, 'आरबीआई गवर्नर न सिर्फ महंगाई से लड़ रहे हैं बल्कि वह बुरे कर्ज के तले दबी हुई बैंकिंग सिस्टम की इनएफ़िशंसी से भी लड़ रहे हैं.' उन्होंने लिखा है कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह से पब्लिक हैंड्स में है और क्रोनी कैपिटलिजम को फाइनैंस करने में इसका इस्तेमाल किया जाता है जो कि देश को कई साल पीछे ले जाता है.'

जिंगल्स ने लिखा, 'एक गवर्नर के रूप में राजन ने कर्ज लेने वाले संदिग्धों से जुड़े जोखिम को कम करने काम किया. आर्थिक दृष्टिकोण से यह सर्वश्रेष्ठ समय है. देश की जीडीपी 8% की दर से बढ़ रही है, अब बैंकिंग प्रणाली के द्वारा घाटे को आसानी से कम किया जा सकता है.'

 

आपको लग सकता है ‘बिजली’ का झटका

कोल इंडिया द्वारा कोयले के दामों में वृद्धि करने के निर्णय से देश भर में बिजली की दरें 8 से 10% महंगी हो सकती हैं. टाटा पॉवर के मुख्य कार्यकारी एवं प्रबंध निदेशक अनिल सरदाना ने यह बात कही. उन्होंने सरकार द्वारा उदय योजना और बिजली अधिशेष के दावों पर उत्साह दिखाने के खिलाफ भी चेताया.

सरदना ने कहा, ‘कोयले के दाम 13 से 19% तक बढ़ गए हैं. इसलिए न्यूनतम बढ़ोत्तरी होगी. तापीय विद्युत के लिए यह 13% होगी. यदि परिवर्तनशील मूल्य में 13% की वृद्धि होगी तो बिजली की औसत कीमतों में 8-10% वृद्धि होगी.’ पिछले महीने कोल इंडिया ने कोयले के मौजूदा दामों पर 6.2% की औसत वृद्धि की थी ताकि इस वित्त वर्ष में 3,234 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई की जा सके.

साइना ने जीता ऑस्ट्रेलियाई ओपन खिताब

भारतीय बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल ने रियो ओलंपिक से पहले अपनी तैयारियां पुख्ता करते हुए चीन की सुन यू को तीन गेम के रोमांचक फाइनल में हराकर दूसरा ऑस्ट्रेलियाई ओपन सुपर सीरीज खिताब जीता. साइना ने दुनिया की 12वें नंबर की खिलाड़ी को एक घंटे 11 मिनट तक चले फाइनल में 11-21, 21-14, 21-19 से हराया.

लंदन ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता साइना ने क्वार्टर फाइनल में थाईलैंड की रेचानोक इंतानोन और सेमीफाइनल में चीन की यिहान वांग को हराया जो क्रमश: 2013 और 2011 में विश्व चैम्पियन रह चुकी हैं. इस सत्र के पहले खिताब के साथ साइना ने 56250 डॉलर ईनामी राशि भी जीती.

यह ऑस्ट्रेलियाई ओपन में साइना की दूसरी खिताबी जीत है. उन्होनें 2014 में भी यहां खिताबी जीत दर्ज की थी. साइना को इस खिताब के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा. उन्होनें पिछले साल दिल्ली में इंडिया सुपर सीरिज खिताब जीता था.

साइना पिछले पांच मुकाबलों में सुन को पांचों बार हरा चुकी है लेकिन इस बार उन्हें कड़ी चुनौती मिली. पहला गेम सुन ने सिर्फ 18 मिनट में जीत लिया. सुन ने काफी तेज रफ्तार से खेल दिखाया. साइना ने कई सहज गलतियां की जिससे स्कोर 4-4 हो गया. सुन ने जल्दी ही 7-4 से बढ़त बना ली. ब्रेक के समय वह 11-6 से आगे थी जब साइना का बैकहैंड रिटर्न नाकाम रहा.

सुन ने साइना को लंबी रेलियों में व्यस्त रखा. सुन की बढ़त 17-10 की हो गई और पहला गेम सुन ने आसानी से जीत लिया. वाइड शॉट पर साइना ने वीडियो रेफरल लिया लेकिन फैसला उनके खिलाफ गया. दूसरे गेम में भी स्कोर 4-4 से बराबर था और सुन ने 6-4 से बढ़त बना ली. साइना ने दो अंक हासिल करके बराबरी की जबकि दो बार सुन की शटल बाहर जाने से साइना को 10-8 की बढ़त मिल गई. ब्रेक तक साइना तीन अंक से आगे थी. चीनी खिलाड़ी ने दो अंक बनाए लेकिन साइना ने आक्रामक शॉट्स लगाकर 17-12 की बढ़त बना ली. साइना ने छह गेम प्वाइंट बनाए.

निर्णायक गेम में साइना और सुन 3-3 से बराबरी पर थे जिसके बाद साइना ने 6-3 से बढ़त बनाई. सुन ने जल्दी ही वापसी की और 9-8 की बढ़त बनाई. साइना ने हालांकि संयम नहीं खोया और 11-10 की बढ़त बना ली. लंबी रेलियों का बखूबी जवाब देते हुए साइना ने 20-17 से बढ़त बनाई और इस लय को कायम रखते हुए जीत दर्ज की.

साइना पिछले साल विश्व रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बनी थी. उन्होनें अगस्त में जकार्ता में विश्व चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता था. वह नवंबर में चाइना ओपन सुपर सीरिज प्रीमियर के फाइनल में भी पहुंची लेकिन इसके बाद चोट के कारण उनका फॉर्म गिर गया. इंडिया ओपन, मलेशिया ओपन, बैडमिंटन एशिया चैम्पियनशिप में वह सेमीफाइनल में हारी. उन्होनें एशियाई चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीता और इंडोनेशिया ओपन सुपर सीरिज में क्वार्टर फाइनल तक पहुंच गई.

प्रधानमंत्री मोदी ने साइना को ऑस्ट्रेलियाई ओपन जीतने पर बधाई दी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल को ऑस्ट्रेलियाई ओपन सुपर सीरिज जीतने पर बधाई दी. मोदी ने ट्विटर पर लिखा,‘साइना नेहवाल को इस शानदार जीत पर बधाई. पूरे देश को आपकी उपलब्धियों पर गर्व है.’ बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और क्रिकेटर शिखर धवन ने भी साइना को बधाई दी.

बच्चन ने लिखा,‘साइना आप लगातार हमें भारतीय होने पर गर्व करने के अवसर दे रही है. वेल डन ऑस्ट्रेलियाई ओपन चैम्पियन.’ धवन ने लिखा,‘साइना नेहवाल को दूसरे ऑस्ट्रेलियाई ओपन खिताब पर बधाई. आपने हमें गौरवान्वित किया है.’

साइना नेहवाल को 10 लाख रुपये नकद पुरस्कार

भारतीय बैडमिंटन संघ ने साइना नेहवाल के लिए 10 लाख रुपये नकद पुरस्कार का ऐलान किया हे. यह इस सत्र में साइना का पहला खिताब है.

बाइ अध्यक्ष अखिलेश दास गुप्ता ने कहा, ‘मैं साइना को इस शानदार जीत की बधाई देता हूं. यह उनके करियर की एक और बड़ी उपलब्धि है. यह जीत उन्हें रियो ओलंपिक में अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रेरित करेगी जहां वह भारतीय बैडमिंटन दल की अगुवाई करेंगी. मैं उनके कोच विमल कुमार, सहयोगी स्टाफ को भी बधाई देता हूं.

न्यूजीलैंड की टीम में एक और भारतीय

भारत में जन्मे अनकैप्ड बल्लेबाज़ जीत रावल को न्यूज़ीलैंड की टेस्ट टीम में चुन लिया गया है. अगस्त महीने में ज़िम्बाब्वे और साउथ अफ्रीका के खिलाफ दौरे के लिए जीत का सलेक्शन किया गया है. हरारे में दो टेस्ट और उसके बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ डरबन और सेंचुरियन में दो टेस्टों मैचों के लिए चुनी गई 16 सदस्यी टीम में जीत अकेले नया चेहरा हैं.

बाएं हाथ के रावल ने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 43.85 की औसत से रन बनाए हैं. वहीं पिछले सीजन में उनका बल्लेबाजी औसत 55.71 था. इस दौरान उन्होंने तीन शतक बनाए थे. उनकी पारी के दम पर ऑकलैंड ने प्लंकेट शील्ड टाइटल जीता था. उन्हें अपनी टीम में 'राहुल द्रविड़' के नाम से भी जाना जाता है. यह नाम उन्हें मजबूत बल्लेबाजी तकनीक के लिए दिया गया है. लेकिन रावल सौरभ गांगुली को अपना आदर्श मानते हैं.

 

27 वर्षीय रावल का जन्म गुजरात में हुआ और वह 2004 में न्यूजीलैंड चले गए. रावल ने गुजरात में ही क्रिकेट ककहरा सीखा. उन्होंने गुजरात के लिए अंडर-15 और अंडर-17 क्रिकेट भी खेला. रावल का कहना है कि उन्होंने अंजिक्य रहाणे, रवींद्र जाडेजा, इशांत शर्मा और पीयूष चावला के साथ काफी क्रिकेट खेला है. वह आज भी गुजरात के खिलाड़ियों मनप्रीत जुनेजा और ईश्वर चौधरी से बात करते रहते हैं. रावल पार्थिव पटेल को अपना अच्छा दोस्त बताते हैं.

रावल जब 16 साल के थे तब न्यूजीलैंड आए. शुरुआती कुछ दिनों में उन्होंने पेट्रोल पंप पर काम किया. लेकिन एक दिन उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने का सपना पूरा करने की ठानी. पिछले साल से ही न्यूजीलैंडटीम में उनके सिलेक्शन की चर्चा होने लगी थी. न्यूजीलैंड के कोच माइक हंसेन ने कहा कि जीत प्लंकेट शील्ड में पिछले कई वर्षों से शानदार प्रदर्शन कर रहा है. पिछले 12 महीने में उसके खेल में परिपक्वता आई है. नतीजा लेने की उसकी क्षमता में भी सुधार हुआ है.

हंसेन ने आगे कहा कि न्यूजीलैंड ए के लिए खेलते हुए परिस्थितियों से अच्छी तरह सामंजस बैठा लिया है. तो हमें लगता है कि अब वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के लिए तैयार है.

जानिए, जीत रावल के बारे में कुछ दिलचस्प बातें…

गुजरात के अहमदाबाद में जीत रावल का जन्म हुआ. ऑकलैंड की तरफ से खेलने वाले रावल को लोग 'ऑकलैंड के राहुल द्रविड़' के नाम से बुलाते है. पिछले आठ सालों से वह न्यूज़ीलैंड में घरेलू क्रिकेट खेल रहे हैं.

2004 में जीत रावल के पिता अशोक रावल भारत छोड़कर न्यूज़ीलैंड चले गए थे और शुरुआती दौर में पेट्रोल पंप पर काम करते हुए अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे. वह अपने बेटे जीत रावल को न्यूज़ीलैंड टीम में मौका दिलाना चाहते थे.

एक बार उस पेट्रोल पंप में लीन क्लब के कोच किट परेरा पेट्रोल भराने आए. अशोक रावल के काफी अनुरोध करने के बाद परेरा जीत रावल को कोचिंग देने के लिए मान गए थे. रावल के कोच परेरा का जन्म श्रीलंका में हुआ था. क्रिकेट कोच के साथ-साथ वह एक शानदार शेफ भी हैं.

शुरुआती दौर में परेरा का जीत रावल के ऊपर ज्यादा भरोसा नहीं था. उनको लग नहीं रहा था कि जीत रावल एक अच्छे क्रिकेटर बन पाएंगे, लेकिन जीत की शानदार बल्लेबाजी को देखते हुए परेरा को यह एहसास हुआ था कि जीत रावल एक अच्छे क्रिकेटर बन सकते हैं.

जीत रावल ने कॉमर्स में डिग्री हासिल की है और अकाउंटेंट बनना चाहते थे. रावल अंग्रेजी में काफी कमज़ोर थे और शुरुआत के दौर में न्यूज़ीलैंड के कॉलेजों में उन्हें एडजस्ट करने में काफी मुश्किल हुई थी.

रावल ने अपना पहला प्रथम श्रेणी मैच 5 दिसंबर 2008 को वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेला था और इस मैच में रावल सिर्फ 31 रन बना पाए थे. गेंदबाज़ी करने का उन्हें मौका नहीं मिला था.

करियर के दूसरे घरेलू प्रथम श्रेणी मैच में रावल ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था. इस मैच में रावल ने शानदार 256 रन की पारी खेली थी. इस पारी को देखने के बाद जीत रावल के कोच किट परेरा को लग गया था कि एक दिन रावल को न्यूज़ीलैंड टीम में मौका मिलेगा.

जीत रावल घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन करते आ रहे हैं. अच्छे प्रदर्शन के बावजूद भी न्यूज़ीलैंड टीम में मौके के लिए उन्हें काफी इंतज़ार करना पड़ा, लेकिन पिछली 10 पारी में शानदार प्रदर्शन की वजह से जीत को टीम में जगह मिली है.

पिछली 10 प्रथम श्रेणी पारियों में जीत रावल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए करीब 75 की औसत से 677 रन बनाए हैं, जिसमें तीन शतक और एक अर्धशतक शामिल है. 20 फरवरी 2016 को ऑकलैंड की तरफ से खेलते हुए जीत ने ओटागो के खिलाफ़ दूसरी पारी में शानदार 202 रनों की नाबाद पारी खेली थी.

जीत रावल न्यूज़ीलैंड की तरफ से 67 प्रथम श्रेणी मैच खेल चुके हैं और करीब 44 की औसत से 4,912 रन बना चुके हैं, जिसमें 14 शतक शामिल हैं. रावल ने 30 मार्च को ऑकलैंड की तरफ से अपना आखिरी प्रथम श्रेणी मैच खेलते हुए सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के खिलाफ पहली पारी में शानदार 147 रन भी बनाए थे.

32 साल बाद भी सुष्मिता की पहचान ‘किटी’ ही क्यों?

हर कलाकार की तमन्ना होती है कि वह निरंतर अपनी ईमेज बदलता रहे. दर्शकों के समक्ष नित नई पहचान के साथ आए. मगर 1985 में दूरदर्शन पर प्रसारित जासूसी सीरियल ‘‘करमचंद’’ में जासूस करमचंद यानी कि पंकज कपूर की सहायक किटी का किरदार निभाने वाली सुष्मिता मुखर्जी को इस किरदार की वजह से इतनी शोहरत मिली, कि लोग उन्हे ‘किटी’ ही पुकारने लगे थे. इस बात को 32 साल होने जा रहे हैं. मगर दर्शक और उनके प्रशंसक आज भी उन्हें ‘किटी’ के रूप मे ही पहचानते हैं. जबकि  पिछले 32 वर्ष के दौरान सुष्मिता मुखर्जी ने कई फिल्मों व सीरियलों में निगेटिव व पाजीटिव किरदार निभाते हुए अपने अभिनय के कई रंग बिखेरे हैं. पर उनके नाम से ‘किटी’ अलग नहीं हो पाया.

हाल ही में जब सुष्मिता मुखर्जी से हमारी मुलाकात हुई, तो हमने उनसे दर्शकों व प्रशंसको की नजर में 32 साल से ‘किटी’ बने रहने का राज जानना चाहा, तो ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए सुष्मिता मुखर्जी ने कहा-‘‘सबसे बड़ी वजह यह है कि जब आपके पास किसी वस्तु की कमी होती है, तो उसका मूल्य, उसका मान, सम्मान ज्यादा होता है. जब ‘करमचंद’आया था, उस वक्त सिर्फ दूरदर्शन ही हुआ करता था. अब तो पांच सौ से अधिक चैनल हो गए हैं. हजारों सीरियल प्रसारित हो रहे हैं. फिल्में प्रसारित हो रही हैं. अब एक्क्सपोजर इतना अधिक हो गया है कि किसी की वैल्यू नहीं रही.

हमारा अपना एक जमाना था. उस वक्त लोग हमारे आगे पीछे घूमते थे. उन दिनों एक मशहूर शायर हुआ करते थे. सलीम दीना..अंग्रेजी के कवि थे. उनका एक लेख मिला, जिसमें लिखा था-‘ट्रेलिंग किटी’ यानी कि किटी का पीछा..इसमें उन्होने लिखा कि उनके समाचार पत्र के संपादक ने उनसे कहा कि यदि आज तुम किटी से नहीं मिले, तो तुम्हारी नौकरी गयी. फिर उन्होंने किस तरह से मुझे ढूंढ़ा.

वर्सोवा के एक छोटे से फ्लैट में रहती थी, उन्हें वहां हमेशा ताला मिलता था. वह किन मुश्किलों से मुझसे मिले. उस जमाने में मीडिया हमारा सम्मान करती थी. आज की तरह उस वक्त की मीडिया नहीं थी. आज तो कलाकार, मीडिया को पैसे देते हैं. युवा कलाकार मीडिया को खरीदते हैं कि हमारे बारे में भी लिखो. वह जमाना अलग था. इसी वजह से ‘किटी’ जैसी शोहरत मेरे किसी अन्य पात्र को नहीं मिली. मगर मैंने उसके बाद भी काफी रोचक व यादगार किरदार निभाए हैं. जिन्हें दर्शकों ने काफी पसंद किया. मेरे 33 साल के करियर में काफी उतार चढ़ाव भी आए.’’  

हरिवंश राय बच्चन पर फिल्म बना सकते हैं अभिषेक

इन दिनों बौलीवड में बायोपिक फिल्मों का दौर चल रहा है और अभिषेक बच्चन ऐसी बायोपिक फिल्म बनाना या ऐसी बायोपिक फिल्म में अभिनय करना चाहते हैं, जिसमें मानवीय दृष्टिकोण के साथ बेहतरीन कहानी हो. पिछले दिनों जब अभिषेक बच्चन से हमारी मुलाकात हुई, तो हमने उन्हें याद दिलाया कि उनके दादाजी स्व. हरिवंश राय बच्चन ने कई कविताएं व कहानियां लिखी हैं. वह अपने दादाजी पर फिल्म बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचते?

हमारे इस सवाल पर अभिषेक बच्चन ने कहा-‘‘मैं अपने दादाजी हरिवंश राय बच्चन के लेखन पर फिल्म बनाना चाहूंगा. आज ही इस बारे में डैड से बात करुंगा. मैने उन्हें बहुत पढ़ा है. उन्होंने जो कुछ लिखा है, जो ग्रंथावली लिखी है, वह आज भी लोगों को प्रेरणा देती है. पहले हर दिन रात्रिभोज के बाद मेरे डैड हमें दादाजी की कविताएं पढ़कर सुनाया करते थे. उनकी हिंदी बहुत क्लिष्ट है, तो डैड हमें उसका अर्थ भी समझाया करते थे. कोई भी दुविधा हो, उसका जवाब दादाजी की कविताओं में मिल जाएगा. इंसान की समस्या का हल उनकी किसी न किसी कविता में निकल ही आएगा.’’

सोशल मीडिया से होती है स्टारडम की क्षति: काजल

हर चीज के अपने फायदे व अपने नुकसान हैं. यह बात हर कोई जानता है. फिर भी लोग हर चीज का उपयोग सिर्फ उसका फायदा सोचकर ही करते हैं. इन दिनों हर फिल्म कलाकार ट्विटर, फेसबुक व इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों का उपयोग करता हुआ अपने बारे में हर छोटी व बड़ी बात अपने प्रशंसक को बताते हुए खुश होता रहता है कि वह तो सीधे अपने प्रशंसक से बात कर रहा है. मगर वह भूल जाता है कि इसके कई नुकसान हैं.

सोशल मीडिया पर अपनी हर बात का जिक्र कर कलाकार अपने ‘स्टारडम’ पर खुद ही कुल्हाड़ी चलाता रहता है. इस बात को दक्षिण की सुपर स्टार व ‘सिंघम’, ‘स्पेशल 26’ और ‘दो लफ्जों की कहानी’ जैसी हिंदी फिल्मों में अभिनय कर चुकी अदाकारा काजल अग्रवाल अच्छी तरह से समझती हैं.

हाल ही काजल अग्रवाल से एक खास मुलाकात के दौरान जब हमने उनसे पूछा कि सोशल मीडिया से आप सीधे दर्शकों तक पहुंच जाती हैं. पर आपको नहीं लगता कि सोशल मीडिया कहीं न कहीं आपके स्टारडम को नुकसान पहुंचा रहा है?

तो काजल अग्रवाल ने कहा-‘‘आपने बिलकुल सही कहा. पर हर चीज के कुछ लाभ, कुछ नुकसान होते हैं. हर तकनीक के फायदे व नुकसान हैं. फिर भी आपने जो कहा वह बिलकुल सच है. हम जब सोशल मीडिया पर नहीं होते हैं, तो हमारे बारे में दर्शकों व हमारे प्रशंसकों के मन में उत्सुकता बढ़ती है. वह हमारे बारे में जानना चाहते हैं. जब हम आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं, तो वह हमारे करीब आने के बारे में सोचते हैं. इससे हमारा स्टारडम बनता है. पर सोशल मीडिया पर हमारी जिंदगी खुली किताब होती है. इससे हमारे प्रति दर्शकों व हमारे प्रशंसकों के मन में उत्सुकता होनी चाहिए, वह कम हो जाती है. इससे हमारे स्टारडम पर असर पड़ता है. इस तरह सोशल मीडिया हमें काफी नुकसान पहुंचाता है. पर सभी सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं, इसलिए हम भी जुड़े हुए हैं.’’

कुटीर उद्योगों से खुलेगा विकास का ताला

अलीगढ से समाजवादी पार्टी के विधायक जफर इकबाल एक बडा सा ताला बनवाकर लाये. प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित 5 कालीदास मार्ग मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस ताले को खोला. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि 2012 में उनकी सरकार बनने के बाद जो विकास का काम किया है उसके प्रतीक के तौर पर यह ताला खोला है. यह सच है कि सरकारी नौकरियों के मामलें में उत्तर प्रदेश में तमाम नौकरियां दी गई. सबसे अधिक शिक्षा विभाग, पुलिस और लेखपाल भर्ती किये गये. बहुत सारी नौकरियों के बाद भी प्रदेश में विकास अपनी वह गति नहीं पकड़ पाया, जिससे गांव की मजदूर, किसान, कारीगर और छोटे छोटे कुटीर उद्योग चलाने वाले कह जिंदगी में कोई बदलाव आया हो. जिस अलीगढ का बना ताला खोलकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में किये गये विकास के कामों को सराहा, कभी उस अलीगढ के ताला उद्योग की हालत देख लीजिये.

केवल अलीगढ के ताला उद्योग की ही बात नहीं है, मुरादाबाद का पीतल उद्योग, बरेली का जरी उद्योग, सहारनपुर का लकडी उद्योग, फिरोजाबाद का चूडी उद्योग, वाराणसी का साडी उ़द्योग, आगरा कानपुर का चमडा उद्योग को करीब से देखेंगे तो यहां के मजदूरों, और बिजनेस करने वालों की दर्दनाक कथा सामने आ सकेगी.

इन उद्योग धंधों के जरीये लाखों कामगारों को काम मिलता है, जिससे वह अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करने में सफल होते हैं. कभी उत्तर प्रदेश के यह उद्योग पूरे देश ही नहीं दुनिया भर में अपनी कला के लिये मशहूर थे. समय के साथ साथ यह कुटीर उद्योग बंद हो गये या बंदी के कगार पर पहुंच गये. इनके करीगर परिवार का पेट पालने के लिये दूसरे प्रदेशों में जाकर मजदूरी करने लगे हैं. इन कारीगरों का दर्द यह है कि इनसे अधिक पैसा तो गांव में नरेगा में काम करने वाले मजदूर को मिलने लगा. ऐसे में यह करीगर भी अपना हुनर छोडकर मजदूरी करने लगे.

किसी भी कुशल कारीगर के लिये इससे खराब हालात क्या हो सकते हैं कि उसे अपना हुनर छोडकर मजदूरी करके पेट पालना पड़े. उत्तर प्रदेश में विकास की गति में यहां के कुटीर उद्योग पीछे छूट गये. इसकी 3 प्रमुख वजहे हैं. सबसे पहले तो यहां के कुटीर उद्योगों को चलाने के लिये जरूरत भर की बिजली नहीं मिलती है. समय के हिसाब से तकनीकी रूप से यह कुटीर उद्योग तरक्की नहीं कर पाये है. इन कुटीर उद्योगों से तैयार होने वाले सामान को सही बाजार तक पह्रुचाया नहीं जा सका है. जिसकी वजह से यह उद्योग मुनाफे में पिछड रहे है. इन उद्योगों का मुनाफा कम होने से लोग इसको बंद करने में ही भलाई समझ रहे है.

प्रदेश को विकास की राह पर ले जाना है तो सरकारी नौकरी देने से काम नहीं चलने वाला. जरूरत इस बात की है कि छोटी छोटी जगहों पर रोजगार देने वाले कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने वाली योजनायें तैयार हों. शहरी चमक दमक के बीच छोटे रोजगारों को जब महत्व दिया जायेगा, तब सही मायनों में विकास का ताला खुलेगा. उत्तर प्रदेश के कई कुटीर उद्योग यहां की शान हुआ करते थे. यह आज लुप्त क्यों हो गये, इसकी वजहों को दूर करने से प्रदेश का विकास होगा. वरना टाट में पैबंद की तरह से यहां के कारीगर दिखते रहेंगे.

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