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बुढ़ापे पर भारी बच्चों की शिक्षा

मई जून में बच्चों की बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आने के साथ ही मांबाप का आर्थिक मोरचे पर इम्तिहान शुरू हो जाता है. जुलाई से शिक्षासत्र शुरू होते ही अभिभावकों में ऐडमिशन दिलाने की भागदौड़ शुरू हो जाती है. बच्चे को किस कोर्स में प्रवेश दिलाया जाए? डिगरी या प्रोफैशनल कोर्स बेहतर रहेगा या फिर नौकरी की तैयारी कराई जाए? इस तरह के सवालों से बच्चों समेत मांबाप को दोचार होना पड़ता है.

शिक्षा के लिए आजकल सारा खेल अंकों का है. आगे उच्च अध्ययन के लिए बच्चों और अभिभावकों के सामने सब से बड़ा सवाल अंकों का प्रतिशत होता है. 10वीं और 12वीं की कक्षाओं में अंकों का बहुत महत्त्व है. इसी से बच्चे का भविष्य तय माना जा रहा है. नौकरी और अच्छा पद पाने के लिए उच्चशिक्षा का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है.

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में महंगाई चरम पर है और मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के भविष्य को ले कर की जाने वाली चिंता से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. अभिभावकों को शिक्षा में हो रहे भेदभाव के साथसाथ बाजारीकरण की मार को भी झेलना पड़ रहा है. ऊपर से हमारी शिक्षा व्यवस्था में वर्णव्यवस्था भी एक खतरनाक पहलू है.

गहरी निराशा

सीबीएसई देश में शिक्षा का एक प्रतिष्ठित संस्थान माना जाता है पर राज्यस्तरीय बोर्ड्स की ओर देखें तो पता चलता है कि देश में 12वीं क्लास के ज्यादातर छात्र जिन स्कूलों में पढ़ रहे हैं वहां हालात ठीक नहीं है.

हाल ही बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के 12वीं के नतीजों ने राज्य में स्कूली शिक्षा पर गहराते संकट का एहसास कराया है. यहां पर कुल छात्रों में सिर्फ 34 प्रतिशत उत्तीर्ण हुए. इस साल 13 लाख में से 8 लाख से ज्यादा फेल होना बताता है कि स्थिति बेहद खराब है. छात्रों के मांबाप गहरी निराशा में हैं.

देश में करीब 400 विश्वविद्यालय और लगभग 20 हजार उच्चशिक्षा संस्थान हैं. मोटेतौर पर इन संस्थानों में डेढ़ करोड़ से ज्यादा छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. इन के अलावा हर साल डेढ़ से पौने 2 लाख छात्र विदेश पढ़ने चले जाते हैं.

हर साल स्कूलों से करीब 2 करोड़ बच्चे निकलते हैं. इन में सीबीएसई और राज्यों के शिक्षा बोर्ड्स के स्कूल शामिल हैं. इतनी बड़ी तादाद में निकलने वाले छात्रों के लिए आगे की पढ़ाई के लिए कालेजों में सीटें उपलब्ध नहीं होतीं, इसलिए प्रवेश का पैमाना कट औफ लिस्ट का बन गया. ऊंचे मार्क्स वालों को अच्छे कालेज मिल जाते हैं. प्रवेश नहीं मिलने वाले छात्र पत्राचार का रास्ता अपनाते हैं या फिर नौकरी, कामधंधे की तैयारी शुरू कर देते हैं.

सीबीएसई सब से महत्त्वपूर्ण बोर्ड माना जाता है. इस वर्ष सीबीएसई में 12वीं की परीक्षा में करीब साढे़ 9 लाख और 10वीं में 16 लाख से ज्यादा बच्चे बैठे थे. 12वीं का परीक्षा परिणाम 82 प्रतिशत रहा. इस में 63 हजार छात्रों ने 90 प्रतिशत अंक पाए. 10 हजार ने 95 प्रतिशत.

कुछ छात्रों में से करीब एकचौथाई को ही ऐडमिशन मिल पाता है. बाकी छात्रों के लिए प्रवेश मुश्किल होता है. 70 प्रतिशत से नीचे अंक लाने वालों की संख्या लाखों में है जो सब से अधिक है. इन्हें दरदर भटकना पड़ता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की बात करें तो नामांकन की दृष्टि से यह दुनिया के सब से बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है. लगभग डेढ़ लाख छात्रों की क्षमता वाले इस विश्वविद्यालय के अंतर्गत 77 कालेज और 88 विभाग हैं. देशभर के छात्र यहां प्रवेश के लिए लालायित रहते हैं पर प्रवेश केवल मैरिट वालों को ही मिल पाता है. यानी 70-75 प्रतिशत से कम अंक वालों के लिए प्रवेश नामुमकिन है.

सब से बड़ी समस्या कटऔफ लिस्ट में न आने वाले लगभग तीनचौथाई छात्रों और उन के अभिभावकों के सामने रहती है. उन्हें पत्राचार का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है या फिर नौकरी, कामधंधे की तैयारी शुरू करनी पड़ती है.

मांबाप बच्चों के भविष्य के लिए कुरबानी देने को तैयार हैं. जुलाई में शिक्षासत्र शुरू होते ही अभिभावकों में ऐडमिशन की भागदौड़ शुरू हो जाती है. कोचिंग संस्थानों की बन आती है. वे मनमाना शुल्क वसूल करने में जुट जाते हैं और बेतहाशा छात्रों को इकट्ठा कर लेते हैं. वहां सुविधाओं के आगे मुख्य पढ़ाईर् की बातें गौण हो जाती हैं.

ऐसे में मांबाप के सामने सवाल होता है कि क्या उन्हें अपना पेट काट कर बच्चों को पढ़ाना चाहिए? मध्यवर्गीय मांबाप को बच्चों की पढ़ाई पर कितना पैसा खर्च करना चाहिए? आज 10वीं, 12वीं कक्षा के बच्चे की पढ़ाई का प्राइवेट स्कूल में प्रतिमाह का खर्च लगभग 10 से 15 हजार रुपए है. इस में स्कूल फीस, स्कूलबस चार्ज, प्राइवेट ट्यूशन खर्च, प्रतिमाह कौपीकिताब, पैनपैंसिल, स्कूल के छोटेमोटे एक्सट्रा खर्च शामिल हैं.

मांबाप का इतना खर्च कर के अगर बच्चा 80-90 प्रतिशत से ऊपर मार्क्स लाता है, तब तो ठीक है वरना आज बच्चे की पढ़ाई का कोई अर्थ नहीं समझा जाता. यह विडंबना ही है कि गुजरात में बोर्ड की परीक्षा में 99.99 अंक लाने वाले छात्र वर्शिल शाह ने डाक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस बनने के बजाय धर्र्म की रक्षा करना ज्यादा उचित समझा. उस ने संन्यास ग्रहण कर लिया.

बढ़ती बेरोजगारी

यह सच है कि शिक्षा के बावजूद बेरोजगारी देश के युवाओं को लील रही है. पिछले 15 सालों के दौरान 99,756 छात्रों ने आत्महत्या कर ली. ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के हैं. ये हालात बताते हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था कैसी है. 12वीं पढ़ कर निकलने वाले छात्रों के अनुपात में कालेज उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में छात्रों को आगे की पढ़ाई के लिए ऐडमिशन नहीं मिल पाता. छात्र और उन के मांबाप के सामने कितनी विकट मुश्किलें हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद बेरोजगारी की समस्या अधिक बुरे हालात पैदा कर रही है.

देश की शिक्षाव्यवस्था बदल गई है. आज के दौर में पढ़ाई तनावपूर्ण हो गई है. अब देश में शिक्षा चुनौतीपूर्ण, प्रतिस्पर्धात्मक हो चुकी है और परिणाम को ज्यादा महत्त्व दिया जाने लगा है. बच्चों को पढ़ानेलिखाने के लिए मांबाप पूरी कोशिश करते हैं. छात्रों पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए दबाव रहता है. कई बार ये दबाव भाई, बहन, परिवार, शिक्षक, स्कूल और समाज के कारण होता है. इस तरह का दबाव बच्चे के अच्छे प्रदर्शन के लिए बाधक होता है.

जहां तक बच्चों का सवाल है, कुछ बच्चे शैक्षणिक तनाव का अच्छी तरह सामना कर लेते हैं पर कुछ नहीं कर पाते और इस का असर उन के व्यवहार पर पड़ता है.

असमर्थता को ले कर उदास छात्र तनाव से ग्रसित होने के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं या कम मार्क्स ले कर आते हैं. बदतर मामलों में तनाव से प्रभावित छात्र आत्महत्या का विचार भी मन में लाते हैं और बाद में आत्महत्या कर लेते हैं. इस उम्र में बच्चे नशे का शिकार भी हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में मांबाप की अपेक्षा भी होती है कि बच्चे अच्छे मार्क्स ले कर आएं, टौप करें ताकि अच्छे कालेज में दाखिला मिल सके या अच्छी जौब लग सके.

दुख की बात है कि हम एक अंधी भेड़चाल की ओर बढ़ रहे हैं. कभी नहीं पढ़ते कि ब्रिटेन में 10वीं या 12वीं की परीक्षाओं में लड़कों या लड़कियों ने बाजी मार ली. कभी नहीं सुनते कि अमेरिका में बोर्ड का रिजल्ट आ रहा है. न ही यह सुनते हैं कि आस्ट्रेलिया में किसी छात्र ने 99.5 फीसदी मार्क्स हासिल किए हैं पर हमारे यहां मईजून के महीने में सारा घरपरिवार, रिश्तेदार बच्चों के परीक्षा परिणाम के लिए एक उत्सुकता, भय, उत्तेजना में जी रहे होते हैं. हर मांबाप, बोर्ड परीक्षा में बैठा बच्चा हर घड़ी तनाव वअसुरक्षा महसूस कर रहा होता है.

कर्ज की मजबूरी

मैरिट लिस्ट में आना अब हर मांबाप, बच्चों के लिए शिक्षा की अनिवार्य शर्त बन गई है. मांबाप बच्चों की पढ़ाईर् पर एक इन्वैस्टमैंट के रूप में पैसा खर्र्च कर रहे हैं. यह सोच कर कर्ज लेते हैं मानो फसल पकने के बाद फल मिलना शुरू हो जाएगा पर जब पढ़ाई का सुफल नहीं मिलता तो कर्ज मांबाप के लिए भयानक पीड़ादायक साबित होने लगता है.

मध्यवर्गीय छात्रों के लिए कठिन प्रतियोगिता का दौर है. इस प्रतियोगिता में वे ही छात्र खरे उतरते हैं जो असाधारण प्रतिभा वाले होते हैं. पर ऐसी प्रतिभाएं कम ही होती हैं. मध्यवर्ग में जो सामान्य छात्र हैं, उन के सामने तो भविष्य अंधकार के समान लगने लगता है. इस वर्ग के मांबाप अकसर अपने बच्चों की शैक्षिक उदासीनता यानी परीक्षा में प्राप्त अंकों से नाराज हो कर उन के साथ डांटडपट करने लगते हैं.

उधर निम्नवर्गीय छात्रों के मांबाप अधिक शिक्षा के पक्ष में नहीं हैं. कामचलाऊ शिक्षा दिलाने के बाद अपने व्यवसाय में हाथ बंटाने के लिए लगा देते हैं.

एचएसबीसी के वैल्यू औफ एजुकेशन फाउंडेशन सर्वेक्षण के अनुसार, अपने बच्चों को विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा के लिए तीनचौथाई मांबाप कर्ज लेने के पक्ष में हैं. 41 प्रतिशत लोग मानते हैं कि अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना सेवानिवृत्ति के बाद के लिए उन की बचत में योगदान करने से अधिक महत्त्वपूर्ण है.

एक सर्वे बताता है कि 71 प्रतिशत अभिभावक बच्चों की शिक्षा के लिए कर्ज लेने के पक्ष में हैं.

अब सवाल यह उठता है कि मांबाप को क्या करना चाहिए? मांबाप को देखना चाहिए कि वे अपने पेट काट कर बच्चों की पढ़ाई पर जो पैसा खर्च कर रहे हैं वह सही है या गलत. 10वीं और 12वीं कक्षा के बाद बच्चों को क्या करना चाहिए,  इन कक्षाओं में बच्चों के मार्क्स कैसे हैं? 50 से 70 प्रतिशत, 70 से 90 प्रतिशत अंक और 90 प्रतिशत से ऊपर, आप का बच्चा इन में से किस वर्ग में आता है.

अगर 90 प्रतिशत से ऊपर अंक हैं तो उसे आगे पढ़ाने में फायदा है. 70 से 80 प्रतिशत अंक वालों पर आगे की पढ़ाई के लिए पैसा खर्च किया जा सकता है. मगर इन्हें निजी संस्थानों में प्रवेश मिलता है जहां खर्च ज्यादा है और बाद में नौकरियां मुश्किल से मिलती हैं. इसी वर्ग के बच्चे बिगड़ते भी हैं और अनापशनाप खर्च करते हैं.

तकनीकी दक्षता जरूरी

कर्ज ले कर पढ़ाना जोखिमभरा है पर यदि पैसा हो तो जोखिम लिया जा सकता है. अगर 70, 60 या इस से थोड़ा नीचे अंक हैं तो बच्चे को आगे पढ़ाने से कोई लाभ नहीं होगा पर शिक्षा दिलानी जरूरी होती है. यह दुविधाजनक घाटे का सौदा है.

इन छात्रों को सरकारी संस्थानों में प्रवेश मिल जाता है जहां फीस कम है. 36 से 50 प्रतिशत अंक वाले निम्न श्रेणी में गिने जाते हैं. इन बच्चों के मांबाप को चाहिए कि वे इन्हें अपने किसी पुश्तैनी व्यापार या किसी छोटी नौकरी में लगाने की तैयारी शुरू कर दें.

ऐसे बच्चों को कोई तकनीकी टे्रड सिखाया जा सकता है. कंप्यूटर, टाइपिंग सिखा कर सरकारी या प्राइवेट क्षेत्र में क्लर्क जैसी नौकरी के प्रयास किए जा सकते हैं. थोड़ी पूंजी अगर आप के पास है तो ऐसे बच्चों का छोटामोटा व्यापार कराया जा सकता है.

शिक्षा के लिए मांबाप पैसों का इंतजाम कर्ज या रिश्तेदारों से उधार ले कर या जमीनजायदाद बेच कर करते हैं. यह कर्ज बुढ़ापे में मांबाप को बहुत परेशान करता है. ऐसे में कम मार्क्स वाले बच्चों के लिए आगे की पढ़ाईर् पर कर्ज ले कर खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है.

देश में कुकुरमुत्तों की तरह खुले प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में कम अंकों वाले छात्रों को मोटा पैसा ले कर भर लिया जाता है पर यहां गुणवत्ता के नाम पर पढ़ाई की बुरी दशा है. एक सर्वे में कहा गया है कि देशभर से निकलने वाले 80 प्रतिशत से ज्यादा इंजीनियर काम करने के काबिल नहीं होते. केवल इंजीनियर ही नहीं, आजकल दूसरे विषयों के ग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट छात्रों के ज्ञान पर भी सवाल खड़े होते रहते हैं. प्रोफैशनलों की काबिलीयत भी संदेह के घेरे में है.

मांबाप को देखना होगा कि आप का बच्चा कहां है? किस स्तर पर है? मध्यवर्ग के छात्र को प्रत्येक स्थिति में आत्मनिर्भर बनाना होगा क्योंकि मांबाप अधिक दिनों तक उन का बोझ नहीं उठा सकते.

शिक्षा का पूरा तंत्र अब बदल रहा है. मांबाप अब 12वीं के बाद दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम यानी पत्राचार के माध्यम से भी बच्चों को शिक्षा दिला सकते हैं. दूरस्थ शिक्षा महंगी नहीं है. इस माध्यम से आसानी से किसी भी बड़े व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बहुत कम फीस पर प्रवेश लिया जा सकता है. कई छोटे संस्थान भी किसी विशेष क्षेत्र में कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं. इस तरह यह पढ़ाई मांबाप के बुढ़ापे पर भारी भी नहीं पड़ेगी.

इंटरनेट पर दिखने वाली फोटो असली है या नकली

आज कल इंटरनेट और सोशल मीडिया पर फेक या एडिटेड फोटोज वायरल होना तो जैसे आम बात हो गई है. पहले लोग फोटो को ऑरिजनल समझ कर खूब शेयर किया करते हैं, लेकिन कई बार बाद में पता चलता है कि ये फोटो फेक हैं या नकली हैं.

आज हम आपको बताने जा रहे हैं फेक और ऑरिजनल फोटो में फर्क पता लगाने के कुछ तरीके. यहां हम आपको कुछ ऑनलाइन टूल्स उपलब्ध हैं जिनसे आप आसानी से पता लगा सकते हैं की ये इंटरनेट पर दिखने वाली ये फोटो फेक है या रियल.

1. Error Level Analysis

वेबसाइट fotoforensics.com पर जिस फोटो के बारे में पता लगाना है उसका URL अपलोड करें. ये वेबसाइट Error Level Analysis कर, कम्प्रेशन हीट मैप बनाता है. इसके बाद फोटो का जो हिस्सा कम मैच करता है वो आपको थोड़ा ज्यादा व्हाइट डॉटेड वाला दिखेगा और आपको पता चल जाएगा कि तस्वीर नकली है या नहीं.

इन कई वेबसाइट्स पर और भी टूल्स अवेलेबल हैं, जो बताते हैं कि फोटो असली है या फेक –

fotoforensics.com

tineye.com

pipl.com

webmii.com

findexif.com

2. मेटा डाटा

जब भी कोई फोटो खींची जाती है तो उससे जुड़ी इन्फॉर्मेशन जैसे डेट, टाइम, कैमरा मॉडल और कई बार एडिटिंग सॉफ्टवेयर भी सेव हो जाते हैं. अगर आपने कोई फोटो ऑनलाइन देखी है तो हो सकता है कि उससे जुड़ी इन्फॉर्मेशन का भी आप पता लगा सकते हो.

ऑनलाइन ऐसे कई टूल्स हैं जो फोटो की एक्जैक्ट डिटेल्स बता सकते हैं. हालांकि, ये तरीका फुलप्रूफ नहीं है. मेटाडाटा में आसानी से बदलाव भी किया जा सकता है.

उदाहरण के लिए – ऑनलाइन टूल- Izitru (http://www.izitru.com/)

3. ध्यान से देखें परछाई और लाइट –

कई बार सिर्फ ध्यान से देखने पर ही फोटो में फर्क समझ में आ जाता है. अगर किसी नेचुरल जगह की फोटो है या ऐसी फोटो है जहां बहुत लाइट है तो फोटो में मौजूद चीजों की शैडो (परछाई) को चेक कीजिए. भले ही इंसान फोटोशॉप एक्सपर्ट क्यों ना हो, लेकिन परछाई बनाने में बहुत मेहनत लगती है ऐसे में फोटो में कोई ना कोई गलती हो जाती है.

शिफ्टिंग लाइट : ये अक्सर मैगजीन कवर में देखा जा सकता है फोटोशॉप का इस्तेमाल सिर्फ मॉडल्स पर ही नहीं बल्कि साथ रखे फर्नीचर आदि पर भी किया जाता है. ऊपर दी गई फोटो का बैकग्राउंड तो बदल दिया गया है, लेकिन लाइट का रिफ्लेक्शन सही नहीं दिया गया है. साथ ही, दीवार के पास थड़े कपल्स का शौडो सही नहीं है.

4. इमेज साइज पर दें ध्यान

फोटोशॉप के द्वारा बनाई गई फोटोज अक्सर साइज में नॉर्मल फोटोज से बड़ी होती हैं. ऐसा इसलिए होता है कि फोटोशॉप पर काम करते समय लेयर्स बन जाती हैं. ऐसे में हेवी फोटोशॉप का इस्तेमाल जिस भी फोटो में किया गया होगा वो नॉर्मल फोटो से बड़ी होगी. इसके अलावा, अगर किसी फोटो को कम्प्रेशन सॉफ्टवेयर से छोटा किया गया है तो उसकी क्वालिटी में फर्क पड़ेगा. ऐसे में यूजर्स पता लगा सकते हैं कि फोटो असली है या नकली.

5. रिवर्स गूगल सर्च

इस तरीके को पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऑरिजिनल फोटोज गूगल इमेज सर्च में नहीं मिलेगी, लेकिन अगर किसी फोटो को फोटोशॉप किया गया है तो उसके जैसी कोई फोटो गूगल पर मिल सकती है जैसे इस पोस्ट की पहली फोटो के लिए हमने गूगल से ली गई एक फोटो का इस्तेमाल किया है. ये तरीका सोशल मीडिया में वायरल हो रही फोटोज के बारे में पता लगाने के काम आ सकता है.

रियालिटी शो के हिमायती फिल्मकार शब्बीर खान

‘हीरोपंती’ और ‘बागी’ जैसी सफलतम फिल्मों के निर्देशक शब्बीर खान अब नई ‘‘मुन्ना माइकल’’ लेकर आ रहे हैं. जिसमें बच्चे को उसकी पसंद के क्षेत्र में काम करने के लिए बढ़ावा देने की बात की गयी है. इसी के साथ इस फिल्म में इन दिनों जिस तरह से टीवी पर नृत्य के रियालिटी शो प्रसारित हो रहे हैं, उसी तरह से शब्बीर खान ने अपनी फिल्म में भी नृत्य के रियालिटी शो को पेश किया है. टीवी पर प्रसारित हो रहे रियालिटी शो को लेकर लोग विभाजित हैं. तमाम लोगों की राय में टीवी के रियालिटी शो की वजह से बच्चे दिग्भ्रमित हो रहे हैं. मगर शब्बीर खान टीवी के रियालिटी शो के पक्ष में खड़े हुए हैं.

हाल ही में ‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास बातचीत में शब्बीर खान ने टीवी के नृत्य रियालिटी शो पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा – ‘‘मुझे लगता है कि यह बहुत सही कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं, क्योंकि इन कार्यक्रमों में आ रहे बच्चों में एक कला है, जिसे वे टीवी के माध्यम से लोगों के सामने पेश कर रहे हैं. इनमें से जो लोग जीतते हैं, उन्हें इस क्षेत्र में आगे कुछ करने की प्रेरणा मिलती है. लेकिन यह मानना कि इन रियालिटी शो के सभी बच्चे सफल हो जाएं, यह सही नहीं है. ऐसा किसी भी क्षेत्र में नहीं होता है. पूरा हिंदुस्तान क्रिकेट खेलता है. गली गली में आपको बच्चे क्रिकेट खेलते मिल जाएंगे, पर सभी सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली या एम एस धोनी तो नहीं हो सकते. इसी तरह से डांस या नृत्य भी पूरे देश में लोकप्रिय है. हर बच्चा डांस करना चाहता है. डांस के कितने ट्रेनिंग स्कूल खुले हुए हैं. इसके बावजूद सबको सफलता नहीं मिल सकती. अब हम साल में कम से कम 300 से अधिक फिल्में बनाते हैं, जिनमें से सफलता तो 8-10 फिल्मों को ही मिलती है.’’

शब्बीर खान ने आगे कहा – ‘‘मेरा मानना है कि टीवी के रियालिटी शो से बच्चों के भविष्य पर असर पड़ता है, इस तरह से सोचने की बजाय यह देखना चाहिए कि बच्चा किस तरह की कला में रूचि रखता है? यदि बच्चे को डांस में या संगीत में रूचि है और वो इस तरह के रियालिटी शो से जुड़ रहा है, तो मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती.’’

जब हमने उनसे कहा कि मगर गली गली क्रिकेट खेलने वाले बच्चों को राष्ट्रीय स्तर पर शोहरत नहीं मिलती, पर डांस के टीवी रियालिटी शो से जुड़ते ही बच्चों को राष्ट्रीय स्तर पर शोहरत मिल जाती है. यह शोहरत कहीं न कहीं इन बच्चे के भविष्य पर असर डालती है? इस पर शब्बीर खान ने कहा – ‘‘देखिए, आप हर चीज को नकारात्मक दृष्टिकोण से क्यों देखते हैं? हमें सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए. श्रेया घोषाल, सुनिधि चैहान, अरजीत सिंह यह सारे गायक रियालिटी शो की ही पैदाइश हैं. इनका नाम भी है. इन्हें जबरदस्त शोहरत मिल रही है. इनका करियर भी अच्छा जा रहा है. इनका स्वभाव भी अच्छा है. मेरे कहने का अर्थ ये है कि जब बच्चे को राष्ट्रीय स्तर पर शोहरत मिल जाती है, तो इसके ये मायने नहीं हैं कि वो सफल हो गया. टीवी के रियालिटी शो के खत्म होने के बाद उसे अपने करियर के दृष्टिकोण से इस शोहरत को सकारात्मक ढंग से उपयोग करना पडता है. टीवी के रियालिटी शो से मिली शोहरत के बल पर आप हवा में उड़ेंगें, तो कुछ नहीं होना है. यहां इन बच्चों के माता पिता की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने बच्चे का सिर आसमान में न चढ़ाएं. उन्हें जमीन पर रहना सिखाएं. यदि आप नकारात्मक ढंग से सोचेंगे, तो नुकसान होगा. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह के इंसान हैं.’’

वाई-फाई हॉटस्पॉट खोजने में मदद करेगा फेसबुक

अब फेसबुक अपने यूजर्स को आसपास के वाई-फाई हॉटस्पॉट की खोज करने में भी मदद करेगा. इस तकनीक का प्रयोग करके आप अपने डाटा की सेविंग कर सकते हैं. फेसबुक ने पिछले साल 'फाइंड वाई-फाई' के नाम से फीचर लांच किया था. उस समय इसे केवल आईओएस यूजर्स के लिए और कुछ देशों में ही लांच किया गया था. फेसबुक के इंजीनियरिग डायरेक्टर एलेक्स हिमेल ने कहा, 'हम पूरी दुनिया में आईओएस और एंड्रॉयड यूजर्स के लिए फाइंड वाई-फाई का विकल्प खोलने जा रहे हैं. यह ऐसे यूजर्स के लिए मददगार होगा, जिनके पास सेल्युलर डाटा कम हो. इसके इस्तेमाल के लिए फेसबुक ऐप पर 'मोर' टैब में 'फाइंड वाई-फाई' का विकल्प मिलेगा.

स्पैम और फेक न्यूज पर लगेगी लगाम

फेसबुक ने झूठी खबरों और गलत पोस्ट से निपटने के लिए नया अपडेट जारी किया है. नए अपडेट में ऐसा एल्गोरिदम लगाया गया है, जिससे आपकी न्यूज फीड में बेकार पोस्ट कम से कम दिखेंगीं. फेसबुक के न्यूज फीड वाइस प्रेसीडेंट एडम मोसेरी ने कहा, 'हम हमेशा से न्यूज फीड में लोगों को बेहतर अनुभव देने का प्रयास करते हैं.  उम्मीद है कि नया अपडेट आपके अनुभव को और भी बेहतर एहसास कराएगा.

सेफ प्रोफाइल पिक्चर टूल

फेसबुक ने अपने यूजर्स के लिए भारत में एक नया टूल पेश किया है. इसके जरिए प्रोफाइल पिक्चर को डाउनलोड और शेयर करने से सुरक्षित रखा जा सकता है. ज्यादातर लोग फेसबुक पर अपने दोस्तों को फोटोज के माध्यम से ही ढूंढते हैं. क्योंकि एक नाम के कई व्यक्ति फेसबुक पर मौजूद होते हैं, ऐसे में नाम से किसी को ढूंढना संभव नहीं है. लेकिन कई यूजर्स हैं जो फेसबुक पर फोटो लगाना सुरक्षित नहीं मानते हैं.

क्या कहना है फेसबुक का ?

नई दिल्ली के सेंटर फॉर सोशल रिसर्च एंड लर्निंग लिंक्स फाउंडेशन के साथ कई संगठनों ने मिलकर इस परेशानी से निजात पाने के लिए एक नया टूल बनाया है. फेसबुक की प्रोडक्ट मैनेजर आरती सोमान ने कहा, "हम नए टूल शुरू कर रहे हैं जो भारत में लोगों को इस संदर्भ में अधिक नियंत्रण देगा कि प्रोफाइल पिक्चर कौन डाउनलोड और शेयर कर सकता है. इसके साथ हम वे रास्ते भी तलाश रहे हैं जिनके जरिए लोग प्रोफाइल पिक्चर के साथ आसानी से डिजाइन जोड़ सकते हैं. इसे हमारे शोध ने दुरुपयोग रोकने में मददगार पाया गया है".

फेसबुक की मानें तो इस टूल को बाकी के देशों में जल्द ही पेश किए जाएगा. यह टूल यूजर्स की प्रोफाइल पिक्चर को सुरक्षित करेगा जिससे फोटोज का दुरुपयोग न हो पाए

इससे पहले फेसबुक ने दो नए फीचर्स लॉन्च करने बात कही थी. ये फीचर फेसबुक लाइव के तहत इस्तेमाल किए जा सकेंगे. इससे यूजर्स को लाइव ब्रॉडकास्ट से कनेक्ट होने में आसानी होगी. फिलहाल फेसबुक इस फीचर को टेस्ट कर रहा है और इस साल के आखिरी तक इसे सभी यूजर्स के लिए उपलब्ध करा दिया जाएगा.

10 कारण प्रेम विवाह टूटने के

विवाह से पहले एकदूसरे को पाने की चाह में जो युगल समाज तथा परिवार के विरुद्ध जाने से भी संकोच नहीं करते, अचानक विवाह होते ही या उम्र के किसी भी पड़ाव में एकदूसरे से आखिर अलग होने का निश्चय क्यों कर लेते हैं. यह बहुत चिंतनीय विषय है, क्योंकि पहले के जमाने के विपरीत आधुनिक समय में अधिकतर विवाह युवाओं द्वारा स्वेच्छा से किए जा रहे हैं. मातापिता द्वारा पारंपरिक सुनियोजित विवाह को उन के द्वारा नकारा जा रहा है. इन के असफल होने के कई ठोस कारण हैं:

– प्रेम विवाह बौलीवुड की ही देन है, जहां जीवनसाथी ढूंढ़ते समय न उम्र की परवाह होती है न जाति के बंधन की. जिस रफ्तार से प्रेम विवाह का फैसला यहां लिया जाता है उसी रफ्तार से तलाक भी हो जाता है. ‘तू नहीं और सही’ यह सोच पूरे बौलीवुड को अपनी गिरफ्त में लिए हुए है, जिस के प्रभाव से साधारण जनता भी अछूती नहीं है. यह तो सर्वविदित है ही कि फिल्मों के नायकनायिका की जीवनशैली आम जनता को बहुत जल्दी प्रभावित करती है, क्योंकि वे उन के आदर्श होते हैं.

 बौंबे हाई कोर्ट ने एक केस के संदर्भ में 2012 में बताया था कि अरेंज्ड मैरिज के बजाय प्रेम विवाहों में तलाकों की संख्या कहीं ज्यादा है. 1980 से प्रेम विवाह के चलन ने जोर पकड़ा. उस से पहले प्रेम की अभिव्यक्ति ही इतनी कठिन थी कि परिवार वालों के सामने जाहिर होने से पहले ही वह कहीं और रिश्ता जुड़ने के कारण दम तोड़ देती थी. यह चलन अभी महानगरों तक ही सीमित है. अभी छोटे शहरों और गांवों में इसे समाज द्वारा मान्यता नहीं मिली है. यह स्थिति भी देखने को मिल सकती है कि यदि परिवार वालों को पता लग जाता है, तो समाज में अपने मानसम्मान को ठेस न पहुंचे, इस से बचने के लिए वे अपने बच्चों की हत्या तक करने से भी गुरेज नहीं करते.

– प्रेम जिस की परिणति विवाह में होती है वह वास्तव में प्रेम नहीं होता, महज शारीरिक आकर्षण होता है. प्रेम और विवाह सिक्के के दो पहलू होते हैं. कोई जरूरी नहीं कि एक प्रेमी अच्छा पति भी साबित हो या एक प्रेमिका अच्छी पत्नी साबित हो. विवाह के पहले एक ही व्यक्ति के गुणों पर रीझ कर उस के साथ जीवनयापन का निर्णय करते हैं, लेकिन भारत में विवाह के बाद पत्नी को पति के सारे परिवार से तालमेल बना कर चलना पड़ता है, पति को भी पत्नी के साथ अपने परिवार की जिम्मेदारी निभानी होती है.

प्रेम विवाह तभी सफल होता है जब इस का आधार त्याग, प्रतिबद्धता, समर्पण, समझौता हो जोकि प्राय: आधुनिक युवावर्ग में देखने को नहीं मिलता है, इसलिए विवाह के पहले देखे गए दिवास्वप्न विवाह के बाद धराशायी होते देख कर पत्नी विद्रोह करने लगती है, जिस का परिणाम तलाक होता है.

– आधुनिक लड़कियां पढ़लिख कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई हैं. इस का सकारात्मक प्रभाव के साथ नकारात्मक प्रभाव यह पड़ रहा है कि वे असहनशील होने के साथसाथ अभिमानी भी हो रही हैं, जोकि सफल वैवाहिक जीवन के लिए घातक है.

– आधुनिक युवावर्ग अपनी वैयक्तिकता को प्राथमिकता देता है और किसी भी प्रकार का समझौता करने से कतराता है, जोकि वैवाहिक जीवन का आधार है. इसी कारण केरल राज्य में तलाकों की संख्या सब से अधिक है. वहां के लोगों की सोच है कि हर व्यक्ति को विवाह करना ही क्यों चाहिए?

– अमेरिका और कनाडा के साथसाथ कई पश्चिमी देशों के लोग भी अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हैं. आजकल हमारे युवा भी या तो उन देशों में नौकरी के कारण वहां जा कर बस गए हैं या फिर भारत में रह कर विदेशी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं, इसलिए वहां के लोगों के वैवाहिक जीवन का हमारी युवा पीढ़ी पर भी बहुत प्रभाव पड़ रहा है. मगर वे भूल जाते हैं कि भारत के विपरीत वहां के युवा न तो परिवार और न ही समाज के प्रति उत्तरदायी होते हैं.

15-16 साल की उम्र के बाद ही न वे मातापिता के प्रति कर्तव्यों के लिए बाध्य होते हैं और न ही मातापिता का उन के प्रति कोई कर्तव्य शेष रह जाता है. उन्हें समाज क्या कहेगा, इस का उन्हें कतई भय नहीं होता है.- फिर अब तलाक लेना भी बहुत आसान हो गया है खासकर महिलाओं के लिए संविधान की धारा 498 के अंतर्गत वे ससुराल पक्ष पर शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगा कर बहुत आसानी से उन से छुटकारा पा सकती हैं. इस के लिए उन्हें कोई प्रमाण दिखाने की भी आवश्यकता नहीं होती है. हां, इस का महिलाओं द्वारा दुरुपयोग करने के कारण लोगों के दबाव डालने पर संविधान के इस कानून में अब संशोधन किया गया है.

– समाज में दिनप्रतिदिन तलाकों की संख्या में बढ़ोतरी भी युवावर्ग को तलाक लेने के लिए प्रेरित कर रही है. ‘दोस्त तलाक ले सकता है तो मैं क्यों नहीं? शायद दूसरा पार्टनर इस से बेहतर मिल जाए’, यह सोच युवावर्ग पर हावी है.

– प्रेम विवाह अधिकतर बिना सोचेसमझे, अपनी मरजी से होता है, इसलिए उसे अपनी मरजी से तोड़ना भी बहुत आसान लगता है, क्योंकि समाज या परिवार का उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं होता.

– लिव इन रिलेशनशिप भी प्रेम विवाह का ही एक रूप है. महानगरों में इस का चलन खूब जोर पकड़ रहा है. इस में लड़केलड़कियां अपने परिवार को सूचित किए बिना ही स्वेच्छा से एकदूसरे के साथ रहते हैं और आवश्यक नहीं कि साथ रहते हुए वे विवाह के बंधन में बंध ही जाएं. उन्हें रिश्ता टूटने पर तलाक लेने के लिए किसी कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता नहीं होती है यानी बंधनरहित विवाह में यह बहुत सुखदायी रिश्ता लगता है. लेकिन यह तभी तक ठीक है, जब तक दोनों में तालमेल है, क्योंकि समाज और परिवार की मानसिकता इस रिश्ते की स्वीकृति नहीं देती और उन का सहयोग न मिलने के कारण एक के भी द्वारा रिश्ता तोड़ने पर दूसरा भावनात्मक रूप से आहत हो कर अवसाद में चला जाता है. आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाता है. अभिनेत्री प्रत्यूषा इस का ताजा उदाहरण हैं. उन से पहले जिया खान ने भी यह कदम उठाया था.

2005 में साउथ की प्रसिद्ध अभिनेत्री खुशबू के लिव इन रिलेशनशिप और विवाह से पहले शारीरिक रिश्ता रखने के समर्थन में साक्षात्कार में खुलेआम बोलने पर विरोधियों का कहना था कि इस से हमारे समाज की लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा. अत: उन के विरोध में 22 एफआईआर दर्ज होने के बाद खुशबू द्वारा केस दर्ज करने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई स्त्री और पुरुष साथ रहना चाहते हैं तो उस का विरोध क्यों हो? ऐसा कर के वे क्या अपराध कर रहे हैं? यह लोगों की मानसिकता के अनुसार गलत हो सकता है, लेकिन गैरकानूनी नहीं. संविधान के आर्टिकल 21 में दिए गए मौलिक अधिकार ‘स्वतंत्रता से जीने का अधिकार’ के अंतर्गत यह आता है. यह उन का व्यक्तिगत मामला है.

प्रेम विवाह की तरह 22 मई, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को भी विवाहित रिश्ते के समान वैधानिक घोषित कर दिया था.

तलाक लेने के लिए कानून हमारे हित को ध्यान में रख कर ही बनाया गया है, लेकिन उपयोग के स्थान पर उस का दुरुपयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है. मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताडि़त होने पर ही तलाक लेना उचित है. छोटीछोटी बातों को तूल दे कर या कोई दूसरा पसंद आ जाए तो तलाक लेने का परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकता. विवाह चाहे किसी भी प्रकार का हो उस की नींव आपसी समझदारी और समझौते पर ही टिकी होती है.

पश्चिमी देशों के विपरीत हमारे देश में वैवाहिक जीवन में परिवार का जो सहयोग मिलता है वह उसे सफल बनाने के लिए बहुत आवश्यक है.

विवाह सामाजिक बंधन के रूप में ही ठीक है, बिना बंधन के वह बिना पतवार की नौका के समान है, जिस की कोई मंजिल नहीं होती. यहां प्रेम विवाह का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने अति आवश्यक हैं.

मातापिता को अपने बच्चों की भावनाओं को समझ कर उन की पसंद को स्वीकार करते हुए सहयोगात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए. उन के मार्गदर्शन से ही बच्चों के वैवाहिक जीवन में ठहराव और अनुशासन की कल्पना की जा सकती है.                      

आप का बच्चा कुपोषण का शिकार तो नहीं

किसी भी शिशु के शुरुआती 1000 दिन उस के जीवन का आधार होते हैं. इसी समय के पोषण से उस के भविष्य की नींव बनती है. लेकिन भारत में बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य को ले कर काफी सुधार होने के बावजूद लाखों बच्चे अपने 5वें जन्मदिन से पहले विटामिन और मिनरल की कमी से जूझ रहे होते हैं. विटामिन और मिनरल की कमी को माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी भी कहा जाता है और यह शिशुओं में बीमारियां होने व मृत्यु दर बढ़ने का सब से बड़ा कारण है.

पोषक तत्त्वों की कमी

स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, विटामिन व मिनरल की कमी का सब से भयावह परिणाम यह है कि प्रतिवर्ष पैदा होने वाले 26 लाख मिलियन बच्चों में से 7 लाख से ज्यादा शिशु शुरुआती समय तक भी जीवित नहीं रह पाते. स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार देश की 13 फीसदी आबादी 6 साल से कम उम्र के बच्चों की है और उन में से 12.7 लाख बच्चों की पोषण की कमी के चलते रोजाना मौत होती है. इन गंभीर तथ्यों में यह जोड़ना भी जरूरी है कि जिस शुरुआती दौर में शिशुओं को प्रचुर मात्रा में माइक्रोन्यूट्रिएंट की सब से ज्यादा जरूरत होती है, उसी दौर में 75 फीसदी शिशुओं की मृत्यु का कारण पोषक तत्त्वों की कमी पाया गया है.

शारीरिक विकास के लिए

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के नियोनेटोलौजिस्ट, डा. सतीश सलूजा के अनुसार, ‘‘6 से 24 महीने की उम्र के बीच के शिशुओं में कमजोर विकास और संक्रमण होने के मामले सब से ज्यादा आते हैं और इस का कारण उन्हें सही पोषण न मिलना है. शिशुओं के सामान्य विकास के लिए सही मात्रा में विटामिन और मिनरल डाइट देना बहुत जरूरी है. 5 साल से कम उम्र के शिशुओं में निमोनिया, डायरिया, खसरा और मलेरिया होने की मुख्य वजह कुपोषण है.’’

अगर किसी भी शिशु को शुरुआती 1000 दिनों के दौरान पोषक तत्त्वों से युक्त आहार दिया जाए तो उस का बेहतर शारीरिक विकास होता है और उस की सोचने व याद करने की क्षमता में भी वृद्धि होती है. इतना ही नहीं वह बच्चा वयस्क होने पर कम बीमार होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिशु स्तनपान से ठोस आहार की ओर बढ़ता है तो उसे माइक्रोन्यूट्रिएंट देने का गैप सब से ज्यादा होता है, क्योंकि उस की जरूरतें बढ़ती हैं, पर उसी दौरान उसे पोषक आहार देना कम होता जाता है.

ध्यान दें

डा. सतीश सलूजा के अनुसार, ‘‘6 महीने की उम्र के बाद शिशुओं में पोषक तत्त्वों की कमी न हो, इस के लिए जरूरी है कि इस उम्र में उन्हें भरपूर पोषक तत्त्व दिए जाएं. इस उम्र में शिशओं के स्तनपान के साथ पोषक तत्त्वों से युक्त आहार (विटामिन, मिनरल, फोर्टीफाइड अनाज/भोजन, आयरन, मल्टी विटामिन ड्रौप सप्लिमैंट) दिया जाना चाहिए.’’                         

बालों की देखभाल से जुड़े मिथक

अकसर बालों को ले कर तरहतरह के मिथक सुनने को मिलते हैं जैसेकि शैंपू बदलने से बाल स्वस्थ रहते हैं, सफेद बाल तोड़ने पर वहां के और भी बाल सफेद हो जाते हैं आदि. जबकि हकीकत कुछ और ही होती है. आइए जानते हैं कि बालों को ले कर और क्याक्या मिथक हैं और उन की हकीकत क्या है:

मिथक: बालों की नियमित कटाई से वे जल्दी बढ़ते हैं.

सचाई: विशेषज्ञों का मानना है कि बाल प्रति महीने 1/2 इंच बढ़ते हैं, फिर चाहे आप बालों को कटवाएं या नहीं. बाल गरमी के मौसम में ज्यादा बढ़ते हैं. इन का कटवाने से कोई लेनादेना नहीं. विशेषज्ञ हर 6 से 8 हफ्तों में बाल काटने की सलाह देते हैं ताकि उन्हें दोमुंहा होने से बचाया जा सके.

मिथक: अच्छे बाल पाने के लिए अच्छे तरीके से शैंपू करना जरूरी है.

सचाई: सही तरह से शैंपू करना बालों के लिए जरूरी है, जबकि बहुत ज्यादा शैंपू करने से बालों की नमी चली जाती है, जिस से वे रूखे हो जाते हैं.

मिथक: शैंपू बदलने से बाल स्वस्थ रहते हैं.

सचाई: आप चाहें तो तरहतरह के शैंपू इस्तेमाल कर सकती हैं जैसे रूसी को रोकने या घनेपन के लिए, पर यह काम पहले वाला शैंपू भी करता है जब आप उस का नियमित प्रयोग करती हैं.

मिथक: एक सफेद बाल तोड़ने से वहां के और बाल भी सफेद हो जाते हैं.

सचाई: यह आधारहीन मिथक है. हां, सफेद बाल तोड़ना बुरी आदत जरूर है. बाल तोड़ने से उन की जड़ों को नुकसान पहुंचता है. ऐलर्जी भी हो सकती है. इस से बाल कमजोर हो जाते हैं और दोबारा नहीं उगते. अत: बालों को स्वस्थ रखने के लिए उन से सौम्य तरीके से व्यवहार करें.

मिथक: रोजाना बालों को सौ बार कंघी करनी चाहिए.

सचाई: बालों को चाहे जितनी भी कंघी करें कोई फायदा नहीं. इस से उन के अच्छे होने के बजाय क्षति ही पहुंचती है. कंघी केवल बालों को संवारने के लिए की जाती है, क्योंकि ब्रशिंग बालों को उन के रोम से बाहर खींचती है और उपत्वचा को कमजोर करती है. ज्यादा कंघी करने से बाल कमजोर हो जाते हैं. यदि आप के बाल गांठदार हों तो चौड़े दांतों वाली कंघी का इस्तेमाल करें.

मिथक: यदि बाल तैलीय हों तो तेल नहीं लगाना चाहिए.

सचाई: यह बिलकुल गलत है. बालों में निरंतर तेल लगाने से सूखे बालों को पोषण मिलता है. तेल बालों की उपत्वचा में आसानी से समा जाता है और उन्हें जड़ से सिरे तक स्वस्थ बनाता है. जब बालों में तेल लगाएं तो अच्छी तरह मसाज करें. इस से बालों में प्रवाह अच्छा होता है और वे कोमल हो जाते हैं.

सलाह

यदि आप के बाल झड़ रहे हों तो इस का कारण आप का गलत हेयरस्टाइल हो सकता है जैसेकि तंग चोटी बांधना, वेव्स और पोनीटेल की वजह से लंबे समय तक बालों को नुकसान पहुंचता है. अत: बालों को टूटने तथा कमजोर होने से बचाने के लिए तंग बैंड या क्लिप न लगाएं.

कंडीशनिंग व पोषण

लंबे बालों की नींव स्वस्थ स्कैल्प होती है. स्कैल्प को साफ रखना और गहरी कंडीशनिंग करना बालों को तेजी से बढ़ने के लिए महत्त्वपूर्ण है. गंदी और तैलीय स्कैल्प रूसी, ऐलर्जी, खुजली को बढ़ावा देती है, जो बालों के झड़ने का कारण बनती है.

गंजापन रोकने और लंबेघने बालों के लिए उन्हें धोने के बाद लटों को जैतून, अरंडी या और्गन के तेल से मौइश्चराइज करें. बालों को रूखा और दोमुंहा होने से बचाने के लिए इन तेलों से अच्छी तरह स्कैल्प और लटों की मसाज करें.       

– अमित शारदा, एम.डी., सनफ्लौवर इमेज

 

 

अहम सलाह

 

– बालों को रोज नहीं धोएं. 2-3 दिन में 1 बार धोएं. निरंतर धोने से बालों का प्राकृतिक तेल लटों और स्कैल्प से निकल जाता है, जो उन्हें चमकदार और स्वस्थ रखता है.

 

– यदि आप अधिक मात्रा में कैमिकल युक्त शैंपू या कंडीशनर इस्तेमाल करती हैं, तो उन्हें तुरंत बंद कर दें. बाजार में मिलने वाले लगभग हर कौस्मैटिक में सस्ते और खतरनाक कैमिकल सोडियम लोरियल सल्फेट का इस्तेमाल होता है.

 

– कंघी या ब्रश का साफ होना बेहद जरूरी है. गंदे ब्रश में कीटाणु तथा जीवाणु पनपते हैं. कंघी या ब्रश करने के बाद उस में फंसे बालों को तुरंत निकाल दें तथा महीने में 1 बार उस की गहराई से सफाई करें.

 

– सूखी लटों से ज्यादा नम लटों को देखभाल की जरूरत होती है. गीले बालों की उपत्वचा नाजुक होती है और गीले बालों को कंघी करने से वे आसानी से उखड़ जाते हैं. इन्हें ज्यादा सतर्क हाथों की जरूरत होती है. गीले बालों को ब्रश करने के बजाय उन्हें धोने से पहले कंघी करना ज्यादा उचित है. गीले बालों में चौड़े दांतों वाली कंघी का इस्तेमाल करें. सूखे बालों पर ब्रश करें. बालों को नुकसान से बचाने के लिए लटों को सिरे की तरफ से छुड़ाना चाहिए न कि जड़ों की तरफ से.

 

– हेयर स्टाइलिंग उपकरण जैसे ड्रायर, स्ट्रेटनर, कर्ल्स आदि लटों को जला देते हैं. ये न केवल बालों में रूखापन लाते हैं, बल्कि उन्हें पतला भी कर देते हैं. अत: बालों को नुकसान से बचाए रखने के लिए इन चीजों का जितना हो सके कम ही प्रयोग करें.

 

 

कोचिंग की बैसाखी पर शिक्षा

कुछ वर्षों पहले रसायन का नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले भारतीय मूल के अमेरिकीब्रिटिश वैज्ञानिक वी रामकृष्णन ने एक टिप्पणी भारत की कोचिंग इंडस्ट्री के बारे में की थी. इस संबंध में पहली बात उन्होंने यह कही थी कि शुद्ध विज्ञान (प्योर साइंस) की तरफ उन का आना इसलिए संभव हुआ क्योंकि उन का दाखिला देश (भारत) के किसी मैडिकल या इंजीनियरिंग कालेज में नहीं हो पाया था. दाखिला इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पुराने खयाल के उन के मातापिता यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि मैडिकल-इंजीनियरिंग कालेजों का ऐंट्रैंस टैस्ट निकालने के लिए कोचिंग लेनी बहुत जरूरी है.

कोचिंग इंडस्ट्री को ले कर अपनी बात को और ज्यादा साफ करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि अब तो कोचिंग संस्थानों में दाखिले के लिए भी कोचिंग की जरूरत पड़ने लगी है. लिहाजा, जब तक ऐंट्रैंस टैस्ट का स्वरूप नहीं बदला जाता व छात्रों और अभिभावकों में कोचिंग के प्रति नफरत नहीं पैदा की जाती, तब तक इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है.

कोचिंग बिना कामयाबी

कोचिंग के खिलाफ वी रामकृष्णन से मिलतीजुलती राय अपने देश में सुनाई पड़ती रही है. इधर यूपीएससी (आईएएस) की परीक्षा में देश में तीसरी रैंक हासिल करने और बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले 30 साल के गोपाल कृष्ण रोनांकी ने भी वैज्ञानिक वी रामकृष्णन जैसी बातें कही हैं. सिविल सेवा की तैयारी के लिए समाज की परिपाटी के मुताबिक वे भी कोचिंग सैंटर जौइन करना चाहते थे, लेकिन पिछड़े इलाके से आने की वजह से किसी भी कोचिंग सैंटर ने उन्हें दाखिला नहीं दिया. ऐसे में गोपाल के पास सैल्फ स्टडी के अलावा कोई चारा नहीं बचा.

कोचिंग से महरूम होने को उन्होंने कमजोरी के बजाय अपनी ताकत बनाई. परीक्षा के लिए उन्होंने कोई कोचिंग अटैंड नहीं की और कड़ी मेहनत व लगन की बदौलत सिविल सर्विस एग्जाम में कामयाब हो कर दिखा दिया कि बिना कोचिंग के भी सफलता पाई जा सकती है.

गोपाल कृष्ण रोनांकी भले ही कोचिंग सैंटर में दाखिला नहीं मिलने के कारण सैल्फ स्टडी के लिए प्रेरित हुए, लेकिन सीबीएसई की 12वीं परीक्षा की इस साल की टौपर नोएडा की रक्षा गोपाल के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी. उस ने अपनी मरजी से कोचिंग की बैसाखी लिए बिना खुद बेहतर पढ़ाई की योजना बनाई और परीक्षा में टौप कर के दिखा दिया कि अगर हौसला हो तो किसी भी परीक्षा की चुनौती ऐसी नहीं है, जिसे पार न किया जा सके. रक्षा गोपाल ने बिना ट्यूशनकोचिंग के 99.6 फीसदी अंक ला कर टौप किया है.

उपरोक्त उदाहरणों के बावजूद हमारे समाज में ट्यूशनकोचिंग का दबदबा बढ़ता जा रहा है. मांबाप कोचिंग सैंटरों और ट्यूशन पढ़ाने वाले अध्यापकों का स्तर जाने बगैर अपने बच्चों को कोचिंग के लिए भेज रहे हैं और सामान्य पढ़ाई से ज्यादा ट्यूशनकोचिंग पर खर्च कर रहे हैं.

लाइसैंस भी जरूरी नहीं है

कोचिंग का जाल इतना गहरा है कि सरकार को भी इस की चिंता है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय कई बार इस पर चिंता जताता रहा है. कुछ ऐसी ही टिप्पणी पिछले साल मशहूर फिल्म अभिनेता और लोकसभा सांसद परेश रावल ने संसद में की थी. उन्होंने प्राइवेट कोचिंग संस्थानों को शैक्षिक आतंकवाद फैलाने वाला बताते हुए देश में प्राइवेट कोचिंग के लिए नियमकानून बनाने की मांग की थी. इस मर्ज का एक सिरा इस विरोधाभासी तथ्य से भी जुड़ा है कि लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहते हैं, लेकिन उन कोचिंग सैंटरों में जरूर भेजते हैं जहां कई बार सरकारी स्कूलों के ही टीचर पढ़ाते हैं. इन तथ्यों के केंद्र में यह इशारा बारबार मिलता है कि कुछ ऐसे उपाय किए जाएं ताकि बोर्ड परीक्षाओं, मैडिकल और इंजीनियरिंग ऐंट्रैंस में कोचिंग की भूमिका घटाई जा सके.

लेकिन ऐसा लगता है कि यह भूमिका कम करने को ले कर समाज से ले कर सरकार तक कोई गहरी दुविधा है जो उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने से रोक देती है. जब से मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों का बोलबाला बढ़ा और इन संस्थानों से निकले डाक्टरइंजीनियर लाखोंकरोड़ों कमाते दिखे, तो हर कोई अपने बच्चे को जैसेतैसे इसी लाइन में खड़ा करने की तैयारी में जुट गया. आज स्थिति यह है कि देश के सभी इंजीनियरिंग व मैडिकल कालेजों में कुल मिला कर 40 से 45 हजार सीटें हैं, पर इन में दाखिला पाने को ले कर हर साल 10 लाख छात्रों के बीच होड़ सी मची रहती है. वे चाहे इन सीटों के लिए पूरी तरह काबिल न हों, लेकिन हर हाल में उन्हें इन्हीं में दाखिला चाहिए. इस का फायदा उठाया है देश में कुकुरमुत्ते की तरह राजस्थान के कोटा और दिल्ली से ले कर हर छोटेबड़े शहर की गलीकूचों में खुले कोचिंग सैंटरों ने.

ये अपने एकाध पूर्व छात्र की सफलता का ढोल पीटते हुए बच्चे को इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना देखने वाले मांबाप से लाखों रुपए ऐंठने में कामयाब होते हैं. पर क्या कोई यह देख पा रहा है कि आखिर इस गोरखधंधे में किस का भला हुआ है?

अरबों डौलर का बिजनैस

देश के वित्तीय कारोबारों पर नजर रखने वाली आर्थिक संस्था एसोचैम ने इस बारे में एक आकलन पेश करते हुए दावा किया था कि 2015 के अंत तक देश में कोचिंग का कारोबार 40 अरब डौलर तक पहुंच चुका है. यह आकलन बेमानी नहीं कहा जाएगा क्योंकि इस में यह आंकड़ा भी निकल कर आया था कि प्राइमरी में पढ़ने वाले 87 फीसदी और सैकंडरी में पढ़ने वाले करीब 95 फीसदी बच्चे ट्यूशन या कोचिंग लेते हैं. इस ट्यूशन की वजह से अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ पड़ा है पर चूंकि वे बच्चे के भविष्य की खातिर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते, इसलिए वे कोचिंग से परहेज नहीं करते हैं. यही नहीं, 78 फीसदी अभिभावकों ने एसोचैम के अध्ययन में यह तक कहा कि आज बच्चों पर ज्यादा नंबर लाने का दबाव है और बिना कोचिंग के ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं लगता है.

महानगरों और छोटे शहरों में प्राइमरी स्तर तक के बच्चों की हर महीने की ट्यूशन फीस जहां 1,000 से 3,000 रुपए है वहीं सैकंडरी के बच्चों के ट्यूशन पर हर महीने औसतन करीब 5,000 रुपए या इस से अधिक का खर्चा आता है. बड़े शहरों में तो स्कूल की फीस के बाद कोचिंग पर औसतन 10,000 रुपए तक का हर महीने का खर्चा पेरैंट्स पर आ रहा है. एसोचैम ने यह सर्वे रिपोर्ट दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, लखनऊ, अहमदाबाद, जयपुर और चंडीगढ़ में 1,200 पेरैंट्स से बातचीत के बाद तैयार की थी.

सर्वे में शामिल 78 प्रतिशत पेरैंट्स ने कहा कि पढ़ाई का स्तर और माहौल काफी बदल गया है. बच्चों पर ज्यादा नंबर लाने का दबाव है. बिना ट्यूशन के ऐसा मुमकिन नहीं है. इन में करीब 86 प्रतिशत अभिभावकों ने माना था कि उन के पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय नहीं है. पति और पत्नी दोनों कामकाजी होने की वजह से उन के पास तो अपने बच्चों के साथ गुजारने के लिए भी वक्त नहीं होता. ऐसे में उन के पास बच्चों को प्राइवेट कोचिंग में भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता.

ये मोहब्बत है

खुद को पाना है तो

उस के लिए तमन्ना करना

ये मोहब्बत है

मोहब्बत की तुम खता करना

चांद की रात है

शायद वो बाम पे आए

घर के जीने पे दीया इक तुम जला रखना

कैसे मेहंदी रचे हाथों से वो दस्तक देगी

रात में घर के किवाड़ों को

तुम खुला रखना

वो भी शबनम की तरह रात में न रो जाए

अश्क मोती है, रुलाने की मत खता करना

वो जुदा होके भी, हम से जुदा नहीं होगी

दिल में रहती है

खयालों से मत जुदा करना

वक्त किसकिस को बताए कि

प्यार नेमत है

बांट देने से ये बढ़ती है, मत बचा रखना.

– राकेश भ्रमर

भेदभाव रहित हो शिक्षा

नौकरियों के घटते अवसर और प्राइवेट स्कूलों के बढ़ते खर्चों से परेशान हो कर माता पिता एक बार फिर सरकारी स्कूलों की ओर रुख करने लगे हैं. 1950 से 1980 तक की पीढ़ी ज्यादातर इन्हीं सरकारी स्कूलों की देन है पर जब अंगरेजी माध्यम वाले निजी स्कूलों ने जोर मारा तो सरकारी स्कूलों को उन की घटिया पढ़ाई के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए मातापिताओं ने प्राइवेट स्कूलों में लाइनें लगानी शुरू कर दीं, जिस की एक झलक हालिया रिलीज एक फिल्म में दिखी भी. सरकारी स्कूलोंको छोड़ने की वजह उन की पढ़ाई का गिरता स्तर ही नहीं था, बल्कि उन स्कूलों के दरवाजे तथाकथित नीची जातियों के लिए खोले जाने भी थे. इन स्कूलों में अमीरों के बच्चों के साथ गरीबों के बच्चे तो आते ही थे, ऊंचे वर्णों के साथ नीचे वर्णों के बच्चे भी आने लगे, यह ऊंचे वर्णों को मंजूर न था. जातिवाद की खाइयों को स्कूलों की पढ़ाई पाट दे, इसलिए ऊंचे वर्णों ने पहले तो ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूलों की ओर रुख किया और फिर धड़ाधड़ अपने स्कूल खोल=.

व्यापारियों ने इस में पैसा भी देखा और उन्होंने मुनाफा न कमाने वाली समाजसेवी संस्थाएं खोल कर हजारों स्कूल खोल डाले जबकि उन का उद्देश्य केवल पैसा कमाना है. आज इन स्कूलों में जो अच्छी पढ़ाई हो रही है वह स्कूलों के भव्य भवनों की वजह से नहीं, अच्छे अध्यापकों की वजह से नहीं, अनुशासन की वजह से नहीं बल्कि मातापिताओं की अपने बच्चों की निरंतर देखरेख के कारण हो रही है. फिर भी, सरकारी स्कूल 12वीं की परीक्षाओं में बाजी मार रहे हैं. सैकड़ों मेधावी बच्चे सरकारी स्कूलों से निकल कर आ रहे हैं. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के मातापिता सुविधाओं के अभाव में, पेट काट कर बच्चों को पढ़ा रहे हैं.

सरकारी स्कूल आमतौर पर सरकार के लिए महंगे हैं. सरकारी स्कूल, जो दिखते फटेहाल हैं, में प्रति बच्चा कुल खर्च प्राइवेट स्कूलों से दोगुना है. प्राइवेट स्कूलों की फीस ज्यादा है तो इसलिए कि वहां करदाताओं का पैसा नहीं लगा है. अब जबकि पिछड़ी और निचली जातियों के बच्चों को भी गरीब कोटे या उन के पास अपनी अच्छी कमाई होने से अंगरेजी माध्यम स्कूलों में जगह मिलने लगी है, निजी स्कूलों का मुख्य उद्देश्य-वर्णभेद-फीका होता जा रहा है और कम से कम संपन्न पिछड़े और निचले वर्णों के मातापिता घटिया प्राइवेट स्कूलों की जगह सरकारी स्कूलों की ओर रुख करने लगे हैं, तो जनता ने भी सरकारी स्कूलों की खैरखबर लेनी शुरू कर दी है. अच्छा परिणाम देना सरकारी स्कूलों के प्रबंधकों के लिए अब जरूरी होने लगा है. स्कूली शिक्षा, कम से कम 8वीं कक्षा तक, केवल पड़ोस के सरकारी स्कूल में होनी चाहिए और उस में हर वर्ग, हर वर्ण, हर धर्म, हर सैक्स के बच्चे साथसाथ पढ़ें, एक ही पढ़ाई करें और जहां तक हो सके मुख्य पढ़ाई अपने इलाके की मातृभाषा व हिंदी में पढ़ाई जाए. अंगरेजी भी पढ़ाई जा सकती है पर वह एक विषय के रूप में. बच्चों को ‘ए’ फौर ऐप्पल पढ़ाना जरूरी नहीं, जब तक घर में वे सेब ही खा रहे हैं. निजी स्कूलों ने वर्णव्यवस्था को बेहद मजबूत किया है. अगर एक देश बनाना है तो  छुआछूत को मिटा कर बच्चों को, एकदूसरे को, प्राकृतिक तौर पर समझने का अवसर दिया जाना चाहिए.

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