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यह भी खूब रही

मुझे किडनी की शिकायत होने पर चिकित्सक के परामर्श के कारण पीने के पानी पर खास सख्ती बरती गई थी. रक्षाबंधन पर मेरी बहन ख्याति राखी बांधने आई, मैं ने राखी बंधवा ली और शगुन भी दिया. जब वह जाने लगी तब मैं ने कहा, ‘‘कंजूस, मिठाई या मेवा कुछ तो खिला दे.’’ तभी उस ने पानी का गिलास मेरे हाथ में थमा दिया और चली गई. मैं आश्चर्यचकित हो कर मुसकरा कर रह गया.    

– कैलाश बिंदल

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मेरी एक मौसीसास हैं, जो बहुत बुजुर्ग हैं. उन की जवानी के समय की बात है. मौसाससुर उन दिनों तहसीलदार थे. इसलिए मौसीजी की अपनी सहेलियों में बड़ी प्रतिष्ठा थी. मौसीजी की अंगरेजी सीख कर अपनी सहेलियों में रोब झाड़ने की तमन्ना  थी. एक दिन उन्होंने अपने एक भांजे से पूछा कि किशोर, अंगरेजी में मक्खियों को क्या  कहते हैं और मच्छरों को क्या कहते हैं? किशोर बड़ा नटखट था, वह बोला, ‘‘मौसीजी मक्खियों को बफैलो (भैंस ) कहते हैं और मच्छरों को एलीफैंट (हाथी).’’ दूसरे दिन मौसी जी जब सहेलियों में बैठीं तो बोलीं कि भई, गरमी के दिन हैं तो दिन में बफैलो चैन नहीं लेने देतीं और रात को एलीफैंट सोने नहीं देते. सब सहेलियां एकदूसरे का मुंह देखती हुई चुप रहीं.

रात में जब यही वाक्य मौसीजी ने मौसाजी के सामने कहा तो उन्होंने चौंक कर पूछा कि क्या तुम्हें इस का मतलब पता है? मौसीजी ने मुसकरा कर उत्तर दिया, ‘‘अरे, मक्खियां और मच्छर जो कि दिन और रात को बड़ा तंग करते हैं. मौसाजी बोले कि तुम्हें यह अंगरेजी जरूर किशोर ने सिखाई होगी चूंकि वे किशोर की आदत से वाकिफ थे. जब उन्होंने बफैलो और एलीफैंट का अर्थ समझाया तो मौसीजी सिर पकड़ कर बैठ गईं.   

– कृष्णा मेहता

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मेरे नन्हीं सी बच्ची पैदा हुई थी. एक दिन मैं घर के बाहर सब्जी के ठेले वाले से सब्जी खरीद रही थी. बैगन खरीदने पर उस ने तौल में एक छोटा बैगन दिया. मेरे बड़ा बैगन मांगने पर उस ने कहा, ‘‘बहनजी, बैगन के साथ एक उस का बच्चा भी ले लो.’’

तभी मैं ने तपाक से उत्तर दिया, ‘‘अरे भैया, मैं इस बच्चे का क्या करूंगी. मैं ने तो अभीअभी बच्चा जना है.’’ मेरा यह वाक्य सुन वहां खड़े सभी लोग हंसने लगे. जब मुझे अपनी कही बात का अर्थ समझ में आया तब मेरा चेहरा शर्म के मारे झुक गया था.

– शैलजा सक्सेना

सफर अनजाना

मुझे घूमने का बेहद शौक है. नईनई जगह घूमना, वहां के बारे में जानना और तरहतरह के व्यजंन खाना मुझे अच्छा लगता है. अपनी इस आदत के मुताबिक मैं बस से शिमला जा रही थी. बस में भीड़ थी लेकिन कुछ दूर जाने के बाद बस में नाममात्र के यात्री बचे थे. रात के सफर में मैं घबराई लेकिन घबराहट का कोई भी भाव अपने चेहरे पर न आने दिया. बस में एक 35 वर्षीय सज्जन पीछे की सीट से मेरी सीट की बगल में आ बैठे. उन्होंने मुझे देख कर कहा, ‘‘मैडम, आप अकेली जा रही हैं?’’ मेरे ‘हां’, कहने पर उन्होंने सफर के दौरान मेरे सामान की निगरानी की. वहां देखने योग्य स्थान के बारे में बताया. जब बस रुकी तो ढाबे में खाने का बिल भी उन्होंने दिया.

अगले दिन सुबह जब उन का ठिकाना आ गया तो उतरते हुए उन्होंने बाय कहा और चले गए. मुझे उस अनजान व्यक्ति के इस व्यवहार पर आश्चर्य होने के साथसाथ यह सोच कर अच्छा भी लगा कि आज भी इंसानियत जिंदा है.

रेनु तिवारी

*हम सपरिवार दिल्ली गए थे. किसी कारणवश लौटने का आरक्षण रद्द करा कर नया आरक्षण कराना पड़ा. निश्चित तिथि पर स्टेशन पहुंचे और ‘सियालदह राजधानी’ प्लेटफौर्म पर लगते ही उस में जा कर अपनी सीट पर बैठ गए. अभी सामान व्यवस्थित करने ही जा रहे थे कि अन्य यात्री के कहने पर कि ये बर्थ उन के लिए आरक्षित है, हम ताज्जुब में पड़ गए. फिर हम ने अपना टिकट देखा और निश्ंिचत हो गए. मन ही मन उन यात्रियों पर हंसने लगे कि अभी टीटी आएगा तो उन्हें नीचे उतरना पड़ेगा. तभी वहां टीटी आ गया और टिकट देख कर जब हम से सामान उतारने को कहा तो हम हक्केबक्के रह गए. ट्रेन अब चलने ही वाली थी. उस से पहले हम उतर गए. हम सोच रहे थे कि अब वे यात्री हम पर हंस रहे होंगे.

दरअसल, आरक्षण कराते समय हम ने यह ध्यान नहीं दिया कि तिथि अगले माह की लिख दी गई थी. किसी कारण ‘हावड़ा राजधानी’ उस दिन बहुत लेट जा रही थी, थोड़ी भागदौड़ करने पर हमें उस का आरक्षण टिकट मिल गया और हम अपनी यात्रा पूरी कर पाए. कभी उस घटना की बेबसी याद आती है तो सोचती हूं कि थोड़ी सी लापरवाही कितनी बड़ी मुसीबत बन जाती है. यदि हम ने टिकट कराते समय टिकट में तिथि देख ली होती तो शायद ऐसी समस्या से दोचार न होना पड़ता.      

– अमिता जैन

कैशलैस इंडिया की मुश्किलें

8 नवंबर, 2016 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 व 1,000 रुपए के पुराने नोटों के अमान्य मुद्रा होने की घोषणा की, तो आम लोगों की पहली प्रतिक्रिया थी कि यह एक नादिरशाही फैसला है. एक ऐसा निर्णय, जो बिना किसी पूर्व तैयारी के लिए लिया गया है और जिस के दूरगामी विपरीत परिणाम देश की अर्थव्यवस्था से ले कर आम जनता की सुखसहूलियत पर होंगे. मोदी ने ऐलान किया कि 50 दिन बीतने के बाद जनता के अच्छे दिनों की शुरुआत होगी और ब्लैकमनी का सफाया हो जाएगा.

50 से ज्यादा दिन बीत गए. असर क्या हुआ है, यह पूरे देश के सामने है. 50 दिन पूरे होने पर यानी 28 दिसंबर को केंद्रीय कैबिनेट ने मोदी के दबाव में अमान्य हो चुके 500 और 1,000 रुपए के पुराने नोटों के रखने की सीमा को ले कर एक अध्यादेश की मंजूरी दी. अध्यादेश में कहा गया कि 31 मार्च, 2017 के बाद अगर किसी के पास तय सीमा से ज्यादा पुराने नोट मिले तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा. इस अध्यादेश को भी जनता इस नजरिए से देख रही है कि सरकार उस पर जबरन कैशलैस व्यवहार थोप रही है, जबकि न तो वह इस का हक रखती है और न ही देश में इस के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं. जनता को अपनी इच्छा के अनुसार हांकने पर अमादा सरकार का यह रवैया इसलिए हैरान करता है कि वह देश का शासन चलाना छोड़ ऐसे काम कर रही है जिन से लोगों की जिंदगी की समस्याएं कम होने बजाय, बढ़ रही हैं.

कोढ़ में खाज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था में मौजूद ब्लैकमनी और जाली करैंसी को खत्म करने के उद्देश्य से 500 और 1,000 रुपए के नोटों को तत्काल प्रभाव से बंद करने की घोषणा की थी. इस उपाय के तहत, कुछ जगहों पर छोड़ कर 8 नवंबर की आधी रात से ये नोट अमान्य घोषित कर दिए गए. इन की जगह 500 और 2,000 रुपए के नए नोट लाए गए. लेकिन बैंकों व उन के एटीएम तक में नई करैंसी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होने से पूरे देश में अव्यवस्था का नजारा दिखा.

देश के करीब सवा 2 लाख एटीएम के बाहर कईकई दिनों तक लंबीलंबी कतारे लगीं. इस के बावजूद लोगों को जरूरत के मुताबिक पैसा नहीं मिल पाया. यही नहीं, रिजर्व बैंक की तरफ से हर रोज जारी किए जाने वाले नए नियमकायदों से भी जनता परेशान हो गई. ऐसा लगा कि जिस प्रकार नोटबंदी का फैसला बिना सोचेविचारे कर दिया गया था उसी तरह रिजर्व बैंक को भी समझ में नहीं आ रहा कि नोटों की कमी से आखिर कैसे निबटा जाए. इस बीच, सरकार, खुद प्रधानमंत्री मोदी और कई अर्थशास्त्रियों ने आम लोगों से कैशलैस हो जाने का सुझाव दिया, जो कोढ़ में खाज जैसा साबित होने लगा है.

डिजिटल लेनदेन

कैशलैस हो जाने का मतलब यह है कि लोग रुपएपैसे का लेनदेन कागजी करैंसी और सिक्कों के बजाय क्रैडिट डैबिट कार्ड रूपी प्लास्टिक मनी व कंप्यूटर, मोबाइल, स्वाइप मशीनों आदि से संचालित होने वाली डिजिटल करैंसी के रूप में करें. इस फैसले के बाद से लगातार दावा किया जा रहा है कि इस के कई फायदे हैं. जैसे इस व्यवस्था के तहत कभी भी जेब और पर्स में नोटसिक्के ले कर चलने की जरूरत नहीं है. इस के स्थान पर प्लास्टिक कार्ड या इंटरनैट से लैस मोबाइल फोन से ही सारे लेनदेन के लिए सरकार की ओर से उपभोक्ताओं और दुकानदारों को क्रमश: 1 करोड़ और 50 लाख रुपए के पुरस्कार तक देने का ऐलान किया जा चुका है.

इस के अलावा केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सभी उपक्रमों, संस्थानों, कंपनियों में कर्मचारियों के वेतन का भुगतान चैक अथवा डिजिटल प्रणाली से करने का अनिवार्य नियम बना दिया. इस का मकसद कर संग्रह में बढ़ोतरी करना बताया गया. लेकिन देखा गया है कि ज्यादातर संस्थान और कंपनियां अपने कर्मचारियों को इन्हीं तरीकों से वेतन देती रही हैं. सिर्फ छोटे या मझोले उद्योगों में उन कर्मचारियों को नकद वेतन दिया जाता है, जिन का वेतन 18 हजार रुपए या उस से कम है. ये कर्मचारी तो वैसे भी आयकर के दायरे में नहीं आते. अगर यह उद्देश्य पूरा नहीं होता है तो सवाल है कि फिर यह नया नियम भी क्यों लाया गया?

साफ है कि एक तरफ जहां सरकार अपने कैशलैस अभियान को लागू कराने के बारे में कन्फ्यूज्ड है, वहीं दूसरी ओर वह उन कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने का काम भी कर रही है जो डिजिटल लेनेदेन की व्यवस्था बनाती हैं.

इन घोषणाओं के बीच कहा जा रहा है कि अगर नोटबंदी के मौजूदा दौर में जनता रुपए पैसे के डिजिटल  लेनदेन की व्यवस्था अपना लेती है तो अगले 3 वर्षों में ही देश में डिजिटल करैंसी का इस्तेमाल 3,500 अरब रुपए तक पहुंच सकता है. सरकार ने आधार कार्ड से भी भुगतान की व्यवस्था बनाने की बात कही है. पर इतनी घोषणाओं के बावजूद न तो एटीएम और बैंकों के बाहर लगी कतारें कम हुईं और न ही लोगों को यह यकीन आया कि बिना नकदी (कैश) के भी देश में कोई खरीदारी हो सकती है.

लोगों को कैशलैस व्यवस्था की तरफ जबरदस्ती धकेलने से क्या दिक्कतें हो सकती हैं, इस का एक उदाहरण राजस्थान के जोधपुर से 80 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अमृतनगर में दिखाई दिया. वहां सरकारी राशन की दुकान में खरीदे गए समान के डिजिटल भुगतान की अनिवार्य व्यवस्था की गई, लेकिन इंटरनैट से लैस मशीनें जमीन पर कोई सिग्नल नहीं पकड़ पाईं. उन मशीनों को राशन की दुकानों की छतों पर लगाया, जहां पुरुषों-महिलाओं को जान जोखिम में डाल कर, बांस की सीढि़यां चढ़ कर जाना पड़ता है. कई बार 4-5 घंटे तक सिग्नल नहीं मिलने के कारण ग्राहकों को खाली हाथ लौटना पड़ता है.

गांवों में ही नहीं, शहरों में भी धीमे इंटरनैट या नैटवर्क नहीं मिलने के कारण डिजिटल कैश की इस व्यवस्था ने समस्याएं पैदा कर दी हैं. इस बीच, हैकिंग की घटनाओं ने जनता की चिंता और बढ़ा दी है. लोगों को लगने लगा है कि अगर उन्होंने इंटरनैट पर आधारित रुपएपैसे के लेनदेन की व्यवस्था अपनाई तो कहीं उन्हें हैकरों के हाथों अपनी जीवनभर की कमाई से भी हाथ न धोना पड़ जाए.

हालांकि इसी दौरान पेटीएम, ग्रौफर, बिग बास्केट जैसी औनलाइन पेमैंट कराने वाली और सामान बेचने वाली कंपनियों के कारोबार में कई  सौ गुना इजाफा जरूर हुआ है लेकिन शहरों में भी लोग औनलाइन पेमैंट करते वक्त इंटरनैट नहीं चलने और जेब में कैश नहीं होने की वजह से हैरानपरेशान नजर आए. साफ है कि देश में डिजिटल पेमैंट के पुख्ता इंतजाम किए बगैर जनता को कैशलैस करनेबनाने की जो मुहिम छेड़ी गई है, वह लोगों का सिरदर्द बढ़ाने वाली ही साबित होने वाली है.

खर्च देगा कौन

देश में कैशलैस व्यवस्था बनाने की मौजूदा मुहिम की राह में सब से अहम सवाल यह है कि ऐसे इंतजाम करने की आखिर क्या जरूरत है, जिस में नोटछपाई के मुकाबले कई गुना ज्यादा खर्च आ सकता है, और फिर भी वे पैसे के लेनदेन की पुख्ता व्यवस्था का विकल्प नहीं बन पा रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि 2 हजार रुपए के एक नोट की छपाईर् पर फिलहाल करीब साढ़े 3 रुपए का खर्च आता है. सौ, 5 सौ के नोट की छपाई और 2, 5, 10 रुपए की ढलाई का खर्च भी बेहद सीमित है. पर इस खर्च का एक फायदा है कि इस करैंसी को एक बाजार में उतारने के बाद उसे इस्तेमाल में लाने के लिए नया खर्च करने की जरूरत नहीं होती. पर इस की तुलना यदि रुपए पैसे की डिजिटल व्यवस्था से करें तो पता चलता है कि कैशलैस होने का मतलब बेतहाशा खर्च को वहन करना है.

मिसाल के लिए, अगर ग्राहक और दुकानदार डिजिटल लेनदेन करना चाहते हैं तो उन्हें धनराशि भेजने और स्वीकार करने के लिए कई प्रबंध करने पड़ेंगे. सब से पहले उन्हें एक अच्छा स्मार्टफोन लेना होगा, बाजार में जिस की कीमत 5 हजार रुपए से शुरू होती है. उस पर हर वक्त अच्छी स्पीड में चलने वाला इंटरनैट कनैक्शन लेना पड़ेगा, जिस की लागत जरूरत के मुताबिक 5 सौ रुपए प्रतिमाह न्यूनतम हो सकती है. यही नहीं, भुगतान करने और धनराशि स्वीकार करने के लिए ग्राहक और दुकानदार कौन सा डिजिटल प्रबंध चुनें, इसे ले कर काफी संशय बना हुआ है क्योंकि इस में एकरूपता नहीं है. जैसे, वे इस के लिए मोबाइल या डिजिटल वौलेट चुनें. पौइंट औफ सेल (पीओएस) मशीन लगाएं? क्विक रिस्पौंस कोड (क्यूआर कोड) को अपनाएं? या फिर मोबाइल पौइंट औफ सेल (एम-पीओएस) को लगवाएं? यह तय नहीं कर पाते हैं.

सब से ज्यादा समस्या यह है कि ये सारे उपाय तभी कारगर हैं जब ग्राहक और दुकानदार के पास अपना एक बैंक अकाउंट, एक सरकारी पहचानपत्र (आधार कार्ड व पैन कार्ड आदि), इंटरनैट कनैक्शन आदि हो. इस के बाद यदि दुकानदार पौइंट औफ सेल मशीन की स्थापना करता है, तो इस का शुरुआती खर्च 2 से 5 हजार रुपए है जो ऐसी मशीन खरीदने का खर्च है. इस के बाद मेंटेनैंस और हर बिक्री पर शुल्क (ट्रांजैक्शन कौस्ट) लगता है. कुछ बैंक एक महीने में तय सीमा से कम ट्रांजैक्शन होने पर जुर्माना भी लगाते हैं.

इन मशीनों पर डैबिट और क्रैडिट कार्ड से ही किसी सामान की कीमत ली जा सकती है, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये मशीनें इलैक्ट्रौनिक डाटा कैप्चर (ईडीसी) तकनीक पर ही काम कर पाती हैं. ऐसे में डिजिटल पेमैंट के अन्य उपायों के लिए दुकानदारों को दूसरे प्रबंध भी करने पड़ते हैं जिन का खर्च अलग है.

मोबाइल वौलेट

मोबाइल वौलेट यानी डिजिटल वौलेट की इस समय काफी ज्यादा चर्चा है. पेटीएम, फ्रीचार्ज, मोबिक्विक, पेयूमनी जैसे मोबाइल वौलेट्स के खूब प्रचार भी हो रहे हैं. यह तरीका स्मार्टफोन पर डाउनलोड किए गए ऐप्स के जरिए काम आता है. इस में करीब 5 हजार रुपए के स्मार्टफोन और इंटरनैट कनैक्शन की जरूरत होती है. इंटरनैट पर खर्च ग्राहक और दुकानदार, दोनों को उठाना पड़ता है. इस की खूबियां तो बहुत गिनाई जा रही हैं पर कई समस्याएं इस से जुड़ी हुई हैं.

पहली बात तो यह है कि मोबाइल वौलेट बैंकिग कायदे कानून से नहीं बंधे हैं. इस के बजाय वौलेट कंपनियां आईटी कानून के सैक्शन 43-ए से जुड़ी हुई हैं जहां कानून का पालन करना और चूक होने पर दंडित करना बहुत मुश्किल काम है. जैसे, एक आम शिकायत यह है कि कोई और्डर कैंसिल होने पर वौलेट कंपनियां वापस आई रकम ग्राहक के बैंक खाते में लौटाने के बदले एक खास कैटेगरी में रख लेती हैं, जिसे किसी और मद में खर्च करने के लिए प्रेरित करती हैं.

बैंकिंग कायदों के अनुसार, ऐसा करना गलत है, पर इन कानूनों से बाहर होने के कारण ऐसे मामलों में कोई कार्यवाही नहीं हो सकती. असल में इन्हें संचालित करने वाली कंपनियां ग्राहकदुकानदार से ज्यादा अपना फायदा देखती हैं. इन से उपभोक्ताओं की निजी जानकारियां चुराने का खतरा भी रहता है. चूंकि इस व्यवस्था में ग्राहक सीधे बैंक खाते से किसी सामान की कीमत नहीं चुकाता, बल्कि उसे पहले खाते से जरूरी पैसा वौलेट में लाना पड़ता है, ऐसे में खतरा यह है कि अगर कोई कंपनी वौलेट में रखे गए पैसे समेत भाग गई, तो पुलिसकचहरी की लंबी प्रक्रिया से लोगों को जूझना पड़ सकता है.

एम-पीओएस

पौइंट औफ सेल मशीन का एक छोटा रूप कुछ बैंकिंग कंपनियां ले कर आई हैं जिसे मोबाइल पौइंट औफ सेल मशीन (एम-पीओएस) कहा जाता है. इन से डैबिट कार्ड के माध्यम से भुगतान लियादिया जा सकता है. हालांकि इन का मासिक खर्च पीओएस के मुकाबले कम है, लेकिन डिवाइस की मेंटेनैंस, इंटरनैट का खर्च दुकानदार के लिए भारी पड़ सकता है.

क्विक रिस्पौंस कोड (क्यूआर कोड) एक अन्य डिजिटल तरीका है जिस से पैसे का लेनदेन हो सकता है. इस में कोई ग्राहक दुकान पर लगे क्यूआर कोड को अपने स्मार्टफोन के कैमरे से स्कैन करता है और आने वाले नंबर पर पैसा ट्रांसफर करता है. यह क्यूआर कोड दुकानदार को कोई बैंक मुहैया कराता है.

हालांकि कोड की स्कैनिंग की वजह से गलत खाते में पैसा ट्रांसफर होने की गुंजाइश नहीं है लेकिन ग्राहक के पास स्मार्टफोन होना जरूरी है. इस में कुछ समय के लिए बैंकिंग ट्रांजैक्शन कौस्ट से छूट मिली हुई है, लेकिन आगे चल कर इस में क्रैडिट कार्ड से भुगतान पर 2 से 2.5 प्रतिशत और डैबिट कार्ड से भुगतान पर 0.75 से 1 फीसदी की दर से शुल्क लग सकता है.

साफ है कि रुपएपैसे के लेनदेन के जितने भी डिजिटल उपाय हैं, उन्हें अपनाने पर उन की स्थापना का शुरुआती खर्च, मैंटेनैंस का मासिक खर्च और ट्रांजैक्शन चार्ज हैं जो कागजी रुपयों व सिक्कों को इस्तेमाल करने पर नहीं लगते. इस के अलावा इन उपायों में इंटरनैट की समझ और अंगरेजी हिंदी की अच्छी जानकारी व आंकड़े भरने की सावधानी भी जरूरी है. यही नहीं, साइबर खतरे भी इस राह में बहुत हैं. कब किस के खाते से कितनी रकम कौन उड़ा ले जाए, इस का भी खतरा  है. कागजी नोटों या नकदी के साथ ये सब कहीं भी जरूरी नहीं है. जिस देश में बहुत बड़ी आबादी अभी साक्षर तक नहीं है, वहां डिजिटल उपाय सिर्फ यह कहने से नहीं प्रचलन में आ जाएंगे कि उन की स्थापना पर शुरुआती खर्च और मासिक मेंटेनैंस ही तो वहन करना है.

इस तथ्य की अनदेखी कैसे हो सकती है कि आज 2 हजार रुपए के नोट की छपाई पर तो सिर्फ 3 या सवा 3 रुपए का खर्च आ रहा है, उस के बाद नोट के नष्ट होने तक उस पर कोई अन्य लागत उसे इस्तेमाल करने वालों पर नहीं आती है, जबकि डिजिटल लेनदेन में तो कदमकदम पर चार्जेज हैं. उन्हें आखिर कौन वहन करेगा? इस के अलावा इन उपायों को अपनाते हुए कई खतरों का सामना करने के लिए भी लोगों को तैयार होना पड़ेगा.

बैंकिंग पर हावी हैकिंग

देश के कैशलैस यानी नकदीविहीन अर्थव्यवस्था बनाने के संबंध में कनाडा, स्वीडन जैसे देशों के उदाहरण दिए जाते हैं. दावा किया जाता है कि वहां करीब 90 फीसदी लेनदेन डिजिटल तौरतरीकों से होता है. लेकिन इस बारे में जो उदाहरण रखे जा रहे हैं वे भारतीय समाज से काफी अलग देशों  के हैं. ऐसे ज्यादा मुल्क विकसित देशों में गिने जाते हैं और वहां साक्षरता की दर काफी ज्यादा है. हमारे देश में कागज के रुपए और धातु के सिक्के वाली करैंसी के बाद प्लास्टिक मनी को ले कर तो कसबों तक जानकारी पहुंच गई है, लेकिन डिजिटल मनी क्या है, यह शायद ही कोई जानता हो. यह अभी किसी को नहीं मालूम कि डिजिटल मनी का स्वरूप क्या होता है और आखिर कैसे उस के जरिए कोई सामान या सेवा खरीदी जा सकती है.

इस बारे में सरकार दावा करती है कि आज हमारे देश में भी करीब 35-40 करोड़ लोग रोजाना इंटरनैट से कोई न कोई कामकाज करते हैं. ईमेल भेजना, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप अकाउंट से सूचनाओं का आदानप्रदान करना, बैंकिंग व रिजर्वेशन संबंधी काम करना आदि कार्यों से आम लोगों को काफी सहूलियत भी हुई है.

सरकार की कोशिश है कि लोग अपने ज्यादतर आर्थिक लेनदेन कंप्यूटर, मोबाइल फोन या फिर एटीएम के जरिए करें. इसे डिजिटल बैंकिंग कहा जा रहा है. सरकार के इस प्रयास का बैंक और क ई आर्थिक संगठन समर्थन कर रहे हैं और इस के लिए वे कई व्यवस्थाएं भी बना रहे हैं, जैसे वे बैंकिंग यानी रुपएपैसे के लेनदेन के लिए मोबाइल ऐप बना रहे हैं, नैटबैंकिंग आदि के इंतजाम भी कर रहे हैं.

एक तरफ देश में आर्थिक गतिविधियों के डिजिटलीकरण की कोशिश की जा रही है, तो दूसरी तरफ कुछ अपराधी तत्त्व इन में सेंधमारी कर के घोटाला करने के प्रयास कर रहे हैं. वे इन सारे प्रबंधों को चौपट करते हुए लोगों के ईमेल और ट्विटर आदि अकाउंट में ही घुसपैठ नहीं कर रहे हैं, बल्कि बैंक खातों की रकम भी यहां से वहां ट्रांसफर कर रहे हैं. इस से लोगों के मन में भय बैठ गया है कि यदि कहीं उन के बैंक खातों की सूचनाएं ऐसे लोगों के हाथ लग गईं तो उन की जमापूंजी का क्या होगा. यह डर फुजूल नहीं है क्योंकि हैकरों ने इसी तरह कई बैंकों को चूना लगाया है.

इसी दौरान जब कांग्रेस पार्टी और उस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ट्विटर अकाउंट को हैक कर लेने की खबर आई, तो यह सवाल उठा कि बैंकिंग के डिजिटल उपाय आखिर कितने सुरक्षित होंगे? जनता की इस आशंका का फिलहाल कोई ठोस जवाब नहीं है कि अगर हैकर लोगों के बैंक खातों में घुसपैठ कर लें और रकम उड़ा लें या उन के पासवर्ड आदि चोरी कर के खरीदारी कर लें, तो उन के नुकसान की भरपाई कैसे होगी.

उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2016 में जब 5 देशों में मौजूद हैकर समूह – लीजन ने राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के ट्विटर अकाउंट की हैकिंग के बाद कारोबारी विजय माल्या समेत देश के कई जानेमाने पत्रकारों के अकाउंट हैक किए थे, तो उस ने यह दावा भी किया था कि भारतीय संसद और भारतीय बैंकिंग सिस्टम भी उस के निशाने पर हैं. हैकर समूह ने कहा कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम में कईर् खामियां हैं और उसे कभी भी हैक किया जा सकता है.

जनता का यह डर निराधार नहीं है क्योंकि वर्ष 2016 में ही ऐसी कई घटनाएं हुईं जिन में हैकरों ने बैंक खातों और एटीएम से रकम उड़ा ली. देश में उस वक्त बड़ी सनसनी मच गईर् थी जब एक बड़े सरकारी बैंक के करीब 6 लाख डैबिट कार्ड हैक कर लिए गए थे. बैंक ने हैकिंग की इस घटना पर परदा डालने की कोशिश की, लेकिन मामला छिप न सका. यही नहीं, इस हैकिंग से पहले देश के करीब 19 बैंकों के उपभोक्ताओं के एटीएम-डैबिट कार्ड की हैकिंग से साइबर अपराधी 1.3 करोड़ रुपए का चूना लगा चुके हैं.

विश्वव्यापी समस्या

कहने को तो भारत में अभी डिजिटल मनी के दौर की शुरुआत है, इस आधार पर कहा जा सकता है कि यहां हैकिंग का खतरा ज्यादा है, हालांकि हैकरों ने साबित किया है कि कोई भी देश उन की पहुंच से बाहर नहीं है. एक अमेरिकी पत्रिका

‘द निल्सन रिपोर्ट’ ने दावा किया है कि साइबर फ्रौड के कारण दुनियाभर के बैंकों से ले कर आम जनता के बैंक खातों में जमा करीब 22 अरब डौलर की राशि फंसी हुई है और उस के वापस मिलने की बहुत कम संभावना है.

ऐसा एक बड़ा फ्रौड हैकर वर्ष 2016 की शुरुआत में बंगलादेश के सैंट्रल बैंक से कर चुके हैं. हैकरों ने इस बैंक के 81 मिलियन डौलर यानी करीब 550 करोड़ रुपए के बराबर रकम को विदेशी खातों में ट्रांसफर कर दिया था और बैंक को इस का पता तक नहीं चला. इस साइबर लूट की जानकारी होने में ही एक महीने से ज्यादा का वक्त लग गया था.

वर्ष 2016 में ही अंतर्राष्ट्रीय हैकरों के गिरोह ने भारत के 3 बैंकों और एक फार्मा कंपनी के कंप्यूटरों को हैक कर लिया था और अपना कब्जा छोड़ने के एवज में भारी राशि वसूल की थी. खुद सरकार यह जानकारी संसद में दे चुकी है कि वर्ष 2016 में अक्तूबर तक करीब 15 हजार सरकारी वैबसाइटों पर हैकरों ने हमले किए. इस से पहले वर्ष 2015 में भारत में बैंकों को एटीएम से बड़ी रकम का गोलमाल करने वाले नौ हैकरों का भंडाफोड़ हुआ था. इन भारतीय हैकरों ने रूस और यूक्रेन के हैकरों से ट्रेनिंग ले कर देश के अलगअलग बैंकों से 2 महीने के अंदर करोड़ों रुपए निकाल लिए थे.

सवाल यह है कि हैकर्स जब बैंकों, सरकारी वैबसाइटों को नहीं छोड़ रहे हैं, तो वे एक आम उपभोक्ता के खातों में कोई गड़बड़ी कर रकम निकालने में भला क्यों चूकेंगे. खासतौर से यह देखते हुए कि जिस मोबाइल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैशलैस लेनदेन का सब से अहम औजार बता और बना रहे है, वह तो और भी आसानी से हैकरों के कब्जे में चला जाता है. इस बारे में औनलाइन सिक्योरिटी कंपनी चैकपौइंट सौफ्टवेयर टैक्नोलौजी के शोधकर्ता पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि दुनियाभर के 90 करोड़ एंड्रौयड आधारित स्मार्टफोन कभी भी हैकिंग के शिकार हो सकते हैं और उन के फोन का सारा डाटा निकाला जा सकता है.

एक अन्य संगठन एफआईसीओ (फिको) के मुताबिक, अमेरिका समेत पूरी दुनिया में एटीएम डैबिट कार्ड का डेटा चुरा कर फ्रौड करने की घटनाओं में दिनप्रतिदिन इजाफा हो रहा है. इसलिए यह मानना बेमानी है कि भारत इस से सुरक्षित रह सकता है. इस पर देश की गरीब, अनपढ़ जनता के लिए समस्या और बढ़ जाती है क्योंकि किसी साइबर फ्रौड की शिकार होने पर वह कहां शिकायत करे, कैसे शिकायत करे, इस के बारे में तो उसे कोईर् जानकारी ही नहीं है.

इस के अलावा देश में अभी हैकिंग जैसे साइबर अपराधों की रोकथाम के माकूल प्रबंध भी नहीं हैं. कहने को तो देश में इस संबंध में वर्ष 2000 में सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून लागू किया गया था, लेकिन डिजिटल लेनदेन से होने वाली गड़बडि़यों के बारे में इस कानून में कोईर् खास दिशानिर्देश नहीं है.

वहीं, रिजर्व बैंक ही देश में बैंकों के लिए सुरक्षा और निजता संबंधी मानक बनाता है, लेकिन पेटीएम, फ्रीचार्ज और मोबीक्विक जैसे डिजिटल वौलेट गैरबैंकिंग वित्तीय निगम की श्रेणी में आते हैं, जिन्हें रिजर्व बैंक के विवेकाधिकार से बाहर रखा गया है. इस कारण डिजिटल भुगतान के दौरान उपभोक्ताओं को नुकसान होने पर उन्हें किसी प्रकार का कानूनी संरक्षण नहीं मिल पा रहा है.

एक समस्या यह भी है कि अभी दुनिया में कोईर् ऐसा अंतर्राष्ट्रीय सिस्टम नहीं बना है जो इंटरनैट सेवाप्रदाताओं को उन के पास मौजूद सूचनाओं को किसी देश की सरकार के साथ साझा करने को मजबूर कर सके. यह भी साफ नहीं है कि यदि सूचनाओं के आदानप्रदान को ले कर किसी इंटरनैट सेवाप्रदाता के साथ कोई समस्या या विवाद उत्पन्न होगा, तो उस की सुनवाई कहां होगी यानी उस का न्यायिक क्षेत्राधिकार कहां माना जाएगा? चूंकि वर्चुअल यानी साइबर अपराधियों को कोई स्पष्ट चेहरा नहीं होता, लिहाजा, उन्हें ट्रैक करना और उन की पहचान करना मुश्किल होता है. ये चाहे किसी संगठन का हिस्सा हों या अकेले व्यक्ति हों, दुनिया के किसी भी कोने से हमला कर सकते हैं और व्यक्ति की प्राइवेसी को तहसनहस कर सकते हैं.

इंटरनैट में अमीर गरीब

एक बार यदि यह मान लें कि देश का हर व्यक्ति डिजिटल लेनदेन के लिए राजी हो जाता है, तो सवाल यह है कि क्या इंटरनैट की पहुंच देश के हर व्यक्ति तक है? इस सवाल का एक जवाब यह है कि हमारे देश में अभी इंटरनैट शहरी और अमीर तबके को संबोधित करने वाली सुविधा है. इंटरनैट के नैटवर्क, कटैंट और रेट इन तीनों पर शहरों के अमीरों व प्रभुत्वशाली तबके  का कब्जा है.

यानी भारत में इंटरनैट का अभी जो नैटवर्क मौजूद है वह शहरी व संपन्न इलाकों में है. इस पर जो कटैंट यानी सामग्री है, उस के ग्राहक या उपभोक्ता यही शहरी लोग हैं और तीसरी महत्त्वपूर्ण चीज यानी इंटरनैट की लागत (रेट) भी अभी अमीरों की जेब के मुताबिक ही है.

गांवकसबों में बसने वाले इस भारत का डिजिटल संसार में पिछड़ापन इतना अखरने वाला है कि एक ओर आज जहां हमारे शहर शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और खरीदारी से ले कर रेल आरक्षण तक में मोबाइल, इंटरनैट के जरिए घर बैठे सुविधा पा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण व दुर्गम इलाकों की जनता का ज्यादातर हिस्सा इन सारी सहूलियतों से कोसों दूर है. शहरों में इंटरनैट की जैसी भी पहुंच बनी है, वह सरकारी कोशिशों के बजाय प्राइवेट टैलीकौम कंपनियों की बदौलत बनी है. अगर वहां से इंटरनैट सुविधाएं पहुंचाने का काम सरकारी एजेंसियों के भरोसे होता, तो हमारे शहरों का किस्सा गांवों से अलग नहीं होता.

उल्लेखनीय है कि पिछली यूपीए सरकार ने देश की ढाई लाख ग्रामपंचायतों को ब्रौडबैंड इंटरनैट से जोड़ने का संकल्प किया था. कई बार डैडलाइंस (आखिरी तारीखें) आगे बढ़ाने के बावजूद यह संकल्प अधर में ही लटका रहा क्योंकि इस दावे की हकीकत यह है कि अभी तक सिर्फ 60 गांवों में ही इंटरनैट पहुंचाया जा सका है. अब सारी उम्मीदें डिजिटल इंडिया जैसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम पर आ कर टिक गई हैं जिस में 2019 तक देश की ढाई लाख ग्रामपंचायतों को इंटरनैट के ब्रौडबैंड कनैक्शन से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है.

इंटरनैट की कछुआ चाल

यह सिर्फ एक मिसाल है पर इस से देश की इंटरनैट गरीबी जाहिर होती है. यह गरीबी कई स्तरों पर कायम है. जैसे, मामला इंटरनैट की स्पीड का ही लें.

इस बारे क्लाउड कंप्यूटिंग और कंटैंट डिलीवरी नैटवर्क-एकामाई ने कुछ समय पहले एक रिपोर्ट ‘द स्टेट औफ द इंटरनैट रिपोर्ट’ जारी की थी. उस के मुताबिक, भारत में मौजूदा सर्विस प्रोवाइडरों के खिलाफ इंटरनैट की धीमी स्पीड की सब से ज्यादा शिकायतें हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में औसत इंटरनैट स्पीड 2 एमबीपीएस है, जबकि विश्व स्तर पर इंटरनैट की स्पीड 4.6 एमबीपीएस है. भारत में केवल 1.2 फीसदी ब्रौडबैंड के उपभोक्ता 10 एमबीपीएस से ज्यादा की स्पीड पर इंटरनैट चला रहे हैं, जबकि दक्षिण कोरिया जैसे देश में 95 फीसदी ग्राहकों को इंटरनैट 4 एमबीपीएस से ज्यादा की गति पर चलता हुआ मिलता है. इंटरनैट की औसत गति के मामले में भारत दुनियाभर में 114वें नंबर पर है.

यही नहीं, भारत में ब्रौडबैंड इंटरनैट की सुविधा पा रहे लोगों को इस के लिए काफी ज्यादा कीमत भी चुकानी पड़ती है. यानी नैटवर्क, कंटैंट और नैटस्पीड की जो शिकायतें हैं, वे बेमानी नहीं हैं.

इसी तरह, बिजली की कमी हमारे गांवों की एक और बड़ी समस्या है. देश के हजारों गांव अब भी बिजली के दर्शन के लिए तरस रहे हैं, ऐसे में क्या इंटरनैट चलेगा और क्या डिजिटल खरीदारी होगी?

मुंबई में लौंच हुआ पहला फिटनेस ऐप ‘मेवोफिट’

फिटनेस आपके लाइफस्टाइल और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में काम करती है. फिटनेस से आत्मविश्वास बढ़ता है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि बार-बार जिम में जाना संभव नहीं होता. ऐसे में अगर कोई ऐसा ऐप आपको मिले जो आपके फिटनेस को पूरी तरह कायम रख सके, तो फिर क्या कहने.

कुछ इसी बात को ध्यान में रखते हुए मुंबई में मेवोलाइफ ने फिटनेस ऐप मेवोफिट को लौंच किया है. इसे फ्री डाउनलोड किया जा सकता है. इस बारें में मेवोलिफ की फाउंडर ख्याति महाजन कहती है कि मुझे फिट रहना बहुत पसंद है लेकिन इसके लिए अलग-अलग ऐप्स डाउनलोड करने पड़ते थे. कई साल की रिसर्च के बाद मैंने इस तरह का ऐप बनाया है, जिसमें एक साथ सारी जानकारी हो. इस ऐप में आपको एक साथ डाइट, व्यायाम, रेसिपी आदि सब मिलता है.

ये आज की नारी के लिए एक सफल ऐप है. फिटनेस दीवा और बॉलीवुड एक्ट्रेस लौरेन गोटलीब का कहना है कि सिर्फ 15 मिनट की वर्कआउट से कोई भी व्यक्ति फिट रह सकता है, लेकिन ये नियमित करना जरुरी है.

कमाई के अखाड़े में धोबीपछाड़

आमिर खान खुद अपनी ही कमाई का रिकौर्ड तोड़ने के लिए फिल्में बनाते हैं. पहले उन्होंने ‘थ्री ईडियट्स’ का कलैक्शन पीछे छोड़ा था फिल्म ‘पीके’ से और उन्हीं की फिल्म ‘दंगल’ ने ‘पीके’ को कमाई के मामले में पीछे छोड़ते हुए भारत की अब तक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म का स्टेटस हासिल कर लिया है.

नए साल के शुरुआती सप्ताह में इस फिल्म ने 350 करोड़ की कमाई कर यह रिकौर्ड बनाया है. फिल्म अभी भी नौनवीकेंड में अच्छा कारोबार कर रही है. जिस से उम्मीद बंधी है कि दंगल के जरिए आमिर खान कमाई के अखाड़े में और अभी कई धोबीपछाड़ दांव दिखाने वाले हैं. 

मजेदार बात यह है कि जब बौलीवुड से ज्यादातर कौर्पोरेट प्रोडक्शन हाउस नुकसान के चलते अपना बोरियाबिस्तर समेट रहे हैं, ऐसे में डिज्नी इंडिया स्टूडियो, जो लगातार असफल फिल्मों के निर्माण से घाटा उठा रहा था, को ‘दंगल’ ने मोटा मुनाफा कमा कर दिया है.

मुगालते में शिवपाल यादव

विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत न मिलने से निर्दलीय विधायकों को लेकर शिवपाल यादव किंग मेकर हो जायेंगे, यह एक तरह का मुगालता ही है. अब दलबदल कानून बदल चुका है. दल तोड़ना और नया दल बनाकर किसी को समर्थन देना सरल नहीं रह गया है. शिवपाल के लिये सपा को तोड़ना सपने जैसा ही है क्योंकि चुनाव में सफलता न मिलने के बाद भी सपा विधायक अखिलेश के साथ ही रहना पसंद करेंगे, क्योंकि ज्यादातर टिकट अखिलेश ने अपने गुट के लोगों को ही दिये है. अपने बयान से शिवपाल केवल अखिलेश को भड़काना चाह रहे हैं. अखिलेश इस चाल को समझते हुए चुप हैं. राजनीति में शिवपाल जैसी उहापोह की हालत ठीक नहीं होती है.

कभी समाजवादी पार्टी का केन्द्र रहे शिवपाल यादव आज हाशिये पर हैं. समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ रहे शिवपाल यादव ने 11 मार्च के बाद नई पार्टी बनाने की बात कह कर यह साबित किया है कि वह अब भी उहापोह में हैं कि आने वाले दिनों में क्या करें? राजनीति में उहापोह की हालत खतरनाक होती है. समय पर फैसला न लेने वाला कमजोर कहा जाता है और वह मात भी खाता है. शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं. उनका बेटा आदित्य यादव भी विधानसभा का चुनाव समाजवादी पार्टी के ही टिकट पर लड़ रहा है. इसके बाद भी शिवपाल यादव 11 मार्च के बाद नई पार्टी के गठन की बात क्यों कर रहे हैं. यह उनके समर्थक और विरोधी दोनों ही समझ पाने में असफल हैं.

शिवपाल यादव यह चाहते हैं कि अखिलेश इस बयान से नाराज होकर उनका टिकट काट दें. जिससे वह खुलकर अखिलेश का विरोध कर सकें. अखिलेश यह बात समझते हैं और वह उनकी इस तरह की बातों को कोई महत्व ने देने का मन बना चुके हैं. चुनाव के बाद जो समीकरण होंगे, वह इस बात पर तय होंगे कि सपा-कांग्रेस गठबंधन का चुनावी प्रदर्शन कैसा रहता है? अगर यह मान लें कि यह गठबंधन सत्ता में नहीं आयेगा, तब भी सपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले विधायकों पर अखिलेश यादव का दबाव ज्यादा रहेगा. ऐसे में शिवपाल यादव के साथ पार्टी के उतने विधायक नहीं रहेंगे कि वह पार्टी का विभाजन कर सकें.

अगर शिवपाल यादव खुद पार्टी से अलग होकर नई पार्टी बनाते हैं तो विधानसभा से उनको इस्तीफा देना पड़ेगा. ऐसे में उनके साथ कौन विधायक खड़े होंगे यह देखने वाली बात है. अगर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की मांग बढ़ जायेगी. इस हालत में भी शिवपाल यादव के लिये अलग दल बनाकर किसी को समर्थन देना सरल नहीं होगा. शिवपाल के ज्यादातर साथी बहुजन समाज पार्टी और लोकदल से चुनाव लड़ रहे हैं. इनके लिये भी अपने दलों से बगावत करके शिवपाल के साथ मिलकर नई पार्टी बनाना सरल नहीं होगा.

उत्तर प्रदेश में 1995 से 2007 तक दलबदल का दौर चला था. 2003 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाने में शिवपाल यादव की महत्वपूर्ण भूमिका थी. अब उस समय को 14 साल हो गये हैं. दलबदल कानून से लेकर चुनाव आयोग और अदालत तक ज्यादा मुखर हो चुकी है. मीडिया नये तेवर में सामने है. ऐसे में अब पहले जैसे दलबदल की उम्मीद नहीं करनी चाहिये. चुनाव के पहले अगर शिवपाल यादव ने कोई मजबूत स्टैंड लिया होता तो चुनाव बाद उनके उभरने के मौके थे. चुनाव बाद स्पष्ट बहुमत न मिलने से शिवपाल यादव नई पार्टी बनाकर किंग मेकर बन जायेंगे यह किसी शिगूफे जैसा है. शिवपाल यादव और उनके रणनीतिकार सपा में भीतरघात कर अखिलेश के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं. अपनी हालत सुधार पायेंगे, ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

प्रैग्नैंट लिसा का कूल अवतार

अभिनेत्री लिसा हेडन ने जिस तरह से अपनी अचानक हुई शादी की खबर सोशल मीडिया में सब को दे कर चौंका दिया था, ठीक उसी तरह उन के मां बनने की खबर भी चौंकाऊ लहजे में तब आई जब उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए गर्भवती होने की जानकारी काफी स्टाइलिश तरीके से दी. काले रंग की बिकिनी में उन का बेबीबंप नजर आ रहा था. याद हो कि लिसा की तरह करीना कपूर खान ने भी कुछ इसी तरह से फैशनेबल अंदाज में प्रैग्नैंसी की खबर दी थी. लिसा ने अपने प्रेमी डिनो लालवानी से एक साल की डेटिंग के बाद साल 2016 में शादी की थी.

कल तक प्रैग्नैंसी के दौरान मीडिया से दूर रहने वाली अभिनेत्रियों का इस तरह सहजता से सामने आना सकारात्मक संदेश है और उन महिलाओं को प्रेरित कर सकता है जो गर्भावस्था के दौरान सब कामकाज छोड़ कर बैडरैस्ट करने पर भरोसा करती हैं और इस गलतफहमी को हवा देती रहती हैं कि गर्भावस्था के दौरान  काम करने से स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है.

बीसीसीआई से अनुराग आउट

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को हटा दिया. लोढ़ा समिति की रिपोर्टें न मानने के कारण अध्यक्ष और सचिव को हटाया गया. प्रबंधकों की एक कमेटी फिलहाल बीसीसीआई का कामकाज देखेगी.

दरअसल, भारत में क्रिकेट की दीवानगी ऐसी है कि कोई दूसरा खेल आज गेंद और बल्ले का मुकाबला नहीं कर सकता. क्रिकेट के जरिए बीसीसीआई का खजाना भरता गया और दुनिया के सब से रईस माने जाने वाली संस्था बीसीसीआई की अध्यक्ष की कुरसी पर हर कोई बैठने के लिए बेताब हो गया. विडंबना देखिए इस कुरसी में खिलाड़ी छोड़ कर अब तक वही बैठ पाया जिस के पास पैसा और पावर था.

अनुराग ठाकुर वर्ष 2000 में हिमाचल प्रदेश राज्य क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने. वर्ष 2001 में भारतीय जूनियर क्रिकेट टीम के राष्ट्रीय चयनकर्ता बने, वर्ष 2008 में उपचुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे, वर्ष 2009 में हमीरपुर से फिर लोकसभा चुनाव जीते, वर्ष 2015 में बीसीसीआई के सचिव और वर्ष 2016 में अध्यक्ष की कुरसी पर काबिज हो गए.

इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीसीसीआई की कुरसी को पाने के लिए कितनी पावर चाहिए.

अनुराग ठाकुर अपने को सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर समझने लगे थे और वे कोर्ट को गुमराह करने की जुगत में लग गए. तमाम तरह की दलीलें देने लगे. सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को कई बार इस बारे में फटकार भी लगाई पर अनुराग अपनी तिकड़म भिड़ाते रहे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने उन की न चल सकी और अंत में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आउट कर दिया.           

भाजपाई रामपाल

जैसे ही किसी बौलीवुड कलाकार का कैरियर डोलने लगता है, तुरंत वह किसी राजनीतिक पार्टी की गोद में जा बैठता है. पार्टियां जनता में लोकप्रिय चेहरे को भीड़ जुटाने के लिए इस्तेमाल करती हैं. राज बब्बर, गोविंदा, राजेश खन्ना से ले कर अमिताभ बच्चन तक सब ने यही किया.

कुछ सालों से नाकामी देख रहे अभिनेता अर्जुन रामपाल भाजपा में शामिल होने के लिए उतावले हैं. बीते दिनों जब वे दिल्ली में भाजपा के मुख्यालय पहुंचे तो बात साफ हो गई. वे भले यह कहते हों, ‘‘मैं राजनेता नहीं हूं और यहां राजनीति के लिए नहीं आया हूं. मैं यहां यह देखने आया हूं कि मैं किस तरह भाजपा को अपना समर्थन दे सकता हूं,’’ लेकिन पार्टी से उन का जुड़ना तय है.

5 राज्यों  में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. देखते हैं रामपाल भगवाई रंग में क्या गुल खिला पाते हैं.  

राज्यों में चुनाव

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोआ और मणिपुर की विधानसभाओं के चुनावों में प्रधानमंत्री व भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी की परीक्षा होनी है. क्या वे गोआ व पंजाब में अपनी सरकारें बचाए रख पाते हैं और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में 2014 का वोट प्रतिशत स्थिर रख पाते हैं? ये चुनाव देश को चाहे न नई दिशा दें, न कोई बदलाव कराएं, 11 मार्च तक सुर्खियों में बने जरूर रहेंगे.

चुनावों से लोकतंत्र मजबूत होता है, यह कहना अब मुश्किल होता जा रहा है. पिछले कुछ चुनावों से साफ दिख रहा है कि नेताओं के भाषणों से न विकास बढ़ता है, न समस्याएं दूर होती हैं. जो दल जाति के नाम पर वोट हासिल करते हैं वे उन वोटरों तक के लिए भी अगले 4-5 साल कुछ नहीं कर पाते. उन का सारा समय अफसरों को इधर से उधर करने और आपसी जूतमपैजार में बीत जाता है.

नरेंद्र मोदी ने 14 मई, 2014 से पहले चुनावप्रचार के दौरान बड़े सब्जबाग दिखाए थे पर 2016 के अंत में हिटलरी और स्टालिनी युग की याद दिलाते हुए उन्होंने एक मूर्खतापूर्ण, तुगलकी फैसले से लोगों को कतारों में खड़ा कर दिया. आज भी जनता का लाखोंकरोड़ रुपया बैंकों के खातों में बंद है जिस पर सरकार विषैले सांप की तरह कुंडली मारे बैठी है और कहती है कि पहले हिसाब लाओ, फिर अपना पैसा ले जाओ, पहले उस का मनमाना लगाया टैक्स भरो, फिर अपना पैसा मांगो.

ऐसा नहीं कि सिर्फ अमीर आदमी इस कष्ट को भोग रहे हैं, इन 5 राज्यों की जनता भी वही कष्ट भोग रही है और वह सरकार के आगे असहाय है, कुछ कर नहीं सकती. डा. भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘एनीहिलेशन औफ कास्ट’ में सही कहा था कि हिंदू लोग नाटे और बौने हैं और उन में स्टेमिना है ही नहीं. उन के अनुसार, इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या सेना के लिए बेकार है. ऐसा देश वोट के सहारे भी अपने हितों की नहीं सोच सकता क्योंकि उसे तो दूसरों के झूठे वादों पर जीने की आदत पड़ गई है.

इन 5 राज्यों के चुनावों में जो होने वाला है, दिख रहा है. भारतीय जनता पार्टी तो कोई वादा ही नहीं कर रही है. वह तो 10 पाकिस्तानियों को मार डालने और नोटबंदी पर मैडल मांग रही है. उसे मैडल मिल भी सकता है क्योंकि ‘पांय लागूं महाराज’ कहने वाले वोटरों की कमी नहीं. यह पांय लागूं संस्कृति अब बहुजन समाज पार्टी में भी है, समाजवादी पार्टी में भी और आम आदमी पार्टी में भी. जहां कम है, वहां कहा जाता है कि अनुशासन नहीं.

पांय लागूं संस्कृति की देन वाला वोटर अपने हितों के लिए ही मतदान करेगा, इस की आशा नहीं है. वह तो हां में हां मिलाएगा और जो उसे सब से ज्यादा आशीर्वाद देगा, उसे वोट देगा.

इन राज्य चुनावों में परीक्षा तो मतदाताओं की होनी है कि वे लोकतंत्र के हकदारों को चुनते हैं या नहीं. क्या वे राज्यों में निरंकुश, आपस में लड़ती, जिद्दी, दिशाहीन सरकारों को चुन कर नाचेंगे, गुलालअबीर बिखेरेंगे? ये चुनाव देश के इतिहास पर एक और काला धब्बा होंगे. इस तरह के परिणामों का असर तुरंत पता नहीं चलता क्योंकि जब पूरी दीवार पीक के धब्बों से भरी हो तो एक और दाग कहां दिखता है.

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