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हमारी बेडि़यां

हमारे यहां जब कोई बुजुर्ग अपनी पूरी उम्र जी कर मृत्यु को प्राप्त होते हैं तो खूब बैंडबाजे, ढोलनगाड़ों के साथ उन्हें अंतिमयात्रा पर ले जाया जाता है. उन की तेरहवीं पर विशाल भंडारा किया जाता है. यहां तक कि पासपड़ोस में लड्डू तक बांटे जाते हैं. इस से साफसाफ यही प्रदर्शित होता है कि सारा परिवार घर के उस बुजुर्ग की मृत्यु का इंतजार कर रहा था.

गीता यादवेंदु

*

मैं एक परिचित की मृत्यु होने पर उन के घर गई. वे पत्नी की मृत्यु के बाद अकेले ही रहते थे. उन के 2 पुत्र दूसरे शहर में रहते थे. वे एक साल से बिस्तर से लगे हुए थे, लेकिन कोई बेटा न तो उन के पास कभी आया, न ही वे बेटों के पास रहने के लिए कभी गए.

मैं आश्चर्यचकित रह गई यह देख कर कि जैसे ही उन की मृत्यु हुई, पता नहीं कैसे वे दोनों आननफानन उन के पास पहुंच गए. उन दोनों ने आते ही सभी परिचितों को उन के निधन के बारे में सूचित किया और बड़े विधिविधान से सारे क्रियाकलाप संपूर्ण किए. तेरहवीं को अच्छेखासे भोज का आयोजन किया गया और पंडितों को जीभर कर दानदक्षिणा दी गई. उन का यह ढकोसला देख कर मेरा मन वितृष्णा से भर उठा, क्योंकि उस परिचित का अकेलापन मैं ने बहुत करीब से देखा था.

काश, यह आयोजन उन के कभी जन्मदिन को मनाने के लिए किया जाता और पंडितों के स्थान पर गरीब लोगों को दान दिया जाता तो बेटों को पिता का कितना आशीर्वाद मिलता और वे कितने खुश होते.

लेकिन उन को पिता के आशीर्वाद से अधिक उन की अर्जित धनसंपत्ति प्यारी थी. इसलिए तो यह सब आडंबर रचा गया कि समाज की दृष्टि में भी वे उस के हकदार माने जाएं, क्योंकि हमारा समाज भी इन आडंबरों का ही पक्षधर है.      

सुधा कसेरा

*

मारवाड़ी समाज में बछवारस नाम की एक पूजा होती है. यह बेटा होने के बाद की जाती है. उस पूजा में मोठ, चना, दही, दूब और कांटे का टुकड़ा ले कर पूजा करते हैं, फिर इसे खा लेते हैं. एक बार मेरी ननद अपनी सास के साथ यह पूजा करने बैठी. सास ने जब पूजा के बाद यह खाया तो कांटा गले में अटक गया. काफी पानी पिलाने पर भी अंदर नहीं गया. बाद में गले में उंगली डाल कर उन्हें उलटी कराई गई. तब जा कर कांटा बाहर निकला. और उन की जान बची.  

ट्रोलिंग की मार

सोशल मीडिया ने भले ही अभिनेता और अभिनेत्रियों को फैंस के साथ सीधे कनैक्ट कर दिया हो लेकिन अभिनेत्रियों के लिए सोशल प्लेटफौर्म काफी दिक्कत पैदा कर रहे हैं. जब भी कोई अभिनेत्री अपने ट्विटर, इंस्टाग्राम या पर्सनल प्रोफाइल पर कोई तसवीर डालती है तो अचानक से उन की ट्रोलिंग शुरू हो जाती है. उन के लुक, कपड़ों के साइज और फोटो खिंचवाने के तरीकों पर जम कर आलोचना किए जाने के साथ गालीगलौज तक की जाती है.

अभी कुछ दिनों पहले ‘दंगल’ फेम ऐक्ट्रैस फातिमा सना शेख ने एक तसवीर पोस्ट की थी जिस में वे स्विमिंग सूट में हैं. लोगों ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया. कोई रमजान के नाम पर भावनाओं को आहत होने की शिकायत कर रहा था, कोई उन के बोल्ड लुक से परेशान था. ठीक इसी तरह दीपिका पादुकोण को भी उन की छोटी ड्रैस के लिए घेरा गया. सनी लिओनी से ले कर रवीना टंडन और आलिया भट्ट से ले कर श्रद्धा कपूर तक सभी ट्रोलर्स से परेशान हैं. हर कोई समाज, संस्कृति और धर्म का झंडा उठा कर कलाकारों को गालियां देने में जुटा है. 

अंतरिक्ष यात्री बनेंगे आमिर

बौलीवुड के मिस्टर परफैक्शनिस्ट कलाकार आमिर खान अपनी हर आने वाली फिल्म के साथ कुछ नया करते हैं. फिल्म ‘दंगल’ के बाद इन दिनों वे अमिताभ बच्चन के साथ आने वाली पहली फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदुस्तान’ की शूटिंग में भले ही व्यस्त हों लेकिन उन की एक और फिल्म का ऐलान हो गया है  आमिर खान जल्द ही भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा पर बनने वाली बायोपिक में नजर आएंगे. रही बात फिल्म के नाम की, तो फिलहाल इस फिल्म का टाइटल ‘सैल्यूट’ रखा गया है जो बाद में बदला भी जा सकता है. सिद्धार्थ राय कपूर और रोनी स्क्रूवाला के साथ ही हमेशा की तरह आमिर खान इस फिल्म के कोप्रोड्यूसर भी होंगे. ऐसे में फिल्म ‘सैल्यूट’ से उम्मीदें बढ़नी लाजिमी हैं. फिल्म का निर्देशन महेश मिथाई करेंगे जो कई बड़ी और हौलीवुड फिल्मों के हिस्सा रह चुके हैं.

मैं वह स्त्री हूं

मैं वह स्त्री हूं जो सदियों से

कारागृह में सहमी, मृतप्राय रही

जहां पगपग कांटे बिछे मिले

क्यों उसी मिट्टी में आदिकाल से

पनप रही हूं मैं

सभ्य समाज भी किस काम का

जहां पलपल अपमानित हुई हूं मैं

आज वेदना के तीर छूटे म्यान से

आखिर क्यों इतने वर्षों के उपरांत भी

यह पक्षपात मौन साधे

देख रही हूं मैं

समय का चक्र घूमा फिर भी

रीतिरिवाजों के तपोवन में

अपने आत्मसम्मान की

प्रतिक्षण आहुति दे रही हूं मैं

क्यों इस चिंता की चिता की

लपटों में दहक रही हूं मैं?

क्यों वर्षों से तिरस्कार की सहभागिनी

बन रही हूं मैं?

अनगिनत बार असहनीय यंत्रणा के

शूल बिंध गए अंतर्मन को

अब भी पीढ़ीदरपीढ़ी

किस उम्मीद के साथ जी रही हूं मैं

आखिर क्यों यह यातना

सह रही हूं मैं?

– अनुभूति गुप्ता

मेरे जाने के बाद

मेरे जाने के बाद क्या हुआ होगा

उस ने मुड़मुड़ के उस राह को देखा होगा

जो न कह पाया जमाने के डर से

शायद अकेले में खुद को सुनाया होगा

मेरे जाने के बाद क्या हुआ होगा

मेरे सूने घर का फेरा भी लगाया होगा

मेरे मिलने की उम्मीद से

कुछ वक्त बिताया होगा

मेरे जाने के बाद वो शख्स वहां आया होगा

कैसे कह दूं तुझ से ऐ दोस्त

रहता नहीं मैं वहां

मेरे जाने के बाद क्या हुआ होगा

उस दरोदीवार पर लिखी है

मेरे इंतजार की बात

कैसे नए लोगों ने उस को मिटाया होगा

मेरे जाने के बाद वो शख्स यहां आया होगा

जाने कैसे उस ने मुझे भुलाया होगा

मेरे जाने के बाद…

– अंकुर कौशल

समाज की महंगी जरूरत हैं प्राइवेट स्कूल

शिक्षा के जरिए ही समाज में हर तरह का बदलाव आ सकता है. अंधविश्वास, रूढि़वादिता, भेदभाव, छुआछूत वहीं सब से ज्यादा है जहां शिक्षा का अभाव है. अपने हक और अधिकार के लिए जरूरी है कि आप शिक्षित हों. सरकारी स्कूलों का ढांचा इतना अच्छा नहीं है कि वे समाज के हर जरूरतमंद को शिक्षा दे सकें. कुछ वर्षों पहले तक की बात करें तो सरकारी स्कूलों में अंगरेजी की शिक्षा कक्षा 6 से दी जाती थी. जबकि मिशनरी स्कूलों में कक्षा 1 से ही अंगरेजी की पढ़ाई शुरू हो जाती थी.

मिशनरी स्कूलों की तादाद इतनी नहीं थी कि वे हर बच्चे को स्कूलों में दाखिला दे सकें. समाज के बडे़ और अमीर लोगों के लिए बड़ेबड़े शहरों में स्कूल खुले थे. उत्तराखंड का देहरादून शिक्षा के लिए पूरे देश में मशहूर था. वहां से पब्लिक स्कूल चलन में आए. धीरेधीरे पब्लिक स्कूलों का चलन पूरे देश में शुरू हो गया. पब्लिक स्कूलों के चलन में आने का सब से बड़ा कारण यह था कि सरकारी स्कूल समाज की जरूरत के हिसाब से बेहतर शिक्षा व्यवस्था मुहैया कराने में असफल हो रहे थे. 1980 से पब्लिक स्कूलों की शुरुआत हर छोटेबडे़ शहर में शुरू हो गई. 10 वर्षों के अंदर यह जरूरत या कहें मजबूरी सी बन कर उभर आए.

यह सही बात है कि इसी दौर से शिक्षा का बाजारीकरण शुरू हो गया. शिक्षा के बाजारीकरण की भी अपनी जरूरत थी. स्कूलकालेज खोलने, वहां बेहतर सुविधाएं देने और शिक्षा के स्तर को बनाए रखने के लिए मजबूत अर्थतंत्र की जरूरत होती है. इस के लिए सारा बोझ स्कूली बच्चों और उन के अभिभावकों पर पड़ने लगा. सरकारी स्कूलों और प्राइवेट स्कूलों की फीस में लंबाचौड़ा अंतर हो गया. फीस के अंतर के बावजूद अभिभावकों ने सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों को तरजीह दी.  सरकारी स्कूलों का बनाबनाया ढांचा प्राइवेट स्कूलों के आगे बिखरने लगा. साल 1990 के आतेआते शिक्षा में प्राइवेट स्कूलों का महत्त्व और प्रभाव तेजी से बढ़ गया. अब शिक्षा व्यवस्था की कल्पना बिना प्राइवेट स्कूलों के नहीं की जा सकती.

प्राइवेट स्कूलों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सरकारी तंत्र ने उस में दखल देना शुरू कर दिया. मिशनरी स्कूलों में सरकारी तंत्र का हस्तक्षेप पहले बहुत कम होता था. वहां भी सरकारी तंत्र का प्रभाव बढ़ने लगा. स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्तियों से ले कर परीक्षा के तौरतरीकों, छुट्टियों व नियमकानून का पालन करने जैसे कई रोड़े खड़े कर दिए गए. पब्लिक स्कूलों को तो सरकारी तंत्र ने दुधारू गाय समझ लिया. पब्लिक स्कूलों पर सरकार का शिकंजा कुछ इस तरह कसने लगा कि वे फीस बढ़ाने पर मजबूर होने लगे. पब्लिक स्कूल चलाने वालों को उलझाने के काम शुरू हो गए.

बेहतर हैं प्राइवेट स्कूल

शिक्षा को समाजसुधार का सब से बड़ा माध्यम माना जाता है. पब्लिक स्कूल छोटे हों या बडे़, इस जरूरत को पूरा करते हैं. राज्यों के शिक्षा विभाग से परेशान पब्लिक स्कूलों ने धीरेधीरे स्टेट एजुकेशन बोर्ड से खुद को अलग करना शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में हालत यह हो गई कि ज्यादा से ज्यादा पब्लिक स्कूल अपने राज्य के स्टेट बोर्ड को छोड़ कर सीबीएसई यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकंडरी एजुकेशन से जुड़ गए. पब्लिक स्कूलों की मेहनत का नतीजा था कि सीबीएसई की साख अभिभावकों के बीच में बढ़ती गई. अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्टेट बोर्ड वाले स्कूलों से निकाल कर सीबीएसई के स्कूलों में शिक्षा के लिए भेजने लगे. जहां स्टेट बोर्ड स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने लगी, वहीं सीबीएसई से जुड़े स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ने लगी. पूरे देश में राज्य स्तरीय बोर्ड वाले स्कूलों को देखें तो वहां की हालत दयनीय होती जा रही है.

हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था बहुत विशाल है. केंद्र और राज्य सरकारें मिल कर इन चुनौतियों से निबटने का काम करती हैं. इस के चलते पूरे देश में कई तरह की अलगअलग शिक्षा व्यवस्था काम करती है. जो अपनेआप में समान शिक्षा अधिकार की राह में सब से बड़ी चुनौती है. देश के माध्यमिक स्कूलों में करीब 5 करोड़ छात्र पढ़ते हैं. इन में से 2 करोड़ कक्षा 9 से 12 के बीच पढ़ते है. शेष 3 करोड़ कक्षा 6 से 8 के बीच पढ़ते हैं.  राज्य स्तरीय बोर्ड से लोगों का मोहभंग हो रहा है. शहरों में राज्य स्तरीय शिक्षा बोर्ड के स्कूलों की हालत खराब है. वहां पर छात्रों की संख्या में लगातार गिरावट आती जा रही है.

पब्लिक स्कूलों और राज्य स्तरीय शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाई की हालत को देखने के लिए बिहार के हालत को देखें तो काफी कुछ तसवीर समझ आती दिखेगी. बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं के नतीजे काफी कुछ कहते हैं. यहां पर कुल 34 प्रतिशत छात्र ही पास हो सके. जबकि पिछले साल यह 62 प्रतिशत था. उस साल बिहार में नकल को ले कर बहुत बदनामी हुई थी. बिहार में फर्जी तरीके से टौप करने वाली लड़की को जेल तक जाना पड़ा था. 2015 में यह प्रतिशत 87 था. बिहार में लगातार एक ही पार्टी की सरकार है. ऐसे में इस तरह के हालात बताते हैं कि शिक्षा के साथ किस तरह से खेल हो रहा है. 2016-17 की परीक्षा में बिहार में 13 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी. इन में से 8 लाख से ज्यादा फेल हो गए.

छात्र नहीं, शिक्षक जिम्मेदार

बिहार की ही तरह पंजाब और उत्तर प्रदेश के हालात भी हैं. वहां पर भी राज्य स्तरीय शिक्षा बोर्ड के स्कूलों का बुरा हाल है. वहां पर पढ़ाई की गुणवत्ता  खराब है. नकल का बोलबाला है. उत्तर प्रदेश में प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षामित्रों में से 60 फीसदी शिक्षामित्र टीचिंग की परीक्षा टीईटी पास नहीं कर पाए हैं. इस वजह से वे बिना टीईटी परीक्षा पास हुए शिक्षक के रूप में समायोजन की लड़ाई लड़ रहे हैं. कई बार इन शिक्षकों के सामान्य ज्ञान का टैस्ट लिया गया तो वे फेल हो गए. गणित, अंगरेजी के विषय पढ़ाने वाले अपने विषयों के बारे में पूछे गए सवालों का सही जवाब देने में असफल रहे. 10 सालों में सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की सुविधाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इस के बाद भी शिक्षा की व्यवस्था खराब होती जा रही है. इस से साफ लगता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था समाज की जरूरतोंपर खरी नहीं उतर रही है. एक तरफ खराब गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूल हैं तो दूसरी ओर पब्लिक स्कूल अपने में लगातार सुधार करते जा रहे हैं. स्मार्ट क्लास से ले कर अच्छे हवादार कमरे वाले स्कूल, बैठने के लिए फर्नीचर, स्कूल में पूरी पढ़ाई, घर से स्कूल आनेजाने के लिए वाहन सुविधा, स्कूल में केयर करने वाले टीचर और बेहतर परीक्षा प्रणाली पब्लिक  स्कूलों में उपलब्ध है. यह सच है कि ये सुविधाएं स्कूल का मैनेजमैंट फीस के जरिए ही मुहैया करता है. अभिभावक इस तरह की सुविधाएं देख कर ही अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजते हैं. ऐसे में मंहगी फीस की बात करनी बेमानी हो जाती है. कुछ अभिभावक महंगी फीस को ले कर सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि पब्लिक स्कूल फीस कम कर दें.

शिक्षा की चुनौतियां

देश की शिक्षा व्यवस्था अलगअलग तरह की है. जरूरत इस बात की है कि देश में समान शिक्षा व्यवस्था लागू हो. अभिभावक सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहते हैं. ऐसे में जरूरत है कि पब्लिक  स्कूलों में शिक्षा सस्ती हो. सरकार अगर शिक्षा विभाग की रिश्वतखोरी को बंद कर दे, स्कूल प्रबंधन को जमीन खरीदने से ले कर स्कूल बनाने तक सरकारी विभागों के चक्कर न काटने पडे़ं और रिश्वतखोरी से लड़ना न पडे़ तो शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक सस्ती हो सकती है.

स्कूल को चलाने के लिए आर्थिक जरूरत होती है. स्कूलमालिक इन जरूरतों को पूरा करने के लिए फीस पर ही निर्भर करता है. जिस तरह से स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही है उस से किसी भी स्कूल को पर्याप्त संख्या में बच्चे नहीं मिल पाते हैं. स्कूली शिक्षा में गुणवत्तापरक शिक्षा का न मिलना सब से बड़ी परेशानी है. देशभर के स्कूलों को देखें तो मोटेतौर पर 3 तरह के स्कूल हैं. सरकारी स्कूल, सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूल और प्राइवेट स्कूल, ये ही शिक्षा व्यवस्था को संभालते हैं. 15 साल पहले तक सब से अधिक बच्चे सरकारी स्कूलों में, उस के बाद सहायता प्राप्त सरकारी स्कूलों में और सब से कम बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जाते थे. अब यह संख्या उलट गई है. सब से अधिक बच्चे पब्लिक स्कूलों में हैं. सब से कम बच्चे सरकारी स्कूलों में हैं. सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या को बढ़ाने के लिए सरकार ने मिडडे मील से ले कर दूसरी तमाम तरह की सुविधाएं देनी शुरू की हैं. इस के बाद भी यह संख्या कम होती जा रही है.

सरकारी स्कूलों का पुराना ढर्रा

स्कूलों में शिक्षा को सुधारने के लिए बड़े वित्तीय निवेश की जरूरत होती है. यह केवल सरकार के वश की बात नहीं है. स्कूलों में बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सरकारी स्कूल असफल हो गए हैं. सरकारी स्कूलों में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था नहीं है. पब्लिक स्कूल अपने पाठ्यक्रम में सूचना प्रौद्योगिकी को शामिल कर चुके हैं. पब्लिक स्कूलों में टीचरों और छात्रों को कंप्यूटर, लैपटौप और टैबेलेट जैसी सुविधाएं मिलने लगी हैं. सरकारी स्कूल इस बदलाव से बहुत दूर हैं. पब्लिक स्कूलों को अपने साथ के स्कूलों से मुकाबला करना होता है, इसलिए वे अपने को बेहतर बनाने का काम करते हैं. जिस का लाभ पढ़ने वाले बच्चों को मिलता है. सरकारी स्कूलों की आपस में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, जिस की वजह से वे किसी भी तरह के बदलाव को करने में पीछे रहते हैं. नकल की सब से बड़ी परेशानी सरकारी स्कूलों में ही देखने को मिलती है. पब्लिक स्कूलों में नकल की परेशानी कभी सुनने को नहीं मिलती. सरकारी स्कूलों में सामूहिक नकल इसलिए होती है क्योंकि शिक्षक सालभर बच्चों को पढ़ाते नहीं. कई स्कूल केवल नकल करा कर ही बच्चों को ज्यादा से ज्यादा नंबर दिलाने का काम करते हैं. सो, शिक्षा में बडे़ बदलाव की जरूरत है.

सरकारी लालफीताशाही के चलते सरकारी स्कूल खुद को बदलने को तैयार नहीं हैं. शिक्षक खराब व्यवस्था की जिम्मेदारी पेरैंटस पर डालते हैं तो अभिभावक टीचर और सरकारी अमले पर. अभिभावक अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पब्लिक स्कूलों की तरफ जाते हैं जहां उन को बेहतर शिक्षा की उम्मीद दिखती है. जरूरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक व समुचित बदलाव किए जाएं ताकि सभी को गुणवत्तापरक शिक्षा मिल सके.

    

शिक्षा व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग प्राइवेट स्कूल

समाज में प्राइवेट स्कूलों ने शिक्षा के साथ ही साथ बच्चों की सेहत, सुरक्षा और साफसफाई की तरफ भी पूरा ध्यान दिया है. आज ज्यादातर अभिभावक प्राइवेट स्कूलों से खुश हैं. स्कूलों के नियमित संपर्क में रहते हैं. हम बच्चों के सर्वागीण विकास की तरफ ध्यान देते हैं. स्कूल टीचर भी बच्चों के साथ पढ़ाई पर ही पूरा ध्यान देते हैं. बिना प्राइवेट स्कूलों के पूरे समाज को शिक्षा नहीं दी जा सकती. क्योंकि सरकारी स्कूलों की तादाद कम है. 

– शर्मिला सिंह, प्रिंसिपल, पायनियर मौंटेसरी इंटर कालेज, लखनऊ

 

शिक्षा के लिए बेहतर माहौल का होना जरूरी होता है. प्राइवेट स्कूल शिक्षा व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग हैं. अभिभावक भी इन से खुश हैं. इस वजह से ही वह यहां अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. अब ज्यादातर प्राइवेट स्कूल बच्चों की सुविधाओं का ध्यान रखते हुए काम कर रहे हैं. ऐसे स्कूल ही आगे बढ़ रहे हैं जो बच्चों की हर सुविधा के साथ पढ़ाई का पूरा ध्यान रखते हैं. प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही होती है. हम बच्चों की जरूरत के हिसाब से शिक्षा और दूसरी गतिविधियों में उन को आगे बढ़ाते हैं.

– पवन सिंह चौहान, डायरैक्टर, एसआर ग्रुप औफ एजुकेशन, लखनऊ

पश्चिम बनाम भारतीय शिक्षा प्रणाली

पूर्वी शिक्षा प्रणाली बेहतर है या पश्चिमी शिक्षा प्रणाली, यह एक सतत प्रश्न है. मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकती हूं कि शिक्षा का सार पश्चिम में पूर्व से बिलकुल अलग और व्यावहारिक है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो 7 साल सिंगापुर में बिताने और अच्छी तरह से व्यवस्थित होने के बाद मैं सिर्फ अपने बच्चों की शिक्षा की वजह से आस्ट्रेलिया जाने को विवश न होती. आज एक दशक के बाद जब पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मुझे अपने निर्णय पर पूर्णसंतुष्टि महसूस होती है.

पश्चिमी शिक्षा प्रणाली अच्छे नागरिक बनाने के लिए डिजाइन की गई है जबकि पूर्वी शिक्षा प्रणाली खासतौर से हमारी भारतीय प्रणाली भ्रष्ट और कूपमंडूक बनाने के लिए. मैं इस बात को इतने विश्वास के साथ इसलिए कह रही हूं क्योंकि मैं ने दोनों प्रणालियों को अनुभव किया है. निम्न कुछ बिंदुओं का अध्ययन करने से पूर्वी बनाम पश्चिमी शिक्षा प्रणाली की स्थिति का अंतर स्पष्ट हो जाएगा.

शिक्षा में व्यावहारिकता

कुछ दिनों पहले की ही बात है, मेरी बेटी मैडिकल ऐंट्रैंस एप्लीकेशन के लिए अपना पोर्टफोलियो तैयार कर रही थी. उस ने मुझ से कहा, ‘‘मम्मी, प्लीज मेरी पर्सनल स्टेटमैंट (जो कि पोर्टफोलियो का हिस्सा था) की पू्रफरीडिंग कर दीजिए.’’ मैं ने उसे पढ़ा और काफी देर तक सोचती रही कि ये सब चीजें कितनी दूर की सोच कर करवाई जाती हैं. असल में बेटी ने उस स्टेटमैंट में अपने द्वारा अब तक किए मानवतावादी, सामुदायिक, स्वयंसेवी कार्यों का विवरण रिफ्रैंसेस के साथ लिखा था और इस के लिए उसे एंट्रेंस एप्लीकेशन पर कुछ अतिरिक्त अंक मिलने थे.

अब आप यही सोचेंगे कि इन सब कार्यों का मैडिकल ऐंट्रैंस से क्या संबंध, उस के लिए तो बस जूलौजी और कैमिस्ट्री टैस्ट होने चाहिए? ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में नैतिक गुणों की कद्र की जाती है. और फिर डाक्टरी के प्रोफैशन में तो नैतिकता अत्यंत ही आवश्यक तत्त्व है. इसलिए इस प्रोफैशन में जाने के लिए केवल मार्कशीट पर लिखे या प्रतियोगिता में अकादमिक विषयों में लाए गए अंकों के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता.

हमारे भारत देश में नैतिकता की कमी की पराकाष्ठा अपने चरम पर है तभी तो अकादमिक विषयों में सर्वोच्च स्थान पाने वाले डाक्टर भी अपने मरीजों के शरीर से अंग चुराने में नहीं हिचकिचाते. जाहिर है ऐसे लोग केवल पैसा कमाने के उद्देश्य से इस प्रोफैशन में आते हैं. जनसेवा या जनहित के लिए नहीं.

व्यक्तित्व विकास और पब्लिक स्पीकिंग के कोर्सेज भी सिर्फ एशियंस के लिए ही चलते हैं. क्योंकि पश्चिमी देशों में पैदा होते ही एक बच्चे को नेशन असेट यानी राष्ट्रीय संपत्ति माना जाता है और उस के पालनपोषण, शिक्षादीक्षा में उस की वैयक्तिकता को सर्वप्रमुखता दी जाती है. दूसरी तरफ भारत में 40-50 वर्षीय पुत्र से भी उम्मीद की जाती है कि वह अपनी पत्नी को अगर कहीं बाहर ले कर जाए तो उस के लिए पहले अपने मातापिता से आज्ञा ले. अब ऐसी शिक्षा और ऐसे माहौल में व्यक्तित्व में निखार अर्जित करना तो माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के समान ही होता है. वहीं, कठिन परिस्थितियों में डिसीजन मेकिंग, प्रौब्लम सौल्विंग जैसे हुनर वेस्टर्नर्स के व्यक्तित्व का हिस्सा सहज ही बन जाते हैं. इन्हें अर्जित करने के लिए उन्हें हम भारतीयों की तरह ‘डेल कार्निज’ जैसे कोर्सेज में प्रवेश नहीं लेना पड़ता.

प्रोग्राम फौर इंटरनैशनल स्टूडैंट असेसमैंट यानी पीआईएसए के आंकड़े बताते हैं कि पूर्वी देश जैसे सिंगापुर और चीन के बच्चे स्कूल और पीआईएसए में उच्च स्कोर तो लाते हैं मगर व्यावहारिक जीवन की समस्याएं सुलझाने के संदर्भ में चीन के बच्चों का स्कोर, टैस्ट लेने वाले सभी देशों के बच्चों के औसत स्कोर की तुलना में 51 अंक कम है जबकि अमेरिका के बच्चों का 10 अंक अधिक है. शायद यही कारण है अमेरिका जैसे देशों की एयरलाइंस के पायलट्स का आपातकालीन हालात से जूझ कर सेफ लैंडिंग करने का सब से अच्छा रिकौर्ड है. कुछ एशियन एयरलाइंस जैसे अमीरात तथा सिंगापुर एयरलाइंस को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ एयरलाइंस होने का दरजा तो मिला हुआ है पर यह दरजा उन्हें यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं के आधार पर मिला है न कि आपातकालीन परिस्थितियों से बखूबी से निबटने के दृष्टिकोण की वजह से.

ईमानदार शिक्षक

गुरुब्रह्मा गुरुविष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:

गुरु:साक्षात् परम ब्रह्मा तस्मैं श्री गुरवे नम:

एक वक्त था कि हमारी भारतीय संस्कृति में शिक्षकों का स्थान सर्वोपरि था किंतु क्या उपरोक्त पंक्तियां आज के परिवेश में भी लागू होती हैं. नहीं, बिल्कुल नहीं. परंतु क्यों नहीं? क्यों हमारे समाज में शिक्षक अपना सम्मान गंवा चुके हैं? इसे समझने की कोशिश करते हैं. जब मेरे बच्चे कुछ बड़े हो गए तो मैं ने फिर से आगे पढ़ने का मन बनाया और यहां आस्ट्रेलिया में एक इंस्टिट्यूट में एक कोर्स में ऐडमिशन ले लिया. मैं ने पाया कि सबकुछ मनोबल बढ़ाने वाला था. अध्यापक हमारी समस्याओं को हल करने के लिए अपने लंचब्रैक का समय तक त्याग देते थे.

ऐसे में मुझे आगरा में अपनी स्कूलिंग और कालेज के दिन याद आ जाते जब वहां शिक्षक प्राइवेट ट्यूशन से पैसा कमाने में इतने व्यस्त थे कि कईकई दिनों तक स्कूल और कालेज की कक्षाओं में पढ़ाने तक न आते थे. अब ऐसे में गुरुब्रह्मा गुरुविष्णु: का दरजा तो अपनेआप ही खत्म हो जाना है. पश्चिमी देशों में खासतौर से 5 मुख्य अंगरेजीभाषी देशों (अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, इंगलैंड) में एक ही क्लास में एकसाथ कम से कम 10 से 15 देशों के, विविध भाषाएं बोलने वाले, बिलकुल भिन्न परिप्रेक्ष्य के बच्चे पढ़ते हैं. इन हालात में शिक्षक पूरी क्लास के बच्चों को किसी स्टैंडर्ड तरीके से पढ़ा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेते हैं. वे हर बच्चे को उस की जरूरत और क्षमता के हिसाब से ध्यान दे कर उस के व्यक्तित्व में निखार लाते हैं.

पश्चिम में एक छात्र की असफलता के लिए जितना उस छात्र को जिम्मेदार माना जाता है उतना ही दोष उस के शिक्षक और शिक्षण संस्थान का भी माना जाता है. जबकि, पूर्व में असफलता का सारा दोष छात्र के ऊपर डाल दिया जाता है. पश्चिम में क्लास गु्रप डिस्कशन को पहली प्राथमिकता दी जाती है और छात्रों को ज्यादा से ज्यादा प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया जाता है वहीं पूर्व में प्राइवेट ट्यूशन और एकल स्टडी का बोलबाला है.

हमारे देश में जब बात निबंध लेखन की आती है तो आजादी के बाद से आज तक वही घिसेपिटे विषय जैसे कि दहेज प्रथा, मेरा प्रिय मित्र, सदाचार, बेरोजगारी, दीवालीहोली’ चलते आ रहे हैं. छात्र इन विषयों को शब्दश: किताबों से रट कर परीक्षा में लिख कर पास हो जाते हैं. ऐसे हालात में रचनात्मकता को बढ़ावा मिलने की गुंजाइश ही कहां बचती है. पश्चिमी देशों में कवियों और लेखकों की जन्ममरण तिथियां रटना और उन की जीवनशैली परीक्षा में लिखने को नहीं दी जाती बल्कि उन की रचनाएं क्लास में पढ़ासमझा कर स्तरीय कविताएं, लेख लिखने का होमवर्क बच्चों को दिया जाता है ताकि आगामी पीढि़यों में भी शेक्सपियर, डब्लू बी यीट्स जैसे साहित्यकार और कवि समाज को मिलते रहें.

शिक्षा पर समानाधिकार

विश्वविद्यालयों में हर उम्र के लोग शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते हैं. ज्ञान प्राप्त करना उम्र की सीमा में नहीं बांधा जाता और लर्निंग को सहजता के साथ लाइफटाइम जर्नी माना जाता है. विश्वविद्यालयों की कक्षा में फिर शिक्षा के लिए आए अधेड़ छात्रों का नई पीढ़ी के छात्र और शिक्षक मजाक नहीं बनाते बल्कि अधिक सम्मान व सहयोग देते हैं. मुझे याद आती है एक घटना जब अब से 25 साल पहले मैं आगरा विश्वविद्यालय में बीएससी तृतीय वर्ष में पढ़ रही थी, तभी एक ऐसी छात्रा ने हमारे साथ तृतीय वर्ष में प्रवेश लिया जिन्होंने द्विवर्षीय बीएससी डिगरी कुछ साल पहले पास की थी तथा अब उन की एमएससी करने की इच्छा थी. मगर क्योंकि तभी बीएससी, द्विवर्षीय कोर्स से त्रिवर्षीय में बदल चुका था, इसलिए उन्हें एमएससी करने के पहले बीएससी तृतीय वर्ष ब्रिज कोर्स के नाम से करना पड़ रहा था.

उन की उम्र हम से मात्र 3 साल ही अधिक थी. मगर इस के लिए क्लास में वे एलियन की तरह ट्रीट की जाती थीं. हदें तो तब पार होती थीं जब सब पीठ पीछे उन के लिए ‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ जैसे अपमानजनक शब्द प्रयोग करते थे. अब सोचने की बात है कि क्या एक उम्र के बाद विश्वविद्यालय जा कर पढ़ाई करना कोई जुर्म है?

राष्ट्र की संपत्ति युवा

दूसरे को आहत करना हम भारतीय अपना जन्मसिद्घ अधिकार मानते हैं. डाक्टरी और इंजीनियरिंग में प्रवेश न मिलने पर अभिभावक बच्चों को ऐसा महसूस कराते हैं कि आगे वे हाई पेड प्रोफैशन में नहीं जा पाते हैं तो उन का इस दुनिया में जीना पूरी तरह निरर्थक है और वे इस धरती पर एक बोझ मात्र हैं.वहीं, पश्चिमी देशों के अभिभावक असफलता का सामना होने पर बच्चे से कहते हैं, ‘इट इज नौट एंड औफ द वर्ल्ड.’ हर बच्चे की अपनी खूबी होती है और पश्चिमी शिक्षा प्रणाली उन को उभार कर बच्चे के व्यक्तित्व को तराशने के सिद्घांत पर आ धारित है. यही कारण है एशियन शिक्षा प्रणाली किताबी कीड़ों को जन्म देती है जबकि पश्चिमी शिक्षा प्रणाली रचनात्मक, सृजनशील वैज्ञानिक, खिलाडि़यों, लेखकों आदि को.

पश्चिम में छोटे बच्चों के क्लासरूम पारिवारिक माहौल देने के लिए डिजाइन किए जाते हैं. बहुत छोटे बच्चों के क्लासरूम में हर बच्चे की एक फैमिली फोटो मंगा कर रखी जाती है. बच्चों को कक्षा के दौरान भी फिंगर फूड और फल खाने की अनुमति होती है. ऐसी चीजें खाने के लिए उन्हें लंचब्रैक तक इंतजार करने की जरूरत नहीं होती.भारतीय शिक्षक और अभिभावक कुशल, बुद्घिमान बच्चों की सराहना करते हैं और उन्हें ही प्रगति के अधिक साधन उपलब्ध कराते हैं जबकि जीवन की वास्तविकता यह है कि मुरझाते, पीले पड़ते हुए पौधों को अधिक देखभाल की आवश्यक ता होती है.

कमजोर छात्रों पर ठीक से ध्यान देने के बजाय ‘बुद्घिहीन हैं ये तो, इन के भेजे में कुछ नहीं घुस सकता’ कह कर उस के आत्मविश्वास को खंडखंड कर दिया जाता है. वे जो कुछ अच्छा कर सकते हैं उसे भी करने की क्षमता खो बैठते हैं. गुरु व मातापिता के सम्मान को ले कर बड़ेबड़े प्रवचन दिए जाते हैं, शास्त्रों का हवाला दिया जाता है परंतु एक बच्चे के मनोविज्ञान तथा भावनाओं को समझने की कुछ खास आवश्यकता नहीं समझी जाती. ‘ये आईएएस बन जाएं तो हम समझेंगे कि हम ने जीवन में सबकुछ पा लिया’ कहने वाले मातापिता यह कभी नहीं समझना चाहते कि उन का बच्चा जीवन से क्या पाना चाहता है, या उस के क्या अरमान हैं? कला, संगीत, लेखन के प्रति झुकाव रखना वक्त की बरबादी माना जाता है जबकि पश्चिमी सभ्यता में इन सब कलाओं में प्रवीण होना गौरव की बात है. साथ ही, स्वस्थ मानसिक विकास के लिए इन्हें आवश्यक भी माना जाता है.

भारत में परीक्षाफल निकलने के बाद असफल छात्रों के घर से भाग जाने और आत्महत्या करने की घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं. जिंदगी से भागना सिखा कर और बच्चों को अपनी इच्छाओं का गुलाम बना कर हम देश को एक स्वस्थ मानसिकता का नागरिक कैसे दे सकते हैं? अभिभावकों, शिक्षकों और पूरे समाज को यह समझने की बहुत ही जरूरत है कि हम अपने बच्चों को सफलता और असफलता दोनों को सहज भाव से अपनाने के लिए प्रशिक्षित करें क्योंकि ये दोनों ही जीवनरूपी सिक्के के दो पहलू ही हैं.

व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली

कुछ सालों पहले जब मैं यहां आस्टे्रलिया में अकाउंटिंग की पढ़ाई कर रही थी तो मेरी पढ़ाई केवल अकाउंटिंग तक ही सीमित नहीं थी. इस कोर्स में एक यूनिट व्यावहारिक वर्कप्लेस ट्रेनिंग भी शामिल थी. इस यूनिट में हमें वर्कप्लेस पर काम में आने वाले सभी उपकरणों के प्रयोग के और लिखित व वर्बल कम्युनिकेशन के प्रभावी तरीके भी सिखाए गए.

इसी तरह से यहां बाल काटने की ट्रेनिंग में केवल कैंचीकंघे का प्रयोग करना नहीं सिखाया जाता, बल्कि बालों और सिर की त्वचा की संरचना के बारे में भी पढ़ाया जाता है ताकि हर व्यक्ति को उस की खास जरूरत के हिसाब से सेवा प्रदान की जा सके.

रोजगार और भेदभाव

पश्चिम में हर काम में व्यावसायिकता है. हेयर ड्रैसिंग, कारपैंटरी, प्लंबिंग सभी के लिए अच्छे संस्थानों द्वारा बाकायदा प्रोफैशनल ट्रेनिंग उपलब्ध है. इसीलिए ऐसे काम करने वालों का शोषण भी नहीं है, साथ ही, हर व्यक्ति को अपनी पसंद का रोजगार करने का अवसर मिलता है. हर काम का सम्मान है, काम के आधार पर कोई छोटाबड़ा भी नहीं होता.

बहरहाल, फर्क जगजाहिर है कि वेस्टर्नर नएनए आविष्कार करते हैं, दूसरे के बनाए सिद्घांतों  व फार्मूलों को रटने में उम्र नहीं बिताते.समाज को हर व्यवसाय के लोगों की आवश्यकता पड़ती है और जब तक हर व्यवसाय में संलग्न नागरिकों का बराबर सम्मान नहीं होगा तब तक हम विकसित सभ्य समाज के मापदंडों पर खरे नहीं उतर सकते. हर काम को बराबर बनाने के लिए  उस में व्यावसायिकता लानी होगी, इस के लिए न सिर्फ लोगों के माइंडसैट को बदलने की आवश्यकता है बल्कि शिक्षा प्रणाली को व्यावहारिक व तार्किक बना कर छात्रों की क्रिएटिविटी को तराशने में मददगार बनानी होगी.

नैतिकता पर भारी नकल

7 मई को देशभर में आयोजित नैशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रैंस टैस्ट यानी नीट की परीक्षा इसलिए सुर्खियों में रही थी कि इस में नकल रोकने के लिए निरीक्षक बेहद सख्ती से पेश आए थे. लग ऐसा रहा था मानो परीक्षार्थी आतंकवादी हों जो अपने शरीर में नकल के बजाय गोलाबारूद छिपा कर लाए हैं. तमाम परीक्षा केंद्रों पर छात्रों की बारीकी से तलाशी ली गई थी. छात्रों के जूतेमोजे उतरवाए गए थे, जो छात्र पूरी बांहों की टीशर्ट पहन कर आए थे उन्हें फाड़ दिया गया, यहां तक कि और उन की बैल्ट्स व चैन्स तक उतरवा ली गई थीं.

सब से ज्यादा दिक्कत छात्राओं को हुई जिन की कान की बालियां और नाक की लौंग तक उतरवाई गईं, मेहंदी लगा कर आई छात्राओं की मेहंदी तक हटा दी गई. उन के घने बालों को भी शक की नजर से देखा गया. प्रतिबंध न होने के बाद भी कई शादीशुदा छात्राओं के मंगलसूत्र तक उतरवा लिए गए. दुपट्टा तो नीट की परीक्षा के ड्रैसकोड के तहत बाहर रखवाया ही गया, छात्राओं के हाथों और गले में बंधे धागे तक काट दिए गए.

इस कड़ाई पर हर जगह छात्रों ने एतराज जताया. केरल के कन्नूर के एक केंद्र पर तो हंगामे की सी स्थिति उत्पन्न हो गई जब एक छात्रा ने उस के अंडरगार्मेंट्स उतरवाने का आरोप लगाया. एक और छात्रा को तब तक परीक्षाहाल में नहीं जाने दिया गया जब तक उस ने अपनी जींस की पैंट का मैटल बटन निकाल कर निरीक्षकों को नहीं दे दिया.

अंडरगार्मेंट्स का सच

परीक्षाएं प्रतियोगी हों या स्कूली, अंडरगार्मेंट्स अब नकल का बड़ा जरिया बनते जा रहे हैं क्योंकि इन की तलाशी लेने में निरीक्षक हिचकते हैं. बात जब लड़कियों की हो तो मामला और भी संजीदा हो उठता है. लेकिन यह सच है कि लड़कियां अंडरगार्मेंट्स पर सवालों के जवाब लिख कर ले जाती हैं. नवंबर-दिसंबर 2016 में इस आशय की एक पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी जिस में दिखाया गया था कि एक लड़़की अपनी कुरती पर लिखे जवाबों को पलटपलट कर देख रही है. दरअसल, तलाशी के दौरान अंडरगार्मेंट्स आमतौर पर उतरवाए नहीं जाते, जिस का फायदा लड़कियां जम कर उठाती हैं.

भोपाल के नूतन कालेज की एक प्राध्यापक की मानें तो लड़कियां ब्रापैंटी पर जवाब लिख कर लाती हैं और फिर बाथरूम में जा कर उन्हें उतार कर पढ़ लेती हैं. चूंकि आजकल की परीक्षाओं में बाथरूम जाने के लिए केवल 5 मिनट ही मिलते हैं, इसलिए कई बार हड़बड़ाहट में वे अंडरगार्मेंट्स टौयलेट में ही छोड़ देती हैं. ऐसे में परीक्षा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अंडरगार्मेंट्स की तलाशी ली जानी एतराज की बात नहीं. पर दिक्कत यह है कि हरेक परीक्षा में हरेक लड़की की तलाशी इस तरह ले पाना मुमकिन नहीं. दूसरे, हंगामा खड़े होने कीआशंका भी मुंहबाए खड़ी रहती है. आजकल लड़कियां अंडरगार्मेंट्स और सलवार सूट सहित साड़ी में नकल की परची चिपका कर ले जाती हैं. ऐसे में बगैर सख्ती किए उन्हें पकड़ पाना आसान नहीं है.

तकनीक का दुरुपयोग

‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’  फिल्म में तो अभिनेता संजय दत्त को मोबाइल के जरिए नकल करते दिखाया गया था लेकिन अब परीक्षा में मोबाइल फोन प्रतिबंधित है तो ‘तू डालडाल मैं पातपात’ की तर्ज पर छात्र तकनीक के दूसरे तरीके अपनाने लगे हैं.

मैजिक पैन की खूबी अब किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही है जिस की खासियत यह होती है कि उस का लिखा हुआ तभी दिखता है जब उस पर अल्ट्रावायलेट किरणें फेंकी जाएं. नकलची छात्र अपने प्रवेशपत्र, कंपास बौक्स और क्लिपबोर्ड तक पर उत्तर लिख कर ले जाते हैं और मौका देखते ही इसी पैन के ऊपर लगे एक बल्ब की मदद से उसे उत्तरपुस्तिका पर लिख डालते हैं. इस बल्ब से अल्ट्रावायलेट किरणें निकलती हैं. ब्लूटूथ एक छोटी सी डिवाइस है, जिस का बेजा इस्तेमाल नकल करने में खूब होता है. यह डिवाइस लौकेट, घड़ी वगैरा में आसानी से छिपा कर ले जाई जा सकती है. इसलिए छात्रछात्राओं की बैल्ट, कंगन, चूड़ी, चैन आदि उतरवाए जाने लगे हैं.

बाजार में धड़ल्ले से मिलने वाली खास तरह की घडि़यां नकलचियों के लिए वरदान सरीखा साबित हो रही हैं जिन में खासी तादाद में डाटा भरा जा सकता है. इस घड़ी को एक खास तरीके से हिलानेडुलाने पर उस में भरा डाटा आसानी से दिखने लगता है, जिसे निरीक्षक नहीं भांप पाते. जब इन घडि़यों के जरिए नकल की शिकायतें आम हो गईं और पकड़ी भी जाने लगीं तो तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं में घड़ी भी उतरवाई जाने लगी. नकल पकड़ पाना कभी आसान नहीं रहा है. परीक्षाओं में नई टैक्नोलौजी का बेजा इस्तेमाल परीक्षाओं में किया जाता है. ऐसे में सख्ती जरूरी है पर इस के बाद भी नकल नहीं रुकती तो इस की एक अहम वजह नकल की पनपती प्रवृत्ति है जो नैतिकता पर भारी पड़ती है.

शौर्टकट की मानसिकता

इस में शक नहीं कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में कामयाब होना अब आसान नहीं रह गया है. कामयाबी सिर्फ मेहनत की मुहताज होती है पर नकल कर कुछ बन जाने का सपना देखने वाले छात्र निश्चितरूप से मेहनती छात्रों का हक मारने का अपराध करते हैं. इस के लिए किसी भी नजरिए से वे छूट या माफी के हकदार नहीं माने जा सकते. ये वे छात्र हैं जो मेहनत की अहमियत नहीं समझते और काबिल तो कहीं से नहीं होते. जितनी खुराफात ये नकल करने में दिखाते हैं अगर उस का 10वां हिस्सा भी मेहनत में लगाएं तो ईमानदारी से कामयाब हो सकते हैं. यही वे छात्र हैं जो सख्त जांच और तलाशी पर कड़ा एतराज जताते हैं.

नकल की बढ़ती प्रवृत्ति दरअसल यह बताती है कि केवल समाज से ही नहीं, बल्कि परिवारों से भी नैतिकता का हृस हो रहा है. हर कोई कम मेहनत या मुफ्त में काफीकुछ हासिल करने की जुगाड़ में लगा हुआ है. नकलची छात्रों के कारण पढ़ाकू और प्रतिभाशाली छात्र पिछड़ते हैं तो हताशा और अवसाद का माहौल बनना स्वाभाविक बात है.

चिंता की एक बात अब अभिभावकों की भूमिका है जो गलत और अनुचित कामों के बाबत बच्चों को रोकना तो दूर की बात है, उलटे उन्हें प्रोत्साहित करने लगे हैं. भोपाल के एक नामी स्कूल की एक शिक्षिका की मानें तो उन्होंने 7वीं कक्षा के एक बच्चे को चिट से नकल करते पकड़ा. चूंकि बच्चे के भविष्य और स्कूल की प्रतिष्ठा के मद्देनजर कोई कड़ी कार्यवाही नहीं की जा सकती थी, इसलिए बच्चे की करतूत उन्होंने उस के अभिभावकों को बताई. इस शिक्षिका का रोना यह है कि पेरैंट्स ने इसे बेहद हलके में लेते यह कहा कि कोई बात नहीं, बच्चा है. फिर नकल तो आजकल पीएससी, यूपीएससी और कर्मचारी चयन आयोग तक की परीक्षाओं में होती है, उन का कोई क्या बिगाड़ लेता है. यह जवाब सकते में डाल देने वाला है जिस के तहत मांबाप ही अव्वल दरजे का नकलची छात्र तैयार करते नजर आ रहे हैं. होना यह चाहिए था कि वे बेटे को रोकते, नैतिकता और मेहनत का महत्त्व बताते, पर हुआ उलटा. तो बात भविष्य के लिहाज से चिंता की तो है कि समाज कहां जा रहा है और उस के जिम्मेदार वही लोग हैं जिन की जिम्मेदारी एक अच्छे समाज के निर्माण की है. उस का रास्ता ईमानदार और मेहनती युवा पीढ़ी से हो कर जाता है.

कैसे मांबाप बच्चों को सही की जगह गलत सिखा रहे हैं, इसे भोपाल के ही एक ट्रैफिक इंस्पैक्टर की बातों से भी समझा जा सकता है. इस ट्रैफिक इंस्पैक्टर के मुताबिक, वह हर रोज 2-4 ऐसे अवयस्क बच्चों को पकड़ता है जो गलत तरीके से बाइक या कार चला रहे होते हैं. जब इन युवकों को पकड़ कर कानूनी कार्यवाही की जाती है तो वे अपने रसूखदार पिता का हवाला देते रोब झाड़ते हैं. इस पर जब उन के अभिभावकों को बुलाया जाता है तो वे कुछ लेदे कर बात रफादफा करने की गुजारिश करते हैं. हैरानी और चिंता की बात इन अभिभावकों की यह दलील रहती है कि अरे, तो क्या हुआ, बच्चे हैं, वक्त रहते समझ जाएंगे, यही तो दिन हैं इन के मौजमस्ती करने के. यह बचाव बच्चे को गलत रास्ते पर चलने को बढ़ावा देने वाला है जो उन से उन का आत्मविश्वास छीन उन्हें उद्दंड बनाता है. इस से बच्चों को जो नुकसान होते हैं, उस से आज बच्चों का बचाव कर रहे मांबाप भी कल को परेशान होते हैं.

रही बात परीक्षाओं में नकल की, तो अभिभावक इसे गलत मानते हैं, ऐसा लगता नहीं. बहुत बड़े पैमाने पर हो रही नकल उन्हें भी कठघरे में खड़ा करती है. यही माहौल शिक्षण संस्थानों और कोचिंग सैंटरों का है जहां बजाय छात्रों को नसीहत देने के, उन्हें नकल करने के हथकंडे सिखाए जाते हैं. कई कोचिंग संस्थानों में तो नकल करने के तौरतरीकों की क्लास ही अलग से लगती है.

मेहनत बनाम टोटके

जरूरत इस बात की है कि छात्रों को पढ़ने व मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए. उन के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें अच्छागलत बताया जाए. पर नकल का बढ़ता माहौल साबित करता है कि हर स्तर पर उन्हें गलत करने के लिए ही शह दी जा रही है. बिहार के टौपर्स घोटाले का सच अब सामने है कि मांबाप और शिक्षक फर्जीवाड़े के ज्यादा जिम्मेदार हैं जो अपने निकम्मे बच्चों के नंबर बढ़वाने के लिए घूस देते हैं, छलकपट का सहारा लेते हैं और बच्चों में गलत संस्कार रोपते हैं. ऐसे में नैतिकता और निष्पक्षता की बात किसकिस से की जाए, यह सोचना बेमानी है. नकल को ले कर किसी ठोस कानून का न होना भी इस की वजह है. इसलिए बेहतर यही लगता है कि नकलची बच्चों के पकड़े जाने पर सजा उन के अभिभावकों को दी जाए जो बच्चों को बिगाड़ने के बड़े जिम्मेदार हैं.

खत्म होती योगी सरकार की हनक

राजस्थान के मौजूदा गवर्नर कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब वे कहते थे कि सरकार की हनक, धमक और इकबाल होनी चाहिए. हनक से कानून का राज कायम होता है, धमक से अपराधी, भ्रष्टाचारी डरता है और इकबाल से जनता में सरकार के प्रति भरोसा जगता है. कल्याण सिंह के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्री हैं जिन को बहुमत से सरकार चलाने का अवसर मिला है. रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह के समय प्रदेश में भाजपा की बहुमत वाली सरकारें नहीं थीं. ऐसे में उन्हें बहुत सारे मौकों पर सहयोगी दलों की खींचातानी का सामना करना पड़ता था.

योगी सरकार से लोगों को यह उम्मीद जरूर है कि वह अपना हनक, धमक और इकबाल कायम करे. शुरुआती समय में यह प्रभाव नहीं बन पा रहा है. प्रदेश में हत्या, लूट और जातीय हिंसा की बढ़ती घटनाओं ने सरकार के प्रभाव पर सवालिया निशान लगा दिया है. उत्तर प्रदेश में अपराध हर सरकार के लिए बड़ा मुद्दा रहा है. भाजपा ने कानून के राज के नाम पर विधानसभा का चुनाव लड़ा. मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने अपराध कम करने का पहला वादा किया था. बहुत सारे बदलावों के बाद भी जब योगी सरकार की हनक कायम होती नहीं दिखी तो जनता सड़कों पर उतर कर अपराध के खिलाफ  आवाज बुलंद कर रही है.

जनता में फैलता यह संदेश योगी सरकार के खिलाफ  जा रहा है. इस से योगी की छवि धूमिल हो रही है. राजधानी लखनऊ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी और कृष्ण की नगरी मथुरा सभी अपराध के दर्द से कराह रहे हैं. सीतापुर में सरेआम कारोबारी सहित उस के बेटे और पत्नी की हत्या हो जाती है. वाराणसी में सर्राफा कारोबारी से लूट के बाद पुलिस ने घटना का परदाफाश किया पर उस से पीडि़त परिवार संतुष्ट नहीं दिखा.

उठ रही है आवाज

राजधानी लखनऊ में पावर विंग ने तमाम संगठनों और लोगों के साथ मिल कर 1,090 चौराहों पर प्रदर्शन किया. पावर विंग की अध्यक्ष सुमन रावत ने कहा, ‘‘अपराध पर रोक लगनी ही चाहिए. जिस तरह से हत्या, बलात्कार, लूट और चोरी की घटनाओं का खुलासा नहीं हो रहा और घटनाएं बढ़ रही हैं, उस से जनता में योगी सरकार के खिलाफ गलत संदेश जा रहा है.’’ चैतन्य वैलफेयर फाउंडेशन की ओम कुमारी सिंह ने कहा, ‘‘अपराध करने वालों को बिना किसी भेदभाव के कड़ी कानूनी सजा दी जाए.’’ इन प्रदर्शन करने वालों का मानना था कि महिला अपराधों के जिम्मेदारों के खिलाफ त्वरित कार्यवाही की जाए.     

अप्रैल माह में प्रधानमंत्री की लोकसभा सीट वाराणसी में सीताराम सर्राफ  के यहां शहर की सब से बड़ी चोरी हुई. इस में 12 किलो सोना चोरी चला गया. पुलिस पर मामले को खोलने का दबाव पड़ने लगा. पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा उन से मात्र 1 किलो सोना ही मिला. सीताराम सर्राफ के परिजन इस खुलासे से संतुष्ट नहीं हैं. वे पुलिस के हर अफसर तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं. सीताराम सर्राफ  के परिजनों में नूपुर अग्रवाल कहती हैं, ‘‘पुलिस ने जिस तरह से मामले को खोला है, उस पर यकीन करना संभव नहीं है. अगर सही लोग पकडे़ गए होते तो पूरा माल बरामद हो जाता.’’

इधर, पुलिस सीताराम सर्राफ  के परिजनों को ही गलत तहरीर देने की बात कह रही है. पुलिस का मानना है कि सीताराम सर्राफ  के परिजनों ने ज्यादा सोना चोरी होने की बात लिखवाई थी. पुलिस को अपराध का शिकार हुए परिवार के साथ बहुत ही संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए. पुलिस के व्यवहार से बहुत हद तक सरकार की इमेज बदल सकती है. थाना और तहसील ही सरकार की इमेज को बनाते व बिगाड़ते हैं.

मुसीबत में कारोबारी

सर्राफा दुकानों पर चोरी की यह पहली घटना नहीं है. लखनऊ और मथुरा में भी इस तरह की घटनाएं घट चुकी हैं. सर्राफा कारोबारियों पर हो रहे जानलेवा हमलों, लूट और चोरी की घटनाओं के विरोध में 19 मई को सर्राफा बाजार बंद रहे. लखनऊ सर्राफा एसोसिएशन के वरिष्ठ महामंत्री प्रदीप कुमार अग्रवाल ने बताया, ‘‘मथुरा में हुई सर्राफा कारोबारी के साथ लूट और हत्या को ले कर पूरे समाज में गुस्सा है. पलिस लूट और चोरी की घटनाओं को दबाने का काम कर रही है. इस से अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं.’’

सर्राफा कारोबारी विनोद माहेश्वरी ने कहा, ‘‘सरकार ने प्रदेश में कानून का राज कायम करने की जो बात कही थी, उस में वह असफल हो रही है.’’ सरकार ने पुलिस विभाग में फौरीतौर पर बहुत सारे बदलाव कर दिए हैं. इस के बाद भी पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह नहीं दिख रही. पुलिस विभाग के तमाम अफसर यह समझ नहीं पा रहे कि किस तरह से वे अपनी रणनीति तय करें. प्रशासनिक तौर पर अच्छे जवाबदेह अफसर सरकार के साथ नहीं दिख रहे हैं. यह सही है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मेहनती और ईमानदार व्यवस्था को आगे करना चाहते हैं लेकिन उन को पूरा सहयोग नहीं मिल रहा. भाजपा के अंदर से भी मुख्यमंत्री को पूरा सहयोग नहीं मिल रहा है.

जानकार मानते हैं कि जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री के साथ 2 उपमुख्यमंत्री बना कर कुशल शासन देने की नीति बनाई, वह सफल नहीं हो पा रही है. योगी आदित्यनाथ कठोर मुख्यमंत्री वाली छवि बनाना चाहते हैं. वे कल्याण सिंह जैसे कुशल मुख्यमंत्री बन सकते हैं. मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को अपनी टीम के साथ बेहतर तालमेल बनाना होगा. वे अब धार्मिक नेताभर नहीं हैं. उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. जिस पर देश ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं. ऐसे में योगी को अपनी प्रशासनिक क्षमता खुद भी बढ़ानी होगी और अपने मंत्रिमंडल व ब्यूरोक्रेसी में वह भरोसा जगाना होगा जिस से लोग उन के फैसले को जनता के बीच सही तरह से ले जाएं. मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से जानवरों की कत्लगाहों को बंद करने, एंटी रोमियों दस्ता बनाने जैसे विवादित काम शुरू हुए, उन की वजह से सरकार की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खडे़ हुए हैं.

चीन की मंशा, भारत की सोच

चीन ने अपने वन बैल्ट वन रोड इनीशिएटिव को अमली जामा पहना कर नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया नारे पर पानी फेर दिया है. भारत का मेक इन इंडिया प्रोग्राम मुख्यतया उन देशों के लिए उपयुक्त था जो यूरोप से महंगा सामान नहीं खरीद सकते थे और चीन के एकाधिकार से भयभीत थे. पश्चिमी एशिया, पूर्वी यूरोप, दक्षिणपूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के देश ही भारतीय सामान को खपा सकते हैं जो क्वालिटी में ठीक न होते हुए मगर सस्ते हो सकते थे.

अब चीन ने इन देशों तक अपनी फैक्टरियों का सामान पहुंचाने का प्रबंध करना शुरू कर दिया है और साथ ही, इन देशों के श्रमिकों को चीन आने का रास्ता सुलभ कर दिया है.

चीन बड़े पैमाने पर दूसरे देशों में रेलें, बंदरगाह, सड़कें, पुल, सुरंगें बना रहा है और चूंकि पैसा चीन का लग रहा है चाहे उधार का, वही इन का अधिकारपूर्वक उपयोग कर पाएगा.

18वीं व 19वीं शताब्दी में इंगलैंड, फ्रांस, डच देशों ने बड़ी नौसेनाएं विकसित की थीं ताकि वे एशिया से व्यापार करने का अधिकार अपने हाथ में रख सकें. ब्रिटिश साम्राज्य के पीछे उस का समुद्री मार्गों पर कब्जा था.

अब चीन अपने विशाल भूभाग का इस्तेमाल कर रहा है. वह मंगोलिया, रूस, पाकिस्तान, कोरिया, जापान, दक्षिणपूर्व एशिया से सीधे जुड़ा है और उन के माध्यम से उस की रेलें अब लंदन, मैड्रिड पहुंचने लगी हैं चीनी माल भरभर कर.

भारत अब अलगथलग पड़ गया है. शंघाई कोऔपरेशन और्गेनाइजेशन की सहायता मिलने के बावजूद भारत का कहीं स्थान नहीं है. और यही वजह है कि भारत की उत्पादन वृद्धि दर अचानक घटने लगी है.

हमारे नेताओं का ध्यान वैसे भी गौपूजा, कश्मीर, हिंदू संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने में लगा है. उत्पादन नहीं, हमें नोटबंदी की वाहवाही और गाय के आधारकार्ड की पड़ी है.

दोनों से फैक्टरियां तो नहीं चलेंगी, यह पक्का है. हम हल्ला चाहे जितना मचा लें पर असल में हम फैक्टरियों के नहीं, आश्रमों, गौशालाओं, घाटों, मंदिरों के निर्माण में लगे रहेंगे, यह पक्का है. इन दोनों में नौकरियां हैं पर वर्गजाति विशेष के लिए, आम भारतीयों के लिए नहीं.

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