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पूरा विश्व पुरुष प्रधान है : प्रियंका चोपड़ा

फिल्म ‘फैशन’ से चर्चित हुई अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने बौलीवुड और हौलीवुड में अपनी एक खास जगह बना ली है. देश हो या विदेश, हर जगह उन के फैंस की संख्या लाखोंकरोड़ों में है. मिस वर्ल्ड बनने के बाद उन्हें पहचान मिली और इसे उन्होंने केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में भी साबित कर दिया कि वे एक मंझी हुई अदाकारा हैं.

अभिनय में उन का शुरुआती दौर अधिक अच्छा नहीं था, लेकिन उन की लगन और मेहनत उन्हें यहां तक ले आई. उन्होंने हर तरह के किरदार निभाए हैं. प्रियंका अपने देश लौटने के बाद यहां की फिल्मों और अपने प्रोडक्शन हाउस को ले कर व्यस्त हैं. प्रियंका ने कई साल अमेरिका में गुजारे, लेकिन उन्हें बौलीवुड और अपना परिवार सब से अधिक पसंद है. उन से हुई बातचीत के दौरान उन्होंने हौलीवुड में ऐंट्री कितनी मुश्किल है, को ले कर बताया, ‘‘टीवी सीरीज ‘क्वांटिको’ की पौपुलैरिटी ही इस की खास वजह है. वहां मुझे बुलाया गया और मैं ने जब फिल्म ‘बेवाच’ की कहानी सुनी तो मुझे पसंद आई. मैं इस में विलेन के किरदार में हूं. मुझे हमेशा से चैलेंजिंग भूमिका करनी पसंद हैं. हालांकि कईर् हिंदी फिल्मों जैसे ‘सात खून माफ’ और ‘एतराज’ में विलेन की भूमिका मैं ने निभाई है, पर यह उस से अलग है.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘वहां काम करने का ढंग अलग नहीं है. वहां भी फिल्ममेकिंग हमारे बौलीवुड जैसी ही होती है, लेकिन वहां का बजट अलग है, हर काम बड़े स्तर पर होता है और हर काम समय से खत्म हो जाता है. केवल भाषा का फर्क है. हां, टीवी और फिल्म निर्माण प्रक्रिया में काफी अंतर है, जो यहां भी है.’’ उन की निर्माण संस्था में बनी मराठी फिल्म ‘वेंटिलेटर’ को नैशनल अवार्ड मिला है. इस बारे में वे कहती हैं, ‘‘मुझे खुशी है कि मुझे अवार्ड मिला. मैं इस फिल्म की कहानी से बहुत अधिक प्रेरित थी. यह फिल्म मैं ने अपने पिता के लिए बनाई थी. मुझे याद आता है जब मेरे पिता वेंटिलेटर पर थे, तब आईसीयू के बाहर यही सब हो रहा था…मेरे पिता के परिवार के लोग पंजाबी हैं और मेरी मां की तरफ के लोग बिहारी हैं, सब के अलगअलग विचार थे. इस तरह टू स्टेट्स की बातचीत चल रही थी.’’

वे आगे बताती हैं, ‘‘इस के अलावा मैं ने जिस वजह से अपनी प्रोडक्शन कंपनी बनाई और वह कामयाब हो रही है, वह खुशी की बात है. जब मैं इंडस्ट्री में आई थी तो मुझे हैल्प करने वाला कोई नहीं था. मैं मिस वर्ल्ड थी, इसलिए फिल्में मिलीं. मुझे अपनेआप को परिचय करवाना पड़ा. इसलिए मैं अपनी कंपनी में नए लेखक, निर्देशक, संगीतकार, गायक और कलाकारों को मौका देती हूं. मैं चाहती हूं कि फिल्में छोटी भले ही हों पर अच्छी हों.’’

आगे की प्लानिंग को ले कर प्रियंका कहती हैं, ‘‘आगे मैं कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ रही हूं, पसंद आने पर करूंगी. इस के अलावा मैं अपनी प्रोडक्शन कंपनी में कई रीजनल फिल्में, जैसे मराठी, सिक्किम, बांगला, कोंकणी आदि भाषाओं में बनाऊंगी.’’ गरमी में अपनी देखभाल और फिटनैस के सवाल पर वे कहती हैं, ‘‘अमेरिका में तो ठंड का मौसम हमेशा रहता है. भारत में गरमी अधिक पड़ती है पर मुझे गरमी का मौसम पसंद है. मेरा कोई खास डाइट चार्ट नहीं होता, मैं सब खाती हूं, लेकिन कुछ सावधानियां रखनी पड़ती हैं ताकि वजन न बढ़े. प्रोटीन अधिक, कोर्बोहाइड्रेट कम लेना होता है.’’

प्रियंका आगे कहती हैं, ‘‘पूरा विश्व पुरुष प्रधान है. महिला और पुरुषों की समानता के लिए जैसे यहां लड़ाई लड़ी जाती है, वहां भी वैसी ही बहस चलती रहती है. सालों से यही चल रहा है, लेकिन यह दौर अब खत्म हो रहा है. आजकल अभिनेत्री प्रधान फिल्में भी 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही हैं, उम्मीद है आगे 200 और 300 करोड़ के आंकड़े भी पार कर लेंगी. इस में दर्शकों को आगे आना होगा. इस से जो ऐक्टर और ऐक्ट्रैस के बीच में मेहनताने में जो अंतर है वह कम होगा. हां, यह सही है कि मुझे वहां के लोगों ने बहुत प्यार दिया और मुझे मेहनताना भी सही मिला. विदेश में भी मैं ने अपनी शर्तों पर काम किया है.’’    

यह भी खूब रही

गजेंद्र सिंह सोलंकी राजस्थान ही के नहीं, देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में से एक हैं. मैं अपने पुत्र के पास फरीदाबाद आया हुआ था और वहां सूरजकुंड में चल रहे मेले में अशोक चक्रधर के संयोजन में एक कविसम्मेलन में गजेंद्र सिंह सोलंकी जी के नाम का विज्ञापन पढ़ कर परिवार के साथ मैं कवि सम्मेलन में पहुंचा.

अशोक चक्रधर से मैं ने पूछा, ‘‘गजेंद्र सिंह सोलंकी जी कब पधारेंगे?’’

वे एक युवक की ओर इशारा कर के बोले, ‘‘यही तो हैं सोलंकी जी.’’ हमारे सोलंकी जी तो 80 वर्ष पार कर चुके हैं व उन के बीसियों कवि सम्मेलनों का संयोजन व उन के कई सम्मान समारोहों का आयोजन मैं स्वयं करा चुका था. सो, मैं दंग रह गया. खिसियाने स्वर में मैं ने अपने सभी परिवार के सदस्यों को बताया कि उसी नाम के ये युवा कवि हैं.  

गजेंद्र जैन

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हमारे एक परिचित के बेटे का रिश्ता तय हो गया था. एक दिन उन का फोन आया कि विवाह की तिथि 17 अक्तूबर निश्चित हुई है. 16 अक्तूबर को लेडीज संगीत व मेहंदी की रस्म होगी. वे बोले कि सोच रहा हूं कि 15 अक्तूबर को कौकटेल पार्टी कर लूं. मेरे पति बोले, ‘‘ठीक है, पर

14 अक्तूबर को हम जैसे लोगों के लिए तुम नीबू पार्टी भी कर दो.’’

मेरे पति की बात सुनते ही वे बहुत हंसे और जब उन्होंने मुझे यह बात बतलाई तो मुझे भी बहुत हंसी आई.   

अरुणा रस्तोगी

*

बात उन दिनों की है जब हम लोग नएनए मुंबई में सांताक्रुज रहने गए थे. मेरी सासूजी राजस्थान से आने वाली थीं. सो, मैं ने एक नई नौकरानी रखी थी. एक दिन मैं बाहर खरीदारी करने गई थी. घर में उस के सिवा कोई नहीं था. एक भद्र महिला ने दरवाजा खटखटाया. नौकरानी के खोलने पर उस ने अपनेआप को मेरी छोटी बहन, जो कोलकाता में रहती थी, बतलाया. नौकरानी ने उसे डाइनिंगरूम में बैठाया और चाय बनाने रसोई में चली गई.

नौकरानी जब चाय ले कर आई, कमरे में रखी चांदी की एक मूर्ति को ले कर वह महिला फरार हो चुकी थी. हम जब घर लौटे तो घबराते हुए नौकरानी ने सारी घटना बताई. हम ने वाचमैन से पूछा तो उस ने बतलाया कि वह महिला सुबह से ही बिल्ंिडग में घूम रही थी. हमारे फ्लैट में उसे हाथ साफ करने का मौका मिल गया.       

आशा गोयनका

बोझ बनती इंजीनियरिंग की डिगरी

इंजीनियरिंग की जिस डिगरी को हासिल करना कभी नौकरी की गारंटी और पारिवारिक प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी, आज वह डिगरी छात्रों और अभिभावकों के लिए एक ऐसा बोझ बनती जा रही है जिसे न तो केवल घर पर रख सकते हैं और न ही फेंक सकते हैं. ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए इतना ही काफी है कि शिक्षा हमेशा से ही एक व्यवसाय रही है. फर्क इतना भर आया है कि बदलते वक्त के साथसाथ आश्रमों व गुरुकुलों की जगह चमचमाते कालेज और पढ़ाने वाले दाढ़ीधारी गुरुओं के स्थान पर टाईसूट वाले प्रोफैसर दिखने लगे हैं यानी बदलाव शिक्षा प्रणाली के ढांचे में हुआ है, उस का मूलभाव ज्यों का त्यों ही है.

इस बदलाव का जीताजागता प्रमाण इंजीनियरिंग की डिगरी है जिस की हालत अब ठीक वैसी ही है जैसी 70 के दशक में बीए की डिगरी की हुआ करती थी कि हासिल तो कर लो, पर नौकरी पाने के लिए एडि़यां रगड़ते रहो. अब औपचारिक डिगरियों का जमाना लद चुका है. यह दौर तकनीक का है, इसलिए अधिकांश युवा रोजगार की अधिकतम गारंटी देने वाली डिगरी चाहते हैं.

यों आए फर्क

बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है, अब से 20 साल पहले तक प्राइवेट सैक्टर में ही इंजीनियरिंग की डिगरी नौकरी की गारंटी होती थी. वह कंप्यूटर का दौर था जब देशभर में सौफ्टवेयर कंपनियां अपना कारोबार बढ़ाने के लिए पांव पसार रही थीं. उस वक्त जिन्होंने कंप्यूटर और उस से जुड़ी शाखाओं में डिगरी ले ली, उन्हें हाथोंहाथ या फिर डिगरी लेने के एकाधदो साल के भीतर अच्छी नौकरी मिली

तकनीकी शिक्षा में क्रांति के लिए 90 का दशक बेहद अहम था जब अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो कंप्यूटर इंजीनियरों की मांग ज्यादा थी, आपूर्ति कम थी. चूंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार को भांप लिया था, इसलिए उन्होंने कंप्यूटर इंजीनियरों को आकर्षक पैकेज देने शुरू कर दिए. शिक्षा और रोजगार को ले कर अवसाद में डूबा और भड़ास से भरा युवा गांवदेहातों से निकल कर उन शहरों की तरफ दौड़ पड़ा जहां पढ़ने को इंजीनियरिंग कालेज थे. देखते ही देखते इंजीनियरिंग कालेज कुकुरमुत्तों की तरह खुलने लगे. यहां यह बात कोई खास माने नहीं रखती कि इन में से अधिकांश कालेज नेताओं, उद्योगपतियों और शिक्षा माफिया से संबंध रखते मगरमच्छों के थे. उन का होना भर ही छात्रों के लिए वरदान साबित हुआ.

बात यकीन से परे है कि एक वक्त इंजीनियरिंग कालेजों की तादाद 5 हजार का आंकड़ा छूने लगी थी और इन में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 20 लाख तक पहुंच गई थी. यह कहनेभर को एक सुखद और अकल्पनीय स्थिति थी. वजह, पुरानी अर्थशास्त्र वाली थ्योरी ही थी कि मांग घटने लगी और आपूर्ति बढ़ने लगी.

2005 के आसपास सौफ्टवेयर कंपनियों ने अपनी शर्तों यानी वेतन पर नौकरी देना शुरू कर दी. इस से भी छात्रों को कोई खास सरोकार या एतराज नहीं था क्योंकि वे बेराजेगारी के दंश और कलंक से बच रहे थे. लेकिन 5 वर्षों बाद ही 2010 में इंजीनियरिंग की डिगरी नौकरी की गारंटी नहीं रह गई थी.

दरअसल, इंजीनियरिंग कालेज संचालकों ने 15 वर्षों तक तगड़ी चांदी काटी. छात्र किसी भी शर्त और फीस पर इन में दाखिला चाहते थे. लेकिन इंजीनियरिंग कालेजों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा से छात्रों को कोई फायदा नहीं हुआ. चमकतेदमकते और इश्तिहारों पर करोड़ों रुपए खर्च करने वाले कालेज डिगरियां बांटने के अड्डे बन कर रह गए.इंजीनियरिंग कालेजों को मान्यता देने वाली एजेंसी अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई ने कालेजों को मान्यता देने में तो उदारता दिखाई पर इंजीनियरिंग शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी में वह गच्चा खा गई. कई दफा एआ ईसीटीई में गड़बड़झालों और घोटालों की बातें उजागर हुईं पर किसी का कुछ खास नहीं बिगड़ा.

इधर कालेजों की हालत मेले में लगी दुकानों की सी हो चली जो लागत वसूलने के लिए छात्रों को तरहतरह के प्रलोभन देने लगे थे कि उन के यहां ऐडमिशन लो तो फीस में इतना डिस्काउंट मिलेगा या होस्टल फ्री रहेगा. इस बाबत इश्तिहारों के अलावा दलालों की भी मदद ली गई. देखते ही देखते हर घर में एक इंजीनियर हो गया, जिस पर किसी को गर्व नहीं हुआ. न तो बेटे या बेटी के इंजीनियर बनने पर किसी ने सत्यनारायण की कथा कराई और न ही महल्ले में मिठाई बांटी.

इंजीनियरिंग शिक्षा और उस की गुणवत्ता का ग्राफ जो गिरा तो अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. एआईसीटीई ने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि जिस डिगरी को हासिल करने में कभी छात्रों को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी, वह कैसे बेहद आसानी से मिलने लगी है. इस अधिकार संपन्न एजेंसी के कर्ताधर्ताओं ने इस बाबत भी गंगाजी में डुबकी लगाई कि वह न कुछ देखेगी और न कुछ करेगी ही.

ऐसे गिरी गुणवत्ता

इंजीनियरिंग कालेजों की तालीम की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, यह बात हर कोई समझ रहा है कि जब 2-4 दड़बेनुमा कालेजों में कालेज चलेंगे तो ऐसा होना लाजिमी है. अभिभावक भी समझने लगे कि उन की संतान दरअसल इंजीनियर नहीं, बल्कि एक टैक्निकल क्लर्क बन कर रह गई है. पर वे इस में कुछ करने की स्थिति में नहीं थे. दिक्कत यह है कि पढ़ाई की गुणवत्ता में गिरावट का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है. भोपाल की एक छात्रा आयुषी की मानें तो उस ने 12वीं की परीक्षा जैसेतैसे थर्ड डिवीजन में पास की थी. मम्मीपापा की इच्छा थी कि वह इंजीनियर बने, इसलिए बन गई. शहर के ही एक छोटे कहे जाने वाले इंजीनियरिंग कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4 वर्षों बाद आयुषी कंप्यूटर इंजीनियर बन गई.

आयुषी जैसे लाखों इंजीनियर क्या पढ़ते हैं और क्या सीखते हैं, इस का खुलासा एक सर्वे में हुआ तो इस की जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने में आई. रोजगार पात्रता के आकलन से जुड़ी कंपनी एस्पायरिंग माइंड्स ने इसी साल अप्रैल में अपने एक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाल कर सामने रख दिया कि भारत में 85 फीसदी इंजीनियर सौफ्टवेयर डैवलपमैंट के काबिल नहीं होते हैं. एस्पायरिंग माइंड्स के इस दिलचस्प सर्वे में देश के 400 से ज्यादा कालेजों के 36 हजार छात्र शामिल किए गए थे. इन में से दोतिहाई तो सही कोड ही नहीं लिख पाए. हैरत की बात महज 1.4 फीसदी छात्रों का सही कोड लिख पाना रही. यह बात या परिणाम चिंताजनक इस लिहाज से भी है कि सौफ्टवेयर प्रोग्रामिंग के मामले में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन भारत पिछड़ रहा है.

इन इंजीनियरों का निर्माण और उत्पादन कैसेकैसे हो रहा है, इसे साबित करने के लिए धड़ल्ले से बंद होते इंजीनियरिंग कालेज आंकड़ों की शक्ल में सामने हैं. दोटूक कहा जाए तो हाट लुट गई, तो दुकानदारों ने बोरियाबिस्तर समेटना शुरू कर दिया है. बंद हो रहे कालेज इसी साल फरवरी के महीने में चौंका देने वाली एक खबर मध्य प्रदेश से यह आई कि 82 इंजीनियरिंग कालेज जल्द बंद होने जा रहे हैं. जबकि 23 कालेज पहले ही बंद हो चुके थे. मध्य प्रदेश के तकनीकी शिक्षा मंत्री दीपक जोशी की मानें तो अब छात्रों का रुझान इंजीनियरिंग के प्रति कम हो चला है, इसलिए ये कालेज बंद होने के कगार पर हैं. इन में 60 फीसदी सीटें खाली पड़ी हैं.

इस बात का दूसरा पहलू यह है कि दरअसल अब इंजीनियरिंग कालेज पहले सा मुनाफा नहीं दे रहे, इसलिए संचालक इन्हें बंद करना चाहते हैं. पर यह बात सच है कि अब छात्रों की रुचि इंजीनियरिंग से हट रही है. इस की कोई सौपचास नहीं, बल्कि इकलौती वजह यह है कि इंजीनियरिंग की डिगरी नौकरी की गारंटी नहीं रही और कैंपस प्लेसमैंट का सुनहरा दौर आ कर, गुजर चुका है. न केवल भोपाल या मध्य प्रदेश, बल्कि देशभर के तमाम प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में अयोग्य शिक्षक पढ़ा रहे हैं वह भी बेहद मामूली पगार पर. भोपाल के एक ऐसे ही प्राध्यापक अवनीश की मानें तो उन्हें बमुश्किल 18 हजार रुपए महीना तनख्वाह मिलती है. जिस कालेज से अवनीश ने एमटैक किया, उस के एक डाइरैक्टर के कहने पर उसी में पढ़ाने की नौकरी कर ली जो कब तक चलेगी, अवनीश जैसे लाखों प्राध्यापकों को इस का पता नहीं.

पिछले साल एक बड़े खुलासे में उत्तर प्रदेश के 600 इंजीनियरिंग कालेजों में लगभग 20 हजार शिक्षक फर्जी पाए गए थे. साफ है कि इंजीनियरिंग कालेजों की खुमारी अब उतर रही है जिन की इस तरह की पोलपट्टियां वक्तवक्त पर उजागर होती रही हैं. दिक्कत यह है कि इंजीनियरिंग की डिगरी का कोई विकल्प नहीं है. प्रबंधन पाठ्यक्रमों की स्थिति ठीक है क्योंकि उन में दाखिला स्नातक होने के बाद मिलता है और उन के संस्थानों की संख्या भी नहीं बढ़ रही है. हालांकि 12वीं के बाद छात्र अभी भी इंजीनियरिंग की डिगरी को ही बेहतर मानते हैं और 5-6 हजार रुपए महीने की नौकरी मिले तो उस से भी परहेज नहीं कर रहे.

इंजीनियरिंग डिगरी की ऐसी दुर्दशा की कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी पर वह हो रही है तो छात्रों के सिर पर बोझ भी बनती जा रही है जिन्हें बीए की डिगरी या बीकौम करने के बाद 5-6 हजार रुपए महीने की नौकरी भी नहीं मिलती. युवाओं के लिहाज से बात वाकई हताशा की है. नई सरकार भी रोजगार के पैमाने पर खरी नहीं उतरी है और वित्त मंत्री अरुण जेटली मंदी को वैश्विक बताते पल्ला झाड़ लेते हैं. हर साल 3,364 इंजीनियरिंग कालेजों से अभी भी 8 लाख इंजीनियरनिकल रहे हैं. कैंपस के बाहर आ कर क्या करेंगे, यह उन्हें भी नहीं मालूम जो अब कहनेभर को इंजीनियर हैं, ठीक वैसे ही जैसे लाखों एलएलबी पास वकील हैं. और सुधार के नाम पर सरकार नौकरी न दे पाए, यह ज्यादा चिंता या चर्चा की बात नहीं. पर इंजीनियरिंग शिक्षा में सुधार हो, तो शायद उस की गुणवत्ता भी सुधरे और इंजीनियरों को नौकरी भी मिले.

ऐसा नहीं है कि एआईसीटीई को इन बातों की चिंता नहीं है पर कैसी है, यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है. पहले तो उस ने धड़ल्ले से इंजीनियरिंग कालेज खुलने दिए और अब धीरेधीरे उन्हें बंद करने की पहल कर रही है. साल 2015-16 में देशभर में 125 और 2016-17 में 122 इंजीनियरिंग कालेज बंद हो चुके हैं. कालेजों में एआईसीटीई अब सीटों की संख्या 16 लाख से घटा कर 10-11 लाख पर समेटने की दिशा में काम कर रही है और यह काम वह चरणबद्ध तरीके से करने की बात कह रही है. लेकिन यह हल नहीं है, न ही इस से विसंगतियां दूर होने वाली हैं. यह एक तरह से फिर से इंजीनियरिंग कालेज संचालकों को फायदा पहुंचाने वाली बात है जो बगैर एआईसीटीई की अनुमति के अपने कालेज एकदम बंद भी नहीं कर सकते. मूल बात या परेशानी इंजीनियरिंग की डिगरी की साख वापस दिलाना है, इस तरफ कोई पहल, कहीं से नहीं हो रही.        

इस साल मकानों की बिक्री में 41 फीसदी की भारी गिरावट

इस कैलेंडर वर्ष में जनवरी से मई की पांच माह की अवधि में मकानों की बिक्री 41 प्रतिशत गिरकर 1.10 लाख इकाई रह गई. यह आंकड़ा देश के 42 प्रमुख शहरों का है. नोटबंदी के बाद से संपत्ति क्षेत्र में मांग सुस्त बनी हुई है. एक साल पहले इसी अवधि में जब मांग ठीकठाक थी 1.87 लाख इकाइयों की बिक्री की गई. रीयल एस्टेट क्षेत्र पर नजर रखने वाली कंपनी प्राप-इक्विटी ने यह जानकारी दी है.
 
रीयल एस्टेट क्षेत्र में इस समय पिछले कई सालों का मंदा चल रहा है. दूसरी तरफ यह भी समस्या है कि कुछ राज्यों में अवैध रेत खनन पर सरकार की सख्ती के कारण आमलोगों के साथ ही डेवलपर्स को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा. यही वजह है कि कई आवास परियोजनाओं में देरी हो रही है और इसके परिणामस्वरूप खरीददार परेशान हो रहे हैं. उन्हें अपना फ्लैट पाने के लिए मजबूरन अदालती रास्ता अपनाना पड़ रहा है. नोटबंदी के बाद से आवास क्षेत्र की मांग पर ज्यादा असर पड़ा है.
 
हालांकि, इस दौरान सस्ते आवास वर्ग में मांग कुछ सुधरी है. सरकार की ओर से इस श्रेणी में कुछ सुविधाएं दिए जाने और सस्ती दरों पर कर्ज उपलब्ध होने से इस वर्ग में मांग बढ़ी है. सरकार ने सस्ते मकानों की परियोजनाओं को ढांचागत क्षेत्र का दर्जा दिया है और ब्याज सहायता भी दी गई. प्राप इक्विटी के संस्थापक और सीईओ समीर जासूजा ने कहा, ‘जनवरी-मार्च अवधि में मकानों की बिक्री कम रही है. नोटबंदी के बाद से बाजार की चाल लगातार धीमी बनी हुई है.’ उन्होंने कहा इस दौरान नए मकानों की परियोजनाओं में भी 62 प्रतिशत की गिरावट आई है.
 
पहले पांच माह के दौरान केवल 70450 फ्लैट के लिए परियोजनाएं शुरू की गईं जबकि पिछले साल इसी अवधि में 1,85,820 फ्लैट के लिए आवास परियोजनाएं शुरू की गईं. जासूजा का कहना है कि नोटबंदी के बाद से रीयल एस्टेट क्षेत्र संकटपूर्ण दौर से गुजर रहा है. इस दौरान लेनदेन गतिविधियों में काफी गिरावट आई है. देश में रीयल एस्टेट (नियमन और विकास कानून) के लागू होने से डेवलपर्स पहले शुरू की गई परियोजनाओं को पूरा करने पर ध्यान दे रहे हैं क्योंकि देर करने पर उन्हें जुर्माना भुगतना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि माल व सेवाकर (जीएसटी) और नए रीयल्टी कानून से उपजी मौजूदा स्थिति के सामान्य होने तक कुछ और समय आवास व रीयल्टी क्षेत्र का बाजार सुस्त बना रहेगा.

क्रिकेटर नहीं डांसर बनना चाहती थीं मिताली राज

महिला वनडे वर्ल्ड कप में भारत की कप्तान मिताली राज ने कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए हैं. 34 साल की मिताली अपना पांचवां वर्ल्ड कप खेल रहीं हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की भारतीय कप्तान कभी क्रिकेटर नहीं बनना चाहती थीं. बल्कि उन्हें क्लासिकल डांसर बनना था.

जोधपुर में 3 दिसंबर 1982 को मिताली का जन्म हुआ. पिता दुराई राज एयर फोर्स में ऑफिसर थे तो मां लीला राज भी क्रिकेट खेल चुकी थीं. तमिल परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन में ही क्लासिकल डांस सीखना शुरू कर दिया. 10 साल की उम्र तक मिताली भरतनाट्यम में पारंगत हो गईं थीं. वे इसी में करियर बनाने के बारे में सोचने लगीं थीं.

लेकिन किस्मत को ऐसा मंजूर नहीं था. मिताली बचपन से ही आलसी थी. पिता चाहते थें कि बेटी अनुशासन में रहे और एक्टिव बने. इसलिए उन्होंने मिताली को क्रिकेट खेलने को कहा. 10 साल की उम्र में मिताली क्लासिकल डांस छोड़ हाथ में बैट पकड़े मैदान में नजर आने लगीं थीं.

इसके बाद उनकी स्कूलिंग हैदराबाद में हुई. स्कूल में लड़कों के साथ क्रिकेट की प्रैक्टिस करती थीं. 17 साल की उम्र में मिताली का चयन भारतीय टीम में हो गया.

मिताली ने एक इंटरव्यू में कहा था, शुरुआत में मैंने सिर्फ पेरेंट्स की खुशी के लिए क्रिकेट खेलना शुरू किया था. मेरा पहला प्यार तो भरतनाट्यम ही था. एक बार मैंने सिविल सर्विस में भी करियर बनाने का सोचा था.

मिताली किताबें पढ़ने की शौकीन हैं. वे हर मैच में बैटिंग करने जाने से पहले किताब पढ़ते हुए अपनी बारी का इंतजार करतीं हैं. उन्हें हाल ही में वर्ल्ड कप में इंग्लैंड के खिलाफ मैच में भी ऐसा करते हुए देखा गया.

मिताली ने अपने 17 साल के अंतरराष्ट्रीय कॅरिअर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं. वे पहली महिला क्रिकेटर हैं, जिन्हें विजडन इंडिया क्रिकेटर अवॉर्ड मिला है. उन्हें 21 साल की उम्र में भारतीय टीम की कमान सौंप दी गई थी. मिताली को खेल में अच्छे प्रदर्शन के लिए भारत सरकार द्वारा अर्जुन अवॉर्ड मिल चुका है.

उन्होंने लगातार 57 मैचों में टीम की कप्तानी की है. ऐसा करने वाली दूसरी सबसे सफल खिलाड़ी हैं. उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने इंग्लैंड में 2006 में पहली बार टेस्ट सीरीज जीती थी. मिताली 5500 से ज्यादा रन बनाने वाली दूसरी महिला क्रिकेटर हैं. वे 2013 में दुनिया की नंबर वन वनडे क्रिकेटर थीं.

2005 में जब भारतीय टीम वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंची थी, उस समय मिताली टाइफाइड के कारण फाइनल नहीं खेल सकीं थीं. टीम मैच हार गई थी. इसके बाद टीम कभी फाइनल में जगह नहीं बना सकी है.

WWE : बेटी ने पिता पर किया पाइप से हमला और फिर

डबल्यूडबल्यूई में सिर्फ पुरुष ही नहीं महिलाओं ने भी अपना लोहा मनवाया है. पुरुष के मुकाबले महिलाओं के मैच में बेहद रोचक मुकाबले देखने को मिले हैं. कई बार तो मैच केवल महिलाओं के बीच ही नहीं बल्कि महिला-पुरुषों में भी हुए हैं.

ऐसा ही एक मुकाबला डबल्यूडबल्यूई के 'नो-मर्सी पे-पर-व्यू' के तहत हुआ था, जिसमें पिता और पुत्री आपस में भिड़े थे और इस मुकाबले को लेकर लोगों के बीच खासा रोमांच देखा गया था. आइए जानते हैं कि इस मुकाबले में हुआ क्या.

डबल्यूडबल्यूई में नो-मर्सी पे-पर-व्यू मुकाबले हमेशा से चर्चा में रहे हैं, लेकिन साल 2003 इस मामले में बेहद खास रहा है. उस साल जहां ब्रॉक लैसनर ने द अंडरटेकर के खिलाफ डबल्यूडबल्यूई चैंपियनशिप बचाने में सफलता हासिल की, वहीं कर्ट एंगल और जॉन सीना के बीच खासी रोमांचक फाइट हुई थी. यह बात अलग है कि इन सभी मैचों में से अगर किसी ने सबको चौंकाया, तो वह थी बाप और बेटी के बीच 'कातिलाना' फाइट.

यह मुकाबला कंपनी के चेयरमैन विन्स मैकमैहन और उनकी बेटी स्टेफनी मैकमैहन के बीच हुआ था. बात की शुरुआत तब हुई थी, जब नो-मर्सी पे-पर-व्यू से दो हफ्ते पहले हुए स्मैकडाउन के एपिसोड में जनरल मैनेजर स्टेफनी मैकमैहन ने विन्स मैकमैहन को बीच में रोकते हुए अपने मैच की घोषणा कर दी थी. वास्तव में इस घटना से विन्स अपनी बेटी पर भड़क गए थें. इसके बाद उन्होंने गुस्से में नो-मर्सी पे-पर-व्यू में अपनी बेटी स्टेफनी के साथ मुकाबले का एलान कर दिया था.

मैच के लिए रखी गईं शर्तें भी अनूठी थीं. शर्त के अनुसार स्टेफनी मैकमेहन अपने पिता विन्स को हराने के लिए पिन या सबमिशन का सहारा ले सकती थीं, जबकि विन्स मैच को 'क्विट' बुलाकर ही अपने नाम करेंगे. सिर्फ इतना ही नहीं इस मैच में एक और शर्त मौजूद था कि जो भी यह मैच हारेगा, उसे अपना पद छोड़ना होगा.

विन्स की बेटी स्टेफनी ने शुरुआती दौर के बाद जब पिछड़ती दिखीं, तो उन्होंने पिता के ऊपर पाइप से हमला कर दिया. उन्होंने कई हमले किए, लेकिन विन्स ने हिम्मत नहीं हारी और दिमाग से काम लेते हुए स्टेफनी को जाल में फंसा लिया.

विन्स ने चलाकी से लय हासिल की और स्टेफनी को नीचे गिराया, उसके बाद उन्होंने स्टेफनी के ऊपर पाइप से हमला कर दिया. अंत में विन्स ने स्टेफनी के गले में पाइप को फंसा दिया और उन्हें जकड़ लिया, जिसके कारण स्टेफनी फेड हो गई और उनकी मां ने स्टेफनी की तरफ से हार मान ली.

इस मैच के दौरान स्टेफनी के साथ उनकी मां लिंडा मैकमैहन थीं, तो विन्स के साथ थीं सेबल. मैच की शुरुआत से ही विन्स मैकमैहन ने स्टेफनी के ऊपर दबदबा बनाए रखा. मैच में सेबल ने विन्स की मदद करने की कोशिश की, लेकिन लिंडा ने उन्हें रोक दिया और उन्हें मारना शुरू कर दिया, इस बीच विन्स ने अपनी बीवी को मारना चाहा, लेकिन लिंडा ने उन्हें थप्पड़ मर दिया और उसका फायदा उठाते हुए स्टेफनी ने विन्स को गलत जगह पर मार दिया.

इसके बाद विन्स मैकमैहन ने अपनी ही बीवी लिंडा मैकमैहन को रिंग में गिरा दिया और वो सेबल के साथ बाहर चले गए. मैच की शर्त मुताबिक हारने की वजह से स्टेफनी मैकमैहन को स्मैकडाउन के जनरल मैनेजर के पद से बर्खास्त कर दिया गया.

मोदी सरकार के भगवाई कदम

देश के 65 पूर्व प्रशासकों ने एक खुला पत्र लिख कर चिंता व्यक्त की है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद देश में न केवल सुनियोजित मुसलिम विरोधी, दलित विरोधी माहौल बनाया जा रहा है, बल्कि असहिष्णुता का वातावरण भी बना डाला गया है. पूर्व पुलिस अधिकारी जुलियो रिबेरो, जवाहर सरकार, हर्ष मंडेर, अरुणा राय जैसे प्रशासकों ने कहा है कि भारतीय संविधान की भावना के विरुद्घ अपने को बहुमत में कहने वाले अपना मन दूसरों पर थोप रहे हैं और धार्मिक परदे के सहारे उदार व तार्किक लोगों को भी अल्पसंख्यकों की तरह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है. इस में सत्तारूढ़ पार्टी के देशभर में फैले सैकड़ों भगवा गमछाधारी दबंग तो शामिल हैं ही, प्रधानमंत्री से ले कर केंद्रीय मंत्री, पार्टी के सांसद, कई मुख्यमंत्री भी शामिल हैं. ये सब हिंदू कट्टर, पौराणिक परंपराओं के नाम पर हिंदू धर्म को थोपना चाहते हैं.

खुले पत्र में पशु व्यापार पर प्रतिबंध, गौरक्षकों की फौज और शिक्षा संस्थानों पर भगवा कब्जे की खुल कर बात की गई है. संविधान की आत्मा कहती है कि इस देश में मसले बहस से हल होंगे, डंडों के जोर से नहीं, लेकिन आज लोकतंत्र को जिस तरह जूतों से कुचला जा रहा है, वह देश को तानाशाही की ओर ले जा रहा है.

आमतौर पर तटस्थ रहने वाले नौकरशाहों का इस तरह खुल कर सामने आने का अर्थ है कि वे स्थिति की गंभीरता को समझ रहे हैं. वे जानते हैं कि जो विषैले बीज बोए जा रहे हैं उन का असर पीढि़यों तक रहेगा और ये पेड़ बड़े होने पर महामारी फैलाएंगे. सरकार अपनी विषैली नीति को थोपने के लिए हर तरह के कानूनी डंडे का इस्तेमाल कर रही है और वे प्रशासक, जो 25-30 वर्ष इन कानूनों को लागू करते रहे हैं, अच्छी तरह जानते हैं कि ये कानून किस तरह आम नागरिक की कमर तोड़ सकते हैं.

स्वतंत्रता ही उत्पादकता व विकास को सब से बड़ी उर्वर जमीन देती है. अंगरेजों से लड़ाई केवल इसलिए नहीं लड़ी गई थी कि वे गोरे रंग के थे, इसलिए भी लड़ी गई थी कि वे भारत के नागरिकों को वह स्वतंत्रता नहीं दे रहे थे जो उन के अपने देश में थी. अमेरिका की आर्थिक सफलता के पीछे यही स्वतंत्रता रही है जो भारत में 1947 के बाद से बड़ी सीमित मात्रा में मिली. कुछ सरकारी तो कुछ सामाजिक बंधन ऐसे थे कि यहां का नागरिक कभी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं रहा.

देश में थोड़ीबहुत जो स्वतंत्रता रही, अब उसे भी कुचला जा रहा है. जो हो रहा है वह हिंदू समाज के पुनर्जागरण का नहीं, देश की भयंकर बीमारी का लक्षण है.

कपिल के शो में पहुंचे पठान ब्रदर्स

कामेडी किंग कपिल शर्मा के टीवी शो ‘कपिल शर्मा शो’ पर इस हफ्ते भारतीय क्रिकेट टीम के पठान ब्रदर्स पहुंचे. पठान ब्रदर्स यानि इरफान पठान और यूसुफ पठान.  इनके साथ शो के सेट पर पिता महमूद खान पठान भी आए. कपिल शर्मा और इनके कॉमेडियन साथी भारती, चंदन प्रभाकर और सुमोना ने मिलकर खूब हंसी मजाक किया. साथ ही कपिल के पूछने पर दोनों भाईयों ने अपने बचपन से जुड़ी यादें भी साझा की. यूसुफ ने कहा, “बचपन में इरफान मुझसे ज्यादा वर्क ऑउट करते थे और फिट रहते थे. इस वजह से मुझे पैरेंट्स से बहुत डांट खानी पड़ती थी.”

बता दें कि कॉमेडियन भारती सिंह भी ‘द कपिल शर्मा शो’ से जुड़ गई हैं जिस कारण कपिल शर्मा शो फिर से टौप 10 में जगह बना ली है. पिछले कुछ दिनों से भारती के कपिल शर्मा शो में काम करने या ना करने को लेकर सस्पेंस बना हुआ था. भारती ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक तस्वीर अपलोड कर इसकी जानकारी दी थी. इस तस्वीर में वह कपिल शर्मा के साथ शो के सेट पर दिख रही हैं. तस्वीर के कैप्शन में भारती ने लिखा है, “कौन कहता है कि मैं ‘द कपिल शर्मा शो’ के लिए शूटिंग नहीं कर रही हूं.”  कुछ दिनों पहले ही चंदन भी कपिल के शो में वापसी की. इस बात की जानकारी चंदन ने फेसबुक लाइव चैट पर दी थी. इन्होंने कहा कि कपिल शर्मा के शो पर वापस लौट रहे हैं और उन्होंने शो को बहुत मिस किया. शो से अलग होने पर कहा कि मुझे ब्रेक की जरूरत थी.

बता दें कि कॉमेडियन सुनील ग्रोवर से झगड़ा होने के बाद से कपिल शर्मा शो की टीआरपी में गिरावट आ गयी थी. कपिल के पुराने साथी कॉमेडियन सुगंधा मिश्रा, अली असगर और संकेत भोसले समेत शो की क्रिएटिव डायरेक्टर प्रीती सिमोस ने कृष्णा अभिषेक के साथ हाथ मिला लिया है. जल्द ही यह लोग सोनी टीवी पर ही एक नए शो ‘कमेडी कम्पनी’ के साथ वापसी करेंगे. माना जा रहा है कि यह शो कपिल के शो को जबरदस्त टक्कर देने वाला है.

परेशानी से बचाए एजुकेशन लोन

आज के समय में शिक्षा बहुत महंगी हो गई है. ऐसे में एजुकेशन लोन ले कर भी शिक्षा पूरी की जा सकती है. इस से पेरैंटस पर शिक्षा बोझ नहीं बनती और शिक्षा ले रहे बच्चों को भी इस बात का एहसास होता है कि वे मेहनत से पढ़ाई करें क्योंकि उसे पढ़ाई के बाद नौकरी कर के इस को चुकाना होता है.

आमतौर पर मांबाप अपने जीवनभर की कमाई बच्चों की शिक्षा में लगा देते हैं. बुढ़ापे में अगर बच्चे साथ नहीं देते तो वे दोहरी मुसीबत में फंस जाते हैं. एजुकेशन लोन के जरिए इस परेशानी को सरलता से सुलझाया जा सकता है. इस से बच्चों की शिक्षा को ले कर पेरैंटस पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता है. अब अलगअलग तरह की पढ़ाई के लिए लोन मिलने लगे हैं. बैंक अब आसानी से लोन देने लगे हैं. लोन लेने से पहले जरूरी है कि उस से जुडे़ विषयों को समझ लिया जाए.  

बैंक एजुकेशन लोन देने से पहले उस की वापसी यानी रिपेमैंट सुनिश्चित करता है. आमतौर पर लोन उसे ही दिया जाता है, जो इसे वापस करने की क्षमता रखता है. रिपेमैंट लोन लेने वाले स्टूडैंट के अभिभावक कर सकते हैं या फिर लोन लेने वाला स्वयं पढ़ाई खत्म करने के बाद रिपेमैंट कर सकता है. लोन लेने के लिए गारंटर की जरूरत पड़ती है. गारंटर लोन लेने वाले का अभिभावक या फिर रिश्तेदार हो सकते हैं. बैंक किसी भी कोर्स के लिए होने वाले खर्चों की पूर्ति करने के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराता है. एजुकेशन लोन के दायरे में देश और विदेश में पढ़ाए जाने वाले कोर्स शामिल होते हैं. आप चाहें तो किसी के लिए भी बैंक से लोन ले सकते हैं. 

जैसी पढ़ाई वैसा लोन

भारत में 12वीं की स्कूली शिक्षा, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, पीएचडी, इंजीनियरिंग, मैडिकल, एग्रीकल्चर, ला, डैंटल, मैनेजमैंट, कंप्यूटर, मान्यताप्राप्त प्रतिष्ठित संस्थानों के कंप्यूटर कोर्स, आईसीडब्लूए, सीए आदि जैसे कोर्सों के लिए एजुकेशन लोन ले सकते हैं. यदि आप विदेश में पढ़ाई करने की चाहत रखते हैं, तो प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी के जौब ओरिएंटेड प्रोफैशनल या टैक्निकल कोर्स, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, एमसीए, एमबीए, एमएस आदि के लिए भी एजुकेशन लोन बैंक से हासिल कर सकते हैं.

स्कूल, कालेज और होस्टल की फीस, परीक्षा, लाइब्रेरी और लैबोरेटरी की फीस, किताबें, इंस्ट्रूमैंटस, इक्विपमैंट, यूनिफौर्म खरीदने के लिए, विदेश में पढ़ाई के लिए यात्रा खर्च, रास्ते का खर्च, स्टडी टूर, प्रोजैक्ट वर्क, थीसिस इत्यादि के लिए एजुकेशन लोन मिल जाता है.

जरूरत के हिसाब से लें लोन

जब आप एजुकेशन लोन लेने का मन बना लेते हैं, तो आप पहले से ही यह अंदाजा लगा लें कि आप की जरूरत कितनी है? अलगअलग मद में कितना खर्च होगा? पढ़ने के लिए कहां जाना है? कितना समय लगेगा? इस पर विचार करने के बाद अपना बजट तैयार करें और तय करें कि कितना बोझ आप खुद उठा सकते हैं.

मंदी के कारण आजकल मार्केट की स्थिति बेहतर नहीं है. ऐसे में जान लें कि आप जो लोन लेने जा रहे हैं, उस की रिपेमैंट सही समय पर हो जाए. इसलिए लोन उतना लिया जाए, जितना अदा कर सकें. नौकरी लगने के बाद रिपेमैंट के औप्शन पर विचार करने से पहले सभी विकल्पों और अच्छीबुरी सभी प्रकार की संभावनाओं पर पूरी तरह विचार कर लिया जाना चाहिए.

बेशक बाजार की मांग और आपूर्ति का इस सैक्टर पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता, लेकिन फ्लोटिंग रेट का असर जरूर पड़ता है. विशेषकर लंबी अवधि के लोन, फ्लोटिंग रेट से प्रभावित होते हैं.

बैंक अन्य लोन की तरह ही एजुकेशन लोन पर भी ब्याज वसूलता है, लेकिन यह वसूली करने के लिए उस के पास मुख्यरूप से 3 विकल्प हैं. इन में एक आकर्षक जरिया है मोरेटोरियम पीरियड जिसे रिपेमैंट हौलीडे भी कहा जाता है. इस में विकल्प होता है कि लोन लेने वाला इस की रिपेमैंट जिस कोर्स में ऐडमिशन लिया गया है, उस की समाप्ति के बाद कर सकता है. रिपेमैंट मोरेटोरियम कई बैंक कोर्स की समाप्ति के 1 वर्ष बाद या नौकरी लगने के 6 महीने बाद शुरू करने के विकल्प देते हैं. कोर्स के दौरान सिर्फ  ब्याज का भुगतान करना होगा. कोर्स पूरा करने के बाद वास्तविक ईएमआई (मूल व ब्याज) का पेमैंट करना होगा. लोन मिलने के तुरंत बाद ईएमआई का भुगतान कर सकते हैं. इस बारे में कई बैंक ब्याजदर पर डिस्काउंट भी देते हैं.

लोन पर ब्याज का रखें ध्यान

आमतौर पर एजुकेशन लोन पर ब्याज की दर पसर्नल लोन के रेट से कम होती है. कुछ बैंक फिक्स रेट चार्ज करते हैं, तो कुछ फ्लोटिंग रेट पर. इन दोनों में करीब 1 प्रतिशत का अंतर होता है. ऐक्सपर्ट सलाह देते हैं कि एजुकेशन लोन की अवधि 5 से 7 वर्ष की होती है, इसलिए रिपेमैंट के लिए फिक्स रेट का औप्शन बैंक नहीं देते. ऐसे में जरूरत है वास्तविक फिक्स रेट की जानकारी लेने की.

कई बैंक लड़कियों के लिए ब्याज की दर में डिस्काउंट का औप्शन भी देते हैं. इन दिनों कई बैंक एजुकेशन लोन के लिए प्रोसैसिंग फीस चार्ज नहीं करते. जिस बैंक से आप लोन ले रहे हैं और यदि वह आप से प्रोसैसिंग फीस की मांग कर रहा है, तो आप उस बैंक के साथ निगोशिएशन कर सकते हैं. आमतौर पर सभी बैंक उस स्थिति में प्रीपेमैंट फीस चार्ज नहीं करते जब लोन लेने वाला अपने बूते लोन की प्रीपेमैंट करता है. लेकिन लोन की बकाया राशि किसी और बैंक में ट्रांसफर करने की हालत में प्रीपेमैंट फीस वसूल की जाती है.

पहले से करें लोन की तैयारी

एजुकेशन लोन लेने के लिए कुछ औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ता है, इस के बिना एजुकेशन लोन मिलना आसान नहीं होता है. कई बार लोन इसलिए नहीं मिलता क्योंकि संबंधित कोर्स यूजीसी द्वारा मान्यताप्राप्त नहीं होते हैं. इसलिए लोन लेने से पहले पूरी तैयारी करनी बेहद जरूरी है.

बैंक, ग्राहकों को लोन लेने में अलगअलग सुविधाएं भी प्रदान करते हैं, जैसे कि कोई बैंक लड़कियों को ब्याजदर में छूट देता है, तो कोई बैंक लोन देने में प्रीपेमैंट चार्ज नहीं लेता है. इस के अलावा, प्रत्येक बैंक की प्रोसैसिंग फीस भी अलगअलग होती है.

आमतौर पर लोन लेने से पहले कुछ प्रमाणपत्रों की जरूरत होती है जैसे ऐडमिशन मिलने का प्रमाणपत्र, स्टडी प्रोग्राम का कास्ट ब्रेकअप, लोन लेने का आवेदनफौर्म, पते, पहचान के प्रमाण, सिगनेचर वैरिफिकेशन यानी आवेदक की जानकारी, गारंटर की इनकम प्रूफ , विदेश जाने के लिए लोन लेने पर यूनिवर्सिटी का लैटर, वीजा डौक्यूमैंट और ट्रैवल पेपर्स, खर्चों की सूची, फोटोग्राफ  आदि.

एजुकेशन लोन उन स्टूडैंट को ही दिया जाता है जो आगे की पढ़ाई यानी हायर, टैक्निकल या प्रोफैशनल कोर्स भारत या इस से बाहर करना चाहते हैं. एजुकेशन लोन विभिन्न कैरियर-ओरिएंटेड कोर्सों इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट, मैडिकल आदि में प्रवेश लेने वाले स्टूडैंट्स को आसानी से मिल जाता है.

इस के अलावा, ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स करने वाले स्टूडैंट्स को भी एजुकेशन लोन दिया जाता है. वैसे, कोर्स फीस के अतिरिक्त कंप्यूटर, मैडिकल किट आदि के लिए भी लोन दिया जाता है. इस के लिए सब से पहले जिस बैंक से लोन लेना है, वहां का निर्धारित फौर्म भरना

होता है. फौर्म के अलावा, फोटोग्राफ, आईडैंटिटी प्रूफ, रैजिडैंस प्रूफ, इनकम प्रूफ, एजुकेशनल क्वालिफिकेशन से संबंधित सर्टिफिकेट्स, सीनियर सैकंड्री स्कूल की मार्कशीट, एमबीए के लिए पोस्ट ग्रेजुएट या ग्रेजुएशन की मार्कशीट, स्कौलरशिप से संबंधित डौक्यूमैंट्स (यदि कैंडिडेट के पास हैं) आदि की जरूरत होती है. इस के अलावा, ऐडमिशन लैटर और कोर्स की अवधि आदि से संबंधित प्रारूपकी भी जरूरत होती है.

एजुकेशन लोन में सावधानी

स्टूडैंट को चाहिए कि वे लोन से संबंधित जो विवरण और दस्तावेज दे रहे हैं, वे पूरी तरह सही हों और बैंक के दिशानिर्देशों के अनुरूप हों. साथ ही, कोर्स के दौरान कितना खर्च आ सकता है, उस का भी विवरण देना चाहिए. लोन की स्वीकृति बैंक के नियमों के तहत ही दी जाती है. कई बार लोन के दौरान कोर्स और यूनिवर्सिटी को भी ध्यान में रखा जाता है.

साथ ही, पेरैंट्स या कोएप्लिकैंट के फाइनैंशियल स्टेटस पर भी नजर रखी जाती है. 4 लाख रुपए तक के एजुकेशन लोन पर किसी सिक्योरिटी की जरूरत नहीं होती है. लेकिन इस के लिए पेरैंट्स के फाइनैंशियल स्टेटस का अप्रेजल किया जाता है.

यदि 4 लाख रुपए से अधिक लोन लेते हैं, तो लोन के अनुरूप सिक्योरिटी की जरूरत होती है या किसी थर्ड पार्टी को गारंटी लेनी पड़ती है. कोर्स के दौरान पहले साल उपयोग किए गए लोन का सिंपल इंटरैस्ट ही अदा करना होता है. लेकिन कोर्स खत्म होने के बाद रिपेमैंट की प्रक्रिया शुरू होने के 5 वर्षो में पूरा पेमैंट करना होता है.     

इन्हें आजमाइए

– इंटरनैट हमारे जीवन को सरल बनाने के लिए है, लेकिन कुछ लोग इंटरनैट का उपयोग अपने को  बरबाद करने के लिए करते हैं. हमें इंटरनैट का उपयोग जरूर करना चाहिए लेकिन यह ध्यान देना चाहिए कि इस का हमारे जीवन पर कोईनकारात्मक प्रभाव न पड़े.

– आप पर्यटन के लिए जा रहे हैं, शौपिंग करने नहीं. शांति, सुकून से दर्शनीय स्थलों का मजा लें. खरीदारी के पचड़ों में न पड़ें. हलकीफुलकी चीज यादगार के तौर पर खरीदी जा सकती है.

– नीम की पत्तियों को पानी में उबाल कर, पीस कर पेस्ट बना लीजिए. अब पेस्ट में शहद मिला कर बालों में लगाने से रूसी खत्म हो जाती है और बाल मुलायम व चमकीले हो जाते हैं.

– किसी के साथ 1 साल लिवइन रिलेशनशिप में रहने से अच्छा है, बिना लिवइन रिलेशनशिप में रह कर एकदूसरे को ज्यादा से ज्यादा समझने की कोशिश करना.

– एक कप आम का जूस पीने से शरीर को विटामिन ए की अच्छी मात्रा मिल जाती है. यह आंख की रोशनी को बेहतर बनाता है.

– अगर ब्रैस्ट पर रैशेज हो जाएं, तो उस पर बेबी पाउडर लगाएं. फंगल रैशेज की समस्या है, तो मीठा कम खाएं.

 

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