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मोदी और नीतीश ने की लालू की बेइज्जती

प्रकाश पर्व के मौके पर पटना पहुंचे प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराबबंदी की जम कर तारीफ की. वहीं नीतीश ने भी मोदी के सुर में सुर मिलाया. नीतीश ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी ने वहां शराबबंदी कराई थी, जिससे बाद ही गुजरात ने तरक्की की रफ्तार पकड़ी.

गौरतलब है कि जब नोटबंदी के बाद सभी विपक्षी दलों ने मोदी की आलोचना की थी, तो नीतीश ने  उस मसले पर मोदी का साथ दिया था और नोटबंदी को जरूरी बताया था. देश-विदेश से आए पंजाबियों और     प्रधनमंत्री ने प्रकाश पर्व के आयोजन की कामयाबी के लिए नीतीश की जम कर तारीफ की. नीतीश भी सारा क्रेडिट खुद ले गए और सरकार के सबसे बड़े सहयोगी दल राजद के मुखिया लालू यादव को दरकिनार कर दिया. लालू को न तो मंच पर जगह मिली ओर न ही कामयाबी का श्रेय मिला.

पटना के गांधी मैदान में आयोजित प्रकाश पर्व समारोह में प्रधनमंत्री समेत कई केंद्रीय मंत्री, राज्य के मंत्री और कई सीनियर नेता मौजूद थे. नीतीश और उनके अफसरों ने राजद सुप्रीमो जैसे जमीनी नेता लालू यादव को मंच के सामने जमीन पर बैठने को मजबूर किया. लालू को स्टेज पर बैठने की जगह नहीं दी गई, जबकि वह राज्य के सीनियर लीडर ही नहीं महागठबंधन की सरकार के सबसे बड़े सहयोगी भी हैं. इसके बाद भी नीतीश कुमार ने उनकी अनदेखी की. मोदी के साथ-साथ नीतीश ने भी अपने भाषण में लालू का जिक्र तक नहीं किया.

पिछले बिहार विधान सभा चुनाव में लालू और नीतीश के गठजोड़ ने साबित कर दिया था कि उनके पास मजबूत वोट बैंक है. 243 सदस्यों वाले बिहार विधन सभा में 178 सीटों पर महागठबंधन का कब्जा है. इसमें जदयू की झोली में 71 सीट हैं तो राजद के खाते में 80 सीट हैं. वहीं कांग्रेस के हाथ में 27 सीटे हैं. सीटों के अलावा सबसे ज्यादा वोट भी राजद को ही मिला था.  राजद को जहां 18.4 फीसदी वोट मिले थे वहीं  नीतीश की पार्टी जदयू को 16.8 फीसदी वोट मिल सका था, कांग्रेस को 6.7 फीसदी वोट मिले थे और तीनों दलों को मिले वोट को मिलाने से यह आंकड़ा कुल 41.9 फीसदी हो जाता है. इसके बाद भी लालू की अनदेखी कर नीतीश ने महागठबंधन के भीतर अफवाहों का बाजार गर्म कर दिया है.

मीडिया वालों ने जब मोदी और नीतीश की जुगलबंदी के बारे में लालू से सवाल किया तो लालू ने अपने ठेठ गवंई लहजे में कहा-‘ आप लोग अपना जलेबी छानते रहिए, बाद में निकलेगा पकौड़ी.’ लालू के कहने का मतलब था कि आप लोग अपने में खुश होते रहिए कि नीतीश और लालू के बीच में तनाव बढ़ रहा है पर कुछ होने वाला नहीं है. राजद के सूत्रों की मानें तो मोदी और नीतीश की अनदेखी से लालू खासे नाराज हैं और प्रकाश पर्व के खत्म होने के बाद वह इस बारे में नीतीश से बात करेंगे.

इसके पहले भी नीतीश महागठबंधन की लाइन से अलग जा कर कई मौकों पर केंद्र सरकार और प्रधनमंत्री की तारीफ में कसीदे गढ़ चुके हैं. 3 तलाक के मसले पर ही नीतीश ने मोदी को कठघरे में खड़ा किया था, लेकिन जीएसटी, सर्जिकज स्ट्राइक, नोटबंदी और बेनामी संपति के मामले में नीतीश ने खुल कर मोदी के सुर में सुर मिलाया. इन मामलों में नीतीश बिना-लाग लपेट के मोदी का साथ दे चुके हैं.

गौरतलब है कि पिछले दिनों जब राजद सुप्रीमो लालू यादव नोटबंदी के खिलाफ शुरू की गई मुहिम शुरू की, तो उसमें भी नीतीश ने उनका साथ नहीं दिया था. नोटंबदी के 50 दिन पूरे होने पर राजद ने पिछले 28 दिसंबर को महाधरना का आयोजन किया तो उससे नीतीश ने कन्नी काट ली थी. वह पहले ही नोटबंदी को सही करार दे कर इससे पल्ला झाड़ चुके हैं.

प्रकाश पर्व का पूरे ताम-झाम से आयोजन कर नीतीश देश-विदेशों से तारीफें बटोर रहे हैं और उनके पार्टी के लोग यह हवा बनाने में लगे हुए हैं कि इससे नीतीश नेशनल ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल नेता बन कर उभरे हैं. दरअसल, पंजाबियों के प्रकाश पर्व का कामयाब बनाने के बहाने नीतीश की नजर अगले महीने होने वाले पंजाब विधान सभा चुनाव पर है. पंजाबियों से मिली वाहवाही के बाद यह उम्मीद तो जगने लगी है कि पंजाब चुनाव में नीतीश की पार्टी जदयू को 5-7 सीटें तो मिल ही जाएगी.

प्रणव मुखर्जी की गुगली पर सकते में सरकार

राष्ट्रपति पद की मर्यादा और कूटनीति दोनों एक साथ निभाते आखिरकार प्रणव मुखर्जी ने नोट बंदी पर अपनी राय दे ही दी कि इससे गरीबों की परेशानियां बढ़ीं हैं. बयान सरकार से असहमति जताता हो और सरकार का स्पष्ट विरोध भी  न लगे, इस बाबत राष्ट्रपति ने कुछ किन्तु परंतु भी इसमे जोड़े मसलन यह कि वे इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि गरीबों को सशक्त बनाने की कोशिशें हो रही हैं और संभवतः नोटबंदी से लंबे समय में गरीबों का फ़ायदा होगा लेकिन इसमे शक है कि गरीब इतना लंबा इंतजार कर सकते हैं.

देखा जाए तो बहुत कम शब्दों में प्रणव मुखर्जी ने देश भर के राज्यपालों और उप राज्यपालों के सम्मेलन को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले को नादानी करार देते उसके दुष्परिणामों से भी आगाह करा दिया है. बयान से ज्यादा अहम उसके आने का वक्त है. पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित हो चुकी हैं, जिनमे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मित्रों वाली शैली दांव पर लगी है. ऐसे में जो काम विपक्ष दो महीने में नहीं कर पाया था, वह राष्ट्रपति ने दो मिनट में कर दिखाया, तो इसे बजाय राजनीति के वित्त, अर्थव्यवस्था और भारतीय जीवन शैली के साथ साथ एक राष्ट्रपति की देश के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारियों के नजरिए से देखा जाना ज्यादा प्रासंगिक है.

प्रणव मुखर्जी लंबे वक्त तक वित्त मंत्री भी रहे हैं. इस नाते वे देश की अर्थव्यवस्था से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि एक नगदी प्रधान अर्थव्यवस्था में केश लेस तरीके एक अव्यवहारिक अवधारणा और एक व्यक्ति विशेष की सनक भर हैं. बात चूंकि राष्ट्रपति ने कही है इसलिए सरकार या सत्तारूढ़ दल भाजपा की तरफ से फौरी तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन देर सबेर किसी न किसी रूप में आएगी जरूर.

मोदी भक्त नीम में लिपटी यह चाशनी गटक पाएंगे, इसमें शक है. अब देखना दिलचस्प होगा कि वे क्या रुख अपनाते हैं. चुप रहे तो राष्ट्रपति से सहमत ही माने जाएंगे और ज्यादा कड़वा कुछ बोले तो यह देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद की शान मे गुस्ताखी होगी. एक बड़ी दिक्कत मोदी भक्तों के सामने ब्लूमबर्ग न्यूज़ एजेंसी की यह रिपोर्ट भी है कि अब तक 70 फीसदी बड़े अमान्य नोट रिजर्व बैंक के पास वापस आ चुके हैं यानि देश में कालाधन है ही नहीं, क्योंकि 2-3 फीसदी नोट तो चलन के दौरान ही नष्ट हो जाते हैं. इस मुद्दे पर वित्त मंत्री अरुण जेटली की इस मासूमियत पर मर मिटने किसका जी नहीं करेगा कि उन्हे इस बारे में कुछ नहीं मालूम. 

अभिनय का अभिन्न स्तंभ ओम ‘ओम पुरी’

66 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस लेने वाले अभिनेता ओमपुरी ने अभिनय जगत में न सिर्फ एक मिसाल पेश की थी, बल्कि बौलीवुड में ‘‘फिल्मी हीरो’’ की चरिपरिचत पहचान को धता बताते हुए खुद को न सिर्फ हीरो के रूप में बौलीवुड में पेश किया, बल्कि दूसरे प्रतिभाशाली कलाकारों के लिए राह खोली भी.

यह एक कटु सत्य है. बौलीवुड में आम धारणा यही रही है कि बौलीवुड में अभिनेता बनने के लिए चिकना चुपड़ा अति खूबसूरत चेहरा चाहिए. जबकि खुद ओम पुरी चिकने चेहरे की बजाय खुरदरे चेहरे के मालिक थे, मगर अपनी अभिनय क्षमता के बल पर उन्होंने सिर्फ बौलीवुड ही नहीं बल्कि हौलीवुड और अमरीकन फिल्मकारों को भी अपने साथ काम करने पर मजबूर किया था.

इन दिनों गैर फिल्मी परिवारों से आकर बौलवुड में कार्यरत कई कलाकार इस बात का रोना रोते रहते हैं कि उन्हे तो अभी भी बौलीवुड में ‘बाहरी’ होने का अहसास कराया जाता है. पर ओम पुरी ने ऐसा कभी नहीं कहा. जबकि जिस वक्त ओम पुरी ने अपने करियर की शुरुआत की थी, उस वक्त भी सिनेमा से जुड़ना हर किसी के लिए आसान नहीं था. उस वक्त भी बौलीवुड पर चंद फिल्मी परिवारों का ही कब्जा था. मगर एक बार ओम पुरी ने हमसे कहा था-‘‘कौन बाहरी..हम बाहरी कैसे हो सकते हैं…मैं तो वह इंसान हूं जो कि दूध में शक्कर की तरह घुल जाता है. हमें तो कभी किसी ने बाहरी नहीं कहा..’’

ओम पुरी के अभिनय करियर में भी काफी विविधता रही है. जिन दिनों मुंबई में स्व. बाल ठाकरे की नई नई गठित पार्टी ‘शिवसेना’ के चलते ‘मराठी वाद’ व ‘आमची मुंबई’ का नारा बुलंद था, उन्ही दिनों अंबाला, पंजाब वासी ओम पुरी ने मुंबई पहुंचकर 1976 में विजय तेंडुलकर लिखित राजनीति व्यंग प्रधान मराठी भाषी नाटक ‘‘घासीराम कोटवाल’’ पर आधारित मराठी भाषा की फिल्म ‘‘घासीराम कोटवाल’’ में घासीराम का किरदार निभाकर सिनेमा में कदम रखा था. इस फिल्म में ओम पुरी ने मोहन अगाशे के साथ अभिनय किया था. के हरिहरन निर्देशित इस फिल्म की भी पटकथा विजय तेंडुलकर ने ही लिखी थी. इससे पहले वह सिर्फ थिएटर ही कर रहे थे.

विजय तेंडुलकर ने स्व.बाल ठाकरे व उनकी नव गठित राजनीतिक पार्टी ‘‘शिवसेना’’ के बढ़ते प्रभाव के चलते यह ऐतिहासिक नाटक ‘‘घासीराम कोटवाल’’ लिखा था. जो कि पुणे सामाज्य के पेशवा नाना फड़नवीस की जीवनी पर आधारित है.

मराठी फिल्म ‘‘घासीराम कोटवाल’’ में अभिनय करने के बाद 1977 में ओम पुरी ने कन्नड़ फिल्म ‘‘तबलिया नीनादे मगाने’’ की. उसके बाद श्याम बेनेगल के साथ कम्युनिस्ट विचारधारा वाली कुछ फिल्मों में छोटे किरदार निभाए. हिंदी फिल्म ‘आक्रोश’ में गूंगे युवक का किरदार निभाकर पहली बार ओम पुरी चर्चा में आए थे. इस फिल्म के लिए उन्हें सह कलाकार का फिल्मफेअर अवार्ड भी मिला था. उसके बाद उन्होंने गुजराती भाषा की केतन मेहता निर्देशित प्रयोगात्मक फिल्म ‘‘भवानी भवाई’’ की थी.

1982 में कैमरामैन मनमोहन सिंह के साथ चित्रार्थ की पंजाबी फिल्म ‘‘चन्न परदेसी’’ की जिसमें उनके साथ राज बब्बर थे. 1982 में ही प्रदर्शित फिल्म ‘आरोहण’ के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया. फिर 1983 में ओम पुरी ने ‘अर्धसत्य’ में अपने आस पास के सिस्टम से लड़कर जीतने वाले ईमानदार पुलिस वाले का किरदार निभाकर दूसरा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया था. ‘आक्रोश’ ने यदि ओम पुरी को कलाकार के तौर पर स्थापित किया था, तो ‘अर्धसत्य’ ने उन्हे स्टार बना दिया था. अब तक वह संजीदा कलाकार के रूप में स्थापित हो चुके थे. लेकिन इसी वर्ष कुंदन शाह निर्देशित हास्यव्यंग प्रधान फिल्म ‘‘जाने भी दो यारों’’ में वह एकदम अलग रंग में नजर आए. तो वहीं वह एक बार फिर इसी वर्ष राज बब्बर, मेहर मित्तल व गुरूदास मान के साथ पंजाबी फिल्म ‘लोंग दा रिष्कारा’ में नजर आए.

1984 में ही छलांग लगाकर ब्रिटिश टीवी सीरियल ‘‘द ज्वेल इन द क्राउन’’ की थी, यहीं पर उनकी मित्रता ब्रिटिश कलाकार आर्ट मलिक से हुई थी. यह एक अलग बात है कि इस ब्रिटिश सीरियल की शूटिंग भारत के राजस्थान में हुई थी. जिसमें ओम पुरी व सईद जाफरी के अलावा सभी ब्रिटिश कलाकार थे. इसके बाद इंग्लिश फिल्म ‘सिटी आफ ज्वाय’ में भी ओम पुरी व आर्ट मलिक ने एक साथ काम किया था. आर्ट मलिक व ओम पुरी 2016 में प्रदर्शित राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ में एक साथ नजर आए थे.

ओम पुरी की चर्चा करते हुए आर्ट मलिक ने मुझसे 28 सितंबर 2016 को कहा था-‘‘मैं आज से चौंतीस वर्ष पहले 1982 में ब्रिटिश टीवी सीरियल ‘ज्वेल इन द क्राउन’ की शूटिंग के लिए पहली बार ब्रिटेन से भारत पहुंचा था. हमने इस सीरियल की शूटिंग राजस्थान में की थी. तब ओम पुरी से हमारी मुलाकात हुई थी. उसके बाद अब फिल्म ‘मिर्जिया’ में शूटिंग के दौरान ओम पुरी ने मेरे हिंदी उच्चारण दोष कम करने में काफी मदद की. वह बहुत अच्छे इंसान और उम्दा कलाकार हैं.’’

उसके बाद ओम पुरी, श्याम बेनेगल, कुंदन शाह, अजीज मिर्जा जैसे फिल्मकारों के साथ कई फिल्में करते रहे. पर यह सब कलात्मक फिल्में थी.

1988 में ओम पुरी ने पहली मलयालम फिल्म ‘‘परवर्थम’’ की. इस फिल्म में ओम पुरी ने रेवती के संग मुख्य भूमिका निभायी थी. 1990 में ओम पुरी को भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से नवाजा. 1992 में रेवती के साथ ही ओम पुरी ने तेलगू फिल्म ‘‘अंकुरम’’ की थी.

1994 में इंग्लिश फिल्म ‘‘वोल्फ’’ की थी. 1998 में इंग्लिश फिल्म ‘सच ए लांग जर्नी’ में रोशन सेठ, सोनी राजदान के साथ अभिनय किया था. पर 1998 की फिल्म ‘ईस्ट इज ईस्ट’ ने उन्हे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी शोहरत दिलायी.

इस बीच वह हिंदी फिल्में करते रहे. बीच में कन्नड़ फिल्म भी की. पर 2003 में ओम पुरी ने इंग्लिश फिल्म ‘‘कोड 46’’ की. इसके बाद 2004 में ओम पुरी को ‘‘आर्डर आफ द ब्रिटिश एम्परर’’ का खिताब मिला. तो वहीं 2004 में ही वह ‘युवा’ और ‘देव’ जैसी फिल्मों में नजर आए. फिल्म ‘देव’ के किरदार से असहमति की बात कर उन्होंने हंगामा मचा दिया था. पर यहीं से उनके करियर में पतन का दौर शुरू हुआ. उसके बाद वह हर साल तीन से चार फिल्में करते रहे, पर यह वह फिल्में नहीं थी, जिनमें उनके अभिनय को यदि किया जाता या उनके अभिनय की चर्चा होती.

2014 में उन्होंने इंग्लिश व फ्रेंच फिल्म ‘द हंड्रेड फुट जर्नी’ की. 2016 में उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मकार नाबिल कुरेशी निर्देशित फिल्म ‘एक्टर इन ला’ कर पाकिस्तानी फिल्मों में भी अपना खाता खोल लिया था.

इस वर्ष उनके अभिनय से सजी गुरिंदर चड्ढा निर्देशित अंग्रेजी भाषा की फिल्म ‘‘वायसराय हाउस’’ प्रदर्शित होने वाली है. तो वहीं उनकी पूर्व पत्नी सीमा कपूर व सलमान खान की कबीर खान निर्देशित फिल्म ‘ट्यूब लाइट’ में भी उनका कुछ दिन का काम बाकी है. कन्नड़ फिल्म ‘टाइगर’ की भी वह शूटिंग पूरी नही कर पाए.

बड़ा भाई करे छोटे की मदद

आज के व्यस्त महानगरीय जीवन में हर व्यक्ति के पास समय का अभाव है. ऐसे में यदि बड़ा भाई घर के छोटेछोटे कामों में मातापिता का हाथ बंटाए, तो कामकाजी पेरैंट्स को सहारा तो मिलता ही है साथ ही युवा हो रहे बच्चों में जिम्मेदारी का भाव भी पैदा होता है.

9वीं में पढ़ने वाले रोहित  का छोटा भाई मोहित 5वीं कक्षा में दूसरे स्कूल में पढ़ता है. रोहित स्कूल के लिए तैयार होने में तो उस की मदद करता ही है साथ ही साइकिल से उसे उस के स्कूल भी छोड़ता हुआ अपने स्कूल जाता है. इस प्रकार उस के कामकाजी मातापिता का काफी समय बचता है और वे भी समय से अपने औफिस जाते हैं.

अंकुर के पापा बैंक में हैं. उन का ट्रांसफर हर 3 साल के लिए दूसरे शहर में होता रहता है, ऐसे में 9वीं कक्षा में पढ़ने वाला अंकुर अपने छोटे भाई मधुर की देखभाल में मां का सहयोग करता है.

अंकुर ने तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले अपने छोटे भाई को होमवर्क कराने की जिम्मेदारी खुद ले रखी है. रात को वह दोनों भाइयों की किताबें बस्ते में रखने व दोनों के जूते पौलिश करने जैसे काम भी करता है. इस से मां को बड़ा आराम मिलता है.

वास्तव में ये छोटेछोटे काम किशोरों को आत्मविश्वासी बनाते हैं और उन के व्यक्तित्व के चहुंमुखी विकास में सहायता करते हैं. किशोरों को भी छोटे भाईबहनों के काम बढ़चढ़ कर करने चाहिए. इस प्रकार मातापिता की सहायता कर सकते हैं.

पड़ोस में रहने वाली राधा जब शाम को औफिस से थकीहारी घर लौटी तो साफसुथरा घर देख कर हैरान रह गई, क्योंकि उन की बाई 2 दिन की छुट्टी पर थी. उन के 11वीं तथा 10वीं में पढ़ने वाले दोनों बेटों ने पूरे घर की साफसफाई करने के साथसाथ मम्मी के लिए टेस्टी पास्ता भी तैयार कर रखा था. पूछने पर उन्होंने बताया कि उन के बच्चे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.

12वीं में पढ़ रहा शरद 9वीं कक्षा में पढ़ने वाले अपने छोटे भाई अक्षय की सभी विषय समझने में मदद करता है. इस से उस के खुद के भी कौन्सैप्ट क्लियर हो जाते हैं और उस के उस खाली समय का भी सदुपयोग हो जाता है.               

चांद की रोशनी, बरसते उल्कापिंड और धधकता लावा

प्रकृति द्वारा रचे गए कुछ दृश्य ऐसे होते हैं, जो इत्तफाक से कभीकभी ही नजर आते हैं, वह भी हर किसी को नहीं. अगर किसी आदमी के हाथ में कैमरा हो तो वह उस दृश्य को क्लिक जरूर करेगा. प्रोफेशनल फोटोग्राफर हो तो फिर तो बात ही क्या. इस फोटो को देखिए, इस में चांद की रोशनी, उल्कापिंडों की बारिश और ज्वालामुखी का बहता हुआ लावा एक साथ दिखाई दे रहे हैं.

 इस फोटो को क्लिक किया है फोटोग्राफर माइक मेज्युएल ने. जगह थी हवाई द्वीप की पुमाला माली. इस जगह को वोल्केनो नेशनल पार्क कहा जाता है. फोटोग्राफर माइक मेज्युएल ऐसे ही दृश्य क्लिक करने के लिए मशहूर हैं, जो देखने वालों के लिए बिलकुल नए और अविश्वसनीय हों.

कुछ दिनों पहले जब माइक मेज्युएल को पता चला कि हवाई द्वीप समूह के किलौआ ज्वालामुखी से लावा बह रहा है तो वह वहां जा पहुंचे. रात में जब वह फोटोग्राफी के लिए ज्वालामुखी के इलाके में पहुंचे तो उन्होंने ऐसा दृश्य देखा, जिसे देख कर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह धरती पर हैं या किसी अन्य ग्रह पर.

उल्कापिंडों के साथ चांद की रोशनी में बहता लावा देखना एक दुर्लभतम अवसर था. बस उन्होंने उस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लिया. मेज्युएल बताते हैं, ‘प्रकृति के ऐसे दृश्यों को सिंगल फ्रेम में शामिल करना हमेशा संभव नहीं होता. कुछ लोगों ने कहा कि काश यह सही में संभव होता. तब उन्हें हकीकत दिखाने के लिए मैं ने अपनी वाल पर कई फोटो अपलोड किए. तब जा कर उन्हें इस के सही होने का विश्वास हुआ.’

इश्क की सजा मौत

मीना अपने 3 भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं, खूबसूरत भी थी. उस का परिवार औरैया जिले के कस्बा दिबियापुर में रहता था. उस के पिता अमर सिंह रेलवे में पथ निरीक्षक थे. उस ने इंटर पास कर लिया तो मांबाप उस के विवाह के बारे में सोचने लगे. उन्होंने उस के लिए घरवर की तलाश शुरू की तो उन्हें कंचौसी कस्बा के रहने वाले राम सिंह का बेटा अनिल पसंद आ गया. जून, 2008 में मीना की शादी अनिल से हो गई.

मीना सुंदर तो थी ही, दुल्हन बनने पर उस की सुंदरता में और ज्यादा निखार आ गया था. ससुराल में जिस ने भी उसे देखा, उस की खूबसूरती की खूब तारीफ की. अपनी प्रशंसा पर मीना भी खुश थी. मीना जैसी सुंदर पत्नी पा कर अनिल भी खुश था. दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चल पड़ी थी.

लेकिन कुछ समय बाद आर्थिक परेशानियों ने उन की खुशी को ग्रहण लगा दिया. शादी के पहले अनिल छोटेमोटे काम कर के गुजारा कर लेता था. लेकिन शादी के बाद मीना के आने से जहां अन्य खर्चे बढ़ ही गए थे, वहीं मीना की महत्त्वाकांक्षी ख्वाहिशों ने उस के इस खर्च को और बढ़ा दिया था. आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिए वह कस्बे की एक आढ़त पर काम करने लगा था.

आढ़त पर काम करने की वजह से अनिल को कईकई दिनों घर से बाहर रहना पड़ता था, जबकि मीना को यह कतई पसंद नहीं था. पति की गैरमौजूदगी में वह आसपड़ोस के लड़कों से बातें ही नहीं करने लगी थी, बल्कि हंसीमजाक भी करने लगी थी. शुरूशुरू में तो किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब उस की हरकतें हद पार करने लगीं तो अनिल के मातापिता से यह देखा नहीं गया और वे यह कह कर गांव चले गए कि अब वे गांव में रह कर खेती कराएंगे.

सासससुर के जाने के बाद मीना को पूरी आजादी मिल गई थी. अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए उस ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो उसे राजेंद्र जंच गया. फिर तो वह उसे मन का मीत बनाने की कोशिश में लग गई. राजेंद्र मूलरूप से औरैया का रहने वाला था. उस के पिता गांव में खेती कराते थे. वह 3 भाईबहनों में सब से छोटा था. बीकौम करने के बाद वह कंचौसी कस्बे में रामबाबू की अनाज की आढ़त पर मुनीम की नौकरी करने लगा था.

राजेंद्र और अनिल एक ही आढ़त पर काम करते थे, इसलिए दोनों में गहरी दोस्ती थी. अनिल ने ही राजेंद्र को अपने घर के सामने किराए पर कमरा दिलाया था. दोस्त होने की वजह से राजेंद्र अनिल के घर आताजाता रहता था. जब कभी आढ़त बंद रहती, राजेंद्र अनिल के घर आ जाता और फिर वहीं पार्टी होती. पार्टी का खर्चा राजेंद्र ही उठाता था.

राजेंद्र पर दिल आया तो मीना उसे फंसाने के लिए अपने रूप का जलवा बिखेरने लगी. मीना के मन में क्या है, यह राजेंद्र की समझ में जल्दी ही आ गया. क्योंकि उस की निगाहों में जो प्यास झलक रही थी, उसे उस ने ताड़ लिया था. इस के बाद तो मीना उसे हूर की परी नजर आने लगी थी. वह उस के मोहपाश में बंधता चला गया था.

एक दिन जब राजेंद्र को पता चला कि अनिल 2 दिनों के लिए बाहर गया है तो उस दिन उस का मन काम में नहीं लगा. पूरे दिन उसे मीना की ही याद आती रही. घर आने पर वह मीना की एक झलक पाने को बेचैन था. उस की यह ख्वाहिश पूरी हुई शाम को. मीना सजधज कर दरवाजे पर आई तो उस समय वह उसे आसमान से उतरी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. उसे देख कर उस का दिल बेकाबू हो उठा.

राजेंद्र को पता ही था कि अनिल घर पर नहीं है, इसलिए वह उस के घर जा पहुंचा. राजेंद्र को देख कर मीना ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आज तुम आढ़त से बड़ी जल्दी आ गए, वहां कोई काम नहीं था क्या?’’

  ‘‘काम तो था भाभी, लेकिन मन नहीं लगा.’’

  ‘‘क्यों?’’ मीना ने पूछा.

  ‘‘सच बता दूं भाभी.’’

  ‘‘हां, बताओ.’’

  ‘‘भाभी, तुम्हारी सुंदरता ने मुझे विचलित कर दिया है, तुम सचमुच बहुत सुंदर हो.’’

  ‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कद्र न हो.’’ मीना ने लंबी सांस ले कर कहा.

  ‘‘क्या अनिल भाई, तुम्हारी कद्र नहीं करते?’’

  ‘‘जानबूझ कर अनजान मत बनो. तुम जानते हो कि तुम्हारे भाई साहब महीने में 10 दिन तो बाहर ही रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें करवटों में बीतती हैं.’’

  ‘‘भाभी जो दुख तुम्हारा है, वही मेरा भी है. मैं भी तुम्हारी यादों में रातरात भर करवट बदलता रहता हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो हमारी समस्या खत्म हो सकती है.’’ कह कर राजेंद्र ने मीना को अपनी बांहों में भर लिया.

  मीना चाहती तो यही थी, लेकिन उस ने मुखमुद्रा बदल कर बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे.’’

  ‘‘प्लीज भाभी शोर मत मचाओ, तुम ने मेरा सुखचैन सब छीन लिया है.’’ राजेंद्र ने कहा.

  ‘‘नहीं राजेंद्र, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’

  ‘‘नहीं भाभी, अब यह मुमकिन नहीं है. कोई पागल ही होगा, जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने करीब पहुंच कर पीछे हटेगा.’’ कह कर राजेंद्र ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखावे के लिए मीना न…न…न… करती रही, जबकि वह खुद राजेंद्र के शरीर से लिपटी जा रही थी. राजेंद्र कोई नासमझ बच्चा नहीं था, जो मीना की हरकतों को न समझ पाता. इस के बाद वह क्षण भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी.

एक बार मर्यादा भंग हुई तो राजेंद्र को हरी झंडी मिल गई. उसे जब भी मौका मिलता, वह मीना के घर पहुंच जाता और इच्छा पूरी कर के वापस आ जाता. मीना अब खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस की शारीरिक भूख मिटने लगी थी, साथ ही आर्थिक समस्या का भी हल हो गया था. मीना जब भी राजेंद्र से रुपए मांगती थी, वह चुपचाप निकाल कर दे देता था.

काम कोई भी हो, ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता. ठीक वैसा ही मीना और राजेंद्र के संबंधों में भी हुआ. उन के नाजायज संबंधों को ले कर अड़ोसपड़ोस में बातें होने लगीं. ये बातें अनिल के कानों तक पहुंची तो वह सन्न रह गया. उसे बात में सच्चाई नजर आई. क्योंकि उस ने मीना और राजेंद्र को खुल कर हंसीमजाक करते हुए कई बार देखा था. तब उस ने इसे सामान्य रूप से लिया था. अब पडोसियों की बातें सुन कर उसे दाल में काला नजर आने लगा था.

अनिल ने इस बारे में मीना से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘पड़ोसी हम से जलते हैं. राजेंद्र का आनाजाना और मदद करना उन्हें अच्छा नहीं लगता, इसलिए वे इस तरह की ऊलजुलूल बातें कर के तुम्हारे कान भर रहे हैं. अगर तुम्हें मुझ पर शक है तो राजेंद्र का घर आनाजाना बंद करा दो. लेकिन उस के बाद तुम दोनों की दोस्ती में दरार पड़ जाएगी. वह हमारी आर्थिक मदद करना बंद कर देगा.’’

अनिल ने राजेंद्र और मीना को रंगेहाथों तो पकड़ा नहीं था, इसलिए उस ने मीना की बात पर यकीन कर लिया. लेकिन मन का शक फिर भी नहीं गया. इसलिए वह राजेंद्र और मीना पर नजर रखने लगा. एक दिन राजेंद्र आढ़त पर नहीं आया तो अनिल को शक हुआ. दोपहर को वह घर पहुंचा तो उस के मकान का दरवाजा बंद था और अंदर से मीना और राजेंद्र के हंसने की आवाजें आ रही थीं. अनिल ने खिड़की के छेद से अंदर झांक कर देखा तो मीना और राजेंद्र एकदूसरे में समाए हुए थे.

अनिल सीधे शराब के ठेके पर पहुंचा और जम कर शराब पी. इस के बाद घर लौटा और दरवाजा पीटने लगा. कुछ देर बाद मीना ने दरवाजा खोला तो राजेंद्र कमरे में बैठा था. उस ने राजेंद्र को 2 तमाचे मार कर बेइज्जत कर के घर से भगा दिया. इस के बाद मीना की जम कर पिटाई की. मीना ने अपनी गलती मानते हुए अनिल के पैर पकड़ कर माफी मांग ली और आइंदा इस तरह की गलती न करने की कसम खाई.

अनिल उसे माफ करने को तैयार नहीं था, लेकिन मासूम बेटे की वजह से अनिल ने मीना को माफ कर दिया. इस के बाद कुछ दिनों तक अनिल, मीना से नाराज रहा, लेकिन धीरेधीरे मीना ने प्यार से उस की नाराजगी दूर कर दी. अनिल को लगा कि मीना राजेंद्र को भूल चुकी है. लेकिन यह उस का भ्रम था. मीना ने मन ही मन कुछ दिनों के लिए समझौता कर लिया था.

अनिल के प्रति यह उस का प्यार नाटक था, जबकि उस के दिलोदिमाग में राजेंद्र ही बसता था. उधर अनिल द्वारा अपमानित कर घर से निकाल दिए जाने पर राजेंद्र के मन में नफरत की आग सुलग रही थी. उन की दोस्ती में भी दरार पड़ चुकी थी. आमनासामना होने पर दोनों एकदूसरे से मुंह फेर लेते थे. मीना से जुदा होना राजेंद्र के लिए किसी सजा से कम नहीं था.

मीना के बगैर उसे चैन नहीं मिल रहा था. अनिल ने मीना का मोबाइल तोड़ दिया था, इसलिए उस की बात भी नहीं हो पाती थी. दिन बीतने के साथ मीना से न मिल पाने से उस की तड़प बढ़ती जा रही थी. आखिर एक दिन जब उसे पता चला कि अनिल बाहर गया है तो वह मीना के घर जा पहुंचा. मीना उसे देख कर उस के गले लग गई. उस दिन दोनों ने जम कर मौज की.

लेकिन राजेंद्र घर के बाहर निकलने लगा तो पड़ोसी राजे ने उसे देख लिया. अगले दिन अनिल वापस आया तो राजे ने उसे राजेंद्र के आने की बात बता दी. अनिल को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह चुप रहा. उसे लगा कि जब तक राजेंद्र जिंदा है, तब तक वह उस की इज्जत से खेलता रहेगा. इसलिए इज्जत बचाने के लिए उस ने अपने दोस्त की हत्या की योजना बना डाली. उस ने मीना को उस के मायके दिबियापुर भेज दिया. उस ने उसे भनक तक नहीं लगने दी थी कि उस के मन में क्या चल रहा है. मीना को मायके पहुंचा कर उस ने राजेंद्र से पुन: दोस्ती गांठ ली. राजेंद्र तो यही चाहता था, क्योंकि दोस्ती की आड़ में ही उस ने मीना को अपनी बनाया था. एक बार फिर दोनों की महफिल जमने लगी.

एक दिन शराब पीते हुए राजेंद्र ने कहा, ‘‘अनिलभाई, तुम ने मीना भाभी को मायके क्यों पहुंचा दिया? उस के बिना अच्छा नहीं लगता. मुझे आश्चर्य इस बात का है कि उस के बिना तुम्हारी रातें कैसे कटती हैं?’’

अनिल पहले तो खिलखिला कर हंसा, उस के बाद गंभीर हो कर बोला, ‘‘दोस्त मेरी रातें तो किसी तरह कट जाती हैं, पर लगता है तुम मीना के बिना बेचैन हो. खैर तुम कहते हो तो मीना को 2-4 दिनों में ले आता हूं.’’

अनिल को लगा कि राजेंद्र को उस की दोस्ती पर पूरा भरोसा हो गया है. इसलिए उस ने राजेंद्र को ठिकाने लगाने की तैयारी कर ली. उस ने राजेंद्र से कहा कि वह भी उस के साथ मीना को लाने चले. वह उसे देख कर खुश हो जाएगी. मीना की झलक पाने के लिए राजेंद्र बेचैन था, इसलिए वह उस के साथ चलने को तैयार हो गया.

5 जुलाई, 2016 की शाम अनिल और राजेंद्र कंचौसी रेलवे स्टेशन पहुंचे. वहां पता चला कि इटावा जाने वाली इंटर सिटी ट्रेन 2 घंटे से अधिक लेट है. इसलिए दोनों ने दिबियापुर (मीना के मायके) जाने का विचार त्याग दिया. इस के बाद दोनों शराब के ठेके पर पहुंचे और शराब की बोतल, पानी के पाउच और गिलास ले कर कस्बे से बाहर पक्के तालाब के पास जा पहुंचे.

वहीं दोनों ने जम कर शराब पी. अनिल ने जानबूझ कर राजेंद्र को कुछ ज्यादा शराब पिला दी, जिस से वह काफी नशे में हो गया. वह वहीं तालाब के किनारे लुढ़क गया तो अनिल ने ईंट से उस का सिर कुचल कर उस की हत्या कर दी. राजेंद्र की हत्या कर के अनिल ने उस के सारे कपडे़ उतार लिए और खून सनी ईंट के साथ उन्हें तालाब से कुछ दूर झाडि़यों में छिपा दिया. इस के बाद वह ट्रेन से अपनी ससुराल दिबियापुर चला गया.

इधर सुबह कुछ लोगों ने तालाब के किनारे लाश देखी तो इस की सूचना थाना सहावल पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह यादव फोर्स ले कर घटनास्थल पहुंच गए. तालाब के किनारे नग्न पड़े शव को देख कर धर्मपाल सिंह समझ गए कि हत्या अवैध संबंधों के चलते हुई है.

लाश की शिनाख्त में पुलिस को कोई परेशानी नहीं हुई. मृतक का नाम राजेंद्र था और वह रामबाबू की आढ़त पर मुनीम था. आढ़तिया रामबाबू को बुला कर राजेंद्र के शव की पहचान कराई गई. उस के पास राजेंद्र के पिता रामकिशन का मोबाइल नंबर था. धर्मपाल सिंह ने उसी नंबर पर राजेंद्र की हत्या की सूचना दे दी.

घटनास्थल पर बेटे की लाश देख कर रामकिशन फफक कर रो पड़ा. लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. धर्मपाल सिंह ने जांच शुरू की तो पता चला कि मृतक राजेंद्र कंचौसी कस्बा के कंचननगर में किराए के कमरे में रहता था. उस की दोस्ती सामने रहने वाले अनिल से थी, जो उसी के साथ काम करता था.

राजेंद्र का आनाजाना अनिल के घर भी था. उस के और अनिल की पत्नी मीना के बीच मधुर संबंध भी थे. अनिल जांच के घेरे में आया तो धर्मपाल सिंह ने उस पर शिकंजा कसा. उस से राजेंद्र की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो पहले वह साफ मुकर गया. लेकिन जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया.

उस ने बताया कि राजेंद्र ने उस की पत्नी मीना से नाजायज संबंध बना लिए थे, जिस से उस की बदनामी हो रही थी. इसीलिए उस ने उसे ईंट से कुचल कर मार डाला है. अनिल ने हत्या में प्रयुक्त ईंट तथा खून सने कपड़े बरामद करा दिए, जिसे उस ने तालाब के पास झाडि़यों में छिपा रखे थे.

अनिल ने हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था. इसलिए धर्मपाल सिंह ने मृतक ने पिता रामकिशन को वादी बना कर राजेंद्र की हत्या का मुकदमा दर्ज कर अनिल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया.?

कार्ड पेमैंट गले की फांस

युवाओं के लिए अच्छे दिन आ गए हैं. नोटबंदी को गले से उतारने के लिए सरकार कार्ड पेमैंट पर बहुत से छोटेछोटे चार्ज समाप्त कर रही है और ज्यादा लोग अब कार्ड से भुगतान लेने लगे हैं. यह भले एक तरह से अच्छा लगे पर जो अनुशासन सदियों से चल रहे कागज के नोटों का है, वह टूट जाएगा. कार्ड की संस्कृति ऊपरी तौर पर चाहे जितनी अच्छी लगे असल में यह मानसिक तौर पर गुलामी ही है. कागज का नकद नोट हर युवा के लिए स्वतंत्रता है कि वह पैसा अपनी गर्लफै्र्रंड के लिए सिनेमा के टिकट के लिए खर्च कर रहा है, बिना मातापिता को बताए मुंबई का चक्कर लगा कर आ रहा है, आर्थर हेली की नई किताब खरीदने पर खर्च कर रहा है या किसी कोचिंग वाले सर से क्लास ले रहा है. उसे अपना ड्रीम नहीं छोड़ना पड़ रहा है. पूर्व कांग्रेस सरकार भी कुछ कम नहीं थी पर वर्तमान सरकार अति कर रही है, चाहती है कि हर काम कार्ड पेमैंट से हो, ताकि पता चल सके कि कब क्या किया गया.

इस कार्ड संस्कृति का नतीजा होगा कि हर युवा का जीवन एक खुली किताब हो जाएगा और जो चाहेगा वह पता लगा लेगा कि उस ने कब, कहां, क्या खर्च किया. आप के जीवन की प्राइवेसी बिलकुल समाप्त हो जाएगी. प्राइवेसी एक मौलिक हक है और उसे बचा कर रखा जाना चाहिए पर देशभक्ति, आतंकवाद और कालेधन के चक्कर में इसे कार्ड पेमैंट के शगूफे के जरिए सरकार बुरी तरह निगल रही है. नोटबंदी अपनेआप में सरकार का अपने ही नागरिकों पर आतंकी प्रहार है. करोड़ों युवाओं के किताबों में छिपा कर रखे गए 500 व 1000 के नोट निकाल लिए गए हैं और बहुतों ने तो अनापशनाप तरीके से उन्हें खर्च भी किया है. कुछ गृहिणियां तो 1000-500 के नोट महीनों बाद निकालेंगी और तब तक वे बेकार हो गए होंगे. ऊपर से सरकार ने प्राइवेसी पर काबू करने का चौकस इंतजाम कर लिया है.

कार्ड से पेमैंट करना आधुनिक तरीका हो सकता है. यह अमेरिका व यूरोप में बहुत लोकप्रिय है पर वहां लोग उधार की जिंदगी जीने के आदी हैं, वे खर्च पहले करते हैं, कमाते बाद में हैं और इसलिए कार्ड उन के लिए लाभकारी है. हमारे यहां जितनी जेब उतने खर्च की आदत है और यह अच्छी आदत है. उधार पर जीने वाले यहां बहुत सा सामान महंगा खरीदते हैं औैर अपनी कमाई को खो देते हैं. प्राइवेसी का सवाल उन के मन में भी रहता है, क्योंकि जिस से भी सामान उधार लिया जाता है, उसे अपनी फटेहाली की दास्तान सुनानी पड़ती है. कैशलैस संस्कृति के पैरोकार ढेरों में युवा वर्ग में मिल जाएंगे पर वे नहीं जानते कि क्रैडिट कार्ड उन के गले का फंदा भी बन सकता है. जहां दूरी हो वहां तो पेमैंट कार्ड से ठीक है पर आमनेसामने का लेनदेन थोपा जाए कि कार्ड से ही हो, गलत है.

बड़े भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखें

संजना 12वीं की छात्रा थी और उस का बड़ा भाई मैनेजमैंट का छात्र था. संजना का अपने भाई से दोस्ताना रिश्ता था, वे अपनी प्रौब्लम को एकदूसरे के साथ शेयर करते थे, लेकिन संजना कुछ दिन से अपने भाई अर्पित को काफी परेशान देख रही थी. संजना ने कई बार भाई की परेशानी का कारण पूछा, लेकिन वह हर बार संजना की बातों को टालता रहा. अब तो अर्पित अपनी क्लास भी मिस करने लगा था, भाई को परेशान देख संजना से रहा नहीं गया और वह भाई से बोली कि भैया मैं कई दिन से आप को परेशान देख रही हूं, आप अपनी परेशानी मुझ से साझा क्यों नहीं करते, हो सकता है कि मैं आप की परेशानी दूर करने में कुछ मदद कर पाऊं.

संजना की बातें सुन कर उस के भाई को थोड़ा बल मिला और उसे लगा कि संजना सही ही तो कह रही है. उस के भाई ने बताया कि उस की अपने कालेज की ही अदिति नाम की एक लड़की से फ्रैंडशिप है, जो उस के साथ ही मैनेजमैंट का कोर्स कर रही है. उस ने बताया कि उन की फ्रैंडशिप अब धीरेधीरे प्यार में बदलने लगी थी, लेकिन अचानक कुछ दिन से अदिति उस से दूरी बना कर रहने लगी है.

संजना अपने भाई अर्पित से बोली कि आप मुझे अपनी गर्लफ्रैंड का पता दे दीजिए, मैं खुद जा कर उस से मिलती हूं और आप से दूरी बनाने का कारण जानने की कोशिश करती हूं. हो सके तो फिर से आप की दोस्ती को नजदीकी में बदलने का प्रयास करूंगी.

एक दिन संजना अपने स्कूल से समय निकाल कर अदिति से मिली और उसे बताया कि वह अर्पित की छोटी बहन है. अदिति संजना से मिल कर बेहद खुश हुई. बातचीत के दौरान संजना ने अदिति को यह बताया कि मेरा बड़ा भाई उसे बहुत चाहता है, लेकिन अचानक उस के दूरी बनाने से वह बहुत परेशान रहने लगा है, जिस वजह से उस का पढ़ाई में भी मन नहीं लगता.

संजना की बात सुन कर अदिति बोली कि मैं भी अर्पित को बहुत चाहती हूं और मुझे उस का साथ भी बहुत अच्छा लगता है, लेकिन कुछ दिन से अर्पित मुझपर अपनी मरजी थोपने लगा था कि मैं हर काम उस के हिसाब से करूं, जिस वजह से मेरी आजादी में खलल पड़ने लगा था.

अदिति ने बताया कि अर्पित उस की तुलना दूसरी लड़कियों से करता है जो उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. अगर अर्पित को उस की कोई बात अच्छी नहीं लगती तो वह यह बात उस से सीधा कह सकता है, लेकिन दूसरी लड़कियों से उस की तुलना करना एकदम गलत है. अदिति ने यह भी बताया कि वह अर्पित के साथ रिलेशन को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन अर्पित को इस के लिए अपने व्यवहार में सुधार लाना होगा. संजना ने अदिति को यह विश्वास दिलाया कि वह अपने बडे़ भाई को अपनी आदतों में सुधार लाने के लिए कहेगी. उस ने अदिति से यह रिक्वैस्ट की कि वह उस के भाई से फ्रैंडशिप जारी रखे.

घर आ कर संजना ने अपने भाई को उस की गर्लफ्रैंड से हुई सारी बातें बताईं और दूरी बनाने का कारण भी बताया. अर्पित ने संजना से वादा किया कि वह भविष्य में कोई भी ऐसी हरकत नहीं करेगा, जिस से उस की गर्लफ्रैंड को दुख पहुंचे. संजना की इस पहल से उस के बडे़ भाई के रिश्ते गर्लफ्रैंड से पहले जैसे अच्छे हो गए. संजना ने भाई और उस की गर्लफ्रैंड पर नजर रखते हुए छोटी बहन होने का फर्ज निभाया और वह दोनों की गलतफहमियां दूर करने में कामयाब रही. छोटी बहन संजना के चलते अर्पित और अदिति दोनों जल्द ही शादी करने वाले हैं.

संजना ने बड़ी बुद्धिमानी से भाई से छोटी होने के बावजूद उन की गर्लफ्रैंड से मिल कर उन के खराब संबंधों के बावजूद फिर उन दोनों को पास लाने में मदद की, लेकिन ऐसा सभी मामलों में नहीं हो पाता, क्योंकि ज्यादातर मामलों में छोटी बहन होने के नाते वह बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड के मामलों में हाथ नहीं डालना चाहती, जबकि कई बार अपने भाई को अपनी गर्लफ्रैंड के चलते तमाम तरह की दुशवारियों का सामना करना पड़ता है. वह इस बात को अपने पैरेंट्स से भी नहीं कह पाता. ऐसी स्थिति में यदि छोटी बहन बड़े भाई की दोस्त की हैसियत से उस की गर्लफ्रैंड पर नजर रखे तो न केवल भाई को गर्लफ्रैंड से होने वाली कई तरह की परेशानियों से बचा सकती है बल्कि भाई को उस की गर्लफ्रैंड से जुड़ी गलत बातों को ले कर भी सचेत कर सकती है.

अकसर कई मामलों में लड़कियों का लड़कों के साथ दोस्ती का उद्देश्य इमोशनल अत्याचार करना भी होता है. ऐसी लड़कियां एकसाथ कई लड़कों से दोस्ती गांठ कर उन के पैसों से मौज उड़ाती हैं और अपने शौक पूरे करने के लिए उन दोस्तों से सैक्स संबंध बनाने में भी कोई गुरेज नहीं करतीं. ऐसी गर्लफ्रैंड कभी भी अपने बौयफ्रैंड के प्रति ईमानदार नहीं हो सकती, जब गर्लफ्रैंड के बारे में ऐसी बातें बौयफ्रैंड को पता चलती हैं तो उस का दिल टूट जाता है और उस के चक्कर में वह अपनी पढ़ाई व कैरियर सबकुछ बरबाद कर बैठता है.

ऐसे मामलों में छोटी बहन होने के नाते बहन अपने बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रख कर उस की अच्छीबुरी आदतों के बारे में भाई को बता सकती है और कभी जरूरत पड़ने पर भाई और उस की गर्लफ्रैंड को आमनेसामने बैठा कर उन की गलतफहमियां दूर करने में भी मदद कर सकती है.

बहन की बातों को भाई गंभीरता से ले

एक महिला महाविद्यालय में शिक्षिका रंजना अग्रहरि का कहना है कि कुछ लड़कियां कई लड़कों के साथ दोस्ती बना कर रखने में विश्वास रखती हैं. यह उसी तरह से होता है जैसे कालेज में लड़केलड़कियों की आपस में दोस्ती होती है. ऐसे में अगर आप का बड़ा भाई भी किसी लड़की को अपनी गर्लफ्रैंड बनाता है तो यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह दोस्ती प्यार तक पहुंचने लगे तो रिश्तों में संजीदगी लाना बेहद जरूरी हो जाता है. वहीं कुछ लड़कियां सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बौयफ्रैंड बनाती हैं और जब उन का मन भर जाता है तो उसे छोड़ कर दूसरे लड़के के साथ दोस्ती गांठ लेती हैं. ऐसे मामलों में दिल टूटना आम बात हो जाती है.

अगर आप घर में छोटी हैं और आप के बडे़ भाई की कोई गर्लफ्रैंड है तो एक जागरूक बहन का फर्ज निभाते हुए अपने भाई को गर्लफ्रैंड की ज्यादती का शिकार होने व इमोशनल अत्याचार से बचाने के लिए उस पर नजर रख सकती हैं. अगर आप को लगता है कि भाई की गर्लफ्रैंड का उद्देश्य आप के भाई के पैसों से मौजमस्ती करना है तो इस के प्रति भाई को सचेत कर सकती हैं. हो सकता है कि एक बारगी भाई को आप की बातों पर विश्वास न हो, लेकिन भाई को विश्वास दिलाएं कि आप उन की सगी बहन हैं और उन का बुरा कभी नहीं सोच सकतीं. यदि भाई को विश्वास न हो तो आप उस से जुडे़ कुछ सुबूत भी पेश कर सकती हैं. ऐसे में आप भाई को न केवल टूटने से बचा सकती हैं, बल्कि उन के कैरियर व पढ़ाई को भी बरबाद होने से बचा सकती हैं.

गर्लफ्रैंड को ले कर अकसर लड़कों में गलतफहमी पैदा हो जाती है. इस का मुख्य कारण उस का कई लड़कों के साथ दोस्ती रखना व उन से बातचीत करना हो सकता है, लेकिन ऐसी बातें गलत नहीं होतीं. अगर भाई को अपनी गर्लफ्रैंड की कई लड़कों से दोस्ती नागवार गुजर रही है तो आप भाई को यह समझा सकती हैं कि उस की भी अपनी लाइफ है. ऐसे में उस के आजादी के हक को छीनना गलत होगा.

बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखना पढ़ाई व कैरियर के लिए है अच्छा

गर्लफ्रैंड के चक्कर में पड़ कर अकसर लड़के अपने पढ़ाई व कैरियर दोनों बरबाद कर बैठते हैं और कई बार गर्लफ्रैंड पढ़ाईलिखाई में बेहद तेजतर्रार होती है. इस स्थिति में आप भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखने के लिए छोटी बहन होने का फायदा उठा कर उस से नजदीकियां बढ़ा सकती हैं. अपनी पढ़ाई से जुडे़ सवालों को भी हल करने में उस की मदद ले सकती हैं. इस स्थिति में भाई की गर्लफ्रैंड के व्यवहार और उस की खूबियों की जानकारी भी हो जाएगी और आप की पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं का निदान भी होगा.

यदि भाई की गर्लफ्रैंड पढ़नेलिखने में तेजतर्रार है तो वह न केवल आप के लिए फायदेमंद है बल्कि आप के भाई को भी भटकने से रोकने में मददगार साबित होती है, क्योंकि उसे पढ़ाई का महत्त्व पता होता है और वह अपने बौयफ्रैंड को पढ़ाई से जुडे़ जरूरी टिप्स भी समयसमय पर देती रहती है.

उपरोक्त बातों के अलावा भी भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखना आप के भाई और उस की गर्लफ्रैंड दोनों के लिए मददगार साबित हो सकता है, क्योंकि आप की नजर रखने से गर्लफ्रैंड की अच्छीबुरी आदतों की सही जानकारी भी हो पाती है. इस के लिए आप भाई की गर्लफ्रैंड से दोस्ती बना सकती हैं, जिस से उसे शक भी नहीं होगा और उस की खूबियों से आप रूबरू भी हो पाएंगी. हो सकता है कि वह आप के पहनावे, हेयरस्टाइल और बातचीत से प्रभावित हो कर आप के भाई से दोस्ती को और प्रगाढ़ करने के लिए कुछ टिप्स भी ले, जिसे आप आसानी से उसे दे सकती हैं.

आजकल ज्यादातर मामलों में लड़कियों से दोस्ती प्यार में बदल जाती है, ऐसी स्थिति में हो सकता है कि आप अपने भाई की गर्लफ्रैंड पर पहले से नजर रख रही हों तो आप के घर में वह जब भाभी बन कर आए तब उस की पसंद व नापसंद के बारे में आप को पहले से ही पता हो, जिस से भाभी और ननद के रिश्तों में और प्रगाढ़ता लाई जा सकती है.

अगर आप बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड पर निगरानी रख रही हैं तो आप के भाई या उस की गर्लफ्रैंड को यह कतई नहीं लगना चाहिए कि आप उन के निजी संबंधों में दखलंदाजी कर रही हैं बल्कि अगर इस बात की जानकारी हो भी जाए तो आप उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि आप जो कुछ भी कर रही हैं, उन दोनों के अच्छे के लिए कर रही हैं. इस से आप की इमेज आप के भाई और उस की गर्लफ्रैंड दोनों की नजर में अच्छी होगी और इस तरह आप एक अच्छी बहन होने का फर्ज अदा कर सकती हैं.                                           

 

तापसी पन्नू : मेहनती अभिनेत्री

अत्यंत भोली और खूबसूरत अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत तमिल, तेलुगू और हिंदी फिल्मों से की. बचपन में तापसी को अभिनेत्री बनने का शौक नहीं था. दिल्ली की रहने वाली तापसी एक सौफ्टवेयर इंजीनियर है. पढ़ाई के दौरान बीचबीच में शौकिया तौर पर मौडलिंग कर वह अपना जेबखर्च चलाती थी. वह कुछ अलग करना चाहती थी, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. इतना ही नहीं उस ने 2008 में पैंटालून फेमिना मिस फ्रैश फेस और साफी फेमिना मिस ब्यूटीफुल स्किन का खिताब भी जीता. वह काफी मेहनती है और हर फिल्म में अपना सौ फीसदी देने की वचनबद्धता रखती है. फिल्म ‘पिंक’ में उस ने मोलेस्टेशन की शिकार युवती की भूमिका बखूबी निभाई है.

वह पिछले 6 साल से फिल्म इंडस्ट्री में है. अपनी जर्नी उस ने दक्षिण भारतीय फिल्मों से शुरू की. बौलीवुड इंडस्ट्री में वह 3 साल पहले आई. वह एक इंजीनियर है और उस की अच्छी कंपनी में जौब भी लग गई थी, लेकिन उस ने जौइन नहीं किया, क्योंकि वह तो इस क्षेत्र में जाना ही नहीं चाहती थी. उस की एमबीए करने की इच्छा थी. वह मार्केटिंग की जौब चाहती थी

पहले साल उस के लिए परीक्षा दी, लेकिन वह अपनी परफौर्मैंस से संतुष्ट नहीं थी. दोबारा परीक्षा देने की सोची और इस दौरान कुछ करने की योजना बनाई. पहले से ही कुछ औफर उसे दक्षिण भारतीय फिल्मों के मिल रहे थे, क्योंकि पढ़ाई के दौरान वह पौकेटमनी के लिए मौडलिंग करती थी, जिस कारण लोगों के पास उस की तसवीरें थीं. उन्होंने उसे औफर देना शुरू कर दिया, लेकिन उस ने कहा कि मुझे न तो दक्षिण भारतीय भाषा आती है और न ही ऐक्टिंग, तो मैं कैसे काम करूंगी? तब उसे हिंदी फिल्मों के औफर नहीं मिल रहे थे, इसलिए उस ने सीरियसली नहीं लिया. साउथ की फिल्में बड़े नाम वाली थीं साथ ही तापसी से कहा गया कि यहां आ कर सभी भाषा सीख लेते हैं. फिर तापसी वहां गई और एकसाथ 2 फिल्में तमिल और तेलुगू में करने लगी.

पहली फिल्म रिलीज होने से पहले ही उस ने 3 फिल्में और साइन कर ली थीं. दोनों फिल्में दोनों भाषाओं में हिट हो गईं. इस तरह से तापसी का फिल्मी सफर शुरू हो गया. काम करतेकरते एक दिन फोन आया कि डेविड धवन की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में काम करना है. वह उन से जा कर मिली और तब से हिंदी फिल्मों की ओर रुख कर लिया. तापसी पन्नू को फिल्मों में आने की प्रेरणा किसी से नहीं मिली. वह आम युवतियों की तरह फिल्में देखती थी, कोई पैशन नहीं था. किसी ऐक्टर को ले कर क्रेजी या फैन्स वाली फीलिंग्स भी नहीं थीं. इसलिए काम करतेकरते चाहत बनी.

‘‘मेरे परिवार वालों का मुझे यहां तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान रहा. उन्होंने कभी मुझ से प्रश्न नहीं किया कि मैं कहां क्या कर रही हूं? उन को विश्वास था कि मैं जो भी करूंगी, सही करूंगी. उन के प्रयास से ही मैं ने इन ऊंचाइयों को छुआ.’’ तापसी का कहना है. 

यहां तक का सफर तय करने में तापसी को काफी जद्दोजेहद करनी पड़ी. साउथ में तो तापसी की पहली फिल्म हिट हो गई थी, लेकिन अब प्रश्न यह था कि आगे क्या करे. ऐक्टिंग अब करती रहनी पड़ेगी और जिसे ऐक्टिंग ही नहीं आती हो, उस के लिए अपने लैवल को उठाना आसान नहीं होता. दिल्ली में डीटीसी बसों में तापसी ने काफी ट्रैवल किया है. इस दौरान उस ने देखा कि अकसर सिरफिरे महिलाओं को छूने की कोशिश करते हैं. तापसी ने न तो कोई रिसर्च किया और न ही किसी ऐसी लड़की से मिली जिस ने उस की मदद की हो. अकसर लड़की को चाहिए कि यदि कोई लड़का उसे छुए तो वह कैसे व्यवहार करे.

निर्देशक सुजीत सरकार दिन में केवल एक बार आ कर कहते थे कि यदि आप के साथ ऐसा हुआ है, तो वही दिमाग में रखना है. फिर वह सीन को समझ जाती थी. वही काफी होता था तापसी के लिए, क्योंकि 2 महीने बाद तापसी को लगने लगा था कि वाकई उस के साथ ऐसा कुछ हुआ है. इस फिल्म से वह कुछ बदली नहीं है. काफी सालों से वह इस खास विषय से जुड़ी है. वह एक रेप विक्टिम एनजीओ के साथ काम करती है. समय मिलने पर वह अखबार पढ़ती है और मजबूती से इस बारे में बात भी करती है. पहले महिलाएं अपने साथ होने वाले अन्याय को चुपचाप सहती थीं अब वे इन घटनाओं की रिपोर्ट करती हैं. लेकिन मीडिया की भागीदारी भी इस में अधिक है इसलिए यह अधिक दिखता है. कुछ फर्जी घटनाएं भी होने लगी हैं.

तापसी ने प्रकाश राज की फिल्म ‘तड़का’ के लिए अपने बाल कलर करवाए थे. फिल्म खत्म होने के बाद उस के बाल काफी खराब भी हो गए थे. इसलिए उस ने उन्हें कटवा दिया. फिर साकिब के साथ फिल्म ‘मखना’ करनी थी, जिस में आधी फिल्म के बाद लुक बदलना था. ऐसे में उसे बाल कटवाना ही सही लगा. तापसी का कोई पर्टिकुलर डिजाइन नहीं है. उस की स्टाइलिश देवकी है. वह जो कहती है वह फौलो करती है. तापसी फिल्म निर्देशक  मणिरत्नम की फिल्म करना चाहती है और फवाद अफजल खान के साथ अभिनय करना चाहती है.

वरदी की आड़ में हनीट्रैप

उत्तरी दिल्ली के जय माता मार्केट, त्रिनगर का रहने वाला कमलेश कुमार एलआईसी ऐजेंट था. अपने इस काम की वजह से उसे दिन भर इधरउधर भागदौड़ करनी पड़ती थी. इस मेहनत से उसे महीने में ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. 25 मई, 2016 को वह किसी काम से त्रिनगर के पोस्ट औफिस गया. तभी उस के मोबाइल पर ज्योति नाम की एक महिला का फोन आया. वह ज्योति को पिछले 5-6 सालों से जानता था. कमलेश ने उस की जीवन बीमा पौलिसी की थी. ज्योति के सहयोग से उसे कई और भी पौलिसी मिली थीं. ज्योति ने उसे बताया, ‘‘मेरी एक बहन रोहिणी में रहती है. उसे एक पौलिसी करानी है. आप उस की कोई अच्छी सी पौलिसी कर देना.’’

‘‘उन के पास कब पहुंचना है?’’ कमलेश कुमार ने पूछा.

‘‘आज ही चले जाओ. मैं भी उसी के पास ही जा रही हूं.’’ ज्योति ने बताया.

‘‘ठीक है, मैं अभी पोस्ट औफिस में हूं. यहां से निबट कर मैं रोहिणी पहुंच जाऊंगा. वहां का एड्रेस बता दो?’’ कमलेश ने कहा.

‘‘जब तुम यहां से निकलो तो मुझे फोन कर देना, मैं वहां कहीं मिल जाऊंगी और अपने साथ ले चलूंगी.’’ ज्योति बोली.

‘‘ठीक है, मैं बता दूंगा.’’

कोई नया केस तलाशने के लिए कभीकभी कितनी मेहनत करनी पड़ती है, इस बात को कमलेश अच्छी तरह जानता था, पर अब उसे ज्योति के माध्यम से एक केस आसानी से मिलने जा रहा था. इसलिए वह खुश था. उस ने फटाफट पोस्ट औफिस का काम निपटाया और बाहर आते ही ज्योति को फोन किया. ज्योति ने उसे बताया कि वह दोपहर एक बजे रोहिणी वेस्ट मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 2 पर मिलेगी. ज्योति से बात करने के बाद कमलेश ने मोबाइल में समय देखा तो साढ़े 11 बज रहे थे. एक बजने में डेढ़ घंटा बाकी था. वह सोचने लगा कि यह टाइम कहां बिताए. उस ने कुछ लोगों को फोन किया. इत्तेफाक से पीतमपुरा के एक क्लाइंट ने उसे मिलने के लिए अपने घर बुला लिया. कमलेश के लिए तो यह अच्छा ही था क्योंकि दोपहर एक बजे उसे पीतमपुरा से आगे रोहिणी जाना था, इसलिए उस ने फटाफट अपनी स्कूटी स्टार्ट की और पीतमपुरा की तरफ चल दिया.

15 मिनट में वह पीतमपुरा में अपने क्लाइंट के यहां पहुंच गया. उस क्लाइंट को एकमुश्त मोटी रकम एलआईसी में जमा करनी थी. उसी संबंध में बातचीत करने के लिए उस ने कमलेश को घर बुलाया था. कमलेश को रोहिणी भी पहुंचना था, इसलिए बातचीत करने के बाद वह निश्चित समय पर रोहिणी वेस्ट मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 2 पर पहुंच गया. वादे के मुताबिक ज्योति वहां खड़ी मिली. रोहिणी सेक्टर-1 की तरफ जाने की बात कह कर ज्योति उस की स्कूटी पर बैठ गई. सेक्टर-1 में पानी की टंकी के पास पहुंच कर ज्योति ने किसी महिला से बात की. फिर उस ने कमलेश से कुछ देर वहीं इंतजार करने को कहा. करीब 10 मिनट बाद वहां 30-35 साल की एक महिला आई. ज्योति ने उस का परिचय अपनी सहेली के रूप में कराया. उसे भी स्कूटी पर बैठा कर कमलेश उन के बताए अनुसार विजय विहार में बी.डी. जैन पब्लिक स्कूल के पास एक फ्लैट पर पहुंच गया.

वहां पहुंच कर 30-35 साल की उस महिला ने कमलेश से कहा, ‘‘मैं आप से अभी बात करती हूं. तब तक आप अंदर एसी वाले कमरे में बैठ जाएं. कमलेश अंदर वाले कमरे में चला गया. पहले से उस कमरे में जो लड़की बैठी थी, वह कमलेश से बातचीत करने लगी. उसे वहां आए अभी 5 मिनट ही हुए थे कि उसी दौरान वहां 4 व्यक्ति आए. लंबेचौड़े डीलडौल वाले वह चारों खुद को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के लोग बता रहे थे. उन में से एक व्यक्ति पुलिस वरदी में था.’’

कमरे में घुसते ही उन्होंने कमलेश को हड़काते हुए कहा, ‘‘यहां बैठे इस लड़की के साथ गलत काम कर रहे हो?’’

उन लोगों की बात सुनते ही कमलेश हक्काबक्का रह गया. कमलेश ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘नहीं सर, आप लोगों को शायद कोई गलतफहमी हुई है. मैं तो यहां बीमा केस के संबंध में आया हूं. आप चाहें तो बाहर बैठी ज्योति से पूछ सकते हैं. ज्योति सारी सच्चाई बता देगी.’’

कमलेश की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वरदी वाले ने कमलेश के गाल पर जोरदार तमाचा मारा. पलभर के लिए कमलेश का दिमाग घूम गया. उसी दौरान कमरे में बैठी महिला वहां से चली गई. कमरे में अब कमलेश के अलावा वही 4 लोग ही थे.

कमलेश समझ गया कि उसे फंसाया गया है. ऐसी हालत में उसे क्या करना चाहिए, उस की समझ में नहीं आ रहा था. फिर भी खुद को बचाने के लिए वह उन के सामने गिड़गिड़ाने लगा. पर उन लोगों ने उस की एक नहीं सुनी. वह उसे हड़काते हुए जेल भेजने की धमकी देने लगे. तभी उन में से एक ने कमलेश की तलाशी लेनी शुरू कर दी. उन्होंने उस का पर्स निकाल लिया और बैग की भी तलाशी ली. उस के पर्स में 4-5 सौ रुपए निकले, जबकि बैग में 25 हजार रुपए थे. वह रुपए उन्होंने अपने पास रख लिए. उस के पर्स में बैंक औफ बड़ौदा, आंध्रा बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम कार्ड थे. कमलेश को ले कर वह चारों फ्लैट से बाहर निकल आए. ज्योति नाम की जिस महिला के साथ वह एलआईसी केस के लालच में उस फ्लैट में आया था, वह दूसरे कमरे में बैठी हुई थी. कमलेश समझ गया कि यह सब उसी की साजिश है.

फ्लैट के बाहर आने के बाद उन में से एक व्यक्ति ने कमलेश को एक साइड में ले जा कर कहा, ‘‘देखो तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो गई तो परेशानी में फंस जाओगे. जेल तो जाना ही पड़ेगा साथ में बदनामी होगी अलग से. फिर सालों साल कोर्ट जा कर मुकदमा लड़ते रहना. वकीलों की फीस तो तुम जानते ही हो. अगर तुम इन सब से बचना चाहते हो तो 2 लाख रुपए खर्च कर दो. सारी बात यहीं रफादफा हो जाएगी और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा.’’ यह सुन कर कमलेश कुछ सोचने लगा. फिर कुछ पल बाद वह बोला, ‘‘इतने पैसे मेरे पास तो हैं नहीं. कहां से दूंगा. मैं आप लोगों से फिर से अनुरोध करता हूं कि मुझे छोड़ दीजिए.’’ कमलेश ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हम ने तुझे जो तरीका बताया, तेरी समझ में नहीं आया. जब जेल जाएगा तब अक्ल ठिकाने आ जाएगी.’’ उसी शख्स ने धमकाया जिस ने 2 लाख रुपए में मामला रफादफा करने को कहा था. इस के बाद पुलिस वरदी वाले ने कमलेश के पर्स से निकाले हुए एटीएम कार्ड अपने एक साथी को देते हुए कहा, ‘‘इस के साथ कहीं आसपास के एटीएम बूथ पर जाओ और देखो कि इन खातों में पैसे हैं कि नहीं. यदि हों तो 2 लाख रुपए निकाल कर इस का मामला यहीं निपटा दो.’’

उस के कहने पर एक आदमी कमलेश की स्कूटी पर बैठ कर आईसीआईसीआई के एटीएम बूथ पर पहुंच गया. कमलेश ने डर की वजह से उसे अपना पिन बता दिया था. जिस के बाद उस शख्स ने कमलेश के एटीएम कार्डों से 82,200 रुपए निकाल लिए. इस तरह उन लोगों ने कमलेश से 1,10,200 ऐंठ लिए पैसे लेने के बाद उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. बिना कुछ किएधरे ही कमलेश लुटपिट कर घर पहुंचा. उस का चेहरा उतरा हुआ था. पत्नी ने उस से वजह भी पूछी पर उस ने उसे कुछ नहीं बताया. यह ऐसी बात थी, जिसे वह किसी को बताने की हिम्मत भी नहीं जुटा रहा था. 3-4 दिन बीत जाने के बाद भी वह उस घटना को भुला नहीं पा रहा था. आखिर एक दिन उस के दोस्त ने उस से उस की खामोशी और परेशानी का कारण पूछ ही लिया. सोचविचार कर कमलेश ने अपने साथ घटी पूरी घटना उसे बता दी.

उस की बात सुनने के बाद दोस्त को लगा कि उस के साथ धोखाधड़ी हुई है क्योंकि असली पुलिस होती तो उसे सीधे थाने ले जाती. अगर किसी तरह की कोई सैटिंग होती भी तो थाने में होती. दूसरे पुलिस को इस तरह किसी के खाते से पैसे निकालने का कोई हक नहीं होता. ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा कि करूं तो क्या करूं.’’ कमलेश दुखी मन से बोला.

‘‘करना क्या है, तुम्हें थाने जाना चाहिए. तुम थाने जाओगे तो उन चारों पुलिसवालों में से कोई न कोई तो वहां दिख ही जाएगा. अगर उन में से कोई न दिखे तो थानाप्रभारी को बता देना. यह भी तो हो सकता है कि वो लोग पुलिसवाले हों ही नहीं. क्योंकि इसी तरह से एक पायलट से 15 लाख रुपए लेने के आरोप में पुलिस ने दिल्ली होमगार्ड के एक पूर्व कमांडर को गिरफ्तार किया था. मेरी बात मानो, तुम थाने चलो. मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं.’’ दोस्त ने उस की हिम्मत बढ़ाई. इस के बाद कमलेश दोस्त के साथ बाहरी दिल्ली के थाना विजय विहार पहुंचा. कमलेश ने थानाप्रभारी अभिनेंद्र जैन को आपबीती सुनाई. थानाप्रभारी ने शाम 5 बजे थाने के समस्त स्टाफ की ब्रीफिंग के दौरान शिनाख्त कराई. कमलेश को उन में से कोई नहीं दिखा. इस से थानाप्रभारी को लगा कि कमलेश के साथ ठगी करने वाले या तो किसी दूसरे थाने के रहे होंगे या फिर उन्होंने फरजी पुलिस बन कर कमलेश से पैसे ऐंठे होंगे.

जो भी हो, उन्होने अपराध तो किया ही था. इसलिए थानाप्रभारी ने कमलेश की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 384/388/208/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज करवा दी. थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ विजय विहार स्थित उस फ्लैट पर गए, जहां ज्योति कमलेश को ले गई थी. वह फ्लैट बंद मिला. पता चला कि वह फ्लैट अवध गुप्ता नाम के व्यक्ति का था. पुलिस अवध गुप्ता की तलाश में जुट गई. मुखबिर की सूचना के बाद पुलिस टीम ने 2 दिन बाद ही उसे रोहिणी के विजय विहार क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने बताया कि कई सालों से वह इस फ्लैट में अकेला रहता है. उस की दोस्ती रोहिणी सेक्टर-22 के रहने वाले सुनील कुमार से थी. सुनील दिल्ली होमगार्ड में था. वह कभीकभी ज्योति नाम की एक महिला को ले कर उस के फ्लैट पर आता था. जब कभी ज्योति किसी व्यक्ति को ले कर आती थी तो सुनील अपने दोस्तों सीताराम, अनिल और आरिफ उर्फ बंटी को ले कर आ जाता था. उस वक्त सुनील पुलिस की वरदी में होता था. ये लोग उस व्यक्ति को रेप के आरोप में बंद करने की धमकी दे कर उस से मोटे पैसे ऐंठते थे. जितने पैसे ऐंठे जाते उसे सभी लोग आपस में बांट लेते थे. अवध गुप्ता ने बताया कि वह सुनील और ज्योति के ठिकानों के बारे में जानता है.

पुलिस ने अवध की निशानदेही पर ज्योति को गिरफ्तार कर लिया. शादीशुदा ज्योति की दोस्ती सुनील से थी. पैसे के लालच में वह हनीट्रैप में लोगों को फंसाने का धंधा करने लगी. कम मेहनत में उसे अच्छी कमाई होने लगी तो वह नएनए शिकार को तलाशने लगी थी. इसी चक्कर में उस ने कमलेश को फांसा था. पुलिस ने अवध गुप्ता और ज्योति को गिरफ्तार कर रोहिणी न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अन्य अभियुक्तों की तलाश में पुलिस ने उन के संभावित ठिकानों पर दबिशें दीं, पर वे लोग अपने घरों से फरार मिले. इसी तरह करीब 5 महीने बीत गए. आरोपियों का कहीं कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था. इस पर उत्तर पश्चिम जिले के डीसीपी ने यह केस जिले की स्पैशल स्टाफ यूनिट को सौंप दिया. तेजतर्रार सब इंसपेक्टर राममनोहर मिश्रा की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई गई.

यह पुलिस टीम फरार अभियुक्त सुनील कुमार, सीताराम, अनिल, आरिफ उर्फ बंटी व उन की एक महिला साथी को तलाशने लगी. लेकिन आरोपी बेहद शातिर थे. उन्हें पता चल गया था कि पुलिस उन्हें ढूंढ रही है. इसलिए वह गुप्त ठिकानों पर छिप गए थे. टीम को किसी तरह से सुनील और उस के दोस्त सीताराम के फोन नंबर मिल गए थे. पुलिस उन के फोन नंबरों के सहारे उन्हें तलाशने लगी. उन के फोन नंबरों के आधार पर 18 अक्तूबर, 2016 को एसआई राममनोहर मिश्रा की टीम ने सुनील कुमार और सीताराम को दिल्ली के बाहरी रिंग रोड स्थित विवेकानंद इंस्टीट्यूट के पास से गिरफ्तार कर लिया. वह अपनी होंडा अमेज कार नंबर डीएल 4सीएयू1658 में वहां किसी का इंतजार कर रहे थे. दोनों को स्पैशल स्टाफ औफिस ले जा कर सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

पूछताछ में पता चला कि सुनील दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-22 में रहने वाले मेवालाल का बेटा था. वह शादीशुदा था लेकिन किसी बात को ले कर उस की पत्नी से नहीं बनती थी, इसलिए वह पत्नी से अलग रहता था. सुनील दिल्ली होमगार्ड था. करीब 6 महीने पहले उस की नौकरी छूट गई थी. जब वह होमगार्ड में नौकरी करता था, तभी उस की ड्यूटी सुल्तानपुरी थाने में थी. वहीं पर सीताराम भी उस के साथ ड्यूटी करता था. सीताराम का एक भाई दिल्ली पुलिस में था. सुनील और सीताराम गहरे दोस्त थे. दोनों ही ज्यादा पैसे कमाने की बातें करते रहते थे. तभी उन के दिमाग में हनीट्रैप के जरिए पैसा कमाने का विचार आया. इस के लिए एक महिला की जरूरत थी. उस का इंतजाम सुनील ने कर दिया. दरअसल सुनील ज्योति नाम की एक महिला के साथ लिव इन रिलेशन में रहता था.

ज्योति को उस ने तैयार कर लिया. अब बात आई जगह की तो सुनील का एक जानकार था अवध गुप्ता, जिस का विजय विहार में फ्लैट था. पैसे के लालच में वह भी तैयार हो गया. सीताराम ने अपने 2 दोस्तों अनिल व आरिफ उर्फ बंटी को भी इस गैंग में शामिल कर लिया. यह दोनों गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र में रहते थे. ज्योति शिकार को फांस कर अवध गुप्ता के मकान पर ले जाती थी. फिर कुछ देर बाद सुनील अपने सभी साथियों के वहां आ धमकता था. सुनील पुलिस वरदी में होता था. इसलिए वह शिकार को डराधमका कर आसानी से पैसे झटक लेते थे. फिर उस रकम को आपस में बांट लेते थे. इस तरह उन का यह धंधा आसानी से चल रहा था. पर कमलेश कुमार के मामले में सभी फंस गए पुलिस ने सुनील और सीताराम को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया जबकि अन्य अभियुक्तों की तलाश जारी है.

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