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वक्तव्य या सुझाव

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को अपना कार्यकाल पूरा करने में अब कुछ ही दिन बचे हैं. इस दौरान वे विवादों पर कम बोले और अपवादस्वरूप ही सरकार से असहमत हुए. यह शायद देश के राष्ट्रपति की मजबूरी भी होती है. लेकिन कांग्रेस ने जिस मकसद से उन्हें अपना आने वाला बुरा वक्त भांप कर इस पद पर बैठाया था, उस में जरूर वे सफल रहे कि सरकार मनमानी करने की हिम्मत उन के आगे नहीं कर पाई.

जो महत्त्वपूर्ण बातें प्रणब मुखर्जी ने कहीं उन में से एक यह भी है कि अब वक्त आ गया है कि संसदीय सीटें बढ़ाई जाएं. यह बात ऐसे वक्त में कही गई, जब कांग्रेस की हालत देशभर में खस्ता है जो सीटें बढ़ाने से सुधरेगी. इस का जवाब हां में दे पाना मुश्किल है पर यह तय है कि प्रणब मुखर्जी यों ही बोलने के लिए कुछ नहीं बोलते. जल्द ही भाजपा उन के इस संक्षिप्त वक्तव्य को सुझाव मानते विस्तार देने लगे तो बात हैरानी की नहीं होगी.

उलटा पड़ गया दांव

आस्ट्रेलिया की राजधानी मेलबौर्न में ट्रैफिक सिग्नलों पर अब पुरुषों के साथसाथ महिला की आकृति भी प्रदर्शित करने का प्रयोग किया गया. सड़क को पार करते समय अब वहां के 10 ट्रैफिक सिग्नलों में मैरी रौजर्स की छवि डाली गई है. करीब 6 ट्रैफिक लाइटें बदलने में 8,400 डौलर की मोटी रकम खर्च की गई. बस, फिर क्या था. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर की गई इस पहल को ले कर हर जगह विरोध और मजाक के स्वर सुनाई देने लगे. किसी ने कहा कि इतनी मोटी रकम लाइट पर खर्चने के बजाय महिलाओं के भले के लिए खर्चे होते तो महिला समानता की बात सार्थक होती. किसी को इस बात से आपत्ति हुई कि सिग्नल में जो छवि महिला की इस्तेमाल हुई है वह काफी ओल्ड फैशंड कपड़ों में है और आज मेलबौर्न में महिलाएं ये नहीं पहनतीं. बहरहाल, हरे और लाल ट्रैफिक सिग्नलों में सिर्फ पुरुषों की आकृति को भेदभाव मान कर महिलाओं की आकृति डालने भर से यह भेदभाव दूर नहीं होने वाला. यह हास्यास्पद और निरर्थक पहल मालूम होती है.

लेटलतीफी के मुरीद क्यों हैं हम

ऐसा लगता है कि वक्त की कीमत नहीं समझना और आधा घंटा देरी संबंधी भारतीय मानक समय के कुख्यात मुहावरे को हमारे सरकारी कर्मचारियों ने पूरी तरह आत्मसात कर रखा है, वरना इस बारे में सरकार को बारबार अपनी चिंता नहीं प्रकट करनी पड़ती. इस का एक उदाहरण तब देखने को मिला, जब दिल्ली के नवनियुक्त चीफ सैक्रेटरी एम एम कुट्टी ने दिसंबर 2016 के आखिरी हफ्ते में सभी विभागों के सचिवों को निर्देश जारी कर के लेटलतीफ बाबुओंकर्मियों का पता लगाने और आदतन ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ा ऐक्शन लेने को कहा.

मोदी सरकार पहले भी दफ्तरों में देर से आने वाले कर्मचारियों से परेशान है और वह सरकारी मंत्रालयों, विभिन्न विभागों और दफ्तरों में कामकाज की लुंजपुंज शैली में लगातार आग्रह के बावजूद, सुधार होता नहीं देख कर लेटलतीफ कर्मचारियों पर नजर रखने व उन पर कार्यवाही करने का संकेत देती रही है. पर लगता है कि सरकारी बाबुओं ने ठान रखा है कि सरकार चाहे जितने डंडे चला ले वे अपनी लेटलतीफी की आदत नहीं बदलेंगे.

उल्लेखनीय है कि डिपार्टमैंट औफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) वर्ष 2015 में जारी एक निर्देश में साफ कह चुका है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए आदतन देर से दफ्तर आना दंडनीय अपराध है और ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा सकती है. इस के लिए सर्विस रूल्स (नौकरी संबंधी नियमावली) का हवाला दिया गया था. जारी आदेश में कहा गया था कि सरकारी कर्मचारियों के लिए समय की पाबंदी सुनिश्चित करने का दायित्व मंत्रालयों, विभागों और कार्यालयों का है, इसलिए उन के अधिकारी विभाग के कर्मचारियों की उपस्थिति का रिकौर्ड रखें.

डीओपीटी ने सभी अधिकारियों से कहा था कि वे उपस्थिति के लिए बायोमैट्रिक सिस्टम को ही आधार मानें और उसी आधार पर कार्यवाही करें. पर लेटलतीफी की आदत से मजबूर सरकारी कर्मचारियों ने बायोमैट्रिक सिस्टम से बचने के कई उपाय कर रखे थे और वे उपस्थिति दर्ज करने के लिए दूसरे तरीकों को अपनाए हुए थे.

यही नहीं, जिन कार्यालयों में उपस्थिति दर्ज करने के आधुनिक तौरतरीके अपना लिए गए हैं, वहां भी उपस्थिति का रिकौर्ड नहीं रखा जाता. इस से कुछ समय बाद यह पता नहीं चलता कि एक निश्चित समयावधि के बीच कौन सा कर्मचारी आदतन समय पर नहीं आता रहा है. डीओपीटी के निर्देश में यह भी सुझाया गया था कि एक सरकारी कर्मचारी के लिए एक हफ्ते में 40 घंटे (8 घंटे प्रतिदिन) की उपस्थिति अनिवार्य है.

ऐसी स्थिति में यदि कोई कर्मचारी महीने में 2 बार 30 मिनट की देरी से आता है, तो उसे समय की पाबंदी में छूट मिल सकती है, लेकिन तीसरी बार इतनी ही देरी पर उस की आधे दिन की छुट्टी काट ली जाएगी. यदि वह आदतन ऐसा करता रहता है, तो वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट (अप्रेजल) में उस के बारे में नकारात्मक टिप्पणी की जा सकती है.

आदत से मजबूर

सरकारी विभागों में काम के वक्त अधिकारियों व कर्मचारियों का नदारद रहना और अपनी कुरसी पर देर से आना खास कर तब अखरता है, जब उस अधिकारी व कर्मचारी के जिम्मे जनता से जुड़े कामकाज हों. ऐसी स्थिति में लोग लंबी लाइन लगा कर कर्मचारी व अधिकारी के दफ्तर और अपनी सीट पर विराजमान होने का लंबा इंतजार करते रहते हैं. ऐसे कर्मचारी को यदि कोई व्यक्ति भूलवश देरी से आने के लिए कोई बात कह दे, तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति का कोई काम हो पाना नामुमकिन ही हो जाता है.

यही नहीं, दफ्तर आ कर भी अपनी सीट से गायब हो जाना भी ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों की आदत में शुमार हो गया है, वे घंटों तक दफ्तर तो क्या, उस के आसपास तक नजर नहीं आते, भले ही लाइन में जनता अपने सौ काम छोड़ कर सिर्फ उन का वहां इंतजार ही क्यों न कर रही हो. इन मुश्किलों का समाधान क्या है?

बायोमैट्रिक सिस्टम का तोड़

देश की राजधानी दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में भले ही अटैंडेंस के लिए बायोमैट्रिक सिस्टम की शुरुआत हो चुकी है, पर अन्य हिस्सों में मौजूद ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उपस्थिति दर्ज कराने का पुराना सिस्टम चला आ रहा है, जिस में कर्मचारी औफिस में रखे रजिस्टर में अपने नाम के आगे हस्ताक्षर करते हैं. इस में अकसर समय के उल्लेख का कोई प्रावधान नहीं होता.

यदि समय दर्ज किया जाता है, तो जरूरी नहीं कि वह एकदम सही लिखा जाए और महीने के आखिर में उस उपस्थिति के आधार पर कर्मचारी की छुट्टियों और वेतन का समायोजन किया जाए. इस में भी बाबुओं की मिलीभगत से कोई कर्मचारी दफ्तर आए बिना वर्षों तक अपनी उपस्थिति लगवाता रह सकता है. ऐसे दर्जनों किस्से उजागर हो भी चुके हैं जब कोई कर्मचारी दफ्तर आए बिना वेतन लेता रहता है.उपस्थिति के सिस्टम के आधुनिकीकरण का तब भी कोई फायदा नहीं, जब तक कि दफ्तर आए कर्मचारी की अनिवार्य मौजूदगी के प्रमाण न जुटाए जाएं. कार्ड पंचिंग के तौरतरीकों के दुरुपयोग की भी सैकड़ों शिकायतें मिल चुकी हैं. ऐसे सिस्टम में भी तब  मिलीभगत एक कामयाब नुस्खे के तौर पर आजमाई जाती रही है, जब एकदूसरे के कार्ड से कर्मचारी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे हैं. यही वजह है कि अब सरकार उपस्थिति दर्ज करने के मौजूदा तौरतरीकों को खत्म कर उन की जगह ऐसा बायोमैट्रिक सिस्टम लागू करना चाहती है जो सारे मैन्युअल सिस्टम की जगह ले सके. आधार एनेबल्ड बायोमैट्रिक अटैंडेंस सिस्टम (एईबीएएस) नामक इस प्रणाली में कर्मचारी की उंगलियों व आंखों की पुतलियों की छाप ली जा सकेगी, जिस से उपस्थिति की धांधलियों पर काफी हद तक रोकथाम की उम्मीद है. पर ये सिर्फ यांत्रिक उपाय हैं. ऐसे में इस की भरपूर आशंका आगे भी रहेगी कि कामचोर व बेईमान कर्मचारी इन का कोई न कोई तोड़ निकाल लें.

सवाल कार्य संस्कृति का

नियमों का पालन डंडे के बल पर करवाना पड़े, तो किसी देश और समाज के लिए इस से ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है. आखिर हमारे देश में ऐसी कार्य संस्कृति क्यों नहीं जग पा रही है जिस में वक्त पर दफ्तर आना, सौंपे गए काम और जिम्मेदारी का समर्पण के साथ निर्वाह करना और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना लोग जरूरी समझते हों. देश में जो नई कौर्पोरेट संस्कृति पनप रही है उस में देर से दफ्तर आने वालों के लिए कोई जगह नहीं होती है. वहां देर से दफ्तर आने वालों के लिए पर्याप्त दंड की व्यवस्था है. इस से कर्मचारी वक्त के पाबंद रहते हैं. अचरज इस बात को ले कर होता है कि सरकारी कर्मचारियों ने इस बदलाव का जरा भी नोटिस नहीं लिया है और इस का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार जब तक उन पर पाबंदियां नहीं लगाएगी, तब तक वे नहीं सुधरेंगे.

इस सिलसिले में एक दावा यह किया जाता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही जिस प्रकार सरकारी कार्यालयों में बायोमैट्रिक अटैंडेंस लागू करवाने की बात कही थी, उस से सरकारी कर्मचारियों में काफी नाराजगी थी. बताते हैं कि इस का बदला उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनावों में लिया और केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को करारा झटका दिया. ऐसी सूरत में सरकारी कर्मचारियों को सख्त कायदों के बल पर दफ्तरों में उपस्थित रहने को मजबूर करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है. इसलिए ज्यादा जरूरत लोगों को यह समझाने की है कि समय को ले कर उन की काहिली देश और समाज ही नहीं, खुद उन के लिए भी दिक्कतें पैदा करती है. उन्हें ऐसे उदाहरण देने की जरूरत है कि जिन पिद्दी से देशों ने मामूली संसाधनों के बल पर पूरी दुनिया में छा जाने के करिश्में किए हैं, उस में उन की कार्यसंस्कृति का बड़ा भारी योगदान है.

जापान इसी एशिया का एक मुल्क है जहां लोग देर से दफ्तर आने को सिर्फ अपराध नहीं मानते हैं, बल्कि औफिस पहुंचने पर दिए गए काम को नहीं कर पाना भी खुद उन के लिए गुनाह है. जापानी वक्त के किस कदर पाबंद हैं, इस का एक उदाहरण भारत में करीब एक दशक पहले देखने को मिला था. वर्ष 2004 में एक जापानी इंजीनियर मत्सू काजू हिरो अपनी कंपनी के काम से भारत आया था. दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरने के एक घंटे बाद तक जब भारत स्थित कंपनी की इकाई की गाड़ी उसे लेने नहीं पहुंची, तो देरी से खफा मत्सू ने फौरन जापान वापसी की फ्लाइट पकड़ ली थी. हवाईअड्डे पर विलंब का यह नजारा डेढ़ दशक में भी नहीं बदला.

एयरइंडिया की लेटलतीफी

यह किस्सा सरकार के वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू से जुड़ा है. वर्ष 2016 में एक अवसर पर उन्हें एयर इंडिया की जिस फ्लाइट से हैदराबाद में आयोजित एक महत्त्वपूर्ण सरकारी बैठक में जाना था, वह फ्लाइट पायलट के नहीं पहुंचने के कारण समय पर उड़ान ही नहीं भर पाई. घंटों इंतजार के बाद वेंकैया नायडू घर वापस लौट गए और नाराजगी में सोशल मीडिया पर ट्वीट करते हुए एयर इंडिया से यह कहते हुए जवाब मांगा कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में एयर इंडिया इतनी लेटलतीफी आखिर कैसे कर सकती है.

एयर इंडिया ने इस मामले में मंत्रीजी से माफी मांग ली, पर इस सरकारी उपक्रम में विलंब का यह पहला वाकेआ नहीं था. ऐसा तकरीबन हर रोज होता है पर उन उड़ानों में कोई वीआईपी नहीं होने के कारण देरी कोई मुद्दा नहीं बनती. ध्यान रहे कि छोटेछोटे देशों ने घड़ी की सूइयों के साथ कदमताल कर के ही विकसित होने की राह खोली है. अब तो ऐसे उदाहरण देश में ही कई निजी कंपनियां पेश कर रही हैं. उन्होंने लगभग हर कायदे में सरकारी प्रतिष्ठानों से आगे निकल कर साबित कर दिया है कि कार्यसंस्कृति को बदलने का कितना बड़ा फर्क किसी संस्थान की तरक्की पर पड़ता है. सरकारी और निजी बैंकों के कामकाज में अंतर आज हर व्यक्ति महसूस करता है.

ऐट द इलेवैंथ आवर

सवाल यह है कि डीओपीटी के निर्देश और बायोमैट्रिक सिस्टम सरकारी कर्मचारियों को वक्त का पाबंद बनाते हैं या फिर सरकारी दफ्तरों में ये कायदे और उपाय सिर्फ आधुनिकीकरण का एक पैबंद बन कर रह जाते हैं. असल में बात भारतीय आदतों की है. अंतिम क्षणों यानी ‘ऐट द इलेवैंथ औवर’ पर ही जगने का उपक्रम करने की इस मानसिकता के दर्शन देश में हर जगह होते हैं.आयकर रिटर्न दाखिल कराना हो, स्कूलकालेज में फीस भरनी हो, बिजली व टैलीफोन के बिल जमा करने हों या कोई अन्य काम निबटाना हो, अमूमन ये सभी काम एक औसत भारतीय अंतिम दिन और आखिरी घंटे तक टालता है. नतीजा है लंबीलंबी, बो झिल कतारें. यही मनोवृत्ति दफ्तरों, विशेषरूप से सरकारी कार्यालयों में बाबुओं के पहुंचने को ले कर भी है और शायद इसलिए भारतीय मानक समय यानी तय समय से आधा घंटा लेट का तंजभरा मुहावरा प्रचलित है.                  

कौनसा देश, वक्त का कितना पाबंद

वक्त की पाबंदी को ले कर देशदुनिया में रोचक सर्वेक्षण होते रहते हैं. ऐसा एक सर्वेक्षण जून 2016 में औनलाइन गेमिंग वैबसाइट मिस्टर गेम्ज ने 15 देशों में किया था. इस के कई दिलचस्प नतीजे सामने आए थे. जैसे, मैक्सिको में भारत की तरह आधा घंटा विलंब को ले कर कोई नाराज नहीं होता. इसी तरह मोरक्को ऐसा देश है जहां दिए गए समय से यदि कोई एक घंटे से ले कर पूरे एक दिन का विलंब करता है तो भी कोई त्योरियां नहीं चढ़ाता. वहीं, दक्षिण कोरिया में जरा सी भी देरी बरदाश्त नहीं की जाती. मलयेशिया में अगर कोई 5 मिनट में आने को कह कर 1 घंटे में भी नहीं आता है तो इस के लिए क्षमायाचना की जरूरत भी महसूस नहीं की जाती है. इसी तरह यदि चीन में कोई व्यक्ति तय समय से 10 मिनट की देरी से आता है, तो इस से कोई ज्यादा हर्ज नहीं होता है.

लेकिन जिन देशों में काम और वक्त की कीमत को समझा गया है, वहां इस के उलट नजारे मिलते हैं. जैसे, जापान में अगर ट्रेन 1 मिनट से ज्यादा देरी से चलती है, तो इसे लेट की श्रेणी में डाला जाता है. भारत में इस तथ्य को भले ही हैरानी से देखा जाए कि जापान में पिछले 50 वर्षों में एक भी मौका ऐसा नहीं आया है जब कोई ट्रेन डेढ़ मिनट से ज्यादा लेट हुई हो.

अपने देश में तो हर साल सर्दी में कोहरे को एक बड़ी वजह बताते हुए ट्रेनें औसतन 3-4 घंटे की देरी से चल सकती हैं और उस पर रेलवे कोई हर्जाना देने की जिम्मेदारी नहीं लेता. जापान की तरह जरमनी में देरी स्वीकार्य नहीं है और अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति तय वक्त से 10 मिनट पहले उपस्थित हो जाए. वक्त के मामले में भारत जैसी सुस्ती कई अन्य देशों में भी फैली हुई है. जैसे, नाइजीरिया में अगर किसी बैठक की शुरुआत का वक्त दिन में 1 बजे है तो इस का अर्थ यह लगाया जाता है कि मीटिंग 1 से 2 बजे के बीच कभी भी शुरू हो सकती है. इसी तरह सऊदी अरब में वक्त को ले कर ज्यादा पाबंदियां नहीं हैं, वहां लोग आधे घंटे तक आराम से लेट हो सकते हैं. बल्कि वहां आलम यह है कि अगर मीटिंग में वक्त पर पहुंच गया व्यक्ति बारबार अपनी घड़ी देखता है तो इसे लेट आने वालों की अवमानना की तरह लिया जाता है.

सर्वेक्षण के मुताबिक, ब्राजील में देर से आने वालों के लिए मुहावरा ‘इंग्लिश टाइम’ इस्तेमाल किया जाता है, जिस का मतलब है कि वहां भी देरी बरदाश्त नहीं की जाती. इस के उलट घाना में भले ही किसी मीटिंग का वक्त पहले से बता दिया गया हो, पर  इस मामले में उदारता की अपेक्षा की जाती है. इसी सर्वेक्षण के नतीजे में भारत का उल्लेख करते हुए लिखा गया था कि यहां के लोग वक्त पर आने वालों की सराहना तो करते हैं, लेकिन वक्त की पाबंदी को खुद पर लागू किए जाना पसंद नहीं करते यानी भारत में वक्त की पाबंदी को एक अनिवार्यता की तरह नहीं लिया जाता.

भारत जैसा हाल यूनान (ग्रीस) का है जहां समय की बंदिश को लोग नहीं मानते. लेकिन विदेशियों से उम्मीद करते हैं कि उन्हें निश्चित समय पर किसी जगह पर उपस्थित रहना चाहिए. कजाकिस्तान में तो वक्त की पाबंदी पर चुटकुले सुनाए जाते हैं और समारोहों में देरी से पहुंचने को स्वीकार्यता हासिल है. इस के विपरीत रूस के नागरिक वैसे तो हर मामले में सहनशीलता अपनाने की बात कहते हैं लेकिन वक्त की पाबंदी के मामले में कोई छूट नहीं देते. हालांकि वहां विदेशियों से तो वक्त पर उपस्थित रहने को कहा जाता है पर यदि किसी रूसी व्यक्ति से इस नियम का पालन करने को कहा जाए तो वह नाराज हो सकता है.

कुल मिला कर मिस्टर गेम्स नामक वैबसाइट ने सर्वेक्षण के आधार पर जो नतीजे निकाले थे, वे शब्ददरशब्द सही साबित हुए हैं.

जापान से लें सबक

वैसे तो अब जापान में भी वक्त की पाबंदी के कायदों में विचलन आने की बात कही जा रही है, खासतौर से युवाओं में इस नियम को ले कर बेरुखी देखने को मिलने लगी है पर मोटेतौर पर जापान अभी भी वक्त के पाबंद देश के रूप में देखा और सराहा जाता है. समय की पाबंदी को जापानियों ने एक आदत के रूप में अपनाया है और इस के लिए उन्हें किसी आदेशनिर्देश की जरूरत नहीं होती है. निजी जलसों में लोगों को इस नियम से छूट हासिल होती है, लेकिन वहां भी वे विलंब की जानकारी मोबाइल, एसएमएस या व्हाट्सऐप से अवश्य देते हैं. ट्रेनों के मामले में जापान में नियम यह है कि अगर कोई ट्रेन एक मिनट से ज्यादा लेट होती है, तो जापानी रेलवे कंपनियां इस के लिए सार्वजनिक क्षमायाचना करती हैं. बुलेट ट्रेनों के आवागमन में 15 सैकंड से ज्यादा की देरी नहीं होती है.

समय की इतनी बंदिश को ले कर जापान में बसे विदेशी काफी हैरान होते हैं. उन्हें लगता है कि वक्त को ले कर जापानी कुछ ज्यादा ही कठोर हैं. जापान में समय की पाबंदी को ले कर इतनी ज्यादा सतर्कता बरतने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं. एक कहानी के मुताबिक, मेइजी दौर में ट्रेनें अकसर आधा घंटे की देरी से चलती थीं, जिस से फैक्टरियों में काम करने वाले लोग कभी भी समय पर नहीं पहुंच पाते थे. इसी के फलस्वरूप करीब 80 साल पहले शोआ युग में जापान में ट्रेनों के लिए साइंटिफिक मैनेजमैंट सिस्टम लागू किया गया. इस सिस्टम की शुरुआत अमेरिका में हुई थी जिस का इस्तेमाल टाइमकीपिंग के जरिए फैक्टरियों में उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया गया था.जापान में यह सिस्टम अपना असर छोड़ने में कामयाब रहा. सचाई तो यह है कि आज के जापान में भी पार्कों से ले कर बाजारों और विज्ञापनपट्टों तक पर वक्त को ले कर जापानियों की सख्ती के दर्शन होते हैं और लोगों की निगाह घड़ी से कभी भी ह टती नहीं दिखाई देती.भले ही अब जापानी युवा इस नियम में कुछ छूट की मांग करने लगे हैं पर जापानी संस्कृति का असर वहां काम करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर भी हुआ है जो वक्त की पाबंदी को जापानके बाहर अन्य मुल्कों में लागू करने लगी हैं.

प्यार किया तो डर के किया

धर्म और जाति की बिना पर प्यार से नाकभौं सिकोड़ते रहने वाले लोग अगर एक दफा ईमानदारी से अपने दिमाग से नफरत का कूड़ा निकाल कर प्यार करने वालों की बातों, जो वे दिल से करते हैं, को सुन लें तो तय है उन का नजरिया प्यार और प्यार करने वालों के हक में बदल जाएगा. जिस समाज में हम रहते हैं उस पर उन लोगों का दबदबा है जिन्हें धर्म ने रटा दिया है कि प्यार करना बुरी बात है और धर्म के उसूलों के खिलाफ है, इसलिए जहां भी किसी को प्यार करते देखो, तुरंत एतराज जताओ, उन्हें धर्मजाति के अलावा घर की मानमर्यादाओं के नाम पर परेशान करो और इतना परेशान करो कि वे मरने तक कि सोचने लगें. यह हर्ज की बात नहीं क्योंकि धर्म जिंदा रहना चाहिए, वही जीवन का सार है.

इस कट्टरवादी सोच के तले हमेशा से ही इश्क करने वाले हारते आए हैं. वे आज भी कायदेकानूनों, रीतिरिवाजों और उसूलों के नाम पर अपनी हंसतीखेलती जिंदगी व हसीन ख्वाबों की बलि चढ़ा रहे हैं. पर प्यार में जान देने वालों की जिम्मेदारी लेने को कोई आगे नहीं आता तो यह महसूस होना कुदरती बात है कि हमें एक ऐसा समाज और माहौल चाहिए जिस में प्यार करने की आजादी हो, नौजवानों को अपनी मरजी से शादी करने का हक हो, नहीं तो प्रेमी यों ही डरडर कर जीते रहेंगे और इन में से कुछ मरते रहेंगे.

एकदूजे के लिए

भोपाल के बाग मुगालिया इलाके  में रहने वाले 19 वर्षीय रंजीत को अपने ही महल्ले में रहने वाली 17 वर्षीया काजल साहू से प्यार हो गया. एक सुनहरी जिंदगी का ख्वाब उन की आंखों ने देखा. लेकिन उन की नजरें दुनियादारी नहीं देख पाईं. जल्दी ही उन के हौसलों ने घर, समाज, जाति और धर्म के आगे घुटने टेक दिए.

पेशे से मैकेनिक रंजीत ठीकठाक कमा लेता था. उस की जिंदगी की कहानी औरों से हट कर है. एक साल पहले ही उस के पिता की मौत हुई तो मां ने दूसरी शादी कर ली थी. जब मां अपने दूसरे शौहर के यहां चली गई तो वह अपने मामा अरविंद के यहां रहने चले आया. जवानी में विधवा हो गई मां को अगर दूसरा सहारा मिल गया था तो यह कतई हर्ज की बात नहीं थी. लेकिन एक साल के अंतर से हुई इन 2 घटनाओं ने रंजीत की जिंदगी में एक खालीपन ला दिया, जिसे पूरा किया कमसिन और खूबसूरत काजल ने जो उस के दिल का दर्द समझने लगी थी.

19 फरवरी की दोपहर में रंजीत घर आया और खुद को कमरे में बंद कर फांसी लगा ली. जैसे ही मामा अरविंद ने भांजे को फांसी के फंदे पर झूलते देखा, तुरंत पुलिस को खबर दी. पुलिस आई, कानूनी कार्यवाही व पूछताछ की और फिर रंजीत की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज दिया. सारे महल्ले में इस खुदकुशी की चर्चा थी कि क्यों सीधेसादे रंजीत, जिस का अपने रास्ते आनाजाना था, ने बुजदिलों की तरह अपनी जान, भरी जवानी में दे दी जबकि उस के सामने तो पूरी जिंदगी पड़ी थी. कुछ ही लोगों को समझ आया कि माजरा क्या हो सकता है लेकिन वे कुछ नहीं बोले. बोलने से अब कोई फायदा भी नहीं था कि रंजीत दरअसल काजल से प्यार करता था और शादी करना चाहता था लेकिन उस के घर वाले तैयार नहीं हो रहे थे. शायद, इसलिए उस ने जान दे दी. रंजीत कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ गया था.

जैसे ही रंजीत की खुदकुशी की खबर काजल को लगी तो उस ने बगैर वक्त गंवाए फैसला ले लिया. यह फैसला दरअसल रंजीत के साथ जीनेमरने की कसमें और वादे निभाने का था. रंजीत की मौत की खबर जिस वक्त काजल को मिली, उस वक्त वह पड़ोस की एक शादी में गई थी. वह घर आई और शाम का खाना बनाया, फिर अपने कमरे में चली गई. इस वक्त काजल की दिमागी हालत क्या रही होगी, इस का सहज अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता. जिस का प्यार उस से कभी छिन गया हो वही समझ सकता है कि काजल पर क्या गुजर रही होगी. रात कोई साढ़े 8 बजे काजल भी रंजीत की तरह फांसी पर झूल गई. मरने से पहले सुसाइड नोट में उस ने खुद के और रंजीत के प्यार का जिक्र किया.

अपनों द्वारा विरोध

शुरू हुआ चर्चाओं का दौर, हरेक की अपनी अलग राय थी. कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने यह कहा कि रंजीत को काजल के बालिग होने तक इंतजार करना चाहिए था. बात सच थी लेकिन ऐसा कहने वाले लोग यह नहीं सोच पाए कि आखिर क्या वजहें थी जिन के चलते रंजीत और काजल को इंतजार करना भी बेकार लगने लगा था. यह बात 10वीं में पढ़ने वाली काजल भी जानतीसमझती थी कि नाबालिग की शादी कानूनन जुर्म होती है.

दरअसल, ये दोनों इंतजार करने को तैयार थे पर इन का प्रेमप्रसंग घरवालों को रास नहीं आ रहा था. रंजीत और काजल का प्यार कोई ढकीमुंदी बात नहीं रह गई थी. जानने वालों को यह भी मालूम था कि कुछ दिनों पहले ही काजल के घरवाले शादी के लिए तैयार हो गए थे पर फिर बाद में मुकर गए थे. यह बात रंजीत के मामा अरविंद ने मानी कि दोनों में प्यार था.

इस वाकए ने अनायास ही फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ की याद दिला दी जिस में हीरो कमल हासन और हीरोइन रति अग्निहोत्री थे. ये दोनों भी एकदूसरे से टूटकर प्यार करते थे पर घरवाले अलगअलग धर्मों, जाति और इलाकों के थे, इसलिए विवाह के लिए तैयार नहीं थे. सपना और वासु पर उन्होंने तरहतरह की बंदिशें व शर्तें लाद रखी थीं जिन पर वे खरे भी उतर रहे थे पर इस के बाद भी बात नहीं बनी तो दोनों ने एकएक कर खुदकुशी कर ली थी.

यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी. आज भी प्रेमियों के बीच इस के किरदारों सपना और वासु की मिसाल दी जाती है और यह आज भी इस लिहाज से मौजूं है कि प्यार के मामले में भारतीय समाज की सोच और संकरापन ज्यों का त्यों 35 साल और उस से भी पहले जैसा है. 35 साल में कितने प्रेमियों ने अपनी जान दी होगी, इस की कोई गिनती नहीं, लेकिन कुछ चर्चित मामले जरूर हैं.

जुदाई का डर

भोपाल के हमीदिया रोड स्थित होटल अमरदीप के एक कमरे में इसी साल 5 जनवरी को ही मनीषा लोवंशी और शुभम पटेल नाम के प्रेमियों ने खुदकुशी कर ली थी. इन दोनों ने जुदाईर् के डर से बाकायदा योजना बना कर साथ मरने की कसम निभाई थी. 24 वर्षीया मनीषा ने इस दिन दोपहर को एक होटल में कमरा किराए पर लिया था. थोड़ी देर बाद शुभम भी होटल के कमरे में आ गया. दोनों ने साथ मिल कर खाना खाया. खाना खाने के बाद उन्होंने जो बातें की होंगी, वो तो उन के साथ गईं पर उन की खुदकुशी कुछ सवाल जरूर छोड़ गई. दोनों ने होटल के कमरे में सल्फास की गोलियां खा लीं.

मनीषा इंदौर की रहने वाली थी जो अकसर भोपाल आया करती थी. यहां उस की जानपहचान अपनी उम्र से 4 साल छोटे शुभम से हो गई. दोनों ने तय कर लिया कि अब साथ जिएंगे और साथ नहीं जी पाए तो मर तो साथ सकते हैं.इस हादसे पर भी खूब सनसनी मची थी जिस में एक बात यह सामने आई थी कि मनीषा की मामीमामा को उस का शुभम से मिलनाजुलना पसंद नहीं था क्योंकि अगर वह शुभम से शादी करती तो इस का असर उन की 3 लड़कियों की शादी पर भी पड़ता  यानी गैरबिरादरी के कम उम्र के लड़के से शादी करने पर पूरे घर की बदनामी होती.

ये दोनों बालिग   थे, चाहते तो शादी कर सकते थे पर इन्हें चिंता और डर जाति व समाज का था. क्यों? इस सवाल का जवाब साफ है कि प्यार करने वाले इस मोड़ पर उसूलों और ख्वाहिशों की चक्की में पिस रहे होते हैं जिस से बाहर निकलने में इन की मदद के लिए कोई न आगे आता है और न ही सही राह दिखाता है. फिर क्या करें? रंजीतकाजल और मनीषाशुभम जैसे प्रेमी. यह सवाल हमेशा से ही मुंहबाए खड़ा है. लेकिन हारते प्यार करने वाले ही हैं जिन का गुनाह सिर्फ इतना सा होता है कि उन्होंने प्यार किया. यह प्यार आज भी चोरी और या गुनाह माना जाता है तो इस के असल जिम्मेदार धर्म के ठेकेदार हैं जो नहीं चाहते कि नौजवान अपनी मरजी से शादी करें, अगर करेंगे तो इन के खोखले उसूल, कायदे, कानून और रीतिरिवाज ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे जो इन की रोजीरोटी का तो बड़ा जरिया हैं ही, साथ ही समाज पर इन का दबदबा भी बनाए रखते हैं.

बीती 18 दिसंबर को मध्य प्रदेश के शिवपुरी में एक और ऐसा ही हादसा हुआ था जिस में 20 वर्षीया माशूका आरती कुशवाह ने अपने 22 वर्षीय आशिक महावीर रजक के खुदकुशी करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली. महावीर चूंकि छोटी जाति का था और आरती ऊंची जाति की, इसलिए इन दोनों की शादी के लिए इन के घर वाले राजी नहीं हो रहे थे. ये दोनों बैराड़ गांव से शिवपुरी पढ़ने आए थे और एकदूसरे को बेइंतहा चाहने लगे थे. महावीर और आरती ने धर्म द्वारा बनाए और फैलाए गए जातिवाद की सजा अपनी जानें दे कर भुगतीं तो किसी ने कुछ नहीं कहा, न ही सोचा कि आखिर इन मासूमों का इस में कुसूर क्या था. कुल मिला कर साबित यह हुआ कि वाकई प्यार करने वाले धर्म, जाति और ऊंचनीच वगैरा कुछ नहीं देखते और ऐसा होना तभी मुमकिन है जब दिलों में प्यार का एहसास जाग जाए.

पर इन्हें सजा क्यों

2 बालिग जब प्यार करते हैं तो सही मानो में उन्हें जिंदगी के माने समझ आते हैं. प्रेमियों को सारी दुनिया हसीन लगती है और उन का कुछ करगुजरने का जज्बा भी सिर उठाने लगता है. उन्हें अपने वजूद का एहसास होता है, जिंदगी का मकसद मिलता है और एक सुकूनभरी जिंदगी गुजारने के लिए वे एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगते हैं. धर्म, जाति और उम्र के बंधन तोड़ने पर ये उतारू हो जाते हैं. लेकिन हकीकत से जब टकराते हैं तो इन की हिम्मत जवाब देने लगती है.

यह हकीकत है कि ये प्यार करने वाले धर्म के ठेकेदारों और समाज के पैराकारों के बिछाए सदियों पुराने जाल में फड़फड़ा कर परिंदों की तरह दम तोड़ देते हैं. किसी का दिल नहीं पसीजता, उलटे प्रचार यह किया जाता है कि देख लो, प्यार करने का अंजाम. कई मामलों में प्रेमी बालिग होते हैं और हर लिहाज से काबिल भी होते हैं लेकिन उसूल तोड़ कर अपने सपनों का आशियाना बनाने की हिम्मत वे नहीं जुटा पाते. इस की वजह सिर्फ यह है कि वे एक बुजदिल बेडि़यों में जकड़े समाज और दुनिया में जीने के बजाय साथ मर जाना बेहतर समझते हैं.

कहने का मतलब यह नहीं कि खुदकुशी करना कोई बहादुरी वाली बात है बल्कि यह है कि प्रेमियों को अपनेआप में दुनिया, धर्म और समाज से लड़ने की हिम्मत जुटानी चाहिए क्योंकि अपनी मरजी के मुताबिक शादी करना और जिंदगी जीना हर किसी का हक है. जिंदगी को बेकार के रीतिरिवाजों व नियमों की बलि चढ़ा कर ये लोग प्यार को कमजोर साबित कर जाते हैं.

आ रहा है बदलाव

एकसाथ खुदकुशी कर मर जाने वालों को समाज में आ रहे बदलावों को भी गौर से देखना चाहिए. आजकल पढ़ेलिखे, खातेपीते घरों में 60 फीसदी शादियां दूसरी जाति में हो रही हैं और हैरत की बात यह है कि राजीखुशी हो रही हैं. मांबाप खुद बच्चों की मरजी से शादी कराने के लिए आगे आ रहे हैं. थोड़ी तकलीफ हालांकि उन्हें भी होती है पर बच्चे खुद को अच्छा पतिपत्नी साबित कर दें, तो वक्त रहते वह तकलीफ भी दूर  हो जाती है. दरअसल, फर्क शिक्षा और माहौल का है जिसे बदलने के लिए जरूरी है कि पहले कैरियर बना कर खुद के पैरों पर खड़ा हुआ जाए, दुनियाजमाने की परवा न की जाए.  इस के लिए जरूरी है कि आशिक और माशूका साथ जीने की कसम खाएं, साथ मरने की बात तो उन्हें सोचनी ही नहीं चाहिए क्योंकि कानून उन के साथ है. धीरेधीरे लोगों का नजरिया भी बदल रहा है पर उस का दायरा अभी सिमटा है, तो जाहिर है नौजवानों के विरोध, गैरत और अच्छे कैरियर से ही और बढ़ेगा.       

इन्होंने जीती जंग

नए साल की शुरुआत प्यार के मामले में ठीकठाक नहीं हुई थी. 3 जनवरी की सुबह भोपाल के कलैक्ट्रेट में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था और उन के इरादे नेक नहीं लग रहे थे. लिहाजा, भारी तादाद में पुलिस बल यहां तैनात था जिसे देख हर कोई हैरत में था कि आखिर यहां कौन सा पहाड़ टूटने वाला है. दरअसल, इस दिन बैंक की एक मुलाजिम रितु अपने प्रेमी विशाल से कोर्टमैरिज करने वाली थी. विशाल चूंकि ईसाई धर्म को मानने वाला है, यह भनक लगते ही कि एक हिंदू लड़की क्रिश्चियन लड़के से शादी करने जा रही है वह भी अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ, तो बजरंगियों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था.

ये लोग रितु और विशाल की शादी न होने देने पर आमादा थे तो इन दोनों ने दृढ़ कर रखा था कि कुछ भी हो जाए, प्यार के इन दुश्मनों के सामने सिर नहीं झुकाना है. शादी से रोकने के लिए रितु के घरवालों ने उसे मारापीटा भी था. इस से साबित हो गया था कि ऐसा गांवदेहातों के अनपढ़ कहे जाने वाले लोगों में ही नहीं, बल्कि पढ़ेलिखे शहरी भी जातपांत, धर्म और ऊंचनीच की गिरफ्त में हैं. खूब हंगामा हुआ लेकिन ये दोनों अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए और रजिस्ट्रार के यहां शादी की दरख्वास्त लगा दी. शादी के दिन भारी गहमागहमी के बीच एडीएम रत्नाकर झा ने रितु को कोर्ट में बुला कर पूछा कि कहीं विशाल और उस के घरवाले तुम्हें बहलाफुसला कर तो शादी नहीं कर रहे हैं और मुमकिन है शादी के बाद तुम्हारा धर्मपरिवर्तन भी करा दें. जवाब में पूरे भरोसे के साथ रितु ने कहा कि वह विशाल से ही शादी करना चाहती है. एडीएम के यह पूछने पर कि तुम्हारे घरवाले नहीं चाहते कि तुम किसी दूसरे लड़के से शादी करो तो रितु ने कहा कि विशाल और मैं ने एकसाथ जीनेमरने की कसम खाई है और इसे मैं उम्रभर निभाऊंगी.

रितु का यह भी कहना था कि वह बालिग है और अपना भलाबुरा बखूबी समझती है. अपने घरवालों के एतराज से उसे कोई सरोकार या लेनादेना नहीं है. उधर, विशाल ने पूरी सख्ती के साथ कहा कि भले ही रितु के मांबाप गुस्सा हों लेकिन वह उन्हें अपने मांबाप की तरह इज्जत देगा और जिंदगीभर रितु का खयाल रखेगा. एडीएम ने बाहर हिंदूवादियों के  जमावड़े की परवा न करते हुए इन दोनों की शादी पर कानूनी मुहर लगा दी. इस मामले से सबक यह मिलता है कि अगर प्रेमी प्यार के दुश्मनों से लड़ने की ठान लें, तो कोई उन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. फिर मरने की बात सोचने का तो सवाल ही नहीं उठता.

क्या करें

प्यार करना गुनाह नहीं है पर उस में साथसाथ या फिर अलगअलग किसी एक का खुदकुशी कर लेना, वह भी डर से, जरूर गुनाह है जिस से इस तरह बचा जा सकता है –

–       शादी का फैसला बालिग होने पर ही लें.

–       शादी से पहले काबिल बनें यानी अपने पैरों पर खड़े हों.

–       कोई भी फैसला लेने से पहले घर वालों को मनाने की हर मुमकिन कोशिश करें.

–       घरवाले न मानें तो रिश्तेदारों और दोस्तों का साथ लेने की कोशिश करें.

–       अगर कोई भी साथ न दे तो कोर्टमैरिज करें और अलग रहें.

बिलाशक ये बातें कहनेसुनने में आसान लगती हैं लेकिन इन पर अगर आसानी से अमल किया जा सकता तो बड़े पैमाने पर प्रेमी खुदकुशी करते ही क्यों? पर मुहब्बत की जंग जीतने के लिए जरूरी है अपनेआप में हिम्मत पैदा की जाए. इस के लिए जरूरी है कि घरपरिवार, जाति और धर्म को ले कर ज्यादा जज्बाती न हुआ जाए और यह भी न सोचा जाए कि अगर अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ शादी कर ली तो उन पर क्या गुजरेगी. सोचें यह कि जब हम एकदूसरे के बगैर वाकई नहीं रह सकते तो हम पर क्या गुजरेगी. खुदकुशी करना आसान काम है, पर इस से सपने पूरे नहीं होते, न खुद के और न ही घरवालों के जो धर्म व जाति के चक्रव्यूह में फंसे अपने बच्चों का भला भी नहीं सोच सकते.

लड़की की चाह

हां, मैं लड़की हूं

चिडि़या हूं बाबुल के आंगन की

अभीअभी सीखा है भरना उड़ान

नाप लूं अपने हिस्से का आसमान

मुझे उड़ने दो

कह सकूं कि हूं मैं

अपनी मरजी के सफर की

न कि हवा है जिधर की हूं उधर की

मुझे उड़ने दो

मां, मैं कली हूं तेरे चमन की

ओढ़ती हूं, बिछाती हूं तेरी कामनाओं को

खुशबू से महकाती हूं हवाओं को

मुझे खिलने दो

एक तबस्सुम के लिए ही सही

जी लूंगी तेरे आंचल की छांव में

फिर चाहे कांटे रहें राह में

मुझे खिलने दो

मेरे हमराह मैं नदी हूं तेरे मन की

हमकदम तेरी हार की, जीत की

मैं छवि समर्पण की, प्रीत की

मुझे बहने दो

किनारों के बीच, किनारों से परे

जहां से निकलूंगी, राह बना लूंगी

हर गम को खुशी हमराह बना दूंगी

मुझे बहने दो

हां, मैं लड़की हूं

मुझे उड़ने दो, खिलने दो

बहने दो, जीने दो.

– अनु

इश्क

इश्क क्या है?

सूने से कागज पर खिलखिलाते

लफ्जों में तुम

इश्क क्या है?

मेरी आंखों की पनीली चमक

में छिपे तुम

इश्क क्या है?

बहती हवा के झोंकों की

खुशबू तुम

इश्क क्या है?

बरसती बूंदों के अनवरत

नृत्य में बसे तुम

इश्क क्या है?

मेरी नींदों में बस कर मुझ में

जागते तुम

इश्क क्या है?

तुम को कुछ पता न होना और

मेरा हो जाना तुम.

– आभा चंद्रा

सफर अनजाना

मेरा छोटा भाई इंजीनियरिंग के बाद कोई परीक्षा देने हैदराबाद जा रहा था. स्टेशन पर उस की मुलाकात एक सज्जन से हुई, जो हैदराबाद जा रहे थे. ट्रेन में भाई उन से वहां के होटल और परीक्षा सैंटर की दूरी की जानकारी लेने लगा. थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए नया शहर है. एतराज न हो तो मेरे घर चल सकते हो. भाई झिझक रहा था. वे सज्जन बोले, ‘‘मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूं. मैं भी परिवार वाला हूं. यह मेरा आईकार्ड है. मैं फलां औफिस में काम करता हूं.’’

वे भाई को स्टेशन से घर ले गए. अगले दिन अपने बेटे के साथ उन्होंने परीक्षा देने भेजा. उन का बेटा परीक्षा के खत्म होने तक वहीं रुका रहा. आज भी उन से भाई और हमारे परिवार का संपर्क बना हुआ है.  

बिब्बन शर्मा

*

मैं परिवार सहित राजस्थान प्रवास पर था. मेरे बेटे प्रसन्न का मुंडन संस्कार करने हम लोग अपने मूल स्थान पर गए थे. वहीं से मेरी पत्नी को बीकानेर जाना था जड़ाऊ गहने खरीदने. हम ने अपने रिश्तेदारों से संपर्क कर बीकानेर के एक विश्वसनीय व्यक्ति का नाम, पता, फोन नंबर वगैरा प्राप्त कर लिया था. वह गहनों का ही कार्य करता था. हम राजस्थान पहली बार गए थे और साथ में मेरे पास रकम भी ज्यादा थी, सो मन में डर बैठा हुआ था. बीकानेर पहुंच कर उस व्यक्ति से संपर्क किया. अनजान शहर, अनजान व्यक्ति और गहनों से संबंधित कार्य. मन में डर लग रहा था. खैर, हम लोग बीकानेर के रेलवे रिटायरिंग रूम में रुके और हम रिकशा ले कर उस व्यक्ति के पते पर पहुंचे. बातचीत हुई, गहने देखे. इसी बीच, उन्होंने पूछा, ‘‘अरे, मैं तो पूछना ही भूल गया कि आप लोगों का सामान कहां है?’’ हम ने उन्हें बताया कि रिटायरिंग रूम में रुके हैं.

उन्होंने कहा, ‘‘नहीं, आप लोग वहां क्यों रुकेंगे? घर में पूरी व्यवस्था है. आप लोगों का भोजन भी तैयार हो रहा है. आप लोगों को यहीं रुकना है, यहीं खानापीना है.’’

वे खुद स्टेशन गए, सामान आदि लाए, घर में रुकाया, शाम को घुमाने ले गए. रात को वहां की प्रसिद्ध चीजें खिलाईं, होटल में भोजन कराया. दूसरे दिन विदा होते समय हमारे लिए घर जाने के लिए टैक्सी की व्यवस्था करा दी. इतना स्नेह, इतना सम्मान, इतनी आवभगत देख कर मैं सोचने को मजबूर हो गया कि क्या आज भी ऐसे लोग हैं.    

आशीष जयकिशन चितलांग्या

राजमार्ग, शराब, कोर्ट

देश के होटल मालिकों का अंदाजा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य राजमार्गों से 500 मीटर की दूरी तक शराब न बेची जाने, न परोसी जाने के फैसले से 1,000 करोड़ रुपए की प्रतिदिन हानि होगी. खुशी की बात है कि इस का लाभ देश के परिवारों को जाएगा. जो काम शराबबंदी नहीं कर सकती, वह काम सुप्रीम कोर्ट ने शराब के सेवन के साथ ड्राइविंग करने से होती दुर्घटनाओं के नाम पर कर दिया. अगर देश के लोग 3,65,000 करोड़ रुपए की शराब केवल सड़कों के किनारे बने होटलों, ढाबों व रैस्तरांओं में गले उतार लेते हैं तो यह गंभीर बात है. इस का नुकसान उन के परिवारों, बच्चों को झेलना पड़ता है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश, जिस की पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो चुकी है, को सरकार अपने आदेशों से नहीं बदलेगी. कुछ राज्य सोच रहे हैं कि राजमार्गों को बदल कर छोटी सड़क घोषित कर दिया जाए, पर यह भी आसान नहीं है. इस में कई महीने लग जाएंगे और शराब पीने की बढ़ती आदत पर लगाम लगेगी.

बिहार और गुजरात जहां शराब की बिक्री बंद है, वहां लोगों को डिप्रैशन की बीमारी हो गई है, ऐसा सुनने को तो नहीं मिला. शराब बंद नहीं हो सकती, न चोरी, न डकैती, न फरेब, न जुआ. पर इन सब को क्या एक श्रेणी में रख सकते हैं कि ये तो आनंददायक हैं, इसलिए समाज इन्हें करने वालों को सहे. शराब पी कर बहकने के साथ ड्राइव करता हुआ शख्स आतंकवादी बम की तरह है जो कहीं भी, कभी भी फूट सकता है. शराब से स्वास्थ्य लाभ तो है ही नहीं. कहने को तो अफीम का अंश भी कुछ दवाओं में  पड़ता है और अलकोहल का भी, पर उसे उन दवाओं को मौज के लिए भरभर कर तो नहीं पिया जाता.

सुप्रीम कोर्ट को चिंता केवल सड़कों की थी, स्वास्थ्य की नहीं. पर उस के फैसले से घरों में होने वाली लाखों दुर्घटनाएं कम हो सकती हैं क्योंकि ज्यादातर पतिपत्नी विवाद शराब के चारों ओर घिरे होते हैं. आजकल फिल्म ‘साहब बीबी गुलाम’ की मीना कुमारी की तरह औरतें भी जम कर शराब का सेवन करने लगी हैं. इसलिए कुछ दिन ही लगाम लगेगी. जब तक ठेके, रैस्तरां, होटल गलियों में या जंगलों में नहीं बनते तब तक तो बचत ही बचत है.

दिन दहाड़े

एक दिन चाची के घर पर एक साधु आया. अपनी आदत से मजबूर मेरी चाची झट से बाहर आईं और साधू को अपना हाथ दिखा कर अपना भविष्य पूछने लगीं. साधू ने चाची का हाथ देख कर उन को बताया कि उन के 2 बच्चे हैं. एक लड़का और एक लड़की. उन के पति शिक्षा विभाग में काम करते हैं इत्यादि. जो भी बातें साधू ने चाची को बताईं वे सब सही थीं. साधू महाराज ने ये सब बताने के बदले में चाची से 500 रुपए लिए.

इस घटना के कुछ दिनों बाद चाची की पड़ोसिन ने उन्हें बताया कि कुछ हफ्ते पहले उन के घर एक अधेड़ आदमी आया था जो चाची के बारे में उन से सारी जानकारी ले रहा था. उन्होंने उस आदमी को चाची के बारे सबकुछ सचसच बता दिया. यह सुन कर चाची को सारा मामला समझ में आ गया. हो न हो, ये अधेड़ आदमी वह साधू ही था जिस ने उन का हाथ देखा था और उन के बारे में सबकुछ बता कर दिनदहाड़े उन से 500 रुपए ऐंठ ले गया. अब चाची का चेहरा देखने लायक था.

सोनी दुबे

*

मेरा ममेरा भाई इंद्रपाल, हाईकोर्ट के एक कार्य से इलाहाबाद गया था. महाकुंभ मेला का समय था. उस ने गंगा नदी के संगम घाट पर स्नान करना चाहा. वह संगम घाट जाने वाले अन्य स्नानार्थियों के साथ रेलवेस्टेशन से एक आटो में बैठ गया. सभी यात्री एकदूसरे से परिचय करने लगे. मेरे भाई ने बताया कि पहली बार लखनऊ से इलाहाबाद वह अकेले ही आया है.

आटो से उतर कर वह घाट के लिए पैदल जाते समय मन ही मन सोचविचार कर रहा था कि वह कहां अटैची रखेगा? कहांकैसे कपड़े उतार कर स्नान करेगा? तभी साथसाथ चल रहे एक युवक ने कहा, ‘‘भाईसाहब, आप भी अकेले हैं और मैं भी अकेला हूं. क्यों न हम दोनों बारीबारी एकएक कर के  स्नान कर लें. घाट पर काफी भीड़ देख अपनी समस्या का यह समाधान उसे अच्छा लगा औैर उस अपरिचित युवक के सुझाव पर सहमत हो गया.’’

वह अपरिचित युवक पहले स्वयं अपने कपड़े, घड़ी उतार कर रुपए व अन्य सामान मेरे भाई इंद्रपाल को सुपुर्द कर स्नान करने चला गया. उस के लौटने पर मेरा भाई भी भी अपनी अटैची व कपड़े उस अपरिचित को सुपुर्द कर स्नान करने चला गया. स्नान कर के जब मेरा भाई अपने सामान के पास पहुंचा, तो वहां से उस के कपड़े और अटैची ले कर वह अपरिचित युवक लापता हो चुका था.       

एस पी रावत

 

मंटो की कृतियों के साथ न्याय करने में विफल ‘मंटोस्तान’

साहित्यिक कृतियों को सेल्यूलाइड के परदे पर उतारते समय फिल्मकार किस तरह उसकी हत्या कर देते हैं, इसका जीता जागता नमूना है राहत काजमी की फिल्म ‘‘मंटोस्तान’’. देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर सआदत हसन मंटो लिखित चार रोंगटे खड़े कर देने वाली विवादास्पद कहानियों ‘‘ठंडा गोश्त’’, ‘‘खोल दो’’, ‘‘आखिरी सैल्यूट’’ और ‘‘असाइनमेंट’’ को मिलाकर फिल्मकार राहत काजमी ने फिल्म ‘‘मंटोस्तान’’ की पटकथा लिखी है. लेकिन जिन्होंने सआदत हसन मंटों व उनकी कहानियों को पढ़ा है, उन्हें पूरी फिल्म देखने के बाद अहसास होता है कि  साहित्यिक कृतियों के साथ पूरा न्याय करने में फिल्मकार विफल रहा है.

फिल्म की कहानियां उन रातों के बारे में है, जो कि हमेशा सिसकियों में ही लिपटी रहती हैं. फिल्म की शुरुआत देश के बंटवारे और पं.जवाहर लाल नेहरू की आवाज के अलावा हिंदुओं द्वारा मुस्लिमों और मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं की मारकाट के दृश्यों के साथ होती है. कहानी पंजाब में है, इसलिए सिख और मुस्लिम ही आमने सामने हैं. बहू बेटियों की इज्जत सरेआम लूटी जा रही है. चारों तरफ डर का माहौल है. लोग अपने घरों से निकलने से डर रहे हैं. पर ईश्वर सिंह (सोएब निकस शाह) जैसे लोग विपत्ति में घिरे लोगों के घर के अंदर घुसकर उनकी हत्या कर उनके गहने व जेवर लूट रहा है. तो उसकी पत्नी कुलवंत कौर (सोनल सहगल) ऐसे जेवर पहनकर खुश होती है, पर जब उसका पति उसे धोखा देकर एक लाश के साथ संभोग करता है, तो इस सच को जानकर वह अपने पति की हत्या कर देती है.

एक कहानी उस मुस्लिम जज (वीरेंद्र सक्सेना) की है, जिसे भरोसा है कि उनका सिख दोस्त उनके घर जरुर ईदी देने आएगा. ईदी देने के लिए जज के दोस्त का बेटा आता है, पर वह अपने सिख साथियों से इस परिवार की रक्षा करने में असमर्थ नजर आता है. उधर सीमा पर भारत पाकिस्तान की सेना डटी हुई है. इनके बीच बातचीत हो रही है कि यह क्या हो गया. तभी पता चलता है कि भारतीय सैनिक राम सिंह का दोस्त जुल्फार (राहत काजमी) पाकिस्तानी सैनिक है. दोनों के बीच बातचीत होती है. बातचीत में ही गोली चल जाती है और अनजाने में राम सिंह मारा जाता है. चौथी कहानी एक मुस्लिम पिता (रघुवीर यादव) की है, जिनकी बेटी के साथ वही सिख बलात्कार करते हैं, जिन्होंने उसे ढूंढ़ कर लाने का वादा किया था.

फिल्मकार ने चारों कहानियों को फिल्म में एक दूसरे के समानांतर चलाया है, इससे दर्शक फिल्म के साथ जुड़ नहीं पाता है और चारों कहानियों का प्रभाव नहीं पड़ता. पटकथा लेखक की कमजोरी के चलते कहानियों का सही ढंग से फिल्म में रूपांतरण नहीं हो सका. फिल्म में विभाजन की त्रासदी व दर्द, तात्कालिक घटनाओं से उपजे विषाद व भय उभर नही पाता है. यह पटकथा लेखक और निर्देशक की कमजोरी का नतीजा है. अन्यथा मंटों की कहानियां पढ़ते समय यह सब इंसान को झकझोर देता है. पाठक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पर यह सब पाठ्य का दृश्य श्राव्य माध्यम में अनुवाद करते समय खो गया. फिल्म जब क्लायमेक्स में पहुंचती है, तो तकनीक और शब्दों की ताकत दोनों ही निर्देशक की पहुंच से दूर हो चुके होते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म में लगभग सभी नौसीखिए कलाकार हैं. जिनसे इस तरह की कहानी के पात्रों के साथ न्याय किए जाने की उम्मीद करना ही बेकार है. फिल्म में वीरेंद्र सक्सेना ने ठीक ठाक अभिनय किया है. रघुबीर यादव भी अपने किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाएं. सोनल सहगल और सोएब शाह ने निराश ही किया है. फिल्म में एक मृत शरीर यानी कि लाश के साथ संभोग करने का अहसास होने पर जिस तरह की क्रिया व प्रतिक्रिया तथा भाव ईश्वर सिंह के चेहरे पर आने चाहिए थे, उसे सोएब शाह बिलकुल नहीं ला पाए. कुछ लोकेशन अच्छी हैं. कैमरामैन के काम को भी सराहा नहीं जा सकता.

128 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मंटोस्तान’’ का निर्माण ‘‘राहत काजमी फिल्मस’’, ‘‘तारिक खान प्रोडक्शन’’ और आदित्य प्रताप सिंह इंटरटेनमेंट ने मिलकर किया है. लेखक व निर्देशक राहत काजमी हैं. फिल्म के कलाकार हैं-रघुवीर यादव, वीरेंद्र सक्सेना, सोनल सहगल, सोएब निकस शाह, रैन बसानेट, राहत काजमी व अन्य.

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