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ग्लैमरस छवि को मुफीद मानती हैं शाल्मली खोल्गडे

बॉलीवुड सिंगर शाल्मली खोल्गडे के गाने हर पार्टी की शान बन गये हैं. ‘बेबी को बेस पंसद है’, और ‘बलम पिचकारी’  से गानों की गायिका के सबसे अधिक पार्टी सांग बजते हैं. शाल्मली खोल्गडे कहती हैं ‘अब गायकी का दौर बदल रहा है. गायकों का स्टेज पर एक अच्छा परर्फामर होना भी जरूरी होता है. गायक अब केवल फिल्मों में प्ले बैंक सिंगर भर नहीं रह गया है. यही वजह है कि अच्छे सिंगिग शो में गायक को परफार्मर की तरह से तराशा जाता है.

ऐसे में गायिका की ग्लैमरस छवि कैरियर को आगे बढ़ाने में अहम रोल रखती है. शाल्मली खोल्गडे स्टार प्लस के सिंगिंग रियल्टी शो ‘दिल है हिन्दुस्तानी’ में करण जौहर और शेखर के साथ जज की भूमिका में हैं. इस शो में देश के बाहर के गायक, बैंड और आर्केस्ट्रा भी हिस्सा ले रहे हैं. शाल्मली खोल्गडे गानों में वेस्टन म्यूजिक के हुनर पर नजर रखेंगी.

फिल्मी गायन, रियल्टी शो के साथ ही साथ शाल्मली खोल्गडे अपना एक नया म्यजिक वीडियो भी बना रही हैं. जिसको वह यूट्यब पर रिलीज करेंगी. इस गाने के जरीये वह नारी सशक्तीकरण के मुद्दे को आगे बढ़ायेंगी. मराठी मूल की शाल्मली खोल्गडे बहुत अच्छी हिंदी बोलती हैं. वह कहती हैं जब मैं फिल्मों में कैरियर की राह में आगे बढ़ी तो सबसे अधिक मेहनत हिंदी सीखने में करनी पड़ी. मैंने स्कूल के समय में हिन्दी विषय लिया था पर असल में हिन्दी मुझे बाद में ही आई.’

बैंगलुरू में नये साल के जश्न में लड़कियों से हुई छेड़छाड़ के मुद्दे पर शाल्मली खोल्गडे ने कहा कि ऐसे मामले अक्सर होते रहते हैं. इनको रोकने के लिये कानून के साथ ही साथ समाज को भी आगे आना होता है. अगर समाज के लोग आगे बढ़ कर इस तरह की घटना का विरोध करते तो उसको रोका जा सकता है. छोटे बड़े कपडों और गानों के बोल को जिम्मेदार ठहराने से सुधार नहीं आयेगा.

27 साल की शाल्मली खोल्गडे को एक्टिंग का शौक भी है. वह थियेटर आर्टिस्ट रही हैं. अभी उनका फोकस सिंगिंग पर है. वह अपनी संतुष्टि के लिये अपने मनपंसद गानों के सिंगल वीडियो भी निकालती रहेंगी. शाल्मली खोल्गडे कहती है ‘फिल्मों में हमें म्यूजिक डायरेक्टर की पंसद से गाना होता है. सिंगल वीडियों में मैं अपनी पंसद से गा सकती हूं. ऐसे में मुझे खुद को संतोष मिलता है.                   

ओमपुरी की वो बातें, जो आपने कभी नहीं पढ़ी होंगी

थिएटर से शुरूआत कर फिल्मों में अपनी एक अलग पहचान बनाते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले अभिनेता ओमपुरी हमेशा दर्शकों को एक अलग रंग में नजर आते रहे. बदले हुए समाज व बदले हुए सिनेमा के रूप व स्तर से ओम पुरी कभी खुश नहीं रहे. उन्होंने हर मसले पर हमेशा अपनी बेबाक राय रखी. मगर समय, समाज व सिनेमा के बदलाव के साथ उनके निजी जीवन व उनके व्यवहार में भी अप्रत्याशित बदलाव आता रहा.

मुझे याद है ओम पुरी ने बौलीवुड में जब अपना करियर शुरू किया था, उस वक्त वह बहुत सहृदय इंसान थे. वह मुंबई में बैंड स्टैंड के पास एक बंगले में एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. उस वक्त तक उन्हे फिल्म ‘आरोहण’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के साथ ही फिल्म ‘‘अर्धसत्य’’ में उनके अभिनय की काफी तारीफें होने लगी थीं. फिल्म ‘‘अर्धसत्य’’ के उनके अनंत वेलनकर के किरदार की हर कोई प्रशंसा कर रहा था. जब मैं उनके पास बैठा हुआ था, उसी वक्त खबर मिली थी कि उन्हें फिल्म ‘‘अर्धसत्य’’ के लिए दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया है. उस वक्त ओम पुरी ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा था, ‘‘मैं तो कलाकार हूं. कला की सेवा करने आया हूं. यह पुरस्कार तो मेरी जिम्मेदारी में इजाफा कर रहे हैं.’’ मगर 2005 के बाद ओम पुरी के अंदर एक गुस्सैल इंसान ने जगह ले ली थी.

राष्ट्रीय पुरस्कार की खबर सुनकर ओम पुरी को बधाई देने के लिए धीरे धीरे कई निर्माता निर्देशकों का वहां जमावड़ा लग गया था. (वास्तव में यह 1983 की बात है. जब मोबाइल फोन थे नहीं और न ही हर किसी के घर या आफिस में फोन हुआ करता था. आज के जमाने में शायद लोग मोबाइल फोन पर ही बधाई देकर चुप बैठ जाते.) बहरहाल, उस वक्त वहां इकट्ठा हुए फिल्मकार यही कह रहे थे कि ओमपुरी जी अभिनय को नित नए आयाम देते जा रहे हैं और यह सिलसिला कहां जाकर ठहरेगा, कोई नहीं कह सकता. लेकिन जैसे ही कला सिनेमा मृत प्राय हुआ और ‘कला सिनेमा’ की बदौलत कमायी गयी शोहरत के बल पर ओम पुरी मुंबईया मसाला फिल्मों का हिस्सा बने, वैसे ही उनकी प्रतिभा धूमिल होती चली गयी. उनके बोल बदलते चले गए. जनवरी 2012 में ओम पुरी ने हमसे कहा था-‘‘मैं तो जिंदगी जीने के लिए कमर्शियल फिल्में कर रहा हूं.’’

हकीकत यही है कि 2004 के बाद ओम पुरी कमर्शियल मसाला फिल्मों में काफी छोटे छोटे किरदार निभाने लगे थे. इस पर उन्होंने हमसे कहा था-‘‘सच कहूं तो पैसे के लिए कई फिल्में कर रहा हूं. मैं अपने करियर की शुरूआत में बहुत अच्छा काम कर चुका हूं. अब बुढ़ापे के लिए, बच्चे की परवरिश के लिए, बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए, बीमार होने पर दवा के लिए धन चाहिए. उसी धन के लिए मैं तमाम ऐसी फिल्में कर रहा हूं. सीधे सपाट शब्दों में कहूं तो जिंदगी जीने के लिए कमर्शियल फिल्में कर रहा हूं.’’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए ओम पुरी ने कहा था-‘‘मैंने 2003 में फिल्म ‘धूप’ की थी. जिसमें मैने उस चरित्र को निभाया था, जो कि फिल्म का मुख्य प्रोटोगानिस्ट था. मगर बौलीवुड में ज्यादातर फिल्में ‘हीरो’ आधारित होती हैं, चरित्र आधारित नहीं. जब चरित्र आधारित फिल्में बनती हैं, तो वह मुझे ज्यादा पसंद आती हैं. कुछ चरित्र आधारित फिल्में बन रही हैं, पर उनमे ‘हीरो’ रहे कलाकार ही चरित्र निभाने लगे हैं. तो फिर हमें कौन याद करने वाला है.’’

ओम पुरी पर 2000 के बाद आरोप लगने लगे थे कि वह अपने समकक्ष नसिरूद्दीन शाह जैसे कलाकारों की तरह अपने अभिनय, अपनी कार्यशैली व अपने किरदारों में बदलाव नही ला पाए. इस पर उनका हमेशा एक ही रोना रहा कि उन्हे प्रियदर्शन की फिल्म ‘मेरे बाप पहले आप’ के बाद अच्छे किरदार नहीं मिले.

इतना ही नही जब उन्होंने अति घटिया फिल्म ‘‘टेंशन मत ले यार’’ स्वीकार की थी, तब ओम पुरी ने अपनी खीझ मिटाते हुए दर्शकों को सलाह देते हुए कहा था-‘‘मैं दर्शकों की या प्रशंसकों की परवाह कब तक करूं? कितने दिन व कितने माह तक अच्छे किरदार के आफर का इंतजार करते हुए घर पर खाली बैठा रहूं? पूरे तीन माह तक घर पर खाली बैठे रहने के बाद मैंने  फिल्म ‘टेंशन मत ले यार’ साइन की है. मैं हर दर्शक से यही कहना चाहूंगा कि हमें कभी भी करोड़ों रूपए नहीं मिले. मुझे फिल्म ‘आक्रोश’ के लिए 9 हजार, ‘जाने भी दो यारों’ के लिए 5 हजार रूपए मिले थे. फिल्म ‘आराहेण’ के लिए मैने पूरे दो माह तक शूटिंग की थी. जिसके लिए मुझे सिर्फ दस हजार रूपए मिले थे. तो भइया आजीविका के लिए व्यावसायिक फिल्में करनी ही पड़ेगी. वैसे भी अब कला फिल्में बनती नहीं हैं. व्यावसायिक फिल्मों में से ही कुछ चुनिंदा फिल्में करनी पड़ रही हैं. जिन हीरो को जिन कलाकारों को करोड़ों रूपए मिल रहे हैं, उनसे कहो कि वह घटिया काम करना बंद करें. ’’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए ओम पुरी ने कहा था-‘‘आजकल स्टार कलाकार भी कला फिल्में कर रहा है. क्योंकि उन्हें भी अलग तरह की लोकप्रियता चाहिए. तो जब कला फिल्म में शाहरुख खान या अमिताभ बच्चन काम करने के लिए तैयार हों, तो हमें कौन पूछेगा? एक वक्त था जब हम शिखर पर थे. पर अब हम ढलते सूरज हैं. इस सच को मानने से क्यों इंकार किया जाए? मुझे अच्छी तरह से याद हैं कि मैं और नसिरूद्दीन शाह एसेल स्टूडियो में एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. हम दोनों इंस्पेक्टर बने थे. हमने सामने देखा कि भीड़ में भारत भूषण जी बैठे हैं. सीन खत्म होने के बाद हम दोनों आश्चर्य के साथ उनके पास गए. तो उन्होंने भी यही बात कही थी कि ‘अब हम ढलते सूरज हैं.’’

इतना ही नहीं ओम पुरी ने फिल्मकारों को कोसते हुए कहा था-‘‘कितनी दुःखद स्थिति है कि हमारे यहां ‘शीला की जवानी..’ और ‘मुन्नी बदनाम हुई..’ जैसे गाने बन रहे हैं. मैं फिल्मकारों की इस बात से सहमत नही हूं कि वह दर्शकों की पसंद के अनुसार ही चीजें दे रहे हैं. सच यह हैं कि हमारे फिल्मकार व्यावसायिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते चले जा रहे हैं. उन्हें खुद इस बात का अहसास ही नही हैं कि दर्शक क्या चाहता है? इसी वजह से फिल्मों की असफलता की संख्या ज्यादा बढ़ी हैं. इसके अलावा साठ व सत्तर के दशक में कलात्मक और व्यावसायिक सिनेमा की स्थिति अच्छी थी. उन दिनों कई जानरों की फिल्में एक साथ बना करती थीं. तब विविधता वाला सिनेमा दर्शकों को देखने को मिलता था, पर अब वह भी नहीं रह गया. भारतीय सिनेमा मौलिकता से भटक गया है. भारतीय फिल्मकार व कलाकार साहित्य से दूर हो गए हैं. हमारे फिल्मकार व कलाकार अब विदेशी नकल करने पर उतारू हो गए हैं. इतना ही नही कारपोरेट जगत ने भी सिनेमा को बर्बाद किया है.’’

आमिर खान निर्मित फिल्म ‘‘दिल्ली बेले’’ की आलोचना और इसे कभी न देखने की चर्चा करते हुए ओम पुरी ने हमसे कहा था-‘‘यथार्थ के नाम पर समाज की बुराइयों को परदे पर दिखाना गलत है. सिनेमा का अर्थ होता है कि वह समाज को उसका आइना दिखाते हुए चीजें इस तरह से पेश करें कि समाज से बुराइयां दूर हो ना कि समाज की बुराइयों को ग्लोरीफाय किया जाए. मैंने तो आमिर खान की फिल्म ‘दिल्ली बेले’ नहीं देखी. उसने इस फिल्म में काफी गालियां भर दी है, जो कि गलत हैं. मैं आमिर खान की फिल्म ‘दिल्ली बेले’ देखने के लिए पैसे नहीं खर्च करुंगा. मैं ‘दिल्ली बेले’ की डीवीडी के लिए भी पैसे खर्च नहीं करूंगा. मेरी समझ में नही आ रहा है कि हमारे सेंसर बोर्ड को क्या हो गया है. वह क्या कर रहा हैं. क्या सेंसर बोर्ड कुछ बड़े नामों पर आखें बंद कर लेता है.’’

इतना ही नहीं ओम पुरी की कथनी व करनी में काफी विरोधाभास रहा है. वह हमेशा रीमेक फिल्मों का विरोध करते रहे. जबकि खुद उन्होंने ‘अग्निपथ’ के रीमेक में काम किया था. इस पर जब उनसे सवाल किया गया था, तो काफी गुस्से में उन्होंने कहा था-‘‘मैंने कोई गुनाह तो नहीं किया. सिनेमा की जो स्थिति है और मैं जहां हूं, वहां जिस ढंग का काम मिलेगा, करना ही पडे़गा. मैंने पहले ही कहा कि जिंदा रहने के लिए कुछ काम करने पड़ते हैं. वैसे भी मैं फिल्में बहुत कम देखता हूं. पिछले दस साल से मैं किसी फिल्म के प्रीमियर पर नही गया. क्योंकि प्रीमियर में फिल्में रात में दस बजे शुरू होती हैं और रात दो बजे खत्म होती है. इससे दूसरा दिन बर्बाद हो जाता है. मैंने पुरानी ‘अग्निपथ’ तो देखी थी,प र मैंने यह ‘अग्निपथ’ नहीं देखी, जिसमें मैंने भी अभिनय किया है.’’

इस पर जब हमने उनसे पूछा था कि  फिर वह रीमेक फिल्मों का विरोध क्यों करते हैं, तो ओम पुरी ने कहा था-‘‘फिल्मों का रीमेक करना गलत बात नहीं है. लेकिन रीमेक का अर्थ यह होता हैं कि पहले जो फिल्म बनी है, उससे बेहतर बनाएं. वैसे हमारे यहां रीमेक बहुत कम हुए हैं और जो हुए हैं, वह स्तरीय नहीं रहे. इसीलिए अब रीमेक को लेकर सवाल उठ रहे हैं. अन्यथा शेक्सपियर के नाटक पर आधारित नाटकों व फिल्मों को पूरे विश्व में कई बार बनाया गया और हर बार वह सफल रहे.’’

इसी तरह ओम पुरी जिन किरदारों को निभाते थे, उनके साथ अपनी असहमित की बात भी कहने से चूकते नहीं थे. उन्होने गोविंद निहलानी के साथ भी काम किया था. पर वह हमेशा गोविंद निहलानी निर्देशित फिल्म ‘‘देव’’ के अपने किरदार के साथ असहमत होने का रोना भी रोते रहे. एक खास मुलाकात के दौरान ओम पुरी ने अपनी फिल्मों की चर्चा करते हुए कहा था-‘‘ तमस, आरोहण, आक्रोश, अर्द्धसत्य जैसी फिल्मों को लोग हमेशा याद रखेंगे. फिल्म ‘देव’ भी अच्छी बनी थी, पर फिल्म ‘देव’ के अपने किरदार से मैं सहमत नहीं था.’’

ओम पुरी भी उन कलाकारों में से रहे हैं, जिन्होंने फिल्मों से निराश होने के बाद दुबारा थिएटर की तरफ रूख नहीं किया था. इस पर उन्होंने कहा था-‘‘मैंने थिएटर से शुरूआत की थी. जब मैं फिल्मों से जुड़ा, तो मैं थिएटर की ही संजीदगी को फिल्मों में ले आया. इसलिए अच्छी फिल्में करते समय मुझे थिएटर न करने का कोई गम या दुख नहीं हुआ. मैंने ज्यादातर उन्ही फिल्मों में अभिनय किया, जो कि हमारी जिंदगी की बात करती हैं. मैने फिल्मों से भी अपने मन की ही बात पहुंचाने का प्रयास किया.’’

2012 के बाद तो वह अपने करियर से काफी निराश हो गए थे. और एक मुलाकात में उन्होंने हमसे कहा था-‘‘ख्वाहिश रखने से क्या फायदा? यहां ख्वाहिश पूरी होती नहीं. बौलीवुड में सिनेमा फार्मूला के आधार पर बनता है. आजकल के हीरो खुद ही चरित्र प्रधान किरदार निभाने लगे हैं. जीतेंद्र जब तक हीरो रहे, तब तक फिल्मों में अभिनय करते रहे. उसके बाद उन्होंने चरित्र नहीं निभाए. पर दूसरे हीरो के साथ ऐसा नही हैं. अब ऋषि कपूर को देखिए, वह भी चरित्र अभिनेता बन गए हैं. हमें इन हीरो के चरित्र कलाकार बन जाने पर एतराज नही हैं. एतराज इस बात पर हैं कि सिनेमा अच्छा नहीं बन रहा हैं. मैं पटकथा, किरदार और धन इन तीनों बातों पर गौर करने के बाद ही फिल्म स्वीकार करता हूं. मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मैंने कुछ फिल्में महज धन के लिए की. अब तो मैं बेहतरीन काम ही करना चाहता हूं. दूसरी बात अब मेरी उम्र साठ वर्ष हो गयी है. इस कारण भी सुस्त हो गया हूं. कम फिल्में कर रहा हूं. मैं तो अमिताभ बच्चन की एनर्जी का प्रशंसक हूं. वह मुझसे उम्र में काफी बड़े हैं और मुझसे कहीं अधिक काम कर रहे हैं.’’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए ओम पुरी ने कहा था-‘‘मेरी इच्छाएं तो बहुत होती हैं. मुझे तो सेंसिबल कामेडी वाली फिल्में भी बहुत पसंद आती हैं. देखिए, मैं खुद को एक वर्सेटाइल कलाकार मानता हूं. मैंने हमेशा अलग अलग तरह के किरदार निभाए हैं. मैंने खुद को हीरो या विलेन में नहीं बांधा. मैंने हीरो, नकारात्मक, कामेडी, हर तरह के किरदार निभाए हैं और हर तरह के किरदारों में दर्शकों ने मुझे हमेशा पसंद भी किया है. वास्तव में मैं हमेशा अपने चरित्र के साथ परदे पर न्याय करने का प्रयास करता हूं. मैं चरित्रों को इस तरह निभाता हूं कि दर्शक को वह उनके बीच का पात्र लगता है. इसकी मूल वजह यह है कि मैं तो प्रकृति व लोगो से प्रेरणा लेता हूं. मैं हमेशा अपनी आंख व कान खुले रखता हूं. हर क्षण मैं आब्जर्व करता रहता हूं.’’

ओम पुरी का ज्योतिष में यकीन नहीं था. वह कहा करते थे-‘‘मै ज्योतिष या अंकशास्त्र में यकीन नहीं रखता. पर यह सच है कि हमारी फिल्मों के निर्माता अपनी फिल्मों के नाम अंकशास्त्र व ज्योतिष का सहारा लेकर ही रखते हैं. ‘बाबर’ भी उसी तरह से रखा गया नाम है.’’

जहां तक ओम पुरी के निजी जीवन का सवाल है, तो ओम पुरी का निजी जीवन भी उनके करियर की ही तरह हिचकोले लेते रहा है. शायद करियर का उतार चढ़ाव उनके निजी जीवन को संचालित करता रहा. जब वह एक संघर्षरत व कलात्मक सिनेमा के कलकार थे, तब उन्होंने अभिनेता अनु कपूर की बहन सीमा कपूर के संग विवाह किया था. पर सफलता के शिखर पर पहुंचते ही 1991 में ओम पुरी ने सीमा कपूर से संबंध खत्म कर लिए थे. उसके बाद 1993 मे उन्होंने पत्रकार व लेखक नंदिता पुरी से विवाह किया था, जिनसे उनका बेटा इशान पुरी है. मगर नंदिता पुरी से भी चार साल पहले 2013 मे ओम पुरी का तलाक हो गया था. पर कुछ माह पहले उन्होंने लखनऊ में अपनी पहली पत्नी सीमा कपूर के निर्देशन में फिल्म ‘‘कबाड़ी’’ में अभिनय किया था. ओम पुरी के करीबी और पारिवारिक दोस्तों में सनी देओल आते हैं.ज बकि अभिनेता सुरेंद्र पाल उन्हे अपना गुरू मानते हैं.

ओम पुरी की दूसरी पत्नी नंदिता पुरी ने 2011 में ओम पुरी की बायोग्राफी लिखी थी. लेकिन बाद में नंदिता पुरी ने ही ओम पुरी पर घरेलू हिंसा के गंभीर आरोप लगाये थे. पिछले कुछ वर्षों से ओम पुरी शराब का काफी सेवन करने लगे थे. शायद करियर व निजी जिंदगी में लगातार विफलता के चलते उन्हे शराब की लत लगी हो. 

1 मिनट में होगी आपके फोन की ‘बैटरी फुल’

स्मार्टफोन चार्ज करना एक बड़ी समस्या है. हमें कई बार जल्दबाजी में कहीं निकलना पड़ता है और तब अगर हमारा स्मार्टफोन डिस्चार्ज मिले तो हमें चिढ़ होती है. कई बार हम स्मार्टफोन चार्ज करने के चक्कर में लेट हो जाते हैं. पर अब आपको अपने स्मार्टफोन की बैटरी चार्ज करने के लिए उसे घंटों चार्जर में लगाकर नहीं रखना पडेगा. वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे आप कुछ ही सेकेंड में अपना फोन चार्ज कर सकते हैं.

फोन की बैटरी को बेहतर बनाने के लिए दुनिया भर के शोधकर्ता नई तकनीक पर काम कर रहे हैं. इसी के चलते हाल ही में यूसीएफ (यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा) के शोधकर्ताओं ने नई फ्लेक्सिबल सुपरकैपासिटर तकनीक विकसित की है. यह तकनीक बैटरी में न सिर्फ पहले से ज्यादा ऊर्जा को सेव करने में मदद करेगी बल्कि चंद सेकंड्स में ही उसे पूरी तरह से चार्ज भी कर देगी.

शोधकर्ताओं ने फ्लेक्सिबल सुपरकैपासिटर्स की लेयर्स को tungsten disulfide और tungsten trisulfide तकनीक से बनाया है. यह रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली को सेव करने में मदद करती है. इस तकनीक से स्मार्टफोन बैटरी को 30,000 बार चार्ज किया जा सकेगा. जब कि मौजूदा तकनीक से बनी लिथियम आयन बैटरियों को ज्यादा से ज्यादा 1500 बार ही चार्ज किया जा सकता है.

वैज्ञानिकों का कहना है इस नई तकनीक से स्मार्टफोन की बैटरी एक बार चार्ज करने के बाद एक सप्ताह तक उसे दोबारा चार्ज करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसके अलावा बैटरी के प्रदर्शन और उसकी क्षमता में भी सुधार होगा.

 

तीन तलाक का राजनीतिकरण

ट्रिपल तलाक यानी 3 बार तलाक, तलाक, तलाक कहने पर कोई भी मुसलिम पति अपनी मुसलिम पत्नी को तलाक दे सकता है. यह कानून इसलामी शरीयत की देन है और सदियों से चला आ रहा है पर आजकल चर्चित है क्योंकि कुछ मुसलिम औरतें इस पर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं जहां आमतौर पर हिंदू समाज में सुधारों का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी उस का समर्थन कर रही है और इसे अमानवीय, बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ मान रही है.

देखा जाए तो यह सिस्टम बहुत अच्छा है. होना तो यह चाहिए कि यह हिंदू कानून में भी शामिल हो जाए और औरतों को भी हक मिल जाए. शादी करूंगी, शादी करूंगी, शादी करूंगी कहने से जब शादी हो जाती है और बाद में कुछ प्रक्रिया के बाद कानून इसे मान भी लेता है तो तलाक, तलाक, तलाक कहने पर शादी क्यों न तोड़ दी जाए?

देशभर की अदालतों में सैकड़ों मामले औरतों के तलाक मांगने के पड़े हैं. जब पतिपत्नी में से कोई भी अदालत पहुंच जाए तो पक्का है कि शादी तो नहीं चलेगी. फिर कानून की, बंदूक की नाल के सहारे उन्हें पतिपत्नी क्यों माना जाए? यह तो गैंगरेप की तरह गैंगबंधन है जिस में दोनों के मातापिता, बच्चे, कानून व्यवस्था जम कर पतिपत्नी का शोषण करते हैं कि एक बार शादी करूंगा क्या कह दिया कि अब जब तक हलाल न हो जाए, शादी टूटेगी ही नहीं.

अगर तीन तलाक सब धर्मों और पतिपत्नी दोनों पर लागू हो जाए तो न इसलामी कट्टरपंथी कुछ कह सकेंगे न इस मामले का राजनीतिकरण होगा. अब तो राजनीति पतिपत्नी के बीच तीसरा बन कर जम गई है और दोनों का शोषण कर रही है.

विवाह कोई नैसर्गिक, प्राकृतिक या आवश्यक प्रक्रिया नहीं है. मानव इतिहास को एक दिन का गिना जाए तो पता चलेगा कि धर्मजनित विवाह की परंपरा तो केवल कुछ मिनटों पहले शुरू हुई होगी. आज विवाह टूट इसलिए रहे हैं क्योंकि बीच के 2,000 वर्षों में भारतीयों ने धर्म के सहारे औरतों को गुलाम बना कर रखने में सफलता पा ली थी. आज औरत आजादी और अपना वजूद चाहती है, बराबरी चाहती है, इसलिए ट्रिपल तलाक का विरोध कर रही है.

उसे बराबरी का स्तर चाहिए. सरकार, कानून, समाज उसे मन मार कर कुछ करने को मजबूर न करें. उस पर न अत्याचार हों न उसे सामूहिक सामाजिक रेप का शिकार बनना पड़े. तलाक सरल हो, चाहे कोई भी धर्म हो और यह प्रक्रिया औरतोंआदमियों दोनों के लिए आसान हो.   

अब बिना तार के चार्ज होगा आपका फोन

नवीनतम प्रौद्योगिकी के जरिए बिना तार के किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को चार्ज किया जा सकेगा. इससे ऐसे उपकरण भी चार्ज हो सकेंगे, जिसमें वायरलैस चार्जिंग की सुविधा नहीं दी गई है. इस तरह यह एप्पल के आईफोन और आईपैड को भी चार्ज करने में कारगर होगा.

वायरलेस चार्जर को फ्रांस के स्टार्ट-अप ने विकसित किया है. इसका नाम ‘एनर्जीर्स्क्वेयर’ है. इसे लॉस वेगास में सीईएस व्यापार शो के दौरान सीएनईटी ने भी देखा.

कैसे काम करता है एनर्जीर्स्क्वेयर

एनर्जीर्स्क्वेयर में एक चार्जिंग पैड और एक स्टीकर है, जिसे एक उपकरण के पीछे लगाया जाता है. स्टीकर माइक्रो-यूएसबी, यूएसबी-सी या लाइटिंनिंग के साथ दो इलेक्ट्रोड को समर्थन देता है, जिससे उपकरण चार्जिंग पोर्ट से जुड़ा होता है. एक बार उपकरण के पैड पर रखे जाने के बाद चार्जिंग शुरू हो जाती है.

यह है कमी

स्टीकर की एक रुकावट यह है कि यह उपकरण की चार्जिंग पोर्ट को अवरुद्ध कर देता है और यदि आप उपकरण को सामान्य तरीके से चार्ज करना चाहते हैं तो स्टीकर को हटाने की जरूरत होती है. कंपनी ने इस दोष को स्वीकार किया है और वादा किया कि उन्नत संस्करण में इसके पीछे तरफ एक पोर्ट शामिल होगा.

एनर्जीर्स्क्वेयर की कीमत 89 डॉलर है, इसमें एक चार्जिंग पैड और पांच स्टीकर शामिल हैं.

कभी कभी आत्मविश्वास डगमगाता है : आदित्य रॉय कपूर

चैनल ‘‘वी’’ पर वीजे के रूप में काम करने के बाद फिल्म ‘‘लंदन ड्रीम्स’’ से अभिनय की तरफ मुड़ने वाले आदित्य रॉय कपूर की जोड़ी श्रद्धा कपूर के साथ काफी पसंद की गयी. वैसे तो वह दूसरी अभिनेत्रियों के संग भी फिल्में करते रहते हैं. मगर आदित्य रॉय कपूर की गत वर्ष कटरीना कैफ के संग वाली फिल्म ‘‘फितूर’’ असफल रही. परदे पर इनकी जोड़ी जमी नहीं. पर अब एक बार फिर आदित्य रॉय कपूर ने श्रद्धा कपूर के साथ फिल्म ‘‘ओ के जानू’’ की है. जिसमें वर्तमान युवा पीढ़ी के करियर व प्यार या शादी को लेकर जो अंर्तद्वंद चलता रहता है, उसका चित्रण है.

चैनल के वीजे से लेकर फिल्म ‘‘ओ के जानू’’ तक के अपने करियर को किस रूप में देखते हैं?

– अरे सर! मैं क्या बताऊं. आप खुद शुरू से मेरा करियर देखते आए हैं. मुझसे ज्यादा आप मेरे करियर का आकलन कर सकते हैं. जहां तक मेरा अपना सवाल है, मैं पीछे मुड़कर देखने में यकीन नहीं करता. सच कहूं तो मैं अपने करियर को लेकर कुछ ज्यादा सोचता नही हूं. मैं यह कभी नहीं सोचता कि कहां क्या बदलाव आया, किस तरह से मेरा एटीट्यूड बदल गया. मेरे करियर, मेरी जिंदगी में सब कुछ होता जा रहा है.

मगर सफलता मिलते मिलते अचानक जब फिल्म असफल हो जाती है. तब क्या होता है?

– सफलता पाने के बाद जब असफलता मिलती है, तो तकलीफ ज्यादा देती है. ‘आशिकी 2’ को जबरदस्त सफलता मिली. उसके बाद मेरी दो फिल्में ठीक ठाक नहीं चली. पर मैं अपने आपको बचाने में सफल हो गया. क्योंकि ‘आशिकी 2’ की सफलता के बाद भी मैं जमीन पर ही था. हवा में नहीं उड़ रहा था. अपने आपको स्टार नहीं माना था.

हां! आपकी कोई फिल्म या आपका कोई प्रोजेक्ट असफल होता है, उस वक्त बहुत कुछ आपके अपने नजरिए पर निर्भर करता है. मेरा मानना है कि आपको लेकर लोगों का नजरिया बदलने दो, पर आप खुद अपने नजरिए को ना बदलें. यदि आपने लोगों के बदलते नजरिए के साथ साथ अपने अंदर का आत्मविश्वास खो दिया, तो सब गड़बड़ हो जाएगा. यदि आपने लोगों के बदलते नजरिए पर, लोगों की बातों पर ध्यान देना शुरू किया, तब तो आप गए काम से. इसलिए इंसान के अंदर धैर्य होना चाहिए. सफलता असफलता हर किसी के साथ आती है. इससे कोई बच नहीं सकता.

वह कौन सा मोड़ था, जब आपका अपना आत्मविश्वास डगमगाया था?

– मैं यह नहीं कहता कि मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. कभी कभी हमारा अपना आत्मविश्वास डगमगाता है. पर मेरे साथ ऐसा बहुत कम समय के लिए हुआ है. ऐसा लोगों की बातें सुनने की वजह से मेरे साथ कभी नहीं हुआ. मैं लोगों की बातें सुनकर अपनी प्रतिभा, अपने निर्णय, अपने काम पर शक नहीं करता. लेकिन हम भी इंसान हैं. हम खुद ही कई बार अपने काम या अपने निर्णय को लेकर खुद से सवाल करते हैं? जब फिल्म असफल होती है, तब भी हम इस तरह के सवाल अपने आप से करते ही हैं?ह र इंसान यह जानने की कोशिश करता है कि मेरा अपना निर्णय कहीं गलत तो नहीं हुआ? तो उस वक्त विश्वास डगमगाता है. मगर उसी वक्त आपका अपना धैर्य काम आता है.

सब कुछ आपकी तकदीर पर निर्भर करता है. यदि आपका समय अच्छा नहीं है, तो गड़बड़ी होनी ही है. यदि समय अच्छा हो तो आपको खुद ब खुद उसी तरह के रास्ते मिलते जाते हैं. कई बार समय के अनुसार ही आपके अपने विचार, आपकी सोच बदलती है. पर समय अच्छा नहीं है, तो आप चाहें जितनी लड़ाई लड़ लें, चाहें जितना परिश्रम कर लें, चाहे जितनी हायतौबा मचा लें, कुछ फायदा नहीं निकलना है. पर समय अच्छा आएगा, तो आपको आगे बढ़ने से रोकने की हिम्मत किसी में नहीं है. आपकी तकदीर ,आपका हक कोई छीन नहीं सकता.

फिल्म ‘‘ओ के जानू’’ तो तमिल की सफलतम फिल्म ‘‘कधाल कंमनी’’ का हिंदी रीमेक है. इसका आप पर कितना दबाव रहा?

– दबाव इस बात का जरूर रहता है कि क्या हम मौलिक फिल्म के अनुरूप परफार्मेस दे पाएंगे? सफल फिल्म के रीमेक करते समय लोगों की बढ़ी हुई अपेक्षाओं पर खतरा उतरने का दबाव होना स्वाभाविक है. मगर कलाकार के तौर पर मैं कोई भी दबाव सेट पर लेकर नही जाता. 

फिल्म ‘‘ओ के जानू’’ भी रोमांटिक फिल्म है?

-जी हां! यह भी रोमांटिक फिल्म है. यह दक्षिण भारत की तमिल भाषा की फिल्म ‘‘ओ कधाल कंमनी’’ का रीमेक है. इसमें मेरी जोड़ी श्रद्धा कपूर के साथ है. इस फिल्म में वर्तमान समय की युवा पीढ़ी की करियर व प्यार को लेकर सोच व मानसिकता को लेकर कुछ बातें की गई हैं. या यूं कहें कि युवा पीढ़ी करियर व प्यार को लेकर जिस अंर्तद्वंद से गुजर रही है, उसका चित्रण है.

करियर और प्यार को लेकर आपकी अपनी सोच क्या है?

– मेरी राय में हर युवक को इन दोनों चीजों को एक साथ लेकर चलना चाहिए. अब समय बदल चुका है. मैंने देखा है कि तमाम पति पत्नी नौकरी करते हुए अपने बच्चों को पालते हैं. दोनों एक दूसरे के लिए रूकावट नहीं बनते. दोनों चीजें एक साथ एकढर्रे पर चल सकती हैं. मगर हर इंसान के लिए इसकी अलग अलग प्राथमिकताएं होती हैं. मगर शादी करने से पहले लड़का हो या लड़की दोनों इस बात पर सोचते हैं कि यदि शादी के बाद वह अपने करियर को नहीं बना पाए तो? इसी के चलते जल्दी जल्दी कमिटमेंट नहीं करते हैं. लोग सोचते हैं कि यदि मैंने रिश्ते या शादी के लिए हामी भर दी, तो मैं अपने करियर, अपने काम में सौ प्रतिशत नहीं दे पाउंगा. आप जानते हैं कि आज की तारीख में कितनी प्रतिस्पर्धा है? ऐसे में सौ प्रतिशत देने का खतरा सभी को रहता ही है. यह आज के युग का कंफ्यूजन है. मैं तो यही कहूंगा कि हम जिस युग में रह रहे हैं, उस युग का कंफ्यूजन है. मैं तो सारा ध्यान अपने करियर पर लगा रहा हूं.

पर हमने सुना है कि आप तो स्कूल के दिनों में ही किसी को दिल दे बैठे थे?

– मैंने पहले भी कहा कि मेरी जिंदगी में उम्र के बढ़ने के साथ कई चीजें होती रही हैं. जब मैं नौंवी कक्षा में पढ़ता था, तब पहली बार मुझे प्यार का बुखार चढ़ा था. मैं उसे डेट पर ले गया था. जेब में ज्यादा पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने उसे सैंडविच खिलाया था. पर वह प्यार टिका नहीं. ब्रेकअप होने के बाद मुझे लगा था जैसे कि सब कुछ खत्म हो गया. मुझे पूरी दुनिया खत्म होना का अहसास हो रहा था. लेकिन परीक्षा खत्म होते ही सब कछ सामान्य हो गया. हम फिल्मों में प्यार को लेकर जिस तरह का जुनून देखते हैं, वैसा जुननू निजी जीवन के प्यार में नहीं होता है. लेकिन मेरा मानना है कि कई बार निजी जिंदगी का प्यार, फिल्मी प्यार के मुकाबले ज्यादा जानलेवाहोता है.

तो कटरीना कैफ के साथ आपके..?

– सब बकवास है..मीडिया सदैव कुछ मसालेदार खबरे छापता रहता है. यह सब मीडिया की बाते हैं. वही रिश्ते बनाती व बिगाड़ती रहती है. मैं तो खुद को एक सीधा इंसान मानता हूं. मेरा अपना कोई पीआर भी नहीं है.

तो फिर यह क्यूं कहा जा रहा है कि  कटरीना कैफ के साथ रिश्ते की वजह से आपने रणबीर कपूर के साथ दोस्ती खत्म कर दी?

– सच कहूं तो इस खबर को पढ़कर मैं खुद हैरान हूं. मेरी समझ में यह नही आता कि यदि हम किसी से रिश्ता जोड़ रहे हैं, तो हम किसी से दोस्ती खत्म क्यों करेंगे? हकीकत यह है कि हम दो दिन पहले ही रणबीर कपूर से मिलने उसके घर गए थे. कुछ अखबारों में वह तस्वीरें छपी भी हैं. मेरी लिंकअप की सारी गलत खबरें छप रही हैं. कटरीना कैफ के साथ मेरा कोई रिश्ता नहीं है.

हम कलाकार हैं और हम मानकर चलते हैं कि यह सब हमारे काम का ही एक हिस्सा है. यदि हमने मीडिया की हर बात पर गौर किया और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने पर पाबंदी लगानी शुरू की, तो हम जिंदगी जी नहीं पाएंगे. मैं मानता हूं कि आप लोग कई बार बहुत सही बातें लिखते हैं. लेकिन हम इस डर से किसी को दोस्त बनाना बंद नहीं कर सकते कि मीडिया में क्या लिखा जाएगा? मैं तो यह कहता हूं कि ज्यादा मत सोचो. अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जियो. जिन्हें जो बोलना है, बोलते रहेंगे. आप चाहे जितना अच्छा काम करें, बुराई ढूढ़ने पर आमादा लोग बुराई ढूंढ़ लेंगे.

आपने कहीं कहा है कि सेक्स न होने पर रिश्ते खत्म हो जाते हैं?

– अरे नहीं! मैं ऐसा नहीं कह सकता. मगर क्या आप यह नहीं मानते कि सेक्स की अहमियत है.

लाइफ को न बनाएं फास्ट एंड फ्यूरियस

आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ बौक्स औफिस पर अपना कमाल दिखा रही है. आमिर की सब से बड़ी खासियत यह है कि वे जो भी फिल्म बनाते हैं उस में उन की मेहनत व परफैक्शन दिखाई देती है. वे साल में चार पांच फिल्में बनाने के बजाय एक फिल्म बनाना पसंद करते हैं. सीन चाहे एक मिनट का हो या 10 मिनट का, आमिर उस में वास्तविकता दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ते, छोटीछोटी बारिकियों पर ध्यान दे कर काम करना पसंद करते हैं.

आज के युवा वर्ग को आमिर खान से सीखने की जरूरत है, क्योंकि आज के युवाओं में धैर्य की कमी है, उन्हें हर काम में जल्दबाजी होती है. खाना खाना हो तो जल्दी, कहीं जाना हो तो जल्दी, सडक़ पर गाड़ी चलाना हो तो जल्दी, गर्लफ्रैंड बौयफ्रैंड बनाना हो तो जल्दी, ब्रेकअप करना हो तो जल्दी. वे समय दे कर काम खत्म करने के बजाय बस फटाफट करना चाहते हैं. उन्हें लगता है जिस तरह से एक क्लिक में गुगल पर हर सवाल का जवाब मिल जाता है, उसी तरह से लाइफ में भी हर काम फटाफट करो और इंजौय करो, सोचना समझना तो पुरानी पीढ़ी का काम है. हम तो यंग जनरेशन हैं. अगर किसी बात के लिए पेरैंट्स कुछ कहते भी हैं तो उन का जवाब होता है ‘‘किस के पास इतना टाइम है कि बैठ कर सोचे, अगर आगे बढऩा है तो तेज भागना होगा.’’

लेकि न जहां हड़बड़ी होती है वहां गड़बड़ी की संभावना ज्यादा होती है. जल्दबाजी में युवा भले ही काम तुरंत खत्म कर लेते हैं. लेकिन वे इस बात को नहीं समझ पाते कि जल्दबाजी में किए गए काम में कुछ न कुछ कमी अवश्य रहती है.

आइए जानते हैं जल्दबाजी से किसकिस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है‐

जल्दबाजी में होता है कंफ्यूजन – आप को शायद यह बात पता नहीं होगी लेकिन जो लोग जल्दबाजी में होते हैं वे जल्दीजल्दी बोलते हैं, सामने वाले को बात खत्म करने का मौका नहीं देते, बीच में ही टोकते रहते हैं, ध्यान से किसी की बात नहीं सुनते और जब उन्हें कोई काम दिया जाता है तो वे कर नहीं पाते, उन्हें कंयूजन होता है कि क्या करें और क्या नहीं. कई बार तो सामने वाले की बात में हामी भर देते हैं और बाद में अफसोस करते हैं कि क्यों किया.

निर्णय लेने की क्षमता में कमी – जल्दबाजी में यह समझना मुश्किल होता है कि किस सिचुएशन में क्या करना चाहिए, और इसी वजह से कठिन परिस्थितियों का सामना करते समय चिड़चिड़े हो जाते हैं. सिचुएशन हैंडल नहीं कर पाते और कुछ ऐसा कह देते हैं जिस की वजह से महत्त्वपूर्ण रिश्ते खो देते हैं.

कौंसट्रेशन में कमी – जब आप जल्दबाजी में होते हैं तब आप किसी भी काम में अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते, आप का ध्यान भटकते रहता है. आप को लगते रहता है कि जल्दी से काम खत्म कर के दूसरा काम शुरू कर दूं और अगर किसी काम में ज्यादा समय लगता है तो  वह काम बोझ लगने लगता है और आप बिना मन के काम खत्म कर देते हैं.

असफलता का सामना – हड़बड़ी में आप अपना 100 प्रतिशत नहीं दे पाते और जब सफल नहीं होते तो उसे छोड़ कर दूसरा काम करना शुरू कर देते हैं. जल्दीजल्दी में समझ नहीं पाते कि क्या सही है और क्या गलत जिस की वजह से कई तरह के प्रौब्लम का सामना करना पड़ता है. कई बार तो असफलता की वजह से गलत रास्तों का चुनाव करने से भी नहीं कतराते.

विश्वास कायम करने में असफल –  आप सोचते होंगे कि आप जल्दीजल्दी काम कर के दूसरों पर अपना प्रभाव डालने में सफल होते हैं लेकिन एक सचाई यह भी है कि आप जल्दीजल्दी काम कर के सामने वाले पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते. जरा सोचिए एक ड्राइवर आप को बिठा कर गाड़ी बहुत तेजी से चला कर समय से पहले पहुंचाता है और दूसरा सही स्पीड पर गाड़ी चला कर पहुंचाता है. आप दोनों में से किस ड्राइवर पर ज्यादा विश्वास करेंगे? यकीनन जो आप को सही से पहुंचाएगा. ठीक इसी तरह लाइफ में भी आप धैर्य व संयम से दूसरों पर प्रभाव डालने में सफल होते हैं.

हैल्थ के लिए नुकसानदायक – आज के युवाओं को वही खाना अच्छा लगता है जो फटाफट बन जाए. उन्हें लगता है कि कौन खाना बनाने में घंटों मेहनत करे, फटाफट बनाओ और फटाफट खाओ. यही नहीं बल्कि कहीं पर भी कुछ भी खा लेते हैं. यही कारण है कि उन्हें कम उम्र में कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड रहा है.

कैरियर में जल्दबाजी करना पड़ता है महंगा – युवा काम सही तरीके से सीखने के बजाय जौब स्वीच करने में विश्वास करते हैं. अगर किसी दिन बौस या फिर कोई सीनियर उन के काम में कोई कमी निकाल दे तो घर आ कर बवाल खड़ा कर देते हैं कि मुझे इस कंपनी में काम नहीं करना. मैं इतना काम करता हूं लेकिन मुझे कभी क्रेडिट नहीं मिलता वगैराह वगैराह. अगर कभी किसी दिन छोटी सी बात पर जौब छोड़ना भी पड़े तो आगेपीछे की नहीं सोचते और जौब छोड़ देते हैं, लेकिन आप का इस तरह से करना आप के कैरियर के लिए ठीक नहीं है. भले ही आप को एक जगह से काम छोड़ कर दूसरी जगह पर जौइन करने पर पैसे ज्यादा मिल जाते हों लेकिन ऐसा कर के आप किसी भी काम में मास्टर नहीं बन पाते. आप को हर काम की थोड़ीथोड़ी नौलेज ही मिल पाती है, इसलिए जरूरी है कि आप अपने काम को बेहतर बनाने की कोशिश करें.

यही नहीं हर काम में जल्दबाजी दिखाने की वजह से आप को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है. स्ट्रैस लैवल बढ़ता है. हार्मोनल बदलाव आते है. आप के पर्सनल रिलेशन भी प्रभावित होते हैं. यह ठीक है कि आप सफल होना चाहते हैं, जीवन में आगे बढऩा चाहते हैं, लेकिन हर काम में जल्दबाजी दिखाने के बजाय अपने काम में थोड़ा परफैक्शन लाने का प्रयास करें, टाइम मैनेजमैंट का गुण सीखें. किसी काम को समय देने का अर्थ यह नहीं है कि आप आलसी या लेट लतीफ हैं बल्कि इस का मतलब यह है कि आप सिस्टमैटिक तरीके से काम करते हैं. इसलिए अब आप को कोई काम मिले तो उसे फटाफट खत्म करने के बजाय थोड़ा समय दे कर करने का प्रयास करें.

यूं ही नहीं है कल्याण का मुलायम प्रेम

सपा में मुलायम-अखिलेश विवाद पार्टी के अंदर का मामला भर नहीं है. इस पर देश के दो बड़े दलों कांग्रेस और भाजपा का चुनावी दांव टिका है. कांग्रेस और भाजपा इसी कारण अपने विधायक प्रत्याशियों के नाम की घोषणा नहीं कर रही है. भाजपा नेता इस विवाद से खुद को अलग बताते हुये इसकी आलोचना करते हैं तो भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह इस झगड़े के जल्द निपटने की उम्मीद कर रहे हैं. अपने जन्मदिन पर बात करते कल्याण सिंह ने कहा कि ‘पितापुत्र में झगड़ा ठीक नहीं है. वैसे यह झगड़ा जल्द सुलझ जायेगा.’

कल्याण के मन में मुलायम के प्रति दिखा प्रेम सहज था. कल्याण के बुरे वक्त में मुलायम ने उनका साथ दिया था. उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को एक सर्वमान्य चेहरे की तलाश है. कल्याण सिंह इसके लिये मुफीद बैठते हैं. ऐसे में कल्याण के मुलायम प्रेम को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. जिस तरह से लखनऊ में मौजूद न रहने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल्याण सिंह की तारीफ की, उससे भाजपा के कुछ बड़े नेता सर्तक हो गये हैं.

असल में भाजपा के लिये सबसे मुफीद है कि प्रदेश की जनता मुलायम की मुसलिम छवि और अखिलेश के खराब शासन के विरोध में भाजपा के पक्ष में वोट करे. खासकर मुसलिम बसपा और कांग्रेस में जा सकता है. भाजपा को मायावती के दलित-मुसलिम गठजोड़ से खतरा दिख रहा है. ऐसे में भाजपा के कुछ नेता अंदरखाने सपा के इस विवाद को सुलझाने में लगे हैं. जिससे चुनावी संघर्ष सपा-भाजपा के ही बीच रहे.

सपा के कमजोर होने का भाजपा पर दूसरा प्रभाव यह पड़ रहा है कि सपा-कांग्रेस गठजोड़ हो सकता है. जिसमें कांग्रेस मजबूत पड़ सकती है. अगर सपा कमजोर रहेगी तो कांग्रेस अपने हिसाब से ज्यादा सीटें मांगेगी और सपा मजबूत होगी तो कांग्रेस को कम सीटों पर समझौता करना होगा. जिससे कांग्रेस की ताकत कम होगी. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश चुनाव से अधिक 2019 के लोकसभा चुनाव को देखकर अपने दांव चल रहे हैं. मोदी केवल उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस को सत्ता में आने से नहीं रोकना चाहते वह बिहार में भी बड़े उलटफेर की योजना में हैं, जहां नीतीश पर वह डोरे डाल रहे हैं. 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सपा का विवाद से लाभ होगा. वह अपने हिसाब से सीटें तय कर सकेगी. एक जुट सपा कांग्रेस को कम से कम सीटें देने पर समझौता कर रही थी पर अब झगड़ों में फंसी सपा ज्यादा से ज्यादा सीटों पर समझौता करने की कोशिश में है. सपा कांग्रेस को पहले 80 सीटे दे रही थी अब कांग्रेस 100 सीटों की मांग कर रही है. इसके साथ ही साथ चुनाव बाद बनने वाली सरकार में भी वह बिहार की तर्ज पर महत्वपूर्ण विभाग चाहती है.

2019 के लोकसभा चुनाव की नजर में कांग्रेस का प्रदेश की सत्ता में आना महत्वपूर्ण है. इससे पार्टी में नई ऊर्जा का संचार होगा. ऐसे में भाजपा की चाल है कि मुलायम और कांग्रेस के बीच कोई ऐसा समझौता न हो सके जैसा बिहार में जदयू, राजद और कांग्रेस के बीच हुआ था. भाजपा विपक्ष को एकजुट करने के बजाय बिखराने में रूचि रख रही है. सपा के एक साथ रहने से विपक्ष बिखरा रहेगा. जिससे भाजपा का चुनाव लड़ना सरल हो जायेगा. 

पुरुष स्त्री की तरह प्रेम नहीं कर सकता : मैत्रेयी पुष्पा

“पुरुष प्रेम कहानी नहीं लिख सकते, क्योंकि स्त्री ही प्रेम के कोमल भावनाओं को बेहतर तरीके से समझ सकती है. प्रेम को नकारना और प्रेम को छिपाना अपराध है. हम प्रेम को छिपाकर उसे अपराध की संज्ञा दे देते हैं, जो कि उचित नहीं है. अगर प्रेम है तो उसे खुलेआम स्वीकार करना चाहिए.” सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने ये विचार सोलो फीमेल ट्रेवेलर, फोटोग्राफर और ब्लॉगर डा. कायनात काजी के कहानी संग्रह “बोगनवेलिया” के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए.

लोकार्पण समारोह का आयोजन कलमकार फाउंडेशन द्वारा नई दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में किया गया. समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्द उपन्यासकार और हिंदी अकादमी, दिल्ली की उपाध्यक्ष श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा ने किया, जबकि वरिष्ठ कवि और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक श्री लीलाधर मंडलोई इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे. “पाखी” के संपादक श्री प्रेम भारद्वाज और वरिष्ठ टीवी पत्रकार व समीक्षक श्री अनंत विजय भी विशिष्ठ अतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित थे. “बोगनवेलिया” नौ प्रेम कहानियों का संग्रह है. इसमें प्रेम के नौ अलग-अलग रंग हैं.  

डॉ. कायनात काजी के कहानी संग्रह “बोगनवेलिया” पर चर्चा करते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि आजकल अच्छी कहानियां पढ़ने को नहीं मिल रही हैं. कायनात की कहानियां इस कमी को पूरा कर रही हैं. उन्होंने कहा कि पुस्तक खोलने के बाद वे लगातार एक के बाद एक सारी कहानियां पढ़ती चली गयीं. इन कहानियों में जीवन की मामूली बातें सुनाने का तरीका प्रभावित करता है. उन्होंने कहा कि एक पुरुष के मुकाबले स्त्री ज्यादा अच्छी प्रेम कहानी लिखती है. स्त्री ही प्रेम के विविध रूपों को महसूस करती है, इसलिए वह सुंदर प्रेम कहानियां लिख सकती है.

मैत्रेयी पुष्पा ने देह और प्रेम के अंतर-संबंधों पर चर्चा करते हुए कहा कि लोगों को लगता है प्रेम के लिए देह ज़रूरी है, जबकि प्रेम अलग है और सेक्स अलग है. प्रेम का सेक्स से संबंध नहीं है. स्त्री की आज़ादी सही मायने में तब होगी जब उसे प्रेम करने की स्वतंत्रता होगी. वह जिससे प्रेम करे, उसे बिना संकोच पति से मिलवा सके. समाज भी यह स्वीकार सके कि पति अलग होता है और प्रेमी अलग. इतनी ताकत तब मिलेगी जब ये समझ सकेंगे की प्रेम की मनाही कही नहीं है और देह प्रेम नहीं है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि एवं भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने कहा कि मैं कविता के पाठक की तरह किताब पढता हूं और अनकहे को ढूंढता हूं. संग्रह की पहली ही कहानी “बोगनवेलिया” इतनी बढ़िया लगी कि ये शेर याद आ गया, ‘था इतना सख्त जान कि तलवार बेअसर, था इतना नर्म दिल कि गुल से कट गया…’ उन्होंने प्रेम के शेड्स की बात करते हुए कहा कि प्रेम और करुणा दुनिया में दो ही तत्व हैं. प्रेम पर ढेर सारे क्लासिक्स लिखे जा चुके हैं. “एक थी रोमना” मास्टरपीस कहानी है. इसमें भाषा अनजान है और प्रेम मौन में है. मंडलोई ने कहा कि “बोगनवेलिया” की कहानियां डॉ कायनात के फोटोग्राफर गुण को शेयर करता है. उन्होंने कहा कि स्त्री अगर प्रेम कहानी लिखे तो पुरुष उसे नहीं पढ़ सकता. लोगों को अगर प्रेम समझ आ जाये तो समाज में नफ़रत ही नहीं रहेगी.

विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित ‘पाखी’ पत्रिका के संपादक प्रेम भारद्वाज ने कहा कि प्रेम और सियासत पर लिखना कठिन कार्य है. “बोगनवेलिया” की कहानियां अलग तरह की हैं. इसमें बहुत विविधता है. इसे पढ़ कर कई बार लगने लगता है कि जैसे दो अलग लोगों ने कहानियां लिखी हों. पहली कहानी “बोगनवेलिया” अकेलेपन की कहानी है. यह बेचारगी नहीं है. यदि अकेले जीवन भयावह हो जाये तो भ्रम रचना होता है. यह स्वाभिमान से जीने की फैंटेसी है. तो वहीं अन्य कहानियों में कायनात ने प्रेम के अलग अलग रंगों को उकेरा है. वरिष्ठ टीवी पत्रकार एवं समीक्षक अनंत विजय ने डॉ कायनात काजी को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उनकी भाषा में रंग हैं. उत्तर आधुनिक बिम्ब हैं. उन्होंने कलमकार संस्था की तरफ से सभी को धन्यवाद भी ज्ञापित किया.

“बोगनवेलिया” कायनात की दूसरी और कहानी संग्रह की पहली पुस्तक है. कायनात की इससे पहले “कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज” नामक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है. देश-विदेश में लाख किलोमीटर की यात्रा तय करने वाली कायनात काजी ‘राहगीरी’ नाम से हिंदी का पहला ट्रैवेल फोटोग्राफी ब्लॉग भी चलाती हैं. इस मौके पर युवा लेखिका डॉ कायनात काजी ने कहा कि “बोगनवेलिया” प्रेम के अलग-अलग रूपों को बुनती कहानियों का संग्रह है. जिसमें किसी स्त्री के खुद से प्रेम की कहानी है तो मां–बेटे के प्रेम के सुन्दर रूप को उकेरती दूसरी कहानी भी है. एक कहानी है पहले प्यार को सहेजती लड़की की तो वही उसके प्रेमी के भावनाओं के पूरी तरह से बदल जाने की भी. कायनात ने कहा कि इन कहानियों को पढ़ते हुए आप के दिल के किसी कोने में मुरझाए प्रेम की कली एक बारगी जरूर खिल जाएगी. दरअसल, ये कहानियां आप के आसपास की हैं. इसलिए इन्हें पढ़ कर शायद आप इन किरदारों में खुद को ढूढ़ने लगेंगे.

बर्थडे स्पेशल: कपिल से जुड़ी खास बातें

कुछ क्रिकेटर धुआंधार बल्‍लेबाजी तो कुछ जबरदस्‍त गेंदबाजी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन क्रिकेटर कपिल देव की बात की जाए तो वह एक महान ऑलराउंडर के रूप में पहचाने जाते हैं. उन्‍होंने बल्‍लेबाज, गेंदबाज व विकेटकीपर के रूप में वनडे व टेस्‍ट मैचों में कई बड़े रिकॉर्ड बनाए हैं.

6 जनवरी 1959 को चंडीगढ़ में जन्‍में भारतीय क्रिकेटर कपिल देव का पूरा नाम कपिल देव रामलाल निखंज हैं. वह दाहिने हाथ के बल्लेबाज व दाहिने हाथ के तेज मध्यम गति के गेंदबाज के मशहूर क्रिकेटर थे.

कपिल देव को भारत की निर्जीव पिचों पर विकेट निकालने में महारत हासिल थी, तभी तो वह एक समय टेस्ट मैचों में सबसे अधिक विकेट लेने वाले गेंदबाजों के बीच वर्ल्ड में नंबर एक थे. आप कपिल देव की धमक को इसी बात से समझ सकते हैं कि उन्होंने एक बार लगातार 4 छक्के जड़ करके टीम इंडिया को फॉलोऑन से बचा लिया था.

आइए जानते हैं टीम इंडिया को 1983 में पहला वनडे वर्ल्ड कप दिलाने वाले कपिल देव और उनके जीवन से जुड़ी खास बातें.

कपिल देव के बारे में खास बातें

1. कपिल देव का जन्म 6 जनवरी 1959 को चंडीगढ़ में हुआ था. कपिल देव ने रोमी से शादी की थी. उनकी रोमी से मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के जरिए हुई थी. वे रोमी को एक साल तक प्रपोज नहीं कर पाए थे. बाद में दोस्तों के साथ एक ट्रिप पर कपिल ने रोमी को प्रपोज किया. इस बारे में रोमी का कहना था, "कपिल तब बहुत शर्मीले थे. उनका आत्मविश्वास जैसा आज है, वैसा उस समय नहीं था." अंततः कपिल देव ने रोमी से 1980 में शादी कर ली.

2. 17 साल की उम्र में उन्होंने क्रिकेट में डेब्यू किया. कपिल देव ने टेस्ट करियर की शुरुआत पाकिस्तान के खिलाफ फैसलाबाद में 1978 में किया था. उन्होंने पहले तीन टेस्ट मैचों में 7 विकेट चटकाए थे. उन्होंने ऑलराउंडर होने का सबूत उस समय दिया, जब उन्होंने इसी सीरीज के कराची में खेले गए तीसरे टेस्ट में पाकिस्तान के खिलाफ 33 गेंदों पर 2 छक्कों की मदद से भारत का सबसे तेज अर्धशतक लगाया. इस मैच में उन्होंने 48 गेंदों में 59 रन बनाए थे, जिसमें 8 चौके और 2 छक्के जड़े थे.

3. इसके बाद वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्हें भारतीय धरती पर 17 विकेट मिले, जो भारतीय विकेटों के मिजाज के लिहाज से अच्छा प्रदर्शन था. इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड की धरती पर उसी के खिलाफ 16 विकेट झटके.

4. कपिल को असली पहचान 1979 में ऑस्ट्रेलिया के साथ खेलते हुए मिली, जब उन्होंने 6 टेस्ट मैचों में 28 विकेट चटका दिए. इसके बाद पाकिस्तान के खिलाफ भारत में ही 32 विकेट लेकर तहलका मचा दिया.

5. कपिल ने महज 21 वर्ष और 27 दिन की आयु में 1000 रन और 100 टेस्ट विकेट पूरा कर दुनिया के सबसे युवा खिलाड़ी बन गए. उन्होंने 2000 रन और 200 विकेट का डबल भी सबसे कम उम्र में ही पूरा किया.

6. कपिल देव की कप्तानी में ही भारत ने पहली बार वनडे वर्ल्ड कप, 1983 जीता था. उनकी कप्तानी में टीम इंडिया ने फाइनल में दो बार की विजेता वेस्टइंडीज जैसी मजबूत टीम को अप्रत्याशित रूप से हराया था.  कपिल की कप्तानी में ही टीम इंडिया ने टेस्ट में 1986 में लॉर्ड्स में पहली टेस्ट जीत दर्ज की थी.

7. 1983 वर्ल्ड कप में जिम्बाब्वे के खिलाफ 17 रन पर पांच विकेट गिर गए थे. कपिल देव ने इस मैच में 175 रन की ऐतिहासिक पारी खेली थी. कप्तान कपिल देव ने सैय्यद किरमानी के साथ नौवें विकेट के लिए नाबाद 126 रनों की साझेदारी निभाई थी, जिसमें किरमानी का योगदान 24 रन का था.

8. कपिल देव ने भारतीय टीम की कप्तानी 1982 में संभाली थी. कपिल देव ने 131 टेस्ट में 23 बार पारी में पांच विकेट लिए थे, जिसे हाल ही में रविचंद्रन अश्विन ने पार किया था.

9. कपिल देव ने 131 टेस्ट मैचों में 434 विकेट लिए थे और एक समय वह वर्ल्ड में टेस्ट में सबसे अधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज रहे. बाद में उनको कर्टनी वॉल्‍श, मुथैया मुरलीधरन, शेन वॉर्न, अनिल कुंबले जैसे गेंदबाजों ने पीछे छोड़ा.

10. साल 1999 में उन्होंने टीम इंडिया के कोच पद की कमान भी संभाली थी और 2000 तक इस पद पर रहे. उनके क्रिकेट में योगदान को देखते हएु 24 सितंबर, 2008 को भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल का दर्जा दिया गया था.

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