Download App

महिमामंडन की राजनीति

अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने के मामले में विशेष सीबीआई अदालत के सामने भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी अदालत के सामने पेश हुये. अदालत के सामने पेश होने से पहले वह वीवीआईपी गेस्ट हाउस में ठहरे. वहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्वागत किया. सीबीआई की विशेष अदालत के सामने भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, महंत नृत्य गोपालदास और रामविलास वंदाती को भी पेश होना पड़ा. अदालत से बाहर जहां भाजपा के नेता बयान देने से बचते रहे, वहीं राम विलास वेदांती ने मुखर होकर कहा कि ‘ढांचा गिराने वालों में मैं शामिल था.’

यही नहीं राम विलास वेदांती ने अपने को इसमें शामिल बताते हुये लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को क्लीन चिट देते कहा कि उनका इसमें कोई रोल नहीं है. वह कहते हैं कि आडवाणी और जोशी को अयोध्या में ढांचा ढहाने के मामले से कोई लेना देना नहीं है. मैं इसमें शामिल था और आगे भी मंदिर बनाने के लिये पूरी तरह से तैयार हूं. यही नहीं भाजपा के सांसद साक्षी महाराज ने भी कहा कि अयोध्या में राम मंदिर बनने से कोई रोक नहीं सकता है. साक्षी महाराज भी ढांचा ढहाने के मामले में सुनवाई से पहले ही अपने बयान दे रहे थे.

साक्षी महाराज ने कहा कि मैंने कोई अपराध नहीं किया है. मैंने गलत काम नहीं किया. मै खुशनसीब हूं कि मुझे यह काम करने का मौका मिला. अब धरती की कोई ताकत अयोध्या में राम मंदिर बनाने से रोक नहीं सकती है. अब लोगों को यह विरोध छोड़ कर आगे आना चाहिये. अब तो तमाम मुसलिम भी इस दिशा में आगे आ रहे हैं. 1992 में अयोध्या में राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद में 6 दिसम्बर को ढांचा ढहा दिया गया था. इस मामले में भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े कई नेता आरोपी बनाये गये. 25 साल बीत जाने के बाद भी अभी तक विशेष सीबीआई अदालत किसी फैसले पर नहीं पहुंची है.

लखनऊ में 30 मई को आरोप तय होने हैं. आरोप तय होने के पहले जिस तरह से भाजपा के नेता इकबालिया बयान दे रहे हैं उससे तो यह साफ है कि आरोपियों को किसी तरह की सजा का भय नहीं रह गया है. आज उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है जो पूरी तरह से हिन्दुत्व का समर्थन करती है. भाजपा हिन्दुत्व की हवा पर चल कर 2014 और 2017 में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक लोकसभा और विधानसभा में अपने सदस्यों को पहुंचा चुकी है. अब वह 2019 के चुनाव में इस मुद्दे को आगे कर चुनाव मैदान में उतरना चाहती है. ऐसे में भाजपा ढांचा ढाहने के आरोपी नेताओं का महिमामंडन कर हिन्दुत्व को हवा दे रही है.   

1 जून से महंगी हो जाएंगी एसबीआई की ये सेवाएं

सरकारी क्षेत्र का सबसे बड़ा बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एक बार फिर अपनी सेवाओं पर लगने वाले शुल्क में बदलाव करने जा रहा है. सर्विस चार्ज में ये बदलाव एक जून से लागू हो जाएंगे. बचत खाते में जमा रकम की न्यूनतम सीमा लागू होने से हलाकान एसबीआई ग्राहकों की जेब नए नियमों से और कटने वाली है.

सबसे अहम बदलाव खाते से कैश निकालने के नियम में किया जा रहा है. एक जून से एक माह में केवल चार बार ही रकम निकासी मुफ्त होगी. इसमें एटीएम के जरिये पैसे निकालना भी शामिल है.

कैश निकालने पर लगेगा चार्ज

एसबीआई से कैश विड्रॉल सिर्फ 4 बार तक के लिए ही मुफ्त रहेगी. इसमें एटीएम ट्रांजैक्शंस भी शामिल हैं. 4 बार से ज्यादा एसबीआई की ब्रांच से भी कैश विड्रॉल करेंगे तो हर ट्रांजैक्शन पर 50 रुपए का सर्विस चार्ज और सर्विस टैक्स लगेगा.

एसबीआई के एटीएम से 4 बार से ज्यादा विड्रॉल करेंगे तो हर ट्रांजैक्शन पर 10 रुपए सर्विस चार्ज और सर्विस टैक्स देना होगा. दूसरे बैंक के एटीएम से 4 बार से ज्यादा कैश विड्रॉल पर हर ट्रांजैक्शन पर 20 रुपए सर्विस चार्ज और सर्विस टैक्स लगेगा.

आरबीआई ने दिए कटे-फटे नोट को लेकर दिए थे ये निर्देश

30 अप्रैल को ही आरबीआई ने बैंकों को कटे, लिखे, पुराने व फटे नोटों को लेने के लिए कहा था. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने बैंकों को साफ निर्देश दिया है कि उन्हें गंदे नोट लेने ही होंगे और इसे लेने से वे इनकार नहीं कर सकते. लेकिन अगर आप एसबीआई में कटे-फटे या गले-गीले नोट जमा कराएंगे तो आपके ऊपर अतिरिक्त चार्ज देना होगा.

पुराने कटे-फटे नोट बदलने पर भी लगेगा चार्ज

एसबीआई 20 से ज्यादा या 5,000 रुपए से ज्यादा कटे-फटे नोट बदलवाने पर अब 2 से लेकर 5 रुपए तक का चार्ज और सर्विस टैक्स वसूलेगा. इसके तहत हर नोट पर 2 रुपये या हरेक 1,000 रुपये पर 5 रुपये चार्ज, जो भी ज्यादा होगा, वह वसूला जाएगा.

5,000 रुपए तक कीमत होने पर हर नोट पर 2 रुपये चार्ज और सर्विस टैक्स वसूला जाएगा और 5000 रुपये से ज्यादा कीमत होने पर हर नोट पर 5 रुपये चार्ज और सर्विस टैक्स लिया जाएगा. कटे-फटे 20 नोट जिनकी कुल कीमत 5,000 रुपये से ज्यादा नहीं होगी तक बदलने पर एसबीआई कोई सर्विस चार्ज नहीं लगेगा.

बेसिक बैंक डिपॉजिट अकाउंट के नए कार्ड पर भी लगेगा चार्ज

1 जून से एसबीआई एक्स्ट्रा डेबिट कार्ड इश्यू करने पर भी चार्ज लेने की तैयारी कर रहा है. एक जून से बैंक सिर्फ रुपे डेबिट कार्ड ही मुफ्त में जारी करेगा. बाकी सभी कार्ड जारी करने पर बैंक ने सर्विस चार्ज लेने का ऐलान कर दिया है. 1 जून से बैंक मास्टर और वीजा कार्ड इश्यू करने पर सर्विस चार्ज लेगा.

15 सालों से नहीं टूटा है चैंपियंस ट्रॉफी का यह रिकॉर्ड

चैंपियंस ट्रॉफी 1 जून से शुरू होने जा रही है. इस टूर्नामेंट में वीरेंद्र सहवाग का बनाया एक रिकॉर्ड पिछले 15 सालों से नहीं टूटा है. चैंपियंस ट्रॉफी के इतिहास में एक मैच में बाउंड्री से सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में सहवाग नंबर वन बल्लेबाज हैं.

उन्होंने साल 2002 में इंग्लैंड के खिलाफ मैच में 126 रनों की पारी खेली थी जिसमें 90 रन तो उन्होंने चौकों-छक्कों से ही बना दिए थे. इस मैच में उन्होंने 21 चौके और 1 छक्का लगाया था.

आइए आपको बताते हैं चैंपियंस ट्रॉफी के एक मैच में छक्के-चौकों से सबसे ज्यादा रन बनाने वाले टॉप 10 बल्लेबाजों के बारे में. जानें बाउंड्री से सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी.

मैच

खिलाड़ी

चौका

छक्का

रन

भारत बनाम इंग्लैंड, 2002

विरेंद्र सहवाग (भारत)

21

01

90

न्यूजीलैंड बनाम यूएसए, 2004

नेथन एस्टल (न्यूजीलैंड)

13

06

88

वेस्ट इंडीज बनाम साउथ अफ्रीका, 2006

क्रिस गेल (वेस्ट इंडीज)

17

03

86

ऑस्ट्रेलिया बनाम इंग्लैंड, 2009

शेन वॉटसन (ऑस्ट्रेलिया)

10

07

82

भारत बनाम साउथ अफ्रीका, 2000

सौरव गांगुली (भारत)

11

06

80

श्रीलंका बनाम वेस्ट इंडीज, 2000

अविष्का गुणावर्धने (श्रीलंका)

19

00

76

वेस्ट इंडीज बनाम साउथ अफ्रीका, 1998

फिलो वॉलेस (वेस्ट इंडीज)

11

05

74

बांग्लादेश बनाम जिम्बाब्वे, 2006

शहरयार नफीस (बांग्लादेश)

17

01

74

भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया, 1998

सचिन तेंदुलकर (भारत)

13

03

70

साउथ अफ्रीका बनाम केन्या, 2002

हर्शल गिब्स (साउथ अफ्रीका)

13

03

70

 

पाकिस्तानी फैन भी दे रहे हैं टीम इंडिया का साथ

आईपीएल का दसवां सीजन खत्म होते ही अब सबकी नजर इंग्लैंड में 1 जून से होने वाली चैंपियंस ट्रॉफी पर है. चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर सभी क्रिकेट प्रेमी उत्साहित हैं. लेकिन 4 जून को भारत-पाकिस्तान के बीच खेली जाने वाली मैच बहुप्रतिक्षित मैच है. पूरा क्रिकेट जगत और क्रिकेट प्रेमी इस मैच के इंतजार में है. सभी को उस क्षण का इंतजार है जब खेल के मैदान में दो चिर प्रतिद्वंदी भारत और पाकिस्तान आमने सामने होंगे.

लेकिन इस मुकाबले से पहले ही पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेट प्रशंसक चाचा शिकागो ने कुछ ऐसा कहा कि सब अचंभित हो गएं.

पाकिस्तानी क्रिकेट में 'चाचा शिकागो' के नाम से मशहूर मोहम्मद बशीर का मानना है कि इस बार चैंपियंस ट्रॉफी में पाकिस्तान टीम का टीम इंडिया से कोई मुकाबला नहीं है. भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले मुकाबलों में हमेशा दिखाई देने वाले 'चाचा शिकागो' मैच में दोनों देशों के झंडे लेकर पहुंचते हैं.

पिछले 6 सालों में यह पहला मौका होगा जब भारत-पाकिस्तान के बीच खेले जा रहे क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाने के लिए वह मैदान पर मौजूद नहीं होंगे.

चाचा शिकागो पाकिस्तानी क्रिकेट की दुर्दशा को लेकर परेशान हैं. उनका मानना है कि भारत-पाकिस्तान के बीच अब कोई मुकाबला नहीं रह गया है. भारत पाकिस्तान से क्रिकेट में बहुत आगे निकल चुका है. एक तरफ टीम में धोनी, कोहली और युवराज हैं और पाकिस्तान में तो कोई बड़ा खिलाड़ी ही नहीं है.

पाकिस्तानी क्रिकेट के अच्छे दौर को याद करते हुए बशीर ने कहा, वो भी एक दौर था जब पाकिस्तान में जावेद मियांदाद, वसीम अकरम और वकार यूनिस जैसे खिलाड़ी थे. अब हालत ये हो गई है कि मैं पाकिस्तानी टीम में खेल रहे अधिकांश खिलाड़ियों का नाम नहीं जानता.

बशीर ने भारत-पाकिस्तान के बीच साल 2011 विश्वकप में मोहाली में खेले गए सेमीफाइनल के बाद खेले गए सभी मुकाबलों में शिरकत की लेकिन 4 जून को खेले जाने वाले मुकाबले के चश्मदीद वह नहीं बन पाएंगे.

बशीर ने कहा, काश मैं बरमिंघम में भी मैच देख सकता. रमजान के कारण वह वहां नहीं जा सकेंगे. मुझे दुख है कि मैं इस बार मैच नहीं देख पाउंगा. लेकिन इस बार भारत मैच आसानी से जीत जाएगा और अपना खिताब भी बचा लेगा. 

अमेरिका : कितना अच्छा, कितना बुरा

‘वर्ल्ड गिविंग इंडैक्स’ के मुताबिक किसी अजनबी की मदद करने में अमेरिकियों का स्थान दुनिया में पहला है. इसी तरह अमेरिका में 69% से ज्यादा फायर फाइटर्स, वौलंटियर्स हैं. ऐसी कितनी ही बातें हैं, जो अमेरिकी मानसिकता को भारतीयों से भिन्न बनाती हैं. ज्यादातर भारतीयों की तरह अमेरिकी निठल्ले बैठना पसंद नहीं करते. वे मेहनती होते हैं. नए आईडियाज डैवलप करने, नई सोच सामने रखने या फिर चीजों को नए तरीके से करने का प्रयास करने में अमेरिकी नहीं हिचकते और अकसर परिणाम आश्चर्यजनक निकलते हैं. काम के प्रति उन का जनून और सकारात्मक प्रवृत्ति देखते ही बनती है.

काफी हद तक मानसिकता में इस अंतर का ही नतीजा है कि अमेरिकी हम से बहुत समृद्ध और विकसित हैं. ज्यादातर पिछड़े या विकासशील देशों जिन में भारत भी शामिल है के युवाओं के लिए अमेरिका सपनों की मंजिल के समान है तभी तो यहां आने और बसने की होड़ लगी रहती है. पर सिक्के का दूसरा पहलू भी है. अच्छाइयों के साथसाथ यहां की जीवनशैली में कुछ कमियां भी हैं.

यदि भारतीय प्रयास करें तो अमेरिका की अच्छाइयों को अपने जीवन में उतार कर और मानसिकता में बदलाव ला कर अपने देश के प्रति भी वैसा आकर्षण पैदा कर सकते हैं, जिस की चाह हम भारतीयों को अमेरिका की ओर खींचती है.

अमेरिका विश्व के समृद्ध, शक्तिशाली व विकसित देशों में एक है. यह भारत से 3 गुना से भी ज्यादा बड़ा है जबकि इस की जनसंख्या भारत से 4 गुना कम है. काश, अगर आजादी के बाद हम अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण रख पाते तो हमारी स्थिति कहीं बेहतर होती. आजकल अमेरिका पिछड़े और विकासशील देशों के लोगों के लिए सपनों की मंजिल है.

अच्छा पहलू

उच्च जीवन स्तर: यहां लोगों का जीवन स्तर काफी ऊंचा है. यहां पार्टटाइम घरेलू काम जैसे कुकिंग, सफाई, माली आदि का काम करने वालों के पास भी सभी सुविधाएं जैसे कार, टैलीविजन, स्मार्टफोन, माइक्रोवैव आदि उपलब्ध हैं.

पर्याप्त अवसर: यहां हर किसी को अपनी योग्यता के अनुसार जीवन में पर्याप्त अवसर हैं. सब को आगे बढ़ने के समान अवसर हैं. किसी जाति, धर्म या अल्पसंख्यक के नाम पर रिजर्वेशन नहीं है. अमेरिका संभवतया दुनिया का ऐसा देश है जहां केवल अपनी क्षमता के बल पर दुनिया में सब से ज्यादा बड़े उद्योगपति हुए हैं.

श्रम की इज्जत: आप चाहे छोटे से छोटा काम करते हों या फिर किसी बड़ी कंपनी के चेयरमैन क्यों न हों, यहां का समाज दोनों का बराबर आदर करता है. इसी तरह व्यापार में भी समान आदर दिया जाता है. आप किसी छोटे पेशे जैसे बाल काटने या किसी बड़ी कंपनी के मालिक हैं, कानून दोनों को बराबर मानता है, समाज भी कोईर् भेदभाव नहीं करता है.

धार्मिक और नस्ली भेदभाव नहीं: यहां कानून और समाज दोनों की नजर में धर्म, नस्ल या जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं है. यही कारण है कि दुनिया के लगभग सभी देश, धर्म और नस्ल के लोगों के रहते हुए भी यहां आपस में दंगे, आगजनी, लूटपाट नहीं होती है. हालांकि कुछ छिटपुट नस्ल की घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है. आज अमेरिका में अनेक सरकारी पदों पर तथा अनेक प्रमुख कंपनियों के उच्च पदों पर गैरअमेरिकी मूल के लोग मिलेंगे, जिन में कई भारतीय भी हैं.

अपना भविष्य खुद चुनें: यहां स्कूलों और कालेजों में पढ़ाई के दौरान आप को जिस विषय में रुचि हो अपना भविष्य खुद चुनें और आगे बढ़ें. हमारे यहां ज्यादातर बच्चों को मातापिता की इच्छा के अनुसार डाक्टर, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्र का चुनाव करना पड़ता है.

सामाजिक समानता: यहां लोगों की आमदनी में बहुत बड़ा फासला होते हुए भी समाज में कम आय वालों के प्रति कोई हीनभावना नहीं है.

समान कानून और अधिकार: इस देश में सब के लिए एक कानून लागू है. धर्म या जाति के नाम पर कोई दूसरा कानून या रिजर्वेशन नहीं होता है.

स्वतंत्र देश, स्वतंत्र नागरिक: अमेरिका सही मामले में स्वतंत्र देश है और इस के नागरिक भी पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं. अमेरिकी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करते. यहां स्वतंत्रता के नाम पर आए दिन हड़ताल, बंद या तोड़फोड़ की घटना नहीं होती है.

एक राष्ट्र: अमेरिका में 50 राज्य होते हुए भी वह एक राष्ट्र है. हमारे यहां हम लोगों में बंगाली, गुजराती या महाराष्ट्रियन आदि होने की भावना पहले है.

कठोर अनुशासन: यहां नियमों का पालन करना अनिवार्य है, आप चाहे जो भी हों. यातायात के नियमों का अच्छी तरह पालन किया जाता है. हाल ही में विश्व रिकौर्ड और विश्वविख्यात तैराक माइकल फेल्प जिन्होंने 2016 के ओलिंपिक तक 22 स्वर्ण पदक ले कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है, उन्हें भी 2 बार नशे में कार चलाने के लिए गिरफ्तार किया गया था.

शांतिपूर्ण मतदान: यहां का मतदान पूर्णतया शांतिपूर्वक होता है.

अभिवादन: अमेरिका में कहीं भी जाएं अमेरिकी हंस कर अभिवादन करते मिलेंगे. ज्यादा बातें नहीं करेंगे पर हायहैल्लो, गुड मौर्निंग आदि समय और मौसम के अनुसार जरूर करेंगे.

सभी देशों के व्यंजन उपलब्ध हैं: अमेरिका में दुनिया के लगभग सभी देशों के लोग बसे हैं, इसलिए यहां लगभग सभी देशों के व्यंजनों का आनंद उठाया जा सकता है.

अच्छी सड़कें: पूरे अमेरिका में सड़कों और फ्लाईओवरों का जाल बिछा है. यही कारण है कि लोग लंबी दूरी तक कार से ही आराम से सफर करते हैं. अत्यधिक दूरी के लिए हवाई सफर करते हैं. रेल यातायात न तो उतना विकसित है और न ही लोग उस से आमतौर पर सफर करना पसंद करते हैं. हाई वे पर थोड़ीथोड़ी दूरी पर पैट्रोल पंप मिलेंगे. इन में अनेक में खानेपीने और फ्री प्रसाधन की भी व्यवस्था है. छोटेबड़े होटल मिलेंगे जहां प्रसाधन का फ्री उपयोग कर सकते हैं.

बच्चों में आत्मनिर्भरता: अमेरिका में बच्चों को छोटी उम्र से ही अपने सभी काम खुद करना सिखाया जाता है. इसीलिए वे अपने निजी कार्य कम उम्र से खुद करने लग जाते हैं.

समय की पाबंदी: यहां कोई भी समय बरबाद नहीं करना चाहता है. ये समय का मूल्य समझते हैं. हर काम अपने निश्चित समय पर होता है.

इंटरनैट का जन्मदाता: इंटरनैट का जन्म भी अमेरिका में ही हुआ था जिस से पूरी दुनिया आजकल हर किसी के हाथ में है और यह पूरी दुनिया को 222 (वर्ल्ड वाइड वेब) के द्वारा जोड़े रखता है. आधुनिक इंटरनैट का जन्म 1990 में टीम ली द्वारा यहीं हुआ था.

उदारता: अमेरिकी सरकार और अमीर लोगों में उदारता भी देखने को मिलती है. जहां सरकार अपने करदाताओं के पैसों से अन्य पिछड़े या गरीब देशों की सहायता करती है, वहीं दूसरी तरफ धनी उद्योगपति और हौलीवुड सितारे भी अन्य देशों के सामाजिक उत्थान के  लिए करोड़ों का अनुदान देते हैं.

उच्च शिक्षा और अनुसंधान के पर्याप्त अवसर: अमेरिका की विश्वस्तर यूनिवर्सिटीज में सारी दुनिया से विद्यार्थी आ कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं. कइयों को स्कालरशिप भी मिलती है. यहां मेधावी विद्यार्थियों के लिए अनुसंधान की भी व्यवस्था है.

सर्वांगीण विकास पर जोर: यहां बचपन से ही व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता दी जाती है. मसलन बच्चे पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भाग लेते हैं. सभी बच्चे शुरू से ही किसी न किसी खेलकूद जैसे चैस, तैराकी, टैनिस, बास्केटबौल, ऐथलैटिक्स आदि में भाग लेते हैं. सरकार भी खेलों पर होने वाले खर्च पर आयकर में छूट देती है.

कमजोर पहलू

आधुनिक शस्त्रों का निर्माता: अमेरिका दुनिया में आधुनिक शस्त्रों का प्रमुख निर्माता है. शस्त्रों के निर्यात में यह विश्व में प्रथम स्थान पर है. ऐसे में हर समय इस बात का भय बना रहता है कि ये हथियार अगर आतंकवादियों और कट्टरपंथियों के हाथ में आ जाएं तो हजारों निर्दोष जान गंवा बैठेंगे.

प्रदूषण फैलाना: यहां के कारखाने और करोड़ों कारें वायुमंडल में प्रदूषण फैलाते हैं. इस मामले में चीन के बाद यह दूसरे नंबर पर है.

मोटापा: यहां काफी लोग मोटापे के शिकार हैं, करीब एकतिहाई लोग. इस की वजह जहां यहां दूध, दही, चीज, पनीर आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, वहीं यहां जंक फूड, पिज्जा, बर्गर आदि का प्रचलन भी बहुत है.

पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी: अमेरिका में पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था की कमी है. लगभग हर किसी के पास अपनी कार होती है. लंबी दूरी की रेल यात्रा या बस यात्रा बहुत कम उपलब्ध है.

दुनिया के बारे में अनभिज्ञता: यहां के ज्यादातर लोग दुनिया के बारे में कम जानते हैं. जैसे कुछ अरसा पहले एक क्विज में लोगों को अमेरिका को दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहते सुना गया था.

गन फ्रीडम: यहां हर कोई आसानी से बंदूक पा सकता है, जिस के चलते हाल ही में शूटिंग के कई मामले देखने को मिले. यहां तक कि स्कूल के बच्चे भी ऐसी वारदातों में शामिल थे.

समलैंगिकता: यहां समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता है. लोग समलैंगिकता को ले कर अपने अधिकारों की बात करते हैं, पर यह अप्राकृतिक तो है ही.

महंगा श्रम: यहां लेबर बहुत महंगी है. इसी कारण सोफे, टैलीविजन, फोन, माइक्रोवैव आदि घरेलू उपकरणों की मरम्मत कराने की जगह उन्हें फेंक कर नया ही लेना बेहतर समझते हैं.

पारिवारिक आत्मीयता की कमी: यहां परिवार में आपसी प्रेम और आत्मीयता की भारत की तुलना में कमी है. बचपन से ही बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के चक्कर में बडे़ होतेहोते उन में प्रेम और पारिवारिक बंधन कमजोर हो जाता है.

आवश्यकता से अधिक टैक्नोलौजी: यहां आधुनिक तकनीक का बहुत ज्यादा प्रयोग होता है. घर में ज्यादातर काम माइक्रोवैव ओवन, डिश वाशर (बरतन धोने और सुखाने की मशीन), वाशर ड्रायर (कपड़े धोने और सुखाने की मशीन) से हो जाता है. बच्चों के हाथ में आधुनिक गैजेट देखे जा सकते हैं.

इस पर महान वैज्ञानिक आइंस्टीन की यह बात याद आती है, ‘‘मुझे उस दिन का डर

है जिस दिन तकनीक मानव वार्त्तालाप से ऊपर हो जाए. तब यह दुनिया मूर्खों की एक पीढ़ी होगी.’’               

दीवानगी नोफोन की

हमारे देश में मोबाइल फोन आए लगभग 20 साल से अधिक समय हो गया है. इन 2 दशकों की सब से बड़ी उपलब्धि यह रही है कि आज देश में 1 अरब से ज्यादा मोबाइल ग्राहक है. पिछले कुछ वर्षों से नया मोबाइल फोन और कनैक्शन लेने वालों की रफ्तार हर महीने 1 करोड़ की दर से बढ़ रही है. हो सकता है कि कुछ समय बाद यह दावा किया जाए कि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले इस मुल्क में इतने ही मोबाइल कनैक्शन हों.

अमीरीगरीबी का ज्यादा फर्क किए बगैर देश में लगभग हर व्यक्ति को सूचना पाने की सुविधा के अलावा एक नई पहचान देने वाली इस क्रांति की शुरुआत जिस अंदाज में हुई थी, उस में यह बताना मुश्किल था कि सिर्फ 20-22 साल में एक रिकशाचालक या कोई मजदूर पीसीओ बूथ के खुलनेबंद होने की चिंता से बेफिक्र हो कर जब चाहे गांवदेहात में अपने परिवार वालों से बात कर सकेगा और अपने दूसरे कई काम भी निबटा सकेगा. भारत जैसा ही हाल चीन का भी है, जहां वर्ष 2012 में ही 1 अरब मोबाइल फोन उपभोक्ता हो गए थे. दुनिया में फिलहाल यही 2 देश हैं जहां 1 अरब से ज्यादा मोबाइलधारक हैं.

इधर एक ओर जब भारतचीन में मोबाइल फोन को ले कर ऐसी होड़ मची हुई है, तो दूसरी तरफ दुनिया में एक नया ट्रैंड उभर रहा है जिस में लोग स्मार्टफोन के नशे से छुटकारा पाना चाहते हैं. इस की शुरुआत एक कनाडाई कंपनी ने ‘नोफोनएयर’ नामक गैजेट बना कर की है, जिस के बारे में दावा किया जा रहा है कि उस की मदद से लोग स्मार्टफोन पर अपनी निर्भरता कम कर पाएंगे और ऐसी जिंदगी जी पाएंगे, जिस में स्मार्टफोन की जरूरत महसूस नहीं होगी.

हालांकि भारतचीन जैसे देशों में लोग अभी इस बारे में सोच नहीं पा रहे हैं कि एक दिन दुनिया में ऐसा भी आ सकता है जब लोग स्मार्टफोन के बिना खुद को ज्यादा सुखी महसूस करेंगे. अभी ज्यादातर लोगों का मानना है कि स्मार्टफोन के बिना रह पाना असंभव है. इधर, जिस तरह से सरकार मोबाइल बैंकिंग पर जोर दे रही है उस में तो एक अच्छे स्मार्टफोन का होना जरूरी लगता है.

जापान समेत कई यूरोपीय देशों में अब भी लोग स्मार्टफोन को एक बुरी लत के रूप में देखते हैं और इस से छुटकारा पाना चाहते हैं, लेकिन लोगों का मानना है कि अब शायद स्मार्टफोन के बिना जिंदा रह पाना मुमकिन नहीं है, क्योंकि इसी के जरिए कई तरह के काम हो रहे हैं और दुनियाभर के लोग एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. इसलिए जब कुछ लोगों को यह जरूरत महसूस हुई कि कैसे वे स्मार्टफोन के जंजाल से बाहर निकलें, तो सब से पहले इस धारणा को तोड़ने की कोशिश शुरू की गई कि स्मार्टफोन के बिना जिंदगी नामुमकिन है.

करिश्मा ‘नोफोनएयर’ का

वैसे तो स्मार्टफोन की लत से छुटकारा पाने के कई उपाय बताए जाते हैं, लेकिन इस का एक नया तरीका कनाडा के 2 वकीलों स्टीवन पल्वर और डैनियल लेविन ने निकाला है. उन्होंने अक्तूबर, 2016 में कनाडा में एक ऐसी बैठक बुलाई जिस में लोगों को बिना स्मार्टफोन के आने को कहा गया. उन्होंने देखा कि मीटिंग में आने वाले 100 से ज्यादा लोगों के बीच ऐसा अनोखा संपर्क बना जिस की आशा ही नहीं थी. इस से उन्होंने नतीजा निकाला कि अगर ऐप्स के जंजाल से हमें छुटकारा मिल जाए तो हम ज्यादा क्रिएटिव, शिष्टाचारी होने के साथ सही माने में लोगों से जुड़ सकते हैं. यह सिर्फ एक उदाहरण है. दुनिया के कई देशों में स्मार्टफोन की लत से पीछा छुड़ाने के लिए लोग तरहतरह के प्रयोग कर रहे हैं. इस का एक नमूना कनाडा में आयोजित फायरसाइड कौन्फरैंस में 2 उ-मियों क्रिस शेल्डन और वैन गूल्ड ने पेश किया. एक टैक्नोलौजी कौन्फरैंस में इन्होंने ‘नोफोनएयर’ नाम से एक छोटी सी डिवाइस लौंच की, जो देखने में तो एक स्मार्टफोन की तरह ही है पर इस में हैडफौन जैक, औपरेटिंग सिस्टम, स्क्रीन, प्रोसैसर, बैटरी, स्टोरेज और ब्लूटूथ जैसी कोई चीज नहीं है. इस में सिर्फ हवा है.

इस डिवाइस को लौंच करते हुए शेल्डन ने कहा, ‘‘यह दिखने में तो स्मार्टफोन है लेकिन स्मार्टफोन की तरह काम नहीं कर सकता. आप फोन से दूर रह कर ही सही मानों में दूसरे लोगों से जुड़ सकते हैं.’’

शेल्डन और गूल्ड ने आगे कहा कि इस वक्त जब दुनिया में लाखों लोग आईफोन और इसी तरह के आधुनिक स्मार्टफोनों के पीछे भाग रहे हैं, नोफोनएयर एक नई लहर की तरह सामने आ सकता है. यह नकली फोन उन के लिए है जो असली स्मार्टफोन से चिपके रहते हैं, पर उस की लत से छुटकारा पाना चाहते हैं.

नोफोनएयर की मांग तेजी से बढ़ रही है, यह इस से साबित होता है कि हौलीवुड के सुपरस्टार कायने वेस्ट ने ट्वीट किया कि मैं अपने फोन से छुटकारा चाहता हूं, शायद यही सोच कर नोफोनएयर बनाया गया है. इस ट्वीट के जवाब में गायिका केटी पैरी ने लिखा, ‘दुनिया से संवाद बढ़ाने के लिए बेहतर है कि फोन से खुद को अलग कर लो.’ उल्लेखनीय यह है कि लौंचिंग के कुछ समय बाद ही 10 डौलर (650 रुपए) की कीमत वाले नोफोनएयर के 10 हजार सैट दुनिया में बिक चुके थे.      

कैसे बचें स्मार्टफोन की लत से

नोफोनएयर असल में हमें स्मार्टफोन की लत से बचाने का एक तरीका मात्र है पर सचाई यह है कि दुनिया में इस समय ऐसे कई तौरतरीकों की खोजबीन हो रही है, जिस से लोगों को फोन की जरूरत महसूस न हो. इस बारे में ब्रिटेन की एक संस्था औफकौम्स का कहना है कि स्मार्टफोन एडिक्शन (लत) एक महामारी के स्तर पर पहुंच गया है. एक सर्वे में 37त्न लोगों ने स्वीकार किया कि वे अपने स्मार्टफोन से खुद को अलग नहीं कर पाते हैं. सर्वे में आधे लोगों को मानना था कि वे स्मार्टफोन का इस्तेमाल सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क साधने में करते हैं. एकचौथाई का मत था कि वे खाना खाते समय भी फोन का प्रयोग करते हैं और 20त्न अपने बाथरूम तक में स्मार्टफोन अपने साथ ले जाते हैं.

दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो हर मिनट में अपना फोन चैक करते रहते हैं कि कहीं कोई नया मैसेज, फोटो और वीडियो तो उन के फोन पर तो नहीं आया है, ऐसे में उन तरीकों की भी चर्चा होने लगी है जिन से लोग स्मार्टफोन की लत से बच सकते हैं. प्रस्तुत हैं सुझाव :

– ऐसे स्मार्टफोन खरीदने से बचें, जिन में अनगिनत फीचर्स हों. अपनी जरूरत के मुताबिक सीमित फीचर वाले फोन खरीदें.

–   हर नया ऐप डाउनलोड न करें. इस से न सिर्फ फोन की स्पीड कम होती है, बल्कि नएनए ऐप हमारा ध्यान भी भटकाते हैं. 5 या 10 से अधिक ऐप फोन में नहीं होने चाहिए.

–   अगर आप को हर दूसरे मिनट पर फोन चैक करने की आदत है तो घर में अपना फोन खुद से दूर दूसरे कमरे में रखें.

–   यदि किसी से बात करते समय कोई अननोन कौल फोन पर आ रही है तो उस वक्त उस पर ध्यान न दें. बात खत्म करने पर कौलबैक कर जानकारी लें कि वह कौल आप के लिए जरूरी है या नहीं. इस से हम फोन को खुद पर हावी होने से बचा सकते हैं.

चूंकि तकनीक बड़ी तेजी से बदल रही है, इसलिए कंपनियां भी नएनए फीचर वाले स्मार्टफोन बाजार में ले कर आती हैं. ऐसे में बहुत से लोग नया फोन खरीद लेते हैं, जबकि उन का पुराना फोन काम कर रहा होता है. इस आदत से खुद को बचाएं, क्योंकि यह हमारा पैसा फुजूल में खर्च कराती है और हमारा ध्यान भी भटकाती है.   

संस्कृति की आड़ में तानाशाही

लड़कियों को परेशान करने और छेड़ने वालों की पकड़धकड़ करने के लिए उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने हर थाने में रोमियो स्क्वैड बनाया है, जो किसी भी गुट को पकड़ सकता है. इन को स्थानीय भारतीय जनता पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं का समर्थन भी है और ये पुलिस स्क्वैड के साथ डंडे लिए घूमते रहते हैं. लड़कियों को इस से चाहे कुछ दिन राहत की सांस मिल जाए पर अपराधों पर नियंत्रण करने के नाम पर अपनी पार्टी के लोगों को ठेके दे देना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है.

इन स्क्वैडों ने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों की तरह तुरंत न्याय करने और सजा देने का तरीका अपनाया है. कहीं 4 लड़के या जोड़े हाथ में हाथ डाले चलते नजर आए नहीं कि ये उन पर लाठियों से पिल पड़ते हैं. पुलिस वाले महज तमाशाई बने रहते हैं पर भगवा दुपट्टे वाले बिना वकील, बिना दलील के कानून और अदालतों के बिना न्याय प्रसाद के रूप में बांट कर वही आतंक का राज स्थापित करने में लग गए हैं, जो सदियों तक इस देश में राजघरानों या जमींदारों का होता था.

परिवारों को पहलेपहल चाहे राहत महसूस हो पर जल्द ही पता चलेगा कि भाईबहनों का भी घर से इकट्ठे निकलना खतरे से खाली नहीं रहेगा. कहने को अकेली युवतियां सुरक्षित होंगी पर रातबेरात यदि वे काम से लौट रही हों और ये रोमियो स्क्वैड उन पर वेश्यावृत्ति का आरोप लगा कर पिटाई कर दें, तो तब कोई सुनने वाला भी नहीं रहेगा.

पहले जो छेड़खानी होती थी उस में पुलिस बल उदासीन रहता था, पर अब पुलिस सक्रिय रहेगी पर सभ्यता और कानून की बातें करने वालों के मुंह बंद करने के लिए और स्क्वैडों व उन के सहायकों को संरक्षण देने के लिए. राजनीतिक दलों को छोडि़ए, वे तो फिर राख से उभर आएंगे पर जानबूझ कर या गलतफहमी के शिकार हुए परिवारों पर जो जख्म लगेंगे वे किसी मरहम से ठीक न होंगे. कानून व व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है पर बेगुनाहों को रोकनाटोकना और संस्कारों व संस्कृति की आड़ में तानाशाही को थोपना देश को महंगा पड़ेगा. हर घरपरिवार सड़कछाप छेड़ने वालों से परेशान है पर इसे रोकने के लिए प्राकृतिक प्रेम भावना को ही समाप्त कर देना घातक है, समाज के लिए भी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित शासनपद्धति पर भी.

टोटकों से नहीं मेहनत से बढ़ें

आज के दौर में ज्यादातर लोग खुद को मौडर्न और आजाद खयालों का बताते हैं, लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो परीक्षा के लिए कठिन मेहनत करने के बाद भी अच्छे अंक पाने के लिए टोटकों और ऐसे अंधविश्वासों पर भरोसा कर आगे बढ़ते हैं. आइए जानें कि टोटके कैसे होते हैं और किस तरह उन से हमारा भला नहीं बल्कि बुरा होता है : कुछ विशेष टोटके हैं, परीक्षा से पहले घर से कुछ मीठा खा कर जाना, पैंसिल बौक्स में तुलसी का पत्ता रखना, लकी स्टोन या फिर गुडलक कड़ा पहनना, शुभ व्यक्ति को देख कर घर से निकलना, घर से ऐग्जामिनेशन हौल में पहुंचने तक किसी से भी बात न करना, किताब में मोर पंख रखना आदि.

ये भी हैं अजीब बेतुके गुडलक चार्म

गुडलक पैन : कुछ छात्रों को लगता है कि उन का वह पुराना पैन जिस से लिखने पर पिछली क्लास में अच्छे अंक आए थे, यदि वे उसे ले कर जाएंगे तो अच्छे अंक आएंगे, क्योंकि वह उन का गुडलक पैन है, लेकिन होता कुछ और ही है. अब समय काफी बदल गया है और कई अच्छी क्वालिटी के स्मूथ और जल्दी लिखने वाले पैन आ गए हैं, लेकिन उन के बीच इस पुराने पैन से लिखने की वजह से पेपर छूट भी सकता है इसलिए ऐसी किसी बेतुकी बात पर विश्वास करने के बजाय एक अच्छा, नया और स्मूथ पैन लें ताकि परीक्षा हौल में पैन की समस्या से जूझने के बजाय आप का ध्यान अपने प्रश्नपत्र  में दिए गए प्रश्नों का जवाब लिखने में हो.

मैना देखना गुडलक : कई लोगों का मानना है कि ऐग्जाम से पहले एकसाथ 2 मैना का दिखना शुभ होता है, इस से पेपर अच्छा जाता है. इसी वजह से छात्र पेपर से पहले पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय अपना समय मैना ढूंढ़ने में बरबाद करते हैं और पेपर खराब हो जाने पर उस की वजह समय बरबाद करना नहीं बल्कि मैना का न मिलना बताते हैं. अब उन्हें कौन समझाए कि पेपर और मैना का आपस में कोई संबंध नहीं बल्कि परीक्षा और मेहनत का संबंध है.

केले की जड़ : कई अंधविश्वासी लोगों का मत है कि केले की जड़ को ऐग्जामिनेशन हौल में ले जाने से ऐग्जाम में अंक अच्छे आते हैं. केले की जड़ को पैन में घिसने से भी अच्छे अंक मिलते हैं.  जबकि सच तो यह है कि कई बार जड़ को पैन में घिसने के चक्कर में ऐग्जामिनेशन हौल में टीचर की नजर में आ जाता है और उन्हें लगता है कि दाल में कुछ काला है और टीचर द्वारा जांचपड़ताल में उस का समय बरबाद होता है, साथ ही उसे शर्मिंदगी भी उठानी पड़ती है.

लकी कलर के कपड़े पहनना : कुछ छात्रों का विश्वास होता है कि अगर वे रैड कलर के कपड़े पहन कर पेपर देने जाएंगे तो उन्हें अच्छे मार्क्स मिलेंगे, इस वजह से वे भरी गरमी में भी लाल रंग के कपड़े पहन कर जाते हैं, जबकि इस से अच्छे अंकों का कोई लेनादेना है, यह सोचना बेवकूफी है.

गुडलक रूमाल :  हर पेपर में एक ही रंग का रूमाल रखना लकी माना जाता है और यदि किसी कारणवश रूमाल खो जाए तो पेपर खराब होने का सारा दोष रूमाल खोने को दिया जाता है, जबकि उस बात का इस से कुछ लेनादेना नहीं है.

दही खाना : ऐग्जाम देने निकलने से पहले दही खाना शुभ माना जाता है, लेकिन कई बार यदि छात्र का गला खराब हो उसे सर्दी आदि लगी हो और वह दही खा ले तो उस की यह तकलीफ और बढ़ जाती है, जिस से पेपर पर असर पड़ता है.

सफलता मेहनत करने से मिलेगी टोटकों से नहीं

परीक्षा में अंक पढ़ाई करने से मिलेंगे : कुछ छात्रों को गलतफहमी रहती है कि परीक्षा में उतने अंक पढ़ाई कर के जवाब लिखने से नहीं मिलेंगे जितने कि टोटके करने से मिल जाएंगे. अगर ऐसे लोग फेल हो जाते हैं तो उन्हें लगता है कि उन के टोटकों में कुछ कमी थी इसलिए इस बार किसी अच्छे जानकार से पूछ कर कुछ करना पड़ेगा और अगर पास हो गए तो सारा क्रैडिट पढ़ाई के बजाय टोनेटोटकों को देते हैं.

लेकिन सच तो यह है कि कितनी भी पूजा कर लो, कितना भी शुभ और अशुभ का राग अलाप लो, यदि पढ़ाई नहीं की है तो कोई ताकत नहीं है जो परीक्षा में अच्छे अंक दिलवा दे, इसलिए इन बेकार की बातों को छोड़ कर अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाएंगे तो किसी टोटके की जरूरत ही नहीं पड़ेगी वैसे ही अच्छे अंक आ जाएंगे.

सारे चैप्टर याद करोगे तो नंबर अवश्य मिलेंगे :  छात्र इस बात को नहीं समझ पाते कि अगर उन्होंने पाठ याद नहीं किया और प्रश्नपत्र में आने वाला कोई सवाल नहीं पढ़ा है तो अंक कैसे मिलेंगे? अगर सिलेबस को अच्छी तरह पढ़ा है तो परीक्षा में प्रश्नों के जवाब भी आ जाएंगे, लेकिन अगर पढ़ा ही नहीं तो उस में कोई भी कुछ नहीं कर सकता.

क्लास में पढ़ाई पर ध्यान दें : कक्षा में टीचर द्वारा जो पढ़ाया जाता है अगर उस पर ध्यान दिया जाए तो पूरा सिलेबस जल्दी समझने और कवर करने में समय नहीं लगता. क्लास में टीचर द्वारा पढ़ाने के साथसाथ यदि खुद भी पढ़ा जाए तो पिछड़ने से बच सकते हैं, क्योंकि टीचर पूरे साल का सिलेबस, ऐग्जाम के हिसाब से ही पूरा करवाता है. अगर क्लास में टीचर के साथसाथ पढ़ा जाए तो आप अपनी प्रौब्लम टीचर से पूछ कर सौल्व कर सकते हैं और ऐग्जाम टाइम में बस आप को रिवीजन ही करना पड़ेगा, क्योंकि पढ़ तो आप पहले ही चुके होंगे.

नोट्स बनाएं : हर सब्जैक्ट के महत्त्वपूर्ण बिंदुओं के नोट्स बनाएं. ऐग्जाम के समय पूरे सिलेबस को बारबार रिवाइज करना कठिन होता है, इसलिए जब भी किसी पाठ को पढ़ें तो जरूरी चीजों के नोट्स बना लें ताकि बारबार पूरे पाठ को दोहराने की आवश्यकता न पड़े. वे नोट्स आप को ऐग्जाम के समय काफी काम आते हैं. जब समय कम होता है और रिवाइज बहुत सारा करना होता है, नोट्स आप के बेहतर रिजल्ट में मददगार साबित होते हैं.

पढ़ाई कल पर न टालें : कहते हैं न कल करे सो आज कर आज करे सो अब, पल में प्रलय आएगी फिर करेगा कब. यह बात पढ़ाई पर तो बिलकुल सही लागू होती है. आप किसी भी काम को टाल लें, लेकिन पढ़ाई को नहीं टाल सकते. अगर नियमित पढ़ाई करेंगे तो किसी फालतू टोटके की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और सफलता भी मिलेगी.

कठिन विषय पर अतिरिक्त ध्यान दें : जिस सब्जैक्ट में आप को जरा भी डाउट हो उस में टीचर से मदद ली जा सकती है. ऐक्स्ट्रा क्लास लेने के बारे में भी बात की जा सकती है या फिर कोई प्राइवेट ट्यूशन ले कर प्रौब्लम सौल्व की जा सकती है. यदि आप उस विषय की पढ़ाई अच्छी तरह करेंगे तो ऐग्जाम आतेआते उस में माहिर हो जाएंगे.                                    

धार्मिक ढकोसलों का शिकार न बनें

घर में बच्चे के जन्म लेते ही मातापिता उसे बुरी नजर से बचाने के लिए तरहतरह के पूजापाठ व टोनेटोटके करवाते हैं. बच्चा डरे नहीं इसलिए उस के तकिए के नीचे लोहे की कोई चीज चाकू वगैरा रखते हैं, उस के गले में बाबाओं द्वारा सिद्ध किए ताबीज व धागे बांधने से भी गुरेज नहीं करते.

बालपन में तो बच्चे को इन की समझ नहीं होती, लेकिन जैसेजैसे वह बड़ा होता है उस के दिमाग में इन चीजों को बैठाने की कोशिश की जाती है और उस पर इतना अधिक दबाव डाला जाता है कि उसे लगने लगता है कि अगर मैं मेहनत नहीं भी करूंगा तब भी पास हो जाऊंगा, लेकिन अगर मैं ने मूर्ति के आगे हाथ नहीं जोड़े या मां के बताए टोटके नहीं किए तो अवश्य फेल हो जाऊंगा और वह कर्म से ज्यादा ढकोसलों में विश्वास करने लगता है जो उस का कैरियर टौनिक नहीं बल्कि उसे दिग्भ्रमित कर देते हैं.

यदि आप के पेरैंट्स भी आप को जबरदस्ती धार्मिक ढकोसलों में फंसाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें बताएं कि कर्म करने से फल मिलता है न कि घंटों धार्मिक पाखंडों में उलझ कर अपना समय बरबाद करने से.

जब रखें बर्थडे पर जागरण का प्रस्ताव

यदि पेरैंट्स कहें कि हम ने मन्नत मांग रखी थी कि जब तुम 15 साल के हो जाओगे तो तुम्हारे बर्थडे पर जागरण करवाएंगे इसलिए इस बार नो पार्टी विद फ्रैंड्स ओनली जागरण, तो आप उन्हें समझाएं कि मन्नतवन्नत कुछ नहीं होती, ये सब मन का वहम है. जागरण पार्टी वाले भी सिर्फ संगीत की धुन पर इमोशनली ब्लैकमेल करते हैं. वे खुद भी बजाय भगवान के, पैसे को अहमियत देते हैं, बातबात पर पैसा चढ़ाने को कहते हैं, इस से तो दोस्तों के साथ ऐंजौय करना ज्यादा अच्छा है. अत: इस बार मैं बर्थडे पर धमाल वाली पार्टी करूंगा. 

ऐसी चीज का क्या फायदा जिस में मैं मन से ही न बैठ पाऊं और अंदर ही अंदर किलसता रहूं. अगर मैं आप की तरह धार्मिक पाखंडों में फंसा रहा तो कभी न लाइफ ऐंजौय कर पाऊंगा और न ही गोल अचीव कर पाऊंगा, इसलिए मैं तो आप को भी यही सलाह दूंगा कि इन चक्करों में फंसने से अच्छा है कि जी लो अपनी जिंदगी.

परीक्षा के लिए उपवास

हम ने पंडितजी से पूछा है कि इस समय तुम पर शनि का प्रभाव है और इसी दौरान तुम्हारी परीक्षाएं भी हैं, ऐसे में तुम्हें ग्रह प्रभाव के कारण मेहनत का फल कम मिलेगा लेकिन यदि तुम पंडित द्वारा बताया उपवास करोगे तो तुम्हें अधिक सफलता मिलेगी.

एक तो सिर पर ऐग्जाम का प्रैशर और ऊपर से घर वालों का उपवास रखने की जिद, अंदर ही अंदर आप को खाए जा रही है. ऐसे में आप साफसाफ इनकार कर दें कि मैं व्रत वगैरा नहीं रखूंगा. आप के कहने का मतलब यदि ग्रह सही चल रहे हैं तो मैं किताबें न भी पढ़ूं तब भी फर्स्ट डिवीजन से पास हो जाऊंगा. मौमडैड प्लीज इन ऊटपटांग बातों में न फंसें. ये सब पंडितों के अपने जाल में फंसाने के बहाने हैं. यदि मुझे कभी व्रत रखना होगा तो मैं अपने पेट को आराम देने के लिए रखूंगा, जिस से चटोरी जबान पर भी एक दिन के लिए लगाम लगेगी.

वास्तुदोष के चक्कर में पढ़ाई का स्थान बदलना

हर बार तुम्हारे इतने कम मार्क्स आ रहे हैं जबकि तुम रातभर पढ़ाई करते हो. ऐसा अगर एक बार होता तो मुझे ज्यादा चिंता नहीं होती, लेकिन ऐसा पिछले साल से लगातार हो रहा है इसलिए मैं ने इस संबंध में अपनी फ्रैंड से बात की तो उस ने वास्तुदोष के बारे में बताया और उसी के कहने पर मैं ने जानेमाने पंडित से बात भी कर ली है. उन्होंने घर का जायजा लेने के बाद बताया है कि आप का घर वास्तुदोष से प्र्रभावित है जिस वजह से तुम्हारे मार्क्स कम आ रहे हैं. इस के लिए तुम्हारा पढ़ाई का स्थान बदलना जरूरी है.

ऐसे में मां को समझाएं कि कम मार्क्स वास्तुदोष के कारण नहीं बल्कि पढ़ाई में मन लगाने के बजाय कंप्यूटर पर वक्त जाया करने के कारण आ रहे हैं और ऐसे में आप जबरदस्ती मेरी पढ़ाई की जगह बदल देंगे तो मैं बेमन से पढ़ूंगा, इस से न तो आप का और न ही मेरा कोई फायदा होगा. इसलिए मैं तो अपनी पढ़ाई की जगह किसी भी कीमत पर बदलने को तैयार नहीं हूं.

टोटके सफलता के साथी नहीं

धर्म के ठेकेदारों ने अंधविश्वास के नाम पर लूट मचा रखी है. अपनी दुकानदारी के तहत वे श्रीयंत्र, घोड़े की नाल, ग्रहनक्षत्रों, दशाओं के आधार पर जहां अंधी लूट मचाते हैं वहीं विदेशी टोटके जैसे लाफिंग बुद्धा, रिंगिंग बैल आदि तक को बेचने के लिए अंधविश्वास का पल्ला पकड़ने से भी गुरेज नहीं करते. इस में नुकसान हर हाल में बेवकूफ बनने वालों का ही होता है.

पेरैंट्स बच्चों का हमेशा शुभ चाहने के लिए टीवी पर विज्ञापन देख प्रभावित हो जाते हैं और फिर बच्चों के मन में इन चीजों को ला कर शुभअशुभ का पाखंड पैदा करते हैं कि अगर कछुए, मछली वगैरा को देखोगे तो शुभ होगा.

ऐसे में आप उन से पूछें कि इस का मतलब तो यही हुआ कि पढ़ो नहीं बल्कि ऐग्जाम देने जाते समय इन के आगे नतमस्तक हो जाओ. ऐसी बातें सुन कर भला किस का दिल करेगा मेहनत करने का और फिर जब नंबर कम आएंगे तो सारा आरोप इन पर लगा दोगो. अरे, जब सिखाओगे गलत तो परिणाम तो गड़बड़ निकलेंगे ही. हो सकता है आप की बातें उन्हें समझ आ जाएं और आगे से वे भी इन चक्करों में पड़ना छोड़ दें.

जबरदस्ती धार्मिक किताबें पढ़ने का दबाव

अकसर देखने में आता है कि घर में उन्हीं सब चीजों को करने की कोशिश की जाती है जिन्हें हमारे बड़ेबुजुर्ग सदियों से करते आ रहे हैं. जैसे धार्मिक किताबें पढ़ना. इन को पढ़ने का महत्त्व भले ही किसी को न पता हो, लेकिन ये जरूर पता होता है कि सुबह नहाधो कर ये धार्मिक किताबें अवश्य पढ़नी हैं ताकि मन व बुद्धि सही रहे. यही सीख पेरैंट्स अपने बच्चों को भी देते हैं. यदि आप के पेरैंट्स भी आप पर इस तरह की धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का दबाव डालते हैं तो उन्हें समझाएं कि ऐसी भक्ति का क्या फायदा जिस में व्यक्ति मन लगा कर न बैठे. इस से उन्हें एहसास होगा कि आप बिलकुल सही कह रहे हैं. आगे से वे भी आप की बात सुन कर धर्म से ज्यादा कर्म करने में विश्वास करने लगेंगे.

धार्मिक सिद्धपीठों पर जाने की जिद

यदि घर में काफी समय से अशांति का माहौल है तो अकसर पेरैंट्स मन की शांति व अच्छा हो इस के लिए धार्मिक स्थलों पर जाने का प्रोग्राम बनाते हैं. उन का मकसद होता है कि सिद्धपीठ में हमें साक्षात भगवान के दर्शन होंगे जो हमारे हर दुख को हर लेंगे, जबकि ऐसा कुछ नहीं है. वहां तो धर्म के धंधेबाज यजमानों को लूटने के लिए बैठे रहते हैं.

ऐसे में आप मातापिता को समझाएं कि यदि आप लोग रिलैक्स होने के लिए कहीं जाना चाहते हैं तो ऐसी जगह जाएं जहां प्राकृतिक नजारे मन को तरोताजा कर दें, क्योंकि प्रौब्लम तो एफर्ट से ही दूर होगी न कि सिद्ध पीठ के दर्शन करने से.

नजर के धागेताबीज बांधने का नाटक

जल्दीजल्दी बीमार होना या फिर खाना छोड़ने पर इसे नजर लगी मान कर हाथ या गले में काला धागा बांध देने जैसे टोटके आज भी अधिकांश पेरैंट्स करते हैं, जो अंधविश्वास के सिवा कुछ नहीं हैं.

अरे, जब बच्चे हैल्दी खाना नहीं खाएंगे तो बीमार ही पड़ेंगे. ऐसे में काले धागे क्या मैजिक दिखा पाएंगे. इसलिए इन फुजूल के चक्करों में न पड़ कर सही तरफ ध्यान केंद्रित कर मुझे भविष्य उज्ज्वल बनाने दें.                              

समझदार बनें, अंधविश्वास से बचें

हमारे परिवारों में बच्चे को अंधविश्वास के घेरे में पालपोस कर बड़ा किया जाता है. बचपन से बच्चे के दिमाग में बैठा शुभअशुभ का डर उस के जीवन में मजबूती से पकड़ बना कर उसे कमजोर और भाग्यवादी बना देता है. किस दिन किस दिशा की तरफ जाना है, घर से क्या खा कर जाने से शुभ होगा, किस रंग के कपड़े पहनने से हर इच्छा पूरी होगी, इस तरह के अंधविश्वासों के घेरे में जब बच्चा बड़ा होता है तो वह इसे अपने बुजुर्गों की परंपरा समझ पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाता है.

अब प्रश्न उठता है कि एक बेहद अंधविश्वासी बच्चे को जो हर रूढ़ी को बड़ी सख्ती से बचपन से जवान होने तक निभाता है, अपने जीवन में असफलता का सामना क्यों करना पड़ता है? जवाब बहुत ही सहज और सरल है, सफलता और असफलता जीवन के 2 अभिन्न अंग हैं. हम कितने भी जादूटोने व अंधविश्वास अपनाएं सफलताअसफलता, सुखदुख सामान्य रूप से हमारे जीवन में आतेजाते रहेंगे.

कैसे मिलता है अंधविश्वास को बढ़ावा

राजीव का बेटा पिछले साल 12वीं में फेल हो गया था. सभी को काफी बुरा लगा. पढ़ने में एवरेज स्टूडैंट उन का बेटा इस साल काफी मेहनत कर रहा था. बच्चे को गले में एक देवी की आकृति वाला लौकेट पहनाया गया था जिसे कभी न उतारने की उसे सख्त हिदायत दी गई थी. पूछने पर राजीव ने बताया, ‘‘जब से परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने वाला लौकेट बेटे को पहनाया है, उस का मन पढ़ने में खूब लग रहा है.’’

सच यह था कि राजीव का बेटा साइंस साइड से नहीं पढ़ना चाहता था. उस का मन आर्ट साइड में था पर राजीव ने प्रैशर में उसे साइंस दिला दी. इस तरह समस्या का मूल कारण जाने बिना किशोर के दिल में बैठ गया कि लौकेट पहनने से वह अच्छे अंकों से पास हो जाएगा. अब वह अपने मित्रों में भी इस लौकेट के चमत्कार को बताएगा और बहुत से उस के साथी इस अंधविश्वास को अपना कर बिना मेहनत के पास होने का भ्रम पाल लेंगे.

इस में कोई शक नहीं कि समाज में अंधविश्वास की जड़ें काफी मजबूती से हमारे दिलोदिमाग में बैठ जाती हैं. बारबार असफल होने पर मन बहुत कमजोर हो जाता है, कमी कहां हुई जो सफलता की राह में रोड़ा बनी उन के कारण जानने के स्थान पर टोनेटोटके, तंत्रमंत्र, गंडेताबीज और भी न जाने कितनी तरह के अंधविश्वासों में फंस जाता है.

कैसे पाएं अंधविश्वास पर काबू

अंधविश्वास का मतलब है किसी पर भी आंख मूंद कर विश्वास करना औैर जब हम किसी के बताए रास्ते पर बिना अपनी बुद्धिविवेक के इस्तेमाल के चल पड़ते हैं, तो वह रास्ता हमें प्रगति के बजाय विनाश की ओर ले जाता है. कुछ समय के लिए ये रास्ते सुखद लग सकते हैं, परंतु अंत में अंधविश्वासी व्यक्ति अपने को लुटा हुआ ही महसूस करता है.

बहुत से परिवारों में बरसों पुराने ऐसे ही अंधविश्वास चलते रहते हैं. बिना लौजिक जाने घरपरिवार में बेतुके बिना सिरपैर के अंधविश्वास इसलिए चलाए जाते हैं, क्योंकि बुजुर्गों ने इन्हें शुरू किया था. ऐसे अंधविश्वासों को छोड़ना ही समझदारी है, लेकिन बच्चों के मन में इन का इतना डर बैठा होता है कि वे सोचते हैं अगर हम ने कुछ नया किया तो परिवार के साथ कुछ न कुछ बुरा हो जाएगा. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरावादी रूढि़यों को एकदम से तोड़ना भी आसान नहीं है परंतु प्रयास करने से बहुत कुछ किया जा सकता है. आइए, देखें कैसे बच्चे इन प्रगतिबाधक अंधविश्वासों पर काबू पा सकते हैं :

मेहनत और लगन से करें काम : किशोरावस्था नए जोश और हौसले का दूसरा नाम है. किशोरों को खुद भी अंधविश्वास का बहिष्कार करना चाहिए और अपने परिजनों से भी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस खोखली परंपरा से होने वाले नुकसान पर बात करनी चाहिए. संभव हो तो अपने आसपास के मित्रों को भी बताएं कि मेहनत ही एक ऐसी सीढ़ी है जो सफलता तक पहुंचा सकती है. अंधविश्वास पर निर्भरता इंसान को बुजदिल और आलसी बनाती है, जो किशोरों के पूरे व्यक्तित्व को कुंठित कर देता है.

सकारात्मक सोच को दें वरीयता :  नकारात्मक विचारों के लोग ही अंधविश्वास में ज्यादा विश्वास करते हैं. सुखसुविधाओं में पले लोग जरा सी परेशानी आते ही टोनेटोटकों या किसी जादुई शक्ति में विश्वास करने लगते हैं. जहां नकारात्मक विचार होंगे वहां अंधविश्वास लंबे समय तक पैर जमा कर अपना राज करता है. पंडेपुजारियों, पूजापाठ और तंत्रमंत्र पर पैसा व वक्त बरबाद होता है. अत: सकारात्मक विचारों को वरीयता दें. कई बार हमारे प्रयास और मेहनत में कोई कमी नहीं होती, परंतु दिशा ठीक न होने के कारण बारबार असफलता का मुंह देखना पड़ता है. अगर मन को मजबूत कर तथ्यहीन अंधविश्वासों को त्याग कर सही दिशा में सकारात्मक प्रयास करें तो आप को सफलता अवश्य मिलेगी.

एक अन्वेषक की तरह जागरूक बनें : एक जागरूक अन्वेषक की तरह हर समय यह विश्लेषण करें कि अंधविश्वास हमें कितना नुकसान पहुंचा रहा है. उस पर अमल कर के घरपरिवार का कितना भला हो रहा है. अपनी कमियों पर बारीकी से विचार करें, संभव हो तो परिजनों के साथ बैठ कर अपने सफलअसफल कार्यों की लिस्ट बनाएं और उस पर ध्यान दें.

कैरियर के लिए प्रयास कर रहे युवाओं के लिए यह फौर्मूला बहुत उपयोगी है. इस के बाद उन्हें किसी जादुई ताबीज या अंधविश्वास की जरूरत नहीं रहेगी.

अंत में हम कह सकते हैं कि अंधविश्वास हमारी बुद्धि, विद्या और बल को बाधित करते हैं और जीवन में उन्नति के सारे दरवाजे बंद कर देते हैं.

अपनी कड़ी मेहनत और लगन का पूरा श्रेय किसी ताबीज, टोनेटोटके या तंत्रमंत्र को देना ठीक नहीं. कैरियर में सफलता चाहिए या परीक्षा में अच्छे अंक तो सही दिशा में मेहनत करें. कदमकदम पर अंधविश्वास की दुकानें खोले ढोंगी बाबातांत्रिक मौके का फायदा उठाते हैं. अत: किशोर हर समय जागरूक रहें, समझदार बनें और अंधविश्वास से बचें.                    

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें