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पहले फिल्मों के लिये भटके, अब पसंद आने पर फिल्मों में करते हैं काम

अपनी बेहतरीन अभिनय के लिए नेशनल अवौर्ड जीत चुके एक्‍टर राजकुमार राव अपनी पिछली फिल्‍म ‘बरेली की बर्फी’ के लिए खूब तारीफें लूट रहे हैं. कमर्शियल सिनेमा से लेकर शाहिद, हमारी अधूरी कहानी, अलीगढ़ और ट्रैप्‍ड जैसी फिल्‍मों तक में शानदार अभिनय के लिए वाहवाही लूटने वाले राजकुमार लगभग हर तरह की फिल्‍मों में नजर आ चुके हैं.

ऐसे में अब राजकुमार राव का कहना है कि पहले वह अपनी अगली फिल्म की खोज करते थे लेकिन अब उनके पास अच्छी कहानियों के आधार पर फिल्में चुनने का विकल्प मौजूद है. बता दें कि राजकुमार ने साल 2010 में फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ से बौलीवुड में कदम रखा था. इस साल राजकुमार राव की तीन फिल्‍में ट्रैप्‍ड, बहन होगी तेरी और बरेली की बर्फी रिलीज हो चुकी है और उनकी अगली फिल्‍म न्‍यूटन जल्‍द ही रिलीज होने वाली है. राजकुमार की न्यूटन का वर्ल्ड प्रीमियर बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में हुआ है.

ऐसे में जब उनसे पूछा गया कि इतनी कम उम्र में इतनी सफलता मिलने पर उनके भीतर कोई बदलाव नजर आता है, तो राजकुमार ने कहा, ‘एक अभिनेता के रूप में कुछ खास बदलाव नहीं आए हैं. मैं हमेशा से अच्छी कहानियों का हिस्सा बनना चाहता हूं. एक बदलाव यह आया है कि अब मेरे पास अच्छी कहानियां चुनने का विकल्प मौजूद है.’ उन्होंने कहा, ‘पहले मैं सिर्फ फिल्मों की तलाश में रहता था लेकिन अब मैं अच्छी कहानियों के आधार पर फिल्में चुनता हूं.’

इस साल रिलीज हुई फिल्‍म ‘बरेली की बर्फी’ में राजकुमार राव ने प्रीतम विद्रोही का किरदार निभाया था और उन्‍हें इसके लिए खूब सरहाना मिली. अपनी संजीदा फिल्‍मों और कमर्शियल सिनेमा पर बात करते हुए राजकुमार ने कहा, ‘मैंने इन सभी को कभी भी बांटा नहीं. ‘काई पो चे’, ‘क्वीन’, ‘बहन होगी तेरी’ और ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में वास्तव में स्वतंत्र फिल्में नहीं हैं. क्या आप किसी एक फिल्म का नाम ले सकते हैं और वो भी ऐसे समय में जब कमर्शियल और पैरलर सिनेमा के बीच की लकीर मिट रही हैं.’

‘न्यूटन’ की बात करें तो यह फिल्‍म एक युवा सरकारी अधिकारी के इर्द गिर्द घूमती है जिसे एक नक्सल नियंत्रित शहर में चुनावी कार्य करने के लिए भेजा जाता है और उसके वैचारिक संघर्ष उसे कैसी स्थिति में पहुंचा देते हैं. वास्तविक स्थानों पर इस फिल्म की शूटिंग के अनुभवों बारे में राजकुमार ने कहा, ‘मुझे इसकी कहानी पहली बार में ही पसंद आ गई थी. किरदार एक आदर्शवादी है और बदलाव लाना चाहता है, हालांकि वह एक भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा है.’

राजकुमार ने कहा, ‘फिर मुझे पता चला कि इस फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में होगी. यह सुन कर पहले मैं डर गया था.  लेकिन जब मैं वहां गया तो ग्रामीणों ने हमारा स्वागत किया.’ वह क्षेत्र नक्सल प्रभावित नहीं है और प्रकृति की सुंदरता भी वहां अद्भुत है. इसलिए शूटिंग अच्छी रही और हम सभी ने इसका आनंद उठाया. बता दें कि अमित मसुरकर द्वारा निर्देशित ‘न्यूटन’ भारत में 22 सितंबर को रिलीज होगी.

मौडल सोनिका चौहान की मौत हादसा या हत्या?

फिल्म या टीवी इंडस्ट्री भले ही किसी भी भाषा से जुड़ी हुई हो, ग्लैमर इस इंडस्ट्री की पहली शर्त है. जहां ग्लैमर होता है, वहां और भी बहुत कुछ होता है. अंधेरेउजाले के दृश्य रच कर सिनेमा या टीवी के परदे पर लाने वालों के अपनी जिंदगी के असल दृश्य कभीकभी तो रंगीन न हो कर इतने काले होते हैं कि जिन्हें देख कर इंसानियत भी शरमा जाए. लेकिन पैसे का चक्कर ऐसे दृश्यों की कालिख को ढंक लेता है. यह भी कह सकते हैं कि ग्लैमर को देखने की चाह चाहे दर्शक की हो, ग्लैमर के मोहरों की हो या प्रस्तुतकर्ता की, अपना रंग तो दिखाती ही है. भले ही पीछे का परदा सफेद हो या काला. इसी चमक से पैसा बरसता है.

कभी घरघर में पहचानी जाने वाली कलर्स के सीरियल ‘बालिका वधू’ की आनंदी यानी प्रत्यूषा बनर्जी ग्लैमर के अंधेरों में खो गई. कब, कैसे, क्यों जैसे सवाल कुछ दिन तक उछलते रहे, फिर सब कुछ शांत हो गया. प्रत्यूषा का बौयफ्रैंड राहुल राज जैसे संदेह के दायरे में आया, वैसे ही निकल भी गया. बस इतना समझ लीजिए कि प्रत्यूषा को ग्लैमर के पीछे का अंधेरा निगल गया और उस प्यारी सी लड़की के लिए कोई कुछ न कर सका.

टौलीवुड यानी बंगला फिल्म एंड टीवी इंडस्ट्री का सच भी इस से जुदा नहीं है. कौन जाने इस इंडस्ट्री की खूबसूरत लड़की सोनिका सिंह चौहान की मौत के पीछे का सच भी कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि वह भी तो ग्लैमर के अंधेरों से निकल कर मौत के अंधेरे में समाई है.

धीरेधीरे सोनिका सिंह की पहचान बनती गई. सोनिका ने कोलकाता टीवी और फिल्म इंडस्ट्री में बतौर मौडल, एंकर, चैनल वी की वीजे, एनडीटीवी प्राइम और स्टार स्पोर्ट्स की एंकर के रूप में काम किया. जाहिर है कुछ स्टार पुत्र या पुत्रियों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर अभिनेता, अभिनेत्री अथवा मौडल शहर या ग्रामीण क्षेत्रों के आम परिवारों से आते हैं. सोनिका सिंह भी एक मध्यमवर्गीय  परिवार से आई थी. उस के पिता विजय सिंह रौयल कलकत्ता टर्फ क्लब में सर्विस करते थे और मां शरोन सिंह घरेलू महिला थीं. विजय सिंह चौहान ने क्रिश्चियन शरोन से लवमैरिज की थी.

सोनिका सिंह ने कोलकाता में रहते हुए शुरुआती पढ़ाई ला मार्टिनियर स्कूल से की और फिर माउंट कार्मेल कालेज से आगे की पढ़ाई पूरी की. सोनिका सिंह खूबसूरत थी, इसलिए ग्लैमर की दुनिया से जुड़ना चाहती थी. यही सोच कर उस ने 2013 के मिस इंडिया कंप्टीशन में भाग लिया. इस में वह फाइनलिस्ट रही. इस के बाद उस ने मौडलिंग शुरू की.

ग्लैमर इंडस्ट्री में रहते ही उस की दोस्ती टौलीवुड के एक्टर विक्रम चटर्जी से हुई. पश्चिम बंगाल के कोलकाता का रहने वाला विक्रम चटर्जी 2012 से टौलीवुड से जुड़ा था. उस ने बंगाली फिल्मों से ले कर बांग्ला सीरियल्स तक में काम किया था. एक तरह से वह टौलीवुड का जानापहचाना चेहरा था.

उस ने जी बांग्ला के सीरियल ‘सात पाके बांधा’, स्टार जलसा के बांग्ला सीरियल ‘सोखी’, ईटीवी के बांग्ला चैनल पर 2013 में आए ‘बिगबौस’, 2014 में जी टीवी पर आए ‘इंडियाज बेस्ट सिनेस्टार की खोज’, जी टीवी के सीरियल ‘डोली अरमानों की’ और कलर्स बांग्ला के सीरियल ‘ब्योमकेश’ में काम किया.

फिल्मों की बात करें तो विक्रम चटर्जी ने मैनाक भौमिक की फिल्म ‘बैडरूम’, बाप्पादित्य बंद्योपाध्याय की फिल्म ‘इलार चार अध्याय’, अग्निदेव चटर्जी की फिल्म ‘3 कन्या’, मैनाक भौमिक की फिल्म ‘अमी आर अमार गर्लफ्रैंड’, एसके की फिल्म ‘मिस्टेक’, कौशिक चक्रवर्ती की फिल्म ‘सोनो एकती प्रीमर गाल्यो बोली’, देवार्ती गुप्ता की फिल्म ‘होई छोई’, अशोक पार्टी की फिल्म ‘अमी शुधु चेयनची टुमे’, पौंपी घोष मुखर्जी की ‘गोगोलर कीर्ती’, अंजान दास की फिल्म ‘अजाना बातास’, सुराजीत धर की ‘बिट्टू’ और प्रीतम डी. गुप्ता की फिल्म ‘साहेब बीवी गोलाम’ में काम किया था.model sonika chauhan case murder or accident

विक्रम चटर्जी और सोनिका सिंह की दोस्ती टौलीवुड में काम करते हुए ही हुई थी. धीरेधीरे दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए थे. घटना से 6 महीने से दोनों रिलेशनशिप में थे. 29 अप्रैल, 2017 को विक्रम और सोनिका फाइवस्टार होटल में होने वाली एक पार्टी में शामिल होने के लिए साथसाथ गए.

ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़ी पार्टियां अमूमन देर से शुरू होती हैं और देर रात तक चलती हैं. इन पार्टियों में पीना ज्यादा होता है, खाना कम. मौजमस्ती व डांस वगैरह भी खूब होता है. इस पार्टी में भी ऐसा ही हुआ. विक्रम और सोनिका सिंह घर जाने के लिए पार्टी से सुबह साढ़े 3 बजे निकले.

कोरोला एल्टीस कार विक्रम की थी, उसी ने ड्राइविंग सीट संभाली. सोनिका चौहान साथ बैठी थी. विक्रम के सिर पर शराब का नशा चढ़ा था. स्टीयरिंग संभालते ही उस ने कार को इस तरह दौड़ाना शुरू कर दिया जैसे किसी रेस में भाग ले रहा हो. नतीजतन रासबिहारी एवेन्यू के पास कार का एक्सीडेंट हो गया. इस एक्सीडेंट में सोनिका चौहान की मौत हो गई, जबकि विक्रम को भी कुछ चोटें आईं. सिर्फ इतनी चोटें कि उसे मरहमपट्टी के बाद छुट्टी दे दी गई. अस्पताल से छुट्टी मिलते ही विक्रम लापता हो गया.model sonika chauhan case murder or accident

पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया तो पता चला कि एक्सीडेंट के समय विक्रम ने कार सोनिका चौहान की ओर झुका दी थी, जिस की वजह से उस की ओर का एयरबैग भी नहीं खुला था.

प्राथमिक जांच के बाद कोलकाता पुलिस ने विक्रम के खिलाफ भादंवि की धारा 304ए (लापरवाही से मौत) और धारा 279 (लापरवाही से गाड़ी चलाना) के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया और उसे पूछताछ हेतु बुलाने के लिए सम्मन जारी कर दिया. लेकिन विक्रम पुलिस के पास आने के बजाय बीमारी के नाम पर एक प्राइवेट अस्पताल में भरती हो गया. उधर सोनिका सिंह को उस की मां की इच्छा पर क्रिश्चियन धर्मानुसार कब्रिस्तान में दफनाया गया.

विक्रम के सामने न आने पर इस मामले ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया. सोनिका के दोस्त सोशल साइटों पर विक्रम के खिलाफ आवाज उठाने लगे. सोनिका की खास दोस्त सतारूपा पाइने ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा— टौलीवुड के अभिनेता की नशाखोरी की वजह से एक अनमोल लड़की की मौत हो गई. वह शराब या किसी अन्य ड्रग के नशे में था. क्या मुझे इस मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल करनी चाहिए?

सोनिका की एक अन्य दोस्त फैशन डिजाइनर नवोनिल दास ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा— विक्रम, तुम्हें साथ बैठे व्यक्ति या सड़क पर चल रहे लोगों की सुरक्षा को ले कर जरा भी फिक्र नहीं थी. तुम अंधाधुंध गाड़ी चला रहे थे, जो इस एक्सीडेंट की वजह बनी. रफ्तार को आदमी खुद चुनता है, इस के लिए तुम नशे के प्रभाव को दोष नहीं दे सकते. तुम्हारे पास किसी की मौत का कारण बनने का कोई अधिकार नहीं है. जीवन के लिए तुम्हारे दिल में जरा भी सम्मान नहीं है, भले ही वह तुम्हारा अपना जीवन हो.

इस से कुछ ही दिन पहले मार्च में बांग्ला लोकगायक कालिका प्रसाद भट्टाचार्य की बर्धवान जिले में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. उस समय कालिका प्रसाद की एसयूवी को ड्राइवर चला रहा था. हादसे के बाद पुलिस ने ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया था.

ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़े इन हादसों ने कोलकाता के लोगों को स्तब्ध कर दिया था. क्योंकि ये हादसे तब हुए थे, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सड़क सुरक्षा पर जागरूकता के लिए ‘सेफ ड्राइव, सेव लाइफ’ नाम से अभियान चला रखा था.

बहरहाल, जब सोनिका चौहान की मौत के मामले में दबाव बढ़ना शुरू हुआ तो पुलिस विक्रम चटर्जी की गिरफ्तारी की कोशिश में जुट गई.

आखिरकार गरदन पर कानून की तलवार लटकती देख विक्रम ने 5 मई शुक्रवार को कोलकाता की बंकसाल कोर्ट के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट की अदालत में सरेंडर कर दिया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. बाद में वह जमानत पर बाहर आ गया.

सोनिका चौहान की मौत के मामले को ले कर चूंकि काफी हंगामा हुआ था, इसलिए पुलिस इस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है. यह भी जानने की कोशिश की जा रही है कि सोनिका चौहान की मौत का कोई अन्य एंगल तो नहीं है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मामले की जांच में कोई कोताही न बरतने का निर्देश दिया है.

उधर विक्रम चटर्जी को कई बार उस कब्रिस्तान में सोनिका सिंह की कब्र के पास देखा गया, जहां वह गुलाब के फूल ले कर जाता था. हालांकि सोनिका के घर वाले उस के इन आंसुओं को घडि़याली आंसू बताते हैं.

सोनिका सिंह के पिता विजय सिंह ने कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को पत्र लिख कर मांग की है कि इस मामले का गंभीरता से अन्वेषण कराएं, ताकि सच्चाई सामने आ सके. उन्हें विक्रम चटर्जी की बातों पर यकीन नहीं है.

बहरहाल, विक्रम चटर्जी की लापरवाही से हुए एक्सीडेंट की वजह से ही सही एक उभरती अदाकारा अकाल काल के गाल में समा गई.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पेपर माफिया के निराले खेल : इस तरह करते थे पेपर लीक

इसी साल 22 मार्च की सुबह के करीब 10 बजे जयपुर में कुछ पत्रकारों को सूचना मिली कि टोंक फाटक के पास किताबों की कुछ दुकानों पर राजस्थान विश्वविद्यालय का बीएससी द्वितीय वर्ष का फिजिकल कैमिस्ट्री का प्रश्नपत्र बेचा जा रहा है. यह पेपर उसी दिन दोपहर 3 बजे होने वाला था. किसी परीक्षार्थी ने दुकानों पर बिक रहे उस पेपर की कौपी वाट्सऐप द्वारा एक पत्रकार को भेज दी थी. उस पत्रकार ने इस मामले की जानकारी अपने एक साथी को दी. उन दिनों जयपुर में राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था. दोनों पत्रकारों ने सावधानी के तौर पर विधानसभा पहुंच कर कुछ विधायकों को इस मामले के बारे में बताया ही नहीं, वह पेपर भी दिखाया.

दोनों पत्रकारों ने उस प्रश्नपत्र पर 4 विधायकों से हस्ताक्षर करवा कर समय भी दर्ज करवा लिया. उन में सत्तापक्ष भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी, कांग्रेस के घनश्याम मेहर, श्रवण कुमार और निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल शामिल थे.

शाम 6 बजे जब पेपर समाप्त हुआ तो उस पेपर का मिलान किया गया. हूबहू वही पेपर आया था, जो उन के पास था. उस में न कोई सवाल बदला था और न ही सवालों का क्रम. ओरिजिनल पेपर और बाजार में बिक रहे पेपर की भाषा और छपाई का फोंट भी एक ही था.

जब यह मामला सामने आया तो राजस्थान यूनिवर्सिटी के कार्यवाहक कुलपति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजेश्वर सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस की जांच कराएगा. यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक बी.एल. गुप्ता ने कहा कि परीक्षाओं में पूरी गोपनीयता बरती जा रही है, फिर भी मामला कमेटी के पास जांच के लिए भेजा जाएगा.

जांच के बाद आखिर यूनिवर्सिटी ने वह पेपर निरस्त कर दिया. राजस्थान यूनिवर्सिटी की पूरे देश में बहुत अच्छी साख है. पेपर आउट होने की इस घटना से यूनिवर्सिटी की छवि पर विपरीत असर पड़ सकता था. निस्संदेह यह बेहद गंभीर मामला था, इसलिए उच्चाधिकारियों ने राजस्थान पुलिस के स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) को इस मामले की जांच करने को कहा.

एसओजी ने सूचनाएं जुटानी शुरू कीं तो जानकारी मिली कि राजस्थान के विभिन्न शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों की ओर से आयोजित होने वाली विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही कई माध्यमों से लीक हो रहे हैं.

गहराई से जांच की गई तो पता चला कि बीकानेर यूनिवर्सिटी की ओर से इसी साल 5 अप्रैल को होने वाली एमकौम फाइनल की परीक्षा, राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा 10 अप्रैल को कराई गई बीए तृतीय वर्ष के भूगोल के प्रथम प्रश्नपत्र की परीक्षा और 12 अप्रैल को होने वाली द्वितीय प्रश्नपत्र और 13 अप्रैल को होने वाली एमए प्रीवियस एवं एबीएसटी द्वितीय के प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही लीक हो गए थे.

इस से परीक्षाओं की गोपनीयता भंग हुई थी. जांच के बाद एसओजी ने पेपर माफिया के विरुद्ध 3 मामले दर्ज किए. एसओजी के आईजी दिनेश एम.एन. के निर्देश पर एसओजी के एसपी संजय श्रोत्रिय के निर्देशन में करीब एक दर्जन टीमों का गठन किया गया. इन टीमों ने पेपर लीक होने के मामले में तकनीकी जांच कर संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी.

इस के बाद 17 अप्रैल को सब से पहले राजस्थान यूनिवर्सिटी के एक विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर सहित 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन में राजस्थान यूनिवर्सिटी के भूगोल के विभागाध्यक्ष जगदीश प्रसाद जाट, राजस्थान विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग के प्रोफेसर गोविंद पारीक, भूगोल के सेवानिवृत्त प्रोफेसर बी.एल. गुप्ता थे.

इस के अलावा राजकीय कालेज खाजूवाला (बीकानेर) के प्राचार्य एन.एस. मोदी और बीकानेर निवासी उन के बेटे निपुण मोदी, एसएसजी पारीक गर्ल्स कालेज चौमूं (जयपुर) के प्रोफेसर शंभुदयाल झालानी, अग्रसेन कालेज भादरा (हनुमानगढ़़) के लेक्चरर कालीचरण शर्मा, रमेश बुक डिपो, मानसरोवर, जयपुर का कर्मचारी शरद शामिल थे.

इन लोगों से पूछताछ में पता चला कि बीकानेर यूनिवर्सिटी की ओर से 5 अप्रैल को एमकौम फाइनल वर्ष के ओआर एंड क्यूटी की परीक्षा आयोजित की गई थी. लेकिन इस परीक्षा के प्रश्नपत्र के सवालों को 4 दिन पहले यानी 1 अप्रैल को राजस्थान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गोविंद पारीक ने एसएसजी पारीक गर्ल्स कालेज चौमूं के प्रोफेसर शंभुदयाल झालानी से नोट कर के बीकानेर यूनिवर्सिटी के खाजूवाला कालेज के प्राचार्य एन.एस. मोदी को बता दिया.paper-mafiya-copy

मोदी ने उन सवालों को अपने बेटे निपुण मोदी को बता दिया. वह इस पेपर की परीक्षा दे रहा था. यही पेपर रमेश बुक डिपो के कर्मचारी शरद ने परीक्षा से पहले ही अग्रसेन कालेज भादरा (हनुमानगढ़) के व्याख्याता कालीचरण शर्मा के जरिए फोन पर हासिल कर लिया और अन्य लोगों को वितरित कर दिया.

इसी तरह राजस्थान यूनिवर्सिटी में 10 अप्रैल को होने वाली बीए फाइनल ईयर की परीक्षा में भूगोल प्रथम प्रश्नपत्र का पेपर 8 अप्रैल को ही राजस्थान यूनिवर्सिटी के भूगोल के विभागाध्यक्ष जगदीश प्रसाद जाट ने पेपर सैटर बी.एल. गुप्ता से नोट किया और परीक्षार्थियों को वितरित कर दिया.

राजस्थान यूनिवर्सिटी की 12 अप्रैल को होने वाली बीए तृतीय वर्ष का भूगोल द्वितीय प्रश्नपत्र का पेपर 11 अप्रैल को ही जगदीश प्रसाद जाट ने हासिल कर विद्यार्थियों में बांट दिया था. इस तरह यह पेपर भी आउट कर दिया गया था.

राजस्थान यूनिवर्सिटी की 13 अप्रैल को होने वाली एबीएसटी द्वितीय प्रश्नपत्र (एडवांस्ट कोस्ट एकाउंटिंग) की परीक्षा का पेपर एक दिन पहले 12 अप्रैल को राजस्थान यूनिवर्सिटी की गोपनीय शाखा के कर्मचारी नंदलाल सैनी, अशोक अग्रवाल एवं महेश गुप्ता तथा अन्य लोगों ने आउट कर दिया था.

गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि 17 अप्रैल को हो रहे बीकौम फाइनल ईयर के इनकम टैक्स का पेपर भी परीक्षा से पहले लीक हो चुका था. इस सूचना पर 17 अप्रैल को ही एसओजी की एक टीम ने दौसा जिले के बांदीकुई कस्बे में छापा मारा. अगले दिन यानी 18 अप्रैल को एसओजी ने पेपर लीक प्रकरण में 3 अन्य मुकदमे दर्ज कर 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

इन में राजस्थान यूनिवर्सिटी की गोपनीय शाखा का अनुभाग अधिकारी नंदलाल सैनी, राजकीय कालेज कालाडेरा (जयपुर) का लेक्चरर शंकर चोपड़ा, बांदीकुई (दौसा) का कोचिंग संचालक चंद्रप्रकाश सिंधी तथा फाइनल ईयर के छात्र अखिल रावत एवं अजय कुमार सैनी शामिल थे.paper-mafiya-copy

इन में कालाडेरा कालेज के लेक्चरर शंकर चोपड़ा ने राजस्थान यूनिवर्सिटी के एमए फाइनल ईयर के वाटर रिसोर्स एवं एडवांस ज्योग्राफी औफ इंडिया के पेपर परीक्षा से पहले 8 अप्रैल को ही यूनिवर्सिटी के भूगोल के विभागाध्यक्ष जगदीश प्रसाद जाट को बता दिए थे.

लगातार तीसरे दिन काररवाई करते हुए एसओजी ने 19 अप्रैल को राजस्थान यूनिवर्सिटी के कौमर्स विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. महेशचंद गुप्ता को गिरफ्तार किया. उन्होंने यूनिवर्सिटी के एमकौम प्रीवियस की 13 अप्रैल को हुई एबीएसटी की परीक्षा का पेपर तैयार किया था.

इस की सूचना यूनिवर्सिटी की गोपनीय शाखा के अनुभाग अधिकारी नंदलाल सैनी ने प्रो. अशोक अग्रवाल को दी थी. प्रो. अशोक अग्रवाल ने डा. महेशचंद गुप्ता से संपर्क कर परीक्षा से एक दिन पहले पेपर हासिल कर लिया था.

उसी दिन एसओजी ने राजकीय कालेज कालाडेरा के भूगोल के लेक्चरर सुरेंद्र कुमार सैनी को गिरफ्तार किया. उन्होंने यूनिवर्सिटी के एमए/एमएससी फाइनल ईयर भूगोल की एडवांस ज्योग्राफी औफ इंडिया की 17 अप्रैल को होने वाली परीक्षा का पेपर तैयार किया था.

सैनी ने यह पेपर शंकर को बता दिया था. शंकर के माध्यम से यह पेपर जगदीश प्रसाद जाट एवं अन्य लोगों तक पहुंच गया था. इस के बाद एसओजी ने 21 अप्रैल को राजस्थान यूनिवर्सिटी के कौमर्स विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर व चीफ वार्डन राजीव शर्मा एवं यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक के निजी सचिव सुरेंद्र मोहन शर्मा को गिरफ्तार किया.

इन में निजी सहायक सुरेंद्र मोहन शर्मा ने नंदलाल सैनी से पेपर बनाने वाले प्राध्यापकों के नाम पता कर के एसोसिएट प्रोफेसर राजीव शर्मा को बताए थे. राजीव शर्मा ने अपने परिचितों के लिए पेपर बनाने वाले उन प्राध्यापकों से संपर्क किया और परीक्षा की गोपनीयता भंग की.

एसओजी ने 22 अप्रैल को यूनिवर्सिटी के डिप्टी रजिस्ट्रार एम.सी. गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया. इस के अगले दिन जयपुर के टोंक फाटक स्थित एक कौमर्स कोचिंग क्लासेज के संचालक अतिशय जैन को पकड़ा गया. इस तरह पेपर लीक प्रकरण में 17 से 23 अप्रैल तक 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया.

इन लोगों से की गई पूछताछ और एसओजी की जांच में सामने आया कि सरकारी यूनिवर्सिटी के अधिकारियों, कर्मचारियों, पेपर बनाने वाले प्रोफेसरों से ले कर उन के सहायकों, कोचिंग संचालकों, प्राइवेट कालेजों एवं बुक सेलरों का पूरा रैकेट है. ये लोग पैसों के लालच, कोचिंग संस्थानों में पढ़ाने, पासबुक (गेस पेपर) लिखने के लिए राइटर बने रहने और परिचितों एवं परिजनों को अच्छे नंबर दिलाने के लिए पेपर लीक करते थे.

एसओजी ने पेपर लीक होने की सूचना मिलने के बाद कई दिनों तक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों व अन्य लोगों के फोन सर्विलांस पर रखे. इस के बाद एक से एक कडि़यां जुड़ती गईं. 1 अप्रैल को प्रिंसिपल एन.एस. मोदी व प्रोफेसर गोविंद पारीक के बीच वाट्सऐप पर हुई वार्ता में मोदी ने पारीक से कहा था, ‘‘5 अप्रैल को एमकौम का पेपर है, सेंड करो.’’

इस पर पारीक ने कहा, ‘‘पेपर मेरे पास नहीं है. मैं ले कर देता हूं.’’

इस के बाद चौमूं के अग्रसेन कालेज के प्रो. शंभुदयाल झालानी और पारीक के बीच बातचीत सामने आई. इस में पारीक ने झालानी से कहा, ‘‘यार, एमकौम का जो पेपर बनाया था, उसे सेंड करो.’’

झालानी ने कहा, ‘‘सर, उस दिन जो सेंड किया था, वही पेपर है.’’

पारीक ने कहा, ‘‘एक बार फिर सेंड करो.’’

झालानी ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं अभी सेंड कर देता हूं.’’

पारीक ने कहा, ‘‘हां यार, मोदी को सेंड करना है. उन का बेटा एमकौम में है.’’

इस के बाद झालानी ने वाट्सऐप पर पारीक को पेपर सेंड कर दिया था.

राजस्थान यूनिवर्सिटी ने इसी साल पेपर सेटर के मानदेय बढ़ाए थे. अंडर ग्रैजुएट का प्रति पेपर मानदेय ढाई हजार रुपए एवं पोस्ट ग्रैजुएट का प्रति पेपर 3 हजार रुपए किया गया है. इस के बावजूद यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष और बोर्ड औफ स्टडीज के समन्वयक या सदस्यों के दबाव में आ कर पेपर लीक किए गए.

दरअसल, विभिन्न विषयों के विभागों में एक अध्ययन मंडल (बोर्ड औफ स्टडीज) होता है. इस में समन्वयक व 2 सदस्य होते हैं. ये ही पेपर सेटर नियुक्त करते हैं. संबंधित विषय के विभागाध्यक्ष या डीन इस से जुड़े रहते हैं. 3 प्रोफेसर 3 पेपर सेलेक्ट कर सीलबंद लिफाफे में परीक्षा नियंत्रक के पास भेजते हैं.

परीक्षा नियंत्रक एवं यूनिवर्सिटी के अन्य उच्चाधिकारी उन में से एक पेपर सेलेक्ट कर छपने के लिए प्रिंटिंग प्रैस पर भेजते हैं.

पेपर लीक करने के लिए कन्वीनर और सेलेक्टर संबंधित विभाग की गोपनीय शाखा से पता करते थे कि किस प्रोफेसर का पेपर सेलेक्ट हुआ है. जिस प्रोफेसर का पेपर सेलेक्ट होता था, उस से संपर्क कर के पेपर हासिल कर लिया जाता था. वह प्रोफेसर भी अपने परिचितों को पेपर बता देता था. कन्वीनर के पूछने पर उसे भी पेपर बता दिया जाता था.

इस घपले में लिप्त लोग बाकायदा बोर्ड औफ स्टडीज के चुनाव में अपने रसूख का प्रयोग करते थे. कुछेक तो बोर्ड औफ स्टडीज के समन्वयक भी बने हुए थे. इन्हीं के माध्यम से पेपर सेटर से पेपर पूछा जाता था. ऐसा न करने पर उन पर हटाने का दबाव डाला जाता था. दूसरी ओर कुछ पब्लिशर बोर्ड औफ स्टडीज एवं एचओडी से मिल कर मुख्य प्रश्नों की पासबुक (गेस पेपर) छापते थे.

जिस पब्लिशर की पासबुक से परीक्षा में सब से ज्यादा सवाल आते थे, उस की प्रसिद्धि रातोंरात हो जाती थी. उस की पासबुक खरीदने के लिए परीक्षार्थियों में होड़ मच जाती थी. ये पब्लिशर इस तरह चांदी काटते थे.

इस के अलावा कुछ प्रोफेसर कोचिंग संस्थानों में पढ़ाते थे. ये प्रोफेसर परीक्षार्थियों को मोस्ट इंपोर्टेंट सवाल बता कर अपनी प्रसिद्धि के लिए येन केन प्रकारेण पेपर हासिल करते थे. कोचिंग संस्थानों के संचालक भी रातोंरात प्रसिद्धि पाने और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए अपने विद्यार्थियों को पेपर बताते थे. ये भी अनैतिक तरीकों से पेपर हासिल करते थे.

बांदीकुई का जो कोचिंग संचालक पकड़ा गया है, उस से इसी बात के संकेत मिलते हैं. प्रोफेसर बुकसेलरों को इसलिए पेपर मुहैया कराते थे, क्योंकि पब्लिशर उन्हें लेखक बनाए रखें. अधिकांश अपनी किताबों के लेखक राजस्थान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों को बनाते थे, ताकि उन की किताबों की ज्यादा से ज्यादा बिक्री हो. इस के बदले में प्रोफेसर उन्हें पेपर उपलब्ध कराते थे.

पब्लिशर इन पेपरों का उपयोग वन वीक सीरीज आदि में करते थे, ताकि उन की किताबों, पासबुक और अन्य परीक्षाओं में सहायक पुस्तकों की बिक्री होती रहे.  पेपर लीक करने का मामला उजागर होने पर 18 अप्रैल को राजस्थान की उच्च शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी ने राजस्थान यूनिवर्सिटी के भूगोल के विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीश प्रसाद जाट, राजस्थान विश्वविद्यालय के कौमर्स विभाग के प्रोफेसर गोविंद पारीक, राजकीय कालेज खाजूवाला (बीकानेर) के प्राचार्य एन.एस. मोदी, राजकीय कालेज कालाडेरा के लेक्चरर शंकर चोपड़ा एवं यूनिवर्सिटी की गोपनीय शाखा के अनुभाग अधिकारी शंकरलाल सैनी को निलंबित कर दिया था.

इस के दूसरे दिन 19 अप्रैल को राजस्थान यूनिवर्सिटी के कार्यवाहक कुलपति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजेश्वर सिंह ने प्रो. जगदीश प्रसाद जाट एवं प्रो. गोविंद पारीक को निलंबित कर दिया. यूनिवर्सिटी प्रशासन ने 24 अप्रैल को एसोसिएट प्रोफेसर डा. राजीव शर्मा, कुलसचिव परीक्षा गोपनीय एम.सी. गुप्ता एवं परीक्षा नियंत्रक के पीए सुरेंद्र मोहन शर्मा को भी निलंबित कर दिया.

यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीश प्रसाद जाट की गिरफ्तारी भी 17 अप्रैल को नाटकीय तरीके से हुई. उस दिन सुबह एसओजी के एक डिप्टी एसपी महिला पुलिसकर्मी के साथ पितापुत्री बन कर जयपुर में मौडल टाउन स्थित प्रो. जगदीश प्रसाद जाट के घर गए. वे किराएदार बन कर उन से मिले और किराए पर मकान लेने की बात कही.

प्रो. जगदीश प्रसाद जाट ने उन्हें अपना मकान दिखा दिया. किराए पर मकान लेने के बहाने एसओजी के डिप्टी एसपी ने पूरा मकान देखपरख लिया और अन्य सबूट जुटा लिए. इस के बाद डिप्टी एसपी ने बाहर खड़े एसओजी के एडिशनल एसपी को खुद का दामाद बता कर अंदर बुलाया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

एसओजी की टीम प्रो. जगदीश प्रसाद जाट को ले कर एसओजी मुख्यालय पहुंची तो वह हैरान रह गए. जो लोग किराए पर मकान लेने आए थे, वे पुलिस के अफसर निकले. दूसरी ओर प्रो. जगदीश प्रसाद जाट को एक महिला समेत 3-4 लोगों द्वारा ले जाने पर उन के घर में हड़कंप मच गया. वे समझ नहीं सके कि क्या हुआ था. उन्होंने पुलिस को प्रो. जगदीश प्रसाद जाट के अपहरण की सूचना दे दी.

उन की सूचना पर थाना मालवीयनगर पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी. करीब 3 घंटे बाद पता चला कि प्रो. जगदीश प्रसाद जाट को एसओजी ले गई थी. दिन भर की पूछताछ के बाद शाम को प्रो. जगदीश प्रसाद जाट की गिरफ्तारी की सूचना मिलने पर उन के घर वालों के चेहरे मुरझा गए थे.

यही स्थिति रमेश बुक डिपो के कर्मचारी शरद को गिरफ्तार करने के दौरान हुई थी. उस दिन सुबह सादे कपड़ों में एसओजी की टीम जयपुर में मानसरोवर के रजत पथ स्थित रमेश बुक डिपो से शरद को पकड़ कर ले गई. इस पर बुक डिपो के लोगों ने पुलिस को शरद के अपहरण की सूचना दे दी. थाना मानसरोवर पुलिस ने जांच की तो पता चला कि शरद को एसओजी ले गई थी.

पेपर लीक रैकेट में जयपुर के कई बुक डिपो की भूमिका संदिग्ध पाई गई है. ये बुक डिपो विशेषज्ञों के नाम पर वन वीक सीरीज, गेस पेपर व पासबुक प्रकाशित करते हैं. रैकेट ने जिनजिन पेपरों को आउट किए हैं, उन पेपरों के न्यूमेरिकल हूबहू पासबुक व वन वीक सीरीज में थे.

दरअसल, अलगअलग कालेजों एवं यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों तथा लेक्चरर विभिन्न बुक डिपो से जुड़े हुए हैं. कोई बुक डिपो की किताबों का लेखक है तो कोई वन वीक सीरीज का विशेषज्ञ.

बांदीकुई के कोचिंग संचालक चंद्रप्रकाश ने एसओजी को पूछताछ में बताया कि उसे आमतौर पर शाम को या देर रात को अगले दिन की परीक्षा का पेपर मिल जाता था. इस पेपर के आधार पर कोचिंग सेंटर के विद्यार्थियों को रिवीजन के नाम पर कोचिंग सेंटर पर बुला कर रात भर पेपर रटवाया जाता था. इस से उस की कोचिंग को प्रसिद्धि मिल रही थी.

पेपर लीक रैकेट के उजागर होने से राजस्थान यूनिवर्सिटी प्रशासन उलझन में फंस गया है.

एसओजी की जांच एवं अन्य सबूतों के आधार पर कई पेपर आउट हुए थे. एसओजी ने इस का खुलासा तो किया ही, आरोपियों ने अपनी करतूत भी स्वीकार कर ली. लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन उन पेपरों को आउट घोषित करने में देरी करता रहा.

इस की वजह यह थी कि परीक्षा प्लानिंग एवं मौनिटरिंग कमेटी ही यूनिवर्सिटी की सब से पावरफुल कमेटी होती है.

प्रो. गोविंद पारीक इस कमेटी के संयोजक थे और वह पेपर लीक मामले में गिरफ्तार हो चुके थे. हालांकि उन की गिरफ्तारी के कई दिनों बाद उन के स्थान पर प्रो. एस.एल. शर्मा को इस कमेटी का संयोजक बना दिया गया था.

प्रो. गोविंद पारीक ने यूनिवर्सिटी की चयन कमेटी की परीक्षाओं में पेपर लीक न हो, इस की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन वह खुद ही पेपर लीक करने वालों में शामिल थे.

एसओजी की जांच में सामने आया है कि एमकौम का जो पेपर प्रो. गोविंद पारीक को बनाना था, वह उन्होंने चौमूं के निजी कालेज अग्रसेन कालेज के प्रोफेसर शंभुदयाल से बनवाया था और यूनिवर्सिटी में पेपर जमा करवाते समय यह शपथ पत्र दिया था कि पेपर उन्होंने खुद बनाया है.

जबकि निजी कालेज के प्रोफेसर शंभुदयाल से पेपर बनाने के दौरान ही लीक हो गया था.

21 अप्रैल को राजस्थान यूनिवर्सिटी के कुलपति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजेश्वर सिंह ने एग्जामिनेशन प्लानिंग एंड मौनिटरिंग कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 5 पेपर रद्द करते हुए उन्हें दोबारा कराने का फैसला लिया.

इन में 10 अप्रैल को होने वाला बीए फाइनल ईयर का ज्योग्राफी प्रथम का प्रश्नपत्र, 11 अप्रैल को हुआ. एमए फाइनल ईयर का ज्योग्राफी औफ वाटर रिसोर्सेज देयर मैनेजमेंट एंड यूटिलिटीज का प्रश्नपत्र, 12 अप्रैल को होने वाला बीए फाइनल ईयर  का ज्योग्राफी द्वितीय का प्रश्नपत्र, 13 अप्रैल को हुआ एमकौम प्रीवियस का एबीएसटी (एडवांस कास्ट एकाउंटिंग) का प्रश्नपत्र तथा 17 अप्रैल को आयोजित एमए फाइनल  ईयर का एडवांस ज्योग्राफी औफ इंडिया प्रश्नपत्र का पेपर रद्द कर दिया गया.

दूसरी ओर एसओजी की ओर से लगातार की जा रही गिरफ्तारियों के विरोध में राजस्थान यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ एवं राजस्थान विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने मोर्चा खोल दिया.

इन का कहना था कि एसओजी मनमर्जी से काररवाई कर रही है, जबकि सारे शिक्षक गलत नहीं हैं. कुछ शिक्षकों ने गेस पेपर विद्यार्थियों को बताए हैं, लेकिन फोन रिकौर्डिंग में रुपयों के लेनदेन की कोई बात साबित नहीं हो रही है.

एसओजी ने करीब एक महीने की अपनी जांच में लगभग सौ से अधिक लोगों के फोन टेप किए.

इन फोन काल्स रिकौर्डिंग में कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. इस के बाद 17 अप्रैल को एक साथ जयपुर, बीकानेर, चौमूं, बांदीकुई, हनुमानगढ़ के भादरा आदि स्थानों पर छापे मारे गए. सब से पहले 8 लोगों को पकड़ा गया. इन से पूछताछ में कडि़यां जुड़ती गईं और 7 दिनों में 19 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया.

एसओजी की जांच में ऐसे लेक्चरर और प्रोफेसर सामने आए हैं, जिन्होंने अपना ईमान नहीं बेचा. फोन रिकौर्डिंग के अनुसार, एक दिन यूनिवर्सिटी के डिप्टी रजिस्ट्रार एम.सी. गुप्ता ने गोपनीय शाखा के अनुभाग अधिकारी नंदलाल सैनी को फोन कर के पूछा, ‘परीक्षाओं की क्या तैयारी चल रही है?’

नंदलाल ने कहा, ‘‘सर, पेपर प्रिंट हो कर आने लगे हैं.’’

‘‘अच्छा…यार ये इनकम टैक्स का पेपर किस का प्रिंट हुआ है?’’ गुप्ता ने पूछा.

नंदलाल ने बताया, ‘‘सर, कोई राम गर्ग हैं.’’

‘‘कहां का है यह?’’

‘‘सर, कूकस में आर्यन कालेज का लेक्चरर है.’’

‘‘यार, उस का कोई नंबर है तो मैसेज कर दो.’’

‘‘ठीक है सर, अभी करता हूं.’’

बाद में डिप्टी रजिस्ट्रार एम.सी. गुप्ता ने राम गर्ग को फोन किया, ‘‘राम गर्गजी बोल रहे हैं?’’

‘‘हां, बोल रहा हूं. बताओ, क्या काम है?’’ राम गर्ग ने पूछा.

‘‘मैं यूनिवर्सिटी से डिप्टी रजिस्ट्रार एम.सी. गुप्ता बोल रहा हूं.’’

‘‘जी सर, बताइए.’’

‘‘यार, आप ने जो पेपर सेट किया है, वही आएगा.’’

गर्ग, ‘‘अच्छा…’’

गुप्ता ने कहा, ‘‘यार, कौन से क्वेश्चन पेपर के लिए सेलेक्ट किए हैं, जरा बताओ.’’

‘‘पेपर..? सर मरवाओगे क्या? मैं ऐसा नहीं करूंगा.’’

‘‘अरे यार, कुछ नहीं होगा. तुम्हारे भी काम आऊंगा.’’

‘‘नहीं सर, मैं नहीं बताऊंगा. माफ करो.’’

कथा लिखे जाने तक कई प्रोफेसर फरार थे. एसओजी उन की तलाश में जुटी थी. बहरहाल, पेपर लीक प्रकरण ने उच्च शिक्षा को राजस्थान को बदनाम कर दिया है. इस समय राजस्थान में कभी किसी यूनिवर्सिटी और कालेज के पेपर आउट हो रहे हैं तो कभी किसी भर्ती परीक्षा के.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जेलर का मायाजाल : बेपरदा हुआ वसूली का मायाजाल और गैंगस्टर्स से गठजोड़

जेल की घड़ी की सुई 12 बजा कर आगे बढ़ रही थी. एल आकार के उस लंबे गलियारे के आखिरी छोर पर असलम तोता बैरक के सींखचों से टेक लगाए खड़ा था. इकराम मिर्ची उस से कह रहा था, ‘‘इस तरह कैसे चलेगा असलमभाई, एक साल  में ही अनूप पाडि़या ने पूरा धंधा कब्जा लिया. तुम्हारे हाथों से निवाला खाने वाला जेल का डिप्टी जेलर कैसे करिश्माई ढंग से अनूप का मुरीद हो गया. कदमकदम पर तुम्हारी दया को तरसने वाला शकील भी उस की शागिर्दी में पहुंच गया.

‘‘आखिर ऐसा कौन सा करिश्मा हुआ कि वसूली के हर मामले पर उस की पकड़ हो गई. आज हम न केवल डरेसहमे हैं, दुत्कारे जा रहे हैं, बल्कि रोज पिट रहे हैं. हैरानी की बात तो यह है कि कभी तुम्हारा भरोसेमंद रहा इमरान अब शकील के साथ अनूप के लिए माल कूट रहा है. बंजारा दिखावे के लिए तुम्हारी सरपरस्ती में कैंटीन चला रहा है, लेकिन हकीकत में वह भी अनूप की परछाई बना हुआ है.’’

मिर्ची ने भड़ास निकालना जारी रखा, ‘‘अफसोस तो इस बात का है उस्ताद कि कुछ समय पहले तक लोग असलम तोता और शकील बकरे की दोस्ती को सलाम करते थे. जेल में सजा काटते हुए हम कमाई करते रहे और डेढ़ हजार कैदियों में से कोई भी कभी हम से नजरें नहीं मिला सका. लेकिन अनूप की एक ही फूंक में हमारा गिरोह ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. जेल में चर्चा है कि जेलर ने कभी असलम तोता और शकील बकरा के साथियों पर जुल्म ढाने की हिम्मत नहीं की, अब हम उसी डिप्टी जेलर और उस के नए साथियों से न सिर्फ रोज जलील हो रहे हैं, बल्कि पिट भी रहे हैं.’’

इकराम की इन बातों से असलम के माथे पर बल पड़ गए. उस ने उस की ओर देखते हुए बेबसी से गरदन हिला कर कहा, ‘‘इकराम भाई, मुझे भी पता है कि हालात हमारी मुट्ठी से फिसलते जा रहे हैं. अनूप पढ़ालिखा आदमी है. उस ने कोई खास चक्कर चलाया होगा, तभी डिप्टी जेलर उस के वश में आ गया. वरना चौथी पास इस जोड़ी से कौन अधिकारी संबंध बनाना चाहेगा.’’

‘‘असलमभाई, जो कुछ हो रहा है, बरदाश्त के बाहर है. इस जेल में बरसों से हमारा दबदबा रहा है, लेकिन अब जो हो रहा है, हम ने ऐसा सोचा भी नहीं था.’’crime-story-corrupt-jailer

एकाएक असलम तोता का खूंखार चेहरा तमतमा उठा. उस के जबड़े भिंच गए, ‘‘इकराम, असलम का दबदबा जैसा था, वैसा ही रहेगा. उसे तो मैं कच्चा चबा जाऊंगा. ऐसा सबक सिखाऊंगा कि डिप्टी जेलर और अनूप पाडि़या की आने वाली पीढ़ी भी याद करेंगी.’’

लेकिन इकराम मिर्ची यह सुनने के लिए वहां नहीं था. वह वहां से अपनी बैरक में आ गया था.

आखिर प्रतिशोध का यह बम सोमवार 3 अप्रैल को जबरदस्त धमाके के साथ फटा तो खुद को सख्तमिजाज अफसर कहलाने के ख्वाहिशमंद कोटा सेंट्रल जेल के डिप्टी जेलर के रहस्यों का पिटारा खुल गया. इसी के साथ जेल में व्यापक रूप से फैला जेलर की वसूली का मायाजाल और गैंगस्टर्स से गठजोड़ बेपरदा हो गया. डिप्टी जेलर बत्तीलाल, जिस के पास जेलर का भी चार्ज था, ने लंबे समय से जेल के कैदियों से हिंसक सलूक करते हुए पूरी जेल को अपनी जागीर समझ रखा था. जेल की यातना से नया कैदी तभी बच सकता था, जब वह एक निश्चित रकम अदा कर देता था. यह रकम कैदी के घर वालों को अदा करनी होती थी.

यह खेल जेलर और पुराने कैदियों की सांठगांठ से चल रहा था. एसीबी के हत्थे चढ़ा कोटा जेल का जेलर बत्तीलाल वसूली के इस खेल में हर महीने 5 लाख से ज्यादा की कमाई कर रहा था. एसीबी ने सारे सबूत जुटा कर सोमवार 3 अप्रैल की रात 9 बजे घेराबंदी कर के जेलर बत्तीलाल मीणा तथा उस के लिए वसूली कर रहे दलाल राजू उर्फ हंसराज नागर को साढ़े 12 हजार रुपए के साथ रंगेहाथों गिरफ्तार कर लिया.

एसीबी के एएसपी चंद्रशील ठाकुर के अनुसार, ‘जेलर और दलालों को पकड़ने तक की काररवाई में इंसपेक्टर विवेक सोनी, हैडकांस्टेबल सुवालाल, कांस्टेबल सत्येंद्र सिंह, सरोज गौड़ और राजेंद्र मालव ने अहम भूमिका निभाई थी. हालांकि डिप्टी जेलर बत्तीलाल ने अपनी गिरफ्तारी पर शोर तो बहुत मचाया कि उसे जबरन फंसाया जा रहा है लेकिन उस की इस चीखपुकार पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.’

जेल प्रशासन एवं पुराने और खतरनाक अपराधियों की मिलीभगत से जेलों में चलने वाला वसूली का यह खेल कोई नया नहीं है. लेकिन कोटा की जेल में जबरन वसूली के पाप का घड़ा कैसे फूटा, इस के पीछे अपराधियों की आपसी रंजिश और वर्चस्व की जंग थी. इस के अलावा विद्युत निगम के इंजीनियर खेमचंद (परिवर्तित नाम) का खुलासा भी था.

जेल में कैदियों की निर्ममता का शिकार खेमचंद जब जमानत पर छूट कर बाहर आया तो उस ने अपनी व्यथाकथा अपने परिचित एक वरिष्ठ आईएएस अफसर को बताई. जेल में चल रहे खेल को सुन कर वह भौचक रह गए. उन्होंने एसीबी के एक बड़े अफसर को जब उस इंजीनियर की आपबीती बताई तो वह भी हैरान रह गए.crime-story-corrupt-jailer

उन्होंने अपनी तसल्ली के लिए खेमराज को बुला कर अपने हिसाब से पूछताछ की. बस उसी दिन से बत्तीलाल मीणा की उलटी गिनती शुरू हो गई. इस के बाद बत्तीलाल के बारे में एसीबी ने पता लगाया तो जो जानकारी मिली, चौंकाने वाली थी. इस से पहले बत्तीलाल बूंदी में भी अपनी कारगुजारियां दिखा चुका था. उस के खिलाफ भ्रष्टाचार को ले कर एफआईआर भी दर्ज हुई थी. जांच में पुलिस ने अपराध को प्रमाणित भी किया था, लेकिन बत्तीलाल ने अपने रसूख से मामला ठंडे बस्ते में डलवा दिया था.

कैदियों के घर वालों से वसूली गई राशि के साथ पकड़े गए डिप्टी जेलर बत्तीलाल और दलाल राजू उर्फ हंसराज नागर की विस्तार से जांच की गई तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ. वसूली के इस खेल को रुद्राक्ष हत्याकांड का आरोपी अनूप पाडि़या अपने भाई अंकुर पाडि़या के साथ खुलेआम चला रहा था. लोगों को जो चीजें जेल के बाहर आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं, वे जेल के अंदर आसानी से मिल रही थीं.

दलाल राजू उर्फ हंसराज नागर की गिरफ्तारी के बाद उस के सहयोगी इमरान को भी घंटाघर के हिरण बाजार से गिरफ्तार कर लिया गया. रकम की वसूली कैसे होती थी, इस बारे में दलाल राजू ने बताया कि सौदेबाजी के लिए जेल में बंद कैदियों की उन के घर वालों से बात कराई जाती थी.

बातचीत में तय हो जाता था कि कितनी रकम कहां, किसे देनी है. खुद को ड्राइवर बताने वाले राजू का कहना था कि जेल में बंद कैदियों को सुविधाएं देने और मारपीट से बचने के नाम पर रोजाना 10 से 15 हजार रुपए की वसूली की जाती थी. वसूली की रकम जेलर बत्तीलाल को सौंपने के लिए उस ने कोडवर्ड बना रखा था. जेलर कहता था कि खाना बन गया है तो ले आओ, मुझे भूख लगी है.

राजू के अनुसार, खाने का मतलब वसूली की उस रकम से होता था, जिसे मीणा तक पहुंचाना होता था. वह इस रैकेट से तब जुड़ा था, जब वह लाला बैरागी हत्याकांड के आरोपी सत्येंद्र उर्फ भाया को जेल में खाना पहुंचाने जाया करता था. तभी एक दिन भाया ने उसे रुद्राक्ष हत्याकांड के आरोपी अनूप पाडि़या से मिलवा कर कहा कि तुम इस के लिए काम करना. अच्छा पैसा मिलेगा. अच्छा पैसा मिलना था, इसलिए वह लालच में आ गया था.

एसीबी के अनुसार, वसूली के चक्कर में जेलर बत्तीलाल मीणा और अनूप पाडि़या की लगभग रोज मुलाकात होती थी. मीणा जब भी अनूप या अन्य कैदियों से मिलने उन की बैरक की ओर जाता था, कैमरों की नजरों से बचने के लिए एमबीसी डाउन कर लेता था. इस के बावजूद दोनों खुद को कैमरे की नजरों से बचा नहीं सके.

एसीबी ने जेल से सीसीटावी कैमरों की जो फुटेज हासिल की है, उस में एसीबी की काररवाई से करीब आधे घंटे पहले यानी 3 अप्रैल को करीब साढ़े 8 बजे मीणा और अनूप बैरक से जेलर के कक्ष में जाते हुए दिखाई दिए हैं. जेल में बंद खतरनाक अपराधी जिस तरह खुल कर सुविधाएं भोग रहे थे और बेधड़क मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे थे, उसे देख कर यह कहना गलत नहीं होगा कि जेल में उन की मौज थी. कैदी जो चाहते थे, उन्हें वह सब मिल रहा था. टीवी, अच्छे कपड़े, लजीज खाना, सब कुछ. यानी उन के लिए जेल नहीं आरामगाह थी.

एसीबी के अनुसार, इस रैकेट में 4 दलाल सक्रिय थे. राजू और इमरान पकड़े जा चुके हैं, बाकी की तलाश जारी है. जेल में कैदियों और उन के घर वालों से वसूली कैसे की जाती थी, इस की परतें धीरेधीरे खुल रही हैं, जिन में कैदियों और उन के घर वालों का दर्द भी सामने आ रहा है. चौंकाने वाली बात यह थी कि वसूली के इस खेल में एकलौता जेलर बत्तीलाल मीणा ही लिप्त नहीं था, कुछ और कर्मचारी भी शामिल थे, जो रिहाई और ठप्पा लगाने की एवज में भरपूर चांदी काट रहे थे.

ठप्पा मतलब जिन कैदियों को तारीख पर अदालत नहीं जाना होता, उन के वारंट पर जेलर ठप्पा लगाता है. इस में कैदी को बीमार बता कर अदालत जाने से बचा लिया जाता था, इस के लिए कम से कम हजार रुपए लिए जाते थे. इस के अलावा कैदियों की रिहाई की भी फीस ली जाती थी. जिस जेलर के पास रिहाई का जिम्मा होता है, वह उसे तब तक अटकाए रखता था, जब तक उसे मुनासिब कीमत नहीं मिल जाती थी. सूत्रों के अनुसार, वहां हर काम का दाम तय था. ऊपर से वे शेखी भी बघारते थे कि उन का कोई कुछ नहीं कर सकता.

जेल से जुड़े लोगों का कहना है कि जेलों में वसूली और गैंगस्टरों की दबंगई कोई नई बात नहीं है. लेकिन कोटा जेल में जेलर और गैंगस्टरों की मनमानी हद पार कर गई थी, जो कैदियों और उन के घर वालों पर कहर बन कर टूट रही थी. आखिर डिप्टी जेलर बत्तीलाल मीणा इतना दुस्साहसी और आतंक का पर्याय कैसे बन गया था. यह जानने के लिए हमें एक साल पीछे लौटना होगा.

बत्तीलाल के लालच की शुरुआत 27 अक्तूबर, 2016 को तब शुरू हुई, जब दलाल राजू ने दीपावली पर गिफ्ट के रूप में उसे टीवी भेंट किया. उस समय जेल कैंटीन मुकेश नामक गैंगस्टर चलाता था. जब उसे दूसरी जेल में भेजा जाने लगा तो जाने से पहले उस ने जेलर बत्तीलाल मीणा की मुलाकात अनूप पाडि़या से करा कर कहा कि यह काम का बंदा है. इसे जेल की कैंटीन सौंप दो. बदले में यह आप की हर ख्वाहिश पूरी करेगा.

मुकेश ने अनूप को जेल के बारे में सब बता दिया था. उस ने कहा था कि साहब का खयाल रखोगे तो तुम्हारे वारेन्यारे हो जाएंगे. डिप्टी जेलर बत्तीलाल को खुश करने की शुरुआत अनूप ने टीवी गिफ्ट कर के की थी. दलाल राजू के जरिए उस ने उसे टीवी भिजवाया तो दोनों के बीच मधुर संबंध बन गए, जो दिनोंदिन गहराते गए. फिर तो असलम तोता जैसे रसूखदार गैंगस्टरों से बत्तीलाल का मोह भंग हो गया.

सूत्रों के अनुसार, जेलर बत्तीलाल ने वसूली का पूरा रैकेट अपनी योजना के अनुसार खड़ा किया और अनूप पाडि़या को जेल में वसूली का सरगना बना दिया.

गुजरते समय के साथ बत्तीलाल ने अपना पूरा साम्राज्य खड़ा कर लिया. लेकिन अनूप पाडि़या से मिलने के बाद गैंगस्टर असलम तोता और शकील का गठजोड़ उन की आंखों की किरकिरी बन गया.

दरअसल, जेल में सब से बड़ा गैंगस्टर होने के नाते असलम तोता का जबरदस्त दबदबा था. लगभग उतना ही रुतबा गैंगस्टर शकील का भी था. लेकिन अनूप को मोहरा बना कर अपना एकछत्र साम्राज्य कायम करने में बत्तीलाल को असलम तोता और शकील से निपटना पड़ा.

जेलर और जेल में बंद गिरोहों की रंजिश के बीच सरगना बने अनूप के होश उस समय उड़ गए, जब एसीबी ने बत्तीलाल और उस का आमनासामना कराया. लेकिन बत्तीलाल ने कहा कि वह अनूप को जानता तक नहीं है. पूछताछ में बत्तीलाल ने सिर्फ इतना कहा कि अनूप को सिर्फ वह इतना जानता है वह एक कैदी है. बत्तीलाल ने उस के द्वारा दिए टीवी के बारे में भी मना कर दिया.

अनूप पाडि़या की यह बात भी झूठी पाई गई कि जेल में मोबाइल फोन मौजूद हैं. क्योंकि एसीबी की तलाशी में जेल में एक भी मोबाइल फोन नहीं मिला था. इसलिए वह झूठा साबित हो गया था. एसीबी की तलाशी में भले ही मोबाइल नहीं मिले, लेकिन सभी जानते हैं कि जेलों में मोबाइल का उपयोग धड़ल्ले से होता है. सूत्रों के अनुसार तलाशी के समय मोबाइल फोन ऐसी जगह छिपा दिए जाते हैं, जहां तलाशी वाले नहीं पहुंच पाते. वैसे भी कोटा जेल ठूंसठूंस कर भरी गई बस की तरह है. वहां सुई तलाशने की जगह कैसे बन सकती है? कोटा जेल की हालत इसी बात से समझ में आ जाती है कि एक हजार बंदियों की क्षमता वाली इस जेल में डेढ़ हजार बंदी भरे हुए हैं.

बहरहाल, डिप्टी जेलर बत्तीलाल मीणा को निलंबित कर दिया गया है. अभी एसीबी की जांच चल रही है. डीजी जेल का कहना है कि जांच में दोषी पाए जाने वाले अन्य कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. जेल में बंद खतरनाक कैदियों को हाई सिक्योरिटी वाली जेलों में भेजा जाएगा.      ?

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

विवाह, विवाद और तलाक : हिंसा से बचने के लिए तलाक को बनाएं आसान

दिल्ली की एक निम्नमध्यम कालोनी में रह रहे बस ड्राइवर पति ने अपने बच्चों के सामने अपनी पत्नी की इसलिए हत्या कर डाली क्योंकि वह मायके से ससुराल जाने को मना कर रही थी.

10 साल के बेटे के बीचबचाव के बावजूद पति ने पत्नी पर चाकू से वार भी किए और फिर उस पर गैस सिलैंडर मार कर उस की जान ले ली.

पुलिस स्टेशन पहुंच कर भी उस का गुस्सा शांत न हुआ और जेल से बाहर आ कर वह ससुराल वालों व अपने बच्चों को मारने की धमकियां देता रहा.

पतिपत्नी विवाद में इस तरह की घटनाएं आम हैं. जिस पति के हुक्म को मानने में पत्नी को बेहद खुशी मिलती है और जिस पत्नी के चेहरे पर एक मुसकान देखने के लिए पति पहाड़ पर चढ़ जाता है वे पतिपत्नी एकदूसरे की जान के हत्यारे बन जाते हैं, यह नया नहीं है. सभ्यता ने साथ रहना सिखा दिया पर आमतौर पर पतिपत्नी में गंभीर विवाद अकसर होते रहे हैं.

पतिपत्नी में सौहार्द के अभाव का बड़ा कारण यह है कि इस संबंध में एक, अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है. दोनों एकदूसरे के पूरक हैं, यह बात समाज नहीं सिखा पाया है. विवाह को धर्म ने किसी काल्पनिक शक्ति का आदेश दे कर स्थिर करने की कोशिश की  पर उस ने धर्म के बिचौलियों को विवाह पर ज्यादा अधिकार दे दिए, विवाह को सुखद कम बनाया.

जब से तलाक के कानून बने हैं, तब से कम से कम दोनों को अलग होने के अधिकार तो मिल गए हैं. वह पति, जिस ने पत्नी की हत्या कर दी, अगर पत्नी से तलाक ले लिया होता, तो पत्नी पर हक न जता पाता. विवाह करना तो चुटकियों का काम है पर विवाह तोड़ना और तलाक लेना बड़ा महंगा व समय लगने वाला है. इसलाम का 3 तलाक का फार्मूला कुछ अच्छा था लेकिन एकतरफा होने की वजह से बेहद अनैतिक था.

अब जब दुनिया ने स्वीकार कर लिया है कि औरतें सब मामलों में बराबर के अधिकार रखती हैं और वे खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं, तो इस तरह की हिंसा से बचने के लिए तलाक को आसान बनाया जाना चाहिए.

जैसे कहीं भी पंडित, पादरी या काजी के हाथों घंटों में विवाह हो सकते हैं, वैसे ही तलाक भी हो जाएं. विवाद हो तो बच्चों के संरक्षण का हो, संपत्ति के बंटवारे का हो. और पतिपत्नी, तलाक के बाद अपनाअपना जीवन मनमरजी से जी सकें.

ब्याह के साथ झट तलाक कहनेसुनने में चाहे बुरा लगे पर पतिपत्नी अदालतों में जूतेचप्पलें घिसते रहें, इस का कोई अर्थ नहीं है.

आप भी जानिए कैसे दें बच्चे को पौटी की ट्रेनिंग

माता पिता बनने के बाद पेरैंट्स के लिए यह बड़ी चुनौती होती है कि वे अपने बढ़ते बच्चे को पौटी ट्रेनिंग कैसे दें? यह सही है कि जब बच्चा बैठने लगे तभी से उसे इस की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए, लेकिन कई बार बच्चा पौटी पर बैठते ही रोने लगता है. ऐसे में मातापिता उसे डायपर पहना देते हैं, जिस से उस की बैक में स्किन ऐलर्जी या रैशेज हो जाते हैं, जो उस की नाजुक त्वचा के लिए ठीक नहीं होते. सही ट्रेनिंग से बच्चा खुदबखुद पौटी आने पर बता देता है.

धैर्य से काम लें

इस बारे में मुंबई के जैन हौस्पिटल के शिशु रोग विशेषज्ञ डा. रोहित नार्वेकर कहते हैं कि अधिकतर मातापिता परेशान होते हैं कि वे बच्चे को पौटी ट्रेनिंग कैसे दें? उन के पास धीरज की कमी होती है. इसलिए बच्चा पौटी ट्रेनिंग लेने में असमर्थ होता है. वे सोचते हैं कि उन के बच्चे में कोई समस्या है, जबकि ऐसा कुछ नहीं होता है. कई बार तो वे थकहार कर डायपर पर आश्रित हो जाते हैं. यह सही है कि हर बच्चे की विकास प्रक्रिया एकदूसरे से भिन्न होती है और समय के साथ ही बच्चा सीखता है. लेकिन इन टिप्स के आधार पर बच्चे को पौटी ट्रेनिंग दी जा सकती है:

18 से 20 महीने के बाद से बच्चे को पौटी की ट्रेनिंग दी जा सकती है. जो 2 साल तक चलती है, क्योंकि उस के साथसाथ वह मैच्योर होता है और उसे ठीक तरह से पौटी इंस्ट्रक्शन समझ में आने लगते हैं.

पौटी सीट का साइज बच्चे के अनुसार होना चाहिए ताकि वह उस पर आराम से बैठ सके.

कई बार बच्चा कुछ संकेत देता है. मसलन, किसी कोने में जा कर खड़े हो जाना, अपना मुंह बनाना, पेट को पकड़ना आदि. इसे मातापिता को नोटिस करने की जरूरत होती है.

कई बार बच्चा कुछ खाने या पीने पर पौटी करता है. ऐसे में जब भी उसे भरपेट कुछ खिलाएं उसे पौटी पर बैठाने की कोशिश करें.

कुछ बच्चे शरारती होते हैं. पौटी पर बैठ कर तुरंत उठ जाते हैं, ऐसे में उन पर गुस्सा न करें या डांटें नहीं वरन उन के पास बैठ कर कुछ बातें करें, उन्हें खिलौने दें, कोई स्टोरी सुनाएं आदि. 10 से 15 मिनट तक उन का ध्यान बटाएं. इस से उन्हें एक स्थान पर बैठने की आदत बनेगी.

अगर पौटी घर पर न भी हो, तो भी टौयलेट में ले जा कर उसे यूरिन करवाएं, बारबार टौयलेट में यूरिन करतेकरते पौटी की आदत पड़ जाएगी.

अगर बच्चा पौटी पर बैठने से कतराता है और रो कर उठ जाता है, तो उसे जबरदस्ती न बैठाएं. 1 हफ्ते बाद फिर से बैठाने की कोशिश करें.

उसे टौयलेट में ले जा कर समझाएं कि पौटी, पैंट में न कर टौयलेट या पौटी में करते हैं.

डायपर पहनाएं, लेकिन हमेशा नहीं, क्योंकि इस से बच्चे की स्किन पर रैशेज हो जाते हैं और उसे काफी समय तक पौटी और यूरिन में रहना पड़ता है. यह बच्चे की सेहत के लिए ठीक नहीं होता.

रोज बच्चे को फिक्स समय पर पौटी पर बैठाएं. इस से उसे समय पर पौटी करने की आदत पड़ जाती है.

कभी अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चे से न करें. हर बच्चे का विकास और सीखने की आदत अलगअलग होती है.

डा. रोहित कहते हैं कि सब से जरूरी है धैर्य, जो मातापिता दोनों को होना चाहिए ताकि एक अच्छी आदत बच्चे में पनप सके. कई बार मातापिता अपने बच्चे के विकास में कमी समझते हैं और डाक्टर के पास सलाह के लिए पहुंच जाते हैं, जो गलत है. कुछ बच्चों को पौटी ट्रेनिंग में 2 साल से भी अधिक समय लग सकता है.

खेल खेल में बच्चे को सिखाएं काम की बातें

तेजी से बदलती जीवनशैली का प्रभाव क्या केवल आप के जीवन पर ही पड़ रहा है? क्या समय की कमी सिर्फ आप को ही परेशान करती है? औफिस की व्यस्तता और मल्टीटास्किंग से क्या आप ही परेशान हैं? नहीं, ये तमाम बातें आप के अलावा आप के बच्चों को भी परेशान करती हैं. जिन की वजह से अकसर वे चिड़चिड़े और आलसी दिखते हैं और आप की बात नहीं मानते हैं. उन्हें छोटीछोटी बातें समझाने में भी दिक्कत आती है. पेरैंट्स होने के नाते आप परेशान हो जाते हैं.

6 से 12 साल की उम्र बहुत से बदलावों की होती है. इस दौरान शारीरिक बदलावों के साथसाथ बच्चों में स्वभाव को ले कर भी कई तरह के बदलाव देखे जाते हैं. लेकिन वह उम्र होती है जब बच्चों को कई अहम बातों के बारे में बताना जरूरी होता है.

ऐसे में विशेषज्ञों की राय काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है. खासतौर से कामकाजी पेरैंट्स के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं कि वे अपने छोटे या बढ़ते बच्चों को कैसे समझाएं या उन के साथ कैसे डील करें.

पढ़ाई में लगाएं फन का तड़का

बच्चों के साथ उन की फन ऐक्टिविटीज में भाग लें.

बच्चों को पेंटिंग का बहुत शौक होता है. इस कार्य में उन का अच्छा दोस्त बना जा सकता है.

उन्हें बताएं कि कौन से 2 रंग मिलाने पर कौन सा नया रंग बनता है.

उन से अपने बचपन की बातें शेयर करें. उन्हें यह न बताएं कि आप बचपन में हर काम में बहुत निपुण थे, बल्कि बताएं कि फलां कार्य करने में आप को भी बहुत परेशानी होती थी.

बच्चों के संग समय बिताएं. उन के साथ टीवी देखें. उन की पसंदनापसंद के बारे में पूछें.

अपना टेस्ट उन के साथ शेयर करें. मसलन, अगर आप उन्हें बताना चाहते हैं कि बाहर गरमी से आने पर तुरंत फ्रिज का ठंडा पानी पीने से गला खराब हो सकता है, तो इस बात पर अमल भी कर के दिखाएं.

अगर आप पिता हैं तो छुट्टी वाले दिन उन के साथ उन के स्कूल बैग का हालचाल जानें. उन के दोस्त बनें, डांटफटकार करने वाले पिता नहीं.

अपनी रुचियां उन पर न थोपें, बल्कि उन की पसंदीदा चीजों संग अपनी रुचि भी जाहिर करें.

उन्हें मजेमजे में बताएं कि शैतानियों में क्या अच्छाबुरा होता है. जैसेकि हर इनसान को पेड़ पर चढ़ना आना चाहिए, लेकिन पेड़ से गिरने पर जोर की चोट भी लग सकती है. इसलिए अपने सामने उन्हें ऐसा करने की सलाह दें.

किसी अनजान से बात न करें. यह बात उन्हें किसी ऐक्टिविटी के माध्यम से समझाने की कोशिश करें. हो सके तो इस तरह की बातें अपने बच्चों को उन के दोस्तों के सामने समझाएं.

छुट्टी वाले दिन सुबह जल्दी उठ कर पार्क जाएं, जौगिंग करें. यह बात केवल मौखिक रूप से न समझाएं, बल्कि छुट्टी वाले दिन आप खुद भी जल्दी उठ कर बच्चों के साथ पार्क जाएं.

गुड और बैड टच के बारे में प्यार से समझाएं

बच्चे बहुत जिज्ञासु होते हैं खासतौर पर बढ़ती उम्र में जब वे अपने और अपने पेरैंट्स के शरीर में अंतर देखते हैं.

वे इस बात की ओर भी बहुत जल्दी ध्यान देते हैं कि लड़के और लड़की के शरीर में काफी अंतर होता है.

जब बच्चा आप से अपने प्राइवेट अंगों के बारे में कुछ पूछे तो उसे समझाएं कि लड़की और लड़के में यह अंतर उन के प्रजनन अंगों की वजह से होता है.

बच्चे को निजी अंगों के वैज्ञानिक नाम बताने से झिझकें नहीं. आप नहीं बताएंगे तो वह बाहर से कुछ और ही सीख कर आएगा.

उन्हें बताएं और किताब का हवाला दें कि देखो किताब में इसे पेनिस या इसे वैजाइना कहते हैं.

2-3 साल के बच्चे को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में बताने का सब से अच्छा समय होता है.

उन्हें बताएं कि कोई अनजान उन के निजी अंगों को नहीं छू सकता. केवल मातापिता उन्हें छू सकते हैं.

उन्हें बताएं कि अगर कोई अनजान व्यक्ति उन के निजी अंगों को छूता है तो उन्हें क्या करना चाहिए.

– डा. संदीप गोविल, मनोचिकित्सक, सरोज सुपर स्पैश्यालटी अस्पताल, नई दिल्ली

30 सितंबर के बाद अमान्य हो जाएंगे इन बैंकों के चेक

देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक स्टेट बैंक औफ इंडिया (SBI) ने अपने पांच पूर्व सहयोगी बैंक और भारतीय महिला बैंक के ग्राहकों से नई चेक बुक के आवेदन के लिए कहा है.

बैंक ने ग्राहकों को तुरंत प्रभाव से नई चेक बुक का आवेदन करने के लिए इसलिए कहा है कि क्योंकि 30 सितंबर, 2017 के बाद पुराने बैंक के चेक और IFS कोड वैध नहीं होंगे, इन्हें अमान्य करार दिया जाएगा.

एसबीआई ने ग्राहकों से कहा है कि नई चेक बुक के लिए इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, एटीएम या फिर शाखा में जाकर तुरंत आवेदन कर लें. जानकारी के लिए बता दें कि जिन सहयोगी बैंकों का एसबीआई में विलय किया गया है उनमें स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक औफ हैदराबाद, स्टेट बैंक औफ मैसूर, स्टेट बैंक औफ पटियाला, स्टेट बैंक औफ त्रवणकोर और भारतीय महिला बैंक शामिल हैं. स्टेट बैंक औफ मैसूर में एसबीआई का 90 फीसदी हिस्सा था जबकि बीकानेर एंड जयपुर में 75.07 फीसदी था. त्रवणकोर में एसबीआई की हिस्सेदारी 79.09 फीसदी है.

एसबीआई उन्नति कार्ड

एसबीआई ने नये क्रेडिट कार्ड की पेशकश की है. बैंक ने इसका नाम उन्नति क्रेडिट कार्ड रखा है. पहले चार वर्षों के लिए यह सेवा पूरी तरह मुफ्त रखी गई है. अन्य क्रेडिट कार्ड की तरह ही यहां भी उपयोग पर रिवार्ड प्वाइंट्स की सुविधा है. एसबीआई की वेबसाइट के अनुसार, कार्ड से सौ रुपए की शौपिंग करने पर एक रिवार्ड प्वाइंट मिलेगा. इन प्वाइंट्स को रीडिम करने के बदले गिफ्ट दिए जाएंगे.

साथ ही इसके एक वर्ष में 50 हजार रुपए या ज्यादा खर्च करने पर 500 रुपए केशबैक की सुविधा है. यह कार्ड एसबीआई के उन ग्राहकों के लिए होगा, जिन्होंने बैंक में 25 हजार या इससे ज्यादा की एफडी करवाई है. ग्राहक एसबीआई उन्नति कार्ड का इस्तेमाल दुनियाभर के 24 मिलियन आउटलेट में कर सकते हैं, इसमें 3,25,000 आउटलेट भारत में हैं.

विश्व की 10वीं सबसे महंगी जगह है दिल्ली का कनाट प्लेस

अगर आप दिल्ली के कनाट प्लेस पर आफिस लेना चाहते हैं तो ये आपके लिए काफी महंगा सौदा साबित हो सकता है, क्योंकि प्रापर्टी सलाह देने वाली कंपनी सीबीआरई के अनुसार, 111 डालर प्रति वर्गफीट के वार्षिक किराए के साथ दिल्ली का कनाट प्लेस आफिस के लिए विश्व की 10वीं सबसे महंगी जगह है. इस आधार पर विश्व की महंगी जगह में मुंबई का बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स 16वें तथा नरीमन प्वाइंट 30वें स्थान पर रहा है. इसप्रकार अब दिल्ली का कनाट प्लेस किराए पर आफिस लेने की दृष्टी से दुनिया की दसवीं सबसे महंगी जगह में शामिल हो गया है. हालांकि, पिछली बार के मुकाबले उसका स्थान एक पायदान नीचे आ गया है.

आपको बता दें कि सीबीआरई ने एक बयान जारी कर कहा कि दिल्ली का कनाट प्लेस 111 डालर प्रति वर्गफीट के सालाना किराए के साथ आफिस के लिए विश्व की दसवीं सबसे महंगी जगह के रूप में सामने आई है. इसके पायदान में एक स्थान की गिरावट हुई है. मार्च 2017 में यह नौवें स्थान पर था.

सीबीआरई के अध्यक्ष (भारत और दक्षिण पूर्व एशिया) अंशुमन मैगजीन ने कहा कि देश में बेहतर मांग के कारण रीयल एस्टेट क्षेत्र के लिए व्यावसायिक आफिस बाजार, स्थिर लीज और किराये के साथ वैश्विक निवेशकों की जारी दिलचस्पी की वजह से आकर्षक बना हुआ है.

रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में एशियाई बाजारों ने शीर्ष दस स्थानों पर अपना दबदबा बनाया है. हान्ग कान्ग महंगे आफिस के मामले में शीर्ष तीन स्थानों में से दो पर कब्जा किया है. हान्ग कान्ग सेंट्रल 269 डालर प्रति वर्गफीट के सालाना किराए के साथ शीर्ष पर, बीजिंग के फायनेंस स्ट्रीट ने 174 डालर वर्गफीट सालाना किराए के साथ दूसरे और हान्ग कान्ग के वेस्ट कोलून ने 164 डालर प्रति वर्गफीट सालाना किराए के साथ तीसरे स्थान पर है.

न्यूयार्क का मिडटाउन मैनहट्टन और बीजिंग का सीबीडी शीर्ष पांच में शामिल है. दिल्ली के कनाट प्लेस समेत तोक्यो का मारुनोऊची और ओतेमाची और शंघाई का पुदोंग भी शीर्ष दस में शामिल है.

अगर लेना है डीएसएलआर कैमरा, तो पहले जान लें उसके बारे में

अगर आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं तो आप डीएसएलआर लेने के बारे में जरुर सोचते होंगे और सही भी है, बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए डीएसएलआर कैमरा ही बेस्ट औप्शन है. फोटोग्राफी के शौकीन लोगों को डीएसएलआर कैमरे से तस्वीरें खींचना ज्यादा पसंद होता है.

इन कैमरों से खींची तस्वीरों की क्वालिटी बेहतर होती है, साथ ही इनकी पिक्चर क्वालिटी काफी क्लियर होती है. डीएसएलआर कैमरे का खास इस्तेमाल प्रोफेशनल स्पोर्ट्स फोटोग्राफर्स, प्रेस फोटोग्राफर्स और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर्स करते है, तो आइए जानते हैं कुछ ऐसे डीएसएलआर कैमरों के बारे में जिन्हें आप कभी भी खरीद सकते हैं.

Canon EOS 1300D

कैनन का EOS 1300D कैमरा डीएसएलआर में सबसे कम कीमत में उपलब्ध हैं. इसमें 18 मेगापिक्सल CMOS सेंसर, 1 क्रौस टाइप AF पौइंट के साथ 9 AF पौइंट, 100-6400 की एक आईएसओ रेंज (विस्तार करने के लिए 12,800) और वाई फाई और एनएफसी जैसे फीचर दिए गए है. इसमें दिए गए वाई फाई और एनएफसी की मदद से कैमरे के सभी तस्वीरों को आप स्मार्टफोन में ट्रांसफर कर सकते हैं.

Nikon D3300

यह एक बेहतर किफायती कैमरा है. यह 24 मेगापिक्सल CMOS सेंसर, 11 AF पौइंट, IOS रेंज की 100-12,800 और 60 एफपीएस पर फुल एचडी वीडियो के साथ आता है. हालांकि दूसरे DSLR कैमरों के मुकाबले में निकौन डी 3300 में थोड़े कम फीचर्स दिए गए है. इसकी बेहतर फोटो क्वालिटी और बेहतरीन परफौर्मेंस के कारण यह कैमरा आपका पहला डीएसएलआर बन सकता है.

Canon EOS 750D

यह कैमरा उन लोगों की पहली पसंद बन सकती है जो लोग नई नई फोटोग्राफी सीख रहे हैं. यह एक टचस्क्रीन डिस्प्ले के साथ आता है. यूजर्स इसके डिस्प्ले को टच करके भी फोटोज क्लिक कर सकते हैं. कैनन के इस कैमरे में 18 मेगापिक्सेल CMOS सेंसर है और 9 पौइंट आल क्रौस टाइप F सिस्टम हैं, जो शानदार तस्वीरों और वीडियो फुटेज को कैप्चर करता है.

Nikon D5500

निकौन D500 अभी तक के देखे गए कैमरों में बेस्ट है. यह कैनन 750 डी को टक्कर देता है. इसमें टच स्क्रीन डिस्प्ले, बिल्ट इन, वाई फाई, और ट्वीड डिजाइन जैसे फीचर्स शामिल किए गए हैं. इसमें 39 फोकस पौइंट हैं (जैसा कि 750 डी पर है). कुल मिलाकर, निकौन D500 कैमरे का लुक काफी अच्छा है. साथ ही शूटिंग के दौरान यह अच्छा परफौर्मेंस देता है.

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