‘लोन लो और घी पियो’, यह कहावत केवल जनता के लिए नहीं है, सरकार के लिए भी है. जापान के सस्ते लोन के चक्कर में भारत अपनी प्राथमिकताओं को भूल कर बुलेट ट्रेन चलाने में लग गया है. नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों के प्रभाव को देखते हुए लगता है कि झूठी शान के चक्कर में केंद्र सरकार ने बुलेट ट्रेन चलाने का फैसला ले लिया है. जापान जैसा बिजनैस समझदारी रखने वाला देश अपना नुकसान क्यों करेगा?

बुलेट ट्रेन चलाने की जल्दी में केंद्र सरकार ने प्रोजैक्ट की डिटेल्ड प्रोजैक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर के आने का इंतजार तक नहीं किया. जल्दबाजीभरे ऐसे फैसले देश के भविष्य पर असर डाल सकते हैं. जापान में मैग्नेटिक लेविटेशन से चलने वाली हाईस्पीड ट्रेन का युग आने वाला है. जिस समय भारत में 250 किलोमीटर प्रतिघंटे की स्पीड से ट्रेन चलेगी उस समय जापान 600 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से चलने वाली ट्रेन नई प्रणाली से चला रहा होगा, जिस में शोर काफी कम होगा.

जिस देश में रेल दुर्घटना में मरने वालों के बारे में उन का ऐसा भाग्य होना कहा व माना जाता हो वहां जर्जर रेल व्यवस्था की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है. रेल दुर्घटना का दर्द मुआवजा बंटने तक याद रहता है. इस के बाद नई दुर्घटना होने का इंतजार किया जाने लगता है.

देश में रेल की सब से अधिक जरूरत पैसेंजर रेलगाडि़यों की  है. और यह किसी सरकार के एजेंडे में नहीं होती. याद नहीं आता कि कभी किसी सरकार ने नई पैसेंजर ट्रेन शुरू की हो और उस का जोरशोर से प्रचार किया हो.  पैसेंजर ट्रेनों पर चलने वाले यात्रियों की ही तरह ऐक्सप्रैस ट्रेनों में लगने वाले जनरल कोच की तरफ रेलवे प्रशासन और सरकार का ध्यान नहीं जाता.

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