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नोटबंदी के बाद नहीं जमा करा पाए पैसा, तो आपके लिए है खुशखबरी

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और RBI से पूछा कि जो लोग नोटबंदी के दौरान दिए वक्त में पुराने नोट जमा नहीं करा पाए, उनके लिए कोई विंडो क्यों नहीं हो सकती? कोर्ट ने कहा कि जो लोग उचित कारणों के चलते रुपए बैंक में जमा नहीं करा पाए, उनकी संपत्ति सरकार इस तरह नहीं छीन सकती है. साथ ही कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के पास पुराने नोट जमा कराने के सही कारण है, उन्हें एक बार फिर से मौका दिया जाना चाहिए.

महिला याचिकाकर्ता की सुनवाई पर

एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि अगर उचित कारण वाले लोगों को एक और मौका नहीं दिया जाता है तो इसे गंभीर मुद्दा माना जाएगा. देश की सर्वोच्च अदालत ने सवाल किया कि अगर रुपए जमा कराने की अवधि में अगर कोई जेल में रहा होगा, तो वो रुपए कैसे जमा कराता? कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात को समझते हुए सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों के लिए कोई ना कोई विंडो जरूर दे.

"जो लोग उचित कारणों से पुराने नोट बैंक में जमा नहीं करा पाए, उनकी संपत्ति सरकार नहीं छीन सकती. ऐसे लोगों को एक मौका दिया जाना चाहिए."-सुप्रीम कोर्ट

केन्द्र सरकार ने जवाब के लिए दो हफ्ते का वक्त मांगा

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों पर केंद्र सरकार ने जवाब देने के लिए दो हफ्ते का वक्त मांगा. सुप्रीम कोर्ट एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें उसने कहा था कि वो नोटबंदी के वक्त अस्पताल में थी और उसने बच्चे को जन्म दिया था, इस वजह से से तय समय-सीमा पर पुराने नोट जमा नहीं कर सकी. इससे पहले 21 मार्च को कोर्ट ने कहा था कि जिन लोगों ने 30 दिसंबर तक पुराने नोट जमा नहीं कराए, उनको एक विंडो देना चाहिए. गौरतलब है कि सरकार ने 8 नवंबर से 30 दिसंबर तक ही पुराने नोट जमा कराने का मौका दिया था.

क्रिकेट के पिच पर पहुंच गए गजराज और फिर..

श्रीलंका और जिंबाब्वे के बीच खेली जा रही वनडे सीरीज के तीसरे मैच से पहले एक अजीबो-गरीब परेशानी खड़ी हो गई है. यह मैच हंबनटोटा में खेला जाना है. हंबनटोटा को प्राकृतिक सौंदर्य और विभिन्न तरह के जंगली जानवरों के लिए पहचाना जाता है लेकिन यही श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के लिए परेशानी की वजह बन गई है.  

35 हजार दर्शक क्षमता हंबनटोटा स्टेडियम एलीफेंट सैंक्चुरी के पास बना है. ऐसे में हाथियों के मैच में बाधा पहुंचाने की आशंका है. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड मैच हाथियों के उत्पात से बचने के लिए तैयारी कर रहा है. इसके लिए सुरक्षा विशेषज्ञ भी मैदान में उपस्थित रहेंगे. जिससे की किसी भी तरह की आपात परेशानी से बचा जा सके.

मैदान के सुदूर होने और हायर मेनटेनेंस कॉस्ट के कारण यहां कम मैचों का आयोजन होता है. इस मैदान पर आखिरी बार कोई मैच 2 साल पहले खेला गया था. यहां कई मौके ऐसे हुए हैं जब स्टेडियम की फेंसिंग तोड़कर हाथी पिच तक पहुंच गए.

इस स्टेडियम को 2009 में बनाया गया था, लेकिन यह काफी दूरवर्ती क्षेत्र में है और हाथियों की अधिक संख्या के चलते यहां कम ही अंतरराष्ट्रीय मैच आयोजित किए गए हैं.

सूत्रों की मानें तो एक वन्यजीव अधिकारी ने कहा, ‘यहां हाथियों के स्टेडियम के सुरक्षा घेरे को तोड़कर अंदर आने की घटनाएं कम होती हैं, लेकिन मैच से पहले पिच पर कुछ हाथियों ने प्रवेश किया और यह अचानक हुआ है.’

स्टेडियम के 100 मीटर दूर से जंगल शुरू हो जाता है. ऐसे में आयोजकों ने 10 वार्डन को देखरेख में लगाया कि हाथी फेंसिंग तोड़तक स्टेडियम में न घुस जाएं. अधिकारियों के मुताबिक स्टेडियम के 240 वर्ग किमी के दायरे में तकरीबन 25 हाथियों को देखा गया है. जिनसे दर्शकों को खतरा हो सकता है. 

योगी सरकार को मंजूर नहीं ‘गुजरात का साबुन’

जो भाजपा सत्ता के बाहर रहते हुये विरोधी दलों के नेताओं को चूडियां और साडी भेंट कर अपना विरोध प्रदर्शन करती थी उसे आज दलित संगठनों के अपने मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के लिये गुजरात से आया साबुन भेंट करना पंसद नहीं है. इन लोगों को उत्तर प्रदेश में प्रवेश से पहले झांसी से ही वापस भेज दिया गया और राजधानी लखनऊ में होने वाली विचार गोष्ठी को कैसिंल करा कर आयोजको गिरफ्तार कर लिया. अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देने वाली भाजपा अब खुद इसकी राह का रोडा बन गई है.

संवैधानिक तरह से विरोध करना लोकतंत्र का मूलभूत अधिकार होता है. सत्ता पक्ष हमेशा इसका अधिकार विरोध करने वालों को देता है. इसका सम्मान करता है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अपनी आलोचना को सहन करने की हालत में नहीं है. दलित मुद्दों को लेकर लखनऊ के प्रेस क्लब में ‘दलित अत्याचार और निदान’ विषय पर परिचर्चा होनी थी. इसके लिये आयोजक आशीष ने बुकिंग के लिये पैसा भी जमा करा दिया था. अचानक उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के सचिव जेपी तिवारी ने बुकिंग कैंसिल कर दी. बताया जाता है कि सरकार को यह पता चल चुका था कि परिचर्चा के बाद गुजरात से आने वाले दलित संगठन उत्तर प्रदेश के दलित संगठनों के साथ मिलकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को साबुन से बनी गौतम बुद्व की 125 किलो की साबुन की प्रतिमा भेंट करना चाहते थे. उत्तर प्रदेश की सरकार ने गुजरात से आने वालों को झांसी में रोक लिया और उनको वापस गुजरात भेज दिया.

25 कार्यकर्ता लखनऊ के नेहरू युवा केन्द्र में रूके थे. उनको वहां पर नजरबंद कर लिया गया. बाकी कार्यकर्ताओं को अलग अलग शहरों में रोक लिया गया. लखनऊ प्रेस क्लब में दलित चिंतक रिटायर आईपीएस एसआर दारापुरी, नेता रमेश दीक्षित सहित कई लोग विचार गोष्ठी में शामिल होने के लिये समय पर प्रेस क्लब पहुंच गये तो वहां पर उनको बताया गया कि विचार गोष्ठी के लिये बुकिग कैंसिल कर दी गई है. इसकी जानकारी इन लोगों को प्रेस क्लब की ओर से पहले नहीं दी गई. ऐसे में जब यह लोग आगे क्या किया जाय इस बात की चर्चा कर रहे थे उनको पुलिस ने धारा 144 के उल्लधंन के आरोप में पकड़ लिया. वहां से उनको शाम के 5 बजे तक लखनऊ पुलिस लाइन में रखा गया. बाद में 20-20 हजार के निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ रिहा किया गया कि वह शांतिभंग करने का कोई काम नहीं करेंगे.

एसआर दारापुरी ने बताया कि दलितों की समस्या पर होने वाली विचार गोष्ठी में गुजरात से कुछ दलित संगठन के लोग यहां आने वाले थे. उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के पहले जिस तरह से दलितों को नहाने के लिये साबुन दिया गया उससे गुजरात के दलित संगठन आहत थे. उनका सोचना था कि सरकार दलितों को गंदा मानती है. इसलिये उनको नहाने के लिये साबुन दिया. यह एक तरह से पूरी बिरादरी का अपमान था. बाबा भीमराव अंबेडकर की 125 जंयती चल रही है इसलिये 125 किलो साबुन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को देना तय हुआ. बौद्ध धर्म के कारण साबुन का मूर्ति का आकार दिया गया था. दलित संगठन के लोग चाहते थे कि योगी आदित्यनाथ इस साबुन से नहा कर अपना तन और मन साफ कर सके.

दारापुरी कहते हैं ‘सरकार ने जब गुजरात के लोगों को झांसी में रोक कर उनको जबरन वापस भेज दिया तब साबुन देने वाली बात को खत्म हो गई थी. उसके बाद भी विचार गोष्ठी का आयोजन क्यों नहीं करने दिया गया? ऐसे साफ पता चलता है कि सरकार सबको सबक सिखाने के लिये तैयार है. ऐसे में लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी प्रभावित होती है.  

सुनील ग्रोवर : टीवी से पहले रेडियो में करते थे कॉमेडी, सबसे पहले पत्नी को सुनाते हैं जोक्स

सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाले बहुचर्चित कॉमेडी शो ‘द कपिल शर्मा शो’ का हिस्सा रहे कॉमेडियन सुनील ग्रोवर ने इस शो को बुलंदियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है. सुनील ने गुत्थी, पिंकी भाभी और डॉ. मशहूर गुलाटी जैसे किरदारों से इस शो में चार चांद लगा दिए. बेशक इस शो ने भी सुनील को लाइमलाइट में लाया और घर-घर में एक चर्चित चेहरा बना दिया लेकिन ऐसा नहीं था कि सुनील इसी शो से इंडस्ट्री में आए. अपनी अदाओं से लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने वाले सुनील ने इससे पहले कई शोज में काम किया है.

शो से अलग हुए

कपिल शर्मा के साथ हुए झगड़े के बाद से सुनील छोटे पर्दे से दूर हैं और उनके फैन्स लगातार उनके वापस आने का इंतजार कर रहे हैं. हालांकि इस बात पर लगातार असमंजस बना हुआ है कि क्या सुनील किसी अन्य कॉमेडी शो से वापसी करेंगे या वह खुद का शो लेकर आने वाले हैं. सुनील को कपिल के शो पर लाने और उन्हें मनाने की लगातार कई कोशिशें की गईं लेकिन सुनील नहीं माने. सुनील इससे पहले क्या थे और उन्होंने किन-किन शोज में काम किया है? आइए आपको बताते हैं सुनील ग्रोवर की जिंदगी की पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ से जुड़े कई तथ्य जो आपको शायद ही मालूम हों.

सुनील का बैकग्राउंड

सुनील हरियाणा राज्य के सिरसा से हैं और उन्होंने चंडीगढ़ से थिएटर में मास्टर डिग्री ली है. सुनील शादीशुदा हैं और उनका एक बेटा भी है जिसका नाम मोहन ग्रोवर है. जिस सुनील को आज टीवी पर देखते हैं उन्हें असल में उस दौर के मशहूर कॉमेडियन जसपाल भट्टी (फ्लॉप शो के स्टार) ने कॉलेज में एक एक्ट करते हुए देख लिया था. सुनील ने एक बार कहा था कि जो जोक्स में पब्लिक में करता हूं, उन्हें पहले मैं अपनी पत्नी आरती पर आजमाता हूं. यदि वह उन पर हंसती है तो मैं उन जोक्स के साथ आगे बढ़ता हूं, वरना मैं उन्हें लोगों को नहीं सुनाता.

रेडियो से मिली पहचान

सुनील एक लंबा वक्त रेडियो पर भी बिता चुके हैं. एफ एम रेडियो चैनल रेडियो मिर्ची पर आने वाले ‘हंसी के फुव्वारे’ नाम के सेशन में उन दिनों सुनील सुदर्शन (सुड) के नाम से होस्ट किया करते थे. इस शो में फालतू जोक्स को भी मजाकिया अंदाज में बताने का उनका अंदाज लोगों को काफी पसंद आता था. उन्हें रेडियो और टीवी एडवर्टाइजिंग प्रैक्टिशनर एसोसिएशन ऑफ इंडिया से शानदार वॉइस परफॉर्मेंस के लिए अवॉर्ड भी मिल चुका है.

कई सफल फिल्मों में किया काम

सुनील ने भले ही पहला लीड रोल फिल्म कॉफी विद डी में किया हो लेकिन आपको बता दें कि इससे पहले वह प्यार तो होना ही था, द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, जिला गाजियाबाद, फैमिली, गब्बर इज बैक और बागी जैसी फिल्मों में छोटे बड़े रोल करते रहे हैं.

डबल मीनिंग जोक्स में असहज

डबल मीनिंग जोक्स को लेकर सुनील बहुत ज्यादा सहज महसूस नहीं करते हैं. एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा- डबल मीनिंग जोक्स में सहज महसूस नहीं करता, मुझे यह पसंद नहीं है. सुनील का मानना है कि रील लाइफ और रियल लाइफ में फर्क करना पड़ता है. जब बात टीवी शो की होती है तो हमें हर किसी को एंटरटेन करना होता है, बच्चों से लेकर दादा जी तक को.

जब दो गेंदों में ही मैच जीत गई नेपाल की टीम

सच ही कहा गया है, क्रिकेट अनिश्चिताओं के साथ साथ आंकड़ो और रिकॉर्ड का खेल है. कब किस टीम, किस खिलाड़ी के नाम कौन सा रिकॉर्ड हो जाए कहा नहीं जा सकता. कुछ ऐसा ही अजीबोगरीब मैच 2006 में नेपाल और म्यांमार के बीच देखने को मिला.

साल 2006 में नेपाल की टीम ने ‘एसीसी कप’ के एक आधिकारिक मैच में सबसे तेज गति से लक्ष्य प्राप्त करके इतिहास रच दिया. उन्होंने विपक्षी टीम के द्वारा दिए गए लक्ष्य को मात्र दो गेंदों में प्राप्त कर लिया. नेपाल ने इस कारनामें को किस तरह अंजाम तक पहुंचाया. आइए जानते हैं.

दरअसल नेपाल का मुकाबला म्यांमार की टीम से हो रहा था. मैच में नेपाल ने टॉस जीता और म्यांमार को बल्लेबाजी के लिए आमंत्रित किया. नेपाल की गेंदबाजी की कमान उनके मास्टर तेज गेंदबाज मेहबूब आलम को दी गई और इसके बाद शुरू हुआ एक अनोखा खेल.

आलम ने म्यांमार की बल्लेबाजी की जड़े हिलाकर रख दीं. म्यांमार के विकेटकीपर बल्लेबाज पारी की पहली गेंद में चलते बने और इसके बाद आलम ने दो और बल्लेबाजों शारजील और रहमान को पवेलियन का रास्ता दिखाया. जिस समय तक कप्तान दास ने अपना दूसरा ओवर खत्म किया. म्यांमार चार रन पर चार विकेट गंवाकर संघर्ष कर रहा था.

इसके कुछ देर बाद फिर से मेहबूब म्यांमार के बल्लेबाजों पर कहर बनकर बरसे. इस बीच सबसे लंबी 21 गेंदों की पार्टरनशिप मो तुन और कप्तान टिन ए के बीच हुई जिसे दास ने तोड़ा और अगले कुछ ओवरों में ही म्यांमार की पारी तांस के पत्तों की तरह बिखर गई. म्यांमार की आधी से ज्यादा टीम खाता भी नहीं खोल सकी. म्यांमार 12.1 ओवरों में 10 रनों पर सिमट गया. म्यांमार की ओर से जकारिया ने 20 गेंदों में एक रन बनाया और वह इस तरह से म्यांमार की ओर से सबसे देर तक क्रीज पर रहने वाले बल्लेबाज रहे.

नेपाल टीम के मेहबूब आलम ने 6.1 ओवरों की गेंदबाजी की और 3 रन देकर 7 विकेट लिए. वहीं दूसरे छोर से उनका साथ निभाते हुए बिनोद दास ने 6 ओवरों में 4 रन देकर 3 विकेट लिए. इसके अलावा 3 रन म्यांमार के बल्लेबाजों ने अतिरिक्त के रूप में बनाए.

11 रनों के स्कोर का पीछा करने उतरी नेपाल की टीम के बल्लेबाज महेश छेत्री ने पहली गेंद को धीरे से खेलकर 3 रन दौड़े. अगली गेंद पर धीरज चंद ने हल्के हाथों से गेंद को खेलकर 3 रन दौड़े. जैसा कि अब ओवर में चार गेंदें बची थी. गेंदबाज ने अगली दो गेंदें वाइड फेंकी. इसके बाद उसने जो गेंद फेंकी वह और भी वाइड थी जिसे कीपर रोक ही नहीं पाया और इस तरह नेपाल ने दो गेंदों में ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया. नेपाल ने इस जीत के साथ इतिहास स्वर्णअक्षरों से लिख दिया.

शेयर बाजार पहुंचा नए शीर्ष पर

भारतीय शेयर बाजार के लिए मई का महीना रिकौर्ड बनाने और तोड़ने वाला साबित हुआ. इस दौरान बाजार ने नएनए रिकौर्ड बनाए और लगातर तोड़े भी हैं. बाजार में तेजी का यह सिलसिला जून के पहले सप्ताह में भी जारी रहा. 9 जून को समाप्त हुए सप्ताह में बाजार तेजी पर बंद हुआ. इस दौरान विदेशी निवेशकों की मजबूत अवधारणा के कारण बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक सर्वाधिक अंकों पर बंद हुआ. बाजार की इस अवधारणा को जीएसटी, अच्छे मानसून का पूर्वानुमान, वैश्विक बाजारों के अच्छे कारोबार तथा रुपए की लगातार मजबूती से बल मिला. इन सब के बीच बाजार ने नया कीर्तिमान स्थापित किया और बीएसई 6 जून को 31,442 अंक तथा नैशनल स्टौक एक्सचेंज 9,675 अंक के स्तर पर पहुंचा. पहली बार बीएसई तथा निफ्टी ने यह ऊंचाई हासिल की.

जानकारों का अनुमान था कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर घटने के अनुमान से शेयर बाजार को करारा झटका लगेगा, लेकिन इस का बाजार पर कोई निराशाजनक असर नहीं हुआ और निवेशकों ने जम कर लिवाली की. इस की बड़ी वजह जीएसटी पर लगातार बन रही सहमति और जुलाई से उसे लागू करने की अच्छी तैयारियों का माहौल है.

मैच हारने के बाद रो पड़े धोनी, देखें वीडियो

वेस्टइंडीज दौरे पर 5 वनडे मैचों की सीरीज खेलने गई टीम इंडिया सीरीज में 2-1 से आगे है. हाल ही में चौथे मैच में भारत को हार का सामना करना पड़ा. इस हार के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में महेंद्र सिंह धोनी काफी निराश दिख रहे हैं. वीडियो में देखा जा सकता है कि धोनी इस हार से इतने हताश थें कि उनके आंखों से आंसू तक निकल आए.

धोनी का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज से हारी तो हर खिलाड़ी एक दूसरे से हाथ मिला रहे थें. इस दौरान धोनी ड्रेसिंग रूम में काफी दुखी होकर बैठे थें.

धोनी भारत की हार को पचा नहीं पा रहे थे. वो सिर्फ मैदान की तरफ एकटक देखे जा रहे थें. इस दौरान उनकी आंखें नम भी हो गईं. 40 सेकंड के इस वीडियो से जाहिर हो रहा है कि धोनी इस हार से कितने मायूस हैं. वह अपनी इस धीमी पारी को कभी याद नहीं करना चाहेंगे.

धोनी ने दूसरे वनडे मैच में 114 गेंदों में सिर्फ 54 रनों की पारी खेली थी. क्रिकेट पंडित धोनी की इस बेहद धीमी पारी को भारत की हार के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं. वेस्टइंडीज की टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवरों में 9 विकेट खोकर 189 रन बनाए थे और भारत के सामने जीत के लिए 190 रनों का लक्ष्य रखा था. जिसके जवाब में भारत की पूरी टीम 49.4 ओवरों में सिर्फ 178 रनों पर सिमट गई और मुकाबले को 11 रनों से हार गई.

अर्धशतक लगाने के लिए धोनी को 108 गेंदों का सामना करना पड़ा. इसके बाद धोनी ऐनवक्त पर आउट हो गए और टीम हार गई. इसे भारतीय क्रिकेट की सबसे धीमी अर्द्धशतकीय पारी करार दिया जा रहा है.

इससे पहले यह रिकॉर्ड सौरव गांगुली के नाम था. गांगुली ने 2005 में श्रीलंका के खिलाफ 105 गेंद में अर्द्धशतक पूरा किया था. इसके बाद 2007 में भी गांगुली ने बांग्लादेश के खिलाफ 104 गेंदों में 50 रन पूरे किए थे. अब यह रिकॉर्ड धोनी के नाम हो गया है.

हालांकि वेस्टइंडीज के खिलाफ इस मुश्किल मैच में अर्द्धशतक लगाने वाले धोनी दूसरे बल्लेबाज रहे. उनके अलावा अजिंक्य रहाणे ने भी 60 रन का योगदान दिया. यह रहाणे का लगातार चौथा वनडे अर्द्धशतक रहा.

वनडे इतिहास की सबसे धीमी अर्द्धशतकीय पारियां

– इंग्लैंड के टीई बैले ने 1958-59 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 350 गेंदों में 50 रन बनाए थे.

– इंग्लैंड के ही सीजे टावरे ने 1982 में पाकिस्तान के खिलाफ लॉर्ड्स में 236 गेंदों में फिफ्टी लगाई थी.

– न्यूजीलैंड के बीए यंग ने 1995 में द. अफ्रीका के खिलाफ 229 गेंदों में 50 रन की पारी खेली थी.

– 1985 में श्रीलंका के खिलाफ खेली गई सुनील गावस्कर की 51 रनों की पारी इस सूची में चौथे नंबर पर है.

– पाकिस्तान के रमीज राजा ने वेस्टइंडीज के खिलाफ 1986 में कराची वनडे में 209 गेंदों का सामना करते हुए अर्द्धशतक लगाया था.

दवाओं की गुणवत्ता को ले कर सरकार सख्त

सरकार विश्व बाजार में अपनी दवाओं के कारोबार को हलका नहीं पड़ने देगी और इस के लिए देशी कंपनियों पर सख्ती बरती जाएगी. सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि गुणवत्ता में किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा. कंपनियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे गुणवत्ता में किसी भी तरह से कमी न करें. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ के कुछ सदस्य देशों ने भारतीय दवाओं की जांच किए जाने की मांग की थी लेकिन भारत ने इस से इनकार कर दिया. उस ने साफ कह दिया कि भारत में ही दवाओं की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा रहा है.

विश्व औषधि बाजार में भारतीय दवाओं की हिस्सेदारी 75 से 80 फीसदी के बीच है. पूरी दुनिया भारतीय दवाओं पर भरोसा कर रही है, इसलिए उस भरोसे को अब कमजोर नहीं होने देना है. सरकार इसी सूत्र पर काम कर रही है.

औषधि नियंत्रक महानिदेशालय ने इस पर अपनी रणनीति बनाने के लिए राज्यों के औषधि नियंत्रक महानिदेशकों के साथ विचार करने की योजना बनाई है. इस बारे में जल्द ही विमर्श किया जाएगा. सरकार को विदेशी मुद्रा कमाने के लिए दवा की गुणवत्ता को तो बरकरार रखना ही है, लेकिन उसे देश की उस आबादी का भी ध्यान रखना है जिन को नकली दवाएं दे कर दवा कंपनियां गाढ़ी कमाई कर रही हैं.

देश का दवा बाजार नकली दवाओं से भरा पड़ा है और गलीमहल्लों तथा प्रदेशों के बड़े शहरों में नकली दवाएं धड़ल्ले से बिक रही हैं. इन दवाओं पर भी नियंत्रण करने की जरूरत है ताकि देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर रखा जा सके.

कंपनियों का फर्जीवाड़ा होगा बंद

सरकार कंपनियों पर नकेल कसने की तैयारी में जुट गई है. हेराफेरी करने वाली कंपनियों की सूची तैयार की जा रही है. 2-3 सालों से जिन कंपनियों ने अपना वित्तीय विवरण नहीं दिया है उन के खिलाफ कार्यवाही की तैयारियां चल रही हैं और अब तक करीब 3 लाख ऐसी कंपनियों की सूची तैयार हो चुकी है. उन के खिलाफ कार्यवाही की प्रक्रिया बाद में शुरू की जाएगी.

इस के अलावा लंबे समय से व्यवसाय नहीं करने वाली कंपनियों के निदेशकों के खिलाफ भी सख्ती बरती जाने की तैयारी है. इस के तहत किसी भी पंजीकृत कंपनी के 5 साल से अधिक समय से निदेशक का पद संभाले मालिकों के विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है.

सरकार का मानना है कि इस तरह की कंपनियों का इस्तेमाल अवैध रूप से पैसे के लेनदेन के लिए किया जाता है. कंपनी अधिनियम कानून के तहत किसी कंपनी का मालिक लगातार निदेशक नहीं रह सकता है. इस में एक महत्त्वपूर्ण नियम यह भी है कि 2-3 वर्षों तक वित्तीय विवरण जमा नहीं करने वाली कंपनियों में मालिक खुद निदेशक नहीं रह सकता है. इस तरह की कंपनियों के नाम पर जम कर फर्जीवाड़ा चल रहा है और उन में से कई के निदेशक लगातार गलत तरीके से लेनदेन में जुटे हैं. ये फर्जी कंपनियां सिर्फ कागजों पर चल रही हैं. जमीन पर कुछ भी नहीं है. यह फर्जीवाड़ा लंबे समय से जारी है लेकिन इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया है.

सरकार के कदम से फर्जीवाड़ा तो रुकेगा ही, साथ ही देश के व्यवसायियों के लिए काम करने का अच्छा माहौल व मौका मिलेगा. वे अपनी बात कायदे से रख सकेंगे और फर्जी निदेशकों की भीड़ छंट जाएगी. ये फर्जी निदेशक प्रैस लिखे वाहनों की तरह हैं जो व्यवसाय में कई बार बड़े बाधक बनते हैं. उन पर रोक लगाई जानी जरूरी है.

सीएसडी पर नहीं होगा जीएसटी का असर

सीएसडी यानी कैंटीन स्टोर डिपार्टमैंट का नाम आप ने जरूर सुना होगा. यह सस्ती दर पर बढि़या सामान की कैंटीन मानी जाती है. सीएसडी से सामान लेना सस्ता पड़ता है और दूसरे शुद्धता की गारंटी भी होती है. यह सुविधा देश के सैनिकों और उन के परिवारों के लिए है. जिला सैनिक कल्याण बोर्ड में भी हर जगह यह सुविधा उपलब्ध है ताकि सेवारत अथवा सेवानिवृत्त सैनिक इस का लाभ ले सकें. बीच में इस सुविधा के नाम पर काफी लोग गलत तरीके से फायदा उठा रहे थे लेकिन सीएसडी ने अब सख्ती कर दी है.

सीएसडी में मिलने वाले सामान पर कर नहीं लगता है, इसलिए वहां सामान सस्ता मिलता है. देश में सीएसडी के 34 डिपो हैं और सैनिकों को उन के जरिए सामान्य उपयोग की वस्तुओं के अलावा शराब भी खरीदने को मिलती है, सबकुछ सस्ता और वाजिब दर पर.

एक अच्छी बात यह है कि सीएसडी में जुलाई से लागू हो रहे जीएसटी के बाद भी सस्ता सामान मिलता रहेगा. वहां जीएसटी में 50 प्रतिशत छूट की व्यवस्था की गई है. सीएसडी को मिलने वाली सब्सिडी के सामान की लागत का भुगतान केंद्र तथा राज्य सरकारें करेंगी. जीएसटी परिषद की हाल में हुई बैठक में यह फैसला किया गया है.

सैनिक देश के लिए जान हथेली पर रख कर चलते हैं. उन की चौकसी के कारण ही देश में लोग निश्ंिचत हो कर काम कर रहे हैं. इसलिए उन को सुविधा मिलती रहनी चाहिए. सैनिकों को यह सम्मान देना उन का अधिकार है. सीएसडी के जरिए उन्हें यह सुविधा आगे भी मिलती रहेगी. पूरा देश इस का स्वागत करता है. कुछ लोग इस सुविधा का दुरुपयोग करते हैं लेकिन उन पर नजर रखी जानी चाहिए. दुरुपयोग से अराजकता पैदा होती है और इसे रोकना आवश्यक है.

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