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कांग्रेसियों पर मोदी के नये तेवर

पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह के रेनकोट में नहाने से लेकर कांग्रेस नेताओं की जन्मपत्री याद दिलाने को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नये तेवर में नजर आ रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के नये तेवर ठीक वैसे ही हैं जैसे लोकसभा चुनाव के पहले थे. लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 100 दिन के अंदर भ्रष्टाचारी और अपराधी जेल में होंगे. कांग्रेस के दामाद जी पर तो बाकायदा किताब तक जारी हो गई थी. यह बात और है कि मई माह में लोकसभा चुनाव का तीसरा साल पूरा होने वाला है. कांग्रेस का नेता तो क्या कोई कार्यकर्ता तक भ्रष्टाचार के आरोप में जेल नहीं गया. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जब राहुल-अखिलेश की जोड़ी ने मोदी राज पर हमला शुरू किया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुराने तेवर में आने को मजबूर हो गये. वह यह भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के विरोध से वोट नहीं मिलने वाले. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में केन्द्र सरकार का कामकाज भी मुद्दा है. खासकर नोटबंदी को लेकर प्रदेश की जनता अपना मत देगी.

कांग्रेस का विरोध प्रधानमंत्री के लिये लोकसभा में संजीवनी साबित हो चुका है. उत्तर प्रदेश में हालात बदले हुये हैं. कांग्रेस, सपा और बसपा का विरोध करने वाली भाजपा ने सभी दलों के नेताओं को गले लगा लिया है. भाजपा में शामिल होकर यह नेता गंगा नहा कर पवित्र हो चुके हैं. दलबदल करने वाले नेताओं और उनके परिवार के लोगों को टिकट देकर भाजपा ने अपनी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया है. जिलों जिलों में भाजपा के लोग पार्टी नेताओं पर टिकट बेचने तक का आरोप लगा रहे हैं. भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके जिस तरह से अपनी पार्टी के परिवारवादी नेताओं के लोगों को टिकट दिया है उससे साफ जाहिर है कि परिवार के हमाम में भाजपा भी कांग्रेस की तरह कार्बन कापी बनने का आतुर है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपा को परिवार का कुनबा बताया. वह यह भूल गये कि भाजपा भी कुनबा बनती जा रही है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी चुनाव मैदान में है. बाकी नेताओं के भी बेटा बेटी टिकट पाकर चुनाव लड़ रहे है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा कार्यकर्ता जनता के सवालों के जवाब देने में असफल दिख रहे हैं. ऐसे लोगों में चेतना जगाने के लिये प्रधानमंत्री ने फिर से अपने कार्यकर्ताओं को कांग्रेस और खासकर गांधी परिवार पर हमला कर मुद्दा देने की कोशिश की है. यह बात और है कि कांग्रेस बुरी और कांग्रेसी अच्छे इस सवाल का भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है. उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक में भाजपा ने बड़ी संख्या में कांग्रेसी नेताओं का भगवाकरण जरूर कर दिया है. ऐसे काग्रेसी कार्यकर्ताओं के नीचे भगवा कार्यकर्ता कैसे काम करे यह उर्जा नहीं मिल पा रही है.

अपने कार्यकर्ताओं को समझाने के लिये केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही कांग्रेस पर हमला नहीं बोला, बल्कि संघ और उससे जुड़े दूसरे संगठन भी अपने कार्यकर्ता को कांग्रेस विरोध के बहाने ऊर्जा भरने में लगे हैं. यह लोग अपने कार्यकर्ताओं को समझा रहे हैं कि लोहे को काटने के लिये लोहा जरूरी होता है. कांग्रेस को काटने के लिये कांग्रेसी जरूरी हैं. कांग्रेस विरोध के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी और संगठन के दूसरे लोग अपने कार्यकर्ताओं को जाग्रत करने और पार्टी के लिये चुनाव में काम करने के लिये तैयार कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा का कांग्रेस विरोध खत्म हो जायेगा. 

मेरी आंखों के नीचे काले घेरे हो गए हैं. मेरे बाल भी बहुत गिर रहे हैं. कोई उपाय बताएं.

सवाल

मैं 21 वर्षीय युवती हूं. मेरी समस्या यह है कि मेरी आंखों के नीचे काले घेरे हो गए हैं. साथ ही मेरे बाल भी बहुत गिर रहे हैं. दोनों समस्याओं से नजात पाने का कोई उपाय बताएं?

जवाब

नींद पूरी न होने और स्ट्रैस की वजह से भी आंखों के नीचे काले घेरे हो जाते हैं. इस के अलावा ज्यादा देर तक कंप्यूटर पर काम करने से या मोबाइल का अधिक प्रयोग करने पर भी आंखों के नीचे काले घेरे होने की समस्या हो जाती है. आंखों के नीचे के काले घेरे दूर करने के लिए सोते समय आंखों के नीचे बादाम के तेल से हलके हाथों से मसाज करें. साथ ही आप चाहें तो बाजार में मिलने वाली अंडर आई क्रीम और अंडर आई पैक का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

जहां तक गिरते बालों की समस्या है, इस के लिए भोजन में संतुलित और पौष्टिक आहार लें. साथ ही जैतून व नारियल तेल से स्कैल्प की अच्छी तरह मसाज करें. इस से स्कैल्प का ब्लक सर्कुलेशन बेहतर होता है और बालों का गिरना भी रुकता है. बालों पर कोई कैमिकल ट्रीटमैंट न कराएं. कई बार कैमिकल ट्रीटमैंट से भी बाल गिरने लगते हैं.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मेरे छोटे भाई की बीवी का सीना एकदम सपाट है. वह उसे रखना नहीं चाहता. हम लोग क्या करें.

सवाल

मेरे छोटे भाई की शादी कुछ महीने पहले ही हुई है. उस की बीवी का सीना एकदम सपाट है. लिहाजा, वह उसे रखना नहीं चाहता. हम लोग क्या करें?

जवाब

लड़कियों के सीने का उभार हार्मोनों पर निर्भर रहता है. आप लोगों को शादी से पहले लड़की को ठीक से देखना चाहिए था. शादी के बाद इस तरह की बातें फुजूल होती हैं.

वैसे, बच्चा होने के बाद सीना कुछ हद तक ठीक हो जाएगा. आप अपने भाई को समझाएं कि बीवी जैसी भी है, उसे ही प्यार करे. आप इस बारे में लेडी डाक्टर से भी बात कर सकते हैं.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

सनी लियोनी लेकर आई हैं ‘सुपर हॉट सनी मॉर्निंग्स’, वीडियो हुआ वायरल

बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक कि अभिनेत्रियां अपने आपको फिट रखने और आकर्षक दिखने के लिए तमाम कोशिशें करती हैं. एक्ट्रेसेस ज्यादातर इसके लिए योगा का इस्तेमाल करना पसंद करती हैं. बॉलीवुड में तमाम ऐसी एक्ट्रेसेस हैं जिन्होंने फिटनेस डीवीडी लांच कर अपने साथ-साथ पूरे देश को फिट रहने के लिए प्रोत्‍साहित किया है. इस तरह पोर्न स्टार से बॉलीवुड स्टार बनी सनी लियोनी भी अपने फिगर को बरकरार रखने के लिए योग करती हैं.

सनी लियोनी भी आज कल योग कर लोगों को फिटनेस फंडा सिखा रही हैं. अभी कुछ दिन पहले ही सनी ने ‘सुपर हॉट सनी मॉर्निंग्स’ नाम से अपनी योगा डीवीडी लॉन्च किया है. बोल्ड सनी ‌लियोनी ने योगा का हॉट वीडियो जारी कर हलचल मचा दी है.

पोर्न स्टार से बॉलीवुड स्टार बनी सनी लियोनी आज भी अपनी पोर्न स्टार वाली इमेज से बाहर नहीं निकल पाई हैं. शायद इसीलिए उनकी फिल्मों में उनके रोल अमूमन काफी उत्तेजक होते हैं. सनी का इस्तेमाल या तो आइटम डांस के लिए किया जाता है या फिर वो इंटीमेट सीन वाली फिल्मों में दिखाई देती हैं.

सनी ने ‘सुपर हॉट सनी मॉर्निंग्स’ नाम से अपनी योगा डीवीडी लॉन्च किया है जिसमें वो काफी हॉट और सेक्सी लग रही हैं. उनका योग वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है. सनी का बैकग्राउंड एडल्ट फिल्मों का रहा है जिसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह कि प्रतिक्रियाएं मिलती रही हैं. इस योग वीडियो में सनी रिसॉर्ट में पूल के किनारे योग की अलग अलग मुद्राएं करती हुई दिख रही हैं. सोशल मीडिया पर कुछ यूजर ने ऐसा कमेंट किया है कि सनी योग के दौरान भी खुद को सामान्य नहीं दिखा पा रही हैं. उनका खुद पर काबू नहीं है. उनके एक्सप्रेशन अभी भी एडल्ट फिल्मों वाले ही हैं.

आप भी देखिए ‘सुपर हॉट सनी मॉर्निंग्स’ का ये वीडियो…

इस फैसले का स्वागत है

दिल्ली के कनाट प्लेस इलाके में 3 महीनों के लिए सभी तरह के वाहन बंद करने का प्रयोग करा जा रहा है ताकि विदेशों के कई शहरों की तरह यह पूरा इलाका भी केवल पैदल चलने वालों के लिए हो जाए. यह एक अच्छा प्रयोग है और देश के हर शहर में ऐसे क्षेत्र हैं जहां लोग कुछ खरीदारी के लिए तो कुछ केवल घूमने के लिए जाते हैं, मगर आड़ीतिरछी खड़ी गाडि़यां उन्हें तंग करती हैं. दिल्ली में करोल बाग, साउथ ऐक्सटैंशन, चांदनी चौक, राजोरी गार्डन आदि बहुत से ऐसे इलाके हैं जहां दुकाने हैं पर चलने की जगह नहीं. जब से गाडि़यां आई हैं लोगों को जरूरत होती है कि ऐन दुकान के सामने गाड़ी खड़ी हो और राजारानी की तरह वे उतर कर शौपिंग करें. यह दूसरों के साथ अन्याय भी है और खुद के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी.

गाडि़यों की घेरी जगह अब बेशकीमती होने लगी है और उन्हें कम करना जरूरी होता जा रहा है. सरकारी ढीलमढाल का नतीजा है कि सुविधाजनक, भरोसेमंद पब्लिक वाहन पूरे देश में कहीं नहीं हैं जहां सामान से लदेफंदे लोग उन का इस्तेमाल हक से कर सकें. पब्लिक वाहन चलाने वालों को मोटी रिश्वत देनी पड़ती है. खरीद पर मोटा ब्याज देना पड़ता है, रखरखाव पर भी मोटा खर्चा होता है और इसीलिए टैक्सियां हों, बैटरी रिकशा हों या आम रिकशा, सब मैलेकुचैले ही होते हैं. बसों, टैंपुओं, लोकल ट्रेनों, मैट्रो का तो बुरा हाल है ही. ऐसे में कौन जोखिम लेगा कि 10 हजार की साड़ी पहन कर मैले वाहन में जा कर शान वाली दुकान या एअरकंडीशंड रेस्तरां में जाएं.

अगर लोगों से अपनी निजी गाडि़यों की लत छुड़वानी है तो ढंग के पब्लिक वाहन होने जरूरी हैं और यह भी जरूरी है कि वे आम जगह मिल सकें और उन के लिए ओला जैसे एप्स पर निर्भर न रहना पड़े. यदि सरकारें पर्याय न देंगी तो चाहे कुछ भी कर लें लोग गाडि़यां नहीं छोड़ेंगे. गाड़ी अब शान की चीज नहीं उपयोगी है, पैन और कोट की तरह. इन पर बहानों से प्रतिबंध लगाया जाएगा तो उस प्रतिबंध को बेमतलब का कर दिया जाएगा. शौपिंग एरिया खुशनुमा हों यह सब चाहते हैं पर कोई भी इस के लिए सही सोच नहीं रख रहा. यह फैसला बाबुओं और नेताओं के बस की नहीं, ठसके वाली औरतों को भी पूछना होगा वरना बेकार है.

माया की मुसीबत दलितों में बिखराव

विधानसभा चुनाव में 35 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी बहुमत से सरकार बनाने में सफल होती है. पिछले कुछ सालों में बसपा का बेस वोट बिखरने लगा. 2007 के बाद इसकी गति थोड़ी और भी तेज हो गई. दलित वोट में बिखराव तो बसपा-भाजपा गठबंधन की सरकारों के समय से ही शुरू हो गया था, उसमें असल तेजी तब आई जब 2007 से बसपा की बहुमत से सरकार बनने के बाद दलित संगठनों को दरकिनार किया गया. उस दौर में बसपा दलित-ब्राहमण गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग के सहारे अपना भला देख रही थी. बसपा ने दलित जातियों और उसके छोटे बड़े नेताओं और संगठनों को दरकिनार करना शुरू कर दिया था. सत्ता के करीब दिख रही बसपा सोशल इंजीनियरिंग धरातल पर कहीं नहीं थी. जमीनी स्तर पर दलित और अगडी जातियों के बीच दूरी बनी हुई थी.

दलितों में अलग अलग जातियों के नेता उभर चुके थे. जिनके पास बड़ा आधार भले न रहा हो पर वह कुछ सीटों पर प्रभावी थे. बसपा नेता मायावती ने ऐसे नेताओं को कभी महत्व नहीं दिया. ऐसे में यह नेता अपने साथ अपनी जाति के वोट लेकर बसपा से कट गये. 2007 के विधानसभा चुनाव में सुरक्षित सीटों पर सबसे  बेहतर प्रदर्शन करने वाली बसपा 2009 के लोकसभा चुनाव इन सीटों पर हार गई. इसके बाद भी बसपा यह मानने को तैयार नहीं थी कि उसका बेस वोट खिसक चुका है. यही गलती मायावती को भारी पड़ी और 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुमत की सरकार बनाने में सफल रही.

बसपा को अपनी हार का पता तो था पर मायावती की जिद दूसरे दलित नेताओं को महत्व देने को तैयार नहीं थी. नतीजा एक बार फिर बसपा के खिलाफ आया जब लोकसभा चुनाव में उसे पूरे प्रदेश में एक भी सीट नहीं मिली. मायावती और उनके रणनीतिकार यह मान कर चल रहे थे कि दलित वोट उनके अलावा कहीं वोट नहीं देगा. बसपा की इसी चूक का लाभ भाजपा ने उठाया और उसने लोकसभा चुनाव में अलग अलग दलों के दलित नेताओं को अपने साथ जोड़ा. कई दलित नेता सांसद बन गये. 2017 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से मायावती ने दलित नेताओं को पार्टी से न जोड़ने की गलती की है.

2017 चुनाव में मायावती को दलितों से अधिक मुसलिम वोट पर भरोसा है. बसपा दलित-मुसलिम गठजोड़ के सहारे है. सपा की कमजोर हालत से उसकी उम्मीद बढ़ गई थी. कांग्रेस-सपा गठजोड़ से मायावती की उम्मीद को झटका लगा है. अब मुसलिम भाजपा विरोध की रणनीति पर वोट करेगा. जिसका लाभ केवल बसपा को नहीं होगा. मायावती को मात देने के लिये भाजपा ने एक बार फिर प्रदेश के दूसरे दलित नेताओं को अपने साथ लिया है. जिसका लाभ दलित वोट के विभाजन के रूप में सामने आयेगा. 2007 के पहले यह माना जाता था कि दलित केवल बसपा के चुनाव चिन्ह को देखकर वोट देता है. अब अलग अलग दलित जातियां अपने अपने नेताओं के साथ खड़ी हो रही हैं. जिससे बसपा का जनाधार पहले जैसा मजबूत नहीं रहा.

सुरक्षित सीटों पर भी अगडे और मुसलिम की पावर बैलेंस बन कर उभर रहे हैं. इस वजह से ही भाजपा अपने पार्टी के अंदर के विरोध को झेल कर दलित नेताओं को अपने टिकट पर चुनाव लड़ाने को विवश है पर बसपा दूसरे दलित नेताओं को महत्व नहीं देना चाहती. दलित जातियों में अपने नेता और जाति के नाम पर एकजुट होना बसपा के लिये खतरे की निशानी है. अगर बहुमत की सरकार में बसपा ने दलित जातियों के सामाजिक सम्मान के लिये ठोस कदम उठाये होते तो उसका जनाधार इस तरह न खिसकता.              

प्यार में इजहार जरूरी

वैशाली ने एमबीए में ऐडमिशन लिया. पहले दिन जब वह कालेज गई तो अपनी ही क्लास के एक लड़के पर उस की नजर टिक गई. लड़के का नाम रोहित था, जो दिखने में काफी हैंडसम था. वैशाली ने जब से रोहित को देखा तो वह उस की दीवानी हो गई. उस ने रोहित को मन में बसा लिया, लेकिन किसी को मन की बात नहीं बताई. कालेज में कई बार उस का रोहित से आमनासामना होता पर वह प्यार का इजहार न कर पाती. एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में दोनों को एकसाथ काम करने का मौका मिला. वैशाली ने सोचा कि इस दौरान वह अपने मन की बात उस से कह देगी, लेकिन प्रोजैक्ट पूरा होने पर भी वह अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाई. कुछ महीने बाद जब वैशाली को पता चला कि रोहित की सगाई हो रही है, तो उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उसे लगा वह रोहित के बगैर जी नहीं पाएगी. उसे अपनेआप से कोफ्त होने लगी कि समय रहते उस ने अपने दिल की बात रोहित के सामने बयां क्यों नहीं की?

समय के साथ वैशाली के लिए भी एक रिश्ता आया. परिजनों ने जब इस रिश्ते के लिए उस की प्रतिक्रिया पूछी, तो उस ने शादी से ही इनकार कर दिया. वैशाली की भांति अनेक युवतियां हैं जो किसी से प्यार तो कर बैठती हैं, लेकिन उस के समक्ष प्यार का इजहार नहीं कर पातीं, जिस से उन का प्यार एकतरफा हो जाता है व कभी परवान नहीं चढ़ता. एकतरफा प्यार में मिली असफलता युवतियों को निराश और कुंठाग्रस्त कर देती है. युवतियां अपने पहले प्यार को, भले ही वह एकतरफा ही क्यों न हो, ताउम्र नहीं भूल पातीं. यदि आप भी किसी को अपना दिल दे बैठी हैं और अपने प्यार के प्रति गंभीर हैं तो जल्दी से जल्दी उसे अपने दिल की बात बता दें. हो सकता है सामने वाला इस बारे में सोचेविचारे या उस नजरिए से आप को देखे. यदि उस के दिल में पहले से ही कोई लड़की होगी तो वह स्पष्ट इनकार कर देगा. इस से आप समय रहते अपने कदम पीछे खींच सकती हैं. यदि उस का अफेयर किसी से नहीं हुआ तो वह आप के बारे में गौर कर सकता है. हो सकता है वह भी आप को चाहने लगे. जब आग दोनों ओर बराबर लगी हो, तभी प्यार परवान चढ़ सकता है अन्यथा एकतरफा प्यार चाहे वह किसी भी तरफ से हो, उस का हश्र अच्छा नहीं होता.

याद रखें, आप के किसी को चाहने मात्र से बात नहीं बनती. बात तभी बनती है जब सामने वाला भी आप को उसी शिद्दत से चाहे, लेकिन यह तभी संभव है जब सामने वाले को आप के मन की बात पता हो. फिर देखिए उस का चमत्कार.

यदि आप आमनेसामने हो कर अपने प्यार का इजहार करने में संकोच करती हैं तो इस के लिए अन्य तरीके भी अपना सकती हैं, जैसे उस से मोबाइल पर बात कर सकती हैं या उसे एसएमएस भेज सकती हैं. चाहें तो किसी मध्यस्थ का सहयोग ले सकती हैं जो उस से आप को मिलवा सके. वैसे भी कालेज में बहुत से स्थान और मौके मिलते हैं जहां आप उस से अपने दिल की बात कर सकती हैं. उसे लाइब्रेरी में, कैंटीन में या किसी कौफीशौप में बुला सकती हैं. प्यार हो जाना जितना आसान है, उस का इजहार उतना ही मुश्किल. ऐसा प्राय: एकतरफा प्यार करने वालों के साथ होता है. अपने प्यार का इजहार आप कई अवसरों पर कर सकती हैं जैसे यदि गु्रप में कहीं बाहर घूमने गई हों तो कोशिश करें कि आप उस युवक के आसपास ही रहें और उसे इस बात का एहसास कराएं कि आप के लिए वह खास है

वैलेंटाइन डे : प्यार के इजहार का खास दिन

वैलेंटाइन डे प्यार के इजहार के लिए खास दिन है. आप अपने प्रिय को पीला गुलाब दे सकती हैं. इस का आशय है कि मैं तो तुम्हें चाहती हूं परंतु मुझे तुम्हारे दिल की बात पता नहीं है. जब आप का दिल किसी पर आ जाए और उसी के नाम से धड़कने लगे तो आप गुलाबी गुलाब भेंट कर अपनी भावना का इजहार कर सकती हैं. लाल गुलाब आप के मनोभावों को प्रदर्शित करता है. यदि वह इसे स्वीकार कर लेता है तो इस का मतलब यह हुआ कि वह भी आप से प्यार करता है.

प्रेमी सहेली के साथ पकड़ा जाए

आशा और सुरेश का एक साल पहले अफेयर शुरू हुआ था. आशा ने सुरेश के साथ जीनेमरने की जाने कितनी कसमें खाईं, साथ रहने के सपने देखे लेकिन उस के ये सपने तब धराशायी हो गए जब एक दिन वह अपने रूम में कालेज से जल्दी आ गई और दरवाजा खोलते ही अपनी रूममेट और सब से अच्छी सहेली रोमा को अपने ही बौयफ्रैंड सुरेश के साथ हमबिस्तर पाया. यह उस की वही सहेली थी जो इन दोनों के प्यार की गवाह थी और उन के बीच होने वाली हर छोटीबड़ी बात जानती थी. यह सिर्फ आशा की ही कहानी नहीं है बल्कि यह अकसर सुनने में आता है कि एक सहेली ने दूसरी सहेली के बौयफ्रैंड को छीन लिया या अपना बना लिया.

वैसे तो ऐसा करना गलत है, लेकिन अगर ऐसा हो भी गया है तो रोनेधोने से काम नहीं चलेगा, बल्कि समझदारी से काम लेते हुए इस सिचुएशन को हैंडल करने की जरूरत है. आइए, जानें इस सिचुएशन से कैसे निकलें बाहर :

प्रेमी की असलियत सामने आई

यह तो अच्छी बात है कि प्रेमी की पोल आप के सामने जल्दी ही खुल गई वरना ये सब आप के घर में पता चल जाता तब आप उन की नजरों में भी गिर जातीं. अभी तो बात सहेली के सामने ही है और वह भी कोई आप की सगी नहीं है बल्कि उस ने तो आप की पीठ पीछे वार किया है, आप के प्रेमी को अपना बना कर. अच्छा हुआ, उस के करैक्टर के बारे में पहले ही पता चल गया. जो लड़का आप की सहेली पर बुरी नजर रख सकता है कल वह आप की बहन के साथ क्या करता, आप सोच भी नहीं सकतीं.

सहेली भी धोखेबाज निकली

वह सहेली चाहे बरसों से आप की कितनी भी अच्छी दोस्त क्यों न रही हो, लेकिन अब आप के साथ उस ने जो किया उस के बाद आप की जिंदगी में उस की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. ऐसी दोस्त बनाने से अच्छा है आप अकेली ही रह लें.

जिंदगी का बड़ा सबक सीख लिया

इस रिलेशनशिप से आप जिंदगी का गहरा सबक लें. अब आप आगे जो भी कदम उठाएंगी सोचसमझ कर ही उठाएंगी. यह गम लंबे समय तक तंग करेगा लेकिन आप को इस से लड़ कर बाहर आने की हिम्मत लानी होगी, इस से आप को जीवन में आए दुखों से लड़ने की ताकत मिलेगी.

पढ़ाई पर ध्यान लगाएं

इस हादसे से आप अपना एक नुकसान कर चुकी हैं, अब पढ़ाई में पिछड़ कर दूसरा नुकसान न करें. अपने जीवन में सब से ज्यादा अहमियत पढ़ाई को ही दें, इस से अपनी स्टै्रंथ बना लें और ध्यान से पढ़ाई करने में जुट जाएं.

आप बदनाम होने से बच गईं

प्रेमी की फितरत ही धोखा देने की थी, तभी तो उस ने आप को चीट किया. एक तरह से देखा जाए तो अच्छा ही हुआ. ऐसे दोगले इंसान से आप को जल्दी छुटकारा मिल गया, वह भी अपना कोई नुकसान किए बिना. वह लड़का सही नहीं था. हो सकता है कि वह आगे चल कर आप को ब्लैकमेलिंग आदि के जाल में फंसाने की कोशिश करता. ऐसे लोगों से दूर होना ही बेहतर है.

ध्यान दें

  • परदे में रहने दो

जी हां, हर बात सहेली को बताई जाए यह जरूरी तो नहीं. अपने और प्रेमी के बीच की बातों को सहेली के साथ डिसकस करना ठीक नहीं. फिर चाहे वह कितनी भी अच्छी क्यों न हो या कितनी ही गहरी मित्र क्यों न हो. आप की बातों और प्रेमी की इतनी तारीफ से हो सकता है कि सहेली का मन पलट जाए और वह प्रेमी की तरफ आकर्षित हो कर उसे फंसाने में लग जाए. ऐसे में प्रेमी के साथसाथ सहेली से भी आप को हाथ धोना पड़ सकता है.

  • ब्रेकअप का रोना न रोती रहें

जिन लोगों को इस रिलेशनशिप के बारे में पता था उन्हें हर बार यही बात कह कर न पकाएं. आप दुनिया में पहली नहीं हैं जिस का ब्रेकअप हुआ है, ऐसा कर के आप खुद को हंसी और बेचारगी का पात्र बना लेंगी. यह आप का गम है और इसे अकेले ही भूलना होगा.

  • विश्वास करना न छोड़ें

माना यह थोड़ा मुश्किल है, लेकिन अगर एक सहेली ने पीठ पीछे धोखा दिया है तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि आप अपनी सारी सहेलियों से मुंह मोड़ कर अकेली हो जाएंगी. अपनी बाकी सहेलियों के टच में रहें.  

  • बच के रहना रे बाबा

आप ने किसी एक से नहीं बल्कि अपने दो अजीजों से धोखा खाया है. इस का मतलब चूक कहीं न कहीं आप से भी हुई है, जो आप ने अपनी जिंदगी में ऐेसे प्रेमी और सहेली को जगह दी इसलिए इस से सीख लें व जांचपरख कर ही किसी से रिलेशन बनाएं. किसी भी युवक को बौयफै्रंड बनाने से पहले उस के बारे में अच्छी तरह से तहकीकात कर लें. अगर थोड़ा भी शक हो तो उस के साथ रिलेशनशिप बनाने की जरूरत नहीं है.

युवाओं में बढ़ता बौडी और फिटनैस का क्रेज

आज युवाओं पर सिक्स पैक ऐब्स का जनून इस कदर छाया है कि वे अपनी बौडी को आकर्षक बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं. वे अपने बौडी लुक और फिटनैस को ले कर कुछ ज्यादा ही क्रेजी हो गए हैं, लेकिन वे यह नहीं समझते कि सिक्स पैक बनाना इतना आसान नहीं है. इस के लिए संतुलित डाइट के साथसाथ ट्रेनर की देखरेख में ऐक्सरसाइज करने की जरूरत भी होती है.

अगर आप फिट हैं तो हर खुशी हासिल कर सकते हैं और फिटनैस आप को मिलेगी संतुलित डाइट और नियमित व्यायाम से.

बौडी बनाने का अर्थ है मांसपेशियों को कसना, जिस से कि आप सुडौल दिखें. इस काम में खासी मशक्कत करनी पड़ती है. ऐब्स बनाने के लिए कार्बोहाइड्रेट तथा फैट की मात्रा को घटा कर प्रोटीन की मात्रा बढ़ाई जाती है, ताकि मांसपेशियां सख्त हो सकें.

चाहिए सिक्स पैक तो देना होगा समय

यदि आप चाहते हैं कि आप की बौडी सुडौल व आकर्षक बने, तो इस के लिए आप को समय निकालना होगा. ‘बौडी फिटनैस सैंटर’ के ट्रेनर पवन मान के मुताबिक, ‘‘युवाओं को सिक्स पैक बनाने से पहले इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उन की बौडी पर फैट कितना चढ़ा है. यदि शरीर अधिक फैटी है तो पहले उसे घटाने के लिए कुछ खास तरह की ऐक्सरसाइज करनी होती है. साथ ही डाइट पर भी ध्यान देना होता है.’’

यदि आप फैटी हैं तो जिम जाने से पहले नियमित व्यायाम बहुत जरूरी है. नियमित व्यायाम में स्विमिंग, साइकिलिंग, जौगिंग आदि जरूरी हैं. इन के अलावा मौर्निंगवाक भी बहुत जरूरी है.

वैसे सिक्स पैक ऐब्स बनाने के लिए जिम ट्रेनर कई प्रकार के डाइट सप्लिमैंट्स देते हैं, जिन में सिंथैटिक पोषक तत्त्व मौजूद होते हैं. ये तत्त्व शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं. आमतौर पर लिए जाने वाले सप्लिमैंट्स में क्रिएटिन, प्रोटीन, स्टीरायड आदि हारमोन होते हैं. इस बारे में वरिष्ठ चिकित्सक डा. उमेश सरोहा कहते हैं, ‘‘ये पोषक तत्त्व शरीर को सुडौल बनाने के बजाय नुकसान ज्यादा पहुंचाते हैं. सुडौल बौडी पाने के लिए नियमित व्यायाम और संतुलित डाइट ज्यादा लाभदायक है.’’

कुछ लोग फैट कम करने के लिए अपने भोजन से फैट वाली चीजें बिलकुल हटा देते हैं, जिस से शरीर को लाभ पहुंचने के बजाय नुकसान ज्यादा पहुंचता है. फैट की अधिक कमी से शरीर के अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए फैट की प्रचुर मात्रा शरीर के लिए बहुत जरूरी है. 

फिटनैस के लिए जरूरी डाइट

–       सिक्स पैक बौडी के लिए फाइबरयुक्त भोजन लेना बहुत आवश्यक है, क्योंकि इस से शरीर का विकास होता है. प्रोटीन की मात्रा बनाए रखने के लिए मौसमी फलों का सेवन बहुत लाभदायक है.

–       सुबह का नाश्ता अति आवश्यक है. नाश्ता हैवी व लंच हलका लें. डिनर तो नाश्ते व लंच से भी हलका लें. इस तरह का चार्ट बना लें. यह आप की सेहत के लिए जरूरी है.

–       दिन भर में कम से कम 10 गिलास पानी पीएं. पानी हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है, क्योंकि अधिक ऐक्सरसाइज करने से शरीर में डिहाइडे्रशन की आशंका बनी रहती है, इसलिए इस से बचने के लिए व्यक्ति को अपने वजन के हिसाब से पानी पीना चाहिए.

–       ढेर सारा भोजन एकसाथ न लें. हिस्सों में बांट कर दिन में कई बार भोजन करें. इस से पाचन तंत्र मजबूत बना रहता है. साथ ही ऐक्सरसाइज करने के लिए और अधिक ताकत मिलती है.

–       हरी सब्जियों का सेवन ज्यादा करें. ये शरीर को ऊर्जा देने के साथसाथ आप को तरोताजा रखती हैं. प्रोटीन डाइट में अंडा, पनीर, दूध, दही, मछली आदि लें.

–       अलकोहल का सेवन बिलकुल न करें. यह आप के शरीर को बेकार करता है.

–       भोजन नियमित मात्रा में ही लें. संतुलित आहार शरीर को रोगमुक्त रखता है. एक सीमा में रह कर ही जिम में वर्कआउट करें. ऐसी किसी दवा का सेवन न करें, जो शरीर को नुकसान पहुंचा

अफगानी मोनालिसा का अनूठा अफसाना

इस अजीबोगरीब कहानी की शुरुआत होती है सन 1985 से. मशहूर पत्रिका ‘नैशनल ज्योग्राफिक’ के फोटो जर्नलिस्ट स्टीव मैकरी अपने एक असाइनमेंट के लिए सोवियत रूस के सैन्य कब्जे वाले अफगानिस्तान पर एक फोटोफीचर तैयार कर रहे थे. इस के लिए वह न केवल मुजाहिदीनों द्वारा रेड आर्मी के खिलाफ लड़ी जा रही जंग को कवर कर रहे थे, बल्कि अफगानी जनजीवन को भी कैमरे में कैद करने की कोशिश में लगे थे. वह रोजाना सैकड़ों की तादाद में फोटो उतार कर पत्रिका के औफिस फिल्म रोल्स भेजते थे, जहां उन्हें डेवलप कर के चुनिंदा चित्रों को एक फाइल में संजोया जाता था. इसी तरह स्टीव मैकरी ने पेशावर के नासिर बाग इलाके में स्थापित एक रिफ्यूजी कैंप में गमगीन बैठे कुछ बच्चों की तसवीरें खींची थीं.

उन बच्चों में 13-14 साल की एक लड़की ने अपनी तसवीर उतारने पर नाराजगी जताई थी. गुस्से में उस ने एक पत्थर भी उठा कर स्टीव मैकरी पर फेंका था, लेकिन खुशकिस्मती से उन्हें वह पत्थर नहीं लगा था. फोटो उतारते वक्त स्टीव मैकरी ने भी शायद इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. लेकिन जब फोटो डेवलप हो कर सामने आई तो उस ने सब का मन मोह लिया. दरअसल, उस लड़की की आंखों की पुतलियां विलक्षण थीं. उस की आंखों में जैसे एक जादू सा झलकता था. पूरे संपादकीय मंडल को एकबारगी तो यही लगा कि ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व पहले कहीं नहीं देखा गया. फोटो उतारा भी बड़ी खूबसूरती के साथ गया था. असाइनमेंट वाले फोटो फीचर को फिलहाल दरकिनार कर के तय किया गया कि पत्रिका के आगामी अंक का कवर इसी अद्वितीय चित्र से तैयार किया जाए. उस समय नैशनल ज्योग्राफिक के जून, 1985 अंक पर काम चल रहा था. उस के कवर पर छपने वाले फोटो को उठा कर उस लड़की का फुलसाइज फोटो छाप दिया गया.

अंक तैयार हो कर मार्केट में आया तो जैसे तहलका मच गया. इस चित्र ने लोगों को इस कदर आकर्षित किया कि महज इसे संजोए रखने के लिए लोग धड़ाधड़ पत्रिका को निजी प्रति के रूप में खरीदने लगे. इस फोटो की जगहजगह चर्चा होने लगी. यों तो अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के रूप में नैशनल ज्योग्राफिक पहले से मशहूर थी, लेकिन इस अंक के बाद तो जैसे यह पूरी दुनिया की खासमखास पत्रिका बन गई. पत्रिका को छपते 114 साल हो गए थे. जो काम इतनी लंबी अवधि में नहीं हो पाया था, वह केवल इस के एक अंक ने कर दिखाया था. पत्रिका के औफिस में आने वाली डाक भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई. इन में से अधिकांश पत्र इस फोटो के गुणगान के लिए ही लिखे होते थे. उस फोटो की इस तरह की लोकप्रियता देख कर नैशनल ज्योग्राफिक के प्रकाशकों ने इसे अपने कई संग्रहों के कवर पर भी छापा. इन संग्रहों में ‘वन हंडरेड बेस्ट पिक्चर्स’ व ‘दि फोटोग्राफिक’ भी केवल इस फोटो की वजह से काफी चर्चा में रहे.

इस फोटो को ले कर एक क्रांतिकारी बात यह हुई कि उन सामाजिक संस्थाओं ने इसे पोस्टर के रूप में छपवा कर बेचना शुरू कर दिया, जो अफगानी शरणार्थियों के लिए चंदा इकट्ठा कर के उन की सहायता का बंदोबस्त किया करती थीं. संदर्भवश बता दें कि तब पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों ने यह पोस्टर खरीद कर अफगानी शरणार्थियों की सहायता करने में अपना योगदान दिया था. एक तरफ यह सब चल रहा था, दूसरी ओर एक जिज्ञासा भी जबरदस्त रूप से जोर पकड़ती जा रही थी. पत्रिका के औफिस में रोजाना सैकड़ों पत्र ऐसे भी आ रहे थे, जिन के जरिए लोग फोटो वाली लड़की के बारे में जानकारी हासिल करना चाहते थे. अब तक इस चित्र को एक टाइटल भी दे दिया गया था— अफगानी मोनालिसा. अब समस्या यह थी कि लोगों की जिज्ञासा शांत करने के लिए पत्रिका वालों के पास लड़की के बारे में किसी तरह की कोई जानकारी नहीं थी. यहां तक कि फोटो जर्नलिस्ट स्टीव मैकरी भी उस के बारे में कुछ नहीं जानते थे.

उधर लोगों ने लड़की के बारे में जानने की जिद नहीं छोड़ी. कुछ प्रबुद्ध किस्म के पाठकों ने तो पत्रिका को कानूनी नोटिस भेज कर इस बात की धमकी भी दी कि अगर इस लड़की के बारे में पूरा खुलासा नहीं छापा गया तो वे अदालत का सहारा लेंगे. देखतेदेखते फोटो को छपे 17 साल का लंबा दौर गुजर गया. लेकिन लोगों ने लड़की के बारे में अपनी जिज्ञासा को ठंडा न पड़ने दिया. उन्होंने पत्रिका का पीछा न छोड़ा. आखिर पूरे 17 सालों बाद इस विलक्षण आंखों वाली लड़की को तलाश कर उस पर डाक्युमेंट्री फिल्म बनाने की जिम्मेदारी स्टीव मैकरी के कंधों पर डाल दी गई. इस के लिए उन्हें 5 सदस्यों की विशेष टीम भी दी गई. जनवरी, 2002 के पहले सप्ताह में वह अपनी टीम के साथ पत्रिका के औफिस से रवाना हो कर पेशावर के उसी नासिरबाग में पहुंचे, जहां के रिफ्यूजी कैंप में 17 साल पहले उन्होंने उस लड़की की फोटो खींची थी. अब वहां वह कैंप नहीं था. स्टीव व उन के साथियों ने अन्य कई शरणार्थी शिविरों में जा कर लड़की का फोटो दिखा कर उस के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की. हालांकि सब जानते थे कि उस की शक्लोसूरत अब वैसी नहीं रही होगी. यह भी बड़ी बात नहीं कि उस की आंखों में भी अंतर आ गया हो.

जो भी था, प्रयास तो करना ही था. स्टीव मैकरी अपनी टीम के सदस्यों के साथ दिनरात अपनी इस अनूठी खोज में लगे रहे. उल्लेखनीय है कि सन 2001 में अमेरिकी फौजें अलकायदा को तहसनहस करने और ओसामा बिन लादेन को जिंदा अथवा मुरदा पकड़ने के लिए अफगानिस्तान में घुसी थीं. इस से जो तबाही हुई थी, उसी के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग उठी थी कि अफगानियों की हर तरह से सहायता की जाए. उस वक्त भी कथित अफगानी मोनालिसा का चित्र खासी चर्चा में था. उस के पोस्टरों की भी खूब बिक्री हुई थी. तब तक अभिनेत्री मर्लिन मुनरो और ब्रिटिश राजकुमारी डायना की तसवीरें बिकने का रिकौर्ड था. उस वक्त चर्चा हुई थी कि अफगानी मोनालिसा के पोस्टरों की बिक्री ने बिक्री के पुराने सारे रिकौर्ड पीछे छोड़ दिए थे. खैर, स्टीव मैकरी का एक ही मकसद था अचानक खींची गई तसवीर वाली लड़की को ढूंढना. इस के लिए वह भूखप्यास सब भूल बैठे थे. कई बार सुनीसुनाई बातों के आधार पर वह अपने साथियों सहित गलत लोगों के घेरे में भी फंसे. यहां तक कि एकदो बार तो उन की जान पर भी बन आई.

लेकिन अब पीछे हटना उन के लिए अपने प्रोफैशन से गद्दारी करने जैसा था. इसलिए वह सिर पर कफन बांध कर टीम के सदस्यों के साथ अपने मकसद में लगे रहे. आखिर एक दिन उन्हें एक बूढ़ा आदमी मिला, जिस ने फोटो देखने के बाद दावा किया कि वह इस लड़की को जानता है. उस ने जानने की वजह यह बताई कि वह भी उसी शरणार्थी कैंप में रहता था, जहां पर वह लड़की रहती थी. वह अकसर उस के बच्चों के साथ खेला करती थी. वह जब कभी उस के सामने आती थी, वह उस की अजूबे सरीखी आंखों को देखता रह जाता था. बूढ़े का कहना था कि जहां तक वह जानता है, उस की शादी हो चुकी है और वह अपने पति और बच्चों के साथ तोराबोरा की पहाडि़यों में कहीं रहती है. यह उन दिनों की बात है, जब तोराबोरा की पहाडि़यां अमेरिकी बमबारी का निशाना बनी हुई थीं. वहां जाना किसी भी तरह के खतरे से खाली नहीं था. स्टीव मैकरी की टीम को वहां की भौगोलिक स्थिति की भी ज्यादा जानकारी नहीं थी. आखिर किसी तरह उन्होंने बूढ़े को साथ चलने को राजी कर लिया.

तोराबोरा की पहाडि़यों में पहुंच कर उन्हें पता चला कि वह लड़की पास के किसी गांव में रहती है, जिसे तलाश करने में उन्हें 3 दिन लग गए. चौथे दिन लगातार 6 घंटे चलते रहने के बाद ये लोग आखिर उस गांव तक पहुंचने में सफल हो गए, जहां वह लड़की रहती थी. उस का घर भी मिल गया. टीम के सदस्यों को बाहर रोक कर बूढ़ा अकेला घर के भीतर गया. करीब आधे घंटे बाद वह बाहर निकला और अकेले स्टीव मैकरी को साथ ले कर फिर से भीतर चला गया. भीतर वाकई वही लड़की मौजूद थी, जिस की स्टीव को तलाश थी. हालांकि अब वह कमसिन लड़की न रह कर परिपक्व औरत बन चुकी थी. लेकिन स्टीव ने उसे उस की आंखों की वजह से पहचान लिया. बातें शुरू करते हुए स्टीव ने सब से पहले उस से उस का नाम पूछा.

उस ने अपना नाम बताया और उम्र बताई 31 साल. फोटो दिखा कर याद दिलाने पर उसे 17 साल पुराना वाकया भी याद आ गया. उस ने बताया कि पेशावर के एक रिफ्यूजी कैंप में जब एक गोरेचिट्टे अंजान आदमी ने अचानक सामने आ कर उस की तसवीर खींची थी तो गुस्से में उस ने वहां पड़ा एक पत्थर उठा कर उस की तरफ फेंका था. शरबत गुल के अनुसार, तब तक उस ने कभी भी अपना फोटो नहीं खिंचवाया था. उस के बाद भी 17 सालों के अंतराल में उस ने कोई फोटो नहीं खिंचवाया था. वह उस का अब तक का पहला और आखिरी फोटो था. वह मात्र 6 साल की थी, जब उस के मातापिता सोवियत फौजों द्वारा की गई जबरदस्त बमबारी में मारे गए थे. घटना के वक्त परिवार के सभी लोग घर में सो रहे थे. बमबारी से घर इस तरह मलबे का ढेर बन गया था कि उस में किसी का भी बच पाना मुश्किल था. लेकिन यह एक करिश्मा ही था कि इस बड़े हादसे में भी वह अपने एक भाई के साथ जीवित बच गई थी.

लेकिन इस के बाद उस छोटी उम्र से ही वह कभी रात में निश्चिंत हो कर नहीं सो पाई. आसमान में जरा सी कोई आवाज होते ही यह सोच कर वह कांप उठती थी कि अभी ऊपर से बमबारी होगी, जिस में वह और उस का भाई मारा जाएगा. लेकिन संयोग से वह और उस का भाई कासर खान दोबारा किसी हमले का शिकार नहीं हुए. उस ने आगे बताया कि उस वक्त समूचे अफगानिस्तान में हर तरफ सोवियत फौजें ही दिखाई दिया करती थीं, जो उन के लिए एक तरह से मौत का पर्याय थीं. ऐसे में उन लोगों के पास सिवाय अफगानिस्तान से पलायन करने के दूसरा कोई रास्ता नहीं था. वह अपनी नानी, भाई और रिश्ते की 4 बहनों के साथ अफगानिस्तान को अलविदा कह कर पाकिस्तान की ओर चल पड़ी थी. रास्ते में पड़ने वाले पर्वतीय इलाके पार करने में उन्हें हफ्तों लग गए. अफगानी पर्वतों को पार कर के जब वे पाकिस्तान की सीमा में पहुंचे तो उन का खानेपीने का सारा सामान खत्म हो गया था.

पाकिस्तान में उन्हें अजनबी लोगों के बीच रिफ्यूजी कैंपों में रहना पड़ा. सन 1990 में सोवियत सेनाओं के जाने के बाद वे अपने गांव लौट आए. वहीं रहते हुए शरबत गुल की शादी रहमत गुल से हुई, जिस से उसे 4 बच्चे हुए. लेकिन उन में से एक के इंतकाल के बाद 3 लड़कियां रूबीना, जाहिदा और आलिया बची थीं. 16 बरस की उम्र में जब शरबत गुल की शादी हुई थी, तब उस का शौहर रहमत गुल पेशावर की एक बेकरी में काम करता था. लेकिन वहां रहते हुए वह कई बीमारियों का शिकार हो गया. उस समय वह अस्थमा से परेशान था, इसलिए नौकरी छोड़ कर गांव में रह कर छोटामोटा काम करने लगा था. बहरहाल, बाहरी दुनिया शरबत गुल की जिस तसवीर की दीवानी थी, वह तसवीर उस ने पहली बार स्टीव मैकरी के पास ही देखी थी. उसे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि उस की उस तसवीर ने किस कदर तहलका मचाया था. शरबत गुल से बातचीत के दौरान उस के कई रिश्तेदार और परिचित वहां आ गए थे. बाद में स्टीव मैकरी की टीम के सदस्यों को भी भीतर आने की अनुमति दे दी गई थी. उन लोगों ने शरबत गुल के खूब फोटो खींचे. उस के अकेली के भी और उस के परिवार के सदस्यों के साथ भी. उस के भाई की आंखें भी करीबकरीब बहन की आंखों जैसी ही थीं. उस का भी एक विशेष फोटो लिया गया.

खैर, अपना यह अद्भुत अभियान सफलता से पूरा कर के जिस वक्त स्टीव मैकरी अपनी टीम के साथ वाशिंगटन स्थित नैशनल ज्योग्राफिक के औफिस पहुंचे, संपादकीय मंडल के सामने यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि इस का क्या प्रमाण है कि शरबत गुल ही वह महिला है, जिस का फोटो 17 साल पहले स्टीव मैकरी ने खींचा था. ऐसे में अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई (फेडरल ब्यूरो औफ इनवैस्टीगेशन) से मदद की गुजारिश के अलावा कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के कंप्यूटर विज्ञान विशेषज्ञ प्रो. जौन डोमेन से भी सहयोग मांगा गया. आखिर काफी जद्दोजहद के बाद एफबीआई के अपराध अनुसंधान विभाग के प्रोफैसर थौमस मुसेनो ने सन 1985 व 2002 में खींचे गए शरबत गुल के फोटो का वैज्ञानिक तरीके से अति सूक्ष्म निरीक्षण किया. उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि दोनों फोटो एक ही औरत के थे. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. डोमेन ने भी अपने तमाम परीक्षणों के बाद यही राय दी कि दोनों फोटो एक ही महिला के थे. हां, दोनों फोटो में एक असमानता जरूर नोटिस की गई थी, वह यह कि पुराने फोटो में लड़की के होंठ पर दाईं तरफ एक तिल था, जोकि मौजूदा चित्र में गायब था. निस्संदेह तिल कभी अपने आप नहीं मिटता. इस संबंध में व्यापक अध्ययन और चित्रों के बारीकी से किए गए निरीक्षण के बाद यह अनुमान लगाया गया कि हो सकता है, फोटो खींचते वक्त लड़की के चेहरे पर मिट्टी अथवा रेत का कोई कण चिपका रहा हो. क्योंकि इस के अलावा दोनों फोटो में कोई असमानता नहीं थी. मतलब स्टीव मैकरी और उन के साथियों का दावा एकदम सही प्रमाणित हुआ.

इस के बाद फिर से शरबत गुल के फोटो छपे, कहानियां प्रकाशित हुईं. उस के जीवन पर डाक्युमेंट्री फिल्में बनाई गईं. लेकिन शरबत गुल केवल इन अफसानों की पात्र के रूप में बस प्रसिद्धि की हकदार बन कर रह गई. किसी ने भी उसे अन्य किसी तरह का लाभ देने की कोई कोशिश नहीं की. उस की आर्थिक परेशानियों का भी किसी ने कोई नोटिस नहीं लिया. अफगानिस्तान के हालात फिर से खराब होने पर उस का पति अचानक गायब हो गया. वह किसी तरह अपने तीनों बच्चों को ले कर पाकिस्तान जा पहुंची, जहां एक शख्स ने पहले उसे अपने यहां पनाह दी, फिर उस से निकाह कर के उसे अपनी बेगम बना लिया. 26 अक्तूबर, 2016 को पाकिस्तान की फेडरल जांच एजेंसी ने पेशावर स्थित उस के घर से शरबत गुल को इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया कि वह जाली दस्तावेजों पर गैरकानूनी रूप से पाकिस्तान में रह रही थी. इस मामले में उसे 13 दिन की जेल और 1 लाख 10 हजार रुपए के जुरमाने की सजा हुई थी. लेकिन गिरफ्तारी के बाद करवाई गई मैडिकल जांच में यह बात सामने आई कि वह जानलेवा बीमारी हेपेटाइटिस-सी से पीडि़त थी.

आखिर पाकिस्तानी कोर्ट ने फैसला बदल दिया कि सजा पूरी होने के बाद उसे पाकिस्तान से नहीं निकाला जाएगा. अफगानिस्तान का कहना है कि शरबत गुल की बीमारी का इलाज न पाकिस्तान में संभव है और न अफगानिस्तान में, इसलिए वह मर जाएगी. ऐसे में इंसानियत के आधार पर भारत को चाहिए कि वह उसे अपने यहां शरण दे कर उस की बीमारी का इलाज करवाए. भारत इस मदद के लिए सहर्ष तैयार भी हो गया है. 13 नवंबर, 2016 को भारत में अफगानिस्तान के राजदूत शैदा अब्दाली ने प्रैस विज्ञप्ति के माध्यम से अपना छोटा सा बयान भी जारी किया है, ‘भारत सरकार ने शरबत गुल का इलाज कराने की बात अधिकृत तौर पर कह दी है. यह इलाज बिलकुल मुफ्त होगा और शरबत गुल व उस के घर वालों के वहां ठहरने वगैरह की व्यवस्था भी भारत सरकार अपने स्तर से करेगी. शरबत गुल का इलाज बंगलुरु के एक नामी अस्पताल में करवाए जाने का इंतजाम कर दिया गया है.

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