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हौकी के जादूगर की वो बातें, जो आपने पहले कभी नहीं सुनी होंगी

हौकी के जादूगर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन 1905 में हुआ. उनके जन्मदिवस को भारत के राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. हर साल आज ही के दिन सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार दिए जाते हैं. यह पुरस्कार खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दिए जाते हैं.

मेजर ध्यानचंद ने अतंरराष्ट्रीय हौकी में 400 गोल दागे. हालैंड में लोगों ने उनकी हाकी स्टिक तुड़वा कर देखी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगा है. अपने 22 साल के हाकी करियर में उन्होंने अपने खेल से पूरी दुनिया को चमत्कृत किया. अपने जमाने में इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना लोहा मनवाया होगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं, मानों कि वो कोई देवता हों.

मेजर ध्यानचंद के बारे में कहा जाता है कि वह रात को प्रैक्टिस किया करते थे. उनके प्रैक्टिस का समय चांद निकलने के साथ शुरू होता था. इस कारण उनके साथी उन्हें चांद कहने लगे. दुनिया जिसे हाकी के जादूगर के नाम से जानती है वह अपने स्थानीय (बुंदेलखंड) लोगों के लिए ‘दद्दा’ हैं. मेजर ध्यानचंद के निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार झांसी के उसी ग्राउंड में किया गया जहां वो हाकी खेलते थे. बुंदलेखंड के रहने वाले ध्यानचंद को आज भी वहां के लोग ‘दद्दा’ कहकर आत्मीय अंदाज में याद करते हैं.

14 अगस्त 1936 को भारत और जर्मनी के बीच बर्लिन ओलिंपिक के हाकी का फाइनल खेला जाना था. लेकीन लगातार बारिश होने की वजह से 40 हजार दर्शकों के बीच मैच अगले दिन 15 अगस्त को खेला गया. मैच से पहले मैनेजर पंकज गुप्ता ने अचानक कांग्रेस का झंडा निकाला. उसे सभी खिलाड़ियों ने सेल्यूट किया (उस समय तक भारत का अपना कोई झंडा नहीं था. वो गुलाम देश था.)

मैच देखने वालों में बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम के साथ साथ जर्मन नेतृत्व के चोटी के लोग मौजूद थे. उस दिन जर्मन तानाशाह हिटलर भी मौजूद था. हाफ टाइम तक भारत सिर्फ एक गोल से आगे था. इसके बाद ध्यानचंद अपने स्पाइक वाले जूते और मोजे उतारकर नंगे पांव खेलने लगे. इसके बाद तो गोलों की झड़ी लग गई. भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और इसमें तीन गोल ध्यान चंद ने किए. वहां ध्यानचंद ने ओलिंपिक में जर्मनी को धूल चटाकर स्वर्ण पदक जीता.

एक अंग्रेजी अखबार ने लिखा, “बर्लिन लंबे समय तक भारतीय टीम को याद रखेगा. भारतीय टीम ने इस तरह की हाकी खेली मानो वो स्केटिंग रिंक पर दौड़ रहे हों. उनके स्टिक वर्क ने जर्मन टीम को अभिभूत कर दिया”.

ओलिंपिक में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन से प्रभावित होकर हिटलर ने उन्हें डिनर के लिए आमंत्रित किया. जर्मन तानाशाह ने उन्हें जर्मनी की फौज में बड़े पद का लालच भी दिया, लेकिन ध्यानचंद ने उसे ठुकरा दिया. उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा कि ‘हिंदुस्तान ही मेरा वतन है और मैं वहीं के लिए आजीवन हाकी खेलता रहूंगा’.

1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हाकी मैग्जीन के एक अंक में लिखा, “ध्यान के पास कभी भी तेज गति नहीं थी बल्कि वो धीमा ही दौड़ते थे. उनके पास गैप को पहचानने की गजब की क्षमता थी. वो इतनी तेजी और ताकत से शाट लगाते थे कि दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गोल कीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था.”

1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई. ध्यान चंद अपनी आत्मकथा ‘गोल’ में लिखते हैं, “मैं जब तक जीवित रहूंगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा. इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं पाए. हमने तय किया कि इनसाइड राइट पर खेलने के लिए आईएनएस दारा को तुरंत भारत से हवाई जहाज से बर्लिन बुलाया जाए.” दारा सेमी फाइनल मैच तक ही बर्लिन पहुंच पाए.

दारा ने बाद में लिखा, “छह गोल खाने के बाद जर्मन रफ हाकी खेलने लगे. उनके गोलकीपर की हाकी ध्यान चंद के मुंह पर इतनी जोर से लगी कि उनका दांत टूट गया. उपचार के बाद मैदान में वापस आने के बाद ध्यान चंद ने खिलाड़ियों को निर्देष दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए. सिर्फ जर्मन खिलाड़ियों को ये दिखाया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है. इसके बाद हम बार बार गेंद को जर्मन डी में लेकर जाते और फिर गेंद को बैक पास कर देते. जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है.

दो बार के ओलंपिक चैंपियन केशव दत्त ने बताया कि बहुत से लोग उनकी मजबूत कलाईयों ओर ड्रिब्लिंग के कायल थे. लेकिन उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग में थी. वो उस ढ़ंग से हाकी के मैदान को देख सकते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है. उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव करेंगे. केशव दत्त कहते हैं, “जब हर कोई सोचता था कि ध्यानचंद शाट लेने जा रहे हैं तो वो गेंद को पास कर देते थे. ऐसा इसलिए कि विरोधी उनके इस मूव पर हतप्रभ रह जाएं.

1968 में भारतीय ओलंपिक टीम के कप्तान रहे गुरुबख्श सिंह ने बताया कि 1959 में भी जब ध्यानचंद 54 साल के हो चले थे, तब भी भारतीय हाकी टीम का कोई भी खिलाड़ी बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था.

ध्यानचंद के पुत्र अशोक कुमार जो कि 1972 के म्यूनिख ओलंपिक खेलो में कांस्य पदक विजेता रहें हैं, ने बताया कि एक बार जब उनकी टीम म्यूनिख में अभ्यास कर रही थी तब एक बुजुर्ग से शख्स एक व्हील चेयर से आएं और पूछा कि इस टीम में अशोक कुमार कौन हैं? जब मुझे उनके पास ले जाया गया तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और भावपूर्ण ढ़ंग से अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में कहने लगे. तुम्हारे पिता बहुत महान खिलाड़ी थे. उनके हाथ में 1936 के खबरों की पीली हो चुकी कतरनें थी जिसमें मेरे पिता के खेल का गुणगान किया गया.

भारत लौटने के बाद ध्यानचंद के साथ एक मजेदार घटना हुई. फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ध्यानचंद के फैन थे. एक बार मुंबई में हो रहे एक मैच में वो अपने साथ नामी गायक कुंदन लाल सहगल को ले आए. हाफ टाइम तक कोई गोल नहीं हो पाया. सहगल ने कहा कि हमने दोनों भाइयों का बहुत नाम सुना है. मुझे ताज्जुब है कि आपमें से कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया. रूप सिंह ने तब सहगल से पूछा कि क्या हम जितने गोल मारे उतने गाने आप हमें सुनाएंगे?

सहगल राजी हो गए. फिर क्या था दूसरे हाफ में दोनों भाइयों ने मिल कर 12 गोल दागे. लेकिन फाइनल विसिल बजने से पहले सहगल स्टेडियम छोड़ कर जा चुके थे. अगले दिन सहगल ने अपने स्टूडियो आने के लिए ध्यानचंद के पास अपनी कार भेजी. लेकिन जब ध्यानचंद वहां पहुंचे तो सहगल ने कहा कि गाना गाने का उनका मूड उखड़ चुका है. ध्यानचंद बहुत निराश हुए. अगले दिन सहगल खुद अपनी कार में उस जगह पहुंचे जहां उनकी टीम ठहरी हुई थी और उन्होंने उनके लिए 14 गाने गाए. और हर एक खिलाड़ी को एक एक घड़ी भी भेंट में दी.

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में नए चेहरों को उतारेगी कांग्रेस

कांग्रेस हिमाचल प्रदेश विधानसभा में नए चेहरों को मैदान में उतार सकती है. चुनाव से ठीक पहले पार्टी की अंदरूनी रिपोर्ट में पता चला है कि वहां स्थिति अच्छी नहीं है. पार्टी ने सख्त फैसले नहीं लिए, तो हार तय है. बता दें की पिछले कई चुनाव से राज्य में सत्ता परिवर्तन होता रहा है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि मौजूदा स्थितियों के मुताबिक हिमाचल में कांग्रेस चुनाव लड़ती नहीं दिख रही है. पार्टी को चुनाव में बने रहना है, तो उसे उम्मीदवार बदलने होंगे.

विधायकों से नाराजगी

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पिछली बार 36 सीट जीती थी. पार्टी सूत्रों का कहना है कि यदि सभी विधायको को टिकट दिया गया तो पार्टी आधी से भी कम सीट जीत पाएगी. कई विधायकों के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी है.

चेहरे बदलने से नाराजगी कम

हिमाचल प्रदेश में वोट प्रतिशत में पांच फीसदी का फर्क सत्ता बदल देता है. ऐसे में पार्टी को नए चेहरों को मैदान में उतारकर मतदाताओं की नाराजगी को कम कर सकती है. इसका सीधा फायदा विधानसभा चुनाव में भी मिलेगा.

टिकट कटने से अधिक नुकसान नहीं

पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि हिमाचल प्रदेश में विधायकों के टिकट कटने से अधिक नुकसान नहीं होगा. क्योंकि, उनके भाजपा में शामिल होकर उम्मीदवार बनने की संभावना कम है. हिमाचल प्रदेश में भाजपा के पास अपने उम्मीदवार है. ऐसे में वह निर्दलीय चुनाव लड़ते भी हैं, तो अधिक नुकसान नहीं कर पाएंगे. मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं होगा. अभी जो स्थिति है उसके मुताबिक ज्यादा मार्जिन से चुनाव जीतना उनके लिए चुनौती होगी. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 43 फीसदी वोट मिले थे.

वीरभद्र सिंह के लिए चुनाव आसान नहीं होगा

सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं होगा. अभी जो स्थिति है उसके मुताबिक ज्यादा मार्जिन से चुनाव जीतना उनके लिए चुनौती होगी. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 43 फीसदी वोट मिले थे. जबकि भाजपा को 38 प्रतिशत वोट मिले.

सावधान ! इंटरनेट वाले ठगों से, कहीं आप भी इनका शिकार न हो जाएं

बीकानेर शहर की रहने वाली उच्च शिक्षित सुरभि शर्मा खातेपीते परिवार से थीं. वह खूबसूरत भी थीं. अपनी दिलकश अदाओं से वह पहली नजर में ही किसी के भी दिल में उतर सकती थीं. इस के बावजूद उन के लिए कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिल रहा था. इस की वजह से सुरभि ही नहीं, उन के घर वाले भी परेशान थे.

घर वालों ने उस के रिश्ते के लिए नातेरिश्तेदारों से ही नहीं, जानपहचान वालों से भी कह रखा था. इन लोगों ने जो भी रिश्ते बताए, उन में से कुछ सुरभि को पसंद नहीं आए तो कुछ को सुरभि और उस के घर वाले पसंद नहीं आए.

एक समय था, जब रिश्तेदार या जानपहचान वाले ही शादियां करा देते थे. लेकिन लोग गांवों से निकल कर शहरों में बसते गए, जिस से लोग एकदूसरे से दूर होते गए. तब वैवाहिकी विज्ञापनों का दौर शुरू हुआ. विज्ञापनों के जरिए लोग बेटीबेटियों की शादी करने लगे.

इंटरनेट आया तो तमाम मैट्रीमोनियल वेबसाइटें बन गईं, जो वरवधू तलाशने में मदद करने लगीं. सुरभि की शादी में हो रही देरी को देखते हुए कुछ लोगों ने उसे सलाह दी कि वह भी किसी मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर अपनी प्रोफाइल बना कर डाल दे. हो सकता है, कोई अच्छा रिश्ता मिल ही जाए.

उन्हीं लोगों की सलाह पर सुरभि ने घर वालों से बात की. घर वालों ने हामी भर दी तो सुरभि ने मैट्रीमोनियल साइट पर अपनी एक बढि़या फोटो के साथ प्रोफाइल अपलोड कर दी. प्रोफाइल अपलोड होने के बाद वेबसाइट की ओर से उसे प्रोफाइल नंबर दे दिया गया. इसी नंबर के जरिए उस से वेबसाइट द्वारा संपर्क किया जा सकता था.

प्रोफाइल अपलोड करने के बाद सुरभि को पूरा विश्वास था कि उसे कोई अच्छा रिश्ता जरूर मिल जाएगा, इसलिए प्रोफाइल अपलोड कर के वह बेहद खुश थी. उस ने और उस के घर वालों ने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ. मैट्रीमोनियल साइट पर सुरभि की प्रोफाइल देख कर कई लड़कों या लड़कों के घर वालों ने वेबसाइट के माध्यम से उस से संपर्क किया.

सुरभि एवं उस के घर वालों ने उन लोगों से और उन के घर वालों से बातचीत शुरू की. बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचती, वेबसाइट के जरिए यूनाइटेड किंगडम (यूके) के रहने वाले पारस प्रेम कुमार ने वेबसाइट द्वारा सुरभि से संपर्क किया. जवाब में सुरभि ने पारस प्रेम कुमार से आवश्यक जानकारियां मंगाईं.

पारस प्रेम कुमार ने जो जानकारियां भेजीं थीं, उस के अनुसार वह मूलरूप से भारत का रहने वाला था. वहां वह यूएन एयरफोर्स में एयरक्राफ्ट इंजीनियर था. फिलहाल वह इराक में पदस्थापित था. वह भारतीय संस्कारों वाली ऐसी लड़की से शादी करना चाहता था, जो प्यार से उस की गृहस्थी संवार सके.

पारस प्रेम कुमार का कहना था कि अगर उस से उस की शादी हो जाती है तो वह खुद को दुनिया का सब से खुशकिस्मत आदमी समझेगा. अब तक जो रिश्ते आए थे, उन में पारस प्रेम कुमार का रिश्ता सब से अच्छा था. यह रिश्ता सुरभि को भी पसंद था और उस के घर वालों को भी. दोनों ओर से एकदूसरे को फोन नंबर दे दिए गए तो बातचीत शुरू हो गई. सुरभि ने भी प्रेम कुमार को अपना वाट्सऐप नंबर दे दिया था, इसलिए दोनों में चैटिंग होने लगी.

प्रेम कुमार जल्दी से जल्दी सुरभि से शादी करने की बात कर रहा था. अब उन के बीच प्यार की भी बातें होने लगीं थीं. सुरभि उसे अपने सपनों का राजकुमार समझने लगी थी और उस से शादी कर के विदेश जाने के सपने देखने लगी थी. यह सन 2016 अगस्त सितंबर महीने की बात है.

उसी बीच एक दिन प्रेम कुमार ने सुरभि से वाट्सऐप पर चैटिंग के दौरान बताया कि यहां उस के पास करीब 5 मिलियन पौंड की संपत्ति है. वह शादी के बाद भारत में बसना चाहता है. अब जल्दी ही उस की उस से शादी होने जा रही है, इसलिए वह 2.5 मिलियन पौंड की संपत्ति के कागज उस के नाम भारत भेज रहा है, ताकि उसे शादी की तैयारी में कोई परेशानी न हो.

प्रेम कुमार ने सुरभि को भरोसा दिलाते हुए कहा था कि इन दिनों भारत और इराक के बीच डिप्लोमैटिक पाउच सर्विस चल रही है, इसलिए इस सर्विस के जरिए वह अपनी 2.5 मिलियन पौंड की संपत्ति के कागज उस के नाम भारत भेज रहा है. जल्दी ही उस ने बताया था कि वह जेम्स डेविड नामक व्यक्ति के जरिए इराक एंबेसी में उस के नाम 2.5 मिलियन पौंड की संपत्ति के कागज भेज दिए हैं.

सुरभि ने हामी भर दी थी. आखिर वह मना भी क्यों करती? प्रेम कुमार ने उसे अपना जीवनसाथी बनाने का वादा जो कर लिया था. ऐसी भी कोई बात नहीं हुई थी कि उस पर भरोसा न किया जाता. अब तक हुई बातों में उसे ऐसी कोई बात नजर नहीं आई थी, जिस पर विश्वास न किया जाता. प्रेम कुमार ने उस के नाम से ढाई मिलियन पौंड की संपत्ति के कागज भेजने की बात कही तो उस के मन में प्रेम कुमार के लिए और प्रेम बढ़ गया था.

इस बातचीत के कुछ दिनों बाद जेम्स डेविड ने सुरभि को फोन कर के कहा कि इराक से उस का एक पाउच आया है. उस के किराए के लिए 70 हजार रुपए जमा कराने होंगे, जो सरकार के खाते में जाएंगे. पैसे जमा कराने के लिए उस ने 2 बैंक खातों के नंबर भी दे दिए थे.

सुरभि जेम्स डेविड द्वारा बताए गए खाता नंबरों में 70 हजार रुपए जमा करा कर इराक से आने वाले ढाई मिलियन पौंड की संपत्ति के कागजों के पाउच का इंतजार करने लगी. कई दिन बीत जाने पर भी जब न कोई कूरियर आया और न ही डाक विभाग से कोई पार्सल तो उसे चिंता हुई. लेकिन तभी अचानक जेम्स डेविड का फोन आ गया.

इस बार उस ने फाइनैंस इंटेलीजेंस सिक्यूरिटी भारतीय रिजर्व बैंक का नोटिस भेजे जाने की बात कह कर उस में बताई गई रकम बैंक खाते में जमा कराने को कहा.

इस के कुछ दिनों बाद सुरभि को एक नोटिस मिला, जिस में इराक से आए पाउच के नाम पर बैंक खाते में रकम जमा कराने की बात कही गई थी. सुरभि ने यह रकम भी बताए गए बैंक खाते में जमा करा दी.
इस के बाद करीब 2 महीने तक दिल्ली पुलिस के क्लीयरेंस सर्टिफिकेट, कस्टम क्लीयरेंस सर्टिफिकेट, इनकम टैक्स क्लीयरेंस सर्टिफिकेट आदि के नाम पर नवंबर, 2016 तक सुरभि से अलगअलग बैंक खातों में लगभग 56 लाख रुपए जमा करा लिए गए. सुरभि ने यह रकम अपने पिता तथा रिश्तेदारों से यह कह कर जुटाई थी कि उस के नाम ढाई मिलियन पौंड का पार्सल आने वाला है.

उस पार्सल के चक्कर में सुरभि अपने घर वालों तथा रिश्तेदारों की कर्जदार हो गई थी. इतनी बड़ी रकम अलगअलग बैंक खातों में जमा कराने के बाद भी उसे प्रेम कुमार की ओर से भेजा गया पार्सल नहीं मिला था.

काफी समय हो गया और पार्सल नहीं मिला तो सुरभि को शक होने लगा. उस ने अपने घर तथा अन्य लोगों से इस बारे में बात की तो सभी को दाल में कुछ काला लगा. लोगों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. सुरभि बीकानेर के एसपी डा. अमनदीप कपूर से उन के औफिस में जा कर मिली और उन्हें सारी बातें बताई.

पूरी बात सुन कर डा. अमनदीप कपूर को पूरा विश्वास हो गया कि सुरभि के साथ ठगी हुई है. उन्होंने सुरभि से प्रार्थना पत्र लिखवा कर 29 नवंबर, 2016 को बीकानेर के थाना सदर में रिपोर्ट दर्ज करा दी. यह मुकदमा अपराध संख्या 481/2016 पर भादंवि की धारा 420, 467, 468 व आईटी एक्ट के तहत दर्ज किया गया.

शादी के नाम पर सुरभि से 56 लाख रुपए की ठगी का यह मामला बड़ा ही पेचीदा था. डा. अमनदीप कपूर ने इस मामले की जांच के लिए एडीशनल एसपी (ग्रामीण) लालचंद कायल के नेतृत्व में सीआईयू के इंचार्ज इंसपेक्टर नरेंद्र पूनिया, थाना सदर के थानाप्रभारी लक्ष्मण सिंह राठौड़, थाना जामसर के थानाप्रभारी मनोज शर्मा, थाना कालू के थानाप्रभारी सुभाषचंद, थाना पांचू के थानाप्रभारी परमेश्वर सुथार, सबइंसपेक्टर कन्हैयालाल, सत्यनारायण गोदारा, संदीप बिश्नोई, नानूराम, साइबर एक्सपर्ट योगेंद्र सुथार, कांस्टेबल रामस्वरूप, दीपक यादव, पुष्पेंद्र सिंह, ओमप्रकाश, मनफूल और राजेश कुमार आदि की एक टीम गठित की.

इस टीम ने करीब 4 महीने तक जो जांच की, उस से पता चला कि स्टूडेंट वीजा पर भारत में पढ़ाई के लिए आए नाइजीरियन छात्रों की दिल्ली में रहने वाली एक गैंग स्थानीय लोगों की मदद से इस तरह की ठगी की वारदात कर रही है. वे ठगी द्वारा हासिल की गई रकम को तत्काल हवाला के जरिए अफ्रीका भेज देते हैं. यही नहीं, उस रकम से सोना खरीद कर भी अफ्रीका भेजा जाता है. नोटबंदी के दौरान इन्होंने सोने की काफी खरीद की थी.

बीकानेर पुलिस ने अप्रैल, 2017 के दूसरे सप्ताह में सुरभि से 56 लाख रुपए की ठगी के मामले में 3 युवकों एवं एक महिला वकील को गिरफ्तार किया. इन में झारखंड के चतरा निवासी बैंक खाताधारक अजीत कुमार यादव भी शामिल था. अजीत ने अपना नाम अनिल कुमार उर्फ अभय गुप्ता रख कर फर्जी आईडी से बैंक में खाता खुलवाया था.

इस के अलावा ठगी में मदद करने वाले बाड़मेर के सिलोर समदड़ी निवासी फिलहाल बालोतरा में रह रहे श्रवण सिंह सोढ़ा और जोधपुर के पालड़ीनाथ के रहने वाले वीरेंद्रनाथ उर्फ महाराज गोस्वामी तथा हरियाणा के गुड़गांव के डीएलएफ फेज-1 की रहने वाली एक महिला वकील को गिरफ्तार किया गया था. वह कानूनी और प्रशासनिक मामलों पर नजर रखती थी.

पुलिस ने गिरफ्तार लोगों से करीब 3 लाख रुपए बरामद किए. इस के अलावा श्रवण सिंह सोढ़ा से एक लैपटौप, 4 मोबाइल फोन और सिमकार्ड, नाइजीरियन को दिए गए रुपयों के हिसाबकिताब की डायरियां, वीरेंद्रनाथ से 2 मोबाइल फोन, एक फर्जी वोटर आईडी, 2 डेबिट कार्ड आदि बरामद किए गए.

गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और पुलिस की जांच से पता चला कि सुरभि से ठगी गई रकम बीकानेर के अलावा दिल्ली, पटना, गुवाहाटी और पुणे के विभिन्न बैंक खातों में जमा कराई गई थी. बीकानेर में शिवराम एंटरप्राइजेज और अनिल कुमार मांझी के नाम से एक ही व्यक्ति ने खाते खुलवा रखे थे.

पटना में शिवराम इंटरप्राइजेज और अभय गुप्ता के नाम से खाते खुलवाए गए थे. दोनों ही बैंक खातों में एक ही व्यक्ति के फोटो लगे थे. आगे की जांच में पता चला था कि नाइजीरियन छात्रों की गैंग अलगअलग साइटों से डाटा एकत्र कर के फेसबुक, ट्विटर एवं अन्य सोशल साइटों के जरिए व्यक्ति विशेष की जानकारी हासिल करती थी.

इन लोगों के बैंक खाते भारत में नहीं खुल सकते, इसलिए ये स्थानीय लोगों की मदद से अलगअलग बैंकों में फर्जी आईडी से चालू खाते खुलवा लेते थे. वेरिफिकेशन के लिए ये मकान या दुकान किराए पर लेते थे. इसी के साथ फर्जी आईडी से इकरारनामा तैयार कर के बैंकों में जमा कराते थे.

इस के बाद ये लोग अपना टारगेट बनाए व्यक्ति को झांसा दे कर बैंकों में रकम जमा कराते थे. बैंक में रकम आते ही ये लोग आरटीजीएस (रीयल टाइम ग्रौस सेटलमेंट सिस्टम) एवं एनईएफटी (नेशनल इलैक्ट्रौनिक फंड ट्रांसफर सिस्टम) के जरिए रकम ट्रांसफर कर देते थे. छोटी राशि एटीएम और बड़ी राशि सेल्फ चैक से निकाल लेते थे.

ठगी के इस पूरे खेल में खाताधारक और मध्यस्थ को 10 से 15 प्रतिशत तक कमीशन दिया जाता था. बीकानेर पुलिस को इस गिरोह के कई बैंक खातों का पता चला है, जिन्हें फ्रीज करवा दिया गया है. इन खातों में 35 से 40 लाख रुपए तक जमा कराए गए थे.

केवल बीकानेर में ही इस गिरोह के सदस्यों ने 19 बैंक खाते खोल रखे थे, जिन में 5 खातों की जांच में एक करोड़ 87 लाख रुपए जमा होने की जानकारी मिली है. बाकी खातों की जांच की जा रही है. इस गिरोह द्वारा बीकानेर की सुरभि से 56 लाख की ठगी के अलावा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा से 13 लाख रुपए और चंडीगढ़ से 11 लाख रुपए ठगे जाने की वारदातों का पता चला है.

गिरफ्तार अजीत कुमार यादव ने बीकानेर की बैंकों में खाते खुलवाने के लिए नोखा रोड पर मकान और रेलवे स्टेशन के पास पार्वती कौंप्लैक्स में दुकान किराए पर ली थी. उस ने बीकानेर में बैंक औफ इंडिया में 2 और आईडीबीआई बैंक में एक खाता खुलवाया था. बीकानेर में चालू बैंक खाते शिवराम इंटरप्राइजेज और बचत खाते अनिल कुमार मांझी के नाम से खुलवाए गए थे.

शिवराम इंटरप्राइजेज का प्रोपराइटर अनिल कुमार ही बना था, जिस का वास्तविक नाम अजीत कुमार यादव था. उस की बीकानेर जेल में शिनाख्त परेड कराई गई तो मकान और दुकान मालिकों ने उस की पहचान कर ली थी. झारखंड के चतरा का रहने वाला अजीत कुमार यादव कई महीने तक बीकानेर में रहा था.

ठग गिरोह ने दिल्ली और गुड़गांव में अपना ठिकाना बना रखा था. वीरेंद्रनाथ करीब 4 महीने तक गुड़गांव में किराए का कमरा ले कर रहा था. श्रवण सिंह सोढ़ा भी वहां आताजाता था. ये लोग ठगी के शिकार लोगों से बैंक खातों में जमा होने वाले रुपयों को निकालते थे और अपना कमीशन काटने के बाद नाइजीरियन को पहुंचाते थे.

कथा लिखे जाने तक हालांकि इस मामले में किसी नाइजीरियन की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, लेकिन राजस्थान की उदयपुर पुलिस ने औनलाइन फ्रौड का खुलासा कर 2 नाइजीरियन युवकों और मुंबई की एक महिला सहित 5 ठगों को पकड़ने में सफलता हासिल की थी.

उदयपुर जिले की थाना अंबामाता पुलिस ने इसी साल अप्रैल के पहले सप्ताह में संदीप मोहिंद्रा उर्फ सोनू पंजाबी एवं नरेश पंचाली को गिरफ्तार किया था. ये दोनों बदमाश बैंकों में फर्जी नाम से खाते खुलवा कर औनलाइन फ्रौड की राशि जमा कराने और अवैध रूप से प्राप्त रकम से सोनाचांदी खरीद कर उसे बेच कर रकम कैश कराने की जालसाजी में लिप्त थे.

पुलिस ने इन बदमाशों से कई बैंकों के एटीएम कार्ड, पासबुक के अलावा 2 हजार रुपए के नोटों की 5 गड्डियां और 5 सौ रुपए के नोटों की 2 गड्डियां, कुल 11 लाख रुपए नकद और 20 ग्राम गोल्डन बिस्किट व 7 किलोग्राम चांदी की 10 सिल्लियां बरामद की थीं.

ये दोनों उदयपुर के रहने वाले थे. बरामद रकम हवाला के जरिए नाइजीरियन गैंग को भेजी जानी थी. इन से पूछताछ में नाइजीरियन युवकों की गैंग द्वारा औनलाइन ठगी का खुलासा हुआ. पता चला कि इस में कई लोग शामिल थे. जिन लोगों के फर्जी बैंक खाते खुले थे, उन के जरिए औनलाइन ठगी की रकम आती थी.
इस रकम को एक नंबर की बनाने के लिए ये सोनाचांदी खरीदते थे. इस के बाद उसे कुछ कम दामों में सर्राफा व्यवसायियों को बेच देते थे. इस तरह रकम हासिल कर ये लोग आपस में बांट लेते थे. दोनों आरोपियों से पूछताछ में कई सर्राफा व्यवसायियों के नाम भी सामने आए हैं. जिन के खातों से आरटीजीएस से रुपए ट्रांसफर किए जाते थे.

गिरफ्तार संदीप मोहिंद्रा एवं नरेश पंचाली से पूछताछ के आधार पर उदयपुर पुलिस ने अप्रैल, 2017 के तीसरे सप्ताह में मुंबई से नाइजीरिया के रहने वाले विक्टर उर्फ कैलविन एवं इडूमी चार्ल्स और मुंबई की एक महिला प्रेमादास सोनी को गिरफ्तार किया था. इन से पूछताछ में करीब 3 करोड़ रुपए के औनलाइन फ्रौड का पता चला. यह भी पता चला कि आरोपियों ने लोगों से ठगे गए रुपयों से रेडीमेड कपड़े खरीद कर कार्गो के जरिए नाइजीरिया भेज दिए थे.

नाइजीरियन युवकों के इस गिरोह ने ठगी के कई तरीके अपना रखे थे. इन्होंने महिला के नाम से फेसबुक पर प्रोफाइल बनाई हुई थी. आमतौर पर पुरुष यूजर महिला प्रोफाइल पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेज देते हैं. उदयपुर पुलिस ने भी गिरोह तक पहुंचने के लिए महिला की प्रोफाइल पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी थी.

इस पर महिला ने खुद को समुद्री जहाज पर अधिकारी बताया था. पुलिस की उस महिला से कई दिनों तक फेसबुक पर चैटिंग चलती रही. 5 दिनों बाद महिला ने फेसबुक पर बताया कि उस के जहाज पर समुद्री डाकू आ गए हैं. उस के पास काफी डौलर, पौंड और भारतीय मुद्रा है. इस राशि को सुरक्षित रखने के लिए वह पार्सल के जरिए उस के पास भेज रही है.

आमतौर पर इस तरह की बात जान कर अधिकांश लोग लालच में तुरंत हामी भर देते हैं और अपना पता दे देते हैं. इस के बाद उस महिला के बजाय गिरोह के स्थानीय लोग उस से संपर्क करते हैं और कहते हैं कि विदेश से आप का पार्सल आया है. इस की कूरियर राशि खाते में जमा करवाइए और पार्सल ले लीजिए.
एक बार रकम जमा होने के बाद फिर किसी न किसी क्लीयरेंस के बहाने कई बार रकम मांगी जाती है और बैंक खातों में जमा कराई जाती है. आमतौर पर एक-दो बार रकम जमा कराने के बाद भी पार्सल नहीं मिलने पर सामान्य आदमी चुप बैठ जाता है और ठग गिरोह के सदस्य भी उस से संपर्क नहीं करते.

इस के अलावा यह गिरोह सोशल नेटवर्किंग साइट पर विभिन्न देशों के वीजा बनवाने का विज्ञापन देते हैं. किसी आदमी के संपर्क करने पर ये लोग फर्जी वीजा की कौपी स्कैन कर उस आदमी को भेज देते हैं और उस से मोटी रकम वसूल करते हैं.

फर्जी सिम के जरिए लौटरी निकलने का झांसा दे कर प्रोसैसिंग चार्ज के नाम पर रकम हड़पने और इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि पर ब्रांडेड इलैक्ट्रौनिक सामान एवं नामी कंपनियों के रेडीमेड कपड़े सस्ते दामों पर बेचने के नाम पर भी ये लोग ठगी करते हैं.

दोनों नाइजीरियन युवकों और मुंबई की उस महिला ने पूछताछ में मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, इंदौर, विशाखापत्तनम सहित विभिन्न शहरों के तमाम लोगों से ठगी करने का अपराध स्वीकार किया है. जांच में पता चला है कि नाइजीरियन युवक विक्टर उर्फ कैलविन और मुंबई निवासी महिला प्रेमादास सोनी 2 बार उदयपुर आ चुके हैं. पुलिस ने इन के होटलों में ठहरने के रिकौर्ड जब्त किए हैं. ये लोग उदयपुर में संदीप मोहिंद्रा और नरेश पंचाली से मिल कर औनलाइन ठगी से हासिल रकम का हिसाबकिताब करने आए थे.

पुलिस ने विक्टर उर्फ कैलविन से भारत में बना हैदराबाद का वोटर आईडी कार्ड भी बरामद किया है. उस ने फर्जी तरीके से यह कार्ड बनवा लिया था. जांच में यह भी पता चला है कि यह गिरोह उदयपुर में 3 साल पहले मर चुके सेक्टर 14 निवासी प्रकाश हेमनानी के बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहा था. प्रकाश हेमनानी के नाम वाले आईसीआईसीआई बैंक के 2 खातों एवं एक्सिस बैंक के एक खाते के जरिए औनलाइन ठगी की जा रही थी.

ऐसा नहीं है कि नाइजीरियन गिरोहों की इस तरह की ठगी का पहली बार पता चला है. ये लोग स्थानीय लोगों की मदद से कई सालों से अलगअलग तरीकों से ठगी कर रहे हैं. सन 2015 के दिसंबर महीने में देहरादून पुलिस ने दून की महिला से कूरियर के नाम पर 20 लाख रुपए की ठगी के आरोप में एक महिला और 2 नाइजीरियन युवकों को गिरफ्तार किया था.

पिछले साल यानी सन 2016 में नोएडा में पकड़े गए नाइजीरियन गैंग के सदस्य जार्ज मार्टिन उर्फ एवर रेवबे ने कई अपराध स्वीकार किए थे. उस ने अंबाला की महिला तेजेंद्र कौर से ब्रिटिश नागरिक बन कर 15.48 लाख रुपए की ठगी की थी. मार्टिन ने फेसबुक पर तेजेंद्र से दोस्ती कर के खुद को अरबपति बताया था. एक दिन मार्टिन ने मुंबई से वाट्सऐप पर टिकट भेज कर अपने इंडिया आने की बात कही.

13 अक्तूबर को उस ने मुंबई एयरपोर्ट पहुंचने की बात कह कर अंबाला आने की इच्छा जताई. इस के बाद नेहा गुप्ता नाम की महिला का फोन आया कि मार्टिन की कस्टम ड्यूटी में 38 हजार रुपए कम हैं. यह रकम तेजेंद्र कौर ने बताए गए खाते में जमा करा दी. इस के बाद मनी लौंड्रिंग केस का झांसा दे कर 2.80 लाख रुपए और इस के बाद 3.28 लाख रुपए एनओसी और अन्य बहानों से खातों में जमा कराए गए.
नोएडा पुलिस ने नवंबर, 2016 में 4 नाइजीरियन युवकों एवर रेवबे, ओग्वू एंटोनीख सिकेरु ताइवू व फ्रांसिस ओबी सहित 8 लोगों को गिरफ्तार किया था. चारों नाइजीरियन 3 महीने के टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे. वीजा खत्म होने पर ये लोग दिल्ली में छिप कर रह रहे थे. ये फर्जी मेल के जरिए उद्यमियों एवं कारोबारियों से करोड़ों की ठगी कर रहे थे.

– कथा में सुरभि बदला नाम है.

मोबाइल क्रांति के इस दुरुपयोग से आप भी बच नहीं पाएंगे

देश की मोबाइल क्रांति का असर घरघर पहुंच चुका है और परिवार के सदस्य अब आपस में बैठ कर बातें नहीं करते, अपनेअपने मोबाइल पर अल्फाबेट दबाते रहते हैं या फालतू के वीडियो देखते रहते हैं. अनजानों से बढ़ता प्रेम और अपनों से बढ़ती दूरी का कारण यह है कि मोबाइलों पर हर सैकंड कुछ न कुछ नया आता रहता है और यदि वह सैकंड छूट जाए तो आई बात हो सकता है या तो गायब हो जाए या फिर स्क्रीन से कहीं दूर चली जाए.

इस दौरान घर की समस्याएं पराई हो रही हैं और फालतू के इमोशनल स्लोगन अपने होते जा रहे हैं. जो लोग अपनी बात 4 जनों में कहते कतराते हैं कि शायद गलत न हो या कोई बुरा न मान जाए, मोबाइल पर बेधड़क हो कह डालते हैं. यह बात दूसरी है कि दूसरी तरफ वाले को अप्रिय बात उतनी ही गलत लगती है और बहुत से संबंध फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम के कारण बिगड़ रहे हैं.

आज मोबाइल क्रांति का भरपूर दुरुपयोग हो रहा है और गूगल, फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम लोगों की बेवकूफी से अरबों डौलर बना रहे हैं जैसे पहले सड़क पर यदाकदा आने वाले मदारी बनाया करते थे. अब यह बेवकूफी रातदिन चलती है और हर जगह चलती रहती है.

मोबाइल पर अपना कच्चा चिट्ठा खोल देना या दूसरे को पछाड़ देना अब आसान हो गया है, पर यह पारिवारिक संबंधों को तारतार कर रहा है. मोबाइल संपर्क साधने का सुगमसरल साधन जरूर है पर इस को संबंध बनानेबिगाड़ने की ताकत दे कर पूरी दुनिया ने अपना व्यक्तित्व ही खो डाला है.

जो आशा थी कि मोबाइल क्रांति के बाद तेजी से आर्थिक उन्नति होगी और भूख, धन, सुरक्षा, भय के इशू का हल आसानी से हो जाएगा, अब वह धूमिल हो गईर् है और इस में हर घर, हर गृहिणी, हर बच्चे का भी हाथ है. आतंकवादियों से ले कर शासकों तक की धौंसपट्टी के लिए मोबाइल क्रांति इसीलिए जिम्मेदार है, क्योंकि दोनों जानते हैं कि दुनिया भर के लोगों ने खुद को मोबाइलों की जंजीरों में पहले ही बांध लिया है. उन्हें तो अब जंजीर का दूसरा हिस्सा पकड़ाना है.

बंधे लोग कभी सुखी, सहज और हंसते परिवारों का निर्माण नहीं कर सकते. पिछली सदी में पुस्तकों के माध्यमों से जो नए विचार घरघर पहुंचे थे उन्हें मोबाइल क्रांति ने कुचल दिया है और कुचले लोग धर्म, शासकों और कट्टरपंथियों के इशारों पर नाचने को मजबूर हैं.

अब ब्लास्ट नहीं होगी आपके स्मार्टफोन की बैट्री

टेक्नालजी की दुनिया में दिन प्रतिदिन बदलाव हो रहे हैं. आज स्मार्टफोन्स को भी कई नई तकनीकों के साथ पेश किया जा रहा है. लेकिन फिर भी स्मार्टफोन यूजर्स को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

आए दिन स्मार्टफोन गर्म होकर ब्लास्ट होने की खबरें आती रहती हैं. बैट्री में आग लगने की वजह से फोन ब्लास्ट होती है. इसके कई अलग-अलग कारण बताए जाते हैं. कई लोग कहते हैं कि फोन की बैट्री ज्यादा गर्म होने से ब्लास्ट होती है. तो कई कहते हैं कि थर्ड पार्टी चार्जर से फोन चार्ज करने पर बैट्री फटती है. हालांकि, फोन की बैट्री को फटने से बचाया जा सकता है. यह बात वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पता लगाई है.

क्या कहते हैं वैज्ञानिक

वैज्ञानिकों के मुताबिक 10,000 गुना छोटे हीरे की मदद से लीथियम बैट्री में आग लगने से बचाया जा सकता है. यह बात वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में बताई है. इस प्रक्रिया को रिसर्चर्स और विशेषज्ञों ने पूरी तरह स्पष्ट किया है.

जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने पूरी प्रकिया के बारे में विस्तार से बताया कि नैनो डायमंड इलेक्ट्रोकेमिकल की मात्रा को कम कर देता है, जिससे लीथियम की बैट्री में शाट सर्किट होने की संभावना बहुत कम हो जाती है.

अमेरिका की यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर युरी गोगोत्सी ने बताया कि कि इस नई तकनीक को फिलहाल कम महत्वपूर्ण एप्लीकेशन में इस्तेमाल किया जाएगा. इसके बाद ही इसे मोबाइल और कार बैट्री में प्रयोग किया जा सकता है.

नई बैट्रियों में दी जाएगी इलेक्ट्रोलाइट की सुरक्षा

बैट्री फटने की घटना से बचने के लिए नई बैटरियों में इलेक्ट्रोलाइट की सुरक्षा दी जा सकती है. दो इलेक्ट्रोडों के बीच आयनों में इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया होने लगती है, जिससे इलेक्ट्रिकल करंट पैदा होता है.

इसी के जरिए बैट्री को चार्ज किया जा सकता है. रिसर्च की मानें तो मोबाइल की स्टोरेज एनर्जी बढ़ाने के लिए नैनो डायमंड इलेक्ट्रोलाइट साल्यूशन के जरिए डेंड्राइट फार्मेशन को बेहद कम कर देता है.

‘स्पैशल 26’ की तर्ज पर ठगी करने वाले गिरोह का हुआ भंडाफोड़

अब से करीब 4 साल पहले बौलीवुड की एक फिल्म रिलीज हुई थी ‘स्पैशल 26’. नीरज पांडे द्वारा निर्देशित इस फिल्म की स्टोरी समाज में घट रही घटनाओं को छूती हुई थी. अभिनेता अक्षय कुमार (अजय सिंह), अनुपम खेर (पी.के. शर्मा), किशोर कदम (इकबाल), राजेश शर्मा (जोगिंदर) आदि का एक गैंग था. यह गैंग फरजी सीबीआई अधिकारी बन कर लोगों के यहां रेड डालता था और वहां से माल ले कर फुर्र हो जाता था. इस गैंग ने असली पुलिस की नींद हराम कर रखी थी.

स्पैशल 26 की तरह दिल्ली में भी नकली पुलिस वालों ने एक के बाद एक वारदातें कर के दिल्ली पुलिस की नाक में दम कर दिया था. दिल्ली में यह नकली पुलिस वाले कहीं रेड वगैरह तो नहीं डालते थे, पर सड़क चलते लोगों को ये इतनी आसानी से ठग लेते थे कि उन्हें ठगी का अहसास घर पहुंचने के बाद होता था. पिछले एक साल में फरजी पुलिस वालों का यह गैंग करीब 70-80 वारदातों को अंजाम दे चुका था. सभी वारदातों में ठगी का तरीका एक जैसा था.

5 मार्च, 2017 की बात है. शक्ति नागपाल विवेक विहार स्थित अपने घर से निकली और मेनरोड से रिक्शा पकड़ कर मैट्रो स्टेशन जा रही थी. वह अभी कुछ दूर ही गई थी कि उस के पास एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस पर 2 युवक सवार थे. उन की कदकाठी ठीकठाक थी. उन्होंने रिक्शा रुकवाते हुए शक्ति नागपाल से कहा, ‘‘हम दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से हैं, आप को पता नहीं है कि कल यहां एक औरत की ज्वैलरी लूट ली गई थी. आप इस तरह ज्वैलरी पहन कर जाती हैं. और अगर आप के साथ कोई घटना हो जाती है तो परेशान पुलिस होगी.’’

यह सुन कर शक्ति नागपाल घबरा कर अंगुली में पहनी हीरे की अंगूठी और कलाई में पहनी सोने की चूडि़यों को देखने लगी. वह बोली, ‘‘मुझे तो बस यहीं कड़कड़डूमा मैट्रो स्टेशन तक जाना है.’’

‘‘देखिए मैडम, आप को जहां भी जाना है जाइए, लेकिन उस के पहले हिफाजत जरूरी है.’’ कह कर उस युवक ने सफेद रंग का एक कोरा कागज बैग से निकाल कर कहा, ‘‘आप अपनी सारी ज्वैलरी इस कागज पर रख दीजिए. इस में ज्वैलरी ले जाना आप के लिए सेफ रहेगा.’’

इस के बाद शक्ति नागपाल ने हाथों से सोने की चूडि़यां और हीरे की अंगूठी निकाल कर उस कागज पर रख दिया. वह व्यक्ति उस ज्वैलरी को कागज में लपेटते हुए उस से बात करने लगा. एकडेढ़ मिनट बाद उस ने कागज में लपेटी ज्वैलरी शक्ति नागपाल को देते हुए कहा, ‘‘मैडम, इस तरह से ज्वैलरी पहन कर मत निकला करो. आजकल जमाना बहुत खराब है. लो, अब इसे अपने पर्स में रख लो.’’

शक्ति नागपाल ने झट से कागज में लिपटी ज्वैलरी अपने पर्स में रखते हुए रिक्शे वाले से कहा, ‘‘चलो भैया, जल्दी चलो. देर हो रही है.’’

रिक्शा के आगे बढ़ते ही मोटरसाइकिल सवार युवक भी वहां से चले गए. शक्ति नागपाल उन पुलिस वालों का बारबार शुक्रिया अदा कर रही थी कि उन्होंने सही सलाह दी. साथ ही उस ने तय कर लिया कि अब वह हर समय आर्टिफिशियल ज्वैलरी ही पहना करेगी. असली ज्वैलरी का उपयोग किसी खास अवसर पर ही करेगी.

कड़कड़डूमा मैट्रो स्टेशन के पास पहुंच कर रिक्शे वाले को पैसे देने के बाद उस का मन अपनी ज्वैलरी देखने को हुआ. पर जैसे ही उस ने वह कागज खोला, उस के जैसे होश उड़ गए. उस कागज में उस की अपनी असली ज्वैलरी की जगह केवल आर्टिफिशियल चूडि़यां थीं.

शक्ति नागपाल को मैट्रो से जहां भी जाना था, वह वहां जाना भूल गई और तुरंत एक रिक्शा पकड़ कर उसी जगह पहुंच गई, जहां उसे पुलिस वाले मिले थे. लेकिन वे वहां नहीं मिले. शक्ति समझ गई कि उस के साथ ठगी की गई है. अब पुलिस में शिकायत करने के अलावा उस के पास कोई उपाय नहीं था.

इसी तरह 2 मार्च, 2017 को पूर्वोत्तर राज्य से एक दंपति करोलबाग आए. इसी तरह लुटेरों का भय दिखा कर मोटरसाइकिल सवार 2 युवकों ने खुद को दिल्ली पुलिस का बताया. उन्होंने विश्वास के लिए उस दंपति को पुलिस का आईडी कार्ड भी दिखाया. उन से भी उन्होंने एक सफेद कागज में हीरे की 2 अंगूठियां, सोने की 2 अंगूठियां, हीराजडि़त चूडि़यां, चेन रखवा लीं और हाथ की सफाई दिखाते हुए पलक झपकते ही दूसरे कागज में लिपटी आर्टिफिशियल ज्वैलरी पकड़ा कर उसे बैग में रखने को कहा.

इस के बाद वे वहां से चंपत हो गए. उस दंपति ने जब वह कागज खोल कर देखा तो उस में आर्टिफिशियल ज्वैलरी मिली. लाखों रुपए की ज्वैलरी ठगी जाने की उन्होंने भी थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

ओल्ड राजेंद्रनगर के रहने वाले 75 साल के मखीजा जी शाम के समय घर से बाहर घूमने के लिए निकले. वह भी उन फरजी पुलिस वालों की साजिश का शिकार हो गए. इसी तरीके से मोटरसाइकिल सवार 2 युवक उन की सोने की अंगूठी, कड़ा और सोने की चेन ले कर चंपत हो गए.

करोलबाग में तो कई वारदातों में ठगों ने 2 करोड़ रुपए से ज्यादा के गहनों की ठगी की थी. एक साल के अंदर दिल्ली में इसी तरह की ठगी की 78 वारदातें हो चुकी थीं. इन में से 38 वारदातें तो केवल पश्चिमी जिले में हुई थीं. सभी वारदातों में ठगों ने खुद को दिल्ली पुलिस का बताया था. वे नकली पुलिस वाले कभीकभी सफारी सूट में भी मिलते थे.

पुलिस के नाम पर हो रही इस तरह की ठगी की वारदातों से लोगों का दिल्ली पुलिस से विश्वास उठता जा रहा था. इस से पुलिस की छवि भी खराब हो रही थी. पुलिस आयुक्त ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने क्राइम ब्रांच के सभी सैक्शनों, समस्त जिलों के स्पैशल स्टाफ, एटीएस और यहां तक कि स्पैशल सेल को भी उन फरजी ठगों का पता लगाने के आदेश दिए.

पश्चिमी जिले में सब से ज्यादा 38 वारदातें इस तरह की ठगी की हुई थीं, इसलिए डीसीपी विजय कुमार ने अपने जिले के स्पैशल स्टाफ को इस काम पर पहले से ही लगा रखा था. एसीपी औपरेशन जगजीत सांगवान के नेतृत्व में स्पैशल स्टाफ की जो टीम इस मामले पर काम कर रही थी, उस में इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू, एसआई संदीप डबास, सुमेर सिंह, एएसआई दिलबाग सिंह, दीपेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल रूपेश कुमार, विकास कुमार, नवीन कुमार, कांस्टेबल सनी, योगेश, प्रदीप कुमार, अमित कुमार आदि शामिल थे.

टीम के पास उन ठगों में से किसी का न तो फोटोग्राफ था और न ही कोई फोन नंबर, जिस के सहारे उन तक पहुंचा जा सके. जिन लोगों के साथ ठगी की वारदातें हुई थीं, उन से उन का हुलिया जरूर पता लग गया था. ठगों ने पश्चिमी दिल्ली में ज्यादातर बुजुर्ग महिलाओं को ही अपना निशाना बनाया था.

इलाके में जिन जगहों पर वारदातें हुई थीं, वहां आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी, पर सफलता नहीं मिली. पुलिस टीम काम में जुटी थी, उसी दौरान इलाके में ठगी की एक और वारदात हो गई. 9 अप्रैल, 2017 को जे-5 ब्लौक राजौरी गार्डन की रहने वाली 74 वर्षीया रमेश कुमारी अपने पति सुभाषचंद्र शर्मा के साथ रिक्शे में बैठ कर राजौरी गार्डन के ही जे-3 ब्लौक जा रही थीं.

उन का रिक्शा मेनरोड पर कुछ दूर ही आगे बढ़ा था कि आगे खड़े 2 लड़कों ने उन का रिक्शा रुकवा लिया. उन में से एक ने अपना आईडी कार्ड दिखाते हुए खुद को दिल्ली पुलिस का कांस्टेबल बताया.

उस ने कहा, ‘‘माताजी, आप इस तरह सोने की चूडि़यां और अंगूठी पहन कर जा रही हैं, आप को नहीं पता कि कल यहां पर एक बड़ी वारदात हो गई है. बदमाशों ने एक महिला की चूडि़यां व अन्य ज्वैलरी लूट ली थी. सामने हमारे एसएचओ साहब खडे़ हैं. अपनी सुरक्षा के लिए आप को क्या करना है, वह खुद बता देंगे.’’ कह कर वह उस बुजुर्ग महिला और उस के पति को 20-25 कदम दूर खड़े 2 व्यक्तियों के पास ले गए. वे दोनों सफारी सूट पहने थे.

रमेश कुमारी को देखते ही सफारी सूट पहने व्यक्ति ने कहा, ‘‘माताजी, आजकल जमाना इतना खराब चल रहा है और आप ये ज्वैलरी पहन कर जा रही हैं. अब रास्ते में आप के साथ कोई वारदात हो जाएगी तो लोग तो यही कहेंगे कि पुलिस सीनियर सिटिजंस का खयाल नहीं रख रही. वारदात को बढ़ावा तो आप लोग देते हैं.’’

वह व्यक्ति एक पुलिस अधिकारी की तरह ही बुजुर्ग रमेश कुमारी से बात कर रहा था. उसी दौरान सामने से एक और राहगीर आता दिखा. उस के दाहिने हाथ में काले रंग का एक बैग था और वह गले में सोने की मोटी चेन पहने था. सफारी सूट पहनने वाले उसी व्यक्ति ने उस राहगीर को पुलिसिया अंदाज में रोक कर उस से पूछा कि वह कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है?

वह राहगीर समझ गया कि ये पुलिस वाले हैं, इसलिए उस ने अपने बारे में बता दिया तो उस सफारी सूट वाले ने कहा, ‘‘तुम्हें पता नहीं कि इधर का माहौल काफी खराब चल रहा है और तुम गले में ये मोटी चेन पहन कर जा रहे हो. यहां स्नैचिंग की कई वारदातें हो चुकी हैं, इसलिए बेहतर यही होगा कि इसे उतार कर रख लो.’’

इतना कह कर उस आदमी ने अपनी डायरी में रखा सफेद कागज निकाल कर कहा, ‘‘चेन इस में रख कर इसे बैग में रख लेना.’’

वह राहगीर डर गया, उस ने गले से सोने की चेन उतार कर उस सफारी सूट वाले को दे दी, जो खुद को दिल्ली पुलिस  का एसएचओ बता रहा था. कागज में चेन लपेट कर उस ने उस राहगीर को दे दी. राहगीर ने उसे अपने बैग में रख लिया और वहां से चला गया. उस समय बुजुर्ग महिला रमेश कुमारी वहीं खड़ी थीं.

एसएचओ ने उन से भी कहा, ‘‘माताजी, आप भी अपनी ज्वैलरी इस कागज पर रख दो, सेफ रहेगी.’’

उस के कहने पर रमेश कुमारी ने अपने हाथों में पहनी सोने की चूडि़यां और अंगुली से सोने की अंगूठी निकाल कर उस सफेद कागज पर रख दी. उस के बाद उस पुलिस वाले ने वह ज्वैलरी लपेट कर सुरक्षित रहने के बारे में बताया और कागज में लपेटी ज्वैलरी थैले में रखने को कहा.

थैले में ज्वैलरी रखने के बाद रमेश कुमारी पति के साथ चली गईं. रास्ते भर वह उस पुलिस वाले की तारीफ पति से करती रहीं, जिस ने उन की सुरक्षा का इतना खयाल रखा था.

घर पहुंचने के बाद रमेश कुमारी ने थैले से कागज में लपेटी ज्वैलरी निकाल कर देखी तो होश उड़ गए. क्योंकि उस कागज में उन की ज्वैलरी की जगह आर्टिफिशियल चूडि़यां रखी थीं. वह फटाफाट घर से निकलीं और पति के साथ रिक्शे में बैठ कर उसी जगह पहुंची, जहां उन्हें पुलिस वाले मिले थे. पर उस समय वहां कोई नहीं मिला.

अब वह समझ गईं कि उन के साथ धोखा हुआ है, वे लोग कोई पुलिस वाले नहीं, बल्कि ठग थे. वह सीधे थाना राजौरी गार्डन पहुंची और थानाप्रभारी को अपने साथ घटी घटना से अवगत करा दिया.

थानाप्रभारी समझ गए कि उन शातिर ठगों ने इस बुजुर्ग महिला को भी अपना निशाना बनाया है. बहरहाल, उन्होंने रमेश कुमारी की तहरीर पर अज्ञात ठगों के खिलाफ भादंवि की धारा 420 के तहत मामला दर्ज कर जांच एसआई विक्रम सिंह के हवाले कर दी. यह घटना पश्चिमी जिले में ही घटित हुई थी, इसलिए इस की जानकारी जब स्पैशल स्टाफ टीम को हुई तो टीम और ज्यादा अलर्ट हो गई.

टीम ने रमेश कुमारी से उन ठगों के हुलिया आदि के बारे में पूछताछ की. उन का हुलिया और काम करने का तरीका पहले घटित हो चुकी घटनाओं से मेल खा रहा था. लेकिन दिल्ली में अलगअलग जगहों पर लगातार वारदातें करने वाले ये लोग हैं कौन, इस बात का पता नहीं लग रहा था. कहीं यह मेवाती गैंग का काम तो नहीं है.

वैसे मेवाती गैंग इस तरह की वारदातें करता नहीं था, फिर भी पुलिस टीम ने मेवाती गैंग के कुछ लोगों को भी पूछताछ के लिए उठाया. काफी पूछताछ के बाद जब लगा कि वे निर्दोष हैं तो उन्हें छोड़ दिया गया.

इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू के लिए यह मामला किसी चुनौती से कम नहीं था. उन की टीम में एसआई संदीप डबास, सुमेर सिंह, एएसआई दिलबाग सिंह, दीपेंद्र सिंह जैसे तेजतर्रार पुलिस अधिकारी थे. ये सभी अपनेअपने स्तर से उन ठगों का पता लगाने में जुटे थे. इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू ने टीम के सभी सदस्यों के साथ एक मीटिंग की. करीब 2 घंटे तक चली इस मीटिंग में विस्तार से विचारविमर्श किया गया.

मीटिंग के बाद पुलिस एक बार फिर से इसी केस में जुट गई. सभी ने अपनेअपने मुखबिरों को भी अलर्ट कर दिया. एक मुखबिर से एसआई संदीप डबास को सूचना मिली कि ईरानी गैंग इस तरह की वारदातें करता है. उन्होंने इस लीड के बारे में इंसपेक्टर सुरेंद्र संधू को बताया. इंसपेक्टर संधू इसी लीड पर काम करने को हरी झंडी दे दी. एसआई संदीप डबास और सुमेर सिंह ईरानी गिरोह के बारे में जानकारी जुटाने लगे.

जांच में पता चला कि इस गिरोह का ताल्लुक मुंबई के ठाणे जिले से है. इस बारे में मुंबई पुलिस से संपर्क किया गया तो जानकारी मिली कि ईरानी गैंग ने मुंबई पुलिस की नाक में दम कर रखा था. अंबीवली थाने में इस गैंग के खिलाफ अनेक मामले दर्ज हैं. मुंबई क्राइम ब्रांच ने इस गैंग के 9 लोगों को सन 2015 में गिरफ्तार कर मकोका लगा कर जेल भेजा था. लेकिन गिरोह के सदस्य नासिर व जफर अब्बास अभी भी फरार हैं. मुंबई क्राइम ब्रांच ने यह भी बताया कि गैंग के फरार सदस्य दूसरे किसी शहर में हो सकते हैं. क्राइम ब्रांच दिल्ली पुलिस को ईरानी गैंग के बारे में जानकारी तो मिल गई, लेकिन फरार आरोपियों के कोई फोटोग्राफ वगैरह नहीं मिले.

दिल्ली में जिस तरीके से ठगी की वारदातें हो रही थीं, ठीक उसी तरह से ईरानी गैंग मुंबई में भी वारदातें करता था. मुंबई क्राइम ब्रांच पुलिस से मिली जानकारी के बाद इस बात की संभावना लगने लगी कि इन वारदातों में भी ईरानी गैंग का ही हाथ हो सकता है. पर यह पता नहीं लग पा रहा था कि यह सदस्य वारदात करने के बाद कहां चले जाते हैं. यानी वह दिल्ली में रह रहे हैं या एनसीआर में.

कभीकभी कुछ मामले पुलिस को उलझा देते हैं. इस मामले में पुलिस ने जो जांच की थी, उस से कुछ उम्मीद की किरण दिखाई तो दे रही थी, लेकिन अब समस्या यह हो गई थी कि जांच ऐसी जगह आ कर रुक गई थी, जहां से आगे बढ़ने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. यदि ईरानी गैंग के नासिर या उस के साथी का कहीं से फोटो मिल जाता तो जांच आगे बढ़ने में मदद मिल सकती थी. पर स्पैशल स्टाफ टीम ने हिम्मत नहीं हारी. टीम अपने स्रोतों से मिल रही सूचनाओं पर काम करती रही.

उसी दौरान एक मुखबिर ने एसआई संदीप डबास को ऐसी सूचना दी कि टीम में शामिल सभी सदस्यों के चेहरे पर मुसकान तैर गई. उस ने बताया कि ईरानी गैंग के कुछ लोग दक्षिणपूर्वी दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन के भोगल इलाके में रहते हैं. यह जानकारी बहुत महत्त्वपूर्ण थी. मुखबिर की सूचना के बाद पुलिस टीम ने जांच की तो पता चला कि मुंबई से भागा हुआ ईरानी गैंग का मुखिया नासिर उर्फ समीर अली भोगल इलाके में रहता है. यहां भी उस ने अपना एक गैंग बना रखा है. ये लोग मोटरसाइकिल और स्कूटी से वारदात के लिए निकलते हैं.

पुख्ता जानकारी मिलने के बाद स्पैशल स्टाफ टीम 14 अप्रैल, 2017 को भोगल में मसजिद लेन के पास मुस्तैद हो गई. दोपहर करीब 1 बजे मसजिद लेन पर 4 लोग आए. उन में से 2 मोटरसाइकिल पर और 2 स्कूटी पर थे. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया. उन में से एक के पास एक बैग था. बैग की तलाशी ली गई तो उस में एक आधार कार्ड, एक पैन कार्ड, कुछ आर्टिफिशियल ज्वैलरी और सफेद कागज मिले.

उन के पास जो टीवीएस कंपनी की जुपिटर स्कूटी और यामाहा मोटरसाइकिल थी, पुलिस ने उन के कागज दिखाने को कहा तो वे केवल मोटरसाइकिल के ही कागज दिखा पाए. पता चला कि वह स्कूटी चुराई हुई है.

पूछताछ में उन्होंने अपने नाम नासिर हफीज खान उर्फ समीर अली, शाह जमन सैय्यद उर्फ आशु, बरकत अली और जफर अब्बास अमजद शेख बताए. ये सभी मूलरूप से महाराष्ट्र के कल्याण इलाके की ईरानी बस्ती के रहने वाले थे और भोगल में मसजिद लेन पर स्थित एक मकान में किराए पर रहते थे. पुलिस ने उन से लूट की वारदातों के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

इस के बाद पुलिस उन सभी को स्पैशल स्टाफ औफिस ले गई. उन चारों ने स्वीकार किया कि उन्होंने दिल्ली के पश्चिमी जिले में ही नहीं, बल्कि और भी इलाकों में ठगी की वारदातों को अंजाम दिया था. ईरानी गैंग कौन है और ये लोग ठग कैसे बने, इस की एक अलग ही कहानी है.

बताया जाता है कि इन आरोपियों के पुरखे ईरान से ताल्लुक रखते थे. 15वीं और 16वीं सदी में गोलकुंडा के राजा ईरान के कुछ लोगों को बौडीगार्ड के तौर पर लाए थे. कदकाठी में लंबेतगड़े होने की वजह से ये राजा के बौडीगार्ड के रूप में तैनात रहते थे. रजवाड़े के बाद इन्होंने अपना ठिकाना मुंबई के ठाणे जिले में स्थित कल्याण क्षेत्र में बना लिया.

इन में से अनेक लोगों ने जरायम को अपना पेशा चुना. गैंग बना कर ये अपराध करने लगे. जिस से वहां पर ईरानी गैंग मशहूर हो गया. पिछले कुछ दिनों से इस गैंग ने फरजी पुलिसकर्मी बन कर राह चलते लोगों से ज्वैलरी ठगनी शुरू कर दी.

वहां जब ज्वैलरी ठगी की वारदातें बढ़ने लगीं तो पुलिस हरकत में आई. मुंबई क्राइम ब्रांच भी मामले की जांच करने लगी. सन 2015 में आखिर क्राइम ब्रांच ने ईरानी गैंग के 9 सदस्यों को गिरफ्तार करने में कामयाबी पाई. गैंग के 2 सदस्य नासिर और जफर अब्बास वहां से फरार हो गए.

ईरानी गैंग के जो 9 सदस्य क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किए थे, पुलिस ने उन्हें मकोका के तहत निरुद्ध कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. फरार नासिर और जफर अब्बास को अनेक संभावित जगहों पर तलाशा गया, पर उन का पता नहीं चल सका.

मुंबई से फरार होने के बाद नासिर और जफर अब्बास कुछ दिन तो इधरउधर घूमते रहे. उस के बाद वे दिल्ली चले आए. दिल्ली के भोगल इलाके में उन के कुछ जानकार रहते थे. वे भी उन के साथ रहने लगे. कहते हैं कि चोर चोरी भले ही छोड़ दे, पर हेराफेरी नहीं छोड़ता. यही हाल नासिर और जफर अब्बास का था. नासिर और जफर ने अपने साथियों शाहजमन उर्फ आशु और बरकत अली से बात की. ये दोनों भी मुंबई के कल्याण इलाके के अंबीवलि के रहने वाले थे.

फरजी पुलिस वाले बन कर राह चलते लोगों को इन्होंने ठगने की योजना बनाई. नासिर ने पुलिस का फरजी आईडी कार्ड बनवा रखा था. इस के अलावा उस ने एक प्रैस रिपोर्टर की भी फरजी आईडी बनवा रखी थी. ये चारों ऐसी सड़क पर खड़े हो जाते थे, जहां से पैदल और रिक्शे वाले गुजरते हों. इन में से 2 सफारी सूट पहने होते थे, जो खुद को पुलिस इंसपेक्टर बताते थे, जबकि 2 उन से कुछ दूर शिकार की तलाश में खड़े हो जाते थे.

ये अधिकतर ऐसी उम्रदराज महिलाओं को अपना शिकार बनाते थे, जो हाथों में या गले में सोने या हीरे की कोई ज्वैलरी पहने होती थीं. दोनों युवक खुद को पुलिस वाला बता कर शिकार के मन में डर पैदा करने के लिए कहते थे कि इस इलाके में ज्वैलरी लूट की घटना हुई है.

इस के बाद वे शिकार को अपने 2 अन्य साथियों के पास ले जाते थे. उन्हें वह अपना अधिकारी बताते थे. खुद को पुलिस अधिकारी बताने वाले गिरोह के ये सदस्य शिकार की ज्वैलरी उतरवा कर एक सफेद पेपर में रखने को कहते थे. उसी दौरान वे असली ज्वैलरी की जगह उसे नकली ज्वैलरी थमा देते थे. शिकार के वहां से जाते ही चारों फरार हो जाते थे. उस महिला को ठगी का तब पता चलता था, जब वह घर पहुंच कर अपने आभूषण देखती थी.

शिकार पर विश्वास जमाने के लिए कभीकभी गिरोह का एक सदस्य गले में सोने की चेन पहन कर उस समय सफारी सूट पहने हुए उधर से गुजरता था, जब वे किसी शिकार से बात कर रहे होते थे. फरजी एसएचओ बना उस का साथी उस सदस्य पर ऐसे रौब दिखाता था, जैसे वह असली एसएचओ हो. वह उस की चेन उतरवा कर कागज में रख कर दे देता था. इस से शिकार भी विश्वास में आ कर अपनी ज्वैलरी उतार देता था.

इस तरह इन लोगों ने दिल्ली के अलगअलग इलाकों में ठगी की वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया. नासिर शादीशुदा था, फिर भी उस ने भोगल इलाके की पिंकी नाम की एक लड़की से शादी कर ली थी. चुराई गई ज्वैलरी को बेचने की जिम्मेदारी पिंकी की थी. पूछताछ में इन्होंने बताया कि वे दिल्ली और एनसीआर में कितनी वारदातें कर चुके हैं, इस का उन्हें भी पता नहीं है.

पुलिस ने 15 अप्रैल, 2017 को चारों अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अजय कुमार मलिक की कोर्ट में पेश कर नासिर और आशु का 3 दिनों का पुलिस रिमांड मांगा. कोर्ट ने नासिर और आशु को 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया तथा बरकत अली और जफर अब्बास को न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

पुलिस ने नासिर की निशानदेही पर भोगल रोड, जंगपुरा के ज्वैलर राहुल वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. उस का सोनी ज्वैलर्स के नाम से ज्वैलरी शोरूम था. वह इन ठगों से ज्वैलरी खरीदता था. ज्वैलर राहुल से पुलिस ने सोने की एक अंगूठी बरामद की थी. वह अंगूठी वृद्ध महिला रमेश कुमारी से ठगी गई थी. राहुल वर्मा को भी पुलिस ने कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

शातिर ठगों को गिरफ्तार करने की  सूचना दिल्ली पुलिस ने ठाणे जिले के कल्याण थाना पुलिस को दे दी थी. चूंकि कल्याण पुलिस को भी मकोका में वांछित नासिर और जफर अब्बास की तलाश थी, इसलिए खबर मिलते ही कल्याण थाने के एपीआई श्रीशैल शेट्टी और हैडकांस्टेबल सुनील जाधव दिल्ली पुलिस के स्पैशल स्टाफ औफिस पहुंच गए. लेकिन तब तक अभियुक्तों को जेल भेजा जा चुका था.

वे उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर ले जाना चाहते थे. पर दिल्ली के केसों की टीआईपी से पहले उन्हें उन का ट्रांजिट रिमांड नहीं मिला, लिहाजा कल्याण पुलिस को बैरंग लौटना पड़ा.

इन शातिर ठगों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम की डीसीपी विजय कुमार ने काफी सराहना की. मामले की तफ्तीश एसआई सुमेर सिंह कर रहे हैं.?

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

यह कैसी हठधर्मिता : पर्यावरण के नाम पर धार्मिक पोंगापंथी सा रवैया

पेड़ जीवन के लिए आवश्यक हैं पर उन के कहीं भी उग आने पर उन्हें सदा के लिए राम, अंबेडकर की मूर्तियों या मजारों की तरह मान लेना और काटने पर हल्ला मचाना गलत है. दिल्ली के प्रगति मैदान में लगभग 1500 पेड़ 30-40 सालों से हैं पर अब पूरे इलाके को नए सिरे से बनाने के लिए उन्हें काटना जरूरी है, तो इस पर भरपूर हल्ला मचाया जा रहा है. इसी तरह दिल्ली की एक सड़क चौड़ी तो हो गई पर वहां दसियों पेड़ बीच में अडे़ हैं और लोग उन्हें बचाने की जिद कर रहे हैं.

घर के बाहर या आंगन में पेड़ लगाना हजारों सालों से परंपरा के रूप में चल रहा है पर जरूरत पड़ने पर अगर पेड़ के काटने पर रोक लग गई तो लोग नए पेड़ लगाने बंद कर देंगे. पेड़ तभी तक लगाए जाएंगे जब तक मानव के लिए सुख देंगे. यदि उन्हें आराध्य या प्रकृति के लिए अनिवार्य मान कर जबरन थोपा जाएगा तो लोग उन्हें लगाना ही छोड़ देंगे.

पीपल के पेड़ों को काटने पर धार्मिक रोक है और इसलिए लोग इन्हें कम से कम लगाते हैं और ये दिखते हैं तो केवल इसलिए कि ये अपनेआप कहीं भी उग जाते हैं. पेड़ों की रक्षा जरूरी है और नए पेड़ लगाने भी जरूरी हैं पर उन्हें आवश्यकता के अनुसार हटाने की सुविधा भी होनी चाहिए. पेड़ इतने जरूरी हैं कि चीन पूरा एक शहर ही इस तरह का बनवा रहा है जिस में हर मंजिल पर भी पेड़ लगाने का प्रबंध है और

30 हजार की आबादी लगेगी कि एक जंगल में रह रही है. यह तभी संभव है जब पेड़ों के बारे में हठधर्मी बंद हो.

देश में आज भी लकड़ी की कमी है और इसीलिए पेड़ गरीबों द्वारा खूब काटे जाते हैं पर उन पर तो यह प्रतिबंध भी लागू नहीं होता. वे रातोंरात पेड़ का सफाया कर देते हैं. स्लमों में पेड़ न के बराबर दिखेंगे, क्योंकि उन्हें काट कर खाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है और फिर गरमियों में लोग भट्ठी में रहते हैं. यह समझ का अभाव है जिस के पौधे हरेक के मन में लगाने सड़कों या कालोनियों के पेड़ों को बचाने से ज्यादा जरूरी हैं.

पर्यावरण के नाम पर धार्मिक पोंगापंथी सा पैतरा अपना लेना मूर्खता है. यह पर्यावरण के लिए हानिकारक है. शहरों का विकास होगा तो पेड़ कटेंगे ही. हां, उन की जगह नए भी लगेंगे. कोई शहर, कालोनी या मकान अच्छा तभी लगता है जब पेड़ हों. आदमी पेड़ का दुश्मन तब बनता है जब बेवकूफ हो.

आवाज और अंदाज ही मेरी पहचान : देवी

भोजपुरी गायकी में देवी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने भोजपुरी के पारंपरिक व आधुनिक गीतों को गाने में एक अलग ही मुकाम हासिल किया है.

उन के पहले भोजपुरी अलबम ‘पुरवा बयार’ ने लोकप्रियता के सारे रिकौर्ड तोड़ दिए थे. बिहार के छपरा जिले की रहने वाली देवी के मांबाप दोनों ही प्रोफैसर हैं. उन्होंने देवी के हुनर को पहचाना और उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया. पेश हैं, देवी से हुई बातचीत के खास अंश:

आप ने 5 साल की उम्र में गाना शुरू कर दिया था. आप का पहला अलबम कब आया था?

जब मैं ने 5 साल की उम्र में घर में पहली बार गीत गाया था, तब मेरे मांबाप को लगा था कि मैं गायकी में अपना कैरियर बना सकती हूं. मेरे पापा ने मुझे बचपन से ही शास्त्रीय संगीत की तालीम घर पर दिलवाई. जब मैं गाती थी, तो आसपास और स्कूल के लोग अपनी सुधबुध खो कर मेरे गीत सुनते थे.

नतीजतन, मेरे मांबाप ने मुझे अपना अलबम निकालने के लिए कहा. मैं पहली बार साल 2002 में दिल्ली आई थी. वहां मैं ने सैकड़ों म्यूजिक कंपनियों में अपना अलबम निकलवाने के लिए बात की थी, लेकिन मेरे गीतों की सादगी के चलते कोई भी म्यूजिक कंपनी रिस्क नहीं लेना चाहती थी. आजकल एक चलन है कि बिकना जरूरी है. इस के लिए लोग भोजपुरी की मिठास को बेहूदगी की हद से भी आगे ले जाने में गुरेज नहीं कर रहे हैं. ऐसे हालात में एलटीटी नाम की एक म्यूजिक कंपनी ने बहुत ही छोटे बजट में मेरे पहले अलबम ‘पुरवा बयार’ के लिए हामी भरी.

इस अलबम ने बाजार में आते ही लोकप्रियता के सारे रिकौर्ड तोड़े थे. आप के सुपरहिट गीत कौनकौन से रहे हैं?

वैसे तो मेरे गाए सभी गीतों को मेरे श्रोताओं और प्रशंसकों ने हाथोंहाथ लिया है, पर मेरे कुछ गीत बेहद लोकप्रिय रहे, जिन में ‘अईले मोर राजा’, ‘यारा’, ‘बावरिया’, ‘अंखियां से अंखियां मिला के’ खास हैं.

आप ने भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्रा के गीतों को भी अपनी आवाज दी है. आप को कैसा महसूस हुआ?

भोजपुरी गीतों के लिए भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्रा ने जो योगदान दिया है, वह आज तक किसी भी गीतकार ने नहीं दिया है.

उन्होंने पारंपरिक व सामाजिक मुद्दों पर गीत लिखे, जो आज भी सब से ज्यादा पसंद किए जाते हैं. मेरे लिए उन के लिखे गीत गाना गर्व की बात है.

भोजपुरी गायन में गायक से नायक बनने की परंपरा रही है, फिर भी आप ने भोजपुरी फिल्मों से दूरी बनाए रखी. क्यों?

मेरे पास भोजपुरी फिल्मों के बहुत से औफर आए, लेकिन भोजपुरी फिल्मों में शब्दों के चयन के चलते मैं ने काम करने से मना कर दिया. इस के बावजूद मैं अच्छे गाने गा कर लोगों के दिलों पर राज कर रही हूं.

आप ने एक हिंदी फिल्म भी बनाई, साथ ही कई हिंदी फिल्मों में गाने भी गाए. क्या आगे भी किसी हिंदी फिल्म को बनाने पर विचार चल रहा है?

मैं ने ‘जलसाघर की देवी’ नाम से फिल्म बनाई, जिस में गाए गीतों को मैं ने अपनी आवाज भी दी और खुद ही ऐक्टिंग भी की है. इस फिल्म में रवींद्र जैन ने संगीत दिया था, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया.

सामाजिक बुराइयों को ले कर भी आप ने कई गीत गाए हैं. इस का विचार कहां से आया?

हमारे समाज में बाल विवाह, दहेज प्रथा, अशिक्षा जैसी कई बुराइयां हैं. ऐसे में गीतसंगीत इन बुराइयों को दूर करने का एक अच्छा जरीया भी माना जा सकता है. इसीलिए मैं ने भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्रा के लिखे गीतों को गाया.

सुना है कि आप ने एक म्यूजिक आश्रम भी बनाया है?

जी हां, आप ने बिलकुल ठीक सुना है. मैं ने शास्त्रीय गीतसंगीत के साथसाथ भारतीय परंपराओं, लोक गायन और साफसुथरे भोजपुरी गायन के लिए ऋषिकेश में देवी म्यूजिक आश्रम बनाया है, जहां देशविदेश से लोग संगीत सीखने आते हैं.

नासमझी बनी बर्बादी : घर की दौलत और इज्जत के साथ खेल रहा था नौकर

शराब को भले ही सामाजिक बुराई माना जाता हो, लेकिन देश में शराब का अरबों का कारोबार चलता है. शाम ढलते ही शहरों के मयखानों, बार और नाइट क्लब आबाद होने लगते हैं.  शाम के तकरीबन साढ़े 7 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में नौचंदी थाना क्षेत्र के सूरजकुंड स्थित एक कैंटीननुमा मयखाने में शराब पीने वालों की भीड़ लगनी शुरू हो चुकी थी.

लोग मेजों पर खानेपीने का सामान सजाए बैठे थे. किनारे की एक मेज पर आमनेसामने 2 युवक बैठे शराब की चुस्कियां ले रहे थे. तभी अचानक 2 युवक उन के पास आ कर खड़े हो गए. उन के हाथों में पिस्तौलें थीं. उन में से एक युवक हवाई फायर करते हुए चिल्लाया, ‘‘अगर किसी ने भी शोरशराबा किया या भागा तो जिंदा नहीं बचेगा.’’

युवक की इस हरकत से वहां का माहौल दहशतजदा हो गया. लोग सकते में आ गए. कोई कुछ समझ पाता उस से पहले ही दोनों युवकों में से एक ने आमनेसामने बैठे युवकों में से एक ने उस के सिर, सीने और पेट को निशाना बना कर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही युवक कुरसी पर लुढ़क गया.

इस के बाद दोनों युवक चले गए. टेबल पर रखा उस युवक का मोबाइल भी वे अपने साथ ले गए थे. गोलियां चलने से वहां अफरातफरी मच गई थी. किसी ने छिप कर जान बचाई तो किसी ने भाग कर. मृत युवक के साथ बैठा युवक भी भाग खड़ा हुआ था.

इसी बीच किसी व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दे दी थी. वारदात की सूचना पा कर पुलिस भी वहां पहुंच गई. निरीक्षण में पता चला युवक मर चुका है. पूछताछ में जानकारी मिली कि दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से आए थे. उन्होंने मृतक पर करीब 25 राउंड गोलियां चलाई थीं. मारा गया युवक अपने साथी के साथ पल्सर मोटरसाइकिल नंबर यूपी-15 बीए-4351 से आया था, जो बाहर खड़ी थी.

घटनास्थल से पुलिस को कारतूस के कई खोखे मिले. मृतक की शिनाख्त तुरंत नहीं हो सकी. उस के सीने, पेट और सिर पर 10 से ज्यादा गोलियों के निशान थे, लेकिन वहां किसी अन्य व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई थी. इस का मतलब हमलावर सिर्फ उसे ही मारने आए थे. जिस तरह उस पर गोलियां चलाई गई थीं, इस का मतलब था कि हत्यारे उसे किसी भी कीमत पर जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे. पुलिस को मृतक की जेबों की तलाशी में एक पर्स मिला, जिस में मिलें कागजों के आधार पर उस की शिनाख्त जुहेब आलम उर्फ साहिल खान के रूप में हुई. पुलिस ने पर्स में मिले पते पर उस की हत्या की सूचना दी तो थोड़ी देर में उस के घर वाले रोतेबिलखते हुए वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक जुहेब शहर के ही थाना लालकुर्ती क्षेत्र के मैदा मोहल्ला स्थित जफर बिल्डिंग में रहने वाले सुलतान का बेटा था.

उस के 2 भाई और थे, जुहेब एमबीए था और करीब 5 सालों से हापुड़ रोड स्थित कीर्तिका पब्लिकेशन में बतौर एकाउंटैंट नौकरी करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे तक ही घर लौट पाता था.

जिस तरह उस की हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि उस की किसी से गहरी रंजिश थी. पुलिस ने उस के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी जुहेब या परिवार की रंजिश होने से साफ मना कर दिया. लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी, क्योंकि कोई तो वजह थी, जिस के चलते उस का कत्ल किया गया था.

पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल से भी पूछताछ की. उन्होंने भी अपनी जानकारी में जुहेब की किसी से रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. उन्होंने बताया था कि उस दिन जुहेब शाम करीब साढ़े 6 बजे उन के यहां से निकला था. कैंटीन में उस के साथ गया दूसरा युवक कौन था, इस की जानकारी पुलिस को नहीं मिल सकी. कत्ल का राज उस युवक के सीने में दफन हो सकता था.

यह 20 फरवरी, 2017 की घटना थी. इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ और एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने घटना के खुलासे के लिए डीएसपी विकास जायसवाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. जिस में थानाप्रभारी मोहन सिंह, सबइंसपेक्टर अफसर अली, हैडकांस्टेबल धर्मराज, कांस्टेबल सतीश और राकेश को शामिल किया गया.

पुलिस के हाथ ऐसा कोई सबूत नहीं लगा, जिस से कत्ल का राज खुल पाता. सभी पहलुओं पर गौर किया गया तो सुई मृतक के मोबाइल पर जा कर अटक गई. हत्यारे जुहेब का मोबाइल फोन अपने साथ ले गए थे. मतलब उस के मोबाइल में कोई गहरा राज छिपा था. यह मामला प्रेमप्रसंग का लग रहा था, अगले दिन पुलिस ने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की छानबीन से पता चला कि जुहेब का नोएडा की रहने वाली किसी युवती से संबंध था. दोनों की अकसर बातें होती रहती थीं. युवती दूसरे संप्रदाय की थी. पुलिस की एक कड़ी मिली तो उस ने जांच आगे बढ़ाई. हत्या की वजह यह प्रेमप्रसंग भी हो सकता था. संभवत: मोबाइल फोन में युवती के फोटोग्राफ रहे होंगे, इसीलिए हत्यारे उसे अपने साथ ले गए थे. एक पुलिस टीम नोएडा गई और उस ने युवती को खोज निकाला.

पूछताछ में पता चला कि युवती और जुहेब का संपर्क सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए हुआ था. बाद में दोनों में बातें होने लगी थीं. जुहेब उस से मिलने नोएडा भी जाया करता था. इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो युवती का अलग संप्रदाय की होने की वजह से खासा हंगामा हुआ.

फरवरी के पहले सप्ताह में जुहेब नोएडा गया तो युवती के घर वालों ने उसे काफी डांटाफटकारा. जुहेब ने उस वक्त भविष्य में उस से किसी तरह का संबंध न रखने का वादा किया. लेकिन वह उस से संबंध तोड़ नहीं सका. इन सब बातों से पुलिस को युवती के घर वालों पर शक हुआ. बेटी के संबंधों से नाराज हो कर वे हत्या करा सकते थे.

पुलिस ने उन से गहराई से पूछताछ की, लेकिन उम्मीदों पर तब पानी फिर गया, जब उन्होंने जुहेब को डांटने फटकारने की बात तो स्वीकारी, लेकिन हत्या में किसी भी तरह का हाथ होने से मना कर दिया. तथ्यों की कसौटी पर उन के बयान खरे पाए गए तो पुलिस खाली हाथ लौट आई.

पुलिस ने अपना ध्यान जुहेब के मोबाइल फोन पर केंद्रित किया. पुलिस यह जान कर हैरान रह गई कि वह अपने मोबाइल में 3 सिमकार्ड का इस्तेमाल करता था. पुलिस ने उस के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की दोस्ती कई लड़कियों और महिलाओं से थी. एक चौंकाने वाली बात यह पता चली कि उस की जिस नंबर पर सब से अधिक बातें होती थीं, वह पब्लिकेशन हाउस की मालकिन का था. पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल की पत्नी नेहा (परिवर्तित नाम) से पूछताछ की.

नेहा ने बताया कि चूंकि उन का ज्यादातर काम जुहेब ही संभालता था इसीलिए उस की जुहेब से अकसर बातें होती थीं. पुलिस उस के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई, क्योंकि दोनों के बीच देर रात तक लंबीलंबी बातें होती थीं. इस का राज नेहा ही बता सकती थी. इस का मतलब कुछ ऐसा जरूर था, जिसे नेहा छिपा रही थी. पुलिस ने 3 अन्य महिलाओं से भी पूछताछ की,   जिन से जुहेब की बातचीत होती थी.

इस के बाद पुलिस को शक हुआ कि जुहेब की हत्या के तार अग्रवाल परिवार से ही जुड़े हैं. पुलिस अभी तक जुहेब के उस साथी तक नहीं पहुंच सकी थी, जिस के साथ वह उस दिन शराब पी रहा था. वह कातिलों से मिला हुआ भी हो सकता था. संभव था कि उसे योजना बना कर वहां लाया गया हो और हत्यारों को इस की सूचना दे दी गई हो.

पुलिस ने रास्तों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई तो एक फुटेज में जो युवक उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठा नजर आया, उस की पहचान असब उर्फ बिट्टू के रूप में हुई. वह पब्लिकेशन हाउस में बतौर ड्राइवर नौकरी करता था. खास बात यह थी कि घटना के बाद उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था.

अब तक अग्रवाल परिवार पूरी तहर शक के घेरे में आ गया था. अपनी मालकिन से नजदीकियां जुहेब की हत्या की वजह हो सकती हैं, यह सोच कर पुलिस ने अमित अग्रवाल से पूछताछ की. लेकिन उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस ने नेहा के युवा बेटे मयंक अग्रवाल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय उस का मोबाइल फोन बंद था, जबकि सीसीटीवी फुटेज के हिसाब से वह पब्लिकेशन के औफिस में ही था.

घटना के समय मोबाइल का बंद होना संदेह पैदा करता था. पुलिस ने जुहेब के कई दोस्तों से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि जुहेब की नेहा से न केवल खासी नजदीकियां थीं, बल्कि वह उस पर काफी मेहरबान रहती थी.

आखिर 24 फरवरी को पुलिस ड्राइवर असब तक पहुंच ही गई. उसे कस्टडी में ले लिया गया, साथ ही पुलिस ने पूछताछ के लिए मयंक अग्रवाल को भी कस्टडी में ले लिया. दोनों से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो ऐसा सच समने आया, जिसे जान कर पुलिस हैरान रह गई. महत्वाकांक्षी जुहेब जल्दी से जल्दी आगे बढ़ने की चाहत में बड़ी भूल कर बैठा था. वह घर की इज्जत और दौलत, दोनों से खेल रहा था. उस का यही खेल उस की जान पर भारी पड़ा.

अगले दिन पुलिस ने प्रैसवार्ता कर के पूरे मामले का खुलासा कर दिया. दरअसल, पब्लिकेशन हाउस में नौकरी के दौरान जुहेब की नेहा से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस की भी एक वजह थी. अमित अग्रवाल काम के सिलसिले में अकसर शहर से बाहर आतेजाते रहते थे. बेटा बाहर रह कर पढ़ रहा था. ऐसे में औफिस की जिम्मेदारी नेहा संभालती थी. यही नहीं, पब्लिकेशन के कागजों के अनुसार, मालकिन भी वही थी. वह आजादखयाल महिला थीं, जबकि जुहेब महत्त्वाकांक्षी और लच्छेदार बातों का बाजीगर था.

उस का यही अंदाज नेहा को भा गया. दोनों की उम्र में करीब 20 साल का फासला था. लेकिन आगे बढ़ने की ललक में जुहेब ने उम्र का फासला नजरअंदाज कर दिया था. वह जानता था कि कंपनी की असली मालकिन नेहा है, इसलिए मजे से नौकरी करने और आगे बढ़ने के लिए नेहा को अपने पक्ष में करना जरूरी है.

नेहा जितनी ज्यादा मेहरबान होगी, उस की जिंदगी में उतनी ही खुशियां आएंगी. यही सब सोच कर वह नेहा पर डोरे डालने लगा. उस की बातों में नेहा को भी रस आने लगा था. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में जुहेब नेहा का दिल जीतने में कामयाब हो गया.

जुहेब ने चालाकी दिखाई थी, लेकिन नेहा को तो समझदारी दिखाते हुए सतर्क हो जाना चाहिए था. पर वह खुद भी अंजाम की परवाह किए बिना उस के रंग में रंगने लगी थी. दोनों की बातें और मुलाकात रोज होती ही होती थी. इस के अलावा वे फोन पर भी बातें और चैटिंग करने लगे. भूल कुछ पलों के निर्णय पर निर्भर होती है. गलत निर्णयों के नतीजे बाद में कितने अच्छे और बुरे निकलेंगे, इस बात को पहले कोई नहीं सोचता. एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. इस के बाद यह आए दिन का सिलसिला बन गया.

समय अपनी गति से चलता रहा. अमित को दोनों की नजदीकियों पर शक हुआ. जुहेब का आचरण उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने उसे नौकरी से निकालने का प्रयास किया. लेकिन हर बार नेहा ढाल बन कर खड़ी हो गई.

कहते हैं कि अनैतिक संबंध छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब सब को यकीन हो गया कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध हैं तो परिवार कलह का अखाड़ा बन गया. बात बढ़ती देख नेहा ने वादा किया कि वह अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कुछ दिनों की खामोशी के बाद दोनों फिर से मिलनेजुलने लगे, उन की राह गलत है, दोनों ही जानते थे, लेकिन अपने संबंधों को वे प्यार का नाम दे कर खुश थे. जुहेब की वजह से एक हंसतेखेलते परिवार में तूफान उठ खड़ा हुआ था. उसे ले कर घर में हमेशा तनाव रहने लगा था. अमित ने कई बार जम कर विरोध किया लेकिन जब स्थितियों में परिवर्तन नहीं आया तो एक दिन उन्होंने आत्महत्या के इरादे से अपने हाथ की नसें काट लीं. लेकिन समय से मिले उपचार की वजह से उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा.

जुहेब और नेहा, दोनों ही बदलने को तैयार नहीं थे. नेहा की मेहरबानियों का असर यह हुआ कि जुहेब की न सिर्फ तनख्वाह बढ़ती गई, बल्कि उस का ओहदा भी बढ़ता गया. एक साल पहले की बात है.

नेहा का बेटा मयंक एमबीए की पढ़ाई कर के घर लौट आया और उस ने बिजनैस संभालना शुरू कर दिया. वह दूर था तो उसे कुछ पता नहीं था. लेकिन घर आ कर उसे वे बातें भी पता चलने लगीं जो नहीं पता चलनी चाहिए थीं. सब कुछ जान कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई, वह जुहेब से नफरत करने लगा.

मयंक ने जुहेब की कई गलतियां पकड़ीं. जुहेब एकाउंटैंट था. हिसाबकिताब की सभी बारीकियां उस के हाथों में थीं. उस की नजर में जुहेब कंपनी को चूना लगा रहा था. उस ने नेहा से उस की शिकायतें कीं, लेकिन वह एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती थी. एक दिन मयंक ने अपनी मां से इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा, ‘‘जब आप को पता है कि जुहेब गलत है और वह कंपनी को चूना लगा रहा है तो उसे हटाने में क्या बुराई है? मैं उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता.’’

‘‘चाहती तो मैं भी यही हूं, लेकिन…’’ नेहा ने अपनी बात अधूरी छोड़ी तो मयंक ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘तुम जानते हो कि कंपनी का सारा काम उसे पता है. लेनदारियां भी उसे मालूम हैं. उसे हटाया गया तो कंपनी को काफी नुकसान हो सकता है. तुम पूरी तरह काम संभाल लो, उस के बाद उसे बाहर कर देंगे.’’

मां की बात सुन कर मयंक सोच में पड़ गया. एक हद तक उन की बात ठीक भी थी. कई सालों में जुहेब कंपनी के हिसाबकिताब की सभी बारीकियां जान गया था. नेहा की तरफ से उसे मिली छूट का ही नतीजा था कि वह बड़े हिसाब अपने हाथों में रखता था.

पूछने या कहने पर भी वह मयंक या उस के पिता को हिसाब नहीं देता था. बात भी उतनी ही बताता था, जितनी वह जरूरी समझता था. जोर देने पर वह मयंक के साथ मारपीट करने तक पर उतारू हो जाता था.

मयंक को शक था कि उस ने कंपनी में लाखों का घोटाला किया है. ऐसे में मयंक की तिलमिलाहट और बढ़ गई. जुहेब शानदार लाइफ स्टाइल में जीता था. एक दिन नेहा के मोबाइल में मयंक ने जुहेब की चैटिंग देख ली. दोनों की बातें शर्मसार करने वाली थीं. मयंक खून का घूंट पी कर रह गया. सब कुछ जान कर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा था.

घर में आए दिन झगड़ा होता रहता था. जुहेब के प्रति मयंक के मन में नफरत तो थी ही, यह नफरत तब और बढ़ गई जब नेहा ने उसे गिफ्ट में स्कूटी दी. मयंक को लगा कि अगर वक्त रहते उस ने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं, जब जुहेब उस के परिवार को न सिर्फ बर्बाद कर देगा, बल्कि बिजनैस पर भी कब्जा कर लेगा.

इज्जत और दौलत की बर्बादी वह अपनी आंखों से देख रहा था. उसे लगा कि जब तक जुहेब का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया जाएगा तब तक मां सुधरने वाली नहीं है. आखिर उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया.

मयंक का एक मौसा था राजू उर्फ किशनपाल. वह मुजफ्फरनगर जिले के थाना रामराज क्षेत्र के गांव देवल का रहने वाला था. वह आपराधिक और दबंग प्रवृति का था. मयंक ने सारी बातें उसे बता कर जुहेब को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने को कहा तो वह बोला, ‘‘झगड़े की जड़ जुहेब को हटाने के लिए पेशेवर लोगों का इंतजाम करना होगा.’’

‘‘जो उचित लगे, आप करें जितना भी खर्चा होगा, मैं देने को तैयार हूं.’’ मयंक ने कहा.

राजू की पहचान ऐसे कई लोगों से थी, जो पैसे ले कर हत्या करते थे. उस ने मेरठ के शास्त्रीनगर के रहने वाले सारिक और नदीम से बात कर के उन्हें जुहेब की हत्या के लिए तैयार कर लिया. इस के बाद सभी ने मिल कर हत्या की योजना बना डाली.

योजना के तहत 20 फरवरी की सुबह राजू मेरठ आ कर मयंक से मिला. मयंक जानता था कि जुहेब और असब के बीच दोस्ती है, इसलिए उस ने असब को भी योजना में शामिल करने का फैसला किया. उस ने असब को औफिस से बाहर बुलवाया और उसे रुपयों का लालच दे कर अपने साथ शामिल कर लिया. तय हुआ कि असब जुहेब को सही ठिकाने पर ले कर जाएगा और फोन कर के राजू को इस बारे में बताएगा.

योजनानुसार राजू शूटरों के पास चला गया. सारिक और उस के साथी के पास पहले से ही हथियार थे. दिन में असब ने जुहेब से शाम को पीनेपिलाने की बात कही तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

शाम को दोनों मोटरसाइकिल से शराब के ठेके पर पहुंचे तो असब ने फोन कर के राजू को सटीक जानकारी दे दी. इस के बाद राजू शूटर सारिक और नदीम के साथ वहां पहुंचा और चालाकी से जुहेब की पहचान करा दी. इस के बाद उन्होंने वारदात को अंजाम दे दिया.

असब वहां से निकला और बाहर आ कर राजू तथा शूटरों से मिला. शूटरों ने उसे एक पिस्टल छिपा कर रखने के लिए दी और खुद चले गए. असब भी अपने मोबाइल का स्विच औफ कर के घर चला गया.

मयंक ने सोचा था कि योजनाबद्ध तरीके से काम करने की वजह से पुलिस इस मामले में उलझ कर रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. जुहेब और नेहा की नासमझी से 2 परिवारों पर मुसीबत आ गई. जुहेब को अपनी जान गंवानी पड़ी तो नेहा के बेटे मयंक को जेल जाना पड़ा. समय रहते अगर दोनों सुधर गए होते तो यह नौबत नहीं आती.

असब की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त 32 बोर का पिस्टल और कारतूस बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों में से किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. फरार आरोपियों की सरगर्मी से तलाश जारी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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