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औनलाइन पेमेंट करते वक्त ध्यान में रखें ये 8 बातें

नोटबंदी के बाद से औनलाइन पेमेंट और ट्रांजेक्शन्स का चलन बढ़ता जा रहा है. सरकार भी कैशलेस इकोनामी के लिए लोगों को बढ़ावा दे रही है. ये आसान होने के साथ समय भी कम लेता है.

औनलाइन पेमेंट करते समय फ्रौड होने के मामले बढ़ते जा रहे हैं जिन्हें सुनकर आपको चिंता हो सकती है. लेकिन आपको जरने की कोई जरूरत नहीं है. आप औनलाइन पेमेंट करते समय कुछ सावधानियों को अपनाकर फ्रौड की संभावनाओं से बच सकते हैं.

जानें 8 ऐसे टिप्स जो आपके औनलाइन पेमेंट और ट्रांजेक्शन को सिक्योर बनाने में पूरी मदद करेंगे.

पब्लिक वाई-फाई और कंप्यूटर्स के इस्तेमाल से बचें

कभी भी पब्लिक वाई-फाई पर अपने फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन्स न करें क्योंकि हैकर्स बड़ी आसानी से पब्लिक वाई-फाई नेटवर्क को हैक कर सकते हैं और आपकी लौगिन-पासवर्ड डिटेल्स चुरा सकते हैं. अगर आपको बाहर फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन करने ही हैं तो अपने फोन के मोबाइल नेटवर्क का इस्तेमाल करें.

सावधानी से सर्च करें

अक्सर आप इंटरनेट पर जो भी सर्च करते हैं वो सर्च हिस्ट्री की मेमोरी में रहता है लेकिन इसमें कई बार ऐसे भी लिंक खुल जाते हैं जो मालवेयर होते हैं. ऐसे लिंक अगर आपकी सर्च हिस्ट्री में पड़े रहेंगे तो आपको औनलाइन पेमेंट करते समय अपने सिक्योर डेटा के चोरी होने का खतरा रहेगा. तो आपके लिए यही सलाह है कि आप समय-समय पर अपनी सर्च हिस्ट्री क्लियर करते रहें और संदेहास्पद लिंक को अपने सिस्टम या लैपटाप से साफ करते रहें.

अपना महत्वपूर्ण डेटा अपने पास रखें

किसी भी पेमेंट साइट और वेब ब्राउजर पर अपनी बैंक डिटेल्स और पर्सनल डिटेल्स को सेव न करें. जब भी काम खत्म हो जाए तब हमेशा लौग आउट कर लें. इंफौर्मेशन को हमेशा टाइप करना चाहिए न कि आपको कौपी पेस्ट करना चाहिए.

एक ही ई-मेल एड्रेस का इस्तेमाल करें

अपने फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन्स, औनलाइन पेमेंट के लिए एक डेडीकेटेड ई-मेल एड्रेस का इस्तेमाल करें जिससे आपके ये ट्रांजेक्शन्स और सिक्योर हो सकें, फिशि मेल्स और स्पैम के जरिए आपके ई-मेल की हैकिंग न हो सके और आपका बैंक खाता सिक्योर रहे.

क्लिक करने की जगह टाइप करें

अपने पसंदीदा रिटेलर्स की वेबसाइट खोलते समय उसके लिए औटोमैटिक रूप से सामने आए लिंक को खोलने की जगह उसका यूआरएल टाइप करें. ध्यान रखें कि आप जो यूआरएल टाइप कर रहे हैं उसकी शुरुआत में https ही हो क्योंकि ये ‘s’ सिंबल एक सिक्योर साइट का संकेत होता है.

टेंप्ररेरी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करें

आप टेंप्ररेरी क्रेडिट कार्ड या ऐसे क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करें जिनकी पेमेंट लिमिट कम हो. अक्सर मर्चेंट ग्राहकों को अस्थाई या टेंप्ररेरी क्रेडिट कार्ड देते हैं जो वनटाइम परचेज या उसी रिटेलर के यहां खरीदारी पर काम आ सकते हैं. तो अगर असावधानीवश आपका क्रेडिट कार्ड खो भी जाए तो उससे आपके बैंक खाते में रखे पैसे को किसी तरह का खतरा नहीं होगा.

सही ऐप डाउनलोड करें

अक्सर स्मार्टफोन की एप्स में मालवेयर होते हैं तो इन्हें डाउनलोड करने से आपको बचना चाहिये. ऐप को डाउनलोड करने से पहले इसके बारे में पढें, इसकी रेटिंग, टर्म्स और कंडीशन्स पढ़ लें. सिर्फ औफिशियल प्ले स्टोर, ऐप स्टोर से ऐप ही डाउनलोड करें.

पासवर्ड मैनेजर का यूज करें

पासवर्ड मैनेजर आपको कई सारे अकाउंट्स को मैनेज करने में मदद करता है, और अक्सर की जाने वाली गलतियों से बचाता है. जैसे अक्सर लोग अपने सारे अकाउंट्स के लिए एक ही पासवर्ड रखने की गलती करते हैं, इससे आपको पूरी तरह से बचाने का काम पासवर्ड मैनेजर के जरिए हो सकता है.

मारुति ने लौंच किया इस शानदार कार का नया एडिशन

देश की शीर्ष कार निर्माता कंपनियों में से एक मारुति सुजुकी इंडिया ने अपनी कार एस क्रौस में बदलाव कर नए एडिशन के साथ बाजार में एक बार फिर लौन्च किया है. लौन्च की गई इस नई एस क्रौस के चार अलग अलग एडिशन है, जिनकी कीमत 8.49 लाख रुपये से शुरू होकर 11.29 लाख रुपये तक है.

मारुति सुजुकी इंडिया और उसके सप्लायरों ने इस नई एस क्रौस के लिये 100 करोड़ रुपये से अधिक निवेश किया है. मारुति सुजुकी इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर ने कहा, ‘एस-क्रौस का नया मौडल, परिवर्तन की हमारी यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा. हमें भरोसा है कि एस-क्रौस प्रीमियम शहर में मारुति सुजुकी की स्थिति को मजूबत करेगा.’

माइलेज

नई एसक्रौस के सभी 4 वैरिएंट में मैनुअल ट्रांसमिशन के साथ 1248CC का डीजल इंजन दिया गया है और कंपनी के मुताबिक इसका माइलेज 25.1 किलोमीटर/लीटर है. सरल शब्दों में कहें तो यह कार 1 लीटर डीजल में करीब 25 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती है.

कंपनी ने अपनी नई एस क्रौस को चार अगल-अलग Sigma DDiS 200SH, Delta DDiS 200SH, Zeta DDiS 200SH और Alpha DDiS 200SH वैरिएंट  के साथ बाजार में उतारा है. इनकी कीमत 8 लाख 49 हजार से 11 लाख 29 हजार रुपए के बीच तय की गई है.

स्टेरिंग

इस कार में आप ड्राइविंग सीट के साथ ही स्टेरिंग को भी अपने मुताबिक एडजस्ट कर सकते हैं. इसमें औटो वाइपर सिस्टम भी दिया गया है, जिससे बारिश होने पर वायपर अपने आप चालू हो जाएंगे.

फीचर्स

नई कार के इंटीरियर फीचर्स की बात करें तो इसमें सामने दिए गए डैश बोर्ड में बदलाव करते हुए इसे जर्मन लक्जरी कार का लुक दिया गया है. टच स्क्रीन इंफोटेंमेंट सिस्टम भी दिया गया है, जो एंड्राइड औटो और एप्पल कार प्ले के साथ कम्पैटिबल है. वहीं क्रूज कंट्रोल और ड्राइवर साइड एंटी पिंच विंडो जैसे कई अनोखे फीचर भी इस नई एस क्रॉस में दिए गए हैं. नई एस क्रौस में बेहतर सीटिंग दी गई है जो लौन्ग ड्राइव के दौरान काफी आरामदायक और कंफर्ट है. फ्रंट गेट के दोनों साइड पानी की बोटल रखने का स्पेस दिया गया है. पीछे की सीट के बीच में भी इसी तरह की सुविधा है. वहीं लगेज रखने के लिए अच्छे खासे स्पेस के साथ एक डिग्गी दी गई है, जिसमें आप पहले से ज्यादा लगेज रख सकते हैं.

इंजन

नई एस क्रौस में पौवरफुल 1.6 लीटर का इंजन है. साथ ही DDiS 200 डीजल इंजन के साथ स्मार्ट हाइब्रिड टेक्नौलजी का इस्तेमाल भी किया गया है. इसके अलावा 216/60 कॉन्फिग्रेशन के साथ 16 इंच के वाइडर टायर दिए गए हैं जो, आपकी ड्राइव को पहले से शानदार बनाते हैं और सड़क पर बेहतर पकड़ भी देतें हैं.

रियर लैम्प्स

कंपनी ने कई जरूरी बदलाव के साथ नई एस-क्रौस को कई मामलों में शानदार लुक और फील दिया है. इसमें आगे लार्ज क्रोम ग्रिल दिए गए हैं, जो इसे एक हैवी और मस्क्यूलर लुक देते हैं. वहीं एस-क्रौस के रियर लैम्प्स में एलईडी का प्रयोग इसे मौडर्न लुक देता है.

सलमान खान ने सरेआम कहा कुछ ऐसा कि उनकी एक्स को आ सकता है गुस्सा

सलमान खान अपनी प्रोफेशनल लाइफ को लेकर जितने चर्चित हैं, उससे भी ज्यादा उनकी पर्सनल लाइफ इंटरेस्टिंग है. वे हमेशा किसी न किसी दिलचस्प वाकये को लेकर खबरों में बने रहते हैं. इसी तरह उनकी लव लाइफ और गर्लफ्रेंड्स के किस्से भी किसी से छुपे नहीं हैं. चाहे वो सोमा अली, संगीता बिजलानी हो या ऐश्वर्या और कैटरिना, उनकी गर्लफ्रेंड्स को लेकर हर बात फैन्स तक पहुंचती है.

सलमान का नाम तो वैसे कई अदाकाराओं के साथ जुड़ा, लेकिन कहा जाता है कि ऐश्वर्या से उन्हें सच्चा प्यार हुआ था और आज तक वे ऐश्वर्या को नहीं भूल पाए हैं. कुछ खबरों की मानें तो सलमान ने ऐश्वर्या की वजह से ही आज तक शादी नहीं की है, लेकिन इस बात का उन्हें कोई मलाल नहीं है. हाल ही में उन्होंने ऐसा ही बयान एक टीवी शो के दौरान दिया.

उन्होंने एक टीवी शो के प्रीमियर में दर्शकों के सामने कहा कि वे ‘एक्स’ बनकर बहुत खुश हैं. असल में वे एक कंटेस्टेंट के साथ स्टेज पर एक एक्ट का हिस्सा बने थे, जिसमें उन्होंने अपने डायलोग के तौर पर ये बात की. उन्होंने कहा कि ‘मैं एक्स बनकर खुश हूं.’

अब उन्होंने ये बात अपनी किस गर्लफ्रेंड को निशाना बनाते हुए कही है ये तो हम नहीं जानते, लेकिन हम इतना जरूर कह सकते हैं कि ये बात सुनकर उनकी एक्स गर्लफ्रेंड्स बुरा मान सकती हैं.

करोड़ों कमाने के बाद भी अपने ड्राइवर को सैलेरी नहीं दे पा रहे रणवीर सिंह

इन दिनों रणवीर सिंह अपनी अपकमिंग फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. उनकी स्टाइल और फैशन सेन्स के तो लाखों दीवाने हैं, लेकिन उनकी एक्टिंग भी किसी सुपरस्टार से कम नहीं है. फिल्म ‘बाजीराव-मस्तानी’ में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रणवीर सिंह खूब वाहवाही बटोर चुके हैं. लेकिन इन फिल्मों से करोड़ों कमाने के बाद भी वे अपने ड्राइवर को कुछ हजार की सैलेरी नहीं दे पा रहे.

जी हां, वैसे तो फैन्स के सामने रणवीर की इमेज बेहद अच्छी है, लेकिन इस खबर को सुनकर शायद वे अपसेट हो जाएं. एक मनोरंजन साईट पर छपी खबर के अनुसार रणवीर के ड्राइवर सूरज पाल की दो महीने की सैलेरी बकाया थी, जिसे लेकर वह रणवीर के मैनेजर से बात करने की कोशिश कर रहा था. लेकिन मैनेजर ने उसे पूरी तरह से इग्नोर किया और बौडीगार्ड से कहकर उसे बाहर निकालने के लिए कहा.

लेकिन इसी दौरान बौडीगार्ड और ड्राइवर के बीच झगड़ा हो गया. झगड़ा यहां तक बढ़ गया कि खुद संजय लीला भंसाली को बीच बचाव करना पड़ा. अंत में उन्होंने ड्राइवर को नौकरी से निकाल दिया और उससे कहा कि 1 दिन के अंदर उसे सैलेरी दे दी जाएगी. बता दें कि रणवीर के ड्राइवर की बकाया सैलेरी 85000 थी.

आईफोन 8 प्लस फटा, देखें फटने के बाद कैसा हो गया फोन

ऐपल की मोबाइल की दुनिया में एक अलग पहचान है. कंपनी ने हाल ही में अपने 3 नए स्मार्टफोन लान्च किए थे. आईफोन 8, आईफोन 8 प्लस और आईफोन X. लेकिन अब आईफोन 8 प्लस को लेकर दो मामले सामने आए हैं. आईफोन 8 प्लस में बैटरी फूलने की शिकायत आ रही है. ऐसे दो मामले 2 अलग अलग देशों से आए हैं.

पहला मामला ताइवान का है और दूसरा मामला जापान का है. दोनों ही यूजर्स ने फोटो को सोशल मीडिया में साझा किया है. दरअसल दोनों ही मामलों में बैटरी फूलने के बाद फोन अपने आप खुल गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पहले मामले में यूजर ने आईफोन 8 प्लस को पांच दिन तक यूज किया और चार्जिंग के दौरान आईफोन 8 प्लस फट कर खुल गया. ऐसा बैटरी के फूलने की वजह से हुआ क्योंकि इसमें कोई आग नहीं लगी और यह सिर्फ खुल गया. यह मामला ताइवान का है.

दूसरा मामला जापान का है. यहां यूजर ने दावा किया है कि उसे बौक्स में फटा हुआ यानी हार्डवेयर खुला आईफोन 8 प्लस मिला है. उन्होंने इसकी तस्वीर भी पोस्ट की है जिसमें आप देख सकते हैं कैसे आईफोन 8 प्लस बैटरी फूलने की वजह से खुल गया है.

दिग्गज अमेरिकी कंपनी ऐपल ने आईफोन 8 प्लस की इस कथित घटना के बाद जांच शुरू कर दी है. ऐपल के एक प्रवक्ता ने बताया है कि उन्हें इस मामले की जानकारी है और इसे देखा जा रहा है. बता दें कि यह पहली बार नहीं है कि आईफोन फटने की खबर आई है. ऐसा पहले भी हुआ है लेकिन ऐसे मामले न के बराबर होते हैं और यह बैटरी में कुछ दिक्कतों से होता है.

दिन दहाड़े

हमारा नया घर कोटा के श्रीनाथपुरम इलाके में बन रहा है. नलफिटिंग व लाइटफिटिंग का काम चल रहा था. हम ने सामान मंगवा कर कुछ घर के अंदर और कुछ बाहर चौकीदार की झोंपड़ी में रखवा दिया. मेरे पति, बाऊजी और मेरे देवर सुबहशाम मकान का काम देखने जाया करते थे.

एक दिन दोपहर में 3 बजे 2 व्यक्ति स्कूटी पर आए और कहने लगे, ‘‘बाऊजी ने बिजली के तारों की बोरी, जो तुम्हारी झोंपड़ी में रखी है, पुराने घर पर मंगवाई है.’’ उन सभ्य दिखने वाले व्यक्तियों की बातों पर विश्वास कर चौकीदार ने उन्हें बोरी पकड़ा दी. वे बोरी स्कूटी पर रख कर चलते बने.

शाम 5 बजे जब मेरे पति व बाऊजी मकान पर गए तो चौकीदार ने कहा, ‘‘बाऊजी, आप ने बिजली के तार पुराने घर पर मंगवाए. वहां पर भी काम चल रहा है क्या?’’ यह सुन कर बाऊजी व मेरे पति बोले, ‘‘हम ने कोई तार नहीं मंगवाया.’’

चौकीदार के होश उड़ गए. वह बोला, ‘‘बाऊजी, उन्होंने आप का नाम लिया और हम ने विश्वास कर लिया.’’ इस तरह हमें हजारों रुपए का चूना दिनदहाड़े लग गया.

राधा भारती काल्या

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मेरे पड़ोस में एक सज्जन के यहां नया एयरकंडीशन लगना था. कंपनी वाले शाम के समय मशीन रख गए और बोले, ‘‘सुबह दुकान खुलने पर हमारा आदमी आ कर इसे लगा देगा.’’ वे सज्जन अपनी मां के साथ रहते थे. उन की बीवी मायके गई हुई थी.

दूसरे दिन सुबह जब वे सज्जन औफिस जाने लगे तो मां से बोले, ‘‘जब कंपनी के आदमी एयरकंडीशन लगाने आएं तो मुझे फोन कर देना. मैं तुरंत औफिस से चला आऊंगा.’’ उन सज्जन का औफिस घर के पास ही था.

दूसरे दिन उन के घर करीब 11 बजे सुबह 2 लड़के आए और कहने लगे, ‘‘माताजी, हम लोग एयरकंडीशन लगाने आए हैं.’’ इस पर माताजी बोलीं, ‘‘बेटे को फोन कर देती हूं, वह अभी औफिस से आ जाएगा.’’ इस पर वे लड़के बोले, ‘‘अरे माताजी, फोन तो कर लो पर हम लोगों को जगह बता दीजिए कि एयरकंडीशन कहां पर लगाना है.’’

माताजी उन को कमरा दिखाने  ले गई. इतने में एक लड़का बोला, ‘‘माताजी, जरा यह तार तो पकडि़ए, हम लोग नाप लें कि कितना तार लगेगा.’’

माताजी ने तार को पकड़ा ही था कि उन्हें बेचैनी हुई. वे सिर पकड़ कर कुरसी पर बैठ गईं और बेहोश हो गईं. वे दोनों लड़के घर का कीमती सामान व नकदी ले कर फरार हो गए.  उपमा मिश्रा

शिंजो, मोदी, बुलेट ट्रेन और देश का अपमान

अहमदाबाद को देश का केंद्र बना कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न जाने क्या साबित करना चाह रहे हैं. अहमदाबाद देश का अच्छा विकसित शहर है पर है एक राज्य का शहर ही. यहां पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत कर और अब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे का आतिथ्य कर नरेंद्र मोदी यह दर्शा रहे हैं कि देश की राजनीति का प्रारंभ और अंत अहमदाबाद से है.

यह देश के साथ एक तरह का अपमान है. अहमदाबाद के साथ यदि लखनऊ, पटना, कोलकाता या बेंगलुरु को भी इस तरह का श्रेय मिलता तो बात दूसरी थी. प्रधानमंत्री का अपने गृहराज्य के प्रति यह प्रेम दर्शाता है कि वे देश पर गुजरातियों का राज थोपने की कोशिश कर रहे हैं जैसे जवाहरलाल नेहरू के जमाने में उत्तर प्रदेश का अघोषित राज थोपा हुआ था. यह बात दूसरी थी कि तब लखनऊ एक बड़ा गांव ही था और वहां विदेशी मेहमानों को बुलाना, होटलों की कमी के कारण संभव न था.

अहमदाबाद औद्योगिक शहर हुआ करता था और गुजरात की राजधानी भी. पर पिछले कुछ दशकों में गुजरात की राजधानी गांधीनगर में खिसक गई है और उद्योग जामनगर, सूरत, राजकोट, बड़ौदा, भुज आदि में. अहमदाबाद अब बिखरा हुआ शहर है जिस का आकर्षण नर्मदा के पानी से भरी साबरमती नदी मात्र है. इस नदी के दोनों किनारों पर आड़ीतिरछी बस्तियां हैं. असल में तो यह शहर 2002 के दंगों की याद ज्यादा दिलाता है, साबरमती के तट पर बसे गांधी के आश्रम की कम जिस के आसपास भव्य बहुमंजिले भवन बन गए हैं. गांधी की तरह आश्रम भी बौना बन कर, बस, प्रतीक रह गया है.

विदेशियों के लिए इसे मानक बना कर हम वही गलती कर रहे हैं जो सदियों से करते रहे हैं. आस्था और अंधविश्वास के नाम पर हम अपनी फटी चादर पर गर्व करते रहे हैं और ढोल पीटते रहे हैं. जापान के प्रधानमंत्री के हाथों मुंबई व अहमदाबाद के बीच अरबों की बुलेट टे्रन का शिलान्यास चाहे कर लें पर यह ट्रेन कभी सफल नहीं होगी क्योंकि हवाईयात्रा ज्यादा सस्ती व सुलभ रहेगी. मुंबई अहमदाबाद रूट पर दोनों तरफ उसी तरह के बेतरतीब शहर हैं जैसी साबरमती के दोनों तरफ की बस्तियां.

हमें न जाने क्यों अपने नासूर, अपनी फटी चादर, अपने अंधविश्वास, अपनी गुलामी की निशानियों को दिखाने में मजा आता है. आगरा हो, दिल्ली हो, अहमदाबाद हो या कोई और शहर, हमारे दिखाने लायक इलाके गुलामी की कहानियां ही कहते हैं.

जरूरत है कि हम खुद को और बाहर वालों को अपनी उपलब्धियों की गाथाएं बताएं पर उन्हें न जाने क्यों समेटे हुए हैं. दूसरे देश जब भी अपनी राजधानी से बाहर विदेशी मेहमानों को बुलाते हैं, तो वे अपना ऐसा शहर चुनते हैं जो बहुत ज्यादा फोटोजैनिक हो. अफसोस, हमारी अपनी उपलब्धि वाला कोई शहर है ही नहीं. ऐसे में विदेशी मेहमानों का स्वागत दिल्ली में ही करें, तो अच्छा रहेगा.

मुंबई में बारिश के कहर से आपको भी कुछ सीखना चाहिए

मुंबई में मूसलाधार बारिश का कहर हो, राम रहीम को ले कर पंचकूला का दंगा हो, गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों की मौतें हों, शहरों की गंदगी हो, चारों ओर अस्तव्यस्तता हो, इन सब से यह लगता है हमें शहरों में जीना न आया है और न ही हम सीख रहे हैं. नरेंद्र मोदी का शौचालय व स्वच्छ अभियान अच्छा प्रयास था पर ज्यादातर लोगों ने इसे संजय गांधी की नसबंदी का सा सरकारी कार्यक्रम मान कर फोटो खिंचवाया और इसे छोड़ दिया.

हम अभी भी शहरों में रहने लायक नहीं हुए हैं. शहरी जीवन के सामान्य तौरतरीके हमें नहीं आते. जो जमीन अपनी नहीं है वह सब की है, यह मूल सिद्घांत तक हम नहीं समझ पा रहे हैं. जो सब का है उस पर कोई भी कब्जा कर ले, कोई भी कूड़ा फेंक दे, कोई भी सामान रख दे, कोई भी आड़ीतिरछी गाडि़यां खड़ी कर दे, इसे हम अपना हक मानते हैं. कौर्पोरेशन नाम की कोई संस्था है, यह हमें मालूम ही नहीं क्योंकि वह दिखती भी नहीं है.

शहर में रहने का मतलब है कि थोड़ी सी जगह में सब हिलमिल कर रहें. अपनी सुविधाओं के साथ दूसरों की समस्याओं का भी खयाल रखना होता है. लेकिन हमें लगता है कि हमारे पास पैसे या जगह कम है तो दूसरों का फर्ज बनता है कि वे हमारे जरिए पैदा हुईं असुविधाओं को सहें.

मुंबई में इस साल बारिश में फिर कहर इसलिए बरपा क्योंकि पूरे साल मुंबई वाले इस की तैयारी करते हैं. नालियां बंद करते हैं. नालों को घर बनाते हैं. मकानों के कूड़े से नदियों को भरते हैं. सीवर साफ नहीं कराते. छतों, छज्जों पर सामान भरते हैं जो बरसात में बह कर सड़कों पर आ जाता है. सीवरों के ढक्कन चुरा लेते हैं. वे टूट जाएं तो ठीक कराने के लिए संबंधित विभाग का दरवाजा नहीं खटखटाते.

मुंबईवासी घरों में एयरकंडीशनरों की भरमार करते हैं पर बाहर वालों के लिए गरमी का इंतजाम करते हैं. बिजली के तार बिखरे पड़े रहते हैं. अच्छेभले मकानों की बालकनियों को, आड़ेतिरछे कपड़े फैला कर, भद्दा दिखाते हैं. दीवारों पर लगे पोस्टरों को साफ नहीं करते. झुग्गियों को बनने देते हैं ताकि उन्हें सस्ते कामगार मिल सकें.

इस सारी मेहनत या कहें कि लापरवाही का फल है कि वर्षारानी कभीकभार अपना प्रकोप दिखा जाती है तो फिर मुंबईवासी कलपने लगते हैं.

ऐसा सभी शहरों में होता है. कोई एक शहर नहीं जो इस से बचा हो जहां शहरी मिल कर शहर को सुखमय बनाते हों, पेड़ लगाते हों, झाडि़यों को काटते हों, पब्लिक टौयलेट बनाते हों, उन्हें साफ रखते हों. सभी शहरों में ये काम दूसरों के हैं. वे तो खुद सिर्फ बोल सकते हैं, करना कुछ नहीं है.

ऐसे में जाहिर है कभी नेचरमेड तो कभी मैनमेड प्रकोप आएंगे ही. इसे सहज ही स्वीकार कर लें. फालतू में चूंचूं करने से कोई लाभ नहीं.

सिंदूर का बोझ न उठाएं, जिंदगी को अपने अधिकारों के साथ जीएं

तना कमजोर होता है और एक उच्च शिक्षिता, स्वावलंबी, आत्मनिर्भर स्त्री का मन भी. पति छोड़ कर चला जाता है, दूसरी शादी कर लेता है लेकिन वह उस के नाम का सिंदूर कभी नहीं छोड़ती. वह परित्यक्ता का जीवन बिताती है लेकिन सिंदूर की आड़ में अपने पारिवारिक अलगाव को छिपाना चाहती है. पति साथ में नहीं है और सिंदूर भी नहीं लगाएगी तो समाज सवाल उठाएगा. इस से उस के मतभेद बाहर आ जाएंगे और न चाहते हुए भी वह दोषी ठहराई जाएगी.

आज हम बेटी को बेटे की ही तरह उच्चशिक्षा दे रहे हैं. उसे किताबी ज्ञान तो हासिल हो जाता है लेकिन साथ ही उसे जन्म से ही लड़की होने का एहसास भी कराते हैं और यह एहसास उस के इस मन में जहर बन कर फैल जाता है, जिस से वह कभी बाहर नहीं आ पाती.

बेटी में कभी इतना साहस नहीं आता कि वह अपनी खुशियों के लिए समाज को ठोकर मार सके. उस की सोच में, उसे उसी समाज में रहना है और वह उसी समाज का हिस्सा है, तो समाज के खिलाफ वह कैसे जाए. गरीब अनपढ़ को तो समझ में आता है कि उस का समाज वैसा ही है, उस की मान्यताएं वैसी ही हैं. लेकिन उच्चशिक्षा हासिल करने के बाद भी अगर स्त्री समाज के डर से खुद को सुरक्षित रखने के लिए सिंदूर लगाती है, तो उस की शिक्षा का क्या महत्त्व रह जाता है?

अगर वह शिक्षित हो कर भी समाज की बेडि़यों को तोड़ने का साहस नहीं दिखाती तो फिर उस ने शिक्षित हो कर नारी के उत्थान में, समाज के विकास में, सामाजिक परिवर्तन में क्या योगदान दिया?

कभी पढ़ा था, एक स्त्री एक परिवार को शिक्षित करती है लेकिन यह तो पुराने जमाने की बात थी. यदि तब एक स्त्री एक परिवार को शिक्षित करती थी, तो आज की एक शिक्षित स्त्री को तो एक गांव, एक समुदाय या एक वर्ग को शिक्षित करना चाहिए. पर वह शिक्षित हो कर भी समाज का सामना करने से डरती है. पति के छोड़ जाने के बाद खुद को सुरक्षित रखने के लिए सिंदूर का सहारा लेती है.

एक समय था जब चाहे जितने भी मतभेद हो जाएं, विवाहविच्छेद नहीं होते थे जैसे भी हो औरत तड़प कर सताई जाने पर भी रिश्ते निभाती थी. आज की स्त्री शिक्षित है, आत्मनिर्भर है, इसलिए वह साहस करती है ऐसे बोझ बन चुके रिश्तों से छुटकारा पाने का. लेकिन थोड़ा और साहस क्यों नहीं जुटाती, क्यों नहीं वह गर्व से कहती कि वह एक शिक्षित, आत्मनिर्भर एकल महिला है, उसे अपने निर्णय पर कोई अफसोस नहीं. उसे भी अपनी जिंदगी, पुरुष की ही तरह, अपनी शर्तों पर बिताने का पूरा हक है. शिक्षा और तकनीक के युग में सिंदूर का बोझ न उठाएं,ल्कि अपनी जिंदगी को अपने अधिकारों के साथ जीएं

  • सरिता पंथी

जर्जर रेल और सपने बुलेट ट्रेन के, हो गए न आप भी हैरान

‘लोन लो और घी पियो’, यह कहावत केवल जनता के लिए नहीं है, सरकार के लिए भी है. जापान के सस्ते लोन के चक्कर में भारत अपनी प्राथमिकताओं को भूल कर बुलेट ट्रेन चलाने में लग गया है. नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों के प्रभाव को देखते हुए लगता है कि झूठी शान के चक्कर में केंद्र सरकार ने बुलेट ट्रेन चलाने का फैसला ले लिया है. जापान जैसा बिजनैस समझदारी रखने वाला देश अपना नुकसान क्यों करेगा?

बुलेट ट्रेन चलाने की जल्दी में केंद्र सरकार ने प्रोजैक्ट की डिटेल्ड प्रोजैक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर के आने का इंतजार तक नहीं किया. जल्दबाजीभरे ऐसे फैसले देश के भविष्य पर असर डाल सकते हैं. जापान में मैग्नेटिक लेविटेशन से चलने वाली हाईस्पीड ट्रेन का युग आने वाला है. जिस समय भारत में 250 किलोमीटर प्रतिघंटे की स्पीड से ट्रेन चलेगी उस समय जापान 600 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलने वाली ट्रेन नई प्रणाली से चला रहा होगा, जिस में शोर काफी कम होगा.

जिस देश में रेल दुर्घटना में मरने वालों के बारे में उन का ऐसा भाग्य होना कहा व माना जाता हो वहां जर्जर रेल व्यवस्था की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है. रेल दुर्घटना का दर्द मुआवजा बंटने तक याद रहता है. इस के बाद नई दुर्घटना होने का इंतजार किया जाने लगता है.

देश में रेल की सब से अधिक जरूरत पैसेंजर रेलगाडि़यों की  है. और यह किसी सरकार के एजेंडे में नहीं होती. याद नहीं आता कि कभी किसी सरकार ने नई पैसेंजर ट्रेन शुरू की हो और उस का जोरशोर से प्रचार किया हो.  पैसेंजर ट्रेनों पर चलने वाले यात्रियों की ही तरह ऐक्सप्रैस ट्रेनों में लगने वाले जनरल कोच की तरफ रेलवे प्रशासन और सरकार का ध्यान नहीं जाता.

जनरल कोच यानी सामान्य डब्बे में यात्रा करना नरक का सफर करने जैसा होता है. जिन के पास पैसा अधिक है वे पूजापाठ के सहारे स्वर्ग का रास्ता पकड़ लेते हैं यानी सुविधाजनक डब्बों और ट्रेनों में सफर कर लेते हैं. जिन के पास गाय के दान जैसे उपाय करने की सामर्थ्य नहीं है वे नरक के सफर जैसे जनरल डब्बे में यात्रा करने को मजबूर होते हैं.

चढ़ावे की धार्मिक संस्कृति को बढ़ावा देने वालों की ही तरह सरकार भी ज्यादा पैसे ले कर सफर करने वालों के लिए सुविधा खोजती है. उन के लिए ही बुलेट टे्रन, शताब्दी ट्रेन और राजधानी ऐक्सप्रैस हैं. देश के बाकी यात्रीजर्जर रेल के हवाले हैं. पुजारी की तरह सरकार भी चढ़ावे के वजन को देख कर ही सुविधाओं का इंतजाम करती है.

मुफ्त में बुलेट ट्रेन

भारत और जापान के बीच हुए समझौते के बाद अब बुलेट ट्रेन की सवारी करने का सपना हर भारतीय देखने लगा है. सरकार 2022 में मुंबई से अहमदाबाद तक बुलेट ट्रेन चलाना शुरू कर देने का दावा व वादा कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में, ‘‘बुलेट ट्रेन का यह सफर महंगा नहीं, बल्कि मुफ्त है.’’ यह एक तरह का लौलीपौप है. प्रधानमंत्री ने 2019 के लोकसभा चुनावों के प्रचार यह लौलीपौप दिया था. बुलेट ट्रेन की परियोजना पर 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च होगा. इस का 80 फीसदी जापान देगा और 20 फीसदी खर्च भारत करेगा.indian politics

प्रधानमंत्री ने देश की जनता को बताया कि जापान ने भारत को मुफ्त में बैंकलोन दिया है. जापान ने भारत को 88 हजार करोड़ रुपया महज 0.1 प्रतिशत के ब्याज पर दिया है. इस को 50 वर्षों में चुकाना है. ऐसे में यह पूरी तरह से मुफ्त मिला है. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि बुलेट ट्रेन से केवल अमीरों को लाभ मिलेगा, यह धारणा गलत है.

इस प्रोजैक्ट का लाभ पूरे देश के रेल नैटवर्क को होगा. बुलेट ट्रेन के चलने से गरीब जनता को क्या लाभ मिलेगा, यह सरकार बताने को तैयार नहीं है. वह यह नहीं कह रही कि बुलेट ट्रेन के सफर से होने वाले लाभ से पैसेंजर ट्रेनों की हालत सुधारी जाएगी. आज देश को बडे़ पैमाने पर इस की जरूरत है कि आम लोगों के सफर को सुविधाजनक व सुरक्षित बनाया जाए.

प्रधानमंत्री ने बुलेट ट्रेन के भावी सफर से देश को तरक्की का फिर से सुनहरा सपना दिखाने का प्रयास किया है. प्रधानमंत्री ने कहा कि बुलेट ट्रेन से देश की घटती आर्थिक विकास दर बढ़ेगी, हाईस्पीड रेल प्रोजैक्ट्स से विकास में तेजी आएगी. प्रधानमंत्री ने अमेरिका और जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका में रेल आने और जापान में हाईस्पीड रेल आने से प्रगति का दौर शुरू हुआ. भारत में भी नैक्सट जैनरेशन ग्रोथ वहीं होगी जहां पर हाई स्पीड कौरिडोर होंगे. मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन से 500 किलोमीटर दूर बसे शहरों के लोग करीब आ जाएंगे. यह सफर 2 से 3 घंटे के बीच तय होगा. इस से लोगों का समय बचेगा, उन को सफर में कम खर्च करना होगा. इन शहरों के बीच का एरिया सिंगल इकोनौमिक जोन में बदल जाएगा. इस से हर तरह के बिजनैस को बढ़ावा भी मिलेगा.

प्रधानमंत्री ने भारतीय स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर 15 अगस्त, 2022 को बुलेट ट्रेन के सफर को शुरू करने का लक्ष्य रखा है. 2022 में बुलेट ट्रेन में सफर करने का सपना देख रहे लोगों को यह पता नहीं है कि इस प्रोजैक्ट की डीपीआर अभी बनी नहीं है. यह रिपोर्ट 2018 तक पूरी तरह तैयार करने की बात हो रही है. बुलेट ट्रेन चलाने के लिए पैसा और टैक्नोलौजी जापान देगा. 88 हजार करोड़ रुपए के कर्ज के बदले भारत को केवल 90 हजार 500 करोड़ रुपए ब्याज सहित चुकाने होंगे. यह कर्ज बुलेट ट्रेन चलने के 15 वर्षों के बाद देना शुरू करना होगा.

देश की पहली बुलेट ट्रेन मुंबई से अहमदाबाद के बीच की 508 किलोमीटर की दूरी केवल 2 घंटे में तय करेगी. इस लाइन पर 12 स्टेशन बनाए जाएंगे. रेलवे ट्रैक का 7 किलोमीटर हिस्सा समुद्र से हो कर जाएगा. बाकी रास्ता एलिवेटेड होगा. इस का खाका जापान इंटरनैशनल कौर्पाेरेशन ने बनाया है.

ट्रेन केवल 4 स्टेशनों पर रुकेगी.  मुंबई से अहमदाबाद के बीच दूसरे स्टेशन बांद्रा, कुर्ला कौंप्लैक्स, थाणे, विरार बोईसर, वापी बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वड़ोदरा, आणंद, अहमदाबाद और साबरमती होंगे. मुंबई स्टेशन अंडरग्राउंड होगा. बाकी स्टेशन एलिवेटेड होंगे. यह पूरा रूट डबल लाइन का होगा. यह रूट महाराष्ट्र, गुजरात और दादरा नगर हवेली से हो कर गुजरेगा. महाराष्ट्र में 156 किलोमीटर, गुजरात में 351 किलोमीटर और दादरा नगर हवेली में 2 किलोमीटर होगा.

ट्रेन की अधिकतम स्पीड 350 किलोमीटर प्रतिघंटे होगी. ट्रेन सभी12 स्टेशनों पर रुकेगी तो 3 घंटे का समय लगेगा. अगर 4 स्टेशनों पर ट्रेन रुकेगी तो 2 घंटे का समय लगेगा. जापान भारत को टैक्नोलौजी ट्रांसफर करेगा. इस प्रोजैक्ट के तहत जरूरी सामान भारत में बनाने के लिए उद्योग को बढ़ावा दिया जाएगा.  इस के संचालन के लिए 4 कौर्पोरेशन बनाए जाएंगे. ये चारों ट्रैक, सिविल रोलिंग, स्टौक इलैक्ट्रिकल और सांइस ऐंड टैक्नोलौजी संभालेंगे. जापान बुलेट ट्रेन के संचालन में सब से भरोसेमंद देश है. जापानबुलेट ट्रेन चलाने की ट्रेनिंग भी देगा. बुलेट ट्रेन प्रोजैक्ट के लिए वड़ोदरा में हाईस्पीड रेल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट स्थापित किया जाएगा. इस में 4 हजार लोगों को ट्रेनिंग दी जाएगी. indian politics

मजबूत होगा राजनीतिक सफर

भारत में ट्रेन का प्रयोग सफर करने के अलावा राजनीति में भी होता है. यही वजह है कि ट्रेन की उपयोगिता से अधिक इस बात का ध्यान रखा जाता है कि इस से क्या राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है.

मैट्रो ट्रेन से ले कर बुलेट ट्रेन तक इस का जरिया बनती रहती हैं. नेता अपने राजनीतिक सफर को ट्रेन की लोकलुभावनी घोषणाओं से पूरा करना चाहते हैं.  सस्ता और मुफ्त का लौलीपौप दे कर नरेंद्र मोदी ने 2014 का लोकसभा चुनाव जीता था. महंगाई रोकने, रोजगार बढ़ाने और कालेधन से हर किसी के खाते में 15 लाख रुपया जमा होने जैसे वादे चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी और उन की भाजपा ने किया था.

3 साल सरकार चलाने के दौरान जनता के किसी वादे पर केंद्र की मोदी सरकार खरी नहीं उतरी है. बड़े जोरशोर और वादों के साथ केंद्र सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया था. परेशान जनता से कहा गया कि 50 दिन कष्टकारी हैं, इस के बाद हर कष्ट कट जाएगा.

50 दिनों का कष्ट सहने के बाद भी सरकार यह बताने की हालत में नहीं है कि नोटबंदी का क्या लाभ हुआ? नोटबंदी के बाद अब जनता को यह पता चल रहा है कि देश की जीडीपी में 2 प्रतिशत की गिरावट आई है. नोटबंदी और बाद में उलझावभरे जीएसटी बिल ने कारोबार को बुरी तरह से प्रभावित किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब मुफ्त बुलेट ट्रेन का सपना दिखा रहे है.

प्रधानमंत्री इस बात को समझ चुके हैं कि यह देश मुफ्त के नाम पर हमेशा झांसे में फंस जाता है. ऐसे में वे अब मुफ्त में बुलेट ट्रेन का सपना बेचने की कोशिश में है. इस के जरिए वे गुजरात के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव को ठीक करना चाहते हैं.

3 नहीं, 60 साल का चाहिए हिसाब  

मोदी सरकार अपने से पहली सरकार से उस के 60 साल का हिसाब मांग रही है पर अपने 3 साल का हिसाब देने को तैयार नहीं है. आमतौर पर सरकार जनता में गरीब और कमजोर वर्ग के लिए काम करती है. मोदी सरकार के बुलेट ट्रेन चलाने से गरीब जनता का क्या भला होगा, समझ नहीं आता.

यह बात ठीक  है कि जापान बुलेट ट्रेन चलाने के लिए सस्ती ब्याजदर पर लोन दे रहा है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने जब गुजरात प्रदेश के अहमदाबाद में देश की पहली बुलेट ट्रेन की आधारशिला रखी तो उस को ले कर पूरे देश में अलगअलग तरह के विचार सामने आने लगे.

आज के दौर में सब से ताकतवर सोशल मीडिया में भी इस को अलग तरह से देखा गया. एक मजाकिया मैसेज में कहा गया, ‘जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे को अभी तक नहीं पता कि उन का इस्तेमाल बुलेट ट्रेन के लिए नहीं, गुजरात चुनाव के लिए हो रहा है.’ इस मजाकिया मैसेज के भीतर भारतीय व्यवस्था का सच छिपा हुआ है. भारत में रेल को चुनावप्रचार का सब से बड़ा माध्यम माना जाता है. रेल मंत्री के इलाके के लिए सब से अधिक ट्रेन की सुविधा पहुंचाने का प्रयास होता रहा है. कुछ ट्रेनों को उन स्टेशनों पर रोकने के लिए बाद में आदेश हुए जहां के नेता या सांसद रेल मंत्रालय में पावरफुल होते थे. अंगरेजों ने भारत में रेलमार्ग की शुरुआत की थी, उन का मकसद अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना था. बाद में इस को जनता की सुविधाओं के हिसाब से आगे बढ़ाया गया. पैसेंजर ट्रेन की कल्पना इस की मिसाल है.

पुनर्जन्म का गणित

2014 के लोकसभा चुनावों में रेल की सुरक्षित यात्रा को ले कर बडे़बडे़ दावे किए गए. भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावप्रचार में इस बात का वादा किया कि ट्रेन की सुरक्षित यात्रा उस का सब से बड़ा संकल्प है. ट्रेन की सुरक्षित यात्रा के लिए जरूरी पैसे के इंतजाम के लिए प्लेटफौर्म टिकट से ले कर यात्री टिकट, रेलभाड़ा तो बढ़ाया ही गया, कई ऐसे छिपे उपाय भी किए गए जिन का बोझ यात्री को उठाना पड़ा. जैसे, पहले प्लेटफौर्म टिकट का समय अधिक था और दाम कम था. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्लेटफौर्म टिकट के दाम बढे़ और समय घट गया.

वेटिंग टिकट को ले कर भी ऐसे बदलाव किए गए जिन का बोझ यात्रियों की जेब पर पड़ा. रेलवे अपने सुरक्षा फंड को बढ़ाने के लिए कई तरह के प्रयोग कर रहा है. इस के बाद भी रेल दुर्घटनाओं में कमी नहीं हो पा रही है. सालदरसाल रेल दुर्घटनाओं में इजाफा होता जा रहा है. रेलवे में होने वाली दुर्घटनाओं में विभाग की लापरवाही के साथ सरकारी योजना की नाकामी साफ दिखने लगी है.

रेल दुर्घटनाओं पर कुछ दिनों तक बहुत सारा गुस्सा और क्षोभ व्यक्त होता है. मुआवजे का बंटवारा होतेहोते इस बात को लोग भूल जाते हैं. यात्री की मौत को उस के कर्मों का फल मान कर लोग चुप हो जाते हैं. मरने वाले की तथाकथित आत्मा की शांति के लिए तरहतरह के आयोजन किए जाते हैं. मरने के बाद स्वर्ग में जगह मिले, वहां कोई कष्ट न हो और पुनर्जन्म अच्छा हो, इस के लिए पिंडदान, तेरहवीं जैसे आयोजन हो जाते हैं. यात्री और बाकी लोग मरने वाले की तेरहवीं तक भी घटना को याद नहीं रखते हैं. सरकार को यह पता है कि देश में मरने वाले को दुघर्टना से नहीं, पूर्वजन्म के किए गए पापों से जोड़ा जाता है. यही वजह है कि रेलवे दुर्घटना में रेल विभाग और सरकार की जिम्मेदारी तय नहीं होती. मरने वाले के भाग्य में ही मरना लिखा था, ऐसा मान लिया जाता है.

जर्जर रेल व्यवस्था

यातायात की व्यवस्था में भारतीय ट्रेन का दुनिया में सब से बड़ा स्थान है. भारत दुनिया का ऐसा सब से बड़ा देश है जहां का प्राकृतिक  और आर्थिक दोनों की तरह के हालात ट्रेन व्यवस्था के लिए सब से अधिक अनुकूल हैं. यही वजह है कि भारत ट्रेन यातायात और परिवहन दोनों के लिए सब से अधिक सुविधाजनक है. यहां अलगअलग जरूरतों के हिसाब से ट्रेनों को तैयार किया गया था. इन को पैसेंजर ट्रेन, ऐक्सप्रैस ट्रेन और मालगाडि़यों की श्रेणी में रखा जाता है. आज के दौर में ट्रेनों को पैसेंजर की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि राजनीतिक जरूरत के हिसाब से चलाया जाता है. जिस नेता के जिम्मे ट्रेन मंत्रालय होता है, उस के चुनाव क्षेत्र के लिए अलग जरूरत बन जाती है.

आज भारत में ट्रेन का विशाल नैटवर्क है. करीब 1 लाख 15 हजार किलोमीटर लंबे रेलमार्ग पर साढे़ 7 हजार से अधिक रेलवेस्टेशन बने हुए हैं. अलगअलग जरूरतों और हालात के हिसाब से रेलमार्ग की चौड़ाई अलगअलग है.  भारत में 3 तरह के गेज वाली पटरियां हैं. इन में चौड़ी गेज यानी बड़ी लाइन, मीटर गेज यानी छोटी लाइन और पतली गेज बहुत छोटी संकरी जगहों के लिए बनी हैं, जिस में पहाड़ी इलाके आते हैं. अब रेलवे अपनी ट्रेन संचालन व्यवस्था को सही करने के लिए एकजैसी गेज की लाइनें तैयार करने के काम में लगा है. अभी चालू पटरियों के आधे हिस्से को ही विद्युतीकरण में बदला जा सका है. हाल के कुछ वर्षों में केवल वाहवाही के नाम पर रेल को ले कर लोकलुभावनी घोषणाएं की गई हैं. रेल के क्षेत्र में जरूरत के हिसाब से काम नहीं किए जा रहे.

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतौली स्टेशन पर उत्कल ऐक्सप्रैस ट्रेन पटरी से उतर गई. घटना का जो कारण सामने आया उस से पता चला कि उस जगह की पटरी टूटी हुई थी. टूटी हुई पटरी को सही करने के लिए लोहे को काट कर रख दिया गया था पर उस को वैल्ंिडग मशीन से जोड़ा नहीं गया था. उत्कल ऐक्सप्रैस हादसे के साथ 5 वर्षों में करीब 586 रेल हादसे हो चुके हैं. इन में से आधे हादसे ट्रेन के पटरी से उतरने के चलते हुए. नवंबर 2014 से अगस्त 2017 तक 20 रेल हादसे हुए हैं.

सुधार की पहल नहीं

रेल हादसों के बाद रेलवे अपनी कमी को परखने और उस को सुधारने का दावा करता है. इस के लिए समिति का गठन किया जाता है. 2012 में रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल के सुरक्षा मानकों की जांच और सुधार का सुझाव देने के लिए अनिल काकोदकर समिति का गठन किया.

समिति ने रेल सुरक्षा प्राधिकरण के निर्माण सहित 106 सुझाव दिए. इन में से 68 सुझाव रेल मंत्रालय ने माने और 19 सुझाव पूरी तरह से खारिज कर दिए. रेलवे ने सुझाव मान तो लिए पर उन पर अमल नहीं किया. समिति ने कहा था कि 2017 तक सभी लैवल क्रौसिंग को खत्म किया जाए. इस पर 50 हजार करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान था. 20 हजार करोड़ रुपए सुरक्षा संबंधी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने का सुझाव दिया गया था.

समिति ने अपनी टैक्निकल जांच में यह पाया था कि अगर रेल का सिग्नल सिस्टम एडवांस हो जाए तो बहुत सारी दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. इस के लिए 20 हजार करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान लगाया गया था.  यह सिस्टम

19 हजार किलोमीटर लंबे ट्रैक पर लगना था. 10 हजार करोड़ रुपए सफर के लिए तैयार किए जाने वाले सुरक्षित एलएचबी कोच को तैयार करने पर लगाने की सिफारिश की गई थी. ज्यादातर ट्रेनों में अभी भी पुरानी तरह से बने कोच ही लगाए जाते हैं. उत्कल ऐक्सप्रैस में पुरानी तरह से बने आईसीएफ डब्बे लगे थे. इस में बोगी के ऊपर डब्बा रखा होता है. ऐसे में जब ट्रेन पटरी से उतरती है तो ये डब्बे बोगी से पूरी तरह से अलग हो जाते हैं. इन में डब्बे के पहियों समेत निचला हिस्सा अलग हो जाता है. इस से डब्बे के पलटने का खतरा रहता है. अनिल काकोदकर समिति ने इन डब्बों को बदलने का सुझाव दिया था.

सुरक्षा का ध्यान नहीं

रेलवे के पास सुरक्षा उपकरणों की भारी कमी है. रेल पटरियों के आसपास अवैध कब्जे हैं, जिन से भी पटरियों की सुरक्षा को बड़ा खतरा होता है. सामान्यतौर पर पटरियों को काटने की तमाम घटनाएं होती रहती हैं. इन की वजह से ट्रेन के पटरी से उतरने का खतरा बढ़ जाता है. इस से जानमाल का भारी नुकसान होता है. रेलवे में पटरी की खराबी का पता चलने या सिग्नल के फेल होने की सूचना ट्रेन के ड्राइवर तक देना बहुत मुश्किल काम होता है.

ऐसे में अगर रेलवे को अत्याधुनिक बनाया जाए तो हादसे कम हो सकते हैं. कई बार एक ही लाइन पर 2 ट्रेनों के आ जाने से भी बडे़ हादसे हो जाते हैं. अगर रेलवे के ट्रेन सिस्टम को ठीककर लिया जाए तो दुर्घटनाएं कम हो सकती हैं.

रेलवे पुलों को ठीक करना, लैवल क्रौसिंग को पूरी तरह से खत्म करना और ट्रेन प्रोटैक्शन स्टाफ को बेहतर ट्रेनिंग देना भी बहुत जरूरी हो गया है. 20 नवंबर, 2016 को इंदौर-पटना ऐक्सप्रैस कानपुर के पास पटरी से उतर गई थी. यह सब से भीषण ट्रेन दुर्घटना थी. इस में 150 से अधिक लोग मारे गए और इतने ही लोग घायल हुए थे.

दुर्घटना का कारण रेल की पटरी में दरार का होना था. अगर इस तरह की कमी का पता समय से चल जाए तो हादसे रोके जा सकते हैं. परेशानी की बात यह है कि ट्रेन के हादसों के बाद कुछ रेलवे अफसरों और कर्मचारियों को सजा के तौर पर इधर से उधर कर दिया जाता है. कुछ दिनों के बाद हादसों को भूल कर लापरवाही भरा काम शुरू हो जाता है. अगर कानपुर के हादसे से सबक लिया गया होता तो उत्कल ऐक्सप्रैस ट्रेन का हादसा नहीं होता. दोनों ही मामलों में रेल की पटरी की खराबी के कारण हादसे हुए थे. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए.

सही किया जाए बुनियादी ढांचा

रेलवे के जानकारों का कहना है कि हर तरह के सुधार के लिए जरूरी है कि रेलवे का बुनियादी ढांचा सही किया जाए. ट्रेन के पटरी से उतरने के कई कारण होते हैं. कई बार पटरी पर सामने की ओर से कोई अवरोध होने से ट्रेन पटरी से उतर जाती है. कई बार ऐसा होता है कि कोई मवेशी या बड़ा जानवर पटरी पर आ जाता है जिस के कारण ट्रेन पटरी से उतर जाती है. इंजन का कोई हिस्सा या पार्ट अगर गिर जाए और उस पर ट्रेन चढ़ जाए तो इस हालत में भी ट्रेन पटरी से उतर जाती है.

सब से अधिक बार पटरी के टूटे होने से ट्रेन पटरी से उतरती है. कई बार यह होता है कि इंजन के निकल जाने के बाद पटरी के बीच का गैप बढ़ जाता है तब उस के पीछे के डब्बे पटरी से उतर जाते हैं. कई इलाकों में शरारती तत्त्वों द्वारा पटरी की तोड़फोड़ की जाती है और समय रहते स्टेशन को इस की सूचना नहीं मिलती, जिस के कारण भी ट्रेन पटरी से उतर जाती है.

रेलवे विभाग के जानकार लोगों का कहना है कि बुलेट टे्रन के लिए पटरी बिछाने का काम बेहद खर्चीला है. ऐसे में अगर पहले से चल रही पटरियों को ठीक किया जाता तो जनता को ज्यादा राहत मिलती. बुलेट ट्रेन से कुछ लोगों को ही सुविधा मिल सकती है. अगर पहले से चल रही ट्रेनों की स्पीड को बढ़ाया जाता, ट्रेनों में होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जाता और नई पटरियों को बनाया जाता तो यह जनता के लिए ज्यादा फायदेमंद होता और जो जरूरी भी है. हमारे देश में रेल से सफर करने वालों के लिए ट्रेन से सस्ता और सुलभ कोई दूसरा रास्ता नहीं है. बस के मुकाबले ट्रेन का सफर कहीं अधिक सस्ता पड़ता है. जरूरत इस बात की है कि ट्रेन की स्पीड बढ़ा दी जाए और समय पर रेलगाडि़यां चलने लगें.

अभी भारत में जो रेल पटरियां हैं उन की सुरक्षा पर रेलवे पूरी तरह से सफल नहीं है. भारतीय रेलवे के पास बुनियादी ढांचे को सही करने के लिए फंड हो, इस का प्रयास हो. रेलवे के पास सुविधा न होने के कारण माल की ढुलाई के लिए लोग दूसरे साधनों पर निर्भर होने लगे हैं जिस से रेल को नुकसान हो रहा है. इसी तरह से रेल के समय पर न चलने से लोग हवाईयात्रा को अधिक उपयोगी समझने लगे हैं. सुविधाजनक बससेवा ने भी रेल के लाभ को कम कर दिया है. रेल के सफर को सुविधाजनक मानने के बाद भी लोग आज दूसरे साधनों की ओर रुख करने लगे हैं.

बुलेट ट्रेन बनाम हाईस्पीड ट्रेन

बुलेट ट्रेन कई देशों में सफेद हाथी बन चुकी है. भारत में बुलेट ट्रेन एक सफल प्रयास होगा, इस में कई तरह के संशय हैं. जापान ने भारत को जो लोन दिया है वह देखने में अभी सस्ता लग रहा है पर इस में कई ऐसे पेंच होंगे जिन का लाभ भारत से अधिक जापान को होगा. एक बड़ी योजना के चक्कर में भारत बडे़ लोन के जाल में फंस रहा है. जापान बहुत चतुर देश है. वह अपने नुकसान का कोई काम नहीं करेगा. यह साफ है कि भारत कम ब्याज के चक्कर में बड़ी महत्त्वाकांक्षी योजना के जाल में उलझ गया है. यह लोन इतना सरल नहीं है जितना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मान रहे हैं. रेल के जानकार लोगों का मानना है कि भारत में राजधानी ऐक्सप्रैस 130 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलती है. इस को सुधार कर के अगर 200 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार तक ले जाएं तो बुलेट ट्रेन की जरूरत खत्म हो जाएगी. साथ ही, रेल का ज्यादा विकास हो सकेगा.

भारत के बड़े शहरों के बीच हवाई सफर का रास्ता पहले से खुला हुआ है. इस को और सुगम बनाया जा सकता है. मुंबई और अहमदाबाद के बीच हवाईयात्रा का विकल्प पहले से खुला है. जिस से 70 मिनट में इस सफर को तय किया जा सकता है. बुलेट ट्रेन के टिकट और हवाई जहाज के टिकट में कोई खास अंतर नहीं होगा.

जानकार लोगों का कहना है कि जापान ने अपनी कंपनी के सर्वे और अनुमान के आधार पर भारत के सामने ऐसे आंकडे़ रखे हैं जिन से भारत को बुलेट ट्रेन, विकास का मार्ग लगने लगी है. जापान ने भारत के रेल विभाग के कुछ अधिकारियों को अपने आंकड़ों के शीशे में उतार लिया है. ये अफसर बुलेट ट्रेन की योजना को देश के लिए एक अवसर मानने लगे हैं. ऐसे अफसर कहते हैं कि अगर इस योजना पर अभी काम नहीं किया गया तो देश तरक्की की राह में पीछे रह जाएगा. ऐसे अफसर तर्क देते हैं कि अगर हाईस्पीड ट्रैक सही तरह से काम करने लगे तो हमारे देश कीतरक्की के लिए संसाधन खुद जुटने लगेंगे.

सब से आगे जापान

बुलेट ट्रेन के संचालन में जापान सब से आगे है. जिस समय भारत 200 किलोमीटर या इस के आसपास की स्पीड वाली बुलेट ट्रेन का सफर शुरू कर रहा होगा उस समय जापान 600 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलने वाली ट्रेन शुरू कर रहा होगा. जापान में इस का ट्रायल 15 अप्रैल, 2015 को हो गया है. 2027 तक इस को चलाने की योजना है. यह आधुनिक चुंबकीय प्रणाली मैग्नेटिक लेविटेशन से चलेगी. इस में बिजली से चार्ज किए गए चुंबक ट्रेन को पटरी से 4 इंच ऊपर रखेंगे. इस से शोर कम और स्पीड अधिक मिलती है. बुलेट ट्रेन के संचालन में जापान के बाद चीन का नंबर आता है. चीन में विश्व की सब से तेज स्पीड से चलने वाली ट्रेन है. यह 431 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलती है. चीन में 22 हजार किलोमीटर लंबा रूट इस के लिए बना है. इटली और स्पेन दूसरे प्रमुख देश हैं जहां पर हाईस्पीड ट्रेनें चलती हैं.

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