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रिलायंस भी होगा ‘फैंटम’ से दूर

बौलीवुड में चर्चाओं का दौर जारी है. यूं तो उपरी सतह पर यही नजर आ रहा है कि ‘‘फैंटम’’ के विकास बहल के खिलाफ ‘यौन उत्पीड़न’ की शिकायत के बाद से यहां भूचाल सा आया है, तो कुछ लोग इसे भारतीय फिल्म उद्योग में स्टूडियो सिस्टम की घोर विफलता मान रहे हैं.

वास्तव में जब भारत में हौलीवुड की तर्ज पर स्टूडियो सिस्टम की शुरूआत हुई, तो सबसे अधिक चर्चा में ‘‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’’ ही आया था, इसने तमाम कलाकारों को अनाप-शनाप पारिश्रमिक राशि देकर अपनी कंपनी की फिल्मों में अभिनय करने के लिए अनुबंधित किया था, पर रिलायंस निर्मित फिल्मों ने बॉक्स आफिस पर पानी तक नही मांगा. अंततः एक दिन ‘रिलायंस इंटरटेनेमंट’ ने फिल्म निर्माण से तौबा कर ली और यहीं से स्टूडियो सिस्टम की बौलीवुड में समाप्ति का दौर शुरू हो गया था.

उसके बाद विकास बहल की दिमाग की उपज के रूप में ‘फैंटम’ का प्रादुर्भाव हुआ था. फैंटम में विकास बहल के साथ अनुराग कष्यप, विक्रमादित्य मोटावणे और मधु मैंटोना जुड़े हैं, फिर ‘फैंटम’ के साथ रिलायंस इंटरटेनमेंट भी जुड़ा, फिलहाल ‘‘फैंटम’’ में पचास प्रतिशत की भागीदारी ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ की है, जबकि बाकी के पचास प्रतिशत में विकास बहल, अनुराग कष्यप, मधु मैंटोना व विक्रमादित्य मोटावणे की साढ़े बारह-साढ़े बारह प्रतिशत की हिस्सेदारी है. जब से ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ की ‘फैंटम’ में भागीदारी हुई, तब से फिल्म वितरण का काम रिलायंस इंटरटमेंट द्वारा ही किया जाने लगा था, पर निर्णय अब भी ‘फैंटम’ से जुड़े लोग ही करते आ रहे हैं. ‘फैंटम’ फिल्म निर्माण भी कर रहा है.

‘फैंटम’के साथ हाथ मिलाने के बाद ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ ने जितनी भी फिल्में वितरित की, उन्होने ‘फैंटम’ व ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ को डुबाया. प्राप्त आंकड़ों के अनुसार ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ को ‘रामन राघव 2’ से 6 करोड़, ‘ट्रैप्ड’ से 5 करोड़, ‘ऑल इज वेल’ से साढ़े आठ करोड़, ‘बीएफजी’ से साढे़ तीन करोड़ का नुकसान हुआ है. इतना ही नहीं सूत्रों की माने तो ‘फैंटम’ में कार्यरत लोगों को प्रति वर्ष 12 करोड़ रूपए पारिश्रमिक राशि दी जा रही है, जबकि अब तक इस कंपनी ने एक पैसा भी नहीं कमाया, जिसके चलते पिछले दो सालों से अंदर ही अंदर आपस में काफी गाली-गलौच हो रही थी. फिल्मों से संबंधित सारे निर्णय अनुराग कश्यप ले रहे थे. आर्थिक पक्ष विकास बहल देख रहे थे, तो स्वाभाविक तौर पर इन दोनों के बीच घमासान मचा हुआ था.

सूत्रों के अनुसार फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट’ की असफलता के बाद अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटावणे के बीच इतनी जबरदस्त बहस हुई कि दोनों के बीच बातचीत बंद हो गयी थी, तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि बहुत जल्द ‘फैंटम’ में बिखराव होगा. सूत्रों का दावा है कि ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ भी ‘फैंटम’ के साथ जुड़ने को अपनी गलती मानकर अलग होने का मौका तलाश रहा था.

अंदर ही अंदर धधक रही इस आग में एक सप्ताह पहले विकास बहल पर एक महिला द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत ने आग में घी का काम किया. उसके बाद रिलांयस इंटरटेनमेंट और फैंटम में बंद दरवाजों के अंदर जमकर घमासान हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप ‘फैंटम’ का अतीत होना लगभग तय हो चुका है.

खबरे गर्म है कि ‘फैंटम’ से विकास बहल और मधु मैटोना अलग हो कर अपनी अलग नयी कंपनी शुरू करने जा रहे हैं, तो वहीं ‘रिलायंस एंटरटेनमेंट’ ने भी ‘फैंटम’ के साथ दूरी बनाने का निर्णय कर लिया है. यह अलग बात है कि ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट’ के सीईओ शिबाशी सरकार और मार्केटिंग हेड समीर चोपड़ा कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं.

बॉलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि ‘फैंटम’ के डूबने से सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा? कुछ लोग मान रहे हैं कि पिछले दो तीन वर्षो में अनुराग कश्यप ने जिस तरह की फिल्में निर्देशित की हैं, उनकी वजह से उनकी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच आयी है. इसलिए उन्हें नुकसान हो सकता है. तो वहीं विकास बहल के नाम पर ‘शानदार’ जैसी असफल फिल्म दर्ज हैं. विक्रमादित्य मोटावणे ने ‘उड़ान’ से जो ख्याति प्राप्त की थी, वे उसे गंवा चुके हैं. उनकी पिछली फिल्म ‘ट्रैप्ड’ ने तो लोगों को बहुत निराश किया, पर मधु मैंटोना के साथ नाकामयाबी का कोई मसला नहीं है, उनके साथ कोई विवाद भी नहीं है. लोगों को उम्मीद है कि मधु मैटोना फायदे में रहेंगें.

पर इससे ये बात साफ तौर पर उजागर हो रही है कि ये सब बौलीवुड में स्टूडियो सिस्टम का खात्मा ही है? पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि हौलीवुड में स्टूडियो सिस्टम कारगार है, तो बौलीवुड में क्यों नहीं?

क्रिकेटर्स ही नहीं इनका भी चलता है आईपीएल में जलवा

आईपीएल में ग्लैमर के बिना तो सब सूना लगता है, तभी तो आयोजकों की कोशिश हेती है कि इसमें ज्यादा से ज्यादा सेलिब्रिटी पहुंचें और इसकी रौनक में चार चांद लगाएं. हमेशा की तरह इस बार भी ओपनिंग सेरेमनी में बॉलीवुड की तारिकाएं अपना जलवा बिखेर रही हैं.

साथ ही शाहरुख खान, प्रीति जिंटा जैसे कुछ सितारे तो आईपीएल टीमों से जुड़े हुए हैं और दर्शक दीर्घा में दिखते रहते हैं. लेकिन इन सबके बीच वहां जिन पर कैमरा ठहरता है, तो वह हैं क्रिकेटरों की कुछ ग्लैमरस पत्नियां जो अपने पति की टीम का उत्साह बढ़ाने के लिए पहुंच रही हैं.

एमएस धोनी की पत्नी साक्षी

साक्षी धोनी आईपीएल में सबसे चर्चित नाम रहा है. वह हमेशा ध्यान खींचती हैं. जब से उन्होंने चेन्नई सुपर किंग्स का हेलमेट पहन एक तस्वीर ट्विटर और इंस्टाग्राम पर थेयर की है तभी से वह चर्चाओं में बनी हुई हैं.

हालांकि धोनी के लिए यह पहला आईपीएल है, जब वह कप्तान नहीं हैं. एमएस धोनी इस बार स्टीव स्मिथ की कप्तानी में राइजिंग पुणे के लिए खेल रहे हैं. हालांकि उनका बल्ला इसमें अब तक नहीं चला है और वह उन पर काफी दबाव है, लेकिन साक्षी अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराएंगी.

मनोज तिवारी की पत्नी सुष्मिता

राइजिंग पुणे सुपरजायन्ट्स के बल्लेबाज मनोज तिवारी की पत्नी सुष्मिता बेहद खूबसूरत हैं. मनोज समय-समय पर अपने ट्रिप की फोटोज भी सोशल मीडिया पर शेयर करते रहे हैं. मनोज और सुष्मिता की शादी 18 जुलाई, 2013 को हुई थी. गौरतलब है कि पिछले साल मनोज को किसी भी टीम ने नहीं लिया था, लेकिन इस बार वह पुणे टीम का हिस्सा हैं और खेल रहे हैं.

युवराज सिंह की वाइफ हेजल कीच

वैसे तो हेजल कीच को क्रिकेट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है और वह उसे पसंद भी कम करतीं थीं, लेकिन शादी के बाद वह युवराज के मैच देखने के लिए पहुंचती रही हैं. आईपीएल के मैचों में भी कैमरा उन पर टिक जाता है. युवी ने बीते साल ही शादी की है. युवराज सिंह सनराइजर्स हैदराबाद के लिए खेल रहे हैं.

भज्जी की पत्नी गीता बसरा

हरभजन सिंह मुंबई इंडियंस के लिए खेल रहे हैं. पहले मैच में उनका प्रदर्शन भी अच्छा रहा है. वैसे तो गीता को क्रिकेट की बहुत ज्यादा पसंद नहीं है और वह उसके बारे में जानती भी बहुत कम हैं, लेकिन वह भज्जी के लिए दर्शक दीर्घा में दिकती रही हैं.

दिनेश कार्तिक की पत्नी दीपिका पल्लीकल

दीपिका पल्लिकल स्क्वैश की टॉप प्लेयर हैं. वह दिनेश कार्तिक के सपोर्ट के लिए हमेशा पहुंचती हैं. कार्तिक गुजरात लॉयन्स के लिए खेल रहे हैं. दोनों ने 18 अगस्त 2015 को पहले क्रिश्चियन रीतिरिवाज और फिर 20 अगस्त को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार फेरे लिए थे.

12 साल की उम्र से ही स्क्वैश में धूम मचाने वाली दीपिका को अंडर 19 की कैटेगरी में नंबर वन महिला स्क्वैश खिलाड़ी का दर्जा मिला था. वह डब्ल्यू एसए रैंकिंग के अंतर्गत शीर्ष 10 में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला हैं. अक्टूबर 2013 में उन्होंने विश्व की पूर्व नंबर एक खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया की राचेल ग्रिनहैम को हराकर मकाउ ओपन का खिताब जीता था.

रोहित शर्मा की पत्नी रितिका सजदेह

रोहित शर्मा ने दिसंबर, 2015 में रितिका से शादी की थी, तब से वह लगभग हर मैच में रोहित को देखने पहुंच जाती हैं. और जब बात आईपीएल की हो तो वह पीछे कैसे रह सकती हैं.

स्टुअर्ट बिन्नी की पत्नी मयंती लैंगर

स्टुअर्ट बिन्नी की पत्रकार पत्नी मयंती लैंगर वैसे तो स्टार क्रिकेट चैनल पर चर्चा में रहती हैं. आईपीएल के दौरान वह भी नजर आ सकती हैं. मयंती भी अपने ग्लैमरस अंदाज के लिए जानी जाती हैं.

जानिए मोबाइल इंश्योरेंस से जुड़ी बातें

आज के समय में फोन खोना यूं तो सामान्य सी बात होती है, लेकिन यह कभी-कभी मुश्किलें भी खड़ी कर देता है जो हमें परेशान कर देतीं हैं. उस स्थिति की कल्पना भर कीजिए कि आपका कोई महंगा मोबाइल फोन खो जाए, जिसकी आप ईएमआई भर रहे हो. जरा सोचिए आपको उस फोन की ईएमआई भरनी होगी जो अब आपके पास है भी नहीं. लेकिन ऐसी परिस्थितियों में मोबाइल इंश्योरेंस एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है जिसके बारे में सिर्फ चुनिंदा लोग ही जानते हैं. हम आपको मोबाइल इंश्योरेंस के बारे में हर छोटी-बड़ी बात बताने की कोशिश करेंगे.

मोबाइल इंश्योरेंस क्या है-

किसी भी अन्य बीमा उत्पाद की ही तरह मोबाइल फोन बीमा जोखिम कर प्रदान करता है. इस तरह के मामलों में इंश्योरेंस आपको फोन खोने, चोरी और नुकसान जैसी स्थितियों के लिए जोखिम राशि प्रदान करता है. इस तरह के बीमा को गैजेट खरीदने या बिलिंग के दिन से अधिकतम पांच दिन की अवधि के भीतर खरीदा जा सकता है. इंश्योरेंस (बीमा) का प्रीमियम गैजेट के मूल्य पर निर्भर करता है.

मोबाइल बीमा का पीरियड सामान्य तौर पर एक साल के लिए होता है, लेकिन बाजार में कुछ ऐसे बीमाकर्ता भी हैं जो दो साल के लिए भी मोबाइल इंश्योरेंस प्रदान करते हैं.

बीमा का फायदा किस स्थिति में-

•    एक्ट ऑफ गॉड

•    हड़ताल या दंगा के दौरान मोबाइल का नुकसान या चोरी

•    चोरी और हाउसब्रेकिंग के मामले में

•    आग, बिजली और विस्फोट से होने वाले नुकसान में

•    व्यक्तिगत लापरवाही के परिणामस्वरूप होने वाले नुकसान जैसे कि खोना, भूल जाना/भूल गए/कहीं छोड़ देना, गायब हो जाना या फिर कहीं गिर जाना इस स्थिति में भी बीमा का फायदा मिलता है.

•    चोरी की कोशिश से होने वाली हानि

•    भारतीय क्षेत्र के बाहर हुआ कोई भी नुकसान

•    जानबूझकर उपेक्षा के कारण नुकसान

•    गलत इंस्टालेशन और गलत सेट-अप के कारण होने वाले नुकसान पर

•    साइबर हमले, आतंकवादी गतिविधियों और घृणित गतिविधियों के दौरान हुए नुकसान पर

कौन-कौन सी कंपनियां देती हैं मोबाइल बीमा-

बहुत सारी बीमा कंपनियां थर्ड पार्टी सेवा प्रदाताओं के माध्यम से मोबाइल/गैजेट बीमा प्रदान करती हैं. बजाज आलियांस, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी और न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी इस सेवा की पेशकश करने वाले कुछ प्रमुख नाम हैं. वहीं थर्ड पार्टी के अलावा सिस्को गैजेट्स, बिस्कोट, गैजेटकॉप्स, इन्फी शील्ड, वारंटी बाजार, ऐप्स डेली और ऑनसाइट पर भी मोबाइल इंश्योरेंस के लिए संपर्क किया जा सकता है.

क्लेम के लिए क्या करें-

बाजार में उपलब्ध तमाम बीमाकर्ताओं की ओर से उपलब्ध करवाए गए बीमा पर क्लेम करने की प्रक्रिया कुल मिलाकर सभी की एक जैसी होती है. जिस तरह से जीवन बीमा और अन्य प्रकार के इंश्योरेंस पर क्लेम किया जाता है उसी प्रक्रिया से मोबाइल बीमा का भी क्लेम आसान है.  

हालांकि इसमें शर्त यह होती है कि किसी व्यक्ति को जितनी जल्दी हो सके, नुकसान/चोरी या फोन के नुकसान के बारे में बीमाकर्ता को सूचित करना चाहिए.

जब अपने MMS की वजह से सुर्खियों में रहीं ये अभिनेत्रियां

बात बॉलीवुड की हो और विवाद का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता है. एक कहावत तो आपने सुनी ही होगी कि जिसका जितना नाम होता है, वह उतना ही ज्यादा बदनाम भी होता है. बॉलीवुड के सितारे इसमें सबसे आगे हैं. बॉलीवुड में शायद ही कोई ऐसा अभिनेता या अभिनेत्री होगी जिसका नाम विवादों में ना आया हो. हर कोई किसी ना किसी वजह से मीडिया की सुर्खियों में छाया रहता है. आज हम यहां अभिनेताओं की नहीं बल्कि अभिनेत्रियों की बात करेंगे. हम बॉलीवुड की उन अभिनेत्रियों के बारे में आपको बताएंगे जो अपने एमएमएस की वजह से सुर्खियों में छायी रही थीं.

बॉलीवुड की ज्यादातर अभिनेत्रियों के नाम विवादों से जुड़े हुए हैं. अब कंगना को ही ले लीजिये, भले ही वह बॉलीवुड की बेहतरीन अभिनेत्री हैं, लेकिन उनका नाम कई बार लड़ाई-झगड़ा करने में आ चुका है. लेकिन आज हम लड़ाई-झगड़े नहीं बल्कि उन एमएमएस की बात करेंगे जिनकी वजह से अभिनेत्रियां लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रही हैं.

करीना कपूर

इनमें सबसे पहला नाम आता है करीना कपूर का, करीना और उनके पुराने ब्यॉयफ्रेंड शहीद कपूर के बारे में कौन नहीं जनता. जब ये दोनों साथ थे तब इनका एक किस वाला एमएमएस काफी वायरल रहा था. एक रेस्टोरेंट में दोनों को किस करते हुए किसी ने उनकी फोटो ले ली थी. फोटो वायरल होने के बाद करीना ने केस भी किया था.

प्रीती जिंटा

प्रीती जिंटा भी एक बार अपने एमएमएस की वजह से चर्चा का विषय बन चुकी हैं. होटल के बाथरूम में बिना कपड़ों के इनका एमएमएस खूब वायरल हुआ था. वह बाथरूम में बिना कपड़ों के शीशे के सामने खड़े होकर शावर ले रही थीं. यह फोटो आने के बाद काफ़ी हल्ला मचा था.

मल्लिका शेरावत

इनका नाम आते ही लोगों के दिमाग में अपने आप ही आ जाता है कि इनके लिए यह सब कोई नई बात नहीं है. इनका भी एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वह बिना कपड़ों के एक विस्तर पर लेटी हुई थीं. वहां मल्लिका ने किसी अंजान विदेशी के साथ सम्बन्ध भी बनाया था.

सोनाक्षी सिन्हा

सोनाक्षी का नाम इस तरह के विवाद में आएगा ये किसी ने सोचा भी नहीं होगा. लेकिन कुछ दिनों पहले सोनाक्षी का भी एक एमएमएस इन्टरनेट पर वायरल हो चुका था. एमएमएस में दिखने वाली लड़की की पहचान दबंग अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा के रूप में की गयी है, जिसमें वह अपने घुटनों के बल झुकी हुई हैं और उनके पीछे कोई व्यक्ति खड़ा है.

राधिका आप्टे

राधिका का नाम भी एक बार एमएमएस मामले में सामने आ चुका है. इनकी भी एक फोटो इन्टरनेट पर वायरल हुई थी, जिसमे वह अपने कपड़े खोलकर सामने बैठे हुए व्यक्ति को कुछ दिखा रही थीं.

सोनाली राउत का नया हॉट फोटोशूट देखा आपने

एक्ट्रैस और टीवी शो बिग बॉस सीजन 8 का हिस्सा रही सोनाली राउत ने एक नया हॉट फोटोशूट करवाया है. सोनाली ने फोटोशूट की तस्वीरों को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. आपको बता दें कि ये पहला मौका नहीं है जब सोनाली ने अपनी हॉट एंड बोल्ड तस्वीरों को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है.

सोनाली इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव रहती हैं और अक्सर अपनी तस्वीरें इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर करती हैं. सोनाली साल 2016 में रिलीज हुई फिल्म 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' का हिस्सा भी रही हैं.

बता दें कि रणवीर सिंह से साथ कंडोम का ऐड कर सोनाली राउत चर्चा में रही थी. 'बिग बॉस' के अलावा सोनाली बॉलीवुड फिल्म 'द एक्सपोज' (2014) और 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' (2016) में भी नजर आ चुकी हैं.

व्यापम घोटाला कट्टरपंथी सोच का नतीजा

मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले में सामने आए 634 मैडिकल छात्रों के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट ने दाखिला रद्द कर दिया है और उच्च न्यायालय का निर्णय बरकरार रखा है. 2008 से 2012 के बीच अवैध ढंग से प्रवेश पाए इन कथित डाक्टरों का कैरियर अब बरबाद हो गया है, क्योंकि उन्होंने प्रवेश के समय घोटालेबाजों का साथ लिया था. इन 634 छात्रों से सहानुभूति रखने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि देश भर में इस तरह के काम हो रहे हैं जो छात्रों को बचपन से गलत राह पर ले जा रहे हैं और सिखा रहे हैं कि शिक्षा में हर तरह का हेरफेर संभव है और परीक्षा पैसे, चालबाजी, नकल, बेईमानी का खेल है, प्रतिभा का आकलन नहीं. अगर इन 634 ही नहीं, कुछ हजार या लाख छात्रछात्राओं के कैरियर की सिस्टम को सुधार के लिए कुरबानी देने पड़े तो गलत न होगा.

यह ध्यान रखने की बात है कि असल अपराधी वे हैं जिन्होंने इन छात्रों को प्रवेश दिलाया था और उन्हें अभी तक सजा मिल पाई है या नहीं स्पष्ट नहीं है. बहुतों पर मुकदमे चल रहे हैं, कुछ लापता हैं, कुछ जमानत पर छूटे हैं, पर इतना पक्का है कि अब तक जो भी कानूनी कार्यवाह हुई है वह और गुनाहगारों को रोकने में असफल है और देश भर में नकल और मुन्नाभाइयों की फसल जम कर बोई जा रही है. हमारी शिक्षा असल में वैदिक हिंदूवादी बन गई है जिस में गुरु की सेवा, उसे दक्षिणा देने और उस की बात को सिरमाथे रखने का निरंतर आदेश दिया जाता है. ज्ञान, तर्क, समीक्षा, नई सोच, शोध का हमारी शिक्षा में बहुत कम स्थान है. व्यापम जैसे घोटाले इसीलिए हो रहे हैं, क्योंकि द्रोणाचार्य आदर्श हैं जो एक मेधावी धनुर्धारी का अंगूठा इसलिए कटवा लेते हैं ताकि उन का प्रिय शिष्य परीक्षा में पास हो सके.

व्यापम उस राज्य की देन है जो कट्टरपंथी सोच का गढ़ बना हुआ है और जहां नए विचारों की हवा को भोपाल गैस से ज्यादा जहरीला समझा जाता है. इस मामले में अदालत ने पाया था कि जैसे सफलता के लिए किए जाने वाले मंत्रों में एक ही भाषा का उपयोग किया जाता है वैसे ही छात्रों ने परीक्षा में ओएमआर शीटों में एक जैसी गलती की थी यानी पूरी तरह नकल की थी. ऐसे छात्र मैडिकल की डिग्री के तो कतई हकदार नहीं हैं, क्योंकि वे गलती पर गलती कर सकते हैं. यह आश्चर्य है कि इस तरह की खामियों के बावजूद देश में प्रतिभाएं हैं और देश में ही नहीं देश के बाहर भी नाम कमा रही हैं. शायद जहरीले पौधों में कुछ फलदार पेड़ भी चल ही जाते हैं. ज्यादा अफसोस यह है कि शिक्षा में बेईमानों को पकड़ने का नाटक तो थोड़ाबहुत किया जा रहा है पर प्रणाली बदलने पर कोई नई सोच नहीं है.

क्यों नकारते सत्य को अंधविश्वासी

कहीं दिखावे का स्वांग, कहीं डर से श्रद्धा, तो कहीं लकीर की फकीरी. कुल मिला कर यही हैं हम. हमारा समाज, जहां धर्मांधता के कारण पंडेपुजारियों, पुरोहितों द्वारा पर्व, उत्सवों को भी नाना प्रकार के कर्मकांडों से जोड़ कर सत्य तथ्यों को नकारते हुए उन का मूलभूत आनंदमय स्वरूप नष्ट कर दिया गया. शुभ की लालसा और अनिष्ट की आशंका से उन के पालन को विवश साधारण जनमानस का भयभीत मन अंधविश्वासों में घिरता चला गया, क्योंकि हमारे धार्मिक ग्रंथ भी इसी बात की पुरजोर वकालत करते हैं कि ईश्वर के बारे में, धार्मिक कार्यों में कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाना. बातें नहीं मानी तो नष्ट हो जाओगे.

भा. गीता श्लोक 18/58.

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यारी. यानी अब यदि तू अहंकार के  कारण नहीं सुनेगा तो पूर्णतया नष्ट हो जाएगा.
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति. भा. गीता 18/67. यानी उसे यह (ज्ञान) तुझे कभी नहीं कहना चाहिए और न उसे, जो मेरी निंदा करता है.
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज.
अहं त्वा सर्व पापेश्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: भा. गीता 18/66. यानी जब धर्मकर्म (लोकधर्म अथवा लोकव्यवहार जो नाना संबंधों के माध्यम से निर्मित है) को त्याग कर तू सिर्फ मेरी शरण में आ जा. मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा. दुखी मत हो.

यह सब क्या है

अगर भगवान है तो भगवान सर्वशक्तिमान है और उन्हें सब से बताने की क्या आवश्यकता थी? फिर उन्होंने अपना वचन सारी भाषाओं में क्यों नहीं लिखवा दिया? कंप्यूटर सौफ्टवेयर की तरह उन के पास तो सारा ज्ञानविज्ञान हमेशा से है. फिर पत्रों, पत्थरों पर क्यों लिखवाया? जो उन्हें नहीं मानते उन के आगे ये गीताके भगवान के वचन कहनेपढ़ने को क्यों मना किया? जबकि उन के वचन तो कानों में पड़ते ही उन्हें पवित्र बन जाना था. सीधी सी बात है, वे तर्क मांगते और इन के पास कोई जवाब न होता और ढोल की पोल खुल जाती, सत्य सामने आ जाता. सत्य तथ्यों को नकारना, बिना तर्क बिना कारण जाने कुछ भी मान लेना, मनवाना यहीं से शुरू हो गया. धर्मभीरु बना मन यहीं से दुर्बल या यों कहें वहमी बनता गया. इस डर में नएनए अंधविश्वास जन्म लेते गए और अंधविश्वासी बढ़ते गए.

एक ही बात मन की गहराई में बैठ गई कि यदि अकारण, बिना तर्क ऐसा करने से अच्छा और न करने से बुरा हो सकता है, तो हमारे व दूसरों के और क्रियाकलापों से भी बिना तर्क ऐसा करने से अच्छा और न करने से बुरा हो सकता है, तो हमारे व दूसरों के और क्रियाकलापों से भी बिना अच्छाबुरा घट सकता है. बस शुरू हो गया अंधविश्वास का सिलसिला. कभी क्रिकेट की जीत के लिए, तो कभी ओलिंपिक मैडल के लिए, तो कभी नेताओं की चुनाव में जीत के लिए हवन कराए जाने लगते हैं. यदि इन सब से कुछ हो सकता तो बलात्कार, हत्या या दुर्घटना रोकने के लिए भारत महान में कोई हवन क्यों नहीं होता, यह सोचने की बात है.

दिखाने का स्वांग

बिल्ली ने एक बार रास्ता काटा, बुरा हुआ तो वहम हो गया, दोबारा हुआ तो वहम और गहरा हो गया. कहीं तीसरी बार हो गया तो अंधविश्वासी ही बन गया. डर इतना मन में बैठ गया कि रास्ता ही बदल लिया या किसी और के गुजरने का इंतजार कर लेने में ही भलाई समझी. आगे आजमाने की हिम्मत ही नहीं दिखाई गई. डर इतना घर कर गया कि कभी ध्यान भी न गया कि अच्छा भी हुआ था कभी. अपना डर दूसरों में भी डालते चले गए. एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे, माउथ टू माउथ सब जगह बात फैल गई. जितनी धर्मभीरुओं की संख्या बढ़ती गई उस से अधिक अंधविश्वास और अंधविश्वासियों की संख्या में वृद्धि होती गई. इसलिए सर्वप्रथम धर्म, दूसरा व्यक्ति का दुर्बल भीरु मन मुख्य कारण हैं, जिन के फलस्वरूप अंधविश्वासी सत्य तथ्यों को सरलता से नकारने लगे.

तीसरा कारण है दिखावे का स्वांग. जैसे कुछ जन धार्मिक कर्मकांडों में लिप्त रह कर जताते हैं कि वे बहुत ही धार्मिक हैं, इसलिए अधिक अच्छे, सच्चे और विश्वास के योग्य जन एक पवित्र आत्मा हैं. फिर भले ही वे दानपुण्य की आड़ में गोरखधंधा या कालाधंधा खूब चलाते हों. दुनिया व कानून की नजरों में धूल झोंकते हुए बेशुमार धनदौलत, नामसम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते हों.

परंपराओं की दुहाई

जमीर को ताक पर रख दें तो जीवन में और क्या चाहिए? वे सब इसी मंतव्य को मानने वाले बन जाते हैं. भ्रष्ट बड़ेबड़े नेता, टैक्स की चोरी करने वाली बड़ीबड़ी फिल्मी हस्तियां बड़ी शान से अपने लावलश्कर और मीडिया की चकाचौंध के साथ मंदिरों में, ट्रीटमैंट के मध्य, देवीदेवताओं के दर्शन, भारी दान, चैरिटी कर अपनेआप को धार्मिक, पवित्र और नेक दिखाने का ढोंग करते हैं. क्या यह आंखें खोलने के लिए पर्याप्त नहीं? सच तो यह है कि हम सो नहीं रहे, सब जानतेबूझते आंखें बंद कर के पड़े हैं. सही तो है कि सोए हुए को जगाया जा सकता है पर जागे हुए को नहीं.

चौथा कारण है लकीर की फकीरी व परंपराओं की दुहाई. हमारे पूर्वज, बड़ेबूढ़े जो करते चले आ रहे हैं, आंखें मूंद कर लकीर के फकीर बने हम भी उन का अनुसरण करते जा रहे हैं. ऐसा करना हम अपना कर्त्तव्य मानते हैं. उन के प्रति प्यारआदर दिखाने का एक तरीका समझते हैं. उन से कोई तर्क नहीं करते. बस अनुसरण करते चले जाते हैं. कुछ संतुष्टि मिली, कुछ अच्छा लगने लगा, करतेकरते फिर विश्वास भी होने लगा, वैसे ही जैसे ताला बंद कर आराम से घूमने निकल जाते हैं कि अब घर सुरक्षित हैं. उन कर्मकांडों, अंधविश्वासों को मान कर, पालन कर हम अपनेआप को भविष्य के प्रति सुरक्षित सा अनुभव करने लगे. बस जैसा अपने बड़ों को करते देखा है वैसा बिना सोचेसमझे करते चले आ रहे हैं.

5वां कारण है अशिक्षा, अज्ञानता. यह भी एक बहुत बड़ा कारण है. आज शिक्षा का बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है. कुछ मस्तिष्क में क्यों, कैसे प्रश्न भी अंकुरित होने लगे हैं. व्यक्ति हर बात का पहले कारण जानना, फिर मानना चाहता है. परंतु अभी भी हमारे देश की जनसंख्या सौ प्रतिशत शिक्षित नहीं हो पाई है. मोबाइल, गाड़ी का प्रयोग तो करते हैं पर बाबाओं से चमत्कार की आशा में उन के पास जाना नहीं छोड़ते. उन के चंगुल में फंसते जाते हैं. साईं बाबा, आसाराम बापू जैसे लोग कहां गए? उन की असलियत आज किसी से छिपी नहीं. दुर्गम पहाडि़यों के संकरे रास्तों से जान जोखिम में डालने हुए मंगल की अभिलाषा में देवीदेवताओं के दर्शन करने सुदूर मंदिरों में पहुंच जाते हैं. कभीकभी जान से भी हाथ धो बैठते हैं. फिर भी उन्हें विश्वास होता है कि अपने शरीर को कष्ट देने से, भूखे रहने से या चढ़ावा आदि देने से देवीदेवता प्रसन्न हो कर कल्याण करते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. परंतु कोई तर्क पूछे तो उत्तर नहीं रहता है उन के पास कि क्यों और कैसे संभव है?

बेसिरपैर की कहानी

किसी ने टोक दिया नजर लग गई और किसी काम के शुरू होते ही छींक दिया तो बुरा हो गया, कहीं काना व्यक्ति दिख जाए तो बहुत बुरा, आंख फड़कना, दीया बुझना, बिल्ली का रास्ता काटना, कुत्ते का रोना ऐसे न जाने अज्ञातवश कितने वहम पाल रखे हैं. शिक्षित हो कर अपना ज्ञान बढ़ा लें तो उन्हें कारणअकारण समझ आ जाए. दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिस का कारण न हो, तर्क न हो. नहीं जानते तो यह हमारी अज्ञानता ही कही जाएगी.

रातदिन कैसे होते हैं? नहीं मालूम तो कुछ भी मनगढंत अटकलें लगा लें. जैसे राक्षस रोज सूर्य को निगल जाता है या बेसिरपैर की कोई और कल्पना. आज भी जाने कितनी कला, कितना विज्ञान दुनियाजहान में छिपा पड़ा है. हमें उस ओर अपना मस्तिष्क दौड़ाना है. मनगढंत बातों से बचना है, जिस के लिए शिक्षा के साथसाथ ज्ञान का होना नितांत आवश्यक है.

हम समय का सदुपयोग न कर निरर्थक कार्यों, ढकोसलों में व्यस्त रह कर यह अनमोल जीवन व्यर्थ में गंवाते हैं. अंधविश्वासों से घिर कर पूर्णतया प्रसन्न भी नहीं रह पाते हैं. इसलिए शिक्षा के साथसाथ जनजन को अपनी बुद्धि के बंद दरवाजे खोल सब से पहले ज्ञान का प्रकाश अपने भीतर फैलाना चाहिए.

मांझी ही नाव डुबोए…उसे कौन बचाए

जब नाव गंगा नदी में डूबने लगी थी तो उस में सवार लोग तो बचाने के लिए चिल्ला ही रहे थे, किनारे खड़े लोग भी उन के बचाव के लिए चिल्लाने लगे थे. अचानक नाव में तेज हलचल हुई और उस में लगे इंजन से धुआं उठने लगा था. इस के बाद नाव 2 टुकड़ों में बंट गई थी. उस में बैठी सवारियों में जो लोग तैरना जानते थे, वे तैरने लगे थे. बाकी लोग जान बचाने के लिए शोर मचाते हुए हाथपैर चला रहे थे.

शाम का समय होने की वजह से नदी में जो भी हो रहा था, साफ नजर नहीं आ रहा था. फिर भी शोर सुन कर नदी के किनारे खड़े लोगों में से जो लोग तैरना जानते थे, उन्होंने डूब रहे लोगों को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी थी.

35 साल की आरती अपनी 5 साल की बेटी अनुष्का को सीने से लगाए गंगा नदी में डूब गई थी. गोताखोरों ने उस की लाश को निकाला तो बेटी मां के सीने से चिपकी थी. इस दर्दनाक दृश्य को जिस ने भी देखा, उस का कलेजा कांप उठा. बाद में पता चला कि अनुष्का सुबह से ही मां से पतंग खरीदने और मेला देखने की जिद कर रही थी. बेटी की जिद की वजह से ही आरती उसे गंगा उस पार मेला घुमाने ले आई थी. आरती के पति विनोद कुमार किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. पत्नी और बेटी की मौत से उन्हें मानो लकवा मार गया था. पटना सिटी की रहने वाली नर्मदा के परिवार के 4 लोगों की इस हादसे में मौत हो गई थी, जिस में उन की बहू, पोती और 2 नातिनें शामिल थीं. उन के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. उन की बेटी ऊषा का रोरो का बुरा हाल था. उस की 2 बेटियां अंजलि और अर्पिता पतंगबाजी का आनंद लेने गंगा उस पार गई थीं.

जाते समय बेटियों ने मां से लौट कर खिचड़ी खाने को कहा था. वह बारबार बेटियों की लाश को झकझोर कर उठाने की कोशिश करते हुए कह रही थी कि ‘अब खिचड़ी कौन खाएगा?’ कभी वह मां को चुप कराने लगती थी तो कभी बदहवास सी इधरउधर देखने लगती थी. पटना में गंगा किनारे पतंग उत्सव में भाग ले कर लौट रहे 70 लोगों से भरी नाव गंगा में डूब गई थी. पटना लौ कालेज घाट के सामने 14 जनवरी की शाम को साढ़े 5 बजे हुए इस हादसे में 27 लोगों की मौत हो गई थी. पर्यटन विकास निगम की ओर से मकर संक्रांति पर गंगा किनारे 14 से 17 जनवरी तक पतंग उत्सव का आयोजन किया गया था.

शाम को यह प्राइवेट नाव सबलपुर से एनआईटी घाट के लिए चली थी. नाव में क्षमता से ज्यादा 70 लोग सवार हो गए थे. नाव घाट से 15 मीटर ही आगे बढ़ी थी कि नाव का इंजन खराब हो गया था, जिस से नाव गंगा में डूब गई थी, जिस में से 19 लोग तो किसी तरह से तैर कर किनारे आ गए थे, बाकी लोग डूब गए थे. उन में से 24 लाशें बरामद की गईं, बाकी का कुछ पता नहीं चला.

हादसे में बच निकले देवेश कुशवाहा ने बताया कि नाव में काफी लोग सवार थे. शाम साढ़े 5 बजे नाव घाट से चली. नाव में पहले से ही थोड़ा पानी था. जैसे ही नाव कुछ मीटर आगे बढ़ी, ओवरलोड होने की वजह से इंजन का पिस्टन फट गया, जिस तेज धमाका हुआ और धुआं निकलने लगा. इस से पानी बाहर निकलने के बजाए नाव में ही आने लगा.

घटना के समय मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि नाव में क्षमता से काफी ज्यादा लोग सवार थे. अंधेरा होने की वजह से सभी को घर लौटने की हड़बड़ी थी. कुछ लोगों ने यह भी बताया कि नाव में पहले से ही सुराख था, जिस से उस में पानी भर रहा था. इंजन बंद होने के बाद नाव डगमगाने लगी तो जान बचाने के लिए अफरातफारी मच गई.

इस की एक वजह आयोजकों द्वारा की गई घोषणा थी. 3 बजे आयोजकों ने अचानक घोषणा कर दी कि सभी जल्द से जल्द जाने की तैयारी करें, क्योंकि 4 बजे के बाद नाव सेवा बंद कर दी जाएगी. इस के बाद वहां आए लोग रानीघाट और कालीघाट पर आ गए. सभी को घर जाने की हड़बड़ी थी. 3 बजे तक वहां करीब 30 हजार पर्यटक थे. भीड़ के हिसाब से नावों की संख्या काफी कम थी. एक घंटे के अंदर नदी का किनारा खाली करने की घोषणा के बाद लोग भेड़बकरियों की तरह नावों में सवार होने लगे. नाव वाले जल्दीजल्दी चक्कर लगा रहे थे, लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी. अंधेरा होने लगा था, जिस से वापसी की हड़बड़ी और बढ़ गई. लोग किसी भी हालत में घर लौटने के लिए उतावले हो रहे थे.

एनडीआरएफ के सूत्रों के अनुसार, जिस समय लोग गंगा में डूब रहे थे, उस समय एनडीआरएफ की गश्ती टीम वहां आए लोगों को नदी पार कराने में लगी थी. एक बड़े अफसर के आदेश पर गश्ती टीम की नौकाएं वीआईपी लोगों को ढोने के काम में लगा दी गई थीं. जिस समय नाव डूब रही थी, एनडीआरएफ की गश्ती टीम आधा किलोमीटर दूर थी. गश्ती टीम की नाव जब वहां पहुंची, सब कुछ शांत हो चुका था. एनडीआरएफ के एक अफसर ने बताया कि अगर एनडीआरएफ की टीम मौके पर होती तो किसी की जान नहीं जाती.

टीम की एक नाव में 6 लाइफ जैकेट और 6 हवा भरी ट्यूबें रहती हैं. एक ट्यूब को पकड़ कर 3-4 लोग डूबने से बच सकते थे. इतना ही नहीं, बोट के किनारे लटकी रस्सियों को पकड़ कर भी एक बार में 20 लोगों की जान बच सकती थी. गंगा में हुए इस हादसे के बाद प्रशासन और एनडीआरएफ एक बार फिर नाकाम साबित हुआ है. हादसे के सवा घंटे बाद राहत कार्य शुरू हो सका था. रेस्क्यू औपरेशन का यह हाल था कि हादसे के 3 घंटे बाद तक एक भी लाश को नहीं निकाला जा सका था. अंत में जिला प्रशासन के गोताखोर राजेंद्र साहनी को बचाव कार्य और लाशों को निकालने के काम में लगाया गया. इस के बाद लाशों के निकालने का सिलसिला शुरू हुआ.

रात के अंधेरे में जब एनडीआरएफ को कुछ नहीं सूझ रहा था तो राजेंद्र साहनी ने मछली मारने वाली बंसी की मदद से लाशों को खोजने और निकालने का काम शुरू किया. उन्होंने 2 घंटे में 75 बार पानी में डुबकी लगाई. इस बीच वह एकएक कर के लाशें निकालते रहे. 55 साल के राजेंद्र साहनी पिछले 20 सालों से सैकड़ों लोगों की जान बचा चुके हैं. हाई टेक्नीक से लैस एनडीआरएफ उन के सामने बौना नजर आ रहा था.

राजेंद्र साहनी अपने 15 साथियों के साथ सर्च औपरेशन में लगे थे. उन्होंने 14 जनवरी को 21 और 15 जनवरी को 4 लाशें निकाली थीं. इस के बाद एनडीआरएफ और एमडीआरएफ की टीम ने कमान संभाली. एनडीआरएफ का सर्च औपरेशन हाई टेक्नीक था. इस के बाद भी उसे लाशों को ढूंढने में कामयाबी नहीं मिली. वहीं राजेंद्र साहनी ने मछली पकड़ने वाली बंसी, प्लास्टिक की रस्सी और ईंट की मदद से लाशों को निकाला था. उन्होंने बताया कि काफी तेज नोक वाली बंसी के संपर्क में आते ही कोई भी चीज आसानी से फंस जाती है. एक साथ 50-60 बंसी को पतली सी प्लास्टिक की रस्सी से बांधा जाता है.

उन के बीच ईंटों के कई टुकड़ों को बांध कर नदी में डाल दिया जाता है. इस के बाद धीरेधीरे नाव रस्सी को खींचती है. यही प्रक्रिया बारबार दोहराई जाती है. बंसी में किसी भी चीज के फंसने का पता चलता है तो गोताखोर पानी के अंदर जा कर उसे निकाल लाते हैं. पिछले 20 सालों से गंगा में लाशों को खोजने और निकालने का काम कर रहे राजेंद्र अब युवकों को गोताखोरी सिखा रहे हैं. सरकार की ओर से सन 2000 के बाद से कोई गोताखोर नियुक्त नहीं किया गया है, जिस से नाव हादसों के बाद बचाव और राहत कार्य के लिए सरकार के पास ठोस इंतजाम न के बराबर है.

प्रशासन की आधीअधूरी तैयारियों की वजह से ही मकर संक्रांति का उल्लास मातम में बदल गया था. पतंग उत्सव को देखने के लिए करीब 30 हजार लोग गंगा किनारे पहुंचे थे, लेकिन इन के लौटने के लिए नावों का पर्याप्त इंतजाम नहीं किया गया था. इतना ही नहीं, हादसे के बाद पटना और सारण जिला का प्रशासन एकदूसरे पर गैरजिम्मेदारी का आरोप मढ़ने लगा था.

पटना प्रशासन का कहना था कि पतंग उत्सव की जिम्मेदारी छपरा प्रशासन को सौंपी गई थी. सोनपुर के एसडीओ मदन कुमार ने बताया कि आयोजनस्थल की जिम्मेदारी संभालने के लिए 2 मजिस्ट्रैट, 4 पुलिस अफसर, 3 सुपरवाइजर और 64 सिपाहियों की ड्यूटी लगाई गई थी.

सरकारी दावा है कि पर्यटन निगम की ओर से 2 स्टीमर, मौनिटरिंग के लिए 3 सरकारी नावों और 10 प्राइवेट नावों की व्यवस्था की गई थी. एनडीआरएफ की ओर से 10 नावों से पैट्रोलिंग की जा रही थी.

वहीं प्रशासन का दावा है कि उस की ओर से 4 नावें और 4 गोताखोरों को लगाया गया था. जिला प्रशासन यह भी दावा कर रहा है कि प्राइवेट नावों पर प्रतिबंध लगाया गया था. इस के बाद भी प्राइवेट नावें कानून की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों को ढोने में लगी थीं. पुलिस वाले भी लोगों को प्राइवेट नावों पर चढ़ा रहे थे.

पतंग उत्सव का आयोजन करने वाले बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम ने लोगों को गंगा के उस पार ले जाने और वापस पटना लाने के लिए मुफ्त में क्रूज की सवारी कराने का विज्ञापन छापा था. इस के बाद भी प्राइवेट नावों से लोगों को ढोया जा रहा था. निगम के एमडी उमाशंकर प्रसाद ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि उत्सव में उम्मीद से ज्यादा लोग पहुंच गए थे.

शाम को तकनीकी खराबी की वजह से क्रूज उस पार नहीं जा सका था. निगम की ओर से लोगों को भरोसा दिलाया जा रहा था कि उन्हें सहीसलामत पटना के घाटों तक पहुंचाया जाएगा, इस के बाद भी हड़बड़ी में वापस लौटने के चक्कर में लोग प्राइवेट नावों में सवार होने लगे थे.

उत्सव में पहुंचे लोगों ने बताया कि सरकारी क्रूज से लोगों को उतारने के लिए बांस का प्लेटफार्म बनाया गया था, जो दोपहर 2 बजे ही टूट गया था. इस के बाद क्रूज सेवा को बंद कर दिया गया था. इसी से लोग प्राइवेट नावों में सवार हो कर लौटने के लिए अफरातफरी मचाने लगे थे.

शुरुआती जांच में पता चला है कि ओवरलोडिंग की वजह से नाव डूबी थी. जिस नाव में 70 से ज्यादा लोग सवार थे, उस की क्षमता महज 40 लोगों की थी. इस का मतलब है कि पुलिस और प्रशासन के अफसरों की अनदेखी और लापरवाही से इतना दर्दनाक हादसा हुआ.

उत्सव से लौट कर आए पटना के लोहानीपुर के रहने वाले उमेश ने बताया कि उत्सव में हजारों लोग पहुंचे थे. पतंगबाजी के बाद जब वापसी का समय हुआ तो अंधेरा होने लगा, जिस से लोगों में लौटने की हड़बड़ी मच गई. नावों पर क्षमता से ज्यादा लोग सवार होने लगे. पुलिस उन्हें रोकने के बजाए चुपचाप तमाशा देखती रही.

पटना लौ कालेज के घाट के पास एनडीआरएफ ने पावर बैलून लाइट जला कर रेस्क्यू औपरेशन शुरू किया, जिस में दर्जन भर लोगों की जान बचाई जा सकी. एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, उत्सव में डिज्नीलैंड लगाने वाले आयोजक और नाविक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है.

नाविकों ने पुलिस को बताया कि हादसे में डूबी नाव पहले से ही खराब थी, जो डगमगा कर चल रही थी. उस में छोटेछोटे कई छेद भी थे. लकडि़यां भी सड़ी हुई थीं. इस के बावजूद उस में 70 लोगों को बिठा लिया गया था. नाव में छेदों से तेजी से पानी भरने लगा था, जिस से कुछ दूर पर ही नाव डूबने लगी थी. हादसे के बाद नाविक फरार हो गया था. पुलिस उस की तलाश कर रही है.

हादसे के बाद नाव वालों के भाग जाने से हजारों पर्यटक फंस गए थे. उन्हें पटना लाने का सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया था. यहां भी आपदा प्रबंधन विभाग फेल रहा. उत्सव में हजारों लोगों की भीड़ तो जुटा ली गई थी, लेकिन प्रशासन ने एक एंबुलैंस तक की व्यवस्था नहीं की थी.

हादसे से कुछ देर पहले तक गंगा नदी के किनारे उत्सव और उत्साह का माहौल था. लोग सेल्फी ले कर सोशल साइटों पर डाल रहे थे. पतंगबाजी कर रहे थे. डीजे की धुनों पर थिरक रहे थे. रानीघाट, एनआईटी घाट और गांधी घाट पर लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा था. लोग जैसेतैसे नावों पर सवार हो कर नदी उस पार उत्सव में पहुंचने की जुगत में लगे थे.

जिस नाव पर 40 लोगों की क्षमता थी, उस 60-70 लोग लद रहे थे. पुलिस वाले किसी को नाव पर सवार होने से मना नहीं कर रहे थे.

पटना से गंगा उस पार जाने वाली प्राइवेट नाव उस पार ले जाने का किराया तो लेते हैं, लेकिन लौटने का किराया नहीं लेते. लौटते समय लोग अपनी मरजी के मुताबिक किसी भी नाव में सवार हो सकते हैं. उन के लिए यह जरूरी नहीं है कि जिस नाव से वे आए हैं, उसी से लौटें. जो नाव पहले दिख जाती है, उसी पर लोग जैसेतैसे सवार हो जाते हैं.

उस पार से पटना के घाटों तक कितनी नावें चलती हैं, इस का जिला प्रशसन को पता नहीं है. नावें किस के नाम रजिस्टर्ड हैं, इस की भी कोई जानकारी नहीं है. बिहार में नदी के खतरनाक घाटों पर नावों का परिचालन बेरोकटोक होता है. पूरे राज्य में 600 घाटों को खतरनाक घोषित किया गया है. पटना में 31 घाट सरकारी फाइलों में खतरनाक दिखाए गए हैं.

इस के बाद भी सभी घाटों से नावें चल रही थीं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था. इसी वजह से आए दिन नाव हादसे होते रहते हैं. बिहार सरकार की नई नाव नियमावली के मुताबिक 15 से 30 सवारियों वाली नाव में कम से कम 2 नाविक और 30 से अधिक सवारियों की क्षमता वाली नावों में 3 नाविकों का होना जरूरी है.

लेकिन इस नियम पर कोई भी नाव संचालक अमल नहीं करता. किस जिले में कितनी नावें हैं, उन की हालत क्या है, इस का भी कोई लेखाजोखा परिवहन विभाग के पास नहीं है. न ही जिलों के जिलाधिकारी के पास हैं. किस नदी के किस घाट पर कितनी नावें चलती हैं, इस का भी अतापता नहीं है.

नावों की उम्र सीमा क्या है, इस का भी किसी को पता नहीं है. नावों की नियमित रूप से जांच का जिम्मा किस के पास है, इस की भी किसी को जानकारी नहीं है. परिवहन विभाग का कहना है कि नावों की नियमित जांच का जिम्मा मोटर वेहिकल इंसपेक्टर (एमवीआई) को दिया गया है.

नाव नियमावली बनने के बाद सन 2011 से ही नावों के रजिस्ट्रेशन का काम ठप है. हर नाव को रजिस्ट्रेशन नंबर दिया जाता है, पर किसी भी नाव पर नंबर नहीं लिखा होता. 14 जनवरी को एनआईटी के पास हुए नाव हादसे की जांच का जिम्मा प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत और डीआईजी शालिन को सौंपा गया है.

शुरुआती जांच में हर तरफ से लापरवाही ही लापरवाही नजर आ रही है. प्रशासन की लापरवाही और बदतर इंतजाम की वजह से ही लोगों की जानें गईं. मारे गए लोगों के परिजनों के बयान पर सोनपुर के अंचलाधिकारी अनुज कुमार के बयान पर उत्सव में खोले गए अस्थाई मनोरंजन पार्क के राहुल वर्मा और नाव चलाने वाले अज्ञात नाविकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है.

पानी में डूबे नाव के मालिक का नाम अशोक राय है और वह हादसे के बाद से फरार है. गंगा किनारे जहां पतंग उत्सव मनाया गया है, वह सारण जिले में पड़ता है. सबलपुर में प्रशासन की अनुमति के बगैर मनोरंजन पार्क बनाया गया था. वहां बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ लग गई थी. पार्क को पटना के आशियानानगर इलाके के मजिस्ट्रैट कालोनी के रहने वाले राहुल वर्मा के मेसर्स आर.के. इंटरप्राइजेज ने बनवाया था. 

जानिए आखिर क्यों कुवारें लड़कों को हॉट लगती हैं भाभियां

अक्सर हम सुनते रहते हैं कि लड़कों को आंटिया और भाभियां ज्यादा हॉट लगती हैं. लेकिन अब इस बात कि पुष्टि विशेषज्ञों ने भी कर दी है. हाल ही में हुए एक सर्वे में बात सामने आई है कि लड़कों को अपनी उम्र कि लड़कियों से कहीं ज्यादा बड़ी उम्र कि औरतें पसंद आती हैं. लड़कों को शादीशुदा औरतें लड़कियों की तुलना में ज़्यादा पसन्द आती हैं. इस सर्वे में जब लोगों से पूछा गया तो उनमें से ज्यादातर लोगों ने स्वीकार किया की उन्हें आंटी और भाभी की उम्र कि पड़ोस में रहने वाली शादीशुदा औरतों पर क्रश हैं.

हालांकि, सर्वे में शामिल लोगों ने यह नहीं कहा की उन्हें आंटियों और भाभियों जैसी औरतों कि हर बात हमे अच्छी लगती है. उन्हें तो बस कुछ खास बातें ही आकर्षित करती हैं. तो आज से आप भी जान ही गए होंगे कि आखिर लड़कों का दिल आंटी या भाभी पर क्यों आ जाता हैं.

ऐसा माना जाता है कि शादीशुदा औरते कुंवारी और सिंगल लड़की कि तुलना में ज्यादा भावुक होती हैं और वो मर्दो कि मनोदशा को अच्छी तरह समझती हैं. शादीशुदा औरते सिंगल और कुंवारी लड़कियों से ज़्यादा विश्वसनीय होती हैं और उनमें अत्यधिक आत्मविश्वास होता है.

शादीशुदा औरतें कुंवारी और सिंगल लड़की कि तुलना में ज्यादा मैच्योर होती हैं. इसके अलावा, वो अपने फ़िगर और स्किन का भी अच्छी तरह ख्याल करती हैं. जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती हैं वो इंसिक्योरिटी से भी उबरने लगती हैं.

शादी के बाद महिलाएं पुरुषों के साथ केवल काम कि बातें करने में विश्वास रखती हैं वो आजकल के लड़के लड़कियों जैसे 24 घंटे एक दूसरे से चिपके रहने में विश्वास नहीं करती हैं. शादीशुदा औरतें ग्लैमर की दुनिया को छोड़कर और सिम्पल लाइफ जीती हैं और ज्यादा अच्छी लगती हैं.

हलके बालों के लिए हेयरस्टाइल

अधिकांश युवतियां हलके बाल होने के कारण बालों को खुला रखने या किसी प्रकार का हेयरस्टाइल बनाने में हिचकिचाती हैं, वे समझ नहीं पातीं कि उन पर कौन सा हेयरस्टाइल सूट करेगा, जिस से स्कैल्प नजर न आए, क्योंकि हलके बालों के साथ यह दिक्कत आती है कि अगर पार्टिशन किया जाए या सैक्शन निकाला जाए तो स्कैल्प नजर आने लगता है. ऐसे ही हलके बालों को खूबसूरत लुक देने के लिए हेयरस्टाइलिस्ट पूनम चुघ बता रही हैं कुछ खास हेयरस्टाइल जो आप को डिफरैंट व स्टाइलिश लुक देंगे :

यंगस्टर पार्टी हेयरस्टाइल

सब से पहले इयर टू इयर पार्टिशन करें, फिर पीछे के बालों को ले कर पोनीटेल बना लें. अब पोनी के बीच में राउंड डोनट लगाएं और पिन से अच्छी तरह फिक्स करें ताकि डोनट हिले नहीं. इस के बाद डोनट पर बालों को फैला दें और ऊपर से रबड़ बैंड लगा दें. अब आप इस में से थोड़े से बाल ले कर ट्विस्ट करें, राउंड सर्कल में ऐसे ही करें. अंत में पिन से अच्छी तरह फिक्स करें ताकि बाल निकलें नहीं. इस के बाद आगे के दोनों भागों से बाल ले कर अच्छी तरह कंघी करें. फिर साइड के बालों को 2 भागों में बांटें और ट्विस्ट ऐंड टर्न कर बन के पास पिन करें. अब सैंटर के बालों से छोटेछोटे सैक्शन ले कर ट्विस्ट करें और बन के पास पिन करें. अंत में ऐक्सैसरीज से डैकोरेट करना न भूलें.

फ्लावर हेयरस्टाइल

इयर टू इयर पार्टिशन करने के बाद पीछे के बालों को ले कर साइड पोनीटेल बना लें. अब आगे के बालों से छोटेछोटे सैक्शन ले कर बैक कौंबिंग करें. बैक कौंबिंग के बाद ऊपर से बालों को क्लीन कर के रबड़ लगा लें. रबड़ लगाने के बाद एल शेप में पिन लगाएं ताकि पफ खराब न हो. अब पफ के नीचे के बालों को ले कर चोटी बनाएं और एक साइड से लूज कर लें. फिर अंदर की साइड जहां लूप नहीं निकाला गया है उस साइड से रोल कर के पिन्स अच्छी तरह से लगाएं.

इस के बाद साइड पोनीटेल में हेयर ऐक्सटैंशन लगाएं. अगर ऐक्सटैंशन कलरफुल हो तो हेयरस्टाइल अट्रैक्टिव लगता है इसलिए कोशिश करें ऐक्सटैंशन कलरफुल हो. अब पोनीटेल को 2 भागों में बांटें. एक सैक्शन ले कर चोटी बनाएं. फिर एक साइड से हलकाहलका लूज कर लें और अंदर की तरफ मोड़ कर पिन लगाएं. फिर दूसरे सैक्शन में भी ऐसा ही करें. अंत में खूबसूरत ऐक्सैसरीज से फिनिशिंग दें.             

फौरमल हेयरस्टाइल

इयर टू इयर पार्टिशन करने के बाद आगे के बालों में हेयर रोलर लगाएं और हेयर स्प्रे कर थोड़ी देर के लिए छोड़ दें. अब साइड के छोटेछोटे बालों को ट्विस्ट कर के रबड़ बैंड लगा लें. इस के बाद सारे बालों को ले कर पोनीटेल बना लें. अब पोनी से छोटेछोटे सैक्शन ले कर बैक कौंबिंग करें. बैक कौंबिंग हो जाने के बाद साइड से रोल कर के पिन्स लगा लें. अब हलकाहलका खींच लें और साइड में ला कर पिन लगाएं. अंत में आगे के बालों से हेयर रोलर निकाल कर साइड पार्टिशन करें.

नौट लूप हेयरस्टाइल

इयर टू इयर पार्टिशन के बाद डोनट को सी शेप में काट लें. अब फ्रंट के बालों को सी शेप डोनट में रैप कर के पीछे पिन लगा लें. अब दोनों साइड छोड़े गए बालों को भी रैप कर लें. इस के बाद पीछे के बालों में पोनी कर के डोनट लगाएं, डोनट को पिन से फिक्स करें फिर नौट लूप बनाएं और डोनट पर फिक्स करें.

क्रिम्प पफ हेयरस्टाइल

कुछ नया करना चाहती हैं तो आगे के सैक्शन में क्रिम्पिंग मशीन से क्रिम्प करें. क्रिम्प करने के बाद यह न सोचें कि काम खत्म हो गया बल्कि एकदम हलके हाथों से बैक कौंबिंग कर के पफ बना लें. अब पीछे के बालों को ले कर पोनीटेल बनाएं और पोनी में डोनट लगाएं फिर पिन से अच्छी तरह से सैट करें. फिर डोनट के पास से बाल ले कर ट्विस्ट ऐंड टर्न करें फिर रोल कर के डोनट के ऊपर लगाएं. पूरे बालों में इसी तरह से करें और हां, अंत में ऐक्सैसरीज लगाना न भूलें.         

कुछ जरूरी टिप्स

–       आगे के हलके बालों में बैक कौंबिंग छोटेछोटे सैक्शन ले कर करें, इस से पफ सही से बनता है.

–       हलके बालों में कभी भी हैवी ऐक्सैसरीज न लगाएं, क्योंकि यह बालों में टिकती नहीं है.

–       जब भी हेयरस्टाइल बनाएं तो बाल अच्छी तरह से वाश करें ताकि हेयरस्टाइल में नीटनैस नजर आए.

–       हेयरस्टाइल में क्लिप का इस्तेमाल कम से कम करें.

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