Download App

…तो उम्र बढ़ जाएगी

अमेरिकी भविष्यवेत्ता, आविष्कारक व लेखक रे कुर्जवील रोजाना 2 दर्जन गोलियों का सेवन करते हैं. उन्हें कोई बीमारी नहीं है, पर वे भविष्य का एक सपना देख रहे हैं, जिसे साकार करने के लिए वे दवा की इतनी गोलियां रोजाना खाते हैं. उन का मानना है कि अब साइंस की मदद से इंसान की उम्र बढ़ाई जा सकती है.

साइंस जिस तरह से उम्र बढ़ाने का सपना पाले हुए है, उसे देख कर यह संभावना अब ज्यादा दूर नहीं लगती कि इंसान की औसत आयु में 15 से 20 साल का इजाफा हो सकता है और वह सौ के पार जा कर भी सक्रिय जीवन जी सकता है. इस के लिए वैज्ञानिक कईर् तरह के प्रयोग और खोजबीन कर रहे हैं.

हाल ही में एक ऐसी ही खोज में उन्हें जेलीफिश परिवार के एक सदस्य हाइड्रा नामक जीव में ऐसे संकेत मिले हैं जिन्हें अमरत्व की अवधारणा के करीब माना जा रहा है. अमेरिका के पामोना  कालेज के एक शोधकर्ता डेनियल मार्टिनेज के अनुसार, ‘‘यह जीव बढ़ती उम्र को मात देने में सक्षम पाया गया है. लगभग 1 सेंटीमीटर लंबे हाइड्रा के शरीर की स्टेम सैल (कोशिकाओं) में यह खूबी पाई गई है कि वे खुद को नए स्टेम सैल से लगातार बदलते रहते हैं यानी शरीर से पुरानी कोशिकाएं खुद ही हटती जाती हैं और नई कोशिकाएं उन का स्थान लेती रहती हैं. इस से हाइड्रा का शरीर एकदम नया बना रहता है. इस खोज से इंसान की उम्र लंबी होने की संभावना बढ़ गई है.

कब होगा करिश्मा

दिसंबर, 2015 में दिल्ली के एक कार्यक्रम में शामिल हुए वैज्ञानिक डा. एब्रे डि ग्रे (सैल रिसर्च फाउंडेशन के चीफ साइंस औफिसर) ने भी इस के बारे में एक अनुमान लगाने की कोशिश की थी. उन्होंने इस की पूरी उम्मीद जगाई है कि अगले 15 वर्ष में यह संभव हो सकता है कि इंसान कम से कम सौ साल तो जीए ही. बढ़ती उम्र रोकने वाली दवाओं के अनुसंधान पर काम कर रहे डा. ग्रे के मतानुसार कोशिकाओं के क्षरण को रोक कर और शरीर में मौजूद मालेक्यूल्स की चाल पलट कर बढ़ती उम्र को कुछ हद तक थामा जा सकता है, जिस से सौ साल की जिंदगी को एक आम बात बनाना मुमकिन है.

क्या है बुढ़ापा

साइंस की नजर में बूढ़ा होना यानी ऐजिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिस का सामना पृथ्वी पर मौजूद हर प्राणी को करना पड़ता है. वनस्पतियों और जीवधारियों में तो बढ़ती उम्र साफ दिखती है, चेहरे और हाथपांव में पड़ती झुर्रियों, झुकते शरीर और कमजोर होती हड्डियों के अलावा आंख, कान से ले कर हर इंद्रीय का क्षरण बुढ़ापे का साफ संकेत होता है, पर विज्ञान की नजर में बुढ़ापा असल में कोशिकाओं के विभाजन की दर पर निर्भर है. मानव की कोशिकाएं अपनी मृत्यु से पहले औसत रूप से अधिकतम 50 बार विभाजित होती हैं. जितनी बार कोशिकाएं विभाजित होती हैं. इंसानी क्षमताओं में उतनी ही कमी आने लगती है.

बुढ़ापे के एक अन्य टैलोमर्स की लंबाई घटना भी माना जाता है. टैलोमर नाम का एंजाइम युवावस्था में प्रचुर मात्रा में बनता है जो डीएनए कोशिकाओं को टूटफूट से बचाता है. टैलोमर असल में प्रत्येक डीएनए के दोनों छोरों पर लगने वाली ढक्कन जैसी संरचनाएं हैं, जिन की लंबाई उम्र बढ़ने के साथ कम होती जाती है. शरीर के बूढ़े होने के कई कारणों में टैलोमर्स के छोटे होते जाने की भूमिका सब से महत्त्वपूर्ण समझी जाती है.

बढ़ने लगी उम्र

आज से 100 या 50 साल पहले इंसान की औसत आयु कोई खास नहीं थी. 50 साल की उम्र के बाद लोग बूढ़े लगने लगते थे, पर 50 वर्ष में ही पूरी दुनिया में औसत उम्र बढ़ चुकी है. कम से कम 1970 में पैदा हुए अमेरिकियों पर यह बात तो लागू होती ही है, जिन की औसत उम्र पहले 70.8 वर्ष मानी गई थी, जो अब से 15 साल पहले यानी वर्ष 2000 में 77 साल मानी जाने लगी थी. इसी तरह वयस्क अमेरिकियों की औसत उम्र 2002 में अगर 75 साल मानी जा रही थी, तो अब आगे उस में 11.5 साल की और बढ़ोतरी की उम्मीद है. इंसान की औसत उम्र में सहसा बढ़ोतरी होती लग रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक उम्दा खानपान और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं का इस में बड़ा योगदान है.

उम्र बढ़ाने की तकनीक

करीब 10 वर्ष पहले अमेरिकी साइंटिस्ट रे कुर्जवील ने घोषणा की थी कि आगे चल कर साइंस से बढ़ती उम्र को रोकना और फिर उम्र घटाने की प्रक्रिया शुरू करना मुमकिन हो जाएगा. कुर्जवील की यह उम्मीद नैनो टैक्नोलौजी पर टिकी है, जिस से शारीरिक संरचनाओं को रीप्रोग्राम किया जा सकेगा. हो सकता है कि कुर्जवील की भविष्यवाणी निकट भविष्य में एक प्रस्थापना तक ही सीमित रहे, पर अमेरिका के अल्वार्ट आइंस्टाइन कालेज औफ मैडिसिन की पहल पर वैज्ञानिकों की एक इंटरनैशनल टीम ने इस संदर्भ में जो खोजबीन की है वह इंसान की उम्र 100 साल तक बढ़ाने का ठोस आधार बन सकती है. इस टीम ने 97 साल की औसत उम्र वाले अमेरिकी अश्केनाजी यहूदी समुदाय में लंबी उम्र देने वाला जीन खोजा है जो इस समुदाय में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है. इस जीन की वजह से शरीर में टैलोमर्ज नाम का एंजाइम प्रचुर मात्रा में बनता है जो डीएनए कोशिकाओं को टूटफूट से बचाता है. साइंटिस्ट इस कोशिश में हैं कि टैलोमर्ज एंजाइम की मात्रा बढ़ा कर बुढ़ापे की रफ्तार कम की जाए और इस तरह इंसान की उम्र थोड़ी और बढ़ा दी जाए.

उपवास है लंबी उम्र का राज

उम्र बढ़ाने के सिलसिले में शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर नियंत्रित तरीके से उपवास रखा जाए तो इस से न सिर्फ बढ़ते वजन को घटाया जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी कई अन्य फायदे भी हो सकते हैं.  खासतौर से उम्र बढ़ाना भी संभव है. दुनिया में 1930 से ही एक ऐसे प्रयोग के बारे में लोगों को बताया जा रहा है, जिस के तहत कम कैलोरी पर पल रहे चूहे उन चूहों की तुलना में ज्यादा दिन तक जिंदा रहे जिन्हें पौष्टिकता से भरपूर भोजन दिया गया था. यह बात आज भी कई शोध साबित कर रहे हैं. जैसे, यूनिवर्सिटी कालेज लंदन स्थित इंस्टिट्यूट औफ हैल्थ ऐजिंग के बुढ़ापे से निबटने के मकसद से आनुवंशिकी और लाइफस्टाइल फैक्टरों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक भी कुछ ऐसे ही नतीजों पर पहुंच रहे हैं.

इंस्टिट्यूट में रिसर्च टीम से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक डा. मैथ्यू पाइपर का कहना है कि आहार पर नियंत्रण जीवन को दीर्घायु बनाने का एक असरदार तरीका है. डा. पाइपर के मुताबिक यदि आप किसी चूहे के आहार में 40% की कमी कर दें तो वह 20 या 30% ज्यादा जीवित रहेगा. उन के जैसी राय रखने वाले कई अन्य वैज्ञानिकों का दावा है कि आहार पर नियंत्रण से मनुष्य का जीवनकाल भी बढ़ाया जा सकता है.

हार्मोन आईजीएफ-1 का कमाल

उपवास के दौरान एक खास किस्म के हारमोन के असर को वैज्ञानिकों ने दर्ज किया है. असल में स्तनधारियों में जीवन अवधि बढ़ाए जाने का विश्व रिकौर्ड एक नई प्रजाति के चूहे का है, जिस की उम्र 40त्न तक बढ़ सकती है. इस प्रयोग के दौरान आनुवंशिक रूप से संबंधित चूहों को जब खाना देना बंद कर दिया गया, तो इस से हारमोन आईजीएफ-1 के  स्तर में कमी आने लगी. पर साथ ही यह भी पाया गया कि शरीर की बढ़ोतरी में कारगर यह हारमोन ऐसी स्थिति में शरीर में आ रही कमियों और टूटफूट को रिपेयर करने लग गया. इस शोध के संबंध में दक्षिण कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ता प्रोफैसर वाल्टर लौंग ने कहा कि जैसे ही शरीर में आईजीएफ-1 हारमोन स्तर कम होता है तो इस का असर शरीर पर होता है और मरम्मत करने वाले कई जीन शरीर में सक्रिय हो जाते हैं. हालांकि दावा किया जाता है कि शरीर में आईजीएफ-1 नामक हारमोन की बहुत कम मात्रा से इंसान बौना रह जाता है, लेकिन ऐसे बौने इंसान आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती उम्र से जुड़े 2 प्रमुख रोगों कैंसर और मधुमेह से सुरक्षित भी पाए गए हैं.

उम्र की आणविक घड़ी को खिसकाना

डा. पाइपर उम्र बढ़ाने के एक और तरीके पर बात करते हुए कहते हैं कि यदि हमें ऐजिंग से जुड़े जीन मिल जाते हैं तो ऐजिंग की घड़ी को आगे खिसकाया जा सकता है. डा. पाइपर के मुताबिक फ्रूट फ्लाइज (एक प्रकार की मक्खी) मनुष्यों की तरह ही बूढ़ी होती है. प्रयोगशाला में जीनों के म्यूटेशन से भी फ्रूट फ्लाई समेत कुछ जीवजंतुओं का जीवन बढ़ाने में सफलता मिली है.

अमेरिकन एसोसिएशन फौर द ऐडवांसमैंट औफ साइंस की बैठक में यूनिवर्सिटी औफ द कैंब्रिज के वैज्ञानिकों ने जो खुलासे किए हैं, वे तो यह उम्मीद भी जगा रहे हैं कि अगर साइंस ने बुढ़ापे की रोकथाम वाली तकनीक में और तरक्की कर ली, तो प्रतीकात्मक रूप से मृत्यु को भी टालना संभव होगा.

दरअसल, ऐजिंग की घड़ी के पीछे खिसकाने संबंधी एक प्रयोग बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया में किया गया है. वहां वैज्ञानिकों की एक शोध टीम ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टैम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उस की आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया. इस से बूढ़ी स्टैम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई रक्त कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं.

दीर्घायु जीन का नाम सर्ट3 है. सर्ट3 समूह का एक प्रोटीन है, जो रक्त की स्टेम कोशिकाओं को तनाव से निबटने में मदद करता है. शोधकर्ताओं ने देखा कि जब वृद्ध हो रहे चूहे की रक्त स्टैम कोशिकाओं में सर्ट3 मिलाया तो नई रक्त स्टैम कोशिकाएं बनने लगीं. इस के असर से रक्त स्टैम कोशिकाओं के भीतर बुढ़ापे से जुड़ी गिरावट थम गई और उन में पुनर्जीवित होने की संभावनाएं पैदा हो गईं.

साइंस अब बुढ़ापे को अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं मानती. नई परिभाषा के अनुसार ऐजिंग एक नियंत्रित प्रक्रिया है और इस में तबदीली की संभावनाएं भी हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि हमें ऐसी तबदीली के तौरतरीके बहुत स्पष्ट रूप से नहीं मालूम. जिस दिन ये रहस्य खुल जाएंगे, लंबी उम्र इंसानों के लिए कोई बड़ी बात नहीं रह जाएगी.                   

उम्र बढ़ाएं, करोड़ों पाएं

इंसान की उम्र के पीछे साइंटिस्ट यों ही नहीं पड़े हैं. इस के पीछे एक वजह यह भी है कि इस के लिए भारीभरकम पुरस्कार भी घोषित किए जा चुके हैं, जैसे सिलिकौन वैली के एक बड़े उद्यमी (हेज फंड मैनेजर) जून युन ने मनुष्य की उम्र 120 साल तक ले जाने वाली वैज्ञानिक खोज के लिए वर्ष 2015  की शुरुआत में ही 10 लाख डौलर के एक पुरस्कार पालो आल्टो लौन्गेविटी प्राइज की घोषणा कर रखी है. युन चाहते हैं कि वैज्ञानिक लाइफ कोड को हैक कर लें और इस तरह ऐजिंग को रोकते हुए इंसान की लंबी उम्र का रास्ता खोल दें, पर एंटीऐजिंग के प्रयासों को बढ़ावा देने वालों में युन अकेले नहीं हैं.

वर्ष 2013 में गूगल ने इसी मकसद से कैलिफोर्निया लाइफ कंपनी (कैलिको) की स्थापना की थी जो उम्र बढ़ाने के उपायों की खोजबीन कर रही है. इसी तरह वर्ष 2014 में अमेरिकी बायोलौजिस्ट और तकनीक के महारथी के्रग वेंटर ने ऐक्स प्राइज फाउंडेशन के संस्थापक पीटर डियामैंडिस के साथ मिल कर ह्यूमन लौन्गेविटी इंक नामक कंपनी की स्थापना कुछ इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की थी. यह कंपनी वर्ष 2020 तक 10 लाख मानव सीक्वेंस का डाटाबेस तैयार करने में लगी हुई है, जिस के आधार पर लंबी और स्वस्थ जिंदगी के राज खोले जा सकेंगे.  

खतरनाक स्टंट अच्छे लगते हैं : आंचल सोनी

फिल्मों में नाजुक बदन की ज्यादातर हीरोइनों को खतरनाक स्टंट करने से डर लगता है, पर आंचल सोनी ने इस सोच को बदल दिया है. वे केवल फिल्मों में ही नहीं, बल्कि अपने डांस शो में भी खतरनाक स्टंट करने से पीछे नहीं हटती हैं. अपने डांस शो के दौरान वे ट्यूबलाइट तोड़ती हैं, लोहे की छड़ को मोड़ती हैं और आग से खेलने वाले स्टंट करती नजर आती हैं. साल 2017 आंचल सोनी के कैरियर के लिहाज से बहुत खास है. वे हिंदी और भोजपुरी फिल्मों में काम कर रही हैं. साथ ही, वे अपना खुद का होम प्रोडक्शन चलाती हैं. उन के होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘बाप रे बाप’ बड़े परदे पर आने वाली है. हिंदी फिल्में ‘गुलाबो’, ‘पिंजरा’, ‘शपथ’ और ‘खान इज बैक’ तैयार हो रही हैं. भोजपुरी फिल्मों में ‘हम साथी जनमजनम के’ के अलावा

2 और फिल्में बन रही हैं. बिहार के सीवान की रहने वाली और उत्तर प्रदेश के जौनपुर में पलीबढ़ी आंचल सोनी दक्षिण भारत की फिल्में भी कर रही हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के फिल्म लाइन में आना कितना मुश्किल होता है

आज ऐक्टिंग की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है. किसी भी जगह की रहने वाली लड़की दूसरी जगह पर काम कर सकती है. कुछ लोग भोजपुरी फिल्मों को अच्छा नहीं मानते, पर सही बात यह है कि बंगाली, गुजराती, मराठी और राजस्थानी सभी बोली के बोलने वाले लोग भोजपुरी फिल्में करना चाहते हैं. ऐक्टिंग की दुनिया के बड़े होने से सभी काम मिलने में आसानी होने लगी है. फिल्मी बैकग्राउंड के अपने फायदे होते हैं, पर दूसरे लोगों को भी यहां काम मिलता है.

आप का मुंबई का सफर कैसा रहा

मैं ने जौनपुर के टीडी कालेज से हिंदी और भूगोल विषय के साथ बीए का इम्तिहान पास किया था. इसी बीच बनारस में एक म्यूजिक अलबम की शूटिंग हो रही थी. मैं ने उस में काम किया. उस के बाद मैं मुंबई आ गई. मेरे पिताजी ने मुंबई में चाइनीज रैस्टोरैंट खोल लिया था. यहां मुझे हिंदी टैली फिल्म में काम मिल गया. भोजपुरी फिल्मों में जौनपुर के तमाम लोग हैं. वे बोले कि मुझे भोजपुरी फिल्मों में काम करना चाहिए. इस के बाद भोजपुरी फिल्मों का काम शुरू हुआ. मेरी पहली भोजपुरी फिल्म ‘जवानी बियाहे राजाजी’ थी. इस फिल्म में मेरा काम देख कर मुझे और भी कई फिल्में मिलने लगीं. मैं ने दक्षिण भारत की कुछ फिल्मों में भी काम किया है.

भोजपुरी फिल्मों में थोड़ा भरे बदन की हीरोइनें ज्यादा पसंद की जाती हैं. आप की क्या राय है

ऐसा नहीं है. अब देखने वालों का नजरिया बदल रहा है. हीरोहीरोइन को लोग हमेशा फिट देखना ही पसंद करते हैं. हमें तो भोजपुरी फिल्मों के साथसाथ दूसरी फिल्मों में भी काम करना है. ऐसे में अपने को फिट रखना पड़ता है. फिट रहने से हर तरह की पोशाक पहनने के बाद भी खूबसूरती बनी रहती है.

फिल्मों में आप को किस तरह के रोल करना पसंद है

मुझे हर तरह के रोल करना पसंद है. मुझे लगता है कि किसी ऐक्टर को एक किरदार में बंध कर नहीं रहना चाहिए. बेहतर ऐक्टर वही है, जो हर रोल को अच्छे से कर सके. मुझे फिल्मों में खतरनाक स्टंट करना पसंद है.

भोजपुरी फिल्मों पर खुलेपन के आरोप लगते रहते हैं. क्या आप इस बात से सहमत हैं

भोजपुरी फिल्मों में हिंदी फिल्मों से ज्यादा खुलापन नहीं है. हिंदी फिल्म में हीरोइन कोई भी कपड़े पहन ले, मुद्दा नहीं बनता, पर भोजपुरी फिल्मों में पहन ले, तो बदन की नुमाइश मान लिया जाता है.

क्या यह बात सच है कि भोजपुरी फिल्मों में हीरोइनों को बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं

केवल भोजपुरी फिल्मों की ही बात नहीं है. जहां पर भी आप मेहनत और स्ट्रगल करने बजाय शौर्टकट तरीके से आगे बढ़ना चाहते हैं, वहां समझौता करना पड़ता है. ऐसे लोग हर जगह हैं. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में भी होंगे. फैसला हीरोइन को ही करना होता है कि वह कैसे काम करना चाहती है. 

एटीएम क्लोनिंग : लोग ठगे जा रहे हैं

पिछले दिनों खबर आई थी कि क्लोनिंग के डर से कई बैंकों ने अपने लाखों ग्राहकों के एटीएम कार्ड ब्लौक कर दिए हैं. खबर सुन कर हम ने भी एटीएम का रुख किया. पत्नी का कार्ड बच गया था, मगर अपना कार्ड ब्लौक मिला. फिर क्या था, भागदौड़ शुरू हो गई. बैंक में जा कर नए एटीएम कार्ड के लिए अर्जी दी. इन पंक्तियों के लिखने तक तो नया एटीएम कार्ड मिल नहीं पाया था. बैंक वाले कह रहे हैं कि जल्द ही मिल जाएगा इस परेशानी के दौरान यों ही एटीएम क्लोनिंग के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई, तो जो जानकारी मिली, उस से बड़ी हैरानी हुई. हैरानी इसलिए, क्योंकि एटीएम क्लोनिंग करने वालों को पकड़ना भले ही मुश्किल हो, लेकिन एटीएम क्लोनिंग को ध्वस्त करना ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन फिर भी देशभर में हल्ला मचा हुआ है और लोग परेशान हैं.

साइबर माहिरों के मुताबिक, कोई भी जालसाज या हैकर एटीएम कार्ड की क्लोनिंग के लिए 2 जगहों पर काम करता है. ये जगह हैं:

1. एटीएम कार्ड मशीन के अंदर डालने वाली जगह.

2. एटीएम मशीन में कीबोर्ड के ऊपर वाली जगह.

साइबर माहिरों के मुताबिक, कार्ड की नकल बनाने के लिए जालसाज एटीएम कार्ड ऐंटर करने वाली जगह पर पोर्टेबल स्कैनर लगा देते हैं. ये स्कैनर इस तरह से बने होते हैं कि इन की बनावट एटीएम मशीन के कार्ड ऐंटर करने वाले हिस्से से बिलकुल मिलतीजुलती होती है, जिस से ज्यादातर लोग अंदाजा नहीं लगा पाते हैं कि वहां कोई स्कैनर भी लगा हुआ है.

जैसे ही कोई शख्स अपना कार्ड अंदर डालता है, वैसे ही उस का फोटो स्कैन हो जाता है, जिसे जालसाज एडीशनल ट्रैपिंग उपकरण के जरीए हासिल कर लेते हैं.

हम सभी जानते हैं कि एटीएम कार्ड का इस्तेमाल उस के पिन नंबर के बिना नहीं किया जा सकता है, इसलिए एटीएम पिन के बिना स्कैन किए गए फोटो की कोई अहमियत नहीं है, इसीलिए जालसाज एटीएम मशीन के कीबोर्ड के ठीक ऊपर कैमरा लगा देते हैं.

यह कैमरा भी ऐसा होता है, जिस के बारे में आम आदमी आसानी से नहीं पता कर पाता है. यह कैमरा पिन नंबर डालते ही उसे अपने अंदर दर्ज कर लेता है. इस तरह से एटीएम कार्ड समेत पूरा डाटा जालसाजों के पास पहुंच जाता है. अब सवाल यह उठता है कि एटीएम मशीन बैंक की है और उस में स्कैनर या कैमरा कोई और लगा गया, तो क्या बैंकों को नियमित रूप से अपनी मशीनों की जांच नहीं करानी चाहिए   निश्चित रूप से कोई आम आदमी स्नैकर या कैमरे का पता नहीं लगा सकता, लेकिन बैंक तो नियमित निरीक्षण से ऐसा कर सकता है. पूरा मामला मशीन के बाहरी हिस्से में की गई गड़बड़ का है, जिसे जांच कर के पकड़ा जा सकता है.हर एटीएम में नियमित रूप से रकम डाली जाती है. उस समय कीबोर्ड या दूसरी किसी जगह पर लगे कैमरे या कार्ड ऐंट्री पौइंट पर लगे स्कैनर की पड़ताल की जा सकती है.

हर एटीएम पर सिक्योरिटी गार्ड भी तैनात रहता है. उसे भी कैमरे या स्कैनर को पहचानने की ट्रेनिंग दी जा सकती है, ताकि वह थोड़ेथोड़े समय पर मशीन की जांच करता रहे कि उस पर कोई कैमरा या स्कैनर तो नहीं लगा है. इस के अलावा बैंक के तकनीकी माहिर भी कुछ ऐसे सामान्य संकेत या दिशानिर्देश जारी कर सकते हैं, जिस से आम आदमी भी यह पहचान सके कि मशीन में कोई गलत कैमरा या स्कैनर तो नहीं लगा है. मिसाल के तौर पर, एटीएम में कार्ड डालने की जगह पर हर समय लाइट जलती रहती है, जबकि अगर उस के आगे स्कैनर लगा होगा, तो स्कैनर में लाइट नहीं जलती है. इसी तरह के कुछ और संकेत भी बैंक ग्राहकों को बता सकते हैं, जिस से कि लोग खुद ही बैंक को सूचना दे सकें कि फलां एटीएम मशीन में यह गड़बड़ है. कुलमिला कर सारा मामला एटीएम मशीन के बाहरी हिस्से की बारीकी से जांच करने का है, जिसे बैंक आसानी से अपने लैवल पर या लोगों को कोई तरीका बता कर अंजाम दे सकते हैं और उन्हें लुटने से बचा सकते हैं.  

परिवार को ज्यादा समय देता हूं : अरशद वारसी

राजू हिरानी की फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में सर्किट की भूमिका निभाकर चर्चित हुए अभिनेता अरशद वारसी बेहतर कॉमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं. हालांकि उनके कैरियर का शुरुआती दौर काफी संघर्षपूर्ण था, पर उन्होंने धीरज और मेहनत के बल पर मुकाम हासिल किया. पहली फिल्म में काम करने का मौका उन्हे अमिताभ बच्चन की कंपनी की फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ से मिला, इसके बाद भी उन्होंने कई फिल्में की, पर वे हिंदी सिनेमा में कही नजर नहीं आये. सर्किट की भूमिका उनके जीवन का टर्निंग पाइंट था. जहां से उन्हे पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा. अभी उनकी फिल्म ‘इरादा’ रिलीज पर है, जिसे लेकर वह खुश हैं. उनसे हुई बातचीत के अंश इस प्रकार हैं.

प्र. इस फिल्म में काम करने की खास बात क्या थी? नसीरुद्दीन शाह के साथ एक बार फिर काम करने का अनुभव कैसा रहा?

यह एक ‘इशू बेस्ड’ इको थ्रिलर फिल्म है, जो गंभीर समस्या आजकल हमारे देश में है. निर्देशक ने इसे दिखाते हुए रोचक बनाया है. मैंने इस तरह की भूमिका पहले निभाई नहीं थी. इसके अलावा अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के साथ फिर से काम करना हमेशा से एक ड्रीम ही रहता है. वे भी मेरे साथ काम करना पसंद करते हैं. वे मेरी कंपनी पसंद करते हैं. वे शायरी और समझदारी की बात करते हैं और मैं बेकार और मस्ती की बातें अधिक करता हूं. असल में वे मेरी ईमानदारी को पसंद करते हैं.

प्र. आप एक डांसर और अच्छे कॉमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं? लेकिन अभी आप काफी कम फिल्में कर रहे हैं, इसकी वजह क्या है?

सभी मुझे यह पूछते हैं. मेरे उत्तर को शायद ही लोग विश्वास करें, मेरे हिसाब से प्रॉपर्टी से अधिक फैमिली पर इन्वेस्ट करना अच्छा होता है. मेरे बच्चे, पत्नी सभी के साथ अब मैं समय बिताना पसंद करता हूं, काम तो मैंने बहुत कर लिए हैं. दोनों आप साथ में नहीं कर सकते, कहीं पर आपको मना करना जरुरी है. मेरे लिए मेरा परिवार पहले है. कभी ऐसा समय था जब मैं एक शूट ख़त्म कर घर पंहुचा फिर अगले दिन दूसरे के लिए तैयार होकर निकल गया. एक दिन मैंने अपने बेटे को जब वापस आकर मिलने की बात कही तो उसने भोलेपन से कहा कि आप तो अब तब आओगे, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा. उसकी इस बात ने मुझे सोच में डाल दिया और उस दिन से मैंने कम काम करना शुरू कर दिया, क्योंकि पैसे की कोई लिमिट नहीं होती और उसे पाने की लालच में मैं अपना परिवार खो नहीं सकता.

प्र. आप अब तक की जर्नी को कैसे देखते हैं?

मैंने सोचा नहीं था कि मुझे इतना कुछ मिलेगा. मैं अपने आप को ‘ब्लेस्ड’ मानता हूं. जो इच्छाएं थी, मुश्किल थी, पर मिला भी. मैं अभी अपना समय परिवार के साथ बिताना चाहता हूं, ताकि मैं अब निर्देशक बनने के लिए अपने आप को तैयार कर सकूं. मैं निर्देशक बनना चाहता हूं और अच्छी फिल्में बनाना चाहता हूं. इसके अलावा मैं बड़े स्केल पर एक म्यूजिकल प्ले का निर्देशन करना चाहता हूं. जिसमें डांस और म्यूजिक का अच्छा परफोर्मेंस दर्शकों को देखने का मौका मिले. डांस और एक्टिंग मेरा पैशन रहा है. डांस से मैं एक्टिंग में आया हूं. इसलिए एक्टिंग और डांस को मैं छोड़ नहीं पा रहा हूं.

प्र. इंडस्ट्री में आजकल कई शादियां सालों साथ रहने के बाद टूट चुकी हैं, आप और मारिया के बीच बहुत अच्छा सामंजस्य है, आपने इसे कैसे बनाये रखा?

मेरे हिसाब से किसी को भी प्रॉपर्टी और पैसे बनाने के अलावा रिलेशनशिप पर अपना समय देने की जरुरत है, क्योंकि रिश्ते को बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है. मैंने अपना एक मापदण्ड तैयार कर लिया है कि मुझे नाम, प्रसिद्धी फोटोग्राफी, लोगों के साथ पार्टियां करना अधिक पसंद है या मेरा परिवार? जिन्हें ऐसा है कि काम करना ही है, वहां परिवार खुद समझ जाता है कि काम करना जरुरी है. ये एडजस्टमेंट दोनों तरफ से आता है. मैं पत्नी के अलावा बच्चों के साथ समय बिताता हूं, उनके लिए ब्रेकफास्ट बनाना, होमवर्क करवाना, घूमने ले जाना आदि सब करता हूं.

प्र. आप कैसे पिता हैं और उन्हें कितनी आजादी देते हैं?

मैं अधिक स्ट्रिक्ट फादर नहीं हूं. वह काम मारिया करती है. मैंने पहली साइकिल अपने पैसे से खरीदी थी. 22 साल की उम्र में लंदन एक डांस शो के लिए गया था. मेरी जिंदगी अलग थी. मैंने बहुत देरी से पैसा कमाया, लेकिन मेरे बच्चों को वे सारी सुविधाएं मिल रही हैं, जो उन्हें चाहिए. मैं बच्चों को स्पॉइल नहीं करता. हर चीज की उपयोगिता उन्हें मालूम है. बेटी मां के नजदीक है, जबकि बेटा मेरे क्लोज है.

प्र. आजकल महिलाओं के साथ कई प्रकार की छेड़-छाड और हत्या की घटनाएं हो रही हैं. इसके जिम्मेदार किसे मानते हैं? परिवार, समाज या धर्म?

दरअसल हम अपने भूतकाल को छोड़ना नहीं चाहते और हमारे ‘पास्ट’ में यही सिखाया गया है कि पुरुष सबसे बेहतर हैं, जबकि महिलाएं उनसे कमतर. इसे आप एक उदहारण से समझ सकते हैं कि एक तरफ सरकार हमारी सोच को आगे बढ़ाने को कहती है, जिसमें ‘हाई’ तकनीक से लेकर नोटबंदी तक आती है, वही सरकार जब चुनाव लड़ने जाती है, तो हमारी सभ्यता और संस्कृति की बात कहती है. यही मुख्य समस्या है. छोटे शहरों और गांव में अभी भी वही पुरानी  मानसिकता है. जिसे हटाना मुश्किल है. मेरे हिसाब से हर महिला को कम कीमत पर लाइसेंस वाली ‘गन’ आसानी से दे देनी चाहिए, इससे कुछ दुरुपयोग तो होगा, पर उसकी सजा भी होनी चाहिए. इससे  पुरुषों के अंदर डर बैठेगा और 90 प्रतिशत अपराध काम होंगे.

प्र. आगे की योजनायें क्या हैं?

मुन्नाभाई एमबीबीएस 3 की शूटिंग करने वाला हूं. इसकी कहानी भी अच्छी और अलग है.

श्रद्धा कपूर ने साझा किया हाफ गर्लफ्रेंड का पोस्टर

बॉलीवुड की क्यूट एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर और एक्टर अर्जुन कपूर की आने वाली फिल्म 'हाफ गर्लफ्रैंड' का पोस्टर रिलीज हो गया है. श्रद्धा ने अपने ट्विटर एकाउन्ट पर पोस्टर के साथ फिल्म की रिलीज डेट भी अपने फैंस के साथ साझा की है.

श्रद्धा और अर्जुन की यह फिल्म 19 मई 2017 को रिलीज होने जा रही है. लंबे समय से श्रद्धा कपूर के फैंस इस फिल्म का इंतजार कर रहे थे. यह फिल्म चेतन भगत के उपन्यास “हाफ गर्लफ्रेंड” पर बनाई गई है. जिसे मोहित सूरी ने डायरेक्ट किया है और खुद चेतन भगत इसे प्रोड्यूस कर रहे हैं.

फिल्‍म की कहानी एक बिहारी लड़के की है जिसे दिल्‍ली की एक हाई प्रोफाइल फैमिली से नाता रखने वाली लड़की से प्‍यार हो जाता है. इस फिल्म में अर्जुन ने बिहारी किरदार को पूरी तरह निभाने के लिए भोजपुरी भाषा का प्रशिक्षण भी लिया है.

चेतन भगत के द्वारा लिखे उपन्यास पर अर्जुन कपूर की यह दूसरी फिल्म हैं. इसके पहले अर्जुन कपूर ने चेतन भगत के उपन्यास  '2 स्‍टेट्स' में काम किया था. जिसने बॉक्‍स ऑफिस पर काफी धूम मचाई थी.

अब देखना ये है कि श्रद्धा और अर्जुन की नई जोड़ी कितनी धूम मचाएगी.

टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही आईपीएल टीमों को लगा झटका

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का दसवां सीजन शुरू होने से पहले ही इसकी फ्रेंचाइजी टीमों को एक झटका लगा है. साउथ अफ्रीका और इंग्लैंड के कई प्लेयर्स टूर्नामेंट को बीच में ही अधूरा छोड़ अपने-अपने देश लौट जाएंगे. वे अपने देश की नेशनल टीमों के प्रति जिम्मेदारी को देखते हुए वापस लौटेंगे.

दो पार्ट में जाएंगे प्लेयर्स

साउथ अफ्रीकी खिलाड़ी सात मई के बाद आईपीएल 2017 छोड़कर लौट जाएंगे. जबकि इंग्लैंड के खिलाड़ी दो पार्ट में टूर्नामेंट से हटेंगे. कुछ प्लेयर्स एक मई को और बाकी के 14 मई के बाद टूर्नामेंट से हटेंगे.

आपको बता दें कि साउथ अफ्रीकी टीम का इंग्लैंड दौरा 24 मई से शुरू होगा. जिसमें दो प्रैक्टिस मैच और तीन वनडे मैच होने हैं. वहीं चैम्पियंस ट्रॉफी के बाद तीन टी-20 और चार टेस्ट खेले जाएंगे.

वहीं इंग्लैंड के कुछ खिलाड़ी पांच और सात मई को आयरलैंड के खिलाफ दो वनडे खेलने के लिए स्वदेश लौटेंगे. इसी वजह से इन देशों के क्रिकेट बोर्डों ने अपने-अपने प्लेयर्स को एक वक्त के बाद टूर्नामेंट खेलने की परमिशन नहीं दी है.

फ्रेंचाइजी को दे दी जानकारी

सूत्रों की माने तो इन खिलाड़ियों ने आईपीएल में अपनी-अपनी फ्रेंचाइजियों को इस बात की जानकारी दे दी है. जिसके बाद फ्रेंचाइजियों ने भी बीसीसीआई को इस बात की जानकारी दे दी है ताकि वो अफ्रीकी बोर्ड से बात कर खिलाड़ियों को टूर्नामेंट में कुछ दिन और रोक सके.

आईपीएल का फाइनल 21 मई को खेला जाना है और यदि इन खिलाड़ियों की फ्रेंचाइजी फाइनल तक पहुंचती है तो खिलाड़ी इसमें रूक सकेंगे या नहीं इस पर स्थिति साफ नहीं है.

ये खिलाड़ी बीच में छोड़ सकते हैं टूर्नामेंट

क्विंटन डी कॉक, साउथ अफ्रीका

जेपी डुमिनी, साउथ अफ्रीका

फॉफ डू प्लेसिस, साउथ अफ्रीका

एबी डिविलियर्स, साउथ अफ्रीका

क्रिस मॉरिस, साउथ अफ्रीका

डेविड मिलर, साउथ अफ्रीका

हाशिम अमला, साउथ अफ्रीका

जोस बटलर, इंग्लैंड

सैम बिलिंगंस, इंग्लैंड

इयोन मोर्गन, इंग्लैंड

क्या है व्हाट्सएप का टू-स्‍टेप वैरिफिकेशन

व्‍हाट्सएप ने कुछ समय पहले ही एक टू-स्‍टेप वैरिफिकेशन का नया सिक्‍योरिटी फीचर जोड़ा है. अगर आपने अभी अपना व्‍हाट्सएप एप्लीकेशन अपडेट नहीं किया है तो जल्दी ऐसा करें. इस फीचर के आने के बाद अब आपको, अपने व्‍हाटसएप को वैरिफाइ करने के लिए 6 अंको वाला पासकोड नंबर डालना होगा.

व्‍हाट्सएप ने धीरे-धीरे ये टू स्‍टेप वैरिफिकेशन का नया फीचर अपडेट करना शुरु कर दिया है. यह नया टू स्‍टेप वैरिफिकेशन फीचर, एंड्रायड फोन के अलावा विंडोज और आईओएस डिवाइसेस में भी अपडेट किया गया है.

पहले की तरह न हो कर, अब यूजर को अपना व्‍हाट्सएप एकाउंट चालू करने के लिए पासकोड की जरूरत पडेगी, मतलब व्‍हाट्सएप को किसी भी फोन में इंस्‍टॉल करने के बाद, इसके वैरिफिकेशन से पहले ये सिक्‍योरिटी पासकोड इनसर्ट करना होगा और अगर आपने पासकोड गलत डाला, तो आपके एकाउंट में सेव हुआ सारा डेटा अपने आप ही डिलीट हो जाएगा.

कैसे होता है ये वैरिफिकेशन

ये टू स्‍टेप वैरिफिकेशन फीचर, जब आप चाहेंगे तब ही आपके व्‍हाट्सएप पर एक्टीवेट होता है. शायद आपने जीमेल में टू स्‍टेप वैरीफिकेशन का इस्तेमाल किया होगा. ठीक वैसे ही व्‍हाट्सएप में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

टू-स्‍टेप वैरिफिकेशन को शुरु करने के बाद आपको खुद एक पासकोड बनाना होता है और ये ये पासकोड 6 अंको का होता है. इसके बाद जब भी आप व्‍हाट्सएप किसी दूसरे फोन में इंस्‍टॉल करेंगे तब सिम वैरिफिकेशन से पहले ये पासकोड आपको डालना होगा और इसके साथ अपना ईमेल भी इन्सर्ट करना होगा.

यहां ध्यान रखने वाली बात ये है कि अगर आप किसी फोन में पासकोड की मदद से अपना व्‍हाट्सएप वैरिफाई कर लेते हैं और इसके साथ आप कोई भी मेल आइडी रजिसटर नहीं करते हैं तो, अगले 7 दिनों में ये टू-स्‍टेप वैरिफिकेशन फीचर को आप डिसेबल नहीं कर सकेंगे. यानि आप बिना पासकोड के व्‍हाट्सएप वैरिफाई नहीं कर पाएंगे. फिर 7 दिनों के बाद बिना पासकोड के व्‍हाट्सएप रीवैरीफाई कर सकेंगे.

हम आपको बता देना चाहते हैं कि अगर आप पासकोड भूल भी गए, तो अपने रजिस्‍टर्ड किये हुए मेल से इसे वापस पा सकते हैं. नया पासकोड जनरेट करने के लिए व्‍हाट्सएप आपको एक लिंक आपके ईमेल पर भेजेगा, जिस पर क्‍लिक करके, आप पासकोड रीसेट कर सकते हैं.

मैगी से भी जल्दी बन जाएगा पैन कार्ड

मैगी के ऐड में हमेशा दिखाते हैं कि बस 2 मिनट, पर सबकी पसंदीदा और कुछ दिनों पहले सरकार की आंखों की किरकिरी बनी मैगी 2 मिनट में कभी नहीं बनती. यह कठोर सत्य है. रिलायंस जियो का सिम भी मिनटों में मिल जाता है. पर कोई भी सरकारी पहचान पत्र बनवाने में सबकी ऐड़ियां घिस जाती है. वोटर आई कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट बनवाने में न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. पर हर बड़े लेन देन के लिए अनिवार्य कर दिया गया पैन कार्ड बनवाना आसान हो गया है. अब पैन कार्ड आवेदन देने के बाद आपको कई हफ्तों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा.

जल्द ही आपको पैन कार्ड के लिए कई-कई दिन तक इंतजार नहीं करना होगा. आपको आपका पैन नंबर मिनटों में मिल जाएगा. यही नहीं आप स्मार्टफोन के जरिए ही इनकम टैक्स का भुगतान भी कर सकेंगे. करदाताओं को सुविधाएं देने की अपनी मुहिम के तहत केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) आधारकार्ड बेस्ड ई-केवाईसी सुविधा के जरिए मिनटों में पैन कार्ड जारी करने की योजना पर काम कर रही है. इसके तहत थंब इप्रेशन जैसी बायोमेट्रिक आइडेंटिफिकेशन के जरिए किसी भी व्यक्ति के एड्रेस जैसी डीटेल वैरिफाई हो जाएगी और पैन कार्ड भी मिल जाएगा.

सूत्रों को एक अधिकारी ने बताया कि जिस तरह ई-केवाईसी के जरिए एक सिम जारी किया जा सकता है, उसी तरह यह प्रक्रिया पैन कार्ड के लिए भी लागू की जा सकती है. अधिकारी के मुताबिक, वर्तमान में जहां इस प्रक्रिया में 2-3 हफ्तों का समय लगता है, नई सुविधा आने के बाद इसमें 5-6 मिनट ही लगेंगी. पैन नंबर तुरंत दे दिया जाएगा, हालांकि कार्ड को बाद में डिलिवर किया जाएगा.

 टैक्स डिपार्टमेंट एक ऐसा ऐप भी डिवेलप कर रहा है जिससे करदाता ऑनलाइन ही कर का भुगतान कर सकेंगे. इस ऐप में पैन के लिए आवेदन करने, अपने रिटर्न की ताजा जानकारी लेने जैसी अन्य सेवाएं भी उपलब्ध होंगी.

क्या आपको भी याद है नोकिया 3310

नोकिया का फोन 80-90 के दशक के हर इंसान का पहला प्यार हुआ करता था. जिस फोन को याद करके हम आज बातें किया करते हैं, एक बार फिर वह फोन मार्केट में लॉन्च होने जा रहा है. अपने सबसे पॉपुलर फीचर फोन Nokia 3310 को नोकिया फिर से लॉन्च करने जा रही है. जबकी नोकिया अपने एंड्रॉइड स्मार्टफोन Nokia 6 के साथ मार्केट में री-एंट्री कर चुकी है. और बाजार में, Nokia 6 की 2 फ्लैशसेल के लिए लाखों रजिस्ट्रेशन भी हुए है. लोगों में आज भी नोकिया का क्रेज बना हुआ है. यही वजह है कि कंपनी मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस इवेंट में एक साथ अपने कई स्मार्टफोन लॉन्च करने वाली है.

Nokia 3310 जो एक GSM फोन था, इसे कंपनी ने सितंबर 2000 में  Nokia 3210 को रिप्लेस करके कम्पनी ने Nokia 3310 लॉन्च किया था. उस समय कंपनी ने दुनियाभर में इसके 126 मिलियन यूनिट यानी 12 करोड़ 60 लाख हैंडसेट का विक्रय किया था.

ऐसा सुना जा रहा है कि नए Nokia 3310 रिफ्रेस की कीमत करीब 4000 रुपए हो सकती है. हालांकि, कंपनी ने अभी फोन की कीमत को लेकर किसी भी तरह की पुष्टि नहीं की है. वैसे, विशेषज्ञों की मानें तो Nokia 3310 की लोकप्रियता पर विचार करते हुए इसकी कीमत 4000 रुपए एकदम सही है.

द गाजी अटैक : इतिहास के अछूते पन्ने का सजीव चित्रण

यदि आप यह जानना चाहते हैं कि 1971 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में विशाखापट्टनम के पास समुद्र के अंदर किस तरह पाकिस्तानी समुद्री बेडे़ के जहाज पीएनएस गाजी को डुबाया गया था, तो फिल्म ‘‘द गाजी  अटैक’’ को जरुर देखना चाहिए. फिल्म शुरू से अंत तक बांधकर रखती है, मगर जिन्हे सिर्फ मनोरंजन चाहिए, उन्हे यह फिल्म निराश कर सकती है.

सर्वविदित है 1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान विशाखापट्टनम के पास पाकिस्तानी जलयान ‘‘पीएनएस गाजी’’ डूबा था. पर उस वक्त भारतीय जलसेना ‘एस 21’ जहाज पर सवार थी. यानी कि नेवी और इस जहाज पर सवार पाकिस्तानियों के बीच क्या हुआ था, इसका सच किसी को पता नहीं है. क्योंकि इस मसले से जुड़ी सभी फाइलें क्लासीफाइड हैं. उस जलयान की अनकही कहानी को अब तीन भाषाओं की फिल्म ‘‘गाजी’’ में लेकर आए हैं फिल्मकार संकल्प रेड्डी.

हिंदी, तेलगू व तमिल इन तीन भाषाओं में बनी 1971 युद्ध के समय विशाखापट्टनम के पास डूबे पाकिस्तानी जलयान ‘‘पीएनएस गाजी” की अनकही कहानी और भारतीय जल सेना यानी कि नेवी के वीरों की दास्तान बयां करने वाली फिल्म ‘‘द गाजी अटैक’’ की कहानी है 1971 की. जब आज का बांगलादेश, पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था. मगर पूर्वी पाकिस्तान के नेता मुजीबुर रहमान की अगुवाई में हुए आंदोलन व युद्ध के बाद वह आजाद होकर बांगलादेश बन गया था.

उसी युद्ध में जब पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के बागियों पर कारवाही करती है, तभी खबर आती है कि समुद्र के रास्ते पाकिस्तान के पीएनएस गाजी से भारत के आईएनएस विक्रांत पर हमला किया जाने वाला है. भारतीय नौ सेना प्रमुख वी पी नंदा (ओम पुरी) इस सच को जानने के लिए ‘‘सर्च’’ अभियान के तहत ‘एस 21’ नामक पनडुब्बी को भेजते हैं. इस पनडुब्बी के कैप्टन रणविजय सिंह (के के मेनन) व लेफ्टीनेट कमांडर अर्जुन वर्मा (राणा डग्गू बटी) व देवराज (अतुल कुलकर्णी) हैं.

एक तरफ राजनीतिक सोच चल रही है, तो दसरी तरफ पनडुब्बी के अंदर रणविजय सिंह और अर्जुन वर्मा के बीच आपसी सोच का टकराव व अपने आपको ताकतवर बताने की लड़ाई भी है. पर अंत में दोनों एक दूसरे को समझ जाते हैं. बहरहाल, भारतीय नौसेना के यह वीर पानी के अंदर कई तरह की मुसीबतों व पाकिस्तानी नौ सेना के प्रहार का जवाब देते हुए अंततः गाजी को डुबाते हैं. मगर कैप्टन रणविंजय सिंह की मौत हो जाती है.

अति चुस्त व कसी हुई पटकथा पर बनी यह फिल्म दर्शकों को कभी भावुक बनाती है, कभी डर पैदा करती है, तो कभी उनके अंदर देशभक्ति भी जगाती है. संवाद फिल्म की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं. निर्देशक संकल्प ने नौसेना की कार्यप्रणाली वगैरह पर काफी शोधकार्य किया है, इस बात का अहसास यह फिल्म दिलाती है. यह फिल्म इस बात का सबूत है कि भारत में भी सीमित साधनों के बावजूद सबमैरिन यानी कि पानी के अंदर युद्ध फिल्म का बेहतर निर्माण किया जा सकता है.

तकनीक के स्तर पर भी गुणवत्ता वाली फिल्म है. स्पेशल इफेक्ट्स वगैरह काफी अच्छे बन पड़े हैं. फिल्म के अंदर हर घटनाक्रम का अपना लाजिक है. फिल्म में सेना के नियम, कानून, अनुशासन आदि को भी बहुत बेहतर तरीके से उकेरा गया है. कम से कम भारत में युद्ध व सेना को लेकर इतनी बेहतरीन फिल्म नहीं बनी है. फिल्म को यथार्थपरक बनाने का प्रयास किया गया है, जिसके चलते कहीं कहीं यह फिल्म डाक्यूमेंटरी होने का अहसास भी दिलाती है. कैमरामैन माधी भी बधाई के पात्र हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो इस फिल्म में राणा डग्गूबटी, के के मेनन, ओमपुरी, अतुल कुलकर्णी व राहुल सिंह सभी ने बेहतरीन परफॅार्मेंस दी है. के के मेनन का किरदार भी काफी अच्छा है. राणा डग्गूबटी के किरदार में तो कई डायमेशंस हैं. मगर फिल्म में बांगलादेशी रिफ्यूजी कम डाक्टर के किरदार की कोई आवश्यकता नहीं थी. सभी जानते हैं कि नौ सेना के बेड़े व हर पनडुब्बी में डाक्टर होता ही है. इस फिल्म में तापसी पन्नू की उपस्थिति कहीं से भी कहानी में कोई योगदान नहीं देती. यदि फिल्म में तापसी पन्नू का किरदार न होता तो भी कहानी में कोई असर न पड़ता.

फिल्म में राजनीति पर कटाक्ष भी किया गया है. फिल्म में इशारों व संवादों के माध्यम से कहा गया है कि सीमा पर सैनिक मरते रहते हैं, मगर हमारी सरकारें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते निर्णय लेने में देरी करती हैं. फिल्मकार ने फिल्म की शुरुआत में ही उनकी फिल्म को इतिहास का पूर्ण सत्य न माना जाए, ऐलान कर पाकिस्तान को खुश कर पाकिस्तान में अपनी फिल्म के प्रदर्शन की उम्मीद बनायी है.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘द गाजी अटैक’’ का निर्माण अवनेश रेड्डी, वेंकटरमन्ना रेड्डी, प्रसाद, एनएम पाशा व जगन मोहन वांछा ने किया है. फिल्म के निर्देशक संकल्प रेड्डी, पटकथा लेखक संकल्प रेड्डी, गंगराजू गुन्नम व निरंजन रेड्डी, कैमरामैन माधी हैं. और कलाकार हैं-राणा डग्गुबटी, के के मेनन, तापसी पन्नू, अतुल कुलकर्णी, ओम पुरी, राहुल सिंह, मिंलिंद गुणाजी व अन्य.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें