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इस पुलिसवाली की इन HOT तस्वीरों ने इंस्टाग्राम पर मचा दिया धमाल

कहते हैं कि शरीर की सुंदरता से क्या होता है, मन सुंदर होना चाहिए. लेकिन मन की सुंदरता की पहली सीढ़ी ही है शरीर की सुंदरता. सुंदर दिखने की चाह सबको होती है. ज्यादातर लोग चेहरे को सुंदर बनाने की जुगत में लगे रहते हैं और उनके उपाय लीपा-पोती के अलावा कुछ भी नहीं है और इन उपायों से कभी भी स्थायी सुंदरता नहीं मिलती.

लेकिन यहां हम आपको सुंदरता या आकर्षक दिखने पर कोई लेक्चर नहीं देने वाले हैं, बल्कि हम आपको एक ऐसी पुलिस ऑफिसर की तस्वीरें दिखाने जा रहें हैं, जिसने अपनी सुन्दर काया से Instagram पर खूब वाहवाही बटोरी है.

जर्मनी की Adrienne Kolesza 31 साल की हैं और पुलिस ऑफिसर हैं. Adrienne बेहद खूबसूरत हैं. आजकल वो अपनी सेक्सी बॉडी के कारण Instagram पर बहुत फेमस हो गईं हैं. उनके इस टाइम 1,00,000 फॉलोवर्स हैं. इतना ही नहीं उनके कुछ फॉलोवर्स ने तो उनको कमेंट भी किया है कि वो उनके हाथों गिरफ़्तार होना चाहते हैं.

तो आइये अब आपको दिखाते हैं उनकी बेहतरीन तस्वीरें.

नाकाम साबित हुआ रोजगार का वादा

‘मित्रो, अगर हम सत्ता में आते हैं, तो हर साल 2 करोड़ रोजगार पैदा करेंगे. 4 करोड़ हाथों को हर साल काम मिलेगा. देश में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन कहीं कुशलता नहीं है, कहीं कनैक्शन नहीं है. हम 10 करोड़ नौजवानों को स्किल ट्रेनिंग दिला कर उन्हें महत्त्वपूर्ण मानव संसाधन में बदल देंगे.’ साल 2014 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी एक जगह नहीं, बल्कि सैकड़ों जनसभाओं में इसी तरह के भाषण दिए थे. उन के तकरीबन सभी भाषणों में नौजवान और उन के लिए रोजगार के सतरंगी सपने शामिल होते थे. ऐसा नहीं है कि इस सरकार ने चुनावों के दौरान किए गए किसी भी वादे को पूरा नहीं किया है, लेकिन जहां तक रोजगार के वादे का सवाल है, तो अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी यह सरकार इस मोरचे पर जबरदस्त तरीके से नाकाम हुई है. यह पहला ऐसा मौका है, जब देश में बढ़ती बेरोजगारी ने नौजवानों या उन के मांबाप को ही नहीं, बल्कि अर्थशास्त्रियों और भविष्य की आर्थिक योजनाएं बनाने वाले नौकरशाहों तक को डरा दिया है.

बेरोजगारी अपनी हद पर है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि यह महज इस सरकार की नाकामी का नतीजा है. इस की बुनियाद में भले ही तमाम वजहें हों, पर इस में कोई दोराय नहीं है कि फिलहाल रोजगार पैदा करने में बुरी तरह से नाकाम रहे हालात और योजनाओं का ठीकरा इस सरकार के सिर पर ही फूटेगा.

दरअसल, यह बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी का ही कौकटेली असर था कि पिछले लोकसभा चुनावों में आम मतदाताओं ने भाजपा को जबरदस्त बहुमत से संसद में पहुंचाया था. शायद इस के पीछे मंशा यह रही होगी कि अगर दूसरी पार्टियां समझौते की हालत में भाजपा को खुल कर काम न करने दें, तो भाजपा को इतनी सीटें मुहैया करा दी जाएं कि वह बिना किसी रुकावट के अपने किए गए वादों को पूरा कर सके. लेकिन कम से कम रोजगार के मोरचे पर तो ऐसा बिलकुल मुमकिन नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के काफी पहले से ही देश के तमाम कालेजों, पढ़ाईलिखाई के दूसरे संस्थानों में जाजा कर छात्रों को जोरदार तरीके से रोजगार दिलाने वाले भविष्य के सपने दिखाए थे. नौजवानों को ही नहीं, बल्कि तमाम कारपोरेट माहिरों को भी अंदाजा था कि नरेंद्र मोदी की सरकार भले किसी और मोरचे पर आमूलचूल ढंग से बदलाव न कर पाए, लेकिन रोजगार के मोरचे पर वह जरूर अच्छे नतीजे देगी, ताकि नौजवानों के बीच अपनी शानदार इमेज बना सके.

लेकिन यह भी एक सच है कि भले ही तमाम ढांचागत सुधारों की दिशा में इस सरकार ने पहले की सरकारों के मुकाबले ज्यादा साहसी कदम उठाए हों, भले ही इस समय हमारा विदेशी मुद्रा भंडार इतिहास के किसी भी समय के मुकाबले कहीं ज्यादा लबालब हो और भले ही पिछले गुजरे 2 साल विदेशी निवेश के मामले में भी अच्छे रहे हों, इन तमाम बातों के बावजूद सचाई यही है कि रोजगार के मोरचे पर यह सरकार बुरी तरह से नाकाम साबित हुई है. हालांकि इस के लिए इस सरकार की कोई सैद्धांतिक गलती नहीं है, वक्त ही कुछ ऐसा है कि रहरह कर दुनिया को बारबार मंदी का साया अपनी गिरफ्त में ले रहा है. इस समय देश में जितनी बेरोजगारी है, हाल के 20 सालों में उतनी कभी नहीं रही. मोदी सरकार भी इस से चिंतित है, क्योंकि सरकार द्वारा ही जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में इस समय कुल आबादी के 11 फीसदी से ज्यादा लोग बेरोजगार हैं, जिस का मतलब यह है कि भारत में आस्ट्रेलिया की कुल आबादी के 4 गुना ज्यादा लोग बेरोजगार हैं. इसे दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि भारत में 4 बेरोजगार आस्ट्रेलिया मौजूद हैं.

अलगअलग किए गए सर्वे की बात करें, तो देश में 43 फीसदी लोग यह मानते हैं कि मोदी सरकार के 2 सालों के कार्यकाल में बेरोजगारी के दर में जरा भी कमी नहीं आई, बल्कि यह बढ़ी ही है. तकरीबन 48 फीसदी लोग तो यह भी मानते हैं कि यह सरकार रोजगारों को पैदा करने और जिंदगी को बेहतर बनाने वाली परियोजनाओं में पिछली सरकारों के मुकाबले कम रकम खर्च कर रही है. लोगों में गुस्सा और चिंता इस बात की भी है कि मोदी सरकार देश के लिए बेहद गैरजरूरी मुद्दों पर फोकस कर रही है, जिस में न केवल बड़े लैवल पर उस का कीमती समय बरबाद हो रहा है, बल्कि अच्छाखासा खर्च भी आ रहा है.

विपक्षी दल कांगे्रस भी आंकड़ों के जरीए बताने की कोशिश कर रही है कि मौजूदा राजग सरकार पिछली संप्रग सरकार के मुकाबले रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं में कम रकम खर्च कर रही है. मसलन, कांगे्रस के आंकड़ों के मुताबिक, संप्रग सरकार ने साल 2013-14 में रोजगार पैदा करने वाली अलगअलग परियोजनाओं में 1,76,377 करोड़ रुपए खर्च किए थे, जबकि मौजूदा राजग सरकार ने साल 2014-15 में महज 1,51,688 करोड़ रुपए ही खर्च किए. हो सकता है इन आंकड़ों में अपने किस्म की बाजीगारी हो, लेकिन इस बात से कोई नजरें नहीं चुरा सकता है कि आज की तारीख में 20 से 25 साल का हर चौथा भारतीय नौजवान बेरोजगार है.

बेरोजगारी का यह आंकड़ा सचमुच खौफनाक है, क्योंकि कोई देश अपने 25 फीसदी बेरोजगार नौजवानों के रहते हुए शांति और तरक्की की कामना नहीं कर सकता.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 24 करोड़ हाथों के पास करने के लिए कोई काम नहीं है. यह डरावना सच है, जो भविष्य के किसी भी इंद्रधनुषी सपने को पलभर में चकनाचूर कर सकता है, इसलिए अपनी तमाम बुराइयों और उपलब्धियों के बयानों के बीच सरकार को इस खतरनाक सच को बेमतलब का बनाना ही होगा, नहीं तो अपनी इमेज गढ़ने में यह सरकार कितनी ही कुशल क्यों न हो, मतदाताओं को खुद के मोह भंग से किसी भी तरह से नहीं रोक पाएगी.       

                     

घर छोड़ने को भी हवा दे रही है बेरोजगारी

किसी भी देश में लोगों के अपने घर छोड़ने यानी पलायन करने की यों तो कई वजहें होती हैं, लेकिन एक सब से बड़ी वजह बेरोजगारी है. भारत की बात करें तो आज की तारीख में बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा बेरोजगारी है. इस के चलते यहीं से सब से ज्यादा लोग घर छोड़ रहे हैं. बिहार की हालत सब से बुरी है. 54 फीसदी से ज्यादा बिहारी नौजवान किसी न किसी वजह से अपने घर और गांव से जा चुके हैं. देश के सभी बड़े शहरों में जहां रोजगार मिल जाता है, वहां सब से ज्यादा इन्हीं 5 प्रदेशों के लोग पहुंच रहे हैं. दरअसल, घर छोड़ने के पीछे और भी कई वजहें होती हैं, जैसे अशिक्षा, गुलामी या निजी सपने. साल 1991 से साल 2001 के बीच देश में 30 करोड़, 90 हजार से ज्यादा लोगों ने घर छोड़ा था, जिस का मतलब यह था कि वे किसी न किसी वजह से अपने प्रदेश को छोड़ कर दूसरे प्रदेशों या देशों तक रोजगार हासिल करने के लिए गए थे. हाल के सालों में घर छोड़ने के लिए मजबूर होने वाले लोगों की तादाद में लगातार इजाफा हुआ है. साल 2001 में महाराष्ट्र आने वाले लोगों की तादाद 20 लाख सालाना से ऊपर थी, जबकि हैरानी की बात यह है कि हरियाणा में इन दिनों में 67 लाख से ज्यादा लोग पहुंचे.

पिछले कुछ सालों में अब तक के ट्रैंड से अलग बडे़ पैमाने पर किशोरों और किशोरियों का भी अपने प्रदेश से भागना हुआ है. झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ वे राज्य हैं, जहां से पिछले 5 सालों के भीतर 30 लाख से ज्यादा किशोरों और किशोरियों ने मजबूरी में अपना घर छोड़ा है. वैसे, जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना बनी थी, उस का एक मकसद यह भी था कि इस की मौजूदगी से बेरोजगारों को अपने घर छोड़ कर छोटेमोटे कामों के लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन इस योजना में तमाम किस्म की धांधलेबाजी के चलते यह घर छोड़ने को पूरी तरह से रोकने में नाकाम रही. हालांकि फिर भी इस की मौजूदगी से पिछले 5 सालों में 3 करोड़ से ज्यादा मजदूरों का घर छोड़ना रुका है. अकेले झारखंड में ही साल 2006 से साल 2012 के बीच 42 लाख से ज्यादा काम के दिनों का रोजगार मुहैया कराया गया, जिस से 17 लाख से ज्यादा मजदूरों को मजदूरी के लिए अपना घरपरिवार नहीं छोड़ना पड़ा.

इस के बावजूद बेरोजगारी के दबाव में हर साल लाखों मजदूरों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक का सफर करना पड़ता है, जहां ये लोग बेहद मुश्किल हालात में काम करने के लिए मजबूर होते हैं. मौजूदा केंद्र सरकार इस को रोक पाने में नाकाम है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान बारबार याद दिलाया था कि तकरीबन 60 सालों तक सत्ता में रही कांगे्रस ने रोजगार के लिए घर छोड़ने को रोकने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया था. उन की सरकार ऐसे गैरजरूरी घर छोड़ने को जल्द से जल्द रोकेगी, मगर इन 2 सालों में तो वह जल्द से जल्द आती कभी नहीं दिखी.

सपने भी हैं बेरोजगारी की वजह

भारत में बेरोजगारी इसीलिए नहीं है कि रोजगार का कोई जरीया ही नहीं है, बल्कि बेरोजगारी की एक बड़ी वजह यह भी है कि तमाम लोगों को उन की काबिलीयत और शख्सीयत के हिसाब से रोजगार नहीं हासिल हो रहा है, इसलिए वे माकूल रोजगार का इंतजार कर रहे हैं. इसे आप बेहतर मौके की तलाश में गैरजरूरी बेरोजगारी भी कह सकते हैं. देश में तकरीबन एक करोड़, 19 लाख लोग इसलिए भी बेरोजगार हैं.

दरअसल, देश में हर साल रोजगार पाने वालों की फौज में एक करोड़, 91 लाख लोगों का इजाफा हो जाता है, जबकि पिछले 3 सालों से 50 लाख रोजगार भी पैदा नहीं हो रहे हैं. यही वजह है कि देश में लगातार बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. विपक्ष के नेताओं का ही नहीं, बल्कि अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि बेरोजगार नौजवान देश के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकते हैं. अगर इन बे जगार नौजवानों के लिए तुरंत कोई हल नहीं निकलता है, तो यह समस्या सरकार के कामकाज के दूसरे पहलुओं पर भी जबरदस्त ढंग से असर डालेगी.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सैंटर फौर द स्टडी औफ रीजनल डैवलपमैंट के अमिताभ कुंडू के मुताबिक यह हालत खतरे की घंटी है, क्योंकि भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले बड़े पैमाने पर वे नौजवान थे, जो बेहतर रोजगार की उम्मीद लगाए बैठे थे. मगर मौजूदा सरकार रोजगार बढ़ाने वाले उद्योग लगाने में नाकाम रही है. सरकार की कौशल विकास योजना भी अच्छे नतीजे नहीं दे पा रही है, क्योंकि बाजार में रोजगार ही नहीं हैं, इसीलिए अगर नौजवानों का कौशल विकास भी हो गया, तो वह धरा का धरा रह जाएगा.

पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ते बच्चे, कुसूरवार कौन

तमाम तरह की सहूलियतें मिलने के बावजूद सरकारी प्राइमरी स्कूलों से ले कर बड़े स्कूलों के छात्र पढ़ाईलिखाई में पिछड़ रहे हैं और राज्य सरकारें यह ढिंढोरा पीट रही हैं कि उन के यहां साक्षरता दर बढ़ी है. सही माने में आज 7वीं 8वीं जमात के छात्रों को ठीक ढंग से जमा, घटा, गुणा, भाग के आसान सवाल भी हल करने नहीं आते हैं. अंगरेजी भाषा के बारे में तो उन का ग्राफ बहुत नीचे है. वे हिंदी भी नहीं लिख सकते हैं, न ही आसानी से पढ़ सकते हैं. क्या है इस की वजह? स्कूलों में तख्ती लिखने को खत्म कर देने के चलते आज ज्यादातर छात्रों की लिखाई पढ़ने में ही नहीं आ पाती है. ऐसे छात्रों की नोटबुक जांच करने में टीचरों को खूब पसीना बहाना पड़ता है.

सालों पहले तख्ती लिखने पर बहुत जोर दिया जाता था, ताकि बचपन से छात्रों की लिखाई सुंदर हो और उन को वर्णमाला की पहचान हो सके. तब होमवर्क के तौर पर उन को तख्ती लिखने के लिए बढ़ावा दिया जाता था. अगले दिन टीचर उन छात्रों की तख्तियों की जांच करते थे. कच्ची छुट्टी यानी स्कूल इंटरवल में छात्र उन तख्तियों को धोते थे और दोबारा तख्ती लिखते थे. अब यह बीते जमाने की बात हो गई है. अब तो पहली जमात का छात्र भी जैलपैन या बालपैन का इस्तेमाल करना अपनी शान समझता है. यही वजह है कि छात्रों की लिखाई अच्छी नहीं बन पाती है और इम्तिहान में उन के नंबर कम हो जाते हैं. कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन होता है. यह कहावत तब कसौटी पर खरी उतरेगी, जब प्राइमरी स्कूलों के छात्रों को पढ़ाईलिखाई के साथसाथ खेलों के लिए भी वक्त दिया जाएगा.

प्राइमरी स्कूलों में पीरियड सिस्टम ही नहीं है, इसलिए यह टीचर की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह पूरे दिन किसकिस सबजैक्ट को कितनी देर पढ़ा कर बच्चों को बीच में रिलैक्स करने के लिए कह दे. सरकारी स्कूलों में खेल पीरियडों के लिए कोई खास तवज्जुह नहीं दी गई है. अगर खेल पीरियड का इंतजाम हो तो बच्चों में पढ़ाईलिखाई के साथसाथ खेलकूद में भी अच्छा तालमेल हो जाएगा. जहांजहां प्राइमरी स्कूलों के साथ मिडिल, हाई या सीनियर सैकेंडरी स्कूल हैं, वहां बच्चों के लिए स्पोर्ट्स पीरियड भी होता है. बड़े स्कूल के छात्र जब मैदान में खेलते हैं, तब प्राइमरी स्कूल के छात्रों का मन भी खेलने को करता है, पर वे अपने मन की बात किसी से नहीं कह पाते हैं.

ऐसे छात्रों को सिर्फ इतना पता होता है कि उन का स्कूल सुबह 9 बजे लगता है और उन की 3 बजे छुट्टी होती है. इस बीच उन्हें दोपहर 12 बज कर 20 मिनट से 1 बजे तक का वक्त दोपहर के भोजन के लिए मिलता है यानी स्कूल के 6 घंटों के बीच उन्हें खेलने के लिए समय कोई पीरियड नहीं मिलता है. हिमाचल प्रदेश की बात की जाए तो एक जिले में डिप्टी डायरैक्टर, ऐजूकेशन ने फरमान जारी किया है कि पहली से  5वीं जमात तक के छात्रों की इकट्ठे ही 3 बजे छुट्टी की जाए. ऐसे डिप्टी डायरैक्टर को कैसे समझाया जाए कि पहलीदूसरी जमात के छात्र इतनी लंबी सिटिंग नहीं कर सकते हैं. उन के लिए तो यह बोरियत भरा काम हो जाएगा.

इन स्कूलों में डिक्टेशन का चलन भी खत्म हो गया है. डिक्टेशन से एक ओर जहां बच्चों को सही रूप से लिखने का अभ्यास होता है, वहीं दूसरी ओर उन के लिखने की रफ्तार बढ़ती है और शब्दों का उच्चारण भी सही ढंग से होता है. उन की गलतियों को सुधारने की गुंजाइश बनी रहती है और वे इम्तिहान में अच्छे ढंग से लिख कर तय समय में पूरे सवाल हल कर पाते हैं. पहले प्राइमरी स्कूलों में हर शनिवार को आधी छुट्टी के बाद बाल सभा कराई जाती थी, जिस में छात्र बड़े जोश के साथ कविता, एकलगान व एकांकी जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. उन को इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता था.

पर अब ये बातें यादों का हिस्सा बन गई हैं. अब तो टीचरों को ऐसा लगता है कि इस तरह के आयोजनों का मतलब है समय को बरबाद करना, जबकि इस तरह के आयोजनों से छात्रों का खुद पर यकीन बढ़ता है और उन में कुछ नया कर दिखाने की ललक बढ़ती है. हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की बात की जाए, तो यहां 5 शिक्षा खंड, सदर, घुमारवीं एक, घुमारवीं द्वितीय, स्वारघाट व झंडूता शिक्षा खंड हैं. पूरे जिले में कुल 593 प्राइमरी स्कूल हैं.

सदर शिक्षा खंड के तहत 153 स्कूल हैं और छात्रों की तादात 4101, घुमारवीं एक शिक्षा खंड में 106 स्कूल, घुमारवीं द्वितीय शिक्षा खंड में 92 स्कूल और छात्रों की तादाद 2561 है. स्वारघाट शिक्षा खंड में 120 स्कूल व छात्रों की तादाद 3523 है, जबकि झंडूता शिक्षा खंड में स्कूलों की तादाद 122 है और इन में 3521 छात्र पढ़ रहे हैं. पर पिछले साल ही जिस डिप्टी डायरैक्टर, प्राइमरी स्कूल ने इस जिले में काम संभाला है, उस शख्स का नाम है पीसी वर्मा. उन्होंने स्कूलों का धड़ाधड़ निरीक्षण कर के प्राइमरी स्कूलों के उन टीचरों के छक्के छुड़ा दिए हैं, जो स्कूलों के लिए बोझ बने हुए हैं. पीसी वर्मा ने दूरदराज के इलाकों में बने स्कूलों में दस्तक दे कर उन टीचरों को यह कड़ा संदेश दिया है कि वे छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न कर के अपने फर्ज का पालन करें. पीसी वर्मा ने 29 दिसंबर, 2015 को सदर शिक्षा खंड के तहत आने वाले ‘सिहड़ा’ व ‘सिहड़ा खास’ स्कूलों में निरीक्षण के दौरान छात्रों की पढ़ाईलिखाई का लैवल जांचा, जो कसौटी पर खरा उतरा, जबकि 12 फरवरी, 2016 को बागी प्राइमरी स्कूल व 25 फरवरी, 2016 को पंजगाई स्कूल में खामियां पाई गईं. उन्होंने टीचरों को इस के लिए कुसूरवार ठहराया.

सदर खंड के खंड प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी बनारसी दास का कहना है कि वे नियमित तौर पर स्कूलों का निरीक्षण करते हैं और जो टीचर ड्यूटी के प्रति कोताही बरतता है, उस पर कार्यवाही की जाती है. सदर खंड के खंड स्रोत केंद्र समवन्यक राजेश गर्ग का कहना है कि पढ़ाईलिखाई में क्वालिटी लाने के लिए सभी एकजुट हो कर कोशिश करें, तो उस के नतीजे अच्छे रहते हैं. जिन टीचरों का काम अच्छा होता है, उन को तरक्की मिलनी चाहिए और जो अपने फर्ज के प्रति लापरवाह रहते हैं उन की डिमोशन होनी चाहिए. समाजसेवी दया प्रकाश कहते हैं कि अफसर चाहे जितने भी निरीक्षण कर लें, सूचना पहले ही लीक हो जाती है और मोबाइल क्रांति द्वारा सबकुछ दुरुस्त हो जाता है. ऐसे में छात्र पढ़ाईलिखाई में पिछड़ते रहेंगे. ढुलमुल सरकारी नीतियां भी इस के लिए जिम्मेदार हैं. 

अंतरिक्ष में भारत का पंच

23 मई, 2016, सोमवार का दिन भारतीयों के लिए गर्व का दिन था. इस दिन आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र से आरएलवी शटल को सुबह 7 बजे एक खास प्रक्षेपणयान से प्रक्षेपित किया गया. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के 650 वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों के एक समूह ने विश्व अंतरिक्ष कार्यक्रम के क्षेत्र में भारत का लोहा मनवाया. यह दिन न केवल यादगार बल्कि अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के क्षेत्र में ऐतिहासिक बन गया. भारत ने आखिर ऐसा क्या किया कि उस की इतनी गौरवगाथा गाई जा रही है?

इस का जवाब है, इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा आरएलवी-टीडी यान यानी रीयूजेबल लौंच व्हीकल का सफल परीक्षण, जिसे बनाने में भारतीय वैज्ञानिक समूह पिछले 5 वर्ष से जुटा था. आरएलवी-टीडी की यह पहली परीक्षण उड़ान थी, जिस में इसरो के वैज्ञानिक पूरी तरह से कामयाब रहे.

आरएलवी-टीडी भारत का पहला स्पेस शटल है. यह आकार में एसयूवी के बराबर है और मानवरहित है. इस का मकसद अंतरिक्ष में उपग्रहों की कक्षा में रौकेट को भेज कर हवाईजहाज की तरह पृथ्वी पर वापस आना है. इस से प्रक्षेपण की लागत दसगुना तक कम हो जाएगी.

रीयूजेबल लौंच व्हीकल यानी दोबारा इस्तेमाल में आने वाला यान जब श्रीहरिकोटा से सुबह 7 बजे छोड़ा गया तो उस के ठीक 10 मिनट बाद वह 70 किलोमीटर की ऊंचाई पर जा कर रौकेट को छोड़ कर वापस बंगाल की खाड़ी में तय स्थान पर गिरा. यह स्थान खाड़ी के तट से 450 किलोमीटर दूर है.

वैज्ञानिकों ने 2 पंखों वाले इस तरह के यान की पहली बार लौंचिंग की. इस की विशेषता है कि अंतरिक्ष में लौंच करने के बाद फिर से इसे धरती पर उतारा जा सकता है यानी इस का उपयोग बारबार किया जा सकता है. इस वजह से अंतरिक्ष कार्यक्रम में आने वाले खर्च में दसगुना तक की कटौती हो सकती है.

इस आरएलवी-टीडी यान के लौंचिंग में बूस्टर के 7 मीटर लंबे रौकेट का इस्ेतमाल किया गया. इस का वजन 1.75 टन था. इस मिशन के कामयाब होने से इसरो को हाइपरसोनिक स्पीड, औटोमैटिक लैंडिंग और डाटा जमा करने में सफलता प्राप्त हो गई है. इस यान के निर्माण पर 95 करोड़ रुपए की लागत आई है.

हालांकि आरएलवी की यह उड़ान भारत की टैस्टिंग उड़ान रही, इसलिए यान को बंगाल की खाड़ी से निकाला नहीं जाएगा. आरएलवी को अंतिम रूप देने में 10 से 15 साल लग जाएंगे. फिर भी हाइपरसोनिक गति (ध्वनि की गति से पांचगुना तेज) वाले एयरोस्पेस व्हीकल के इस सफल और प्रथम परीक्षण ने भारत को दुनिया के उन गिनेचुने 4 देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान के ग्रुप में शामिल कर दिया है जिन के पास यह तकनीक है. भारत 5वां देश बन कर टैक्नोलौजिकल ‘इलिट क्लास’ में शामिल हो गया है.

खास बातें

आरएलवी-टीडी पूर्णत: स्वदेशी है. यह सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में छोड़ कर वापस धरती पर आ जाए, इस तरह डिजाइन किया गया है. इसे एक बूस्टर की मदद से अंतरिक्ष में भेजा जाता है. इसरो ने पहली बार पंखों वाले यान का प्रक्षेपण किया. इस के एडवांस वर्जन का स्पेस के मैन मिशन में भी उपयोग किया जाएगा.

इसरो प्रमुख किरण कुमार के अनुसार आरएलवी तीनों तकनीकी परीक्षणों में सफल रहा है. पहला, रौकेट के धरती पर वापस आने के दौरान उस पर पड़ने वाले एयरो थर्मो डायनामिक प्रभाव यानी हवा से घर्षण होने पर पैदा होने वाली ऊष्मा, दूसरा, रौकेट में लगे स्वचालित मिशन प्रबंधन और तीसरा रौकेट की ऊष्मारोधी बाहरी परत की क्षमता. इन तीनों ही कसौटियों पर आरएलवी सफल रहा.

प्रक्षेपण के एक दिन पहले इसरो प्रमुख काफी उत्साहित थे. उन का कहना था कि वे ऐसी कई नई चीजें करने जा रहे हैं जैसेकि वायुगति विज्ञान, पंखों वाले यान, विंड टनल टैस्ट और नए डिजाइन ऐसे मुद्दे थे, जो इसरो के डिजाइनरों और इंजीनियरों के सामने भारी चुनौतियां पेश कर रहे थे.

रूस ने 1989 में ‘बुरान’ नाम से ऐसा ही स्पेस शटल बनाया था, लेकिन इस ने एक ही बार उड़ान भरी. फ्रांस और जापान ने प्रायोगिक उड़ानें भरीं. अमेरिका ने पहला आरएलवी-टीडी शटल 135 बार उड़ाया. नासा ने हालांकि 2011 से इस तरह के रौकेट प्रोग्राम पर रोक लगा दी. इस से पहले वह 3 दशक तक डिस्कवरी, एंडेवर, कोलंबिया और चैलेंजर रौकेट का इस्तेमाल स्पेस ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम के तौर पर करता रहा था, लेकिन अब उस ने इन्हें रोक कर अपनी क्षमता को कुंद कर लिया है.

हालांकि विकसित देशों की नजर में अब इस तरह के टैस्ट की उतनी महत्ता नहीं रही है. फिर भी अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत का यह शुरुआती कदम कई माने में महत्त्वपूर्ण है. इस का उद्देश्य प्रक्षेपणयान को अंतरिक्ष में जा कर उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के बाद एक मिशन की तरह धरती पर वापस आना है, ताकि इस का उपयोग दोबारा किया जा सके.

इस से उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के खर्च में दसगुना तक की कमी आएगी. इस के विकसित संस्करणों में मानव मिशन को अंतरिक्ष में भेजना भी भविष्य में संभव हो सकेगा. इस नजरिए से भारत की यह सफलता अद्वितीय है. अंतरिक्ष में भारत का यह जबरदस्त पंच है और अंतरिक्ष विज्ञान में उस की बढ़ती शक्ति का द्योतक भी है.

मिशन के मुख्य बिंदु

–       पहली बार इसरो ने 2 पंख वाले यान की लौंचिंग की.

–       इस यान का इस्तेमाल बारबार किया जाएगा.

–       आरएलवी की तुलना में इस का आकार पांचगुना कम है.

–       इस पर 95 करोड़ रुपए की लागत आई.

–       इस की हाइपरसोनिक गति है यानी ध्वनि की गति से पांचगुना अधिक.                                            

इसरो के उपग्रह मिशन

राष्ट्रीय विकास के लिए अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रयोग में आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का उद्देश्य रहा है. राष्ट्रीय अनुप्रयोग जैसे, दूरसंचार, टीवी प्रसारण, आकाशवाणी के लिए उपग्रह संचार, दूरसंवेदी द्वारा संसाधन सर्वेक्षण और प्रबंधन, मौसम विज्ञान संबंधी सेवाएं और पर्यावरण जांचपड़ताल आदि. इन सभी लक्ष्यों को पाने के लिए देशी उपग्रहों तथा प्रक्षेपणयानों का विकास भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े संगठनों का उद्देश्य रहा है.

इसरो यानी इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन इस में अपनी महत्ती भूमिका अपने स्थापना काल से ही निभाता आ रहा है. अंतरिक्ष अनुसंधान गतिविधियों और अंतरिक्ष अनुप्रयोग कार्यक्रम की योजना बनाने, निष्पादन और प्रबंधन के लिए इसरो जिम्मेदार है.

आज भारत के पास राष्ट्रीय और विश्व दोनों ही स्तरों पर दूरसंवेदी उपग्रहों का सब से बड़ा समूह है, जिन की बदौलत भारत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सेवाएं उपलब्ध करा रहा है. इन सभी में इसरो की महत्त्वपूर्ण भूमिका है. इसरो के कई सहयोगी संगठन भी हैं जिन में मुख्य हैं, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, शार केंद्र यानी श्रीहरिकोटा में स्थित इसरो का मुख्य प्रक्षेपण केंद्र, इसरो अक्रिय यंत्र एकक, विकास व शिक्षा संचार एकक, भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला, इसरो उपग्रह केंद्र व अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र आदि.

इसरो ने 1980 में पहले स्वदेशी प्रक्षेपणयान एसएलवी-3 का सफल प्रक्षेपण किया था. इस के बाद अगली पीढ़ी के संवर्द्धित उपग्रह प्रक्षेपणयान यानी एएसएलवी का निर्माण किया. अक्तूबर, 1994 में धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान के द्वारा आईआरएसपी 2 यान को छोड़ा. इस की सफलता के साथ ही भारत ने प्रक्षेपणयान कार्यक्रम में बड़ी छलांग लगा ली. 2008 में इसरो ने चंद्रयान-1 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर विश्व को अपनी क्षमता और सामर्थ्य से अवगत करा दिया. 2009 में इसरो का चंद्रयान से संपर्क टूट गया, लेकिन यह एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम था, क्योंकि इसी ने चंद्रमा पर पानी की खोज करने में सफलता हासिल की थी.

देश की रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसरो ने राडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट-2 का प्रक्षेपण 2009 में किया. इस का प्रक्षेपण पीएसएलवी-सी12 के द्वारा 20 अप्रैल, 2009 में किया गया था.

इसरो ने बैलून के एक प्रयोग में समतापमंडल की वायु में बैक्टीरिया की 3 ऐसी प्रजातियों की खोज की है जो धरती पर नहीं पाई जातीं. इन प्रजातियों की खासीयत यह है कि इन में पराबैंगनी विकिरण के प्रतिरोध की उच्च क्षमता है. इसरो को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में उस समय बड़ी सफलता हासिल हुई थी जब इस ने महासागरीय अनुसंधान के लिए अत्याधुनिक उपग्रह ओशनसैट-2 का सफल प्रक्षेपण 23 सितंबर, 2009 में पीएसएलवी-सी 14 द्वारा किया. इस से महासागरीय अनुसंधान को नई दिशा मिली.

आज से लगभग 2 वर्ष पूर्व मंगलयान का सफल प्रक्षेपण कर के इसरो ने हमें चंदामामा से मिलवा दिया. अभी हाल ही में इसरो ने इंटरसैप्टर को भी सफलतापूर्वक छोड़ा था. इस तरह हम देखते हैं कि इसरो ने अंतरिक्ष कार्यक्रम के क्षेत्र में कई मील के स्तंभ गाड़े हैं. हालांकि कुछ में वह असफल भी हुआ है फिर भी उस की ज्यादातर सफलताओं से भारत की शान बढ़ी है और विश्व ने भारत का लोहा माना है. आरएलवी-टीडी यानी रीयूजेबल लौंच व्हीकल टैक्नोलौजी डैमौन्स्ट्रेट की सफल उड़ान से अंतरिक्ष कार्यक्रम के क्षेत्र में एशिया में जापान के बाद दूसरा देश बन गया है. चीन जैसे शक्तिशाली देश के पास भी यह टैक्नौलोजी नहीं है. यह भारत के लिए गर्व की बात है.

नाभि को दें सैक्सी लुक

नारी सौंदर्य में आकर्षक नाभि अपनी खास अहमियत रखती है. आकर्षक और संतुलित नाभि युवतियों को जहां सैक्सी लुक प्रदान करती है वहीं पार्टीफंक्शन में आकर्षण का केंद्र भी बनती है. आज नाभि दिखाने का फैशन चलन में है.

सविता को पेट के ऊपर साड़ी बांधने पर कसाव महसूस होता है और इस से उसे असुविधा भी होती है, इसलिए वह साड़ी नाभि के नीचे बांधती है, लेकिन उथली नाभि और अंदर की दिखती धारियों की बात से अनजान सविता को उस की सौंदर्य विशेषज्ञ सहेली सुषमा ने जब एहसास कराया तो वह बहुत परेशान हो गई. सुषमा ने इस का उपाय सुझाते हुए कहा कि कुछ युवतियों की नाभि ऊपर की तरफ निकली होती है तो कुछ की नाभि संकरी, छोटी एवं कम गहरी होती है, जो उन के सौंदर्य को कम कर देती है. आजकल ‘नी शेप’ नामक तकनीक के जरिए नी शेप क्लिनिक एवं पार्लर्स में युवतियों की नाभि को आकर्षक आकार दिया जाता है.

तब सविता ने अपनी सहेली सुषमा से विस्तार से इस के बारे में बताने को कहा. जिस पर सुषमा ने बताया कि बदलते परिवेश एवं फैशन की दौड़ में बौडी आर्ट (टैटू), पियर्सिंग (शरीर के अंगों में छेद कर उस में आधुनिक बोल्ड ज्वैलरी पहनाना) के साथसाथ नी शेप का नाम भी जुड़ गया है, जिस के तहत नाभि को आकर्षक बनाया जाता है. नाभि को आकर्षक, गहरी एवं सुंदर बनाने के लिए आजकल ‘नेवल स्प्रिंग’ तकनीक अपनाई जाती है. इस के अंतर्गत नाभि का नाप ले कर जंगरोधी धातु की नाभि के आकार की एक स्प्रिंग तैयार की जाती है. इस स्प्रिंग की खासीयत है कि यह नाभि के अंदर गहराई में जा कर फैलती है और नाभि के अंदर की त्वचा को दबाती है. फिर इसे नाभि के अंदर डाल कर छोड़ दिया जाता है. जब इस नेवल स्प्रिंग को दबा कर किसी जंगनिरोधी चिमटी के सहारे नाभि की गहराई या सतह पर डाल कर छोड़ा जाता है तब दबाव कम होते ही यह स्प्रिंग अपने बड़े आकार में आ जाती है, इस से नाभि का आकार चौड़ा, गोल एवं आकर्षक हो जाता है. यह स्प्रिंग नाभि में दिखाई नहीं देती है.

इस नेवल स्प्रिंग की एक विशेषता यह भी है कि लगातार नाभि के अंदर रहने से इस के स्प्रिंग के तार त्वचा को दबाते हैं और उस स्थान के सैल्स स्प्रिंग तार के साइज के दबाव के कारण अंदर की तरफ दबतेदबते स्थायी हो जाते हैं और जब नाभि स्थायी रूप से आकर्षक रूप ले लेती है तब स्प्रिंग अपनेआप बाहर निकल जाती है. इस के बाद भी यदि नाभि में पर्याप्त आकर्षण नहीं आता है तो उसी जगह थोड़ी बड़ी स्प्रिंग बना कर डाल देते हैं. इस तरह से नाभि कुछ ही दिन में आकर्षक, गोल एवं गहरी हो जाती है. ब्यूटी क्लिनिक एवं नी शेप क्लिनिक में नाभि में इस नेवल स्प्रिंग को डालने पर सामान्यत: 500 रुपए या उस से अधिक का खर्च आता है.

नेवल स्प्रिं डालते समय विशेषज्ञों को हाथों में ग्लव्स पहनने चाहिए तथा उन के पास विभिन्न आकार की नेवल स्प्रिंग, स्प्रिंग को नाभि में डालने के लिए विभिन्न प्रकार की चिमटियां एवं फौरसेप होने चाहिए. नेवल स्प्रिंग लगाने से पूर्व नाभि को ऐंटीसैप्टिक लोशन से अच्छी तरह साफ करना चाहिए. नेवल स्प्रिंग जंगरोधी होनी चाहिए, स्प्रिंग के दोनों छोर अंदर की तरफ मुड़े हुए होने चाहिए जिस से कि वे नाभि में अंदर जाने के बाद उसे नुकसान न पहुंचाएं. अगर नेवल स्प्रिंग लगाने के बाद किसी तरह की परेशानी या असुविधा हो तो उसे निकलवा देने में ही समझदारी है.

नी शेप क्लिनिक अभी महानगरों एवं बड़े शहरों तक ही सीमित है, लेकिन धीरेधीरे इन की लोकप्रियता अन्य जगहों पर भी बढ़ेगी. इसी के साथ एक विधि ‘कपिंग’ है. इस में किसी खोखली वस्तु (धातु के कप) को मसल्स पर रख कर उस की हवा निकाली जाती है. हवा निकलने से उस जगह पर वैक्यूम पैदा हो जाता है, जिस से वह उस जगह पर चिपक जाता है, इस से वहां खिंचाव शुरू हो जाता है और नए सैल्स बनने से वह जगह फैलनी शुरू हो जाती है. नाभि के पर्याप्त आकार लेते ही कप निकल जाता है. इस विधि में नाभि को जो आकार देना है उस आकार के कप का उपयोग किया जाता है.

इस तरह नाभि को आकर्षक रूप प्रदान किया जाता है

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पति, पत्नी और कंपनी

कंपनियों व फर्मों के पार्टनरों में विवाद होना आम बात है पर जब कंपनी पति पत्नी ने मिल कर शुरू की हो और विवाद हो जाए तो स्थिति गंभीर व रोचक दोनों हो जाती है. भू सिग्मा नाम की डेटा एनालिसिस करने वाली एक सफल कंपनी में पतिपत्नी धीरज राजाराम और अंबिगा राजाराम की 47 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. इस कंपनी की संपत्ति डेढ़ अरब रुपए आंकी जाती है. 71 साल से दोनों ने कंपनी को अपने खूनपसीने से सींचा था. पर अब पतिपत्नी विवाद भी है और कंपनी विवाद भी. पतिपत्नी विवादों में आमतौर पर घर, बैंक बैलेंस, गाडि़यां, जेवर आदि की गिनती की जाती है पर इस विवाद में दोनों की कंपनी भी शामिल है. कंपनी के शेष हिस्सेदार व खरीदार चिंतित हैं कि उन का क्या होगा.

पतिपत्नी मिल कर काम करें और फिर उन में विवाद हो जाए, इस पर अनूठी फिल्म ‘सौदागर’ बनी थी जिस में अमिताभ बच्चन ने गुड़ बेचने वाले का रोल निभाया था पर वह गुड़ बिकता इसलिए था क्योंकि उस में उस की पत्नी बनी नूतन की मेहनत थी. अमिताभ को एक लड़की पद्मा खन्ना भा जाती है और वह गुड़ बेच कर हुई कमाई से मेहर चुका कर पद्मा खन्ना से निकाह कर लेता है और नूतन को अकारण तलाक दे देता है. रोमांस तो ठीक पर जब गुड़ बनाने की बात आती है तो पद्मा खन्ना बुरी तरह फेल हो जाती है. पतिपत्नी संबंधों में अकसर दोनों भूल जाते हैं कि जीवन को सुखी बनाने में एकदूसरे का कितना साथ रहा था. जो पतिपत्नी लड़तेझगड़ते दिखते हैं, उन दोनों ने भी कितने ही काम खुशीखुशी किए होते हैं. जिन जोड़ों के पहले विवाह पूर्व प्रेम रहे हों या विवाह बाद प्रेमसंबंध बने हों, वे भी असल में एकदूसरे पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं. यदि वे अलग होते हैं तो आमतौर पर दोनों की मूर्खता के कारण.

5-7 साल एक छत के नीचे रहने व एक बिस्तर पर सोने के बाद संबंधों में खटास आनी ही नहीं चाहिए. एकाधिकार की भावना, एकदूसरे को नियंत्रित करने की कोशिश और हर समय मीनमेख निकालना आदि खटास के कारण हो सकते हैं. हालांकि उन की आवश्यकता होती ही नहीं है क्योंकि वैवाहिक जोड़े ‘जैसे हैं, वैसे हैं’ के आधार पर बनते हैं, ‘मेड टू और्डर’ पर नहीं. इन को फैक्टरी में भेज कर ठीक नहीं कराया जा सकता है

जहां बच्चों या पत्नी के साथ मिल कर बनाई कंपनी हो, वहां तो अलग होने की सोची भी नहीं जानी चाहिए. चाहे उन में से एक कितना ही गलत क्यों न हो. केवल हिंसा ही एक कारण हो सकती है संबंध तोड़ने का. अंबिगा और धीरज राजाराम को यह बात क्यों समझ नहीं आई, यह समझ से परे है.

स्टेडियम में लापरवाही और बदइंतजामी का खेल

बिहार में वर्ल्ड लैवल का अकेला मोइनुल हक स्टेडियम कबाड़खाना बन कर रह गया है. साल 1996 में भारत में हुए क्रिकेट वर्ल्ड कप का एक मैच इस स्टेडियम में खेला गया था. उस समय इस स्टेडियम को दोबारा चकाचक बनाया गया था, पर उस के बाद इस ओर झांकने की फुरसत किसी को नहीं है. पटना के राजेंद्र नगर इलाके में 30 एकड़ में बने इस स्टेडियम में 4 क्रिकेट पिच बनी हुई हैं. 2 पवेलियन और 4 ड्रैसिंग रूम हैं. इस की बाउंड्री 70 यार्ड की है. पिचों की हालत इतनी खराब है कि पता ही नहीं चलता है कि कहां पिच है और कहां आउटफील्ड है.

आउटफील्ड में उगी लंबीलंबी घास किसी खेत का भरम पैदा करती हैं. मैदान में चारों और चूहों ने अपने रहने के लिए बिल बना लिए हैं और दिनरात वहां चूहों की ‘घुड़दौड़’ होती रहती है. ड्रेनेज सिस्टम के फेल होने की वजह से मैदान झील में बदल जाता है, मानो नौका दौड़ प्रतियोगिता की तैयारी हुई हो. क्रिकेट वर्ल्ड कप के समय लगे इलैक्ट्रौनिक स्कोर बोर्ड का बस ढांचा बच गया है और पवेलियन की छत विकेट की गिल्ली की तरह उड़ गई है. कुरसियां रन आउट हो चुकी हैं. खेल महकमे के कुछ लोग बताते हैं कि खेल महकमे और राज्य खेल प्राधिकरण के अफसरों की आपसी खींचतान और लापरवाही की वजह से उन्होंने स्टेडियम का कबाड़ा कर के रख दिया है.

टैस्ट क्रिकेटर रह चुके सबा करीम कहते हैं कि पहले इस स्टेडियम में नए क्रिकेटर प्रैक्टिस कर के अपने खेल को निखारते थे, पर अब स्टेडियम की बदहाली की वजह से उन के लिए प्रैक्टिस करने की कोई और जगह नहीं है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी इस स्टेडियम को कभी गुलजार किया करते थे. तमाम सुविधाओं के बाद भी इस स्टेडियम की देखरेख सही तरीके से नहीं की गई, जिस का खमियाजा नए क्रिकेटर और क्रिकेट प्रेमी भुगत रहे हैं. इस स्टेडियम में कभीकभार लोकल टूर्नामैंट भी होते रहते हैं. टूर्नामैंट के आयोजकों और खिलाडि़यों को किसी भी तरह की सुविधा देने के नाम पर खेल महकमा अपने हाथ खड़े कर देता है, पर किराया वसूलने में जरा भी कोताही नहीं करता है. स्टेडियम का एक मुलाजिम बताता है कि स्कूल और कालेज के क्रिकेट टूर्नामैंट से किराए के नाम पर वसूली जाने वाली रकम से ही स्टेडियम की हालत काफी हद तक सुधारी जा सकती है, पर स्टेडियम की फिक्र किसे है?

13-14 साल पहले एक प्राइवेट फाइनैंस कंपनी ने पवेलियन को नए सिरे से बनाने के लिए माली मदद की थी और उस कंपनी के नाम पर पवेलियन का नाम भी रख दिया गया, लेकिन देखरेख का कोई ठोस इंतजाम नहीं होने से पवेलियन ‘रन आउट’ हो चुका है. क्रिकेटर राजेश राज कहते हैं कि अगर स्टेडियम को सही रखा जाए, तो इतने बड़े और इंटरनैशनल लैवल के स्टेडियम में प्रैक्टिस कर उन के जैसे कई खिलाड़ी अपने खेल को संवार और निखार सकते हैं, पर क्यूरेटर नहीं होने से पिच की मरम्मत और देखभाल नहीं हो पाती है. राज्य के खेल व युवा मामलों के मंत्री शिवचंद्र राम कहते हैं कि स्टेडियम की बदहाली की चिंता सरकार को है और उसे दुरुस्त करने की तैयारी चल रही है. जल्दी ही स्टेडियम को सभी सुविधाओं से लैस कर दिया जाएगा और उस के इंटरनैशनल रंगरूप को वापस लाया जाएगा. देखते हैं कि मंत्रीजी की इस दलील में कितना दम है.

चरागाह बना संजय गांधी स्टेडियम

पटना का दूसरा स्टेडियम है संजय गांधी स्टेडियम. यहां खिलाडि़यों के बजाय गायभैंस घूमती नजर आती हैं. यह खेल का मैदान कम जानवरों का चरागाह ज्यादा नजर आता है. साल 1980 में गर्दनीबाग इलाके में इस स्टेडियम को फुटबाल मैचों के आयोजन के लिए बनाया गया था, लेकिन सही रखरखाव नहीं होने की वजह से स्टेडियम के मैदान में बड़ेबड़े गड्ढे हो गए हैं और दर्शक स्टैंड की दीवारें ढह चुकी हैं. कभी चंद्रेश्वर प्रसाद, ललन दूबे, जयशंकर प्रसाद जैसे नैशनल लैवल के फुटबाल खिलाडि़यों के बेहतरीन खेल से रोशन हुआ यह स्टेडियम अब रात को अंधेरे में डूबा रहता है. अफसोस की बात है कि पिछले 10-12 सालों से यहां जिला लैवल का भी कोई मैच नहीं हो सका है.

अहंकारी

अभिजीत 2 दिनों से घर नहीं लौटा था. उस की मां सरला देवी कंपनी में पूछ आई थीं. अभिजीत 2 दिन पहले कंपनी में आया था, यह चपरासी ने सरला देवी को बताया था. अभिजीत 25 साल का अच्छी कदकाठी का नौजवान था. वह सेठ गोपालदास की कंपनी में पिछले 2 साल से बतौर क्लर्क काम कर रहा था. अभिजीत के परिवार में उस की मां सरला देवी के अलावा 2 बहनें थीं. 2 साल पहले अभिजीत के पिता की मौत हो चुकी थी. वे भी सेठ गोपालदास की कंपनी में काम करते थे. उन्हीं की जगह अभिजीत इस कंपनी में काम कर रहा था. अभिजीत के इस तरह गायब होने से सरला देवी और उन की दोनों बेटियां परेशान थीं. सरला देवी को उम्मीद थी कि सेठ गोपालदास ने उसे कंपनी के किसी काम से बाहर भेजा होगा, पर अब उन के द्वारा इनकार किए जाने पर सरला देवी की परेशानी और बढ़ गई थी.

सरला देवी ने अभिजीत को हर जगह तलाश किया, पर वह कहीं नहीं मिला. आखिर वह गया तो कहां गया, यह बात उस की मां को बेहद परेशान करने लगी. फिर उन्होंने कंपनी के सिक्योरिटी गार्ड से बात की. पहले तो उस ने इधरउधर की बात की, फिर बता दिया कि उस दिन कंपनी की छुट्टी का समय हो गया था. उस में काम करने वाले लोग जा चुके थे. अभिजीत अपने थोड़े बचे काम को तेजी से निबटा रहा था, ताकि समय से घर लौट सके. तभी सेठ गोपालदास की छोटी बेटी कामना कंपनी में आई. वह अभिजीत की टेबल के करीब आई और अपने हाथ टेबल पर टिका कर झुक गई. उस समय वह जींस और शर्ट पहने हुई थी, जो उस के भरेभरे जिस्म पर यों कसी हुई थीं कि उस के बदन की ऊंचाइयां और गहराइयां साफ दिख रही थीं.

अभिजीत अपने काम में मशगूल था. कामना ने उस का ध्यान खींचने के लिए अपना पैर धीरे से पटका. आवाज सुन कर अभिजीत ने नजरें उठा कर देखा तो बस देखता ही रह गया. कामना उस की टेबल पर हाथ टिकाए झुकी हुई थी, जिस से उस के भारी और दूधिया उभारों का ऊपरी हिस्सा शर्ट से झांक रहा था. वह गार्ड नौजवान था, पर समझदार भी था. उस ने सरला देवी को बताया कि उसे कामना का बरताव अजीब लगा था. वह कोने में खड़ा हो कर उन की बातें सुनने लगा. दफ्तर तो पूरा खाली ही था.  उन दोनों की बातचीत इस तरह थी:

‘कहां खो गए?’ कामना धीरे से बोली थी.

‘कहीं नहीं,’ अभिजीत ने बौखला कर अपनी नजरें उस के उभारों से हटा ली थीं. उस की बौखलाहट देख कर कामना के होंठों पर एक मादक मुसकान खिल उठी थी. वह अभिजीत के सजीले रूप को देखते हुए बोली थी, ‘क्यों, आज घर जाने का इरादा नहीं है?’

‘है तो…’ अभिजीत अपनेआप को संभालते हुए बोला था, ‘थोड़ा सा काम बाकी रह गया था, सोचा, पूरा कर लूं तो चलूं.’

‘काम का क्या है, वह तो होता ही रहेगा…’ कामना बोली थी, ‘पर इनसान को कभीकभी घूमनेफिरने का समय भी निकालना चाहिए.’

‘मैं समझा नहीं.’

‘मैं समझाती हूं…’ कामना अभिजीत की आंखों में झांकते हुए बोली थी, ‘अभिजीत, तुम्हें घर लौटने की जल्दी तो नहीं है न?’

‘कोई खास जल्दी नहीं…’ अभिजीत बोला था.

‘मैं आज मूड में हूं और अगर तुम्हें एतराज न हो, तो तुम मेरे साथ पापा के कमरे में चलो.’

‘पर मैं आप का मुलाजिम हूं और आप मेरे मालिक की बेटी.’

‘मैं इन बातों को नहीं मानती…’ कामना बोली थी, ‘मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं इनसान हूं और तुम भी. तुम मुझे अच्छे लगते हो. अब मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं या नहीं, तुम जानो.’

‘आप भी मुझे अच्छी लगती हैं…’ अभिजीत पलभर सोचने के बाद बोला था, ‘ठीक है.’ कामना अभिजीत को ले कर एक कमरे में पहुंचे. दफ्तर में अंधेरा था, पर दरवाजे में एक छेद भी था. गार्ड उसी से देखने लगा कि अंदर क्या हो रहा है.

उस गार्ड ने सरला देवी को बताया कि अभिजीत कामना की इस हरकत से परेशान लग रहा था.

‘अरे, तुम अभी तक खड़े ही हो?’ कामना बोली थी, ‘आराम से सोफे पर बैठो.’ अभिजीत आगे बढ़ कर कमरे में रखे गुदगुदे सोफे पर बैठ गया था. कामना आ कर उस के करीब बैठ गई थी और अभिजीत की आंखों में झांकते हुए बोली थी, ‘अभिजीत, तुम ने किसी से प्यार किया है?’ गार्ड सब सुन सकता था, क्योंकि पूरे दफ्तर में सन्नाटा था.

‘नहीं…’ अभिजीत बोला था, ‘कभी यह काम करने का मौका ही नहीं मिला.’

‘अगर मिला, तो क्या करोगे?’

अभिजीत चुप रहा था.

‘तुम ने जवाब नहीं दिया?’

‘हां, करूंगा’ वह बोला था.

‘आज मौका है और समय भी.’

‘पर लड़की?’

‘तुम्हारा मेरे बारे में क्या खयाल है?’ कहते हुए कामना ने अपनी शर्ट उतार दी. उस के ऐसा करते ही उस के उभार अभिजीत के सामने आ गए थे. उन को देखते ही अभिजीत के सब्र का बांध टूट गया था. जब कामना उस से लिपट गई, तो पलभर के लिए वह बौखलाया, फिर अपने हाथ कामना की पीठ पर कस दिए. इस के बाद तो अभिजीत सबकुछ भूल कर कामना की खूबसूरती की गहराइयों में उतरता चला गया. सरला देवी ने कामना के ड्राइवरसे भी पूछताछ की. उसे भी बहुतकुछ मालूम था. उस ने बताया कि पिछली सीट पर अकसर कामना मनमाने ढंग से उस का इस्तेमाल करने लगी थी. कामना का दिल जिस पर आ जाता, वह उसे अपने प्रेमजाल में फांसती, उस से अपना दिल बहलाती और जब दिल भर जाता, तो उसे अपनी जिंदगी से निकाल फेंकती.

ड्राइवर ने आगे बताया कि एक दिन उन दोनों में झगड़ा हुआ था. कामना का दिल उस से भर गया, तो वह उस से कन्नी काटने लगी. उस के इस रवैए से अभिजीत तिलमिला उठा. वह कामना से सच्चा प्यार करता था. जब कामना को पता चला तो वह बोली थी, ‘अपनी औकात देखी है तुम ने? तुम हमारी कंपनी में एक छोटे से मुलाजिम हो. मैं ब्राह्मण और तुम यादव. दूसरी जाति की लड़की को तुम प्यार कर पा रहे हो, क्या यह कम है. शादी की तो सोचना भी नहीं.’

‘पर तुम ने इसी मुलाजिम से दिल लगाया था?’

‘दिल नहीं लगाया था, बल्कि दिल बहलाया था. अब मेरा दिल तुम से भर गया है, इसलिए हमारे रास्ते अलग हैं.’

‘नहीं…’ अभिजीत तेज आवाज में बोला था, ‘तुम मुझे यों अपनी जिंदगी से नहीं निकाल सकती.’

‘और अगर निकाला तो?’

‘मैं सारी दुनिया को तुम्हारी हकीकत बता दूंगा.’ अभिजीत की बात सुन कर कामना पलभर को हड़बड़ाई, पर अगले ही पल उस की आंखों से गुस्सा टपकने लगा. वह अभिजीत को घूरते हुए बोली, ‘तुम ऐसा कर नहीं पाओगे. मैं तुम्हें ऐसा हरगिज करने नहीं दूंगी.’ यह बात सारा दफ्तर जानता था कि एक दिन अभिजीत से सेठ गोपालदास ने कठोर आवाज में सब के सामने बोला था, ‘तुम ने हमारी बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसाया और उस की इज्जत पर हाथ डाला. यह बात खुद कामना ने मुझे बताई है.

‘कोई मेरी बेटी के साथ ऐसी हरकत करे, मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकता. तुझे इस की सजा मिलेगी,’ इतना कहने के बाद सेठजी ने अपने आदमियों को इशारा किया था. सेठजी के आदमी अभिजीत को खींचते हुए दफ्तर से बाहर ले गए. इस के बाद अभिजीत को किसी ने नहीं देखा था. अभिजीत को गायब हुए जब 10 दिन बीत गए, तो सरला देवी समझ गईं कि अभिजीत मार दिया गया है. सरला देवी ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में लिखवा दी. सरला देवी अपने बेटे को ले कर यों परेशानी के दौर से गुजर रही थीं कि उन की मुलाकात अभिजीत के एक दोस्त से हुई, जो उसी के साथ काम करता था. उस ने सरला देवी को बताया कि अभिजीत को मारने में सेठ गोपालदास का हाथ है. सरला देवी ने अभिजीत के दोस्त को बताया कि कामना को सबक सिखाना है. कामना अपनी ऐयाशियों में डूबी हुई थी. अभिजीत की मौत से बेपरवाह कामना की नजरें एक दूसरे लड़के को ढूंढ़ रही थीं. उस ने रमेश को फांस लिया.

एक शाम जब कामना अपनी कार में लौंग ड्राइव पर निकली थी, तो रमेश उसे सरला देवी के घर ले गया. सरला देवी को देख कर कामना की घिग्घी बंध गई. वह सबकुछ उगल गई. रमेश ने उसे एक कुरसी से बांध दिया और कई घंटों तक तड़पने के लिए छोड़ दिया. इस के बाद कामना का पूरा बयान रेकौर्ड कर लिया. रात में जब सरला देवी ने उसे छोड़ा तो कहा, ‘‘जैसे मैं जिंदगीभर अभिजीत को याद करूंगी, वैसे ही तुम भी करना. यह टेप, यह बयान, हर बार तब काम आएंगे, जब तुम शादी करने की कोशिश करोगी.’’ कामना के पास कोई चारा नहीं बचा था. वह पैदल ही घर की ओर चल पड़ी, हारी और लुटी हुई.

दलित फूड्स डॉट कॉम

दलित चिंतक और लेखक चंद्रभान प्रसाद ने एक नया प्रयोग बाज़ार में दलित फूड्स पेश कर कर डाला है. क्या है दलित फूड्स और इसके कारोबार के पीछे चंद्रभान की मंशा क्या है इसके पहले एक नजर इतिहास पर डाली जाना मौजू है जो दलितों की खानपान संबंधी दुर्दशा का भी गवाह है. धार्मिक साहित्य पंडो ब्राह्मणों से भरा पड़ा है, जो दान में मिला स्वादिष्ट भोजन करते थे. यह मंहगा होने कारण पौष्टिक भी होता था. ब्राह्मणों को भोजन कराये जाने का विधान और उल्लेख जगह जगह है और यह भोजन खिचड़ी या दलिया नहीं, बल्कि 56 तरह के जायकेदार व्यंजन ही होना चाहिए, इसके निर्देश भी हैं गोया कि सादा खाना खिलाया तो मनोरथ पूरा नहीं होगा.

दलित समुदाय के लोग मोटे अनाज और दाल के अलावा सस्ती साग भाजी से गुजर करते थे (आज भी कमोबेश यही हालत ग्रामीण भारत में हैं) इसके बाद भी वे स्वस्थ हट्टे कट्टे और दीर्घायु होते थे, तो इसकी वजह उनका मेहनती होना थी. वक्त और हालत थोड़े बदले, जिन दलितों के पास पैसा आया, उन्होने ऊंची जाति वालों की तरह खाना शुरू कर दिया. इन्हे पंडों ने सामाजिक मान्यता भी दे दी और इनके यहां खाना भी शुरू कर दिया, क्योंकि पैसे वाला दलित ही उन्हे मेवे और देसी घी के व्यंजन खिला सकता था. पिछले 2 दशकों से धर्मगुरुओं और बाबाओं ने भी खानपान का कारोबार शुरू कर दिया, जिसकी शुरुआत आयुर्वेदिक नुस्खों और चूरण से हुई, फिर देखते ही देखते अचार, मुरब्बे, चटनियां और शरबतों के बाद मसाले कासमेटिक और सब कुछ वे बेचने लगे, सिवाय सेनेटरी नेपकिंस और हैयर रिमूवर के.

बाबा रामदेव तो अपनी कंपनी पतंजलि के जरिये सचमुच बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खून के आंसू रुला रहे हैं. इस पूरे खेल और धंधे में हुआ सिर्फ इतना कि दलित की खाने संबंधी झिझक और डर कम हो गए और वह भी मुख्य धारा में शामिल होकर अच्छा खाने और खिलाने लगा, हालांकि इससे न तो उसका दलित पना दूर हुआ और न ही भेदभाव खत्म हो गए. दलितों के लिए काफी कुछ उल्लेखनीय कर चुके चंद्रभान प्रसाद अब उनके लिए कुछ फूड प्रोडक्ट बेचने लगे हैं, जो हाल फिलहाल ऑनलाइन ही उपजब्ध हैं. दलित फूड्स डाट कॉम वैबसाइट पर इन्हे खरीदा जा सकता है. ये उत्पाद बहुत आम हैं मसलन आम का अचार, धनिया और मिर्ची पाउडर वगैरह, खास बात यह है कि ये देश के विभिन्न हिस्सों मे दलितों के खेतों में उगाये गए हैं.

महज इस बिना पर ये बिकेंगे, इसमे शक है, पर उत्साहित चंद्रभान कहते हैं कि साल 2008 मे उन्हे अमेरिकी यूनिवेर्सिटी की तरफ से दलितों की एक बस्ती मे रहने का मौका मिला था, वहां उन्होंने देखा कि कई दलित 90 और उससे ज्यादा की उम्र के हैं, जबकि दलितों की औसत उम्र आम भारतीयों से कम होती है. चन्द्रभान बताते हैं कि दलितों का रहवास गांव से बाहर होता है, उनके पास साधन भी कम होते हैं, इस के बाद भी उनकी लंबी उम्र एक अचरज वाली बात थी. दलित समुदाय आम तौर पर ज्वार बाजरे की रोटी खाता था. गेंहू की रोटी खाने पर उनका पेट खराब हो जाता था. अब दलितों का खाना हेल्दी डाइट के नाम पर डाइबिटीज़ और दिल की बीमारी के मरीज खा रहे हैं.

क्या भारतीय बाजार में दलित ठप्पे वाले उत्पाद चल पाएंगे, इस सवाल के जबाब मे चंद्रभान कहते हैं कि उनका मकसद ऐसे लोगों तक पहुंचना है जो दलितों का उत्थान चाहते हैं, उनके हुनर और काम को बढ़ाना चाहते हैं. इस मे भारतीय उद्योग परिसंघ ( सीआईआई ) उनकी मदद कर रहा है और 5 लाख की मामूली रकम से यह व्यवसाय शुरू किया गया है. रामदेव और रविशंकर का जिक्र करने पर वे तल्ख लहजे में कहते हैं इन लोगों का कारोबार बहुत बड़ा है. रामदेव की छवि तो ऐसी है कि वे गोबर की आइसक्रीम बनाएं, तो वह भी बिकेगी.

चंद्रभान का आइडिया कारगर होगा इसमे शक है. दलित ठप्पा तो इसकी अहम वजह है ही, लेकिन इस में भारतीय बाजार और खानपान की बदलती आदतों पर  ध्यान नहीं दिया गया है, जिस खानपान के बाबत सदियों तक दलितों को जायकेदार और सेहतमंद खाने से धर्म और जाति के नाम पर वंचित रखा गया उसे तोड़ने का जज्बा दलित फूड्स की अवधारणा में नजर नहीं आ रहा है. जहां यानि गांव देहातों मे दलित भेदभाव और ज्यादती का शिकार हैं, वहां ऑनलाइन बिक्री नहीं होती, बल्कि जाति के अभिशाप से मुक्ति पाने दलित भगवान से सीधे जुडने दान का वाउचर रिचार्ज कराते हैं. चंद्रभान जैसे दलित चिंतक पैसा कमाने के फेर में अगर अपने मकसद से भटकेंगे तो इसमें फायदा पंडे पुजारियों का ही है.

कैमरे के साथ ये गंदी हरकत करना चाहती हैं पूनम पांडे

इंटरनेट पर हमेशा सनसनी फैलाने वाली पूनम पांडे अपने फैंस को किसी ना किसी तरह झटका जरूर देती है. सैल्फी क्वीन पूनम ने हाल ही में अपनी बिकनी में तस्वीरें शेयर की है. जिसमें वह हमेशा की तरह हॉट लग रही है.

इसके साथ ही उन्होंने ट्वीट किया है, I just wanna have sex with the camera 😉 मतलब कि कैमरे के साथ सैक्स करना चाहती हैं. बता दें इससे पहले पूनम पांडे ने अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस के मौके पर अपने फैंस के लिए कुछ तस्वीरें पोस्ट भी की थी. पूनम पांडे पहले भी अपने फैंस को कई बार वीडियोज के जरिए योगा के टिप्स दे चुकी हैं.

आप भी देखिए पूनम की ये हॉट तस्वीरें…

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