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देह धंधे में डूबी लड़कियां

नेहा पैसा कमाने के लिए देहधंधा कर रही थी, लेकिन उस ने देहधंधे से जिस तरह की कमाई के बारे में सोचा था, उस तरह उस की कमाई हो नहीं रही थी. ज्यादा कमाई के लिए उस ने पूनम आंटी से बात की तो उस ने नेहा को ऐसी जगह पहुंचा दिया, जहां की चमकदमक देख कर उस की आंखें फैल गईं.

पूनम ने नेहा को पूरी बात समझा दी थी. वह पहले तो वहां झिझक रही थी, लेकिन बाद में पूनम की बात मान कर उस के बताए रास्ते पर चल पड़ी थी. आखिर उसे देहधंधा तो करना ही था. पूनम के संपर्क में आने के बाद नेहा ने देखा कि केवल लड़कियां ही नहीं, शादीशुदा औरतें भी इस धंधे में लगी हैं.

नेहा ने कई लड़कियों से बात की तो पता चला कि ज्यादातर लड़कियां या औरतें अपने घरों से नौकरी करने के नाम पर निकलती हैं और वहां आ कर देहधंधा करती थीं. तमाम ऐसी लड़कियां थीं, जिन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता था. होटल में आते समय वे अपने चेहरे को कवर किए रहती थीं. बाहर निकलते समय भी वे चेहरा ढके रहती थीं.

पुलिस ने रामपुर के संधू होटल पर छापा मार कर 5 कालगर्ल्स सहित 7 लोगों को पकड़ा था. पकड़े गए लोगों के पास से आपत्तिजनक चीजें और नकदी बरामद की गई थी. पुलिस पहले भी इस होटल से सैक्स के कारोबार में शामिल लोगों को पकड़ कर जेल भेज चुकी थी. वहां पकड़ी गई ज्यादातर लड़कियां उत्तराखंड की थीं.

रामपुर के थाना स्वार पुलिस को सूचना मिली थी कि होटल संधू में सैक्स का कारोबार चल रहा है. पुलिस ने होटल पर छापा मारा तो वहां 5 कालगर्ल्स सहित 7 लोगों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया. पकड़ी गई ज्यादातर लड़कियां उत्तराखंड की रहने वाली थीं. पकड़े गए लोगों में संधू होटल का मैनेजर भी था.

आसपास के लोग कई बार इस होटल के बारे में पुलिस से शिकायत कर चुके थे, लेकिन होटल संचालक और पुलिस की मिलीभगत की वजह से पुलिस ने काररवाई नहीं की थी. इसी साल अप्रैल महीने में होटल से 2 कालगर्ल्स सहित 4 लोगों को पकड़ा गया था. पूछताछ में इन लड़कियों से पता चला था कि काम की तलाश में भटक रही लड़कियों को देहधंधा कराने वाले लोग आसानी से उन्हें अपनी ओर मोड़ लेते थे.

देहधंधे का संचालन करने वाला इस बात का पूरा खयाल रखता था कि एक ग्राहक के पास एक ही लड़की बारबार न जाए. लड़कियों को भी इस बात की खास हिदायत दी जाती थी कि वे ग्राहक से बाहर संबंध न रखें. कई संचालक तो लड़कियों और ग्राहकों के मोबाइल फोन अपने पास रख लेते थे, जिस से किसी तरह के फोटो या वीडियो के बनने की संभावना न रहे.

इस तरह के चलन में लड़कियों के लिए अच्छी बात यह होती है कि ये पुराने दकियानूसी चकलाघर से अलग होते हैं. यहां साफसुथरे कमरों और अच्छे ग्राहकों से संपर्क होता है. किसी तरह के शोषण की संभावना नहीं होती. संचालक इस बात का खयाल रखता है कि किसी लड़की से जबरन कुछ न कराया जाए. इस से किसी तरह के विवाद की संभावना नहीं रहती.

इस तरह के ज्यादातर मामले दूसरे लोगों के विवादों की वजह से ही पुलिस के सामने आते हैं. ज्यादातर मामलों में होटलों के आसपास रहने वाले लोग ही पुलिस से शिकायत करते हैं. कई बार विरोधी होटल वाले भी शिकायत कर देते हैं. पुलिस को ये बातें पहले से ही पता होती हैं. इस तरह की शिकायतों के बाद कुछ दिनों तक होटल यह धंधा बंद कर देते हैं.

धीरेधीरे वे फिर धंधा शुरू कर देते हैं. इस तरह की शिकायतों से पुलिस को मिलने वाली रिश्वत बढ़ जाती है. पहली बार जब नेहा पुलिस छापे में पकड़ी गई थी तो उसे इस बात का डर सता रहा था कि उस के घर वालों को सच्चाई का पता चल जाएगा. लेकिन पकड़े जाने पर संचालकों ने नेहा के घर वालों को बताया था कि वह टूर पर गई है. 3 दिन उस का मोबाइल बंद रहेगा. यही नहीं, संचालकों ने अदालत में जमानत के समय नेहा का नाम और पता सब फरजी लिखवाया था. इस से किसी को नेहा के सच का पता नहीं चला.

संचालक कोर्ट और पुलिस के कामों में होने वाले खर्च की रकम को लड़कियों से ही वसूल करते हैं. लड़कियों को यह पैसा किस्तों में अदा करना होता है. असल में ये लड़कियां किसी रोजगार से जुड़ी नहीं होतीं. घर के लोग रोजगार या कामधंधे से बाहर जाते हैं. वे इतना पैसा नहीं कमा पाते कि परिवार चला सकें. ऐसे में लड़कियां रोजगार के लिए देहधंधे का सरल रास्ता चुनती हैं.

उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में रोजगार के साधन उस तरह से नहीं बन पाए, जैसी उम्मीद की जा रही थी. ऐसे में गरीबी में परेशान लोग कई तरह के बुरे कामों में फंस गए हैं. गांवों और शहरों में रहने वाली लड़कियां मैदानी इलाकों के बड़े शहरों में नौकरी के लिए जाती हैं. जाती तो वे नौकरी के लिए हैं, पर उन में से तमाम देहधंधे में फंस जाती हैं.

वहां से आने वाली लड़कियां रामपुर, बरेली और दिल्ली तक जाती हैं. एक साल में केवल रामपुर में ही ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिन में वहां से आई लड़कियां देह धंधा करती पकड़ी गई हैं. लेकिन ये किसी बड़े रैकेट का हिस्सा नहीं होतीं. होटल के संचालकों से ये सीधा संपर्क रखती हैं. जरूरत पड़ने पर होटल के संचालक इन्हें बुला लेते हैं.

ये लड़कियां 6 से 8 के ग्रुप में होती हैं. कई बार 3 से 4 लड़कियां भी अपना ग्रुप बना लेती हैं. ऐसी लड़कियां ज्यादातर दिन में देह कारोबार करती हैं. प्रति ग्राहक ये 5 सौ रुपए लेती हैं. होटल मालिक ग्राहक से कमरे के हिसाब से पैसा वसूल करता है, जो आमतौर पर डेढ़ से 2 हजार रुपए के बीच होता है.

अगर लड़की को रात में रोकना होता है तो उस का रेट अलग होता है. मैदानी इलाकों के मुकाबले पहाड़ी इलाकों के शहरों और होटलों में देहधंधा कम होता है. क्योंकि वहां के होटलों में इस तरह के काम करना आसान नहीं है.

ऐसे में पहाड़ घूमने आने वाले पर्यटक पहाड़ से लगे मैदानी इलाकों में रुकते हैं. यहां उन्हें कई तरह की सुविधाएं मिल जाती हैं. कई पर्यटक तो मैदानी इलाकों के शहरों में ही रुकते हैं और वहां से कार से पहाड़ घूमने जाते हैं. यहां के होटल पहाड़ के होटलों के मुकाबले सस्ते होते हैं और यहां इस तरह की सुविधाएं भी मिल जाती हैं.

मैदानी इलाकों के होटलों में पुलिस का खतरा कम होता है. मैदानी इलाकों में देहधंधा करने वाली लड़कियां पहाड़ों से आती हैं. पहाड़ पर एक तो ऐसे काम मुश्किल से होते हैं, दूसरे वहां पहचान होने का खतरा होता है. ऐसे में मैदानी इलाकों के होटल इन के लिए ज्यादा सुरक्षित होते हैं. पहाड़ों की ये लड़कियां अपने शहरों से बहुत दूर नहीं जाती हैं.

भाई ने ही कराई भाइयों की हत्या

24 नवंबर, 2016 की रात पटना के जमाल रोड स्थित कुमार कौंप्लेक्स की चौथी मंजिल पर स्थित फ्लैट में रहने वाले शिवराज चौधरी के बेटों अभिषेक और सागर चौधरी की हत्या हो गई थी. दोनों भाइयों की लाशें पुलिस ने फ्लैट के एक ही कमरे से बरामद की थीं. दोनों भाई यह फ्लैट किराए पर ले कर रह रहे थे.

हत्यारों ने दोनों भाइयों की बड़ी बेरहमी से हत्या की थी. हत्या के बाद गुप्तांग भी काट लिए थे. अभिषेक का सिर धड़ से अलग कर दिया गया था. सागर के गले में प्लास्टिक की रस्सी लपेटी थी, जिस से अंदाजा लगाया गया था कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी.

हत्यारों ने अभिषेक और सागर की हत्या में चाकू का भी उपयोग किया गया था. उन के शरीर पर चाकुओं के करीब 25-30 घाव थे. शरीर का कोई भी अंग बाकी नहीं था, जहां चाकू का घाव न रहा हो. इस से साफ लग रहा था कि हत्यारों को मृतकों से काफी खुन्नस थी.

पुलिस ने रोहतास, पटना और भोजपुर के ऐसे 9 लोगों से पूछताछ की, जिन का अभिषेक से संबंध था. ये सभी अभिषेक और सागर के करीबी रिश्तेदार थे. इन लोगों से पूछताछ में पता चला था कि सासाराम के बंजारी इलाके की रहने वाली किसी लड़की से अभिषेक का विवाह होने वाला था.

उस लड़की से अभिषेक की सगाई 16 सितंबर, 2016 को रोहतास में हुई थी. 23 नवंबर को शादी होने वाली थी. सगाई के बाद लड़की से अभिषेक की फोन पर बातें होने लगी थीं. लेकिन कुछ दिनों बाद ही सगाई टूट गई थी.

पुलिस ने जब इस की वजह पता की तो घर वालों ने बताया कि लड़की के सुंदर न होने की वजह से यह सगाई टूटी थी. अभिषेक के पिता शिवराज चौधरी का कहना था कि अभिषेक की सगाई होने के कुछ दिनों बाद ही उस की मर्चेंट नेवी में नौकरी लग गई थी.

मई, 2017 में उसे मुंबई जा कर नौकरी जौइन करनी थी. इसी बात को ले कर उसे विवाह में मामला उलझ गया था. अभिषेक के कैरियर को देखते हुए लड़की के घर वालों से विवाह के लिए मना कर दिया गया था, जिस की वजह से दोनों परिवारों में काफी विवाद हुआ था. अभिषेक के घर वालों ने दहेज के रूप में लड़की वालों से एक लाख रुपए एडवांस ले रखे थे.

24 नवंबर की सुबह 7 बजे अभिषेक नारायणपुर गांव के अपने घर से पटना पहुंचा था, जहां उस की मुलाकात कुछ दोस्तों से हुई थी. दोपहर 2 बजे वह अपने जीजा अमित से मिला था. वह पटना हाइकोर्ट में वकालत करते हैं. उसी दिन अभिषेक के मंझले भाई सागर को किसी काम से घर जाना था. वह घर के लिए निकला जरूर, पर पहुंचा नहीं.

अभिषेक और सागर के सब से छोटे भाई का नाम अमित चौधरी उर्फ भोलू है. पहले पुलिस को उसी पर दोनों भाइयों की हत्या का शक था. पुलिस उस से पूछताछ करना चाहती थी, लेकिन घर वाले पुलिस से कह रहे थे कि वह बीमार है. घर वालों का कहना था कि 2 भाइयों की हत्या की वजह से वह गहरे सदमे में हैं.

गौरतलब है कि हत्या के बाद भोलू और उस के मामा ही सब से पहले कमरे में पहुंचे थे. पुलिस को यह भी लग रहा था कि कहीं दोनों भाइयों की हत्या प्रेमप्रसंग की वजह से तो नहीं हुई है. लेकिन घटनास्थल की स्थिति से लग रहा था कि इस हत्याकांड में किसी जानपहचान वाले का हाथ है. इस की वजह यह थी कि हत्यारा आराम से दोनों के कमरे में पहुंच गया था और दोनों की हत्या कर के चला गया था.

हत्या वाले दिन दोपहर 2 बजे अभिषेक ने पिता शिवराज चौधरी और मां रेणु देवी को फोन कर के बात की थी. अभिषेक का बहनोई अमित दोनों का खाना पहुंचाता था. दोनों भाई पटना में रह कर मोबाइल फोन एसेसरीज का कारोबार करते थे. इस के अलावा दोनों भाई आरा से बिहटा ट्रक चलवाते थे.

उन का बालू का ठेका भी था. बालू के ठेके और ट्रक को ले कर कई बार दोनों भाई विवादों में फंस चुके थे. उन का एक डंपर उत्तर प्रदेश में भी चलता था. शिवराज चौधरी का कहना था कि उन के बेटों की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. दोनों बेटों की हत्या से उन के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था.

पहले दोनों भाई गांव में किराए पर जेनरेटर चलाते थे. इस के बाद उन्होंने पोल्ट्री फार्म और डेयरी फार्म का भी काम किया. पास में कुछ पैसे आए तो उन्होंने पटना में कारोबार करने का विचार किया. पटना आ कर दोनों ने 2 ट्रक खरीदे और उन्हें किराए पर चलाने लगे.

सन 2014 में जमाल रोड स्थित कुमार कौंप्लेक्स में उन्होंने रहने के लिए राजकुमार गुप्ता का फ्लैट किराए पर लिया था. मकान मालिक ने बताया था कि दोनों भाई काफी शांत स्वभाव के थे. उन का बाहरी लोगों से कोई लेनादेना नहीं था.

हत्यारा दोनों भाइयों के मोबाइल फोन भी ले गया था. शायद हत्यारों का सोचना था कि मोबाइल फोन गायब होने से पुलिस को कोई सबूत नहीं मिलेगा, लेकिन वही पुलिस के लिए तुरुप का पत्ता साबित हुआ.

पुलिस ने दोनों के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा ली थी. वहीं 24 साल के अमित को अपने भाइयों की हत्या करवाने का जरा भी मलाल नहीं था. उस का कहना था कि उसे अपने भाइयों से नफरत हो गई थी. बड़ा भाई अभिषेक हमेशा परेशान करता रहता था. मंझला भाई सागर हमेशा उसे डांटतामारता रहता था. उन्होंने अपना धंधा तो चमका लिया था, जबकि उसे कोई काम नहीं करने दे रहे थे.

जब अभिषेक ने उसे घर से भगा दिया तो उसे लगा कि अगर दोनों भाइयों को रास्ते से हटा दिया जाए तो पिता और भाइयों की सारी संपत्ति उस की हो जाएगी. उस के बाद वह अकेला ऐश करेगा. इसी लालच में उस ने अपने भाइयों अभिषेक और सागर की हत्या करने का विचार बना लिया था.

22 अक्तूबर को अभिषेक और सागर ने अमित को घर से भगा दिया था. पहले अभिषेक ने एक ट्रक खरीदा था, उस के कुछ दिनों बाद सागर ने एक ट्रक खरीदा था. दोनों मिल कर तीसरा ट्रक खरीदना चाहते थे. अमित भी अपना एक ट्रक खरीदना चाहता था, जिस के लिए वह भाइयों से रुपए मांग रहा था. लेकिन भाइयों ने रुपए देने से ही मना ही नहीं कर दिया, बल्कि उसे घर से भाग जाने के लिए कह दिया.

इसी से नाराज हो कर अमित ने दोनों बड़े भाइयों अभिषेक और सागर को सबक सिखाने का मन बना लिया. अभिषेक ने फ्लैट की 3 चाबियां बनवा रखी थीं, जिस में से एक चाबी अभिषेक के पास रहती थी तो दूसरी सागर के पास रहती थी. जबकि तीसरी चाबी दरवाजे के ऊपर वेंटीलेटर पर रखी रहती थी. उस के बारे में उन दोनों के अलावा अमित और उन के पिता शिवराज चौधरी को पता था.

अमित के रिश्तेदारों का कहना था कि अमित इधर गलत लोगों की संगत में पड़ गया था. ऐसे लोगों से दूर रखने के लिए अभिषेक ने उसे बालू के कारोबार में लगा दिया था, जहां वह रुपयों की हेराफेरी करने लगा था. अभिषेक ने उसे कई बार समझाया, पर वह नहीं माना. दिवाली के पहले अमित की चोरी पकड़ी गई तो सागर ने उस की पिटाई कर दी थी.

शायद पिटाई से ही नाराज हो कर अमित ने अपराधियों के साथ मिल कर भाइयों की हत्या की साजिश रच डाली थी. अमित अपना ट्रक खरीदना चाहता था, जिस के लिए वह भाइयों से रुपए मांग रहा था. रुपए देने के बजाय दोनों भाई यही सलाह दे रहे थे कि वह पहले ट्रक चलवाने वाले कारोबार को अच्छी तरह समझ ले, उस के बाद ही वह इस कारोबार को शुरू करे.

बगैर समझेबूझे कोई काम करने से रुपए डूब सकते हैं. अमित भाइयों की बात मानने के बजाय ट्रक खरीदने की जिद पर अड़ा था. अभिषेक ने रुपए देने से मना कर दिया तो अमित उस के दुश्मन संतोष से जा मिला. आरा के नारायणपुर गांव के ही रहने वाले संतोष से अभिषेक का कुछ दिनों पहले ही झगड़ा हुआ था.

अमित ने उसी के साथ मिल कर अभिषेक की हत्या की योजना बनाई. संतोष को भी अभिषेक से बदला लेना था, इसलिए वह तुरंत उस की हत्या करने को तैयार हो गया. उसे इस काम के लिए ढाई लाख रुपए देने को भी कहा था. संतोष ने उसे अपने गैंग में शामिल करने का वादा किया था.

कुमार कौंप्लेक्स से कुछ दूरी पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में पुलिस को 3 सदिग्धों की फोटो मिली. उन फोटो को ले कर पुलिस आरा पहुंची तो तीनों की पहचान हो गई. पता चला कि वे आरा के छुटभैए अपराधी थे, जिन का नाम संतोष, नीतीश और सच्चिदानंद था. इस के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया तो उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया कि अमित ने ही उन्हें भाइयों की हत्या की सुपारी दी थी.

पुलिस ने अमित को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद उस की निशानदेही पर रितेश और रमेश को भी आरा से गिरफ्तार कर लिया गया. इन के पास से 8 मोबाइल फोन, 3 चाकू और एक हथौड़ा बरामद किया गया. संतोष अभी नहीं पकड़ा जा सका है. पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए ताबड़तोड़ छापे मार रही है. आरा में उस के खिलाफ दरजनों मामले दर्ज हैं.

पुलिस ने अमित से सख्ती से पूछताछ की तो वह घबरा गया. पुलिस ने उस से पूछा कि वह घटना वाले दिन कहां था तो उस ने कहा कि वह आरा में ही था. लेकिन मोबाइल फोन की लोकेशन से उस का झूठ पकड़ा गया. लोकेशन के अनुसार उस दिन वह पटना में था. इस के बाद पुलिस ने सख्ती की तो उस ने सच्चाई उगल दी.

अमित ने जो बताया उस के अनुसार, 23 नवंबर, 2016 की रात सागर जमाल रोड वाले फ्लैट में अकेला था. अमित, संतोष, सच्चिदानंद और नीतीश को साथ ले कर फ्लैट पर पहुंचा. अमित खुद नीचे रह गया, जबकि तीनों अपराधियों को ऊपर भेज दिया. हत्यारों ने सागर के सिर पर हथौड़ा मार कर बेहोश कर दिया.

उस के बाद अंगौछे से गला कस कर हत्या कर दी. उन्होंने अमित को बताया कि सागर को मार दिया है तो वह ऊपर पहुंचा और सागर की लाश को घसीट कर पूजाघर में छिपा दिया. सागर की हत्या कर के सभी बाहर आ गए और दरवाजा लौक कर के अभिषेक के पीछे लग गए.

24 नवंबर, 2016 को 10 बजे अभिषेक फ्लैट पर पहुंचा तो पीछा करता हुआ अमित, संतोष, रितेश और रमेश के साथ फ्लैट पर पहुंच गया. इस बार भी अमित नीचे ही खड़ा रहा और तीनों अपराधी अभिषेक के फ्लैट पर जा पहुंचे.

उन्होंने अभिषेक के सिर पर भी हथौड़ा मार कर बेहोश कर दिया और फिर गला रेत कर हत्या कर दी. उस के प्राइवेट अंगों को भी काट दिया. इस के बाद अमित कमरे में पहुंचा और अभिषेक की लाश को भी पूजाघर में ले जा कर छिपा दिया.

इस के बाद दोनों लाशों पर एसिड डाल कर जलाने की कोशिश की. उस ने कमरे में फैले खून को साफ किया और बाहर से दरवाजा बंद कर के सब के साथ फरार हो गया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि संपत्ति विवाद और ईर्ष्या की वजह से अभिषेक और सागर के छोटे भाई अमित ने ही उन की हत्या करवाई थी. 3 भाइयों में अभिषेक सब से बड़ा था और सागर उस से छोटा, अमित सब से छोटा था. 23 नवंबर को अमित के मोबाइल फोन की लोकेशन पटना की पाई गई तो पुलिस का शक यकीन में बदल गया था.

बीए करने के बाद अमित नौकरी खोज रहा था. जब कहीं नौकरी नहीं मिली तो वह अपने दोनों बड़े भाइयों से रुपए मांगने लगा था. कुछ समय तक अभिषेक रुपए देता रहा. उस के बाद में उस ने अभिषेक से कहा कि वह अपना अलग धंधा करना चाहता है, जिस के लिए वह उसे रुपए दे.

पिछली दिवाली से ही अमित अपने भाइयों से कारोबार के लिए रुपए मांग रहा था. जबकि वे टालमटोल कर रहे थे. अभिषेक के रवैए से नाराज हो कर अकसर अमित घर में हंगामा करता रहता था.

शिवराज चौधरी के 7 बच्चे हैं. अभिषेक, सागर और अमित के अलावा उन की 4 बेटियां हैं. चारों बेटियों का विवाह हो चुका है. घर वालों का कहना है कि अमित के रवैए और उस की अपराधियों से दोस्ती की वजह से घर के सभी लोग परेशान थे. उस पर किसी के समझाने का असर नहीं हो रहा था. वह रातोंरात करोड़पति बनने के सपने देखा करता था.

अभिषेक और सागर को उस के ही छोटे भाई अमित ने मौत के घाट उतरवा दिया था. अब वह जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया है. एक साथ तीनों बेटों के खोने के दर्द में डूबे शिवराज चौधरी आंखों में आंसू लिए कहते हैं कि उन का परिवार और जिंदगी दोनों बरबाद हो गई.

उन की पत्नी रेणु चौधरी बुत बनी बैठी रहती हैं. उन्हें किसी चीज की सुध नहीं है. उन की सूनी आंखें मानो हर पल अपने बच्चों को ढूंढती रहती हैं. शिवराज कहते हैं कि दौलत के लिए भाइयों के झगड़े के बारे में कई कहानियां सुनी थीं, पर उन के ही बेटे ने एक दर्दनाक कहानी बना डाली. अब उन की जिंदगी बेकार है.

यात्रा के दौरान कितना सुरक्षित है आपका ‘लैपटॉप’

आप चाहे अपने काम के लिए यात्रा कर रहे हों या फिर अपने दोस्तों के साथ कोई मजेदार ट्रिप प्लान कर रहे हो, तो संभव है कि कुछ काम करने या समय व्यतीत करने के लिए आप अपना लैपटॉप अपने साथ ले कर जाएंगे. इसके अलावा अगर आप विदेश यात्रा करने जा रहे हैं और अपने परिवार और दोस्तों से दूर हो रहे हैं, तो स्काइप और फेसबुक आपके कंप्यूटर पर पूरे समय चलता ही रहता है. अपनी किसी भी यात्रा के दौरान अपने लैपटॉप को सुरक्षित रखने के लिए इन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

सही बैग का प्रयोग करें

अपने पसंदीदा लैपटॉप को यात्रा पर ले जाने से पहले उसके लिए उचित बैग को चुनाव कर लेना चाहिए. ऐसे वस्तुओं को चुनाव करना चाहिए जो आपके कंप्यूटर को ले जाने के लिए सबसे सुविधाजनक हो क्योंकि मौजूदा टीएसए अर्थात परिवहन सुरक्षा प्रशासन दिशानिर्देशों की सिफारिश है कि आपका लैपटॉप बैग "चेकपॉइंट के हिसाब से मैत्रीपूर्ण" होना चाहिए. लैपटॉप बैग का विकल्प ऐसा चुनना चाहिए जो नियमित सुरक्षा स्क्रीनिंग को यथासंभव आसान बना सके.

सुरक्षित वाईफाई का इस्तेमाल

आप कहीं भी मिलने वाले गेस्ट वाईफाई का लाभ उठाने का मौका नहीं ही छोड़ते हैं. ऐसे में आपको ये बात ध्यान रखना चाहिए कि अपनी गतिविधियों को सीमित और सुनिश्चित कर लेना चाहिए ताकि आपकी व्यक्तिगत जानकारी किसी जोखिम में न पड़ जाएं.

इसमें आपको खासकर के इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि जब आप एक खुले नेटवर्क का इस्तेमाल कर इंटरनेट चला रहें हो तो अपना बैंक खाता स्टेटमेंट, क्रेडिट स्कोर, और बिलों का भुगतान ये सब सुरक्षित  हों. यदि आप अपने कार्य उद्देश्यों के लिए यात्रा कर रहे हैं, अपनी कंपनी की आईटी टीम से हमेशा संपर्क रखें.

अपने लैपटाप पर स्थान सेवाओं को चालू रखें

यात्रा पर कहीं भी जाने से पहले अपनी अपने लैपटॉप पर  iCloud.com पर या कहीं और स्थान सेवाओं को चालू करें. यह हर तरह से आपकी सुरक्षा द्रष्टी से उचित है. यदि आप अपना लैपटॉप बैग को किसी टैक्सी या होटल में छोड़ भी देते हैं या आपका लैपटॉप खो जाए तो आपकी सुविधा के लिए ये आपको अपने लैपटॉप से सामग्री को लॉक करने या मिटाने की क्षमता प्रदान करता है.

सब कुछ अपडेट कर लेना चाहिए

अपनी यात्रा से पहले, अपने कंप्यूटर और एंटी-वायरस सॉफ्टवेयर को अपडेट कर लें, ताकि यदि आपको कहीं वाईफाई का इस्तेमाल करना पड़े तो यह आपको समय पर सुरक्षा प्रदान कर सके और आपका समय बर्बाद न हो.

अपने लैपटॉप को परस्नेलाइज कर लें

अपने लैपटॉप को अपने और उस व्यक्ति के लिए पहचान योग्य बनाएं जिसके साथ करके यात्रा कर रहे हैं. ऐसा आप अपने लैपटॉप को कोई अद्वितीय डेकेल या स्टीकर के साथ चिह्नित करके कर सकते हैं. ऐसा करके आप चोरों से अपने लैपटॉप को बचा सकते हैं. सफर में  अपने लैपटॉप को कुछ यूं चिन्हित करें कि एक टेबल पर रखे 10 लैपटॉप में से आप अपने लैपटॉप को आसानी से पहचान सकें.

140 का हुआ टेस्ट क्रिकेट, जानें पहले मैच की कहानी

भारत समेत दर्जनों देशों में जिस खेल के लिए लोग दीवानगी की सारी हदें पार कर देते हैं, उस खेल का पहला आधिकारिक टेस्ट मैच 15-19 मार्च 1877 को यानी आज ही के दिन ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में खेला गया था.

टेस्ट क्रिकेट के आज 140 साल पूरे हो गए हैं. पहला टेस्ट मैच ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था. ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) में खेले गए इस मैच में इंग्लैंड को 45 रनों से हार का सामना करना पड़ा था. इंग्लैंड ने अगला टेस्ट मैच जीतकर सीरीज को 1-1 से बराबर कर लिया था.

ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया. पहली पारी में ऑस्ट्रेलिया ने बैनरमैन की सेंचुरी की बदौलत 245 रन बनाए. इसके जवाब में इंग्लैंड की टीम 196 रनों पर आउट हो गई. हालांकि ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में बैनरमैन चल नहीं पाए और पूरी टीम 104 रनों पर आउट हो गई. दूसरी पारी में इंग्लैंड को जीतने के लिए सिर्फ 153 रन बनाने थे लेकिन पूरी टीम 108 रन बनाकर आउट हो गई. पहला टेस्ट मैच चार दिनों तक खेला गया.

टेस्ट क्रिकेट इतिहास का पहला रन और पहला शतक

पहले टेस्ट मैच का टॉस ऑस्ट्रेलियाई टीम ने जीता और पहले बल्लेबाजी का फैसला किया. लगभग 1500 दर्शकों की उपस्थिति में कंगारू टीम के लिए पारी की शुरुआत दाएं हाथ के बल्लेबाज चार्ल्स बैनरमैन और दाएं हाथ के विकेटकीपर बल्लेबाज नैट थॉमसन ने की.

जहां थॉमसन के लिए पहला ही आधिकारिक मैच बुरा रहा, वहीं बैनरमैन हीरो बनकर उभरे. उन्होंने पारी के पहले ओवर की दूसरी गेंद पर इतिहास का पहला रन लिया. इसके बाद तो वह रुके नहीं और पहले दिन का खेल खत्म होने तक 126 रन बनाकर नाबाद लौटे. इस प्रकार उन्होंने पहले ही टेस्ट मैच में शतक लगाने का गौरव हासिल कर लिया और क्रिकेट इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा लिया.

रिटायर्ड हर्ट होने वाला पहला बल्लेबाज

चार्ल्स बैनरमैन ने दूसरे दिन भी शानदार बल्लेबाजी जारी रखी और 165 रन (18 चौके) तक पहुंच गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से उनके दाएं हाथ की अंगुली में जॉर्ज यूलिएट की एक गेंद लग गई, जिससे उसमें फ्रैक्चर हो गया और उन्हें रिटायर्ड हर्ट होना पड़ा. इस प्रकार वह इतिहास के पहले रिटायर्ड हर्ट होने वाले बल्लेबाज भी बन गए. ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 245 रन बनाए. खास बात यह कि जहां बैनरमैन ने शतक लगाया, वहीं उनकी टीम का अन्य कोई भी बल्लेबाज 18 रन के आंकड़े को भी पार नहीं कर सका.

पहला विकेट और डक आउट

जहां पहले टेस्ट का पहला रन दूसरी गेंद पर बना था, वहीं टेस्ट इतिहास का पहला विकेट इंग्लैंड के गेंदबाज एलन हिल ने चौथे ओवर में लिया था. उन्होंने कंगारू बल्लेबाज नैट थॉमसन को बोल्ड किया था, जो महज एक रन ही बना पाए थे. ऑस्ट्रलिया के एडवर्ड ग्रेगरी शून्य (डक) पर आउट होने वाले पहले बल्लेबाज बने. साथ ही वह रनआउट होने वाले पहले बल्लेबाज भी बन गए.

मिडविंटर ने पहली पारी में लिए 5 विकेट

ऐतिहासिक टेस्ट मैच में कंगारू टीम ने 45 रन से जीत हासिल की. इंग्लैंड की टीम पहली पारी में 196 रन ही बना पाई. ऑस्ट्रेलिया के बिली मिडविंटर ने पहली पारी में पांच विकेट झटके. दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलियाई टीम 104 नर पर सिमट गई और इंग्लैंड को जीत के लिए 154 रन का लक्ष्य मिला, लेकिन वह भी संघर्ष नहीं कर पाई और 108 रन पर ही पूरी टीम लौट गई. कंगारू गेंदबाज टॉम केंडल ने 55 रन देकर सात विकेट चटकाए.

पहली सीरीज रही बराबर

भले भी इंग्लैंड की टीम पहले टेस्ट में हार गई, लेकिन उसने दूसरे टेस्ट में शानदार वापसी करते हुए ऑस्ट्रेलिया को चार विकेट से हराकर सीरीज 1-1 से बराबर कर ली. इस प्रकार टेस्ट इतिहास की पहली सीरीज बराबर रही.

टेस्ट मैच के अन्य रिकॉर्ड

सबसे अधिक टेस्ट मैच खेलने का रिकॉर्ड इंग्लैंड टीम के नाम है. इंग्लिश टीम ने 983 टेस्ट मैच खेले हैं. 351 में उसे जीत मिली है तो 289 में हार का सामना करना पड़ा. 343 मैच डॉ रहे. ऑस्ट्रेलिया ने 799 टेस्ट मैच खेले हैं, जिसमें से उसे 377 में जीत मिली है. कंगारू टीम महज 214 टेस्ट में हारी है.

भारत ने 1932 में टेस्ट क्रिकेट खेलना शुरू किया. भारत ने अभी तक 510 टेस्ट मैच खेले हैं. इसमें से 138 में जीत हासिल की है और 158 में उसे हार मिली है. 213 मुकाबले ड्रॉ रहे हैं. एक मैच टाई रहा है.

सबसे कम टेस्ट मैच की बात करें यह बांग्लादेश के नाम है. इस टीम ने अभी तक 99 टेस्ट मैच खेले हैं. बांग्लादेश 8 टेस्ट मैच जीत पाया है, जबकि 76 में उसे हार का सामना करना पड़ा और 15 मैच ड्रॉ रहे. दुनिया की कुल 10 टीमें टेस्ट क्रिकेट खेल रही हैं. इनमें ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, इंग्लैंड, इंडिया, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका, श्रीलंका, वेस्ट इंडीज और जिम्बाब्वे शामिल हैं.

साइबर अपराध से दुनिया को 45.5 अरब डौलर का चूना

सरकारी क्षेत्र के बैंक ग्राहकों को साइबर बीमा सुरक्षा कवर देने की योजना पर तेजी से काम कर रहे हैं. देश के सब से बड़े स्टेट बैंक औफ इंडिया पर पिछले साल हुए साइबर हमले के बाद से बैंकों के समक्ष इस संकट कैसे निबटना है, बड़ी चुनौती बन गया है. देश में पिछले साल साइबर अपराध के कारण आम लोगों को 4 अरब डौलर का नुकसान हुआ है. भारत जैसे देश में डिजिटल रूप से साक्षर लोगों की संख्या भले ही बहुत कम है लेकिन डिजिटल प्रक्रिया से लेनदेन का माहौल तेजी से बढ़ रहा है और इस प्रक्रिया में साइबर अपराधी मौज कर रहे हैं.

बैंकों की अपने ग्राहकों को किसी को भी खाता या एटीएम कार्ड संबंधी सूचना नहीं देने की हिदायत है, इस के बावजूद अपराधी लोगों को ठग रहे हैं और अर्थव्यवस्था अरबों का नुकसान को पहुंचा रहे हैं. भारत ही नहीं, दुनियाभर के विभिन्न हिस्सों में साइबर अपराधों की बाढ़ आई है. एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2016 में विश्वस्तर पर साइबर अपराध के कारण लोगों को 45.5 अरब डौलर का चूना लगा. कमाल की बात यह है कि साइबर अपराधों की संख्या में हर साल 40 से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है.

साइबर अपराध से लोगों को सुरक्षा देने के लिए स्टेट बैंक औफ इंडिया ने अपने 30 करोड़ खाताधारकों को कड़ी सुरक्षा मुहैया कराने की तैयारी शुरू कर दी है. साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी क्षेत्र के बैंक एकजुट हो कर काम करने पर विचार कर रहे हैं और बीमा क्षेत्र की तमाम कंपनियां उन्हें हर स्तर पर सहयोग करने पर विचार कर रही हैं.

देश के कुछ वाणिज्यिक संगठन इस काम को खर्चीला बता रहे हैं लेकिन डिजिटीकरण के माहौल में इस से लोगों को सुरक्षा देना अनिवार्य बन चुका है. औद्योगिक संगठनों की सलाह है कि सरकारों को योग्य साइबर सुरक्षा पेशेवरों को आकर्र्षित करने की सख्त जरूरत है और उन के जरिए ऐसी टीमें तैयार करवाना समय की मांग है कि वे साइबर अपराधियों की हर चाल को पकड़ सकें व बैंक के ग्राहकों को सुरक्षा मुहैया करा सकें.

साइबर क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्य बहुत कठिन नहीं है और इसे जल्द हकीकत में बदला जा सकता है. सरकार को इस दिशा में सख्ती से और विशेष ध्यान दे कर काम करने की आवश्यकता है. इस का सीधा फायदा प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी डिजिटल योजना को बढ़ावा देने और लेनदेन को औनलाइन करने की परिकल्पना को साकार करने में मिलेगा. लेकिन पहले लोगों को यह विश्वास दिलाना होगा कि औनलाइन लेनदेन से किसी को लूटा नहीं जा सकता, यह विश्वसनीय और सहज व्यवस्था है.

मैं 2 माह पूर्व मां बनी हूं. मेरे पति चाहते हैं कि हम पहले की तरह शारीरिक संबंध बनाएं. क्या करूं.

सवाल

मैं 30 वर्षीय विवाहित महिला हूं. 2 माह पूर्व नौर्मल डिलीवरी के जरिए मैं एक स्वस्थ बच्चे की मां बनी हूं. मेरे पति चाहते हैं कि हम पहले की तरह शारीरिक संबंध बनाएं. लेकिन मैं डरती हूं कि कहीं इस से कुछ परेशानी तो नहीं होगी. मैं यह जानना चाहती हूं कि क्या यह उपयुक्त समय है शारीरिक संबंध बनाने का?

जवाब

आमतौर पर महिलाओं को सामान्य डिलीवरी के 6 हफ्ते के बाद सैक्स संबंध बनाने की सलाह दी जाती है. लेकिन यह प्रत्येक महिला के शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार होने पर भी निर्भर करता है. कई बार जल्दबाजी संक्रमण का कारक बन सकती है. इसलिए, आप के लिए यही बेहतर होगा कि आप सैक्स संबंध बनाने से पूर्व एक बार अपनी गाइनीकोलौजिस्ट से अवश्य सलाह कर ले.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

भारत में उभरती कौर्पोरेट चिकित्सा

कारोबार के हर क्षेत्र में इन दिनों एक नई संस्कृति का उभार होता नजर आ रहा है और वह है कौर्पोरेट संस्कृति. चिकित्सा के क्षेत्र में भी यह संस्कृति अपने पांव तेजी से फैला रही है. आजादी के बाद से ले कर अब तक अस्पताल प्रबंधन और इलाज में तकनीकी बदलाव के साथ ही साथ पेशेवर रवैया अपनाया जा रहा है. बिड़ला, टाटा, अपोलो, हिंदुजा जैसे बड़ेबड़े औद्योगिक घरानों के अस्पताल पहले से ही सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के रूप में जाने जाते थे, अब रिलायंस, डालमिया, इमामी, फोर्टिस सहित बहुत सारे औद्योगिक ग्रुप कौर्पोरेट चिकित्सा के साथ स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कदम बढ़ा रहे हैं, फिर वह अस्पताल, नर्सिंगहोम, क्लिनिक, डायग्नौसिस सैंटर हो या स्वास्थ्य बीमा का क्षेत्र. चिकित्सा से जुड़े इन तमाम क्षेत्रों में कौर्पोरेट स्तर की सेवाएं दी जा रही हैं.

आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था को ले कर समयसमय पर हुए सर्वेक्षण का नतीजा यही कहता रहा है कि कौर्पोरेट अस्पताल संस्कृति के कारण आने वाले समय में चिकित्सा क्षेत्र में बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है. आधुनिक चिकित्सा मोटेतौर पर हर किसी को उपलबध हो रही है. वहीं रोजगार की भी गुंजाइश बढ़ी है. कौर्पोरेट अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा उपकरणों को औपरेट करने वाले प्रशिक्षित लैब तकनीशियनों, रेडियोलौजिस्ट, फिजियोथेरैपी पैरामैडिकल स्टाफ, नर्सिंग कर्मियों और नई बीमारियों से निबटने के लिए विशेषतौर पर प्रशिक्षित डाक्टरों के लिए भी गुंजाइश बढ़ी है.

स्वास्थ्य सेवा के सितारे

भारत में स्वास्थ्य सेवा का पिछले ढाईतीन दशकों का सफर बड़ा दिलचस्प रहा है. कौर्पोरेट चिकित्सा पद्घति से पहले देश के निजी अस्पतालों में सुपरस्पैशलिटी सेवाएं आरंभ हुईं. इस ने स्वास्थ्य सेवा को एक नया आयाम तो दिया पर यह एक खास वर्ग तक ही सीमित थी. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कुछ नाम हैं जिन्होंने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयां दी हैं और ये नाम इस क्षेत्र के सितारे हैं. ऐसा ही एक नाम हैं डा. प्रताप रेड्डी. इन के अवदानों को कभी भुलाया नहीं जा सकता. अपोलो फेम डा. रेड्डी को भारत के कौर्पोरेट चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी के रूप में जाना जाता है. इस क्षेत्र में अपोलो एक क्रांति के रूप में उभर कर आया. कहते हैं डा. रेड्डी का मकसद भारत में अपोलो अस्पतालों की श्रृंखला के रूप में ऐसा मैडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का था जिस में हर किसी को इलाज मुहैया हो सके. देश का आम आदमी चिकित्सा का खर्च वहन कर सके.

चेन्नई में 1983 में अपोलो अस्पताल ने अपना पहला कदम रखा. आज दक्षिण एशिया और मध्यपूर्व के देशों समेत दुनिया के 9 देशों में अपोलो की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं. भारत में अपोलो के 64 वर्ल्ड क्लास अस्पताल व क्लिनिक हैं, लगभग 9 हजार बैड, डेढ़ हजार से अधिक फार्मेसी, लगभग 150 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और डायग्नौसिस सैंटर के साथ स्वास्थ्य बीमा, ग्लोबल कंसल्टैंसी, 15 नर्सिंग कालेज व अस्पताल मैनेजमैंट व रिसर्च फाउंडेशन हैं.

हमारे देश में डा. प्रताप रेड्डी के अलावा चिकित्सा क्षेत्र में एक और व्यक्तित्व है जो पूरे दिलोजान से अपने पेशे के लिए समर्पित है. और वह व्यक्तित्व है डा. देवी शेट्टी. दिल की बीमारी से ग्रस्त गरीबों के लिए डा. शेट्टी नाम किसी से छिपा नहीं. अब तक वे लगभग 20 हजार ओपन हार्ट सर्जरी कर चुके हैं. सफल सर्जरी का प्रतिशत 98 है. 1991 में डा. शेट्टी ने एक बच्चे की हार्ट सर्जरी की, जो कि देश में पहली सफल ओपन हार्ट सर्जरी के रूप में जानी जाती है. वे मदर टेरेसा के व्यक्तिगत डाक्टर थे.

मदर टेरेसा की सोहबत में इन के दिल में गरीबों के लिए दर्द पैदा हुआ और बिड़ला के कैलकटा हौस्पिटल में एक गरीब मरीज की ओपन हार्ट सर्जरी करने के बाद सर्जन के रूप में डा. शेट्टी ने अपनी फीस माफ कर दी. यह बात अस्पताल प्रबंधन को नागवार गुजरी. डा. शेट्टी ने उसी दम इस्तीफा दे दिया.

डा. शेट्टी बेंगलुरु चले गए और वहां उन्होंने मणिपाल हार्ट फाउंडेशन की स्थापना की. इस के बाद 2001 में नारायण हृदयालय के नाम से एक ट्रस्ट और अस्पताल की स्थापना की. अस्पताल के पीछे हैल्थ सिटी भी तैयार की गई है.

आज नारायण गु्रप का हृदयालय बेंगलुरु, अहमदाबाद, बरहमपुर, धारवाड़, गुवाहाटी, जयपुर, हैदराबाद और जमशेदपुर समेत 17 जगहों में 29 हैं. कोलकाता में डा. शेट्टी का अस्पताल रवींद्रनाथ टैगोर हार्ट फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है. डा. शेट्टी के लगभग हरेक अस्पताल में 4-5 बिल्ंिडग्स और 2-5 हजार बैड हैं. इन अस्पतालों में हार्ट, बौनमैरो, किडनी और लीवर प्रत्यारोपण से ले कर हर तरह की बीमारियों का इलाज समाज के हर स्तर के लोगों का हो रहा है.

बढ़ रहा है कौर्पोरेट अस्पतालों का कारोबार

देश के महानगरों और बड़े शहरों में पिछले 2 दशकों से निजी अस्पतालों में इलाज से ले कर प्रबंधन तक का काम कौर्पोरेट ढांचे में ढल रहा है. कोलकाता, बिहार और पूर्वोत्तर के राज्यों समेत देशभर से लोगों के लिए दक्षिण भारत में चेन्नई, वेल्लोर, हैदराबाद, बेंगलुरु इलाज का सब से भरोसेमंद ठिकाना हुआ करता था. हर छोटेबड़े इलाज के लिए लोग दक्षिण भारत का रुख किया करते थे. आंखों के लिए चेन्नई का शंकर नेत्रालय और हैदराबाद का एल वी प्रसाद अस्पताल, दूसरी अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए वेल्लोर के क्रिश्चियन मैडिकल कालेज और चेन्नई में अपोलो अस्पताल हैं. कोलकाता, बिहार और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के अलावा बंगलादेश और म्यांमार तक से मरीज दक्षिण भारत आते रहे हैं. यहां तक कि जमीनजायदाद तक बेच कर लोग दक्षिण भारत में कम खर्च में बेहतरीन इलाज के लिए जाते रहे हैं.

अब अगर कोलकाता की बात करें तो एक समय था यहां के लोग भी बेहतरीन इलाज के लिए ज्यादातर दक्षिण भारत का रुख किया करते थे. दक्षिण भारत ही उन का एकमात्र भरोसा था. उस समय यहां इक्केदुक्के निजी अस्पताल ही थे पर वे धनीमानी के लिए ही थे. आम आदमी इन अस्पतालों का रुख कर नहीं पाता था.

पर समय बदला और समय के साथ कोलकाता के चिकित्सा क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया. पिछले 2 दशकों में अकेले ईस्टर्न बाईपास में 15-20 निजी कौर्पोरेट अस्पताल खुल चुके हैं और एक हद तक यहां अत्याधुनिक चिकित्सा का लाभ समाज के निचले स्तर के लोगों को भी मिल रहा है.

पिछले 5 सालों से अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधा के नजरिए से कोलकाता पूर्वोत्तर भारत के लिए गेटवे बना हुआ है. इस के अलावा हर साल हजारों की संख्या में बंगलादेशी कोलकाता आ कर इलाज करा रहे हैं. पिछले साल कोलकाता के पियरलैस अस्पताल में 14 हजार बंगलादेश के नागरिकों ने अपना इलाज करवाया. दिल की बीमारी के अत्याधुनिक इलाज के लिए कोलकाता में प्रख्यात कार्डियक सर्जन डा. देवी शेट्टी का रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंस बड़ा भरोसे का अस्पताल माना जाता है. यहां भी बंगलादेश समेत नेपाल, भूटान, म्यांमार से मरीज आते हैं.

लेकिन बंगलादेशी नागरिकों के लिए कोलकाता मैडिकल हब बना हुआ है. इस के पीछे एक बड़ा कारण दिल्ली, मुंबई या दक्षिण भारत में जा कर इलाज करवाने के बजाय कोलकाता में इलाज करवाने में ज्यादा सहूलियत होती है. दरअसल, दोनों का खानपान, रहनसहन और भाषा लगभग एकजैसी है. उस पर बंगलादेश बंगाल के बहुत ही करीब है. बंगाल में यही सुविधा नेपाली, भूटानी नागरिकों को मिलती है. जाहिर है बड़ी संख्या में नेपाल, भूटान के लोग कोलकाता इलाज कराने आते हैं.

इन्हीं वजहों से यहां के कौर्पोरेट अस्पतालों का कारोबार भी बढ़ रहा है. अब इस का फायदा एयरवेज कंपनियों को भी मिलता ही है. हाल ही में अपोलो और जेट एयरलाइंस ने फ्लाई टू गुड हैल्थ योजना के तहत इलाज और हवाईजहाज के किराए में 10 प्रतिशत छूट की भी घोषणा की है.

मल्टीस्पैशलिटी से कौर्पोरेट तक का सफर

निजी अस्पतालों के कौर्पोरेट अस्पताल में तबदील होने के बाद भारत में कुछ सरकारी अस्पताल भी सुपर स्पैशलिटी चिकित्सा सेवा उपलब्ध करा रहे हैं. वैसे भी आज देश में जो अस्पताल कौर्पोरेट अस्पताल के रूप में स्थापित हैं, उन के सफर की शुरुआत सुपर स्पैशलिटी सेवाओं से ही हुई थी. दरअसल, सुपर स्पैशलिटी सेवाओं से अस्पतालों में कौर्पोरेट कल्चर की नींव पड़नी शुरू हुई. शुरू  के दिनों में इस तरह की सेवाओं को केवल बड़े निजी अस्पताल ही मुहैया करा रहे थे. लेकिन बाद में देश के कुछ नामीगिरामी सरकारी अस्पतालों में भी इस की शुरुआत हुई.

दिल्ली का एम्स इसी श्रेणी में आता है. आने वाले दिनों में एम्स की शाखाएं देश के अन्य राज्यों में भी खोले जाने का प्रस्ताव है. इस को ले कर राजनीति भी कुछ कम नहीं हो रही है. बहरहाल, जिस किसी राज्य में एम्स की शाखा खुलेगी, उस राज्य के लिए यह फख्र की बात होगी. वहीं, माना यह भी जा रहा है कि एम्स की स्थापना से उस राज्य में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हो जाएगी. बजट में कई राज्यों में एम्स खोले जाने की घोषणा हो चुकी है.

एम्स की ही श्रेणी में आता है कोलकाता का सेठ सुखलाल करनानी अस्पताल, जो एसएसकेएम अस्पताल के नाम से जाना जाता है. इस की स्थापना 1770 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी. तब यह कोलकाता का पहला अस्पताल था और प्रैसिडैंसी जनरल अस्पताल के नाम से जाना जाता था. आजादी के बाद इस का नाम सेठ सुखलाल करनानी अस्पताल पड़ा. यह कोलकाता का सुपर स्पैशलिटी सरकारी अस्पताल है. यहां अत्याधुनिक इलाज की सहूलियत है.

मुंबई के किंग एडवर्ड मैमोरियल अस्पताल को ही लें तो यह न्यूरोसर्जरी के लिए बैस्ट सरकारी अस्पताल के लिए जाना जाता है. हैदराबाद के निजाम इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस में 28 विभागों में से 14 विभाग ऐसे हैं जहां सुपर स्पैशलिटी सेवाएं मुहैया हैं. चंडीगढ़ का पीजीआईएमईआर और लखनऊ का संजय गांधी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस भी न्यूरोसर्जरी के लिए विख्यात है. ये इसी श्रेणी के सरकारी अस्पताल हैं, जहां अत्याधुनिक कौर्पोरेट चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है. यहां यह भी कहने की जरूरत है कि अगर सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण हो भी रहा है तो यह केवल बड़े शहरों तक ही सीमित है.

ऐसे में भरोसा कौर्पोरेट अस्पताल ही हैं. कुछ कौर्पोरेट अस्पताल हैं जिन की शाखाएं देशभर के विभिन्न राज्यों में हैं. फोर्टिस, अपोलो और टाटा मैमोरियल ऐसे ही कौर्पोरेट अस्पताल हैं. चेन्नई के शंकर नेत्रालय, क्रिश्चियन मैडिकल कालेज, अपोलो, कोलकाता के अपोलो, वेलव्यू और आमरी, हैदराबाद के इंडोयूएस सुपर स्पैशलिटी अस्पताल, एलवी प्रसाद अस्पताल, सैंचुरी अस्पताल, यशोदा अस्पताल से ले कर मुंबई के टाटा अस्पताल, बीच कैंडी, हिंदुजा, लीलावती, कोकिलाबेन अस्पताल, बेंगलुरु के सत्य साईंबाबा इंटरनैशनल अस्पताल, ऐक्सिस सुपर स्पैशलिटी,नैशनल इंस्टिट्यूट औफ मैंटल हैल्थ ऐंड न्यूरोसाइंस और दिल्ली में सर गंगाराम अस्पताल, सफदरजंग अस्पताल, राम मनोहर लोहिया अस्पताल और गुरुग्राम के मेदांता जैसे अस्पतालों में दुनियाभर से लोग इलाज कराने के लिए आते हैं.

मैडिकल टूरिज्म टैलीमैडिसिन

वर्ष 2012 से चिकित्सा क्षेत्र में मैडिकल टूरिज्म और टैलीमैडिसिन की संस्कृति ने जोर पकड़ा. एक वर्ष के अंदर रूस, यूक्रेन, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, अफ्रीका और दूसरे कई खाड़ी के देशों से मरीज दिल्ली से ले कर मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु में इलाज के लिए आते हैं.

आंकड़ों की मानें तो 2012 में जहां एक लाख 72 हजार लोग इलाज के लिए भारत आए तो 2013 में 2 लाख 36 हजार और 2014 में एक लाख 84 हजार से अधिक विदेशी इलाज के लिए भारत आए. मैडिकल टूरिज्म मार्केट रिपोर्ट के अनुसार,

अक्तूबर 2015 तक भारत का मैडिकल टूरिज्म लगभग 2 अरब 22 करोड़ रुपए का था. और अब उम्मीद की जा रही है कि 2020 में यह 4 खरब 67 अरब 18 करोड़ रुपए से 5 खरब 33 अरब 92 करोड़ रुपए तक हो जाएगा.

मैडिकल टूरिज्म में उफान का जो कारण रहा है वह कम खर्च में बेहतरीन इलाज है. मिसाल के तौर पर किसी बीमारी के इलाज के लिए अमेरिका में जो खर्च आता है, उस रकम के महज 10वें हिस्से में एक विदेशी मरीज भारत आ कर इलाज का पूरा खर्च उठा कर लौट जाता है. केवल अमेरिकी नहीं, दुनिया के तमाम हिस्से से लोग यहां आ कर इलाज करवाते हैं. हाल ही में दुनिया की सब से अधिक वजन वाली मिस्र की महिला नागरिक इमान अहमद इलाज के लिए मुंबई आई हैं. बताया जाता है कि अगले 2 सालों तक इमान अहमद का भारत में इलाज होगा.

एक अमेरिकी एजेंसी है जौइंट कमीशन इंटरनैशनल (संक्षेप में जेसीआई) यह एक अलाभकारी एजेंसी है. इस एजेंसी ने दुनियाभर में 21 हजार अस्पतालों को मान्यता दे रखी है. भारत के ऐसे 28 अस्पताल हैं जिन्हें जेसीआई की मान्यताप्राप्त है. इस एजेंसी की ओर से भारत में परामर्शदाता तेलंगाना के

डा. महबूब अली खान हैं. यह जेसीआई कौर्पोरेट चिकित्सा पद्घति के बहुत सारे नियमों का पालन करता है.

विदेशी मरीजों का भारत में इलाज कराने के मामले में आईएसओ की तुलना में जेसीआई की मान्यता कहीं अधिक माने रखती है. ज्यादातर विदेशी मरीज जेसीआई द्वारा मान्यताप्राप्त अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं. अस्पताल और मरीज के बीच जेसीआई एक कड़ी का काम करता है.

बहरहाल, मैडिकल टूरिज्म का एक हिस्सा है टैलीमैडिसिन. यह वह तकनीक है जिस के तहत विदेश में बैठ कर कोई भारत के डाक्टरों से परामर्श कर सकता है. जब कोई मरीज विदेश या भारत के ही किसी दूरदराज के इलाके से आ कर कहीं किसी बड़े शहर में इलाज कराना चाहता है तो इलाज से पहले और बाद में टैलीमैडिसिन की सुविधा बड़ी सहूलियत देती है. भारत में इस की शुरुआत चित्तूर के अपोलो अस्पताल में अरागोंडा नामक प्रोजैक्ट के तहत हुई.

लेकिन आगे चल कर अपोलो अस्पताल के अलावा एशियन हार्ट फाउंडेशन, सूचना तकनीक विभाग, इसरो, दूसरे कई राज्य सरकारों और निजी संस्थाओं के सहयोग से रियल टाइम में मैडिकल परामर्श देने व लेने का काम होता है. कार्डियोलौजी, टैलीरेडियोलौजी, टैलीपैथेलौजी को सपोर्ट करती है. आज दिल्ली में एम्स, लखनऊ में संजय गांधी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस के अलावा चंडीगढ़, ओडिशा, शिमला, कटक, रोहतक के कुछ अस्पतालों में इस की सुविधा उपलब्ध है.

पिछले कुछ सालों में इसरो के टैलीमैडिसिन नैटवर्क का विस्तार हुआ है. अब इस नैटवर्क से कम से कम 45 ग्रामीण अस्पताल और 15 सुपर स्पैशलिटी अस्पताल जुड़े हुए हैं जिन में अंडमान निकोबार से ले कर कारगिल, लेह, लक्षद्वीप शामिल हैं. जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है तो कोलकाता में स्कूल औफ ट्रौपिकल मैडिसिन, एसकेकेएम, नीलरतन सरकारी अस्पताल में भी टैलीमैडिसिन की सहूलियत है. इस के साथ ही, बंगाल के कई जिलों में भी टैलीमैडिसिन की सुविधा है. कोलकाता के रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंस और बेंगलुरु का नारायण हृदयालय को टैलीमैडिसिन का लिंक हब बनाया गया है.

सरकारी स्वास्थ्य बजट

सरकारी बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अलग से रकम मुहैया कराई जाती है. लेकिन पाया गया है कि ज्यादातर सरकारी अस्पताल कुछ अत्याधुनिक चिकित्सा से संबंधित डायग्नौसिस मशीनें और दूसरे कई उपकरण तो खरीद लेते हैं और उन का खूब प्रचार भी हो जाता है पर प्रशिक्षित तकनीशियनों व स्वास्थ्य अधिकारियों के अभाव में महंगी मशीनें पड़ीपड़ी कबाड़ हो जाती हैं.

आखिरकार इन आधुनिक उपकरणों का लाभ आम जनता को नहीं मिल पाता है. और ऐसी चिकित्सा सेवा पाने के लिए लोग मजबूरन इस उम्मीद के साथ, कि निजी अस्पतालों में उम्दा इलाज होगा, उधर का रुख करने लगते हैं, अपने बीमार परिजनों को भलाचंगा कर के घर लौटा ले जाने के लिए भले ही उन्हें कर्ज लेना पड़े या सबकुछ दांव पर लगाना पड़े. ऐसे में साफ है कि सरकारी अस्पताल ठूंठ बन कर रह जाते हैं. कर के रूप में जनता का पैसा जाया हो जाता है.

चिकित्सा का हब बना भारत

डेढ़दो दशकों से भारत विदेशी नागरिकों के लिए मैडिकल हब बन गया है. यहां यह देखा जाना जरूरी है कि आखिर भारत मैडिकल हब क्यों बना, खासतौर पर अंग प्रत्यारोपण का? एक कारण तो यही है कि विदेशी नागरिकों के लिए उन के देश की तुलना में भारत में इलाज का खर्च कहीं सस्ता है. इस सहूलियत की चर्चा पहले ही की जा चुकी है.

अंग प्रत्यारोपण के लिए भी विदेशी नागरिक भारत का रुख करना पसंद करते हैं. भारत के कुछ राज्य अलगअलग अंगों के प्रत्यारोपण के लिए दुनियाभर में जाने जाते हैं. मिसाल के तौर पर आंध्र प्रदेश हार्ट, किडनी, लीवर, लंग्स, गुजरात किडनी और लीवर, कर्नाटक हार्ट, होमोग्राफ्ट, किडनी, लीवर, लंग्स, पैनक्रियाज, केरल हाथ, घुटना, माइक्रोवैस्कुलर, चेन्नई कोर्निया, हाथ, हार्ट किडनी, लीवर, लंग्स के प्रत्यारोपण के लिए हर साल हजारों की तादाद में विदेशी भारत के इन शहरों में आते हैं.

हाल ही में किसी अमेरिकी अखबार में एक विज्ञापन आया था, जिस में कहा गया था कि हर 15 घंटे में एक न्यूयौर्क निवासी किसी न किसी अंग के डोनर का इंतजार करते हुए लंबी नींद सो जाता है. इस विज्ञापन की टैगलाइन थी- ‘बीकम एन और्गन डोनर.’ यह विज्ञापन अमेरिका के महज एक शहर में देखा गया है. जाहिर है कि इस विज्ञापन के जरिए स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है. यही स्थिति है जो मानव अंग तस्करी को बढ़ावा देती है. केवल भारत में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में ऐसा रैकेट काम कर रहा है.

वैसे भी, दुनियाभर के एक प्रतिशत धनकुबेरों के लिए अंग प्रत्यारोपण कोई समस्या नहीं है. मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई के अस्पतालों में इलाज कराते सऊदी शेखों को देखा जा सकता है. बताया जाता है कि वे भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में छुट्टियां मनाने के नाम पर आते हैं और अंग प्रत्यारोपण करवा कर लौट जाते हैं.

हालांकि मानव अंगों की तस्करी के मामले सामने आने पर भारत के अस्पतालों को विदेशियों के लिए अंग प्रत्यारोपण हब बनाने को ले कर विरोध भी कम नहीं होता रहा है. हमारे देश में चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ी बिरादरी के एक बड़े धड़े का यह भी मानना है कि जिस तादाद में विदेशी नागरिक अंग प्रत्यारोपण के लिए भारत आ रहे हैं, इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब डाक्टर मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ऐक्ट को धता बताते हुए देशी व विदेशी मरीजों के बीच अंतर करने लगेंगे. अगर ऐसा दिन आया तो देशी मरीज बगैर इलाज के मरने को मजबूर हो जाएंगे.

एयर एंबुलैंस की सुविधा

बेंगलरु की एयर रेस्क्यू, मेदांता की फ्लाइंग डौक्टर्स समेत देश में कई बड़े कौर्पोरेट एयर एंबुलैंस की सुविधा मोटे दामों पर उपलब्ध कराते हैं. इन हैलिकौप्टरों में आपातकालीन मैडिकल इक्विपमैंट समेत तमाम बुनियादी सुविधाएं होती हैं जो मरीजों को आम एंबुलैंस में मुहैया करवाई जाती हैं. फिलहाल दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता व चंडीगढ़ आदि जगहों पर एयर एंबुलैंस की सुविधा मौजूद है. कौर्पोरेट चिकित्सा की महंगी व खर्चीली सुविधाएं, जाहिर है, संपन्न तबके वाले ही अफोर्ड कर सकते हैं.

सरकारी अस्पताल : नियम ज्यादा सुविधाएं कम

भारत में मात्र एकचौथाई उच्चवर्गीय, साधनसंपन्न तथा शहरी लोग हैं जिन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान, राजीव गांधी सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल, संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस जैसे विश्व स्तरीय सुविधाओं से युक्त संस्थान हैं जहां लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से ले कर डे केयर सर्जरी तक की सुविधाएं उपलब्ध हैं. इन के अतिरिक्त दूसरे कौर्पोरेट अस्पताल हैल्थ टूरिज्म तथा टैलीमैडिसिन जैसी आधुनिक सुविधाओं के भी विकल्प हैं. दूसरी ओर भारत में बसने वाले तीनचौथाई ग्रामीण तथा दूरदराज के लोगों के लिए उपलब्ध प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कम्युनिटी हैल्थ सैंटर व जिला अस्पतालों में चिकित्सा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है. वहां न तो डाक्टर हैं, न ही दवाइयां. उस पर भी सरकारी नियमों का ऐसा जाल है कि कई मरीज तो पेपरवर्क पूरा होतेहोते दम तोड़ देते हैं.

सरकारी रवैया तथा लालफीताशाही के कारण इस सैक्टर में कोई भी काम ढंग से नहीं हो पा रहा है. दूसरे देशों में प्रति हजार जनसंख्या पर अस्पतालों में 3.96 बैड हैं जबकि भारत में मात्र 0.7 ही हैं. करीब 10 लाख भारतीय प्रतिवर्ष इलाज के बिना ही मर जाते हैं तथा लगभग 7 करोड़ लोग विशेषज्ञ की सुविधा नहीं प्राप्त कर पाते क्योंकि 80 फीसदी विशेषज्ञ शहर में ही रहना पसंद करते हैं, केवल 3 फीसदी ही ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं. भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर 74,150 कम्युनिटी हैल्थ सैंटर की जरूरत है लेकिन इस की संख्या आधे से भी कम है.

2025 तक भारत के अस्पतालों में करीब 17 लाख बैड की जरूरत होगी. पब्लिक सैक्टर द्वारा किए जाने वाले 860 मिलियन यूएस डौलर इनवैस्मैंट के बावजूद महज 15 से 20 फीसदी ही इस की आपूर्ति हो पाएगी. इनवैस्टमैंट कमीशन के अनुसार, पिछले 4 सालों के दौरान भारत की विकास दर 4 फीसदी की दर से बढ़ी है. उसी दर से भारतीयों की इनकम भी बढ़ी है. लेकिन इस के बावजूद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को आधारभूत चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही हैं.

मानव अंग तस्करी

इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं पर मानव अंग की तस्करी का धब्बा भी लग रहा है. 1994 में मानव अंग के व्यापार को गैरकानूनी घोषित किया गया था. हालांकि पारिवारिक सदस्यों द्वारा अंग डोनेट करने पर किसी तरह की बंदिश नहीं है. इसी का लाभ उठा कर फर्जी दस्तावेज बना कर डोनर के रूप में ग्रामीण इलाकों के गरीबों को पैसों का लालच दे कर डोनर बना दिया जाता है. देशभर में कई गिरोह मानव अंग तस्करी के काम में लगे हुए हैं. इस काम में देश के कुछ निजी अस्पताल के डाक्टर से ले कर नर्सिंग स्टाफ तक की मिलीभगत होती है. स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में हर साल 1-2 लाख किडनी की जरूरत होती है.

वहीं, पूरे देश में विभिन्न तरह के अंगों के प्रत्यारोपण के लिए डोनर का इंतजार करने वालों की एक बहुत ही लंबी सूची है. ज्यादातर मरीजों का यह इंतजार कभी खत्म न होने वाला इंतजार बन कर रह जाता है. इंतजार ही इंतजार में बहुत सारे मरीजों की मौत हो जाती है. उन्हें डोनर नहीं मिलता. लेकिन वहीं विदेशी मरीज वीजा ले कर भारत आते हैं और अंग प्रत्यारोपण करवा कर लौट जाते हैं. माना जाता है कि अंग तस्करी से जुड़े एक बहुत बड़े रैकेट के कारण ही यह संभव हो पाता है. दिल्ली के एक निजी अस्पताल में मानव अंग (किडनी) की तस्करी का भंडाफोड़ हो चुका है. थौमसन रायटर्स फाउंडेशन के अनुसार, मानव अंग की तस्करी के मामले में अस्पताल प्रशासन ने भी स्वीकार कर लिया है कि अस्पताल में अनजाने में पीडि़तों के शरीर से अंगों को निकाला गया.

चिकित्सा का व्यावसायीकरण

‘‘दमा के इलाज के लिए दिल्ली के एक कौर्पोरेट अस्पताल गया था. जेब में 50 हजार रुपए थे. मैं ने सोचा कि दमे के इलाज में एक अच्छे अस्पताल में इस से ज्यादा क्या खर्च होगा. इतने में अच्छा इलाज हो जाएगा और मैं ठीक भी हो जाऊंगा. वहां जाने के बाद मुझे आईसीयू में भरती कर दिया गया. तमाम तरह की महंगी जांचें होने लगीं. दूसरे दिन मुझे पता चला कि आईसीयू का प्रतिदिन का चार्ज काफी ज्यादा है जो मेरे बजट से काफी ज्यादा है. अपने चिकित्सक से कहा कि मैं अब अच्छा महसूस कर रहा हूं, मुझे जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाए. लेकिन मुझे 4-5 दिनों तक आईसीयू में ही रखा गया और ठीक 5वें दिन मुझ से 2.5 लाख रुपए जमा करने के लिए कहा गया. इतनी बड़ी रकम की मैं ने कल्पना तक नहीं की थी. बहुत विनती करने के बाद किसी तरह 1.5 लाख रुपए दे कर अस्पताल से मुक्त हुआ.’’– एक भुक्तभोगी

यह हाल हर जगह का भले न हो लेकिन 10 में से कम से कम 6 लोग इस तरह की समस्या से रूबरू हो चुके हैं. मरीज किसी अस्पताल में भरती तो अपनी मरजी से हो सकता है लेकिन वहां से बाहर निकल पाना उस के हाथ में नहीं होता. सोती हुई सरकार सब देखते हुए भी अनदेखी करती है क्योंकि बड़े अस्पतालों के कर्ताधर्ता पहले ही उन की आंखों पर रिश्वत की पट्टी बांध चुके होते हैं. चिकित्सा के व्यावसायीकरण ने इलाज का तरीका तथा स्टैंडर्ड चाहे जितना भी उम्दा क्यों न किया हो, किंतु इस में दो मत नहीं है कि स्वास्थ्यसेवा पूरी तरह व्यापार बन चुकी है. इसी मानसिकता के तहत अस्पताल खोले भी जा रहे हैं और इसी संस्कृति के तहत चलाए भी जा रहे हैं.

 

 

डा. दीपक प्रकाश और साधना शाह

देर आए दुरुस्त आए

तमिलनाडु में जन्मी और भारतीय महिला टीम की पूर्व कप्तान शांता रंगास्वामी भारत की पहली महिला क्रिकेटर हैं. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमैंट पुरस्कार से नवाजा है.

रंगास्वामी ने 12 टैस्ट मैचों और 16 एकदिवसीय मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की है. बीसीसीआई ने महिला क्रिकेटरों के लिए लाइफटाइम अचीवमैंट पुरस्कार की शुरुआत इसी वर्ष की है. इस पुरस्कार को पाने वाली शांता रंगास्वामी पहली महिला खिलाड़ी हैं. उन्होंने टैस्ट क्रिकेट में 32 के औसत से 750 रन बनाए. उन के नाम 1 शतक और 6 अर्धशतक हैं. वहीं एकदिवसीय मैचों में उन्होंने 287 रन बनाए. 50 रन उन का सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत स्कोर है.

इस वर्ष जून में महिला विश्वकप का आयोजन इंगलैंड में हो रहा है और पुरुषों के क्रिकेट वर्ल्डकप से पहले महिला विश्वकप का आयोजन हो रहा है. ऐसे समय में बीसीसीआई ने इस तरह का पुरस्कार दे कर सराहनीय काम किया है. शांता का मानना है कि यह अच्छा एहसास है कि महिला क्रिकेटरों को आखिरकार वह मिल रहा है जिस की वे हकदार हैं.

बीसीआई ने, देर से ही सही यह पहल की है तो इस से महिला खिलाडि़यों को प्रोत्साहन मिलेगा. वैसे देखा जाए तो एक तरफ भारतीय महिला क्रिकेट टीम दर्शकों के आकर्षण और दिलचस्पी की बाट जोह रही है वहीं दूसरी तरफ बीसीसीआई महिलाओं के साथ हमेशा से भेदभाव करता आया है. महिला टीम की कप्तान मिताली राज के अलावा कई पूर्व क्रिकेटरों ने भी गाहेबगाहे इस बात को उठाया भी है पर बीसीसीआई को इस से कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि महिला क्रिकेट टीम से उस की कोई खास आमदनी होती नहीं.

खैर, कप्तान मिताली राज के लिए यह अच्छी खबर है क्योंकि मिताली की अगुआई में भारतीय टीम इस विश्वकप में अच्छा परफौर्म करेगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है.

शादी से पूर्व एक युवक से मेरा शारीरिक संबंध था. मुझे डर है कि मेरे पति को पता न लग जाए. क्या करूं.

सवाल

मैं शादीशुदा, 5 वर्षीय बेटे की मां हूं. मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते हैं. शादी से पूर्व मैं एक युवक से प्रेम करती थी और उस से मेरा शारीरिक संबंध भी था पर अब उस की भी शादी हो गई है. वह मेरे मायके के पास ही रहता है. मैं जब भी मायके जाती हूं, हम अवश्य मिलते हैं. इस बार भी जब मैं मायके गई तो वह मेरे घर पर मुझ से मिलने आया.

परिस्थितिवश उस समय घर पर कोई नहीं था. भावनाओं में बह कर हमारे बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो गया. अब मुझे डर है कि कहीं मेरे पति को हमारे संबंधों की भनक न लग जाए. मैं अपनी वैवाहिक जिंदगी में कोई परेशानी नहीं चाहती. मुझे क्या करना चाहिए जिस से मेरे वैवाहिक संबंधों में कोई कड़वाहट न आए?

जवाब

आप एक के बाद एक गलतियां करती जा रही हैं और चाहती हैं कि वैवाहिक संबंधों में कड़वाहट न आए. सब से बड़ी गलती तो आप ने उस युवक से अब तक संबंध रख कर की है. विवाह के बाद भी आप उस युवक से क्यों मिलती हैं, जबकि वह भी शादीशुदा है.

अभी आप के पति को और उस युवक की पत्नी को आप दोनों के विवाहेतर संबंधों की जानकारी नहीं है लेकिन जैसे ही दोनों को आप के संबंधों की जानकारी होगी, दोनों बसेबसाए घरों को टूटने में देर नहीं लगेगी.

आप के लिए यही सलाह है कि आप उस लड़के से पूरी तरह दूरी बना लें, उस से कोई संपर्क न रखें और अपने वैवाहिक रिश्ते यानी अपने घरपरिवार पर ध्यान दें व उसी में मन लगाएं. उस युवक से साफ शब्दों में कह दें कि वह आप से किसी प्रकार का संपर्क न करे. इसी में आप की व उस के  परिवार की भलाई है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

फुटबौल में महिलाएं

इस वर्ष फुटबौल में इंडियन वूमंस लीग में लड़कियों के लिए नए द्वार खोल दिए गए हैं. सामाजिक भेदभाव को तोड़ते हुए लड़कियां अब फुटबौल में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं. मगर इतने बड़े देश में 5-7 राज्यों को छोड़ दीजिए तो महिला फुटबौल की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है.

महिला फुटबौल के लिए खेल संघों की कोई दिलचस्पी नहीं दिखती. केवल फुटबौल चैंपियनशिप में भाग लेने की अनिवार्यता के कारण यह औपचारिकता निभानी पड़ती है. वूमंस लीग से अब उम्मीद जगी है कि कम से कम महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा, उन का आत्मविश्वास बढ़ेगा. इस कदम से महिला फुटबौल को विकास की नई राह मिलेगी.

हालांकि केवल कहने भर से ऐसा होगा नहीं. महिला खिलाडि़यों को इस के लिए सुरक्षित वातावरण मुहैया कराना होगा. राज्य फुटबौल संघों को इस के लिए जमीनी स्तर पर काम करना होगा. विश्व स्तरीय ट्रेनिंग देनी होगी, गांवकसबों में प्रतिभाओं को ढूंढ़ना होगा. उन्हें निखारना होगा, तभी महिला फुटबौल की तसवीर बदलेगी. नहीं तो बातें हैं बातों का क्या.

वैसे भी भारत में खेलप्रेमियों की कमी नहीं है. 125 करोड़ में से करीब 123.5 करोड़ लोग इस देश में खेलों से प्यार करते हैं. आप को जान कर हैरानी होगी कि इस में 97 फीसदी लोग क्रिकेट के दीवाने हैं. यदि दूसरे खेलों की बात करें तो इस के लिए दूसरे खेल समय बरबाद करने जैसे हैं. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूसरे खेलों को ले कर समाज में कितना भेदभाव होगा. खासकर वे खेल जिन में लड़कियां हिस्सा लेती हैं.

लड़कियों को बताया जाता है कि इस खेल से तुम्हारा बदन गठीला हो जाएगा, ज्यादा उछलकूद वाला खेल खेलना ठीक नहीं. यह लड़कों का खेल है, तुम्हें शोभा नहीं देता या तुम्हारे वश का नहीं आदि. ऐसी तमाम बातों से लड़कियों को दोचार होना पड़ता है.

हम आधुनिक होने का दिखावा चाहे जितना कर लें लेकिन सोच के स्तर पर सही माने में आधुनिकता के आसपास भी नहीं ठहरते. परिवार के सदस्यों के साथसाथ समाज के लोगों को भी आपसी सोच बदलनी होगी, खेल संघों में बैठे जिम्मेदार लोगों को भी सोचना होगा.

वहीं, मणिपुर की नांगोम बाला लड़कों के साथ फुटबौल खेल कर अपनी मेहनत से आगे बढ़ी हैं. आज नांगोम भारतीय महिला फुटबौल टीम की कप्तान हैं. यदि नांगोम दकियानूसी सोच को दरकिनार न करती तो वे यह मुकाम हासिल न कर पातीं.

ओडिशा की सस्मिता मलिक, हरियाणा की संजू प्रधान, दिल्ली की डालिमा छिब्बर अपने दम पर कड़ी मेहनत कर आगे बढ़ी हैं और शोहरत अर्जित की है.

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