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वूमन फ्रैंडली हैं ई बाइक्स : सोहिंदर गिल

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महिलाओं के आगे बढ़ने की राह में एक बड़ी बाधा है कहीं भी आनेजाने के लिए उन की पिता, पति या पुत्र पर निर्भरता. बाइक हो या गाड़ी, ड्राइविंग आसान नहीं होती. इसी वजह से ज्यादातर पुरुष ही ड्राइविंग सीट पर बैठते हैं.

मगर समय के साथ इस दिशा में भी अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैं. नई तकनीकों ने ड्राइविंग को आसान बना दिया है. इस का बढि़या उदाहरण हैं ई बाइक्स, जिन्हें खासतौर पर बुजुर्गों, छात्रों और महिलाओं के लिए तैयार किया गया है.

पिछले 8 सालों में हीरो इलैक्ट्रिक करीब डेढ़ लाख ई बाइक्स बना चुकी है. इन में से करीब 35% ई बाइक्स महिलाएं ही प्रयोग में ला रही हैं. पिछले दिनों हीरो इलैक्ट्रिक के ग्लोबल बिजनैस के चीफ ऐग्जीक्यूटिव औफिसर सोहिंदर गिल से मुलाकात हुई. पेश हैं, उन से की गई बातचीत के मुख्य अंश:

ई बाइक्स वूमन फ्रैंडली कैसे हैं?

ई बाइक्स को चलाना बहुत आसान है. सब से बड़ी बात यह है कि इन में वियर ऐंड टियर पुरजे नहीं होते. सामान्य गाडि़यों में क्लच, गियर जैसे इतने झमेले होते हैं कि आएदिन कुछ न कुछ खराब होता रहता है. हर 3 माह बाद सर्विसिंग कराओ, ईंधन डालो. मगर हीरो इलैक्ट्रिक में सिवा एक मोटर के कोई वियरटियर पार्ट नहीं है. इसलिए ये गाडि़यां कभी सर्विस स्टेशन नहीं जातीं.

चलाते वक्त थ्रौटल जीरो कर दो, गाड़ी रुक जाएगी और बैटरी भी कटऔफ हो जाएगी. आप  रैड लाइट पर खड़े हैं तो यह नहीं कि स्विचऔफ करना पड़ेगा. बस थ्रौटल जीरो कर दो. बैटरी की खपत बंद हो जाएगी. आप चाबी लगाने के बाद जैसे ही थ्रौटल को घुमाएंगे गाड़ी चलनी शुरू हो जाएगी. न क्लच, न गियर न ही कुछ और. हाथ में केवल साइकिल ब्रेक. स्पीड उसी से कम या ज्यादा कर सकते हैं. अगर आप ने 1-2 बार साइकिल चलाई है तो आप को इसे चलाने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

घर में जो मोबाइल सौकेट है उसी से बैटरी चार्ज कर ली. अगर आप फ्लैट में रहते हैं तो इस की बैटरी इतनी हलकी है कि ब्रीफकेस की तरह घर ले जाएं, मोबाइल सौकेट में लगाएं और शांति से सो जाएं. सुबह तक यह 70 किलोमीटर तक के सफर के लिए चार्ज हो जाएगी. 1 यूनिट से 6 रुपए में 70 किलोमीटर घूम कर आ सकते हैं.

इस की स्पीड कैसी है?

2 तरह की गाडि़यां हैं. पहली गाड़ी सिंपल है. अगर आप के पास लाइसैंस नहीं है, तो भी आप यह गाड़ी चला सकते हैं. इस की स्पीड 25 किलोमीटर प्रति घंटा है, दूसरी वाली गाड़ी की स्पीड 55 किलोमीटर प्रति घंटा है.

मैं ने देखा है कि जिन्हें घर के आसपास जाना हो, आसपास के रोजमर्रा के काम निबटाने हों, बच्चों को स्कूल छोड़ना या लाना हो वे 25 किलोमीटर स्पीड वाली गाड़ी पसंद करते हैं.

इस में बारबार इंश्योरैंस नहीं कराना पड़ता, रजिस्ट्रेशन टैक्स नहीं देना पड़ता. शोरूम से निकलने के बाद इस पर कोई खर्चा नहीं होता. इसीलिए लोग 25 किलोमीटर स्पीड वाली गाड़ी पसंद करते हैं. अगर आप को कहीं दूर आनाजाना है तो 55 किलोमीटर स्पीड वाली गाड़ी ले सकते हैं.

आप इसे वूमन ऐंपावरमैंट से कैसे जोड़ सकते हैं?

हम 2 तरह की गाडि़यां बना रहे हैं. पहली जो 55-60 किलोमीटर की रफ्तार वाली है, वह स्कूलकालेज जाने वाले लड़केलड़कियों के लिए है और दूसरी गाड़ी जो कम स्पीड वाली है उसे हम वूमन ऐंपावरमैंट के लिए बना रहे हैं.

यह इतनी इकोनौमिकल है कि किसी को खलती नहीं. इस से बड़ा ऐंपावरमैंट और क्या हो सकता है? आप जहां भी जा रहे हैं अगर वहां सौकेट लगा है तो वहीं बैटरी रिचार्ज कर लें. पैट्रोल पंप जाने का झंझट ही नहीं.

यही नहीं इसे महिला सुरक्षा को ध्यान में रख कर भी तैयार किया गया है. आप सुरक्षा के लिए क्या करेंगे? जीपीएस वाली या इमरजैंसी सायरन वाली गाड़ी लेंगे. इस गाड़ी में ये दोनों ही सुविधाएं हैं. इस से महिला अपना कंट्रोल, अपनी लोकेशन, अपने पति, दोस्तों या बच्चों को दे सकती है.

जब किसी महिला के पास अपनी ई बाइक है तो वह बस या औटो से उतर कर पैदल घर क्यों जाए? सड़क पर पैदल क्यों चले? किसी और के आने का इंतजार क्यों करे?

ई बाइक्स की तरह ई कैब या ई कार कब लाएंगे?

अभी हमारा पूरा फोकस टू व्हीलर पर है. हमें लगता है कि भारत टू व्हीलर्स का देश है. इस वक्त 2 करोड़ टू व्हीलर बनते हैं जबकि कारें तो सिर्फ 30 लाख बनती हैं.

वैसे हम थ्री और फोर व्हीलर भी जल्दी लाएंगे. इस वक्त ई टैक्सी नागपुर में चल रही है.

क्या ई बाइक्स प्रदूषण कम करने में भी मदद करती हैं?

एक बार जब आप के हाथ में ई बाइक्स आ जाएगी तो समझिए कि आप ने हर 3 साल में एक बहुत बड़ा ट्री प्लांट कर दिया. यदि आप ने 8-10 साल ई बाइक चलाई तो 4-5 ट्री प्लांट के बराबर प्रदूषण कम कर दिया.

जो गाडि़यां सड़कों पर धुआं छोड़ती हैं वे 3-4 गुना प्रदूषण फैलाती हैं जबकि ई बाइक जीरो प्रदूषण फैलाती है. इस में साइलैंसर नहीं है और न ही इंजन है तो प्रदूषण कैसे होगा?

सिनेमा किसी भाषा का मोहताज नहीं : मजिद मजीदी

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सिनेमा कभी भी भाषा का मोहताज नही होता. हर बड़ा फिल्मकार मानता है कि सिनेमा किसी भी देश की संस्कृति का वाहक हो सकता है और अब यही बात माजिद मजीदी की भारतीय कलाकारों के साथ भारतीय पृष्ठभूमि की कहानी पर भारत में ही फिल्मायी गयी फिल्म ‘‘बियांड द क्लाउड्स’’ से भी उभरकर आ रही है. जब से ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी भारत की यात्रा पर आए और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले, तब से यह चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है.

इरानियन राष्ट्रपति हसन रूहानी और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपसी बातचीत के दौरान आतंकवाद के खात्मे के लिए दोनों देशों के बीच सभ्यता संस्कृति व सूचना के आपसी आदान प्रदान पर जोर दिया.

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दोनों नेताओं ने दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान के लिए सिनेमाई सहयोग को सबसे बड़ी जरुरत बतायी. उन्होने सार्थक सिनेमा के माध्यम से दोनो देशों के प्रतिभाशाली लोगों को एक साथ लाने पर भी जोर दिया. इन नेताओं के बीच हुई बातचीत की पृष्ठभूमि में ईरानियन फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म ‘‘बियांड द क्लाउड्स’’ की  चर्चा हो रही है.

कहा जा रहा है कि फिल्मकार माजिद मजीदी का पहला सिनेमाई भारतीय प्रवास मुख्य केंद्र स्थान बन गया है. इस फिल्म का जिक्र करते हुए रूहानी ने कहा कि इसी तरह सिनेमा के क्षेत्र में दोनों देशों की प्रतिभाओं के ज्यादा से ज्यादा एक साथ आने पर बल दिया जाना चाहिए.

पति करण के जन्मदिन पर बिपाशा ने की खास तैयारियां, देखें तस्वीरें

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बौलीवुड और टीवी अभिनेता करण सिंह ग्रोवर का आज यानी कि 23 फरवरी को जन्मदिन हैं. करण अपने 36वें जन्मदिन का जश्न गोवा में पत्नी बिपाशा बसु के साथ मना रहे हैं. बिपाशा ने अपने लकी चार्म करण के जन्मदिन के लिए खास तैयारियां कीं. इंडस्‍ट्री के इस क्‍यूट कपल ने मुंबई की भीड़भाड़ से दूर गोवा में करीबियों के संग बर्थडे मनाया. इस जश्न की कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जिसमें जोड़ी बर्थडे को खूब इंज्‍वाय करते नजर आ रहे हैं.

साल 2004 में टीवी शो ‘कितनी मस्त है जिंदगी’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले करण ‘कसौटी जिंदगी की (2005-06)’, ‘दिल मिल गए (2007-10), ‘कबूल है (2012-13)’ जैसे सीरियल के अलावा कई रिएलिटी शोज का हिस्सा बन चुके हैं. करण ने 2015 में ‘अलोन’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की. अलोन की शूटिंग दौरान ही बिपाशा और करण के बीच नजदीकियां बढ़ी, जिसके बाद से ही दोनों के डेट की खबरें आने लगी थी. 30 अप्रैल, 2016 को जोड़ी शादी के बंधन में बंधीं.

 

करण अपने प्रोफेशनल लार्इफ के अलावा अपनी पर्सनल लाईफ को लेकर भी खासा सुर्खियों में रहे. बिपाशा उनकी तीसरी पत्नी हैं. करण ने साल 2008 में टीवी एक्ट्रेस श्रद्धा निगम से पहली शादी की, लेकिन शादी के 10 महीने बाद ही उनका तलाक हो गया. साल 2012 उन्होंने अपनी को-स्टार जेनिफर विंगेट से दूसरी शादी की, लेकिन ये रिश्ता भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया और साल 2014 में इनका तलाक हो गया. फिर उन्होंने बिपाशा से शादी कर ली.

बिपाशा ने शादी के बाद फिलहाल किसी प्रोजेक्‍ट को हाथ नहीं लगाया है. हालांकि करण ‘3 देव’ और ‘फिर्की’ में व्यस्त हैं. पिछले दिनों खबरें थी कि दोनों टीवी रियेलिटी शो को जज करते नजर आयेंगे लेकिन फिर इस बारे में दोनों की ओर से कोई कमिटमेंट नहीं आया.

महान खिलाड़ियों को देख उन जैसा खेलने की कोशिश करता हूं : स्टीव स्मिथ

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आधुनिक क्रिकेट के इस युग में चार सबसे पसंदीदा खिलाड़ी माने जाते हैं- स्टीव स्मिथ, विराट कोहली, केन विलियम्सन और जो रूट. क्रिकेट की वर्तमान पीढ़ी में जब बल्लेबाजों का नाम लिया जाता है तो यही चार स्टार क्रिकेटर नजर आते हैं. इनकी अपनी कमजोरियां और अपनी ताकत है. इन्होंने कठिन समय और परिस्थितियों का मुकाबला करते हुए अपने बल्लेबाजी को निखारा है. हर रोज इनकी कहानी आकर्षण के नए आयाम छू रही है. खासतौर पर जब औस्ट्रेलियाई टेस्ट और वनडे के कप्तान स्टीव स्मिथ की बात होती है.

स्टीव स्मिथ ने अपना अंतरराष्ट्रीय करियर स्पिन औलराउंडर के रूप में शुरू किया था, लेकिन समय ने उन्हें बेखौफ बल्लेबाज बना दिया. वह आधुनिक क्रिकेट के सबसे सफल बल्लेबाज माने जाते हैं. पिछले कुछ सालों में स्मिथ की तुलना सर डौन ब्रैडमैन से होने लगी है. माना जा रहा है कि स्मिथ ने अपनी तकनीक को शानदार बनाया है और किसी भी गेंदबाज का डर उनके मन में नहीं रहा. बल्लेबाजी को बेहतर बनाने के स्मिथ के स्रोत क्या हैं?

भारतीय कप्तान विराट कोहली, न्यूजीलैंड के कप्तान केन विलियम्सन और दक्षिण अफ्रीका के मिस्टर 360 एबी डिविलियर्स से वह कुछ न कुछ सीखकर आगे बढ़ रहे हैं. इनके खेल को देखकर स्मिथ अपने खेल को बेहतर बना रहे हैं. स्मिथ 61 टेस्ट मैचों में 6057 रन बना चुके हैं. उनका औसत 63.76 है. एक इंटरव्यू में स्मिथ ने बताया कि कैसे वे कई बार दूसरों की तरह बल्लेबाजी करते हैं.

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उन्होंने कहा, ”मैं दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों पर नजर डालता हूं और उनकी तरह बल्लेबाजी करने की कोशिश करता हूं. मैं इनके खेल को देखता हूं और सीखता हूं क्योंकि ये दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज हैं. मैदान पर स्मिथ के कोहली से ऐसे रिश्ते दिखाई नहीं पड़ते जिससे कहा जा सके कि ये दोनों अच्छे मित्र हैं. लेकिन स्मिथ इस बात पर नजर रखते हैं कि कोहली स्निपरों को कैसे खेलते हैं. इसका स्मिथ को फायदा भी हुआ है. पिछले साल फरवरी मार्च में औस्ट्रेलिया ने भारत का दौरा किया था. और स्मिथ ने यहां 71.29 की औसत से 499 रन बनाए थे. इनमें तीन शतक भी शामिल थे.”

स्टीव स्मिथ ने बताया, ”मैं देखता हूं कि विराट स्पिन को कैसे खेल रहे हैं, कैसे गेंदों को हिट कर रहे हैं. मैं उससे थोड़ा बहुत सीखता हूं. मुझे लगता है ये दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ी हैं. आप इनके खेल को देखकर बहुत कुछ सीख सकते हैं. स्मिथ ने बताया कि उनके एशियाई पिचों पर बैट को पकड़ने का अलग ढंग होता है. यहां वे स्पिन को अलग तरीके से खेलते हैं.”

दक्षिण अफ्रीका के विस्फोटक बल्लेबाज डीविलियर्स को कौपी करने के बारे में स्मिथ ने कहा, ”डिविलियर्स को मैं कुछ हद तक कौपी करने की कोशिश करता हूं. मैं उनके शौट खेलने के तरीके को फौलो करता हूं. खासतौक पर जब बौल रिवर्स स्विंग कर रही हो.”

औस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ ने यह भी कहा कि वह केन विलियम्सन के अंदाज में भी खेलते हैं. उन्होंने कहा, ”कुछ साल पहले मैंने विलियम्सन की तरह गेंद को लेट कट करके सीमा पार पहुंचाने का प्रयास किया था.” औस्ट्रेलियाई कप्तान की इन बातों को जानकर तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि स्टीव स्मिथ की बल्लेबाजी आधुनिक क्रिकेट के चार महान बल्लेबाजों का मिश्रण है.

रोहित शर्मा बने ‘जीरो के हीरो’

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टीम इंडिया के सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा के लिए द. अफ्रीकी दौरा किसी खराब सपने जैसा ही रहा है. टेस्ट, वनडे और टी 20 सीरीज के अब तक हो चुके दो मैचों में उनकी बल्लेबाजी पर नजर डालें तो पांचवें वनडें में उनकी शतकीय पारी के अलावा उन्होंने हर मौके पर निराश ही किया है. दूसरे टी 20 मैच में भी प्रोटियाज के खिलाफ रोहित शर्मा ने शून्य पर आउट होकर एक बेहद शर्मनाक रिकौर्ड भी अपने नाम कर लिया.

भारत की तरफ से टी20 में सबसे ज्यादा बार शून्य पर आउट हुए रोहित शर्मा

क्रिकेट की दुनिया में हिटमैन के नाम से मशहूर रोहित पहले ऐसे भारतीय बल्लेबाज बन गए हैं जो टी20 मैचों में भारत की तरफ से सबसे ज्यादा बार शून्य पर आउट हुए हैं. रोहित अपने अंतरराष्ट्रीय टी20 करियर में अब तक खेले 73 मैचों में सबसे ज्यादा यानी 4 बार शून्य पर आउट हो चुके हैं. टी 20 मैचों में जीरो पर आउट होने के मामले में रोहित से आगे दो भारतीय बल्लेबाज यूसुफ पठान और आशीष नेहरा थे. अब रोहित ने उन दोनों को पीछे छोड़ दिया है. उनके इस शर्मनाक रिकौर्ड को देखते हुए अगर उन्हें शून्य का हीरो कहा जाए तो गलत नहीं होगा.

3 बार गोल्डन डक के साथ रोहित शर्मा आशीष नेहरा और औल राउंडर यूसुफ पठान के बराबर थे. लेकिन इस मैच ने रोहित शर्मा को गोल्डन डक में अव्वल कर दिया. टी-20 मैचों में रोहित शर्मा के 4 गोल्डन डक के बाद नंबर आता है यूसुफ पठान का, जिनके नाम 3 गोल्डन डक हैं, इसके बाद आते हैं आशीष नेहरा उनके नाम भी 3 गोल्डन डक है. बता दें कि क्रिकेट में जब कोई बल्लेबाज बिना रन बनाएर आउट होता है तो उसे डक कहा जाता है. अगर खिलाड़ी पहली बौल पर आउट होता है तो उसे गोल्डन डक कहते हैं. वहीं जब कोई बैट्समैन बिना कोई बौल खेले ही आउट हो जाए तो उसे डायमंड डक कहा जाता है.

एक नजर डालते हैं कि कब-कब रोहित जीरो पर आउट हुए-

1 फरवरी 2012- विरुद्ध औस्ट्रेलिया (सिडनी)- 0 रन

9 फरवरी 2016- विरुद्ध श्रीलंका (पुणे)- 0 रन

27 फरवरी 2016- विरुद्ध पाकिस्तान (ढाका)- 0 रन

21 फरवरी 2018- विरुद्ध द. अफ्रीका (सेंचुरियन)- 0 रन

रोहित जितनी बार भी टी 20 मैचों में शून्य पर आउट हुए हैं वो सारे मैच फरवरी महीने में खेले गए हैं. वैसे रोहित शर्मा एक बार शून्य पर नाबाद पवेलियन भी लौटे हैं. 13 जून 2010 को हरारे में जिम्बाब्वे के खिलाफ खेले गए मैच में वो शून्य पर नाबाद पवेलियन लौटे थे.

तृष्णा : भाग 1

‘‘सीधेसीधे कहो न कि चंदन तो आ गया, अब चांदनी चाहिए,’’ उदय ने हंस कर इरा से कहा.

उस का मन एक स्वच्छ और निर्मल आकाश था, एक कोरा कैनवस, जिस पर वह जब चाहे, जो भी रंग भर लेती थी. ‘लेकिन यथार्थ के धरातल पर ऐसे कोई रह सकता है क्या?’ उस का मन कभीकभी उसे यह समझाता, पर ठहर कर इस आवाज को सुनने की न तो उसे फुरसत थी, न ही चाह.

फिर उसे अचानक दिखा था, उदय, उस के जीवन के सागर के पास से उगता हुआ. उस ने चाहा था, काश, वह इतनी दूर न होता. काश, इस सागर को वह आंखें मूंद कर पार कर पाती. उस ने आंखें मूंदी थीं और आंखें खुलने पर उस ने देखा, उदय सागर को पार कर उस के पास खड़ा है, बहुत पास. सच तो यह था कि उदय उस का हाथ थामे चल पड़ा था.

दिन पंख लगा कर उड़ने लगे. संसार का मायाजाल अपने भंवर की भयानक गहराइयों में उन्हें निगलने को धीरेधीरे बढ़ने लगा था. उन के प्यार की खुशबू चंदन बन कर इरा की गोद में आ गिरी तो वह चौंक उठी. बंद आंखों, अधखुली मुट्ठियों, रुई के ढेर से नर्म शरीर के साथ एक खूबसूरत और प्यारी सी हकीकत, लेकिन इरा के लिए एक चुनौती.

इरा की सुबह और शाम, दिन और रात चंदन की परवरिश में बीतने लगे. घड़ी के कांटे के साथसाथ उस की हर जरूरत को पूरा करतेकरते वह स्वयं एक घड़ी बन चुकी थी. लेकिन उदय जबतब एक सदाबहार झोंके की तरह उस के पास आ कर उसे सहला जाता. तब उसे एहसास होता कि वह भी एक इंसान है, मशीन नहीं.

चंदन बड़ा होता गया. इरा अब फिर से आजाद थी, लेकिन चंदन का एक तूफान की तरह आ कर जाना उसे उदय की परछाईं से जुदा सा कर गया. अब वह फिर से सालों पहले वाली इरा थी. उसे लगता, ‘क्या उस के जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया? क्या अब वह निरुद्देश्य है?’

एक बार उदय रात में देर से घर आया था, थका सा आंखें बंद कर लेट गया. इरा की आंखों में नींद नहीं थी. थोड़ी देर वह सोचती रही, फिर धीरे से पूछा, ‘‘सो गए क्या?’’

‘‘नहीं, क्या बात है?’’ आंखें बंद किए ही वह बोला.

‘‘मुझे नींद नहीं आती.’’

उदय परेशान हो गया, ‘‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है न?’’ अपनी बांह का सिरहाना बना कर वह उस के बालों में उंगलियां फेरने लगा.

इरा ने धीरे से अलग होने की कोशिश की, ‘‘कोई बात नहीं, मुझे अभी नींद आ जाएगी, तुम सो जाओ.’’ थोड़ी देर तब उदय उलझा सा जागा रहा, फिर उस के कंधे पर हाथ रख कर गहरी नींद सो गया.

कुछ दिनों बाद एक सुबह नाश्ते की मेज पर इरा ने उदय से कहा, ‘‘तुम और चंदन दिनभर बाहर रहते हो, मेरा मन नहीं लगता, अकेले मैं क्या करूं?’’

उदय ने हंस कर कहा, ‘‘सीधेसीधे कहो न कि चंदन तो आ गया, अब चांदनी चाहिए.’’

‘‘जी नहीं, मेरा यह मतलब हरगिज नहीं था. मैं भी कुछ काम करना चाहती हूं.’’

‘‘अच्छा, मैं तो सोचता था, तुम्हें घर के सुख से अलग कर बाहर की धूप में क्यों झुलसाऊं? मेरे मन में कई बार आया था कि पूछूं, तुम अकेली घर में उदास तो नहीं हो जाती हो?’’

‘‘तो पूछा क्यों नहीं?’’ इरा के स्वर में मान था.

‘‘तुम क्या करना चाहती हो?’’

‘‘कुछ भी, जिस में मैं अपना योगदान दे सकूं.’’

‘‘मेरे पास बहुत काम है, मुझ से अकेले नहीं संभलता. तुम वक्त निकाल सकती हो तो इस से अच्छा क्या होगा?’’ इरा खुशी से झूम उठी.

दूसरे दिन जल्दीजल्दी सब काम निबटा कर चंदन को स्कूल भेज कर दोनों जब घर से बाहर निकले तो इरा की आंखों में दुनिया को जीत लेने की उम्मीद चमक रही थी. सारा दिन औफिस में दोनों ने गंभीरता से काम किया. इरा ने जल्दी ही काफी काम समझ लिया. उदय बारबार उस का हौसला बढ़ाता.

जीवन अपनी गति से चल पड़ा. सुबह कब शाम हो जाती और शाम कब रात, पता ही न चलता था.

एक दिन औफिस में दोनों चाय पी रहे थे कि एकाएक इरा ने कहा, ‘‘एक बात पूछूं?’’

‘‘हांहां, कहो.’’

‘‘यह बताओ, हम जो यह सब कर रहे हैं, इस से क्या होगा?’’

उदय हैरानी से उस का चेहरा देखने लगा, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘यही कि रोज सुबह यहां आ कर वही काम करकर के हमें क्या मिलेगा?’’

‘‘क्या पाना चाहती हो?’’ उदय ने हंस कर पूछा.

‘‘देखो, मेरी बात मजाक में न उड़ाना. मैं बहुत दिनों से सोच रही हूं, हमें एक ही जीवन मिला है, जो बहुत कीमती है. इस दुनिया में देखने को, जानने को बहुत कुछ है. क्या घर से औफिस और औफिस से घर के चक्कर काट कर ही हमारी जिंदगी खत्म हो जाएगी?’’

‘‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम जो कुछ कर रही हो, वह काफी नहीं है?’’ उदय गंभीर था.

इरा को न जाने क्यों गुस्सा आ गया. वह रोष से बोली, ‘‘क्या तुम्हें लगता है, जो तुम कर रहे हो, वही सबकुछ है और कुछ नहीं बचा करने को?’’

उदय ने मेज पर रखे उस के हाथ पर अपना हाथ रख दिया, ‘‘देखो, अपने छोटे से दिमाग को इतनी बड़ी फिलौसफी से थकाया न करो. शाम को घर चल कर बात करेंगे.’’

शाम को उदय ने कहा, ‘‘हां, अब बोलो, तुम क्या कहना चाहती हो?’’

इरा ने आंखें बंद किएकिए ही कहना शुरू किया, ‘‘मैं जानना चाहती हूं कि जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए, आदर्श जीवन किसे कहना चाहिए, इंसान का सही कर्तव्य क्या है?’’

‘‘अरे, इस में क्या है? इतने सारे विद्वान इस दुनिया में हुए हैं. तुम्हारे पास तो किताबों का भंडार है, चाहो तो और मंगवा लो. सबकुछ तो उन में लिखा है, पढ़ लो और जान लो.’’

‘‘मैं ने पढ़ा है, लेकिन उन में कुछ नहीं मिला. छोटा सा उदाहरण है, बुद्ध ने कहा कि ‘जीवहत्या पाप है’ लेकिन दूसरे धर्मों में लोग जीवों को स्वाद के लिए मार कर भी धार्मिक होने का दावा करते हैं और लोगों को जीने की राह सिखाते हैं. दोनों पक्ष एकसाथ सही तो नहीं हो सकते. बौद्ध धर्म को मानने वाले बहुत से देशों में तो लोगों ने कोई भी जानवर नहीं छोड़ा, जिसे वे खाते न हों. तुम्हीं बताओ, इस दुनिया में एक इंसान को कैसे रहना चाहिए?’’

‘‘देखो, तुम ऐसा करो, इन सब को अपनी अलग परिभाषा दे दो,’’ उदय ने हंस कर कहा.

इरा ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं बहुतकुछ जानना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि जब पेड़पौधे, जमीन, नदियां सब बर्फ से ढक जाते हैं तो कैसा लगता है? जब उजाड़ रेगिस्तान में धूल भरी आंधियां चलती हैं तो कैसा महसूस होता है? पहाड़ की ऊंची चोटी पर पहुंच कर कैसा अुनभव होता है? सागर के बीचोंबीच पहुंचने पर चारों ओर कैसा दृश्य दिखाई देता है? ये सब रोमांच मैं स्वयं महसूस करना चाहती हूं.’’

उदय असहाय सा उसे देख रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इरा को कैसे शांत करे. फिर भी उस ने कहा, ‘‘अच्छा उठो, हाथमुंह धो लो, थोड़ा बाहर घूम कर आते हैं,’’ फिर उस ने चंदन को आवाज दी, ‘‘चलो बेटे, हम बाहर जा रहे हैं.’’

उन लोगों ने पहले एक रैस्तरां में कौफी पी. चंदन ने अपनी पसंद की आइसक्रीम खाई. फिर एक थिएटर में पुरानी फिल्म देखी. रात हो चुकी थी तो उदय ने बाहर ही खाना खाने का प्रस्ताव रखा. काफी रात में वे घर लौटे.

कुछ दिनों बाद उदय ने इरा से कहा, ‘‘इस बार चंदन की सर्दी की छुट्टियों में हम शिमला जा रहे हैं.’’

इरा चौंक पड़ी, ‘‘लेकिन उस वक्त तो वहां बर्फ गिर रही होगी.’’

‘‘अरे भई, इसीलिए तो जाएंगे.’’

‘‘लेकिन चंदन को तो ठंड नुकसान पहुंचाएगी.’’

‘‘वह अपने दादाजी के पास रहेगा.’’

शिमला पहुंच कर इरा बहुत खुश थी. हाथों में हाथ डाल कर वे दूर तक घूमने निकल जाते. एक दिन सर्दी की पहली बर्फ गिरी थी. इरा दौड़ कर कमरे से बाहर निकल गई. बरामदे में बैठे बर्फ गिरने के दृश्य को बहुत देर तक देखती रही.

फिर मौसम कुछ खराब हो गया था. वे दोनों 2 दिनों तक बाहर न निकल सके.

3-4 दिनों बाद ही इरा ने घर वापस चलने की जिद मचा दी. उदय उसे समझाता रह गया, ‘‘इतनी दूर इतने दिनों बाद आई हो, 2-4 दिन और रुको, फिर चलेंगे.’’

लेकिन उस ने एक न सुनी और उन्हें वापस आना पड़ा.

एक बार चंदन ने कहा, ‘‘मां, जब कभी आप को बाहर जाना हो तो मुझे दादाजी के पास छोड़ जाना, मैं उन के साथ खूब खेलता हूं. वे मुझे बहुत अच्छीअच्छी कहानियां सुनाते हैं और दादी ने मेरी पसंद की बहुत सारी चीजें बना कर मुझे खिलाईं.’’

इरा ने उसे अपने सीने से लगा लिया और सोचने लगी, ‘शिमला में उसे चंदन का एक बार भी खयाल नहीं आया. क्या वह अच्छी मां नहीं? अब वह चंदन को एक दिन के लिए भी छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी.’

वे जो वगैरह थे

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वे जो वगैरह थे वे जो वगैरह थे

वे बाढ़ में बह जाते थे वे भुखमरी का शिकार हो जाते थे

वे शीतलहरी की भेंट चढ़ जाते थे वे दंगों में मार दिए जाते थे

वे जो वगैरह थे

वे ही खेतों में फसल उगाते थे वे ही शहरों में भवन बनाते थे

वे ही सारे उपकरण बनाते थे वे ही क्रांति का बिगुल बजाते थे

दूसरी ओर

पद और नाम वाले ही सरकार और कारोबार चलाते थे

उन्हें भ्रम था कि वे ही संसार चलाते थे.

– सुशांत सुप्रिय

दास्ताने मुहब्बत

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चश्मेनम भी हुए जो वो मुसकराए

राजेदिल खुल गए उन के बिन बताए

हम खड़े के खड़े ही रहे रहगुजर में

हजारों गए और हजारों ही आए

ये एहसासेदिल है, नजर तो नहीं है

इसे रंगेदुनिया कोई क्या दिखाए

हो गए इश्क की बू से यों रूबरू

ये गुलगुलिस्तां भी नहीं रास आए

गम के अंधेरों में उन का तबस्सुम

हजारों दीये जैसे हों जगमगाए

कदम बढ़ चुके हैं जो राहों पर उन की

कहो दिल पर कोई न पहरा लगाए

है मीठी गजल दास्ताने मुहब्बत

जो इस को सुने ये उसी के मन भाए.

– कुसुम अग्रवाल

एकतरफा निर्णय से कानून भी कठघरे में होगा

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सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाहों को ले कर एक मामले में कहा है कि चाहे बाल विवाह मानव अधिकारों के खिलाफ हों और कितने ही घृणित हों, जिस संख्या में ये देश में हो रहे हैं इन का अपराधीकरण नहीं करा जाना चाहिए. यह ठीक है. देश में हर काम को अपराध घोषित करने की परंपरा सी चालू हो गई है.

पहले जियो और जीने दो का जो सिद्धांत कानून बनाने वाले दिमाग में रखते थे अब धर्मों के अनुयायी बन गए हैं कि जो भी कुछ करोगे, पाप करोगे और प्रायश्चित्त करोगे ही.

सुप्रीम कोर्ट के पास मामला गया था कि क्या सहमति से 15 व 17 वर्ष के लड़कीलड़के के यौन संबंध जायज हैं? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, सहमति हो अथवा न हो, अपराध घोषित करा है. 15 से 18 साल की विवाहित लड़की से पति के यौन संबंध अब तक अपराध नहीं थे.

पर असल बात तो यह है कि लड़कियों के यौन संबंध 13-14 साल की उम्र से सहमति से शुरू हो जाते हैं और इस कदर होते हैं कि अगर सभी को कानूनी दायरे में लाया गया तो अदालतों में सैकड़ों लड़के अपराधी बने दिखेंगे और सैकड़ों लड़कियां पीडि़ता के रूप में गवाह. यह नकारना कि 17-18 वर्ष की लड़कियों में यौन संबंध अपवाद हैं गलत होगा.

ये संबंध गलत हैं, इस में शक नहीं है पर इन्हें सामान्य अपराधों की गिनती में डालना भी सही नहीं होगा. हमउम्र नाबालिगों के यौन संबंधों को अपराध मान लिया गया तो दोनों के ऊपर जीवन भर का धब्बा लग जाएगा. लड़के को बालगृह की यातनाओं को भुगतने के लिए भेजना होगा और उस का कैरियर चौपट हो जाएगा तो लड़की पर धब्बा लग जाएगा कि वह चालू है. उस की भी पढ़ाईलिखाई चौपट हो जाएगी.

अगर नाबालिग स्कूली यौन संबंध सहमति से हों तो बहुत सावधानी से हैंडल होने चाहिए. हमारी पुलिस और अदालतें इस तरह की नाजुक स्थिति को संभालने लायक नहीं हैं. पुलिस ऐसे मामले में मातापिताओं को लूटने में लग जाती है और अदालतें तारीख पर तारीख डालने में. दोनों की सहज प्राकृतिक क्रिया उन्हें एक अंधेरे कुएं में डाल देती है.

यह भयावह स्थिति आज दिखती नहीं है, क्योंकि अपराध होते हुए भी कोई कानून का दरवाजा नहीं खटखटाता और मामला दबा कर रखा जाता है. लड़कों को डांटडपट दिया जाता है और लड़कियों को घरों में बंद कर दिया जाता है. अगर पुलिस को भनक लगने लगे और जैसा सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि सहमति से नाबालिगों के बीच बना यौन संबंध बलात्कार है, जिस में दोषी केवल लड़का है तो हर चौथा घर लपेटे में आ जाए तो बड़ी बात नहीं.

इस तरह के संवेदनशील पर प्राकृतिक मामलों को सुप्रीम कोर्ट, दूसरी अदालतें और पुलिस खाप पंचायतों की तरह सुलझाने की कोशिश कर रही हैं कि हर मामले में बिना अगरमगर सुने अपराधी घोषित कर दिया जाए और सजा दे दी जाए. पुलिस की कैद खाप पंचायतों की सजा से भी बदतर होती है.

धर्म की दुकानदारी को गैरकानूनी करना ही होगा

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वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे बाबा कैसे लड़कियों को बहकाते हैं कि वे अपने मातापिता को भी भुला देती हैं, एक चमत्कार ही है. मध्य प्रदेश के सतना के राजेश प्रताप सिंह ने 7 साल पहले अपनी 16 वर्षीय बेटी को किस मोह में या किस अंधविश्वास में बाबा के द्वारका आश्रम में भेज दिया यह आश्चर्य है.

लोग खुले हाथ अपनी मेहनत की मोटी कमाई इन बाबाओं को देते रहते हैं जो कोई नई बात नहीं है पर बच्चों को भी आज के युग में उपहार की तरह बाकायदा स्टांप पेपर पर अनुबंध लिख कर दे दिया जाए यह गंभीर मामला है.

धर्म के नाम पर अनाचार सदियों से होता रहा है और पीडि़ताएं खुदबखुद इस अनाचार को ठीक उसी तरह नियति मान कर स्वीकार करती रही हैं जैसे वेश्याएं चकलों में जिंदगी को सहन करने लगती हैं और सैनिक गोलियों की बौछारों को. इन सब मामलों में निरंतर तर्क और सत्य के स्थान पर अंधभक्ति इस प्रकार दिमाग में प्रत्यारोपित कर दी जाती है कि लड़कियां व उन के मातापिता इसी को भाग्य मान कर संतुष्ट ही नहीं हो जाते, इस बात पर समाज में गर्व भी करने लगते हैं.

वैसे दुनिया के सभी समाजों में पिता अपनी बेटियों को उन के लिए ढूंढ़े गए वर के हाथ में सौंपते हुए भी यही कहते हैं कि बेटी, अब जो कुछ तुम्हारे साथ होगा, वह पति करेगा यानी कि वे बेटी को जीवन से पूरी तरह बाहर निकाल देते हैं. कई समाजों में तो विवाह बाद बेटियों की शक्ल ही नहीं देखी जाती. अन्य उदार समाजों में भी पिता के घर के दरवाजे लगभग बंद ही हो जाते हैं.

बेटियों के प्रति यही सोच आश्रमों के बाबाओं को मालामाल बनाती है. बेटी का भार ग्रहण करते हुए आश्रमों के बाबा मातापिता से मोटा दान भी दहेज की तरह ले लेते हैं और फिर उन का मनमाना दुरुपयोग करते हैं. 2-4 महीनों में बेटियां आश्रम के जीवन की आदी हो जाती हैं और मरजी से अपनी जगह वहीं बनाना शुरू कर देती हैं. सैकड़ों बाबाओं ने इसी का लाभ उठाया है. वे बेटियां भी ग्रहण करते हैं, पत्नियां भी. बहुत सी औरतें पतियों को जानबूझ कर छोड़ कर आश्रमों में बस जाती हैं तो कुछ घर में सेंध लगा कर आश्रम की अपने तन और पति के धन दोनों से सेवा करती हैं.

जब कभी हल्ला मचता है तो लोग ऐसे हायहाय करते हैं मानों राम रहीम या वीरेंद्र देव दीक्षित कई अपवाद और अपराधी हैं जबकि ये औरतें अपनी या मातापिता की मरजी से ही इन आश्रमों में आती हैं.

अगर इस दुर्दांत कथा का अंत करना है तो धर्म की दुकानदारी को गैरकानूनी करना होगा, जो भारत हो या अमेरिका कहीं भी संभव नहीं लगता. जब तक यह नहीं होगा राम रहीम, वीरेंद्र देव दीक्षित और अमेरिका के अपने ही ऐसे बाबा पनपते रहेंगे.

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