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साफसफाई में अव्वल रंगसापाड़ा

गुवाहाटी, असम से तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ग्वालपाड़ा जिले में एक ब्लौक है बालिजाना और वहीं का एक गांव है रंगसापाड़ा. 88 घरों वाले इस गांव की कुल आबादी महज 5 सौ लोगों की है, लेकिन इन चंद लोगों ने मिल कर जो मिसाल कायम की है, वह आज पूरे असम में किसी विजयगाथा की तरह सुनाई जाती है. दरअसल, रंगसापाड़ा के लोगों ने साफसफाई को आज से 27 साल पहले ही अपना मूलमंत्र बना लिया था. उसी का नतीजा है कि ग्वालपाड़ा जिले को पूरे असम का सब से साफसुथरा गांव होने का खिताब मिला है. रंगसापाड़ा को यह कामयाबी यों ही नहीं मिली. मेहनतमजदूरी करने वाले इस गांव के लोगों में साफसफाई को ले कर इतनी समझ कैसे आई, उस के लिए हमें 1990 के समय में जाना होगा.

गांव के मुखिया रौबर्टसन मोमिन बताते हैं कि दूसरे गांवों की तरह उन के गांव में भी गंदगी रहती थी, लोग नशे का सेवन करते थे, आपस में लड़ाईझगड़ा भी होता था.

एक दिन गांव वालों ने मिल कर सोचा कि गांव की हालत सुधारने की दिशा में कुछ करना चाहिए. उन्होंने एक बैठक बुलाई और आपसी समझ से कुछ सख्त फैसले लिए गए, जैसे कोई भी खुले में शौच नहीं जाएगा, घर के आगे गंदगी नहीं डालेगा और किसी तरह का नशा नहीं करेगा. ये 3 प्रण गांव वालों ने लिए और इन नियमों को तोड़ने की सजा भी तय की गई.

जरा सोच कर देखो कि आज से 27-28 साल पहले पूरब के सुदूर गांव वालों ने नियम तोड़ने पर क्या जुर्माना तय किया था? पूरे 5001 रुपए का. इतना बड़ा जुर्माना उस जमाने में तो क्या आज भी बहुत भारी लगता है.

रौबर्टसन मोमिन बताते हैं कि जुर्माना ज्यादा इसलिए रखा गया कि कोई इस को भरने के डर से नियम न तोड़े. मगर गांव वालों ने इस स्वच्छता मिशन में पूरा साथ दिया और कभी ऐसी नौबत नहीं आई कि किसी पर जुर्माना लगाना पड़ा हो.

उन्होंने आगे बताया कि साल 2000 में विलेज मैनेजमैंट कमेटी बनाई गई. इस में 10 सदस्य हैं. कमेटी का चुनाव हर साल गांव वाले मिल कर करते हैं और यह कमेटी गांव की साफसफाई, भाईचारे और नशे वगैरह पर नजर रखती है.

गारो आदिवासी समाज के इस गांव में पढ़ाईलिखाई की दर भी सौ फीसदी है. यहां सभी लोग अपनी बेटियों को पढ़ाते हैं. 9वीं जमात में पढ़ने वाली सल्ची मोमिन रोजाना साइकिल से 12 किलोमीटर दूर स्कूल में पढ़ने जाती है. उस के गांव में 8वीं जमात तक ही पढ़ाई का इंतजाम है.

बालिजाना ब्लौक की प्रमुख रत्ना देवी बताती हैं कि पहले यहां लोगों ने घरों में ही कच्चे शौचालय बनाए थे. इस के लिए सभी ने मिल कर श्रमदान किया था. सरकार की तरफ से योजना आने पर अब हर घर में पक्के शौचालय बन गए हैं. जल्द ही गांव को पक्की सड़क से भी जोड़ा जाएगा.

सभी लोग मिल कर हफ्ते में एक दिन पूरे गांव की सफाई करते हैं. पीने के पानी के लिए यहां 7 हैंडपंप भी लगे हैं.             

 

बेटी ने किया मौडलिंग के लिए मोटीवेट : रश्मि सचदेवा

मिसेज यूनिवर्स रश्मि सचदेवा को देख कर कोई नहीं कह सकता कि उन की 21 साल की बेटी है. शादी के बाद भी फैशन की दुनिया में वह सब कुछ हासिल किया जा सकता है, जो किसी प्रोफैशनल मौडल का सपना होता है, रश्मि सचदेवा ने इस बात को साबित कर दिखाया है. मिसेज दिल्ली एनसीआर से शुरू हुआ उन का यह सफर मिसेज यूनिवर्स तक जा पहुंचा. आज वे बड़ी सैलिब्रिटी हैं. खुद को फिट रखने की कला तो कोई उन से सीखे. पेश हैं रश्मि से गुफ्तगू:

मौडलिंग का शौक कब से हुआ?

मौडलिंग का तो पता नहीं पर यह शौक था कि पत्रिकाओं में फोटो छपें. यह शौक बचपन से था. मैं ने कुछ फोटो खिंचवाए और उन्हें ले कर ‘सरिता’ पत्रिका के औफिस गई. पहली बार मुझे ‘सरिता’ पत्रिका में यह मौका मिला. उस समय ‘सरिता’ में अंदर छपने वाली शायरी के साथ मेरा फोटो छपा था. मैं ग्रैजुएशन के पहले साल में थी तब शादी हुई. शादी के बाद बेटी हुई. मैं ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. मिसेज दिल्ली एनसीआर में मेरी एक दोस्त हिस्सा ले रही थी. मेरी बेटी ने देखा तो वह बोली कि मैं भी इस में हिस्सा लूं. बेटी की बात का समर्थन पति ने भी किया. वहां से दोबारा मैं ने फैशन की फील्ड में कदम रखा. यह सफर मिसेज इंडिया और मिसेज यूनिवर्स तक पहुंच गया. 

अब फिल्में और टीवी शोज के औफर भी मिले होंगे?

मिसेज यूनिवर्स का खिताब जीतने के बाद सीरियल, फैशन शो, मौडलिंग के बहुत सारे औफर आने लगे. इस के बाद भी मैं ऐक्टिंग में आगे नहीं जाना चाहती. मेरे लिए परिवार को समय देना सब से जरूरी है. ऐक्टिंग में समय बहुत लगता है. सीरियल और फिल्में दोनों ही टाइम टेकिंग काम है. शूटिंग में काफी समय लगता है, इसलिए मैं इस में उलझना नहीं चाहती. मौडलिंग और फैशन शो बहुत समय नहीं लेते. घरपरिवार के साथ इन्हें मैनेज किया जा सकता है. इसलिए ये ही मेरे लिए सब से अच्छे हैं.

आप किसी सुपर मौडल की तरह स्लिम और फिट दिखती हैं. कैसे हासिल किया ये सब?

मैं जिम के बजाय मौर्निंग वाक पर ज्यादा फोकस करती हूं. रोज कम से कम 40 मिनट की वाक करती हूं. डाइट पर यकीन नहीं करती. हैल्दी और क्वालिटी फूड लेती हूं. 40 के बाद महिलाओं में तमाम तरह की हैल्थ प्रौब्लम्स होती हैं. ऐसे में जिम करने से कई बार बौडी को नुकसान हो सकता है. अत: वाकिंग सब से बेहतर है. प्रैगनैंसी के बाद बढे़ वजन को कम करना सब से जरूरी होता है. एक बार वह कम हो जाए, तो फिटनैस हासिल करना सरल हो जाता है.

आप की पसंद और नापसंद क्याक्या है?

मैं थैलेसीमिया फाउंडेशन के साथ जुड़ कर काम कर रही हूं. आगे भी समाजसेवा के लिए अपना वक्त निकालती रहूंगी. मुझे झूठ से बहुत नफरत है. मैं परिवार के साथ सब से अधिक खुशी का अनुभव करती हूं. रीडिंग, कुकिंग और म्यूजिक मेरी पसंदीदा हौबी हैं. मैं ने पंजाबी म्यूजिक अलबम में काम किया है.

अगर आप की बेटी फैशन की फील्ड में जाना चाहे तो आप क्या कहेंगी?

अगर बेटी फैशन की फील्ड को कैरियर के रूप में चुनती है, तो मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. यह फील्ड भी दूसरी फीड्स की ही तरह है. दूर से लोग इस फील्ड के बारे में अलगअलग राय रखते हैं. मुझे तो यह भी बहुत सुरक्षित फील्ड लगी. मैं उन महिलाओं के लिए काम करना चाहती हूं, जो शादी के बाद भी अपने फैशन के कैरियर को आगे बढ़ाना चाहती हैं.

आप हर तरह की फैशनेबल ड्रैस पहनती हैं?

अगर आप फिट हैं, तो आप हर तरह की ड्रैस पहन सकती हैं, इसलिए जरूरी है कि खुद को फिट रखें. वैस्टर्न ड्रैस की बात हो या फिर साड़ी की, फिटनैस और उसे पहनने का तरीका हर जगह माने रखता है. डै्रसिंग सैंस के साथसाथ हेयरस्टाइल, मेकअप और ऐक्सैसरीज को ले कर भी अपडेट रहना चाहिए.        

जिंदगी के हर मोड़ पर परेशानियां झेली हैं : काम्या पंजाबी

‘बिग बौस सीजन 7’ में आने के बाद काम्या अपने फैंस के और भी करीब आ गईं. इन दिनों धारावाहिक ‘शक्ति अस्तित्व के एहसास की’ में प्रीतों का किरदार निभा रहीं काम्या ‘कौमेडी सर्कस’, ‘कौमेडी नाइट्स बचाओ’ जैसे कौमेडी शोज में स्टैंडअप कौमेडी भी कर चुकी हैं, तो ‘बौक्स क्रिकेट लीग’ और ‘बौक्स क्रिकेट लीग 2’ का हिस्सा बन कर क्रिकेट के प्रति अपनी दीवानगी भी बयां कर चुकी हैं. आइए, काम्या के निजी जीवन को टटोलते हैं:

आप ने अपनी लाइफ में कई अप्स ऐंड डाउन देखे हैं. उन से कैसे निबटती हैं?

मैं बेबाक हूं, बिंदास हूं, किसी से नहीं डरती. शायद इसीलिए परेशानियों से निबट लेती हूं. दूसरा सच यह भी है कि मैं ने ये चीजें अपनी मां से सीखी हैं. जब हम छोटे थे तब हमारे घर में भी बहुत परेशानियां थीं, लेकिन मेरी मां बहुत अच्छे तरीके से उन से निबटती थीं. वे हार नहीं मानती थीं, कभी डरती नहीं थीं. उन्होंने कभी गिवअप नहीं किया. मैं ने भी कभी गिवअप नहीं किया और न ही कभी करूंगी. मेरी मां आज भी मेरे जीवन में पिलर की तरह हैं. मैं चाहती हूं कि मैं भी उन की तरह अच्छी मां बनूं.

अपनी बेटी की परवरिश के वक्त किन बातों को ध्यान में रखती हैं?

ब एक मां अपने बच्चे की परवरिश करती है, तो सिर्फ उस की खुशी का ध्यान रखती है, उस की सिक्योरिटी और कंफर्ट का खयाल रखती है. वह उसे दुनिया की सारी खुशियां देना चाहती है और दुनिया की बुराई से हमेशा दूर रखना चाहती है. मैं भी यही चाहती हूं. मुझे खुशी है कि मैं अपनी बेटी की अच्छी दोस्त हूं. वह मुझ से अपनी सारी बातें शेयर करती है, लेकिन मैं उस की अच्छी दोस्त नहीं बन पाई हूं और आने वाले 10 साल बनना भी नहीं चाहती. हां, जब वह बड़ी हो जाएगी तो जरूर बनना चाहूंगी. मैं अभी दोस्त बन कर उसे यह नहीं पता चलने देना चाहती कि उस की मां किन हालात से गुजरी है और आज यहां कैसे खड़ी है. मेरी बेटी मेरी पूंजी है. वह मेरी ताकत भी है और कमजोरी भी.

घर के साथ काम को कैसे मैनेज करती हैं?

अगर हम इस बात को बहुत बड़ा समझें कि मैं घर भी संभाल रही हूं बाहर काम भी कर रही हूं, मैं सुपर वूमन हूं तो बेशक आप को यह काम बहुत बड़ा लगेगा, लेकिन असल में दोनों काम एकसाथ करना मुश्किल नहीं है. बस टाइम मैनेजमैंट आना चाहिए.

बतौर सिंगल मदर बेटी की परवरिश कितनी चैलेंजिंग लगती है?

मैं अपनी बेटी को अच्छी परवरिश दे रही हूं, अच्छे स्कूल में पढ़ा रही हूं. वह सब कर रही हूं, जो पेरैंट्स अपने बच्चे के लिए करते हैं. मैं बतौर सिंगल मदर कभी कमजोर नहीं पड़ती सिवा उस समय जब मेरी बेटी मासूम से सवाल करती है जैसे मेरे फ्रैंड के पापा उन के साथ रहते हैं, तो मेरे क्यों नहीं? उस के ऐसे सवाल मेरे लिए चैलेंजिंग होते हैं. वह इसलिए क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती और उसे सच अभी नहीं बताना चाहती.

अपनी पर्सनल और प्रोफैशनल लाइफ में ज्यादा अहमियत किसे देती हैं?

प्रोफैशनल लाइफ को, क्योंकि मेरा काम मेरा जनून है, मेरी खुशी है. मैं ने जिंदगी के हर मोड़ पर परेशानियां झेली हैं, लेकिन मैं ने काम करना कभी नहीं छोड़ा.

एक पुरुष के लिए दूसरी शादी करना आसान है, लेकिन महिला के लिए क्यों नहीं?

एक औरत पुरुष को दिलोजान से अपनाती है. वह यह कैलकुलेट नहीं करती कि इस की बीवी है या इस का बच्चा है, लेकिन एक पुरुष तलाकशुदा महिला को अपनाते वक्त यह सब कुछ सोचता है. वह ऐसी औरत चाहता है जिस के साथ किसी दूसरे पुरुष का नाम न जुड़ा हो, फिर भले उस की वह तीसरी शादी हो या उस का नाम 10 औरतों के संग जुड़ा हो. इस की वजह यह है कि औरत मन से प्यार करती है और पुरुष दिलोदिमाग से.                 

ओबीसी जातियां : मेहनत छोड़ धर्म की ओर

उत्तर प्रदेश में कुर्मी, हरियाणा व राजस्थान में गुर्जर, जाट और गुजरात में पटेल जाति मेहनती खेतिहर जातियां मानी जाती हैं. ओबीसी से जुड़ी दूसरी जातियां भी खेतीकिसानी में मेहनत करने वाली होती हैं. पर अब ये भी दूसरी जातियों की तरह अपनी मेहनत का काम छोड़ कर आरक्षण के पीछे भागने लगी हैं. सोचने वाली बात यह है कि देश में सरकारी नौकरियां कितनी हैं? क्या सभी को सरकारी नौकरियां मिल सकती हैं? शायद नहीं. इस के बाद भी सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण की मांग बराबर उठ रही है. राजनीतिक दल सरकारी नौकरियों का लालच दे कर इन जातियों को अपने पीछे चलने को मजबूर कर रहे हैं. वे आरक्षण के जरीए वोट हासिल करना चाहते हैं. दरअसल, धर्म और राजनीति का सहारा ले कर समाज में अपना दबदबा बना चुकी ऊंची जातियां इन को धर्म की पालकी ढोने के लिए अपने साथ रखना चाहती हैं. इस का फायदा उठा कर पिछड़ी जातियों को भी पिछड़ी और बहुत पिछड़ी जातियों के खेमे में बांध दिया है.

पहले जहां पर ये जातियां एकजुट हो कर अपने में सुधार का काम करती थीं, वहीं ये अब यह बंटवारे का शिकार हो गई हैं. इन को लगता है कि आरक्षण के जरीए ही इन का भला हो सकता है. आरक्षण के जरीए अब तक दलित जातियों का भला नहीं हुआ, यह समझने के बाद भी आरक्षण की मांग लगातार बढ़ रही है.

लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जिस तरह से पिछड़ी जातियों में गाय और राम मंदिर के नाम पर वोट डाले गए हैं, वह बताता है कि अब पिछड़ी जातियां भी धर्म का सहारा ले कर आगे बढ़ना चाहती हैं. काम कर मेहनत के बल पर अपनी पहचान बनाने वाली ये जातियां अब दूसरों के बल पर आगे बढ़ना चाहती हैं.

केंद्र सरकार ने हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल, राजस्थान में गुर्जर समाज के आरक्षण आंदोलन को शांत करने के लिए ओबीसी आरक्षण को ले कर नया आयोग बनाने का फैसला लिया है. इस के बाद यह आंदोलन अब कुछ समय के लिए स्थगित हो गया है.

केंद्र सरकार ने कहा है कि आरक्षण की बढ़ती मांग को देखते हुए सामाजिक और पढ़ाईलिखाई के तौर पर पिछड़े वर्ग के लिए नया आयोग बनाने का यह फैसला लिया गया है. नए आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया है. इस आयोग में 5 सदस्य, एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष होंगे.

अभी जो पिछड़ा वर्ग आयोग काम कर रहा था, उस को 14 अगस्त, 1993 को बनाया गया था. एक बार फिर सरकार ने नया आयोग बना कर पिछड़ी जातियों के दर्द पर मरहम लगाने का कदम उठाया है.

आजादी के बाद से ही आरक्षण को ले कर हर जाति में मांग बढ़ने लगी थी. नेताओं ने इस को वोट बैंक में बदलने के लिए नएनए तरह के आरक्षण को घोषित करने की शुरुआत कर दी, जिस के चलते अदालतों को भी दखलअंदाजी करने का मौका मिलने लगा. कई बार सरकार द्वारा दिए गए आरक्षण को अदालत ने रद्द भी कर दिया. इस के बाद भी आरक्षण को ले कर राजनीति का खेल चलता रहता है.

साल 1980 में मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि भारत में 52 फीसदी पिछड़ी जातियां हैं. साल 2006 के नैशनल सैंपल सर्वे संगठन ने माना कि भारत की आबादी में पिछड़ों की 41 फीसदी हिस्सेदारी है. इस सर्वे से यह भी पता चला कि पिछड़ी जातियों की 78 फीसदी आबादी गांवों में और 22 फीसदी आबादी शहरों में रहतीहै. देशभर में तकरीबन 2494 जातियां केंद्र सरकार की अन्य पिछड़ी जातियों की लिस्ट में शामिल हैं.

पिछड़ी जातियों में 2 तरह के लोग हैं. इस के लिए ही अन्य पिछड़ा वर्ग बना है. इस वर्ग की हालत काफी खराब है. इस वर्ग के 12 फीसदी से भी कम लोग सरकारी महकमों में तैनात हैं. शहरों में इस वर्ग के लोग 870 रुपए और गांवों में 556 रुपए हर महीने खर्च करते हैं. ऐसे में इस वर्ग के लोग यह मांग बराबर कर रहे हैं कि उन को दिया जाने वाला आरक्षण बढ़ाया जाए.

केंद्र सरकार द्वारा नया पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने के बाद भी पिछड़े वर्ग के नेता खुश नहीं हैं. समाजवादी पार्टी के नेता प्रोफैसर रामगोपाल यादव ने कहा, ‘‘केंद्र सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग बना कर ओबीसी जातियों को बरगलाने का काम कर रही है. यहबहुत ही घातक कदम साबित होगा.’’ दूसरी तरफ मायावती कहती हैं, ‘‘केंद्र सरकार बहुत पहले से आरक्षण का विरोध करती रही है. वह अब इस की समीक्षा कर इसे खत्म करने की पहल करने जा रही है.’’

मायावती को लगता है कि केंद्र सरकार दलित कोटे से ही कटौतीकर के आरक्षण में पिछड़ी जातियों को हिस्सा देने वाली है.मायावती और प्रोफैसर रामगोपाल यादव दोनों को ही यह पता है कि इन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने दलित और पिछड़े दोनों को ही हिंदुत्व की तरफ मोड़ लिया है, तभी उत्तर प्रदेश में भाजपा गठबंधन 325 विधानसभा सीटें जीत कर अपनी सरकार  बनाने में कामयाब हुआ.

भगवा में रंगी सरकार

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना कर भाजपा ने पूरी सरकार को भगवा रंग में रंग दिया है. साथ ही, पिछड़ों को भी सत्ता में ज्यादा हक देने के लिए पिछड़ा वर्ग के केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमत्री का दर्जा दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री डाक्टर दिनेश शर्मा के साथ केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री जातीय संतुलन को साधने के लिए बनाया गया है.

जिस तरह से पिछड़ों का सब से ज्यादा साथ हासिल होने के बाद सरकार को भगवा रंग में रंग दिया गया है, उस से साफ है कि समाज सुधार में लगी पिछड़ी जातियां भी अब समाज सुधार को भूल कर धर्म की पालकी ढोने में जुट गई हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने सरकारी आवास को पवित्र करने के लिए पूजापाठ कराई. वहां पर ‘ओम’ और ‘स्वास्तिक’ के चिह्न बनवाए. आवास के आसपास सड़क तक को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करने की मुहिम चलाई. प्रदेश सरकार के हर मंत्री ने अपने दफ्तर के बाहर ऐसी ही पूजापाठ कराई. इस से साफ हो गया कि सरकार हर जाति और धर्म की सरकार के बजाय भगवा सरकार के अपने नाम को ही मजबूत कर रही है.

यही नहीं, गाय के नाम पर मांस के कारोबार को बंद करने की कोशिश भी शुरू हो गई. प्रदेश में पशुओं को काटने के लिए बने बूचड़खानों को नए लाइसैंस नहीं दिए जा रहे हैं. जो बिना लाइसैंस के चल रहे हैं, उन को बंद कर दिया गया है. कुछ महीनों में ही बहुत से बूचड़खानों के लाइसैंस खत्म होने वाले हैं. ऐसे में सरकार इन को नए लाइसैंस नहीं देगी, तो परेशानी खड़ी हो जाएगी.

यह सच है कि बहुत सी दलित और पिछड़ी जातियां भी मांस के कारोबार से जुड़ी हैं. अब धर्म के पाले में खड़े होने के चलते कोई इन का विरोध नहीं कर पा रहा है. कुछ यही हालत राम मंदिर मसले पर भी है. केंद्र और प्रदेश में सरकार चला रही भाजपा को पता है कि केवल अगड़ी जातियों के भरोसे न तो सरकार बनाई जा सकती है और न ही अपना दबदबा बनाया जा सकता है. ऐसे में जरूरी है कि धर्म के नाम पर पिछड़ी और दलित जातियों को अपने पाले में रखा जाए.

दायरा बढ़ाने की कोशिश

दरअसल, केंद्र सरकार पिछड़ी जातियों को खुश रखने के लिए इन के आरक्षण का दायरा बढ़ाने की कोशिश में है. इस के लिए सरकार ओबीसी की परिभाषा को नए सिरे से तय करने की कवायद कर रही है, जिस से ओबीसी का दायरा बढ़ सके. संविधान में सामाजिक और पढ़ाईलिखाई के मामले में पिछड़े वर्ग को ओबीसी का दर्जा देने का प्रावधान है.

धारा 340 के तहत ओबीसी की भलाई करना सरकार का फर्ज है. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय जातियों को सामाजिक व माली आधार पर उन्हें लिस्ट में शामिल करने या बाहर निकालने का काम करता है. समयसमय पर सरकार इस तरह के फैसले पहले भी करती रही है. साल 1990 में भारत सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियों के लिए शिक्षा और रोजगार के बराबर के मौके मुहैया कराने के लिए सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी.

साल 1992 में इंदिरा साहनी बना भारत सरकार मामले में कोर्ट ने सामाजिक पिछड़ेपन की विचारधारा पर जोर देते हुए या क्रीमीलेयर यानी माली रूप से मजबूत जातियों को आरक्षण से बाहर रखने को कहा. साल 1993 में एक लाख रुपए से ज्यादा सालाना आमदनी वाले ओबीसी परिवारों को क्रीमीलेयर के दायरे में रखा गया. साल 2004 में यह रकम बढ़ा कर ढाई लाख और साल 2006 में साढ़े 4 लाख, और साल 2008 में 6 लाख सालाना कर दी गई.

पिछड़ी जातियों को ले कर सब से पहले साल 1953 में कालेलकर कमीशन बनाया गया. आयोग ने 2399 जातियों को पिछड़ी जातियों में शामिल करने की सिफारिश की. इस आयोग ने तकनीकी संस्थानों में पिछड़ों को 70 फीसदी आरक्षण दिए जाने की बात कही, पर सरकार ने इसे माना नहीं.

साल 1979 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह की अगुआई में नया मंडल कमीशन बनाया गया. इस कमीशन ने 3743 जातियों को पिछड़ी जातियों में शामिल करने की सिफारिश की गई. सरकारी शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में इस आयोग ने ही 27 फीसदी आरक्षण की बात कही. अब मोदी सरकार द्वारा केंद्र ने जिस तरह से नए आयोग को बनाने की बात कही है, उस से लग रहा है कि अगर ओबीसी लिस्ट में कोई वर्ग ऐसा शामिल है, जो सामाजिक और पढ़ाईलिखाई के रूप से पिछड़ा नहीं है, तो उस को ओबीसी की लिस्ट से बाहर किया जा सकता है. साथ ही, ऐसे मौके भी बन सकते हैं कि नई जातियों को इस में शामिल किया जाए. 

हर धर्म में हैं पिछड़े

ओबीसी जातियां हर धर्म में हैं. हिंदू में इन की आबादी 42 फीसदी, मुसलिम में 39 फीसदी, ईसाई में 41 फीसदी, सिखों में 2 फीसदी, जैनों में 3 फीसदी, बौद्धों में 0.4 फीसदी, पारसी में 13 फीसदी, अन्य में तकरीबन 6 फीसदी ओबीसी जातियां हैं.

केंद्र में हर राज्य के लिए पिछड़ा वर्ग की अलग लिस्ट है. इस में शामिल जातियों को संबंधित राज्यों के केंद्रीय शिक्षण संस्थानों और केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण मिलता है. अगर राज्यवार पिछड़ी जातियों की जनसंख्या को देखें, तो सब से ज्यादा 255 जातियां महाराष्ट्र में हैं. इस के बाद ओडिशा में 198, झारखंड में 134, बिहार में 132, उत्तराखंड में 79, उत्तर प्रदेश में 77, दिल्ली में 58 और मध्य प्रदेश में 55 हैं. अभी ओबीसी की जो परिभाषा तय है, वह मंडल आयोग के हिसाब से तय है. अंगरेजों ने अपने समय में जो लिस्ट बनाई थी, उस के आधार पर चल रही है. अब हर तरफ से यह मांग हो रही है कि ओबीसी की परिभाषा नए सिरे से तय की जाए.

केंद्र की भाजपा सरकार ने नए ओबीसी आयोग के ऐलान के बाद यह तय किया है कि नए सिरे से इस को परिभाषित किए जाने की जरूरत है. भाजपा इसे समय की जरूरत मानती है, तो विरोधी दल इसे आरक्षण खत्म करने की चाल मान रहे हैं. देखने वाली बात यह है कि इस तरह के नए आयोग से ओबीसी जातियों को क्या फायदा मिलता है? भाजपा सरकार पर विरोधी दलों का भरोसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि साल 1990 में जब मंडल कमीशन की सिफारिशें केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने लागू की थीं, तो बड़े पैमाने पर उस का विरोध शुरू हो गया था.

भाजपा ने अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को उठा कर मंडल आयोग का जवाब देने के लिए कमंडल की राजनीति शुरू कर दी है. ऐसे में लग रहा है कि भाजपा केवल पिछड़ों को ही नहीं, बल्कि दलित जातियों को भी पार्टी से जोड़ने के लिए धर्म का पाठ पढ़ा रही है. भाजपा ने इन जातियों में भी पूजापाठ को बढ़ा कर नवहिंदुत्व का संचार करने में कामयाबी हासिल की है. इस से ये जातियां अपनेअपने खेमे से दूर हो कर धर्म की पालकी को उठाने को बेचैन दिख रही हैं. अब देखना यह है कि इस से इन को हासिल क्या होता है? क्या सच में समाज में छुआछूत और गैरबराबरी का भाव खत्म हो जाएगा? या फिर एक बार फिर से इन का फायदा उठा कर हाशिए पर धकेल दिया जाएगा?           

‘प्रचंड’ ने दिया मधेशियों को धोखा

मधेशी आंदोलन को नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ जितना दबाने की कोशिश कर रहे हैं, उतनी ही तेजी से उस की आग धधकती जा रही है. 6 मार्च, 2017 को सरकार ने राजविराज में प्रदर्शनकारी मधेशियों पर पुलिस फायरिंग करा कर इस आंदोलन को फिर से हवा दे दी है. इस पुलिस फायरिंग में 7 मधेशी कार्यकर्ताओं की मौत हो गई. उस के बाद भड़के मधेशियों ने नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एमाले) के दफ्तर, भूमि सुधार कार्यालय और नेकपा (एमाले) के सांसद सुमन प्याकुरेल के घर में आग लगा दी.

मधेशी मोरचा के कार्यकर्ताओं ने सप्तसरी जिले के राजविराज, रूपनी, कल्याणपुर, भरदह वगैरह इलाकों के चौकचौराहों पर टायरों में आग लगा कर बवाल मचाया.

दरअसल, 6 मार्च, 2017 को नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली की अगुआई में नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एमाले) की आम सभा थी. उस के बाद मेची से महाकाली तक रथयात्रा निकाली जानी थी.

मधेशी मोरचा रथयात्रा का विरोध कर रहा था. सप्तसरी जिले के राजविराज इलाके में जिस जगह पर आम सभा हो रही थी, उस जगह को मधेशियों ने चारों ओर से घेर लिया. नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी और मधेशी मोरचा के कार्यकर्ता आपस में उलझ गए और तीखी झड़प हो गई. पुलिस ने फायरिंग की, जिस से अफरातफरी पैदा हो गई.

नेपाल के 28 शहरों में मधेशी आंदोलन का पूरा असर दिखने लगा. तमाम स्कूलकालेज, बाजार और कारखाने बंद हो गए. मधेशियों के गुस्से को देखते हुए नेपाल सरकार ने सप्तसरी के कलक्टर उद्धव प्रसाद, एसपी दिवेश लोहानी, सशस्त्र पुलिस बल के एसपी जय बहादुर खड़का और डीएसपी दान बहादुर को आननफानन सस्पैंड कर दिया. इस के बाद भी मधेशियों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ.

नेपाल में संविधान संशोधन विधेयक पेश होने और 5वां अलग प्रांत बनाने के फैसले के खिलाफ मधेशियों ने 9 मार्च, 2017 को प्रदर्शन किया. नया प्रांत बनाए जाने के विरोध में मधेशियों ने बुटबल, रूपनदेही, भैरावाहा, पाल्पा, कपिलवस्तु, गुल्मी, अधरखांची समेत कई इलाकों में प्रदर्शन किए.

मधेशी मांग कर रहे हैं कि प्रांतों की सीमा फिर से तय की जाए और उन्हें नेपाल की नागरिकता दी जाए. पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने पिछले साल अगस्त महीने में प्रधानमंत्री बनने के बाद मधेशियों को उन का हक देने का भरोसा दिया था, उस के बाद मधेशियों ने आंदोलन खत्म किया था. लेकिन अब मधेशियों पर गोलियां बरसा कर ‘प्रचंड’ सरकार ने आंदोलन को फिर गरमा दिया है.

गौरतलब है कि नेपाल में राज्यों के बंटवारे के बाद से ही मधेशी बनाम पहाड़ी का झगड़ा चल रहा है. ओली सरकार के हटने के बाद ‘प्रचंड’ के सत्ता की बागडोर संभालने के बाद हालात धीरेधीरे सामान्य होने लगे थे. इसी बीच ‘प्रचंड’ ने स्थानीय निकायों के चुनाव  का ऐलान कर मधेशियों के गुस्से को भड़का दिया.

मधेशियों की नाराजगी यह है कि उन की मांगों का निबटारा किए बगैर चुनाव कराना जायज नहीं है. मधेशी इसे भेदभाव को बढ़ावा देने वाले संविधान को वैधता दिलाने की साजिश करार दे रहे हैं.

पिछले साल भारत यात्रा के दौरान पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने यह भरोसा दिया था कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया में मधेशियों की मांगों का पूरा खयाल रखा जाएगा और उन से बातचीत के बाद ही संविधान में संशोधन को अंतिम रूप दिया जाएगा. इस के बाद भी मधेशियों की मांगों पर कोई विचार नहीं किया गया.

नेपाल सरकार ने 3 साल पहले अपने संविधान में नए सिरे से सुधार और बदलाव का काम शुरू किया था. उस के तहत नए भौगोलिक सीमांकन भी किए गए. नेपाल की कुल आबादी में 52 फीसदी मधेशी हैं, जो भारतीय मूल के हैं. बड़ी ही चालाकी के साथ नया सीमांकन इस तरह किया गया कि मतदान में मधेशियों की आबादी कोई खास असर नहीं दिखा सके.

नेपाल के कुल 7 राज्यों में से केवल एक राज्य में मधेशियों को बहुसंख्यक दिखाया गया है. मधेशियों का आरोप है कि उन्हें राजनीतिक तौर पर अलग करने और उन्हें उन के हक से वंचित करने की साजिश के तहत नया सीमांकन किया गया है. ऐसा कर के नेपाल ने देश की एक बड़ी आबादी के साथ नाइंसाफी की है और भारत को भी नाराज करने का काम कर डाला है.

मधेशी मोरचा ने 8 मार्च, 2017 को सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया. यूनाइटेड डैमोक्रेटिक मधेशी फ्रंट ने 6 मार्च, 2017 को बालुवाटर में प्रधानमंत्री के आवास पर पुष्पकमल  दहल ‘प्रचंड’ से मुलाकात कर 5 सूत्री मांगों का मैमोरैंडम सौंपा.

नवंबर, 2013 में हुए चुनाव के बाद नेपाल की 601 सदस्यीय संविधान सभा में मधेशी पार्टियों के कुल 39 सदस्य हैं और वे ‘प्रचंड’ सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं. इन में मधेशी पीपुल्स राइट्स फोरम के 14, तराई मधेशी डैमोक्रेटिक पार्टी के 11, मधेशी जन अधिकार फोरम के 10, राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी के 3 और मधेशी नागरिक फोरम का एक सदस्य था.

साल 2008 के संविधान सभा के चुनाव में मधेशी पार्टियों के सदस्यों की तादाद 83 थी. नेपाल के झापा, मोरंग, सप्तरी, सुनसरी, सिरहा, परसा, बारा, धनुषा, महोतरी, सरलाही, रूटहाट, नवलपरासी, रूपादेही, कपिलवस्तु, चितवन बांके, बदरिया, कंचनपुर, खेलाली जिलों में मधेशियों की भरमार है.

नेपाल के कुल 75 जिलों में से 22 जिलों में मधेशियों की आबादी ज्यादा है. नेपाल के बीरगंज में पिछले 32 सालों से रह रहे मधेशी केशव यादव कहते हैं कि नेपाल सरकार हमेशा मधेशियों को बाहरी मानती रही है.

गौरतलब है कि पिछले तकरीबन 50 सालों से मधेशी ‘एक मधेश एक प्रदेश’ की मांग करते रहे हैं. मधेशियों की आबादी 52 फीसदी है, लेकिन वे नेपाल के कुल क्षेत्रफल में से 17 फीसदी इलाके में ही रहते हैं और उन के बूते ही नेपाल सरकार

को मिलने वाले कुल राजस्व का 80 फीसदी हिस्सा आता है.

नेपाल की कुल आबादी 2 करोड़, 95 लाख है, जिस में से डेढ़ करोड़ मधेशी हैं. नेपाल में कुल 103 जातियां हैं, जिस में 56 जातियां मधेशियों की हैं. इन में यादव, ब्राह्मण, कुर्मी, राजपूत, कुशवाह, वैश्य, कायस्थ, मल्लाह, हलवाई, केवट, लोहार, माली, कुम्हार, तेली, धोबी, हरिजन, पासवान और मुसहर जातियां खास हैं.

इन जातियों में सब से ज्यादा 4 फीसदी यादव हैं. उस के बाद 1.3 फीसदी हरिजन, 1.35 फीसदी तेली, 1.2 फीसदी कुशवाह और एक फीसदी कुर्मी जाति के लोग हैं.

नेपाल के नए संविधान में देश के कुल 75 जिलों में से केवल 7 जिलों को ही एक मधेश प्रदेश बनाने और 7 राज्यों को नए सिरे से बनाने के लिए राजनीतिक समिति बनाने की बात कही गई है. इसी को ले कर मधेशी पार्टियां बिदकी हुई हैं.

मधेशी नेता उपेंद्र यादव कहते हैं कि नेपाल सरकार की मंशा मधेशियों को राजनीतिक हाशिए पर रखने की है, इसी वजह से मधेशियों को उन के हक देने में अड़ंगे लगाती रही है. नेपाल की संसद ने 3 अगस्त, 2016 को माओवादी सुप्रीमो पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ को दूसरी बार नेपाल का प्रधानमंत्री चुन लिया था.

तराई मधेशी राष्ट्रीय अभियान के संयोजक जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि नेपाल में संविधान सभा का कोई मतलब ही नहीं रह गया है.

नेपाल के नए संविधान में मधेशियों को उन का हक देने के बजाय हाशिए पर डालने की कोशिश की गई है. इस से नेपाल का एक बार फिर से हिंसा की आग में झुलसना तय है.             

चंबल की पहचान बदलने को बेताब शाह आलम

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा के बीच स्थित चंबल घाटी सदा से ही लोगों में दिलचस्पी का विषय रही है. इसकी वजह यहां रहने वाले खूंखार डकैत हैं. चंबल केवल डकैतों की वजह से ही मशहूर नहीं है. इसकी और भी खासियत है. चंबल को करीब से देखने समझने और यहां की दशा लोगों तक पहुंचाने के लिये युवा सोशल एक्टिविस्ट शाह आलम ने साइकिल से यहां की लंबी यात्रा की. साइकिल से चंबल की करीब 2300 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर चुके शाह आलम अब चम्बल के बीचों-बीच 25 मई से जन संसद शुरू करने जा रहे हैं. 25, मई 1857 में यहां से शुरू होने वाली जनक्रांति के 160 साल पूरे होने पर शुरू हो रही जनसंसद के दौरान चम्बल घाटी के अवाम, एक्टिविस्ट व जन प्रतिनिधि का जमावड़ा होगा.

जन संसद के दौरान चम्बल की समस्याओं को उजागर किया जाएगा. जनसंसद में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान राज्यों के लोग शरीक होंगे. कई सत्रों में चलने वाली जन संसद में लोगों के बीच से एक-एक सत्र के लिए अलग-अलग जन सांसद चुना जाएगा, जो अपने इलाके की समस्याएं रखेंगे. इन समस्याओं का दस्तावेजीकरण कर सरकार व प्रशासन के सामने रखा जायेगा. हजारों किलोमीटर यात्रा करने वाले देश के पहले एक्टिविस्ट बने शाह आलम बीहड़ांचल को ‘नर्सरी ऑफ सोल्जर्स’ बताते हैं. वह कहते हैं कि चम्बल डकैतों  के लिए ही जाना गया, लेकिन यह धारणा गलत है. चम्बल ने देश को इतने क्रांतिकारी दिए हैं कि इसे ‘नर्सरी ऑफ सोल्जर्स’ कहना बड़ी बात नहीं होगी.

शाह आलम कहते है कि 25 मई, 1857 को चम्बल की मशहूर पचनदा (पांच नदियों का संगम) से छापामार जंग की शुरुआत हुई थी. 25 मई को इस क्रांति के 160 साल पूरे हो रहे हैं. क्रांतिकारियों ने इसी इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ सामूहिक योजनायें बनाई. चम्बल की घाटी के बीहड़ो को क्रांतिकारियों ने तैयारी के लिए सबसे अहम स्थान बनाया. इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि जैसी तैयारी यहां क्रांतिकारियों ने की, उत्तर भारत में वैसी तैयारी कहीं और नहीं हुई. यहां सैकड़ों क्रांतिवीरों ने अंग्रेजों सेना से लड़ते हुए शहादत दी थी.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की फौज में सबसे ज्यादा सिपाही चम्बल की घाटी के थे. शहीद आजम भगत सिंह को चम्बल के जंगल पसंद थे. इसके साथ ही उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य के नाम से विख्यात गेंदालाल दीक्षित, राम प्रसाद बिस्मिल, काशीबाई, जंगली-मंगली बालिमिकी, जन नायक गंगा सिंह, तेजाबाई, शेर अली नूरानी जैसे दर्जनों क्रांतिकारी चम्बल की घाटी को ट्रेनिंग सेंटर बनाया. उन्होंने बताया कि सन 1916 में बने उत्तर भारत के गुप्त क्रांतिकारी दल ‘मातृदेवी’ की सेन्ट्रल कमिटी के 40 सदस्यों में से 30 चम्बल के बागी ही थे. चम्बल में आजादी का बिगुल लगातार बजता रहा.

आजादी के बाद चम्बल की समस्याओं और अत्याचार ने डकैतों को जन्म दे दिया. डकैतों का पनपना आजाद भारत की सरकार की बड़ी खामी थी. देश और दुनिया ने चम्बल को डकैतों के रूप में जान लिया और चम्बल के गौरवशाली इतिहास को भुला दिया गया. शाह आलम ने बताया कि इसी उपेक्षा के कारण चम्बल समस्याओं की खान बन चुका है. चम्बल को उसका हक और पहचान दिलाने के लिए पांच नदियों के संगम पचनदा पर जनसंसद होगी. इसके साथ ही बीहड़ के रहवासियों के साथ जालौन के पचनद, जगम्मनपुर में घाटी की मौजूदा समस्याओं पर मंथन होगा. यहां चुने गए जनसांसद जो अपने इलाके की जन समस्याओं को प्रमुखता से सदन के बीच रखेगा. जनसंसद के दौरान चम्बल घाटी के तीन राज्यों औरैया, इटावा, जालौन, भिन्ड, मुरैना, धौलपुर के बीहड़ों में कठिन जीवनयापन से जूझ रहे ज्वलंत सवालों से पटल को रुबरु करायेंगे.

बस्ती जिले के नकहा गांव में जन्मे शाह आलम अयोध्या के निवासी हैं. अवध यूनिवर्सिटी और  जामिया सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद एक दशक से ज्यादा समय से दस्तावेजी फिल्मों का निर्माण किया. सामाजिक सरोकारों के लिए 2002 में चित्रकूट से अयोध्या तक, 2004 मेहंदीगंज बनारस से सिंहचर तक, 2005 में इंडो-पाक पीस मार्च दिल्ली से मुल्तान तक, 2005 में ही सांप्रदायिक सौहार्द के लिए कन्नौज से अयोध्या, 2007 में कबीर पीस हॉर्मोनी मार्च अयोध्या से मगहर, 2009 में कोसी से गंगा तक बिहार में पुनर्वास का हाल जानने के लिए पैदल यात्रा की. शाह आलम 2006 से ‘अवाम का सिनेमा’ के संस्थापक हैं. ‘अवाम का सिनेमा’ के देश में 17 केन्द्र हैं. जहां कला क विभिन्न माध्यमों को समेटे एक दिन से लेकर हफ्ते भर तक आयोजन अक्सर चलते रहते हैं. अवाम का सिनेमा के जरिये वह नई पीढ़ी को क्रांतिकारियों की विरासत के बारे में बताते हैं. शाह आलम ने बीते साल मई, जून, जूलाई के महीने में 2300 किमी से अधिक दूरी सायकिल से तय करके चंबल के बीहड़ो का दस्तावेजीकरण किया था.

राजनीति में आने को बैचेन रजनीकांत की चिंता

तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत राजनीति में आ रहे हैं, यह सवाल अपनी जिज्ञासा खो चुका है, अब सुगबुगाहट यह है कि रजनीकांत कब राजनीति में आ रहे हैं और इससे भी ज्यादा अहम चर्चा इस बात पर हो रही है कि वे भाजपा की डोली में बैठकर दुल्हन बनकर राजनीति के आंगन में पांव रखेंगे या फिर खुद अपनी नई पार्टी बनाकर दूल्हा बनकर बारात निकालेंगे. रजनीकांत जो भी फैसला लें तमिलनाडु की जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ना, जो पलक पांवड़े बिछाकर अपने इस हीरो के फैसले पर से घूंघट उठने का इंतजार कर रही है और मुंह दिखाई के शगुन में थोक में वोट न्योछावर करने तैयार बैठी है.

बीती 17 मई को चेन्नई में रजनीकांत ने अपने प्रशंसकों के लिए दरबार लगाया, तो पूरे तमिलनाडु में अघोषित अलर्ट हो गया था कि वे आज अपने पत्ते खोल सकते हैं लेकिन रजनीकांत का आठ साल बाद चहेतों का हुजूम जुटाने का मकसद कुछ और था, उन्होंने पहली बार राजनीति में आने की बात टरकाई नहीं, बल्कि उसे हां का आकार देते कहा कि राजनीति में आना कोई बुरी बात नहीं है, अगर भगवान चाहता है तो वे राजनीति में आएंगे  और अगर वे राजनीति में आए तो राजनीति से पैसा बनाने वालों से दूर रहेंगे.

अतीत में झांकते हुए उन्होंने बड़ी मासूमियत से माना कि 21 साल पहले डीएमके गठबंधन का समर्थन कर उन्होंने भूल की  थी. बकौल रजनीकांत, वह एक राजनैतिक दुर्घटना थी. तभी से रजनीकांत के राजनीति में आने की अटकलें लगना शुरू हो गईं थीं पर उन्होने दौबारा ऐसे कोई संकेत नहीं दिये तो उन पर विराम भी लग गया. अम्मा के नाम से मशहूर जयललिता की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी अपनी पार्टी एआईएडीएमके संभाल कर रखने में नाकाम साबित हो चुके हैं और कांग्रेस व भाजपा यहां कहने भर को हैं, ऐसे में सारा फायदा डीएमके के मुखिया  एम करुणानिधि को न मिले, इस बाबत दक्षिण में पैर जमाने की कोशिश में जुटी भाजपा की नजरें और उम्मीदें रजनीकांत पर टिकी हैं तो बात कतई हैरत की नहीं.

पिछले तीन सालों में भाजपा के कई दिग्गज नेताओं और रजनीकांत की मुलाकातों से इन अटकलों को और बल मिला कि रजनीकांत भाजपा में जा सकते हैं. इस बाबत भाजपा के लिए हाड़ तोड़ मेहनत कर रहे आरएसएस को भी एतराज नहीं है जो किसी भी तरह दक्षिण भारत के इस अहम सूबे को भी भगवा रंग में नहला देना चाहता है, क्योंकि एम जी रामचंद्रन और जयललिता के अलावा डीएमके मुखिया करुणानिधि ने भी कभी उसे तमिलनाडु में पसरने का मौका नहीं दिया.

तमिलनाडु में दलित हितों वाला द्रविड़ आंदोलन 60 के दशक में इस तरह परवान चढ़ा था कि उसका असर और धमक जयललिता युग तक बरकरार रहे, फर्क इतना भर आया था कि जयललिता ने दलित की जगह गरीब शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था और उनकी तमाम कल्याणकारी योजनाएं सिर्फ इन्ही गरीब दलितों को ध्यान में रखते बनाई जाती थीं. गरीबों के लिए सस्ते खाने वाली अम्मा थाली की नकल मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ यूं ही नहीं कर रहे हैं.  ये दोनों भी अम्मा की तर्ज पर हीरो बन जाना चाहते हैं, यह और बात है कि इन दोनों में ही जयललिता सरीखा जज्बा और प्रशासनिक पकड़ दोनों का अभाव है. तमिलनाडु की राजनीति मे पिछले पांच दशकों से फिल्म स्टार्स भगवान की तरह पुजते आए हैं, उनकी पर्दे की चमत्कारी छवि को ही यहां का वोटर असली मानता है, इस लिहाज से रजनीकांत एक ऐसे इकलोते अभिनेता हैं जो इस पैमाने पर सौ फीसदी खरे उतरते हैं.

सोशल मीडिया पर उनके चमत्कारी किस्से रामायण के एक शक्तिशाली पात्र हनुमान की तरह एक से दूसरे मोबाइल फोन में छलांग लगाते रहते हैं जो किसी भी असंभव को संभव बना देने की कूबत रखता है. फिर दिक्कत क्या है या पेंच कहां उलझा है, जो रजनीकांत भाजपा के जरिये राजनीति में आने पूरी तरह हां अभी नहीं भर रहे, जबकि यह बात किसी सबूत की मोहताज नहीं कि तमिलनाडु के अगले सीएम वे ही प्रोजेक्ट किए जाएंगे और वे अगर अभी केंद्र में मंत्री पद मांगें, तो वह भी भाजपा उन्हें थाल में सजाकर देगी.

यह सवाल दरअसल में एक गुत्थी या पहेली भी है कि क्या रजनीकांत की नजर में भाजपा अभी भी सिर्फ सवर्णों और सामंतों की पार्टी है, जो दिखावे के लिए दलितों को गले लगाकर फिर से वर्ण व्यवस्था लोकतान्त्रिक तरीके से ही सही लागू करना चाहती है और उसके मन में दलित गरीबों के लिए वही जगह है जो हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वर्णित है. लाख टके का सवाल यह भी मौजू है कि क्या 66 वर्षीय कम शिक्षित रजनीकांत दलित चिंतक पैरियार (इरोड वेंकट नायकर रामास्वामी) की तरह इतना सोच पा रहे होंगे कि उत्तर और दक्षिण भारत के दलितों की सामाजिक स्थिति में जमीन आसमान का फर्क है और अगर सत्ता उनके जरिये भाजपा की मुट्ठी में आई तो क्या गारंटी है कि तमिल ब्राह्मण फिर से पूरा निजाम अपने कब्जे में नहीं ले लेंगे.

जयललिता खुद ब्राह्मण थीं पर दलितों की वैसी ही पेरोकर थीं जैसे उत्तरप्रदेश में बसपा के संस्थापक कांशीराम हुआ करते  थे. जयलललिता इस वजह से भी  पुजतीं थीं कि वे मूलतया सवर्ण विरोधी मानसिकता वाली महिला हो गईं थीं और पौराणिक वादियों को उनके रहते तमिलनाडु में नो एंट्री का बोर्ड लटका मिलता था, जैसा इन दिनों पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने लटका रखा है, इसीलिए  बंगाल में हिंसा अब कट्टर  हिंदूवादियों और उदार  हिंदूवादियों के बीच होने लगी है. दूसरी दिक्कत रजनीकांत का मराठी मूल का होना भी है. इस मुद्दे पर अंदरूनी तौर पर कई सर्वे और मीटिंग हो चुकी हैं, जिनका निष्कर्ष यह निकला कि यह जन्म कुंडली के आंशिक मंगल जैसी समस्या है जिसकी वक्त रहते ग्रह शांति करा दी जाए तो जातक दोष मुक्त हो जाएगा. लेकिन खुद रजनीकांत इस दोष को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं यह उनके बयानों से झलकता भी है.

बड़बोले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 15 मई को इस मुद्दे को तूल देने की कोशिश भी यह कहते की थी कि रजनीकांत बेंगलुरु से आए मराठी हैं, वे कोई तमिल नहीं हैं, वे केवल मन बहलाने के लिए हैं और कई दलों से जुड़े रहने के कारण उनकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है, यानि वे कट्टर हिन्दुत्व से परहेज करते हैं. हालांकि इस बयान पर लीपापोती करते उन्होंने इसे मज़ाक बताया था. साफ दिख रहा है कि भाजपा और रजनीकांत की कुण्डली पूरी तरह नहीं मिल रही है और दोनों एक दूसरे को लेकर शंकित हैं. ऐसे में भले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह , केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और आर एस एस चिंतक एस गुरुमूर्ति रजनीकांत पर डोरे डालते रहें, खुद रजनीकांत को राजनीति में आकर वास्तविक सुपरमेन बनने की अपनी ख्वाहिश पूरी करने से पहले हजार दफा सोचना पड़ेगा कि तमिलनाडु के हित वे कहां सुरक्षित रख पाएंगे, भाजपा में जाकर  या फिर खुद की पार्टी बनाकर.

गोल्ड खरीदने के गोल्डन रूल्स

भारत में गोल्ड को लग्जरी से ज्यादा इन्वैस्टमैंट के रूप में देखा जाता है. फिर सोने की लगातार बढ़ती कीमत ने इस बात को साबित भी कर दिया है कि गोल्ड निवेश का एक अच्छा जरीया है.

फाइनैंस सलाहकार अभिनव गुलेचा कहते हैं, ‘‘गोल्ड में निवेश करने से महिलाओं के दोनों शौक पूरे हो जाते हैं. पहला उन के गोल्ड कलैक्शन में इजाफा हो जाता है और दूसरा उन की इन्वैस्टमैंट की ख्वाहिश भी पूरी हो जाती है.’’

सोने में निवेश के कई विकल्प मौजूद हैं. गहनों के रूप में या फिर सिक्कों के रूप में सोना खरीदने के अलावा भी सोने में और कई तरीकों से पैसे लगाए जा सकते हैं. इन के अलावा सोने में निवेश के लिए म्यूचुअल फंड प्रारूप भी उपलब्ध है. गोल्ड ईटीएफ और गोल्ड फंड भी अच्छे विकल्प हैं. यह निवेशक की अपनी सहूलियत पर निर्भर करता है कि वह इन में से किस विकल्प को चुनता है. आइए, इन विकल्पों पर एक नजर डालते हैं.

गोल्ड ईएमआई स्कीम

गोल्ड में निवेश का यह सब से आसान तरीका है. आजकल हर ज्वैलरी ब्रैंड गोल्ड पर तरहतरह की स्कीमें ला रहा है. जैसे 12 महीनों में 11 किस्तें ग्राहक भरे और 12वीं किस्त ज्वैलरी ब्रैंड खुद भरेगा. यदि आप 1,000 की किस्त हर महीने भरें तो 12वें महीने एक निश्चित तिथि पर आप 12,000 की कोई भी गोल्ड ज्वैलरी ले सकते हैं. लेकिन अभिनव की मानें तो यह ज्यादा फायदे का सौदा नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘इस तरह की स्कीम तब फायदेमंद होगी जब आप को अपना ज्वैलरी कलैक्शन बढ़ाना हो, क्योंकि इस स्कीम से आप को जमा की गई किस्तों के मूल्य की ज्वैलरी ही मिलेगी. यदि आप इसे पैसों में कन्वर्ट कराना चाहें तो भी नहीं करा सकतें.’’

गोल्ड फ्यूचर्स

गोल्ड फ्यूचर्स के जरीए सोना खरीदने के लिए पूरी राशि की जरूरत नहीं पड़ती. इस प्रक्रिया में मार्जिन मनी से काम चल जाता है. किसी भी वक्त सौदा किया जा सकता है और समाप्त भी. इस में लिक्विडिटी की समस्या नहीं होती. आप चाहें तो कैश में सौदे का निबटान कर दें या फिर इस की फिजिकल डिलिवरी ले सकते हैं.

आप के पास यह सुविधा भी होती है कि आप अगली ऐक्सपायरी में सौदे को रोलओवर कर लें. लेकिन इस के कुछ नुकसान भी हैं. पहली बात तो यह कि फ्यूचर्स में जोखिम अधिक होता है. इस के अलावा सौदे की ऐक्सपायरी से पहले आप को निर्णय लेना ही होता है. गोल्ड फ्यूचर्स में खरीदारी और बिक्री दोनों ही वक्त ब्रोकरेज देना पड़ता है. इसलिए इस प्लान में इन्वैस्ट करने से पहले किसी अच्छे इन्वैस्टमैंट सलाहकार से राय जरूर ले लें.

गोल्ड फंड

गोल्ड फंड म्यूचुअल फंड का ही एक रूप है, जिस में अंतर्राष्ट्रीय फंडों के जरीए सोने की माइनिंग से संबंधित कंपनियों में निवेश किया जाता है. गोल्ड फंड में निवेश के कई फायदे हैं. यह इलैक्ट्रौनिक फौर्म में रखा होता है, जिस से इस की हिफाजत की चिंता नहीं रहती है. इस तरह की योजनाओं में निवेश करने से निवेशकों को फंड मैनेजर के कौशल और सक्रिय फंड प्रबंधन का फायदा मिलता है.

अभिनव बताते हैं, ‘‘गोल्ड फंड का सब से बड़ा फायदा यह है कि इसे बगैर डीमैट अकाउंट के औपरेट किया जा सकता है और इस में एसआईपी (सिप) सुविधा भी है. सिप के जरीए छोटी रकम से भी निवेश किया जा सकता है. इस प्लान में आप महज कुछ सौ रुपए की राशि से भी सोने में निवेश कर सकते हैं. गोल्ड फंड में सिप से मिलने वाले रिटर्न पर कोई संपत्ति कर भी नहीं लगता. लेकिन इस की कुछ सीमाएं हैं. कौस्ट औफ होल्डिंग के हिसाब से गोल्ड फंड ईटीएफ से थोड़ा महंगा पड़ता है.’’

गोल्ड ईटीएफ

गोल्ड ईटीएफ वे म्यूचुअल फंड होते हैं, जो सोने में निवेश करते हैं और शेयर बाजार में लिस्टेड होते हैं यानी इन के जरीए सोने में निवेश करने के लिए यह जरूरी है कि आप के पास डीमैट और ट्रेडिंग खाता हो. हालांकि यह घरेलू महिलाओं के लिए थोड़ा कठिन है, लेकिन कामकाजी महिलाओं के लिए डीमैट अकाउंट और ट्रेडिंग अकाउंट खुलवाना आजकल कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन अभिनव की मानें तो गोल्ड ईटीएफ में निवेश करना भले ही आसान है, लेकिन इस की भी अपनी सीमाएं हैं.

वे बताते हैं, ‘‘इस के लिए आप को ब्रोकरेज चार्ज और फंड मैनेजमैंट चार्ज देना होता है. गोल्ड ईटीएफ में निवेश करने वाले निवेशकों को फंड मैनेजर के कौशल और सक्रिय फंड प्रबंधन का भी कोई फायदा नहीं मिल पाता.’’

पूरे भारत में लोग दीवाली पर सोने की शौपिंग करते हैं. अगर आप भी इस बार दीवाली पर सोना खरीदने का मूड बना रही हैं, तो कुछ बातों का खयाल जरूर रखें. खासतौर पर गोल्ड की क्वालिटी और प्योरिटी का वरना लेने के देने पड़ सकते हैं. आइए, जानते हैं इन जरूरी बातों को:

कैरेट रेटिंग चैक करें

यह सभी को पता होता है कि गोल्ड की प्योरिटी कैरेट से मापी जाती है. कैरेट के मुताबिक ही गोल्ड की कीमत तय की जाती है. प्योर गोल्ड 24 कैरेट में आता है, लेकिन यह बेहद सौफ्ट होता है, इसलिए ज्वैलरी बनाने के लिए इस में कुछ इंप्योरिटी डाली जाती है, जिस से 24 की जगह 22 कैरेट गोल्ड से ज्वैलरी तैयार होती है.

कई बार ज्वैलरी खरीदते वक्त जौहरी ग्राहक को 24 कैरेट गोल्ड कह कर ज्यादा पैसे ऐंठ लेता है जबकि ज्वैलरी हमेशा 22 कैरेट या 18 कैरेट गोल्ड से ही तैयार की जाती है. गोल्ड में कैरेट के हिसाब से ही ज्वैलरी की कीमत लगाई जाती है. इसलिए ज्वैलरी खरीदते समय इस बात का पूरा खयाल रखें कि आप कितने कैरेट की गोल्ड ज्वैलरी ले रही हैं और फिर उसी हिसाब से पेमैंट करें.

हौलमार्क चार्ज

हौलमार्क के गहने खरीदते वक्त आप को थोड़ी कीमत अधिक देनी होगी. उस में इस परीक्षण की लागत को भी शामिल किया जाता है. कई बार हौलमार्क के गहनों की कीमत भी अलगअलग दुकानों पर अलगअलग हो सकते है. इसलिए कई जगहों पर पता कर के ही सही जगह से हौलमार्क ज्वैलरी खरीदें.

गोल्ड रेट जरूर चैक करें

आप जब गोल्ड खरीदने जाएं तो उस दिन गोल्ड का रेट क्या है, यह जरूर पता कर लें. इस के बाद पेमैंट करते वक्त भी गोल्ड की कीमत जरूर पूछें, क्योंकि गोल्ड की कीमत घटतीबढ़ती रहती है.

मेकिंग चार्ज

मेकिंग चार्ज अलगअलग गहनों के मुताबिक अलगअलग होता है, जिसे ज्वैलर्स सोने के गहने बनाने के मेहनताने के रूप में लेते हैं. ऐसे में ज्वैलरी खरीदते वक्त अलगअलग जगहों के मेकिंग चार्ज की जानकारी जरूर लें ताकि आप के गहनों की कीमत में कम से कम मेकिंग चार्ज हो, क्योंकि जब भी आप गहने बेचेंगी मेकिंग चार्ज की कीमत का नुकसान आप को ही उठाना पड़ेगा. ऐसे में कम मेकिंग चार्ज वाली खरीदारी ही फायदे का सौदा है. हां, ध्यान रखें आप सोने में जितने अधिक नगों और डिजाइनों की मांग करेंगी, उन पर मेकिंग चार्ज भी उतना ही अधिक होगा और फिर सोने की शुद्धता भी उतनी ही कम होगी.

रिटर्न पौलिसी जान लें

ज्वैलर या सेल्समैन से रिटर्न पौलिसी और प्रामाणिकता के सर्टिफिकेट के बारे में जानकारी जरूर ले लें. हो सकता है कल को आप का अपनी ज्वैलरी बेचने का मन बन जाए, तब यह सर्टिफिकेट आप के काम आएगा. दूसरे, इस सर्टिफिकेट से यह भी पता चल जाएगा कि आप ने जो गोल्ड खरीदा है वह असली है. इस बात को याद रखें कि प्योर गोल्ड रिटर्न के दौरान लेबर चार्जेज के अलावा दूसरा कोई चार्ज नहीं काटा जाता.

केकेआर का यह खिलाड़ी बन गया देवदास

कोलकाता नाइट राइडर्स आईपीएल की बेहतरीन टीमों में से एक मानी जाती है. कोलकाता की टीम दो बार आईपीएल ट्रॉफी पर अपना कब्जा जमा चुकी है. और इस सीजन फाइनल में पहुंचने के लिए आज कोलकाता ती टीम बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में मुंबई इंडियंस के खिलाफ दूसरा क्वालीफायर मैच खेलेगी.

इस हार जीत के बीच कोलकाता नाइट राइडर्स ने हाल ही में आईपीएल में अपने दस साल पूरे होने का जश्न मनाया. इस दौरान बॉलीवुड के किंग खान ने गंभीर समेत दूसरे नाइट राइडर्स खिलाड़ियों की तुलना अपने किरदारों से की.

बातचीत के दौरान जब शाहरुख से पूछा गया कि टीम में कौन सा ऐसा खिलाड़ी है जो सबसे ज्यादा शराब पीता है? तो शाहरुख ने क्रिस लिन का नाम लिया. उन्होंने लिन को टीम का ‘देवदास’ बताया.

इसके बाद शाहरुख से पूछा गया कि कौन सा ऐसा खिलाड़ी है जो उनकी फिल्म स्वदेश के ‘मोहन भार्गव’ का किरदार निभा सकता है. जवाब में शाहरुख ने कहा कि, “मोहन भार्गव बहुत शांत, ईमानदार और गंभीर शख्स है जो कभी मुस्कुराता नहीं. गौतम गंभीर को ही ‘मोहन भार्गव’ होना चाहिए.”

शाहरुख ने एक एक करके कोलकाता नाइट राइडर्स के सभी खिलाड़ियों को अपनी फिल्म के किरदार के नाम दिए. शाहरुख ने मनीष पांडे को फिल्म ‘दिल तो पागल है’ का राहुल बताया. उन्होंने कहा, ”दिल तो पागल है का राहुल काफी अच्छा दिखता था. मुझे लगता है कि मनीष पांडे भी काफी अच्छा दिखता है, इसलिए वह राहुल है.”

शाहरुख ने नाइट राइडर्स के ताबड़तोड़ बल्लेबाज यूसुफ पठान को ‘रईस’ बताया. उन्होंने कहा, “रईस तो यूसुफ भाई हो सकते हैं, इस बात में कोई दोराय नहीं है.” वहीं नाइट राइडर्स के कोच जैक्स कैलिस को शाहरुख ने ‘डियर जिंदगी’ का ‘जहांगीर खान’ बताया.

शाहरुख ने कहा, “मेरा मानना है कि कैलिस डॉक्टर जहांगीर खान हो सकता है. मैंने उसे बतौर खिलाड़ी देखा है, बतौर कोच भी मैंने उसे देखा है. वह काफी शांत रहता है और बिना ज्यादा कुछ कहे चीजों पर नियंत्रण रखता हैा. उसके इस व्यवहार से ही पूरी टीम एकजुट रहती है.”

इस पार्टी में शाहरुख हमेशा की तरह बेटे अबराम के साथ पहुंचे थे. आम तौर पर गंभीर रहने वाले कप्तान गौतम गंभीर ने भी इस पार्टी में काफी मस्ती की. पार्टी में शाहरुख ने खेलों को लेकर अपने लगाव और केकेआर की टीम के साथ अपने सफर के बारे में भी बात की.

क्रिकेट में नहीं होगी छक्कों की बारिश!

टेस्ट क्रिकेट में अगर कोई बल्लेबाज बिना कोई चौका-छक्का लगाए पूरे दिन बल्लेबाजी करता था तो उसे बेहतरीन खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन टी20 क्रिकेट के आने से हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. अगर बल्लेबाज क्रीज पर आने के 5 मिनट के अंदर कोई बड़ा शॉट नहीं लगाता तो दर्शक अपनी कुर्सी छोड़कर जाने के लिए तैयार हो जाते हैं. मतबल ये है कि आजकल क्रिकेट का मतलब सिर्फ चौके-छक्कों से ही है.

इसका काफी श्रेय बल्लों की बनावट में आए बदलाव को भी जाता है. पिछले कुछ सालों में बल्लों को बनाने के तरीकों में कई तरह के बदलाव किए गए हैं जिससे गेंदबाजों पर बल्लेबाज हावी नजर आने लगे हैं.

वहीं क्रिकेट के कई दिग्गज गेंदबाजों के साथ हो रही इस नाइंसाफी की आलोचना कर चुके हैं. सभी का मानना है कि खेल में गेंदबाजों और बल्लेबाजों के लिए बराबरी का मौका होना चाहिए. इस दिशा में जल्द ही एक कदम उठाया जा रहा है.

ब्रिटेन के रहने वाले एक भारतीय सर्जन ने बल्लों की बनावट को बदल कर खेल में संतुलन लाने का काम शूरू किया है. उन्होंने क्रिकेट के बल्ले की डिजाइन पर शोध किया जिसका लक्ष्य गेंद और बल्ले के बीच संतुलन बनाना था और अब इस साल एक अक्तूबर से यह इस्तेमाल में लिया जायेगा.

इंपीरियल कॉलेज लंदन के डिपार्टमेंट ऑफ सर्जरी एंड कैंसर में सीनियर लेक्चर्र डॉ. चिन्मय गुप्ते ने लंदन के इम्पीरिल कालेज की टीम की अगुवाई की जो क्रिकेट के बल्लों पर शोध कर रही थी. एमसीसी यानि मेरिलबोन क्रिकेट क्लब इस शोध के नतीजे को लागू करने जा रहा है.

गुप्ते ने कहा, ‘‘ पिछले 30 साल में क्रिकेट में छक्कों की संख्या बढ गई है. बल्लों के डिजाइन ही इस तरह के हैं कि गेंद की बजाय बल्ले का दबदबा है. यह नया डिजाइन संतुलन लायेगा.’’

नये नियम के तहत बल्ले के किनारे की मोटाई 40 मिलीमीटर से कम होगी और उसकी कुल गहराई 67 मिमी से ज्यादा नहीं हो सकती.

पुणे में जन्में गुप्ते महाराष्ट्र के क्रिकेटर मधुकर शंकर के बेटे हैं और पेशेवर क्रिकेटर हैं जो मिडिलसेक्स और ग्लूसेस्टर के लिये खेल चुके हैं.

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