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चुनाव और फेसबुक व्हाट्सऐप

फेसबुक ने भारतीय चुनाव आयोग को भरोसा दिलाया है कि अगले चुनावों से पहले वह फेक यानी झूठी खबरों को रोकने की पूरी कोशिश करेगा. इस तरह के छद्म समाचार को फेसबुक एक खास एल्ग्रोथिम के जरिए अपनेआप रोक देगा, उन्हें फौरवर्ड नहीं होने देगा. सोशल मीडिया के दूसरे अहम माध्यम व्हाट्सऐप ने भी इसी तरह का भरोसा दिलाया है. फेक न्यूज यानी झूठी खबरें या कहें अफवाहें दुनियाभर की चिंता का विषय बन गई हैं. विचारों की स्वतंत्रता पर हमेशा ही झूठी खबरें या झूठे तथ्य देने पर अंकुश रहा है. जो स्वतंत्रता के हामी हैं उन्होंने भी कभी दुर्भावनाभरी बातों को प्रसारित करने का समर्थन नहीं किया.

पहले छपाई की सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं थी. फेक न्यूज केवल अफवाहों के जरिए कानों से कानों तक पहुंचाई जा सकती थी. उस समय छपी सामग्री जिम्मेदार लोगों के हाथों में रहती थी. हर कोई प्रैस या छापाखाना स्थापित कर फेक न्यूज वाला अपना अखबार नहीं निकाल सकता था. अब तो घर में बैठ कर ही पटियाला या प्लानीपट्टम में हुई मारपीट का वीडियो बनाया जा सकता है. लेटिन अमेरिकी फिल्मों के दृश्यों को कई बार आसानी से मार्फिंग और फोटोशौप के जरिए उन्हें भारतीय पृष्ठभूमि में बदल कर मुसलिमों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचार के रूप में दर्शाया जा सकता है.

जो लोग सदियों से पौराणिक झूठी खबरों पर विश्वास कर रहे हैं, जिन में प्रधानमंत्री से ले कर अधिकांश मंत्री शामिल हैं, वे इस तरह की फेक न्यूज पर विश्वास कर लेते हैं. तर्क शब्द तो उन की भाषा में है ही नहीं. वे तो विश्वास करते हैं कि मेढकमेढकी की शादी करा कर बारिश कराई जा सकती है या सर्जरी से हाथी का सिर आदमी पर लगाया जा सकता है और फिर उसे चूहे पर सवारी कराई जा सकती है. उन्हीं लोगों ने फेक न्यूज का जम कर प्रचार किया है क्योंकि वे उस का लाभ उठाना जानते हैं और उठा भी रहे हैं. फेसबुक और व्हाट्सऐप ने अगर इन्हें बंद कर दिया तो जान लीजिए कि ये दोनों सोशल मीडिया के स्तंभ समाप्तप्राय हो जाएंगे.

तर्क की बात सुनने की व सत्य सहने की ताकत और बुद्धि भारतीयों में है ही नहीं. जो थोड़ी बहुत 1950 और 1960 के दशकों में दिखी थी वह अब तक गंगा के पानी की तरह जहरीली हो गई है. ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि फेसबुक और व्हाट्सऐप का अंत अब निकट ही है.

यह प्यार

यह प्यार कोई गुनाह तो नहीं,
रिश्तों में दरार की वजह तो नहीं.
जाने कितने सालों से
दिल में छिपाए बैठे हैं, नाउम्मीदी के पश्चात भी

अपना बनाए बैठे हैं.
वो कहते हैं हम से कुछ मत छिपाना,
अपना हाल ए दिल
हम को सुनाना. बुरा लग गया

तो तुम्हें बता देंगे, अन्यथा अपनी पलकों में
फूलों की जगह सजा लेंगे.
फिर भी थे शब्द खुल के बता भी न सके,
वर्षों एक दिन मिलन की आस में.

भावनाओं के आवेश में,
तृष्णाओं के दबाव में मर्यादा में से
……. जान सके.
दिल की गहराई से सिर्फ और सिर्फ

उन के प्यार के लिए न करूंगा बात
जिस से हो उन के हृदय को आघात.
यह प्यार है कोई गुनाह नहीं
जीने के लिए इस से बड़ी कोई दवा नहीं.

लव इन सिक्सटीज स्पेशल : सीनियर सिटिजनों में लिवइन

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और अंतर्राष्ट्रीय हैल्प पेज ने संयुक्तरूप से 2012 में जो रिपोर्ट जारी की थी उस में अनुमान लगाया था कि 2050 तक भारत व चीन में दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या बुजुर्गों की होगी. वर्तमान में भारत की लगभग 12.7 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 60 वर्ष से अधिक है.

स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में जो सुधार आ रहे हैं उस से मानव के जीवनकाल में वृद्धि हुई है लेकिन साथ ही, सेवानिवृत्ति और अपने जीवनसाथी को खोने के बाद या जवानी में एकल रहने के बाद बुजुर्ग अवस्था में स्त्रीपुरुष के पास समय की तो अधिकता हो जाती है, लेकिन मिलनेजुलने वाले व आपसी दुखदर्द बांटने वालों की कमी रहती है. इस उम्र में यौन संबंधों पर बात करना तो अपराध जैसा है.

अब समय बदल रहा है. 60 साल के बुजुर्ग भी यौन संबंधों में रुचि दिखा रहे हैं. लंदन स्थित कालेज औफ नर्सिंग में बुजुर्गों के स्वास्थ्य सलाहकार डौनी गैरट का कहना है कि शारीरिक स्पर्श और सैक्स मनुष्य की बुनियादी जरूरतें हैं.

लंदन की जानीमानी कलाकार लुई वीबर अपनी कला के माध्यम से बढ़ती उम्र और सैक्स के मसले को उठाती हैं. उन का कहना है, ‘‘31 प्रतिशत उम्रदराज पुरुष और 20 प्रतिशत उम्रदराज महिलाएं अपने साथी को बारबार चूमती हैं या प्यार जताती हैं.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘हो सकता है कि कोई बुजुर्ग लंबे समय से सैक्स से दूर रहा हो, लेकिन वह अभी मरा तो नहीं. उस की कल्पनाएं बची हुई हैं, हास्यबांध बचा हुआ है.’’

लिवइन का चलन

यही कारण है कि अब भारत के बुजुर्गों में भी लिवइन रिलेशनशिप का क्रेज बढ़ता जा रहा है. इस का श्रेय हमारे स्वास्थ्य में हुए तमाम गुणात्मक सुधारों तथा बेहतर हुई आर्थिक स्थितियों को जाता है. शिक्षा और सोच का दायरा भी बढ़ा और उदार हुआ है. अब 60 साल के स्त्रीपुरुष भी अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं के अनुकूल जीवन जीने लगे हैं. इन सीनियर सिटिजनों की इच्छाओं और आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए मैचमैकिंग सर्विस नामक संस्था द्वारा सीनियर सिटिजन लिवइन रिलेशनशिप सम्मेलन की शुरुआत की गई. पहला सम्मेलन वर्ष 2011 में किया गया था, जिस में आधा दर्जन जोड़ों ने एकदूसरे का साथ चुना था. दूसरा सम्मेलन 22 नवंबर 2015 को हुआ था जिस में एकदूसरे का साथ चुनने वालों की संख्या 2 दर्जन से अधिक थी.

इसी प्रकार ग्लासगो कैलेडोनियाई यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान में पीएचडी करने वाले टेलरजेन पिलन और उस के सहयोगी एलन जेग्रो का बुजुर्गों पर किया गया एक अध्ययन एज ऐंड एजिंग जर्नल में वर्ष 2015 के अंत में प्रकाशित हुआ था. इस के अनुसार यह प्रमाणित हुआ था कि जो बुजुर्ग यौन गतिविधियों को महत्त्व देते हैं उन का सामाजिक जीवन और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है. उन के यौन व्यवहार से जुड़ी बातों का उन के बेहतर जीवन स्तर से भी गहरा और सकारात्मक रिश्ता पाया गया.

एम राजेश्वरी, दामोदर राव के लिए पिछले 2 वर्ष से एक उपयुक्त साथी की तलाश कर रही थीं. एम राजेश्वरी ने अध्यापिका के पद से सेवानिवृत्त होेने

के बाद बतौर समाजसेवा एकल या जीवनसाथी खो चुके बुजुर्गों के लिए साथी खोजने के लिए थोडूनीडा नामक एक एजेंसी की शुरुआत की थी. 64 वर्षीय दामोदर राव साथी की तलाश में राजेश्वरी की एजेंसी से मदद ले रहे थे. जब इस सिलसिले में राजेश्वरी ने उन से पूछा कि आप को कैसी साथी चाहिए, तो राव ने उन्हें बताया कि वे स्वतंत्र व उत्साही पार्टनर की तलाश में हैं, जिस की शिक्षा में दिलचस्पी हो.

बातचीत के दौरान एम राजेश्वरी व दामोदर राव की आंखें मिलीं और दोनों को उसी पल एहसास हो गया कि वे दोनों एक ही चीज की तलाश में हैं. दामोदर राव को एम राजेश्वरी जैसी साथी की ही तलाश थी. राजेश्वरी का कहना है, ‘‘दिसंबर 2010 में जब मैं ने यह एजेंसी शुरू की थी तब मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि मैं अपने लिए ही साथी तलाश कर बैठूंगी. मैं 50 वर्ष से ऊपर के लगभग 250 लोगों के लिए साथी की तलाश कर चुकी हूं और इन में से लगभग 95 प्रतिशत लोग मेरी तरह लिवइन रिलेशनशिप को प्राथमिकता देते हैं बजाय औपचारिक विवाह के.’’

अकेलेपन का एहसास

एम राजेश्वरी अपनेआप में एक उदाहरण हैं. जब वे 13 वर्ष की थीं तो उन का विवाह 21 वर्षीय युवा के साथ परंपरागत ढंग से कर दिया गया था. लेकिन विवाह के 17 साल बाद उन दोनों का तलाक हो गया था. राजेश्वरी अपने 3 बच्चों के साथ अपने मातापिता के पास लौट आईं. उन्होंने फिर से अपनी शिक्षा आरंभ की और अंत में अध्यापिका की नौकरी हासिल कर ली.

सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने बड़े बेटे के साथ रहने लगीं, लेकिन उन्हें अकेलेपन का एहसास होने लगा. इसी कारण वे उन लोगों के बारे में भी सोचने लगीं जिन्हें जीवन के आखिरी पड़ाव पर एक साथी की जरूरत महसूस होती है. वे हैदराबाद लौट आईं और बुजुर्ग लोगों की मुलाकात कराने के लिए थोडूनीडा नामक एजेंसी की शुरुआत की.

एजेंसी के कार्यालय के लिए उन्होंने एक हौल किराए पर लिया. लेकिन उस का किराया चुकाने के लिए उन के पास पैसा नहीं था. उन्होंने किराया चुकाने हेतु प्रत्येक व्यक्ति से 300 रुपए लेने शुरू कर दिए. एक स्थानीय समाचारपत्र ने उन की एजेंसी द्वारा बुजुर्गों की मुलाकात के संदर्भ में खबर प्रकाशित की तो राजेश्वरी आश्चर्यचकित रह गईं. एजेंसी की पहली ही मीटिंग में 80 बुजुर्गों ने भाग लिया. कुछ बुजुर्ग तो 400 किलोमीटर तक का फासला तय कर के आए थे.

पहली मीटिंग में 35 महिलाएं थीं जो लज्जा व शर्म की गठरी बनी हुई थीं, क्योंकि वे इस उम्र में नए सिरे से एक साथी की तलाश कर रही थीं. राजेश्वरी को उन्हें समझाना पड़ा कि साथी का मतलब सिर्फ सैक्स से नहीं है बल्कि भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने से भी है. इस मीटिंग में मजदूर से ले कर उद्योगपति तथा चपरासी से ले कर डाक्टर तक मौजूद थे. उन में से कइयों को तो अपनी पसंद का साथी मिल भी गया. जिन्होंने शादी के बजाय साथसाथ रहने का फैसला किया.

इस संबंध में दामोदर राव का कहना था कि बुजुर्गों को भी साथी की जरूरत होती है. इस नए संबंध में खुद को तय करना होता है कि आप के भोजन की प्राथमिकताएं क्या हैं, सोने की आदत कैसी है. एकदूसरे की प्राइवेसी में हस्तक्षेप न किया जाए. वैसे हर जोड़ा साथ रहने के लिए अपने नियम खुद तय कर लेता है.

तालमेल है जरूरी

इस उम्र में जोड़ा बनाते समय भी शारीरिक आकर्षण की अपनी भूमिका होती है, लेकिन अधिकतर लोग मानसिक तालमेल और हमदर्दी को प्राथमिकता देते हैं. इसी प्रकार एक सीनियर सिटिजन हैं, मराठी फिल्मों की नायिका सुहासिनी मुले. इन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकतर समय अपने पैशन और कैरियर को समर्पित कर दिया. लेकिन 60 साल की उम्र में ये शादी के बंधन में बंध गईं. इस उम्र में इन्हें एक ऐसा शख्स मिला जिस के साथ अपनी बाकी जिंदगी बिताना सही लगा. इन्होंने 2011 में भौतिक विज्ञान के जानकार

प्रो. अतुल गुरतु से शादी की. इन का कहना है कि इस के पूर्व मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि कोई ऐसा इंसान है जिस के साथ पूरी जिंदगी गुजारी जा सके, लेकिन प्रोफैसर साहब से मिलने के बाद मुझे एहसास हुआ कि इस व्यक्ति के साथ जिंदगी गुजारी जा सकती है और मैं ने शादी का फैसला कर लिया. सुहासिनी को अतुल गुरतु का एक आर्टिकल पढ़ कर उन से लगाव हुआ था. इस के बाद दोस्ती हुई और आखिर में बात शादी तक पहुंच गई.

सुहासिनी मुले एक सशक्त अभिनेत्री तो हैं ही, साथ ही वे एक डौक्यूमैंट्री फिल्म निर्माता भी हैं. वे 4 बार अपनी डौक्यूमैंट्री फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त कर चुकी हैं. सुहासिनी का यह फैसला इस उम्र में एकल जीवन जी रही कवयित्री महिलाओं को प्रेरणा प्रदान करेगा.

मुंबई निवासी कवयित्री जाने भंडारी का कहना है, ‘‘मेरे जीवन के छठे दशक में जब मेरे पति की मृत्यु हुई तो सामाजिक विचाराधारा के अनुसार मुझे अपनी बाकी जिंदगी विधवा बन कर ही गुजारनी थी, लेकिन जब मेरे जीवन में दोबारा जीवनसाथी का प्रवेश हुआ तो वह क्षण मेरे लिए अविश्वसनीय था. हमारे 5 साल के प्रेम संबंधों का अंत आखिरकार भव्य शादी में हुआ जिस में मेरे बच्चे व पोतेपोतियां भी शामिल थे. उस समय मेरी उम्र 68 साल तथा मेरे नए जीवनसाथी कमलेशपुरी की उम्र 69 वर्ष थी.

भारत के प्रसिद्ध यौनरोग व प्रेम संबंधों के सलाहकार डा. महेंद्र वत्स, जोकि 60 के बाद भी जीवनसाथी खोजने का पूरा समर्थन करते हैं, का विचार है कि मानव साहचर्य और यौन अंतरंगता का उम्र से कोई संबंध नहीं है. यह एक इच्छा है जिसे जिंदा रखने की आवश्यकता है या फिर हमें हालात को कुदरत पर छोड़ देना चाहिए जैसा कि विधवा बहू या अन्य गृहिणी को कुदरत के भरोसे छोड़ दिया जाता है और परिवार उन की ओर से आंखें मूंद लेता है.

डा. वत्स एक रोचक तथ्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, ‘‘उम्र बढ़ने पर यौन इच्छा में भले ही कमी आ सकती है लेकिन यौन कुशलता बेहतर हो जाती है.’’ पुरुष व स्त्री दोनों को दीर्घ अवधि तक मर्दन की आवश्यकता होती है, जोकि यौन संबंधों में अधिक घनिष्ठता व आनंद लाता है. वे ब्रिटिश सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहे हैं कि उम्रदराज व्यक्ति संभोग के  कारक होते हैं क्योंकि उन का शीघ्र शृंखलन नहीं होता. इसी कारण वे जवान व्यक्ति की अपेक्षा स्त्री को अधिक यौन संतुष्ट रखते हैं.

दकियानूसी सोच

अफसोसजनक बात यह है कि हमारे समाज की दकियानूसी विचारधारा बुढ़ापे में यौन संबंधों को पूरी तरह दुत्कार देती है. संयुक्त परिवार में अगर कोई विधवा दादीमां औनलाइन जा कर जीवनसाथी की तलाश करे तो उसे बहुत ही गिरी नजरों से देखा जाता है.

बदलती मानसिकता व नई विचारधारा के साथ डिग्निटी फाउंडेशन भारत के सब से पुराने वरिष्ठ नागरिक सहायता समूहों में से एक है. यह समूह अपने सदस्यों का एकाकीपन दूर करने तथा जीवनसाथी खोजने हेतु हर तरह की सहायता करता है. समूह द्वारा एकदूसरे को जानने व खुली चर्चा हेतु हर वर्ष जीवनसाथी परिचय सम्मेलन का आयोजन भी किया जाता है.

डिग्निटी की सक्रिय कार्यकर्ता भौलु श्रीनिवासन का कहना है कि हमारी संस्था नियमित रूप से वरिष्ठ नागरिकों के जीवनसाथी हेतु विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में वैवाहिक विज्ञापन जारी करती रहती है. हाल ही में हम ने एक कहानी प्रकाशित कराई है जिस में 70 वर्ष की महिला ने 78 वर्ष के सेवानिवृत्त एक वायुसेना अफसर से शादी की है. इस शादी में महत्त्वपूर्ण भूमिका उन के बच्चों ने निभाई है. अगर बच्चे ही खिलाफ हो जाएं तो मातापिता अपनी भावना व मित्रता दोनों ही छिपाने लगते हैं. इसलिए नौजवानों को भी प्रगतिशील मानसिकता अपनाने की जरूरत है.

जहां तक अधिक उम्र में विवाह से लाभहानि का सवाल है, तो निश्चित ही इस के लाभ अधिक और हानि कम है. विवाह से स्त्रीपुरुष दोनों की ही सक्रियता बढ़ जाती है, वे अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देने लगते हैं तथा उन का एकाकीपन दूर हो जाता है. लेकिन ज्यादा बुजुर्ग जोड़े शादी के बजाय लिवइन रिलेशनशिप को प्रमुखता दे रहे हैं. कुछ जोड़े तो आर्थिक जिम्मेदारी को भी आधाआधा बांट रहे हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में आर्थिक जिम्मेदारी को पुरुष ही निभा रहे हैं. कुछ बुजुर्ग पुरुष परिजनों के साथ समझौता कर लेते हैं जिस से उन की मृत्यु के बाद महिला साथी को काफी हद तक आर्थिक सहयोग मिल जाता है. अधिकतर बच्चे भी अब अपने बुजुर्गों के फैसले का स्वागत करने लगे हैं.

बेटियों को ही नहीं बेटों को भी संभालें

मेरी सहेली ने एक बार मुझे एक वाकेआ सुनाया. जब वह अपनी 8 वर्षीया बेटी रिचा को अकेले में ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में बता रही थी, तब बेटी ने उस से कहा था, ‘मम्मी, ये बातें आप भैया को भी बता दो ताकि वह भी किसी के साथ बैड टचिंग न करे.’

सहेली आगे बताती है, ‘‘बेटी की कही इस बात को तब मैं महज बालसुलभ बात समझ कर भूल गई. मगर जब मैं ने टीवी पर देखा कि प्रद्युम्न की हत्या में 12वीं के बच्चे का नाम सामने आया है तो मैं सहम उठी. इस से पहले निर्भया कांड में एक नाबालिग की हरकत दिल दहला देने वाली थी. अब मुझे लगता है कि 8 वर्षीया रिचा ने बालसुलभ जो कुछ भी कहा, आज के बदलते दौर में बिलकुल सही है. आज हमें न सिर्फ लड़कियों के प्रति, बल्कि लड़कों की परवरिश के प्रति भी सजग रहना होगा. 12वीं के उस बच्चे को प्रद्युम्न से कोई दुश्मनी नहीं थी. महज पीटीएम से बचने के लिए उस ने उक्त घटना को अंजाम दिया.’’

आखिर उस वक्त उस की मानसिक स्थिति क्या रही होगी? वह किस प्रकार के मानसिक तनाव से गुजर रहा था जहां उसे अच्छेबुरे का भान न रहा. हमारे समाज में ऐसी कौनकौन सी बातें हैं जिन्होंने बच्चों की मासूमियत को छीन लिया है. आज बेहद जरूरी है कि बच्चों की ऊर्जा व क्षमता को सही दिशा दें ताकि उन की ऊर्जा व क्षमता अच्छी आदतों के रूप में उभर कर सामने आ सकें.

आज मीडिया का दायरा इतना बढ़ गया है कि हर वर्ग के लोग इस दायरे में सिमट कर रह गए हैं. ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि हम अपने बच्चों को मीडिया की अच्छाई व बुराई दोनों के बारे में बताएं. एक जमाना था जब टैलीविजन पर समाचार पढ़ते हुए न्यूजरीडर का चेहरा भावहीन हुआ करता था. उस की आवाज में भी सिर्फ सूचना देने का भाव होता था. मगर आज समय बदल गया है. आज हर खबर को मीडिया सनसनी और ब्रेकिंग न्यूज बना कर परोस रहा है. खबर सुनाने वाले की डरावनी आवाज और चेहरे की दहशत हमारे रोंगटे खड़े कर देती है.

घटनाओं की सनसनीभरी कवरेज युवाओं पर हिंसात्मक असर डालती है. कुछ के मन में डर पैदा होता है तो कुछ लड़के ऐसे कामों को अंजाम देने में अपनी शान समझने लगते हैं. अफसोस तो इस बात का भी होता है कि मीडिया घटनाओं का विवरण तो विस्तारपूर्वक देती है परंतु उन से निबटने का तरीका नहीं बताती.

कुछ मातापिता हैलिकौप्टर पेरैंट बन कर अपने बच्चों पर हमेशा कड़ी निगाह रखे रहते हैं. हर वक्त हर काम में उन से जवाबतलब करते रहते हैं. इसे आप भले ही अपना कर्तव्य समझते हों परंतु बच्चा इसे बंदिश समझता है. कई शोधों में यह सामने आया है कि बच्चे सब से ज्यादा बातें अपने मातापिता से ही छिपाते हैं, जबकि हमउम्र भाईबहनों या दोस्तों से वे सबकुछ शेयर करते हैं.

आज के बच्चे वर्चुअल वर्ल्ड यानी आभासी दुनिया में जी रहे हैं. वे वास्तविक रिश्तों से ज्यादा अपनी फ्रैंड्सलिस्ट, फौलोअर्स, पोस्ट, लाइक, कमैंट आदि को महत्त्व दे रहे हैं. वे किसी भी परेशानी का हल मातापिता से पूछने के बजाय अपनी आभासी दुनिया के मित्रों से पूछ रहे हैं. वे अंतर्मुखी होते जा रहे हैं, साथ ही, उन का आत्मविश्वास भी वर्चुअल इमेज से ही प्रभावित हो रहा है. बच्चों को यदि सोशल मीडिया तथा साइबर क्राइम से संबंधित सारी जानकारी होगी और अपने मातापिता पर पूर्ण विश्वास होगा, तो शायद वे ऐसी हरकत कभी नहीं करेंगे.

एकल परिवारों में बच्चे सब से ज्यादा अपने मातापिता के ही संपर्क में रहते हैं. ऐसे में वे अपने अभिभावक की नकल करने की कोशिश भी करते हैं. बच्चों में देख कर सीखने का गुण होता है. ऐसे में अभिभावक उन्हें अपनी बातों द्वारा कुछ भी समझाने के बजाय अपने आचरण से समझाएं तो यह उन पर ज्यादा असर डालेगा. उदाहरणस्वरूप, नीता अंबानी अपने छोटे बेटे अनंत को मोटापे से छुटकारा दिलाने के लिए उस के साथसाथ खुद भी व्यायाम तथा डाइटिंग करने लगी थीं.

प्रौढ़ होते मातापिता अपने किशोर बेटों से बात करते समय उन से बिलकुल भी संकोच न करें. मित्रवत उन से लड़कियों के प्रति उन की भावनाओं को पूछें. रेप के बारे में वे क्या सोचते हैं, यह भी जानने की कोशिश करें. यदि कोई लड़की उन्हें ‘भाव’ नहीं दे रही है तो वे इस बात को कैसे स्वीकार करते हैं, यह जानने की अवश्य चेष्टा करें.

आमतौर पर यदि खूबसूरत लड़की किसी लड़के को भाव नहीं देती तो लड़का इसे अपनी बेइज्जती समझता है और इस बारे में जब वह अपने दोस्तों से बात करता है तो वे सब मिल कर उसे रेप या एसिड अटैक द्वारा उक्त लड़की को मजा चखाने की साजिश रचते हैं. एसिड अटैक के मामलों में 90 प्रतिशत यही कारण होता है. इसलिए, ‘लड़कियां लड़कों के लिए चैलेंज हैं’ ऐसी बातें उन के दिमाग में कतई न डालें.

निर्भया कांड में शामिल नाबालिग युवक या प्रद्युम्न हत्याकांड में शामिल 12वीं के छात्र का उदाहरण दे कर बच्चों को समझाने का प्रयास करें कि रेप और हत्या करने वाले को समाज कभी भी अच्छी नजर से नहीं देखता. कानून के शिकंजे में फंसना मतलब पूरा कैरियर समाप्त. सारी उम्र मानसिक प्रताड़ना व सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ता है.

मातापिता अपने बच्चों को अच्छा व्यक्तित्व अपनाने के लिए कई बार समाज या परिवार की इज्जत की दुहाई देते हुए उन पर एक दबाव सा बना देते हैं, जो बच्चों के मन में बगावत पैदा कर देता है. मनोवैज्ञानिक फ्रायड के अनुसार, ‘‘जब हम किसी को भी डराधमका कर या भावनात्मक दबाव डाल कर अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो यह एक प्रकार की हिंसा है.’’

बच्चे में किसी भी तरह की मानसिक कमियां हैं तो अभिभावक उसे छिपाएं नहीं, बल्कि स्वीकार करें और उसी के अनुसार उस की परवरिश करते हुए उस के व्यक्तित्व को संवारें. दिल्ली के निकट गुरुग्राम के रायन इंटरनैशनल स्कूल के प्रद्युम्न की हत्या करने वाला 12वीं का छात्र अपराधी नहीं था, बल्कि एक साइकोपैथ था. यह एक ऐसा बच्चा है जिसे सही मौनिटरिंग व सुपरविजन की जरूरत है यानी उसे परिवार के प्यार व मातापिता के क्वालिटी टाइम की जरूरत है. समय रहते यदि उस की मानसिक समस्याओं का निवारण किया गया होता तो शायद प्रद्युम्न की जान बच सकती थी. जिस तरह शरीर की बीमारियों का इलाज जरूरी है उसी तरह मानसिक बीमारियों की भी उचित इलाज व देखभाल की आवश्यकता होती है. इसे ले कर न ही मातापिता कोई हीनभावना पालें और न ही बच्चों को इस से ग्रसित होने दें.

जातिवाद का जहर और आधुनिक शैली का दिखावा

आधुनिक समाज में जातिवादी बातें बेमानी लगती हैं. लोगों की जीवनशैली और विचारधारा में परिवर्तन आया है. नेताओं की इन बातों और पाठ्यपुस्तकों से ऐसा लगता भी है, लेकिन हकीकत हूबहू ऐसी नहीं है. परदे के पीछे पुरानी तसवीर उभरती नजर आती है.

सरकारी नौकरी और ओहदे आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं. बाहरी समाज से ज्यादा जातिवाद, भाषावाद और भाईभतीजावाद सरकारी कर्मचारियों की सोसाइटी में देखने को मिलता है. सरकारी नौकरी व तबादले के कारण कर्मचारियों की आवासीय कालोनी ही उन का अपना परिवार होती हैं. किंतु जब आप इस सोसाइटी का हिस्सा बनते हैं तो आप के सामने इस के कई विकृत रंग नजर आते हैं. सरकारी आवास ज्यादातर शहरों व गांवों के बाहर बने होते हैं. आवास कर्मचारियों के पदानुसार तय होते हैं. बड़े शहरों में तो ये आवास फ्लैटनुमा होते हैं. एक बिल्डिंग में रहने के कारण लोग नेमप्लेट पर लगे नामों से एकदूसरे को जानते हों किंतु मेलमिलाप बहुत दूर की बात है. घरों के बंद दरवाजे उन के दिलों को भी बंद रखते हैं. महीनों में कभी कोई सीढ़ी पर नजर आ गया तो वह या तो मुसकराएगा या फिर यों ही निकल जाएगा, जैसे कोई अजनबी हो. एक बार ऐसा ही किस्सा देखने को मिला. आसपड़ोस में रहने वाले 2 अफसर दूसरे शहर में किसी कार्यक्रम में मिले और बातचीत के बाद उन्हें मालूम हुआ कि हम दोनों पड़ोसी हैं.

हालांकि, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के परिवारों में थोड़ाबहुत मेलजोल दिखाई देता है. ऐसे परिवेश में प्यारमुहब्बत तो ठीक है लेकिन ज्यादातर महिलाएं या परिवार ताकझांक के काम में लिप्त रहते हैं. किस के यहां कौन आया, कौन गया. परिवार में कौनकौन हैं, क्या हो रहा है. कब अवकाश लिया और क्या किया. जब तक सामने वाले का छिलका न उतार दें, चैन ही नहीं मिलता. अलगअलग लोगों की भिन्नभिन्न मानसिकता का स्वरूप यहां देखने को मिलता है.

एकदूसरे से बचना, प्राइवेसी को संभालना मुख्य मुद्दा होता है. अफसरों का मनमुटाव उन के परिवार में भी साफ झलकता है. एकदूसरे से निश्चित दूरी बनाए रखना आम बात है. एक समस्या ऐसी है जिस का सामना सोसाइटी में रहने आए हर नए परिवार को करना पड़ता है. नई जगह रोजमर्रा की चीजें दूध, पेपर, पानी, बाई जैसी आम जरूरतों के लिए स्वयं खोजखबर लेनी पड़ती है. पड़ोस में रहने वाले यह जानकारी देना तो दूर की बात है वे पानी के लिए भी पूछने से बचते हैं.

कानाफूसी की लत सरकारी कर्मचारियों के परिवारों में इस तरह की मानसिकता सर्वोपरि होती है. औफिस में सहकर्मियों के साथ संबंधों का असर उन के परिवारों पर भी पड़ता है. सहकर्मी का यदि किसी सहकर्मी से मेलमिलाप न हुआ तो उस के पारिवारिक संबंध बनते हुए भी बिगड़ जाते हैं. इन की पत्नियों के साधारणतया वार्त्तालाप के विषय ही यही होते हैं – ‘हमारे साहब ने यह काम किया,’ ‘हमारे साहब बहुत काम करते हैं,’ ‘ऐसा काम आया,’ ‘औफिस में किस ने क्या कहा’, ‘कहां क्या आया’ वगैरह. जैसे सिर्फ उन के पति ही काम करते हैं, बाकी तो आरामतलबी के लिए दफ्तर जाते हैं.

सरकारी अफसरों की पत्नियां अपने खुद के व्यक्तित्व पर नहीं बल्कि अपने पति के पदों को जीती हैं. उन में एकदूसरे से बड़ा दिखने की होड़ लगी रहती है. जिन के पति ओहदे में बड़े हैं, वे अपने पति के मातहत व सहकर्मियों के परिवारों से आवभगत व चमचागीरी की उम्मीद करती हैं. खुद को ऊंचा बता कर दूसरों को छोटा दर्शाना ऐसी महिलाओं की आदत होती है. पुरुषों के पदों व स्तर के अनुसार महिलाएं भी अपनाअपना दल तैयार करती हैं. यदि किसी नए परिवार ने किसी एक दल से वार्त्ता या मेलमिलाप किया तो अन्य दल के लोग उन से दूरी बना लेते हैं. जिसे समझना नए परिवारों के लिए मुश्किल होता है कि आखिर उन से क्या हो गया. कुछ ऐसे परिवार भी होते हैं कि जिन का मतलब सिर्फ कुरसी से होता है. जो आगे बढ़ने की सीढ़ी बने, उस की चमचागीरी करो.

सरकारी सोसाइटियों में जातिवाद व भाईभतीजावाद का बोलबाला होता है. बच्चों का बचपन इसी परिवेश में रह कर कहीं खो सा जाता है. वे जो देखते हैं, उसे ही आगे बढ़ाते हैं. ऐसे में भविष्य में उन के सामाजिक होने में दिक्कत आती है. यहां विजातीय परिवारों को मनमुटाव का सामना सब से ज्यादा करना पड़ता है. सजातीय परिवारों में यदि कोई कार्यक्रम होता है तो भाईबंधु बढ़चढ़ कर पैसा जमा कर बड़ा गिफ्ट देते हैं. भले ही किसी विजातीय का उन से संबंध न हो, पर बुलाए जाने पर भी विनम्र और विजातीय परिवार को सामाजिक मजबूरी के कारण शामिल होना पड़ता है. जातिवाद का संस्कार

हमारे एक हिंदीभाषी मित्र हैं. उन के ज्यादातर साथी मराठीभाषी थे. एक जगह वे 3 वर्ष रहे. उन के एक सहकर्मी की बेटी की शादी थी. सभी औफिस वालों ने मिल कर हारमोनियम व वाशिंग मशीन गिफ्ट की. परिवार की महिलाओं ने भी पैसे जमा कर साड़ी सैट दिए. हालांकि उन में कुछ परिवार जातिभाई थे लेकिन हमारे मित्र सब से हमेशा मीठी बातें करते व सभी परिवारों को अपना समझते रहे. प्रतिवर्ष होने वाले तबादले में पुरुष व महिलावर्ग ने उन्हें अलगअलग सैंड औफ दिया. उन का अच्छे से सत्कार किया. किंतु जब एक बार प्रमोशन पर उन का तबादला आया तो लोगों ने पल्ला झाड़ लिया. 10 दिनों बाद जब उन के किसी अपने का तबादला हुआ तो वही प्रथा फिर कायम हो गई. यहां तात्पर्य सैंड औफ या गिफ्ट से नहीं है, बल्कि लोगों की मानसिकता से है, जो भेदभाव को बढ़ावा देती है. ऐसे परिवेश में विजातीय व विभाषी लोग कट कर रहना ही पसंद करते हैं. जातिवाद व भाषावाद का जहर धीरेधीरे मन को ग्रसित करने लगता है. अपनी मेहनत व काबिलीयत के दम पर उच्च पद पर आसीन होने वाले प्रकाश चंद्र तबादले के बाद जलगांव पहुंचे. हिंदीभाषी प्रकाश चंद्र के अन्य सहकर्मी मराठी, मराठी ब्राह्मण, मराठा, एकदो अन्य जाति के थे. सभी के आवास एक ही सोसाइटी में थे. छलकपट से परे प्रकाश चंद्र से सहकर्मियों का अच्छा व्यवहार था, जो क्षणभंगुर निकला. हुआ यों कि जिले के जिलाधीश तबादले के बाद वहां आए. प्रकाश चंद्र के गुरु व ट्रेनर होने के कारण उन का व्यवहार उन के साथ स्नेहभरा था. उन्होंने उन की काबिलीयत देखते हुए उन्हें प्रमुख कार्यक्रम के कार्य प्रबंधन का कार्य सौंप दिया जो अन्य लोगों को नागवार गुजरा.

साम, दाम, दंड, भेद की नीति तोड़ो और जोड़ो की नीति पर कार्य करने लगे. लोगों ने अपनी जाति व भाषानुसार दंभ दिखाना व तिरस्कार करना शुरू कर दिया. औफिस में किसी तरह काम में अड़ंगा लगाना, परिवार की महिलाओं द्वारा सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन के परिवार को नजरअंदाज करना व तंज कसना आदि शुरू कर दिया. अपने जातिभाई लोगों को अच्छा बना कर प्रमुख के सामने प्रस्तुत करना जैसी ओछी हरकतों का असर मनमुटाव का सब से बड़ा कारण होता है. एक सहकर्मी, जो रिटायर होने वाले थे लेकिन अपने सेवाकाल में कभी प्रमोशन नहीं पा सके, सार्वजनिक वार्त्ता में बोले कि हमारे देश में बाहर के लोग नौकरियों में कटोरा ले कर आ गए. देश से उन का मतलब प्रदेश ही था.

ऐसी विकृत मानसिकता को क्या कहें. मानसिक प्रताड़ना की हदें तब पार होती हैं जब बच्चों का भी मेलजोल बंद कराया जाता है. अच्छे संबंध भी जातिवाद व भाषावाद के कारण मनमुटाव में बदल जाते हैं. दूषित सोच

हाल ही में महेंद्र अपने बेटेबेटी को उच्चशिक्षा दिलाने के लिए मुंबई तबादला ले कर आए. इत्तफाक से वहां कुछ सहकर्मी उन के ही डिपार्टमैंट के निकले. सोचा, पुरानी पहचान है, अच्छी जमेगी. घर में आते ही सब से पहले लोगों की नजर इस बात पर थी कि उन के घर में क्याक्या सामान आया है. कभी कोई डोरबैल बजती तो पड़ोसियों की निगाहें परदे के पीछे से खिड़कीदरवाजे पर चिपकी मिलतीं, कौन, क्या, कैसे. ‘अरे, इन के यहां कितना सामान है,’ एक ही पगार वाले होने के बावजूद इस तरह की वार्त्ता गरमाती रहती है.

कालेज जाने में असुविधा होने से महेंद्र को बेटी को होस्टल में रखने का निर्णय लेना पड़ा. लेकिन यह बात किसी को जाहिर नहीं की. पारिवारिक समस्या से वे खुद ही जूझ रहे थे. लोगों ने सच जानने के लिए उन का जीना दूभर कर दिया. जातिवाद का प्रचंडस्वरूप तब देखने को मिलता है जब वही कार्य उन के अपने लोग करते हैं. विजातीय लोगों को इस का खमियाजा भुगतना पड़ता है, जिस का सरोकार उन के कार्य से भी नहीं होता है, लेकिन बातों की गरमाहट का बाजार व राजनीतिकरण होता रहता है.

तबादले और शारीरिक व मानसिक थकान के कारण कुछ दिनों के लिए महेंद्र ने दफ्तर से पूर्ण अवकाश ले लिया कि घर पर ही आराम करेंगे, गांव नहीं जाएंगे. चूंकि दीवाली की भी छुट्टियां थीं, दफ्तर का हर एक दिन का चार्ज किसी न किसी के पास रहता था. महेंद्र का चार्ज उन के तथाकथित मित्र पूरन के पास चला गया. पूरन को कुलबुलाहट होने लगी. शाम को तिलमिलाते हुए वे महेंद्र के घर पर टपक गए, क्यों छुट्टी ली. छुट्टी ले कर घर पर बैठे हो. हमारे ऊपर कितना काम है. वे बाल की खाल निकालने लगे. अवकाश के बाद दफ्तर में जातिवाद ने अपना जहर उगल दिया. साथ ही परिजनों का मनमुटाव भी प्रखर होने लगा. मिसेज महेंद्र ने कई प्रयत्न किए किंतु मिसेस पूरन की गर्मजोशी गायब थी.

सरकारी सोसाइटी में त्योहार भी सरकारी नजर आते हैं. सजातीय भाईबंधु फिर भी थोड़ाबहुत मेलमिलाप कर लेते हैं, किंतु दूसरे लोगों के साथ उन की गर्मजोशी कम ही नजर आती है. बड़े शहरों में जहां फ्लैटनुमा आवास होते हैं वहां त्योहारों की रौनक ज्यादा गायब रहती है. कुछ लोग दीवाली के

4-5 दिनों के अवकाश में बाहर चले जाते हैं. जो शेष रहते हैं, वे जगमगाते फ्लैटों में कैद ही रहते हैं. शहरों में जहां हर जगह रौनक होती है वहीं दूसरी ओर इन सोसाइटीज में चहलपहल भी नहीं होती है. एक ही जगह साथ रहने वाले लोगों का एकदूसरे से अपरिचित सा व्यवहार सोसाइटी को हृदयविहीन बनाता है. यहां भाषावाद, जातिवाद का राजनीतिकरण चरमोत्कर्ष पर होता है. यह ऐसा जहर है जो धीरेधीरे सामाजिक व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहा है.

शौचालय सस्ते में बनाएं कुछ इस तरह

भारत में खुले में शौच की समस्या आज भी चुनौती बनी हुई है, जबकि सरकार जोरजोर से खुले में शौच मुक्त होने के ढोल पीट रही है. सरकार शौचालय बनवाने के लिए रुपए भी देती है, लेकिन यह पैसे भ्रष्टाचार के चलते जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. खुले में शौच की समस्या का सीधा सामना औरतों और लड़कियों को ज्यादा करना पड़ता है. इस दौरान किसी जंगली जानवर के हमले या जहरीले जीव के काटने से भी मौत होना आम बात है. कई बार उन्हें बलात्कार का शिकार तक होना पड़ता है.

बूढ़े और लाचार बीमार लोगों का बाहर शौच के लिए जाना और भी मुश्किल काम है. बारिश के दौरान या आपदा के समय में यह और भी भयावह हो जाता है. खुले में किए गए शौच से संक्रमण फैलने और बीमारियां होने का खतरा बना रहता है क्योंकि यहीं से मक्खियां मल से फैलने वाले कीटाणुओं को घरों और खाने की चीजों तक पहुंचा देती हैं.

लिहाजा, यह जरूरी हो जाता है कि गांवों या शहरों में खुले में शौच में कमी लाने के लिए शौचालय बनाने की सस्ती तकनीक का सहारा लिया जाए जिस के तहत बने शौचालय सस्ते होने के साथसाथ टिकाऊ भी हों. सोख्ता शौचालय सोख्ता गड्ढों वाले शौचालयों को महज 10 से 12 हजार रुपए में तैयार किया जा सकता है. इस में 2 गड्ढे बनाए जाते हैं. इन की गहराई सवा मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि मल को खाने वाले कीड़े जमीन के अंदर सवा मीटर की गहराई में ही पैदा होते हैं. ज्यादा गहराई होने पर कीड़े पैदा नहीं हो पाते हैं और जमीन के अंदर तक पीने का पानी खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है. प्रधानमंत्री के हाथों ‘गौरवग्राम पुरस्कार’ हासिल कर चुके स्मार्ट विलेज हसुड़ी औसानपुर के ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि अगर सोख्ता गड्ढों वाले शौचालय का इस्तेमाल ज्यादा समय तक करना चाहते हैं तो शौचालय की सीट के पास 2 गड्ढे बनाने चाहिए. इन्हें समयसमय पर साफ कर के 10 से 12 सदस्यों वाले परिवार के लिए सालों तक इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

इस तरह के शौचालयों को बनाते समय यह ध्यान देना चाहिए कि शौचालय के गड्ढे पीने के पानी के चांपाकल वगैरह से कम से कम 10 मीटर की दूरी पर हों.

2 गड्ढों वाले शौचालय व एक चबूतरे को बनाने के लिए 1,000 ईंटें, डेढ़ से 3 बोरी सीमेंट, 10 से 12 बोरी बालू, 4 फुट पाइप, एक लैट्रिन सीट व गड्ढा ढकने के लिए ढक्कन की जरूरत पड़ती है. इस तरह के शौचालय को बनाने के लिए सरकार से 12,000 रुपए की मदद भी मुहैया कराई जाती है. बांस से बने सस्ते शौचालय अगर सस्ते में शौचालय बनवाने की बात की जाए तो बांस से बने शौचालयों का सहारा ले सकते हैं. इन में बहुत कम खर्च आता है. गोरखपुर जिले के जंगल कौडि़या ब्लौक के कई गांवों में इस तरह की तकनीक से लोगों ने अपने घरों में शौचालयों को बनवाया है जिन में शौचालय की दीवारों और छत को बांस से बना कर उस पर मिट्टी का लेप लगा दिया जाता है और नीचे सीमेंट, ईंट के साथ चबूतरा बना कर लैट्रिन सीट बिठाई जाती है. इसी के बगल में गड्ढा बनाया जाता है. यह गड्ढा सोख्ता गड्ढों की तरह ही बनता है.

इस तरह की शौचालय तकनीक को ईजाद करने वाली संस्था गोरखपुर ऐनवायरनमैंटल ऐक्शन ग्रुप से विजय पांडेय बताते हैं कि गरीब परिवारों के लिए यह तकनीक बहुत ही कारगर है और इस में मुश्किल से 4,930 रुपए की लागत आती है जिसे कोई भी परिवार आसानी से अपने घरों में बनवा सकता है. यह जगह भी कम घेरता है. सैप्टिक टैंक शौचालय

ऐसे शौचालयों को भी कम लागत में बनाया जा सकता है लेकिन यह उस जगह के लिए ज्यादा मुफीद माना जाता है जहां सीवर लाइन हो या ढकी हुई नालियां हों. शौचालय बनाने के कारोबार से जुड़े राकेश बताते हैं कि सैप्टिक टैंक शौचालय को महज एक दिन में बना कर इस्तेमाल में लाया जा सकता?है. इस के लिए पहले से बने सीसी पाइप को जमीन के अंदर फिट किया जाता है और फिर उस के बगल में चबूतरा बना कर शौच जाने के लिए चालू कर दिया जाता है.

ऐसे शौचालयों से निकलने वाले पानी को खुले में नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इस से मच्छर, कीड़ेमकोड़ों के पनपने का डर बढ़ जाता है और खुले में पानी छोड़ने से आबोहवा पर बुरा असर पड़ सकता है. ऐसे शौचालय बनाने के लिए 15 से 17 हजार रुपए की लागत आती है. 5 से 10 सदस्यों वाले परिवारों के लिए इसे 50 साल तक शौच जाने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

भारत नेपाल बौर्डर : जारी है लड़कियों की खरीदफरोख्त

भारत नेपाल बौर्डर के लौकहा बीओपी इलाके से 24 मई, 2018 को सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने 8 नेपाली नागरिकों को हिरासत में लिया तो एक बार फिर बौर्डर इलाके में मानव तस्करी का भंडाफोड़ हुआ. इन में 2 नौजवान दोनों देशों के बौर्डर की हिफाजत में लगे सुरक्षा बलों की आंखों में धूल झोंक कर अपने साथ 6 नेपाली लड़कियों को ले कर भारत की सरहद में घुस गए थे. भारतीय इलाके में घुसने के बाद वे सभी तेजी से बसस्टैंड की ओर बढ़ रहे थे कि उसी समय कुछ लोगों को उन के हावभाव पर शक हुआ. सीमा सुरक्षा बल को इस की जानकारी दी गई और उन लोगों को दबोच लिया गया.

उन दोनों नौजवानों से पूछताछ के बाद खुलासा हुआ कि वे मानव तस्करों के एक गैंग के लिए काम करते हैं और 6 नेपाली लड़कियों को दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी उन्हें मिली थी. इस के लिए उन्हें 2 लाख रुपए मिलने वाले थे. इस वारदात ने बौर्डर पर चाकचौबंद निगरानी का दावा करने वाले सुरक्षा बलों की भी पोल खोल दी.

सीमा सुरक्षा बल की 18वीं बटालियन के कमांडैंट अजय कुमार ने बताया कि दोपहर के तकरीबन डेढ़ बजे 8 लोग भारत की सरहद में दाखिल हुए और सभी लौकहा बसस्टैंड की ओर बढ़ने लगे. उसी समय सीमा सुरक्षा बल को सूचना मिली थी कि उन में से 2 नौजवान मानव तस्करी गिरोह के लिए काम करते हैं. तुरंत ही उन सभी को गिरफ्तार कर लिया गया.

सख्ती से पूछताछ के बाद उन दोनों नौजवानों ने कबूल किया कि वे मानव तस्करी के धंधे में लगे हुए हैं. वे 6 लड़कियों को दिल्ली ले जा रहे थे. ये सभी लड़कियां नेपाल की राजधानी काठमांडू के सिंधुपाल चौक की रहने वाली हैं.

गिरफ्तार नौजवानों में से एक का नाम परमानंद चौधरी है और वह नेपाल के सप्तरी जिले के कनकपुरा गांव का रहने वाला है. दूसरे नौजवान का नाम दिनेश राम है और वह सप्तरी जिले के ही लक्ष्मीपुर गांव का रहने वाला है. सीमा सुरक्षा बल के अफसर बताते हैं कि साल 2015 में नेपाल में आए भूकंप के बाद से वहां लड़कियों की तस्करी में काफी तेजी आई है. इस पर काबू पाना इसलिए मुश्किल हो गया है कि ज्यादातर लड़कियों के मांबाप की मरजी से ही उन्हें बेचा जा रहा है.

मानव तस्करी में लगे लोग लड़कियों के मांबाप, भाई वगैरह को बहलाफुसला कर इस बात के लिए राजी कर लेते हैं कि वे ही अपनी बेटियों को बौर्डर पार करा दें. इस के लिए उन्हें अलग से कुछ और पैसे दे दिए जाते हैं. इस से जहां एक ओर तस्करों का काम आसान हो जाता है, वहीं दूसरी ओर बौर्डर पर तैनात सुरक्षा बलों को शक नहीं हो पाता है. अगर सीमा सुरक्षा बल शक के आधार पर किसी से पूछताछ करता है तो लोग बता देते हैं कि वे अपनी बेटी को ले कर कुछ काम से भारत जा रहे हैं. लड़की भी कबूल करती है कि उस के साथ उस का पिता, भाई या चाचा है.

लड़की को उस के घर से लेने के बाद एजेंट लड़की को बौर्डर पार करने में मदद पहुंचाने वालों के हाथों में 10,000 से 12,000 तक रुपए थमा देते हैं. भारत और नेपाल के बीच 1751 किलोमीटर का खुला बौर्डर है और दोनों देशों के लोग बेरोकटोक इधर से उधर आतेजाते रहते हैं.

नेपालभारत की सरहद पर पिछले 12 सालों से ‘कैरियर’ (तस्करों के सामान को आरपार करने वाले को नेपाल में कैरियर कहा जाता है) का काम कर रहे एक नेपाली ने बताया कि वह पिछले 7-8 सालों से तस्करों के सामान को आरपार पहुंचाने का काम कर रहा है और कभी भी पकड़ा नहीं गया है. ऐसे लोगों को गांजा, अफीम, हेरोइन, विदेशी सामान समेत लड़कियों और बच्चों को इधरउधर पहुंचाने का काम सौंपा जाता है. इस के बदले में तस्कर उन्हें मोटी रकम देते हैं. साथ ही, वे पुलिस और कस्टम वालों से भी बचाते हैं.

भारतनेपाल बौर्डर पर मानव तस्करी की रोकथाम का काम करने वाली एक एनजीओ ‘भूमिका विहार’ की डायरैक्टर शिल्पी सिंह बताती हैं कि मानव तस्करी के मामले में बिहार का सरहदी इलाका ट्रांजिट पौइंट बन चुका है. इस संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 5 सालों में 519 बच्चे गायब हुए हैं, जिन में ज्यादातर लड़कियां थीं. शादी और नौकरी का लालच दे कर लड़कियों की तस्करी की जाती है. बच्चों को गायब करने के बाद उन्हें वेश्यालयों में पहुंचा कर देह धंधे के दलदल में धकेल दिया जाता है.

दोनों देशों के लोगों को आनेजाने के लिए पासपोर्ट, वीजा वगैरह की जरूरत नहीं पड़ती है. सीमा सुरक्षा बलों का मानना है कि सिक्योरिटी के लिए दोनों देशों के बीच कुल 26 चौकियां बनी हुई हैं और रोजाना तकरीबन 15,000 लोग आरपार होते हैं. पिछले कुछ समय से यह देखा गया है कि मानव तस्करों ने अपने काम को आसान बनाने के लिए 14-15 साल के बच्चों तक को भी तस्करी के धंधे में झोंक रखा है. बच्चेबच्चियों को कुछ लालच दे कर बौर्डर पार करने के लिए कहा जाता है और वे हंसतेखेलते बौर्डर पार कर जाते हैं. दिक्कत यह है कि खुला बौर्डर होने की वजह से दोनों देशों के लोगों के इधरउधर आनेजाने का कोई रिकौर्ड भी नहीं रखा जाता है. इस से यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि किस देश से कितने लोगों ने बौर्डर पार किया और कितने वापस लौटे.

मानव तस्कर लड़कियों को बौर्डर पार कराने के बाद पटना लाते हैं और उस के बाद रेलगाड़ी से उन्हें दिल्ली, मुंबई, गोवा, पुणे वगैरह बड़े शहरों में ले जाते हैं. पिछले साल पटना में 15 साल की मासूम नेपाली लड़की ने मानव तस्करों के चंगुल से भाग कर पुलिस को जो कहानी सुनाई, उस से पुलिस वालों के भी होश उड़ गए थे.

वह लड़की नेपाल के रौतहट जिले की रहने वाली थी. उस ने बताया कि वह अपने स्कूल में ही पढ़ने वाले किशन नाम के लड़के से प्यार करती थी और उस से ब्याह रचाना चाहती थी. किशन भी उस से शादी करने को तैयार था. किशन ने उसे समझाया कि उन के घर वाले उन की शादी नहीं होने देंगे, इसलिए घर से भाग कर ही शादी की जा सकती है.

उस लड़की पर मुहब्बत का भूत इस कदर हावी था कि वह बगैर कुछ सोचेसमझे किशन के साथ भाग कर पटना आ गई. किशन का असली चेहरा तब सामने आया, जब पटना पहुंचते ही उस का रंग ही बदल गया. लड़की ने पुलिस को बताया कि वह किशन से रोज कहती कि जल्दी शादी करें, पर वह 30-35 दिनों तक टालता रहा. उस के बाद तो जब भी वह शादी की बात कहती तो वह भड़क जाता.

उस के बाद किशन उस से गंदेगंदे काम करने के लिए कहता था. कुछ दिनों के बाद वह अपने साथ 2-4 लड़कों को ले कर आने लगा. वे उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे. लड़की किशन को अपनी मुहब्बत की दुहाई देती तो वह उसे पीटने लगता था. वह चुपचाप किशन की बातों को मानने के लिए मजबूर थी. लेकिन एक दिन मौका मिलते ही वह वहां से भाग निकली.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, मानव तस्करों ने अपने धंधे में तेजी लाने के लिए कई दलालों को भी लगा रखा है. दलाल लोकल लोग ही होते हैं, जिस से वे आमतौर पर गरीब बच्चों के मांबाप को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उन के बच्चों को मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे बड़े शहरों में नौकरी लगवा देंगे या ऊंची पढ़ाई का इंतजाम करवा देंगे. इस से अच्छा पैसा मिलेगा. गरीबी में सिर से पैर तक डूबे गरीब लोग अपने बच्चों की बेहतरी के लिए दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं. कस्टम अफसर आरके सिंह कहते हैं कि तस्कर पढ़ाई, खाना और बेहतर जिंदगी देने का वादा करते हैं. नेपाल में भूकंप और गरीबी की दोहरी मार झेल रहे मांबाप आसानी से दलालों के झांसे में फंस जाते हैं. बेटी को बेहतर जिंदगी देने और कुछ रुपयों के चक्कर में उस की जिंदगी को बदतर बना रहे हैं. उस के बाद कभी भी न तो वह अपनी बेटी से बात कर पाते हैं और न ही कभी बेटी वापस लौट कर आती है.

वे दलालों के सामने रोतेगिड़गिड़ाते रहते हैं कि कम से कम बेटी से बात तो करा दें, पर दलाल उन्हें टका सा जवाब देते हैं कि बेटी सही जगह पर है और अच्छी जिंदगी जी रही है. किसी तरह की टैंशन न लें. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, वेश्यालयों के साथ ही डांस गर्ल, बार गर्ल और मसाज गर्ल के रूप में भी नेपाली लड़कियों को आसानी से खपाया जाता है. पटना, मुजफ्फरपुर, रांची, कोलकाता वगैरह शहरों के कई मसाज पार्लरों में नेपाली लड़कियां काम करती हुई आसानी से दिख जाती हैं.

भारत में सैक्स का यह कारोबार तकरीबन 4 लाख करोड़ रुपए का है. दिल्ली के जीबी रोड, कोलकाता के सोनागाछी, मुंबई के कमाठीपुरा, पुणे के पेठ, इलाहाबाद के मीरगंज, बनारस के शिवदासपुर, मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान, मुंगेर के श्रवण बाजार आदि रेड लाइट इलाकों में पिछले 3-4 महीने के दौरान नेपाली लड़कियों की तादाद तेजी से बढ़ी है.

पिछले साल पुणे, महाराष्ट्र के पेठ इलाके में छापामारी कर पुलिस ने तकरीबन 700 नेपाली लड़कियों को बरामद किया था. इस के बाद भी भारत सरकार लड़कियों की तस्करी को रोकने के नाम पर केवल दावे और वादे ही करती रही है. बिहार के किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जिलों के जरीए नेपाल से मानव तस्करी का धंधा फलफूल रहा है. ज्यादातर बच्चे गरीब और अनपढ़ परिवारों के ही गायब होते हैं. ऐसे बच्चों के मांबाप अपने बच्चे के गायब होने की शिकायत पुलिस थानों में दर्ज करने से घबराते हैं. उधर पुलिस महकमा भी मानव तस्करी को ले कर लापरवाह बना हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की पिछले साल की रिपोर्ट साफतौर पर बता देती है कि नेपाल में किस कदर गरीबी है और भूकंप आने के बाद उस में कई गुना इजाफा हुआ है. रिपोर्ट यह भी कहती है कि भूकंप आने के बाद नेपाल में लड़कियों को भेड़बकरियों की तरह बेचा जा रहा है. भूकंप राहत शिविरों में 15 लाख से ज्यादा लड़कियों को जानवरों की तरह ठूंसठूंस कर रखा गया है और उन की हिफाजत का कोई पुख्ता इंतजाम ही

नहीं है. तकरीबन 40,000-45,000 तो ऐसी लड़कियां हैं जिन के परिवार के सभी लोग भूकंप में मारे गए. उन के सिर पर किसी का साया नहीं है. कुछ रुपयों और दो वक्त की रोटी के लिए वे कुछ भी करगुजरने को तैयार हो जाती हैं. दलाल उन्हें नौकरी दिलाने के झांसे में आसानी से फंसा लेते हैं.

नेपाल और भारत के बौर्डर के आसपास सैकड़ों ट्रैवल एजेंसी, प्लेसमैंट एजेंसी और मैरिज ब्यूरो बेरोकटोक लड़कियों और मानव तस्करी के खेल में लगे हुए?हैं. लड़कियों की शादी कराने, नौकरी दिलाने, भारत में सैर कराने वगैरह का झांसा दे कर वे गरीब और भोलेभाले मांबाप को अपने जाल में फंसा लेते हैं. नेपाल की राजधानी काठमांडू में तो इस तरह की सैकड़ों एजेंसी कुकुरमुत्तों की तरह उग चुकी हैं. उन पर लगाम लगाने का कोई इंतजाम नहीं है.

एजेंसी के दलाल गरीब मांबाप को समझाते हैं कि गरीबी की वजह से वे अपनी बेटी का ब्याह तो कर नहीं सकते हैं, ऐसे में मैरिज ब्यूरो के जरीए अच्छा लड़का मिल सकता है. पोखरा का रहने वाला सुरेश दहाल बताता है कि उस की बेटी की शादी दिल्ली के किसी कारोबारी से कराने की बात कही गई थी. उस ने मैरिज ब्यूरो के एजेंट की बात मान ली.

गरीबी की वजह से वह अपनी बेटी रीना का ब्याह किसी अच्छे लड़के से नहीं कर सकता था, इसलिए वह अपनी बेटी को शादी के लिए दिल्ली भेजने के लिए मन मार कर तैयार हो गया. सुरेश कहता?है, ‘‘जब एजेंट रीना को ले कर जाने लगा तो उस ने मेरे हाथ में 2,000 रुपए थमाए थे. उसी समय मेरा माथा ठनका था कि उस ने 2,000 रुपए क्यों दिए? कुछ रुपए तो हमें ही बेटी को देने चाहिए थे, पर उस समय कुछ कह नहीं सका.’’

सुरेश आगे बताता है कि उस की बेटी को घर से गए 2 साल से ज्यादा का समय हो गया है, लेकिन उस के ठौरठिकाने का कुछ भी पता नहीं है. मैरिज ब्यूरो के लोगों से वह जब भी बेटी के बारे में पूछता है तो उसे यही जवाब मिलता है कि वह ससुराल में राज कर रही है और अगर वह अपने घर वालों से बात नहीं करती है तो इस में ब्यूरो क्या कर सकता है?

मोतिहारी सिविल कोर्ट के सीनियर वकील अभय कुमार बताते हैं कि नेपाल में लड़कियों को औनेपौने दामों पर खरीद कर उन्हें वेश्यालयों तक पहुंचाने वाले दलाल जम कर पैसा बना रहे हैं. नेपाली लड़कियां 1-2 हजार रुपए में भी बेच दी जा रही हैं. कुछ दिनों के लिए पेट की आग बुझाने के लिए गरीब मांबाप अपनी लाड़ली बेटियों को दरिंदों के हाथों बेच देते हैं. वहीं तस्कर लड़कियों को दिल्ली, मुंबई या कोलकाता के देह बाजार में डेढ़ से ढाई लाख रुपए तक में बेच डालते हैं.

ज्यादातर नेपाली लड़कियों को वहां से सऊदी अरब, हौंगकौंग, जापान, कोरिया, अफ्रीका, मलयेशिया, थाईलैंड वगैरह दूसरे देशों में पहुंचा दिया जाता है. वहां लड़की के सारे दस्तावेजों को जब्त कर लिया जाता है, ताकि वह कहीं भाग नहीं सके. लड़की के सामने जिल्लत की जिंदगी जीने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है.

मैंने अपने ब्वायफ्रैंड के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए. अब मेरी शादी होने वाली है. अगर सैक्स करते वक्त पति को पहली रात को ही मेरे संबंधों के बारे में पता चल गया तो क्या होगा.

सवाल
मैं 20 वर्षीय युवती हूं. एक लड़के से प्यार करती थी. हम दोनों ने कई बार शारीरिक संबंध भी बनाए. 2 वर्ष पूर्व हमारे संबंधों में काफी खटास आने लगी थी. हम जब भी मिलते थे तो और बातें कम लड़ाईझगड़ा ज्यादा होने लगा था. जल्द ही हमें समझ में आ गया कि हमारा रिश्ता लंबा नहीं चल सकता, क्योंकि दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का फर्क था. तब हम ने तय किया कि इस रिश्ते को बेवजह ढोते रहने का कोई फायदा नहीं है. इसलिए हम ने ब्रेकअप कर लिया.

अब जबकि मेरे घर में मेरी शादी की बात चल रही है मैं तनावग्रस्त रहने लगी हूं. यह सोचसोच कर कि यदि मेरी शादी  हुई तो पति को पहली रात को ही पता चल जाएगा कि मेरा विवाह पूर्व किसी से संबंध रहा है.

कोई भी व्यक्ति किसी बदचलन लड़की को पत्नी के रूप में क्यों स्वीकार करेगा. इतना बड़ा रहस्योद्घाटन होने के बाद मुझे जलील कर के लौटा दिया जाएगा. इस से मेरी और मेरे परिवार की जो बेइज्जती होगी उस की कल्पना कर के ही मैं कांपने लगती हूं. इस से तो अच्छा है कि मैं शादी ही न करूं. पर मेरे अलावा मेरी 2 छोटी बहनें भी हैं. इसलिए मैं शादी के लिए इनकार नहीं कर सकती. मांबाप शादी न करने की वजह पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगी. दिनरात इसी चिंता से घिरी रहती हूं. कभी मन करता है कि आत्महत्या कर लूं. इस से सारी उलझनों से छुटकारा मिल जाएगा. बताएं क्या करूं?

जवाब
विवाहपूर्व के संबंध चिंता का सबब तो बनते ही हैं. जो गलती आप कर चुकी हैं उसे सुधारा नहीं जा सकता. इसलिए घर वालों की इच्छानुसार विवाह कर लें. पति से अपने अतीत के बारे में कुछ न कहें. जब तक आप मुंह नहीं खोलेंगी वे नहीं जान पाएंगे कि अतीत में आप के किसी के साथ संबंध रह चुके हैं.

पोर्न फिल्में सैक्स का खुला बाजार

सनी लियोनी को जिस तरह से भारतीय फिल्मों में कैरियर बनाने में कामयाबी मिली है, उस के बाद से कई पोर्न स्टार लड़कियां भारतीय इंडस्ट्री में आ कर कैरियर बनाना चाहती हैं.

रशियन पोर्न स्टार मिया मालकोवा हिंदी फिल्मों के जानेमाने फिल्मकार व डायरैक्टर रामगोपाल वर्मा की वैब सीरीज ‘गौड, सैक्स ऐंड ट्रुथ’ में काम कर चुकी हैं.

सोशल मीडिया पर इस के फोटो वायरल होने के बाद लोगों की बढ़ी दिलचस्पी से साफ है कि मिया मालकोवा को भी सनी लियोनी जैसी लोकप्रियता हासिल हो सकती है.

इस की सब से बड़ी वजह यह है कि भारतीय समाज अब पोर्न स्टार को ले कर अपनी पुरानी दकियानूसी सोच से बाहर निकल रहा है. सनी लियोनी को कलाकार के रूप में पैसा और शोहरत दोनों मिल रहे हैं.

सनी लियोनी को जब टैलीविजन के एक शो ‘बिग बौस’ में लाया गया था तो शो बनाने वालों पर आरोप लगा था कि वे अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाने के लिए सनी लियोनी का सहारा ले रहे हैं. उस समय पहली बार हिंदुस्तानी दर्शकों को पता चला था कि सनी लियोनी पोर्न फिल्मों की बहुत बड़ी कलाकार हैं.

पोर्न फिल्मों और उस के कलाकारों को हिंदुस्तानी दर्शक पसंद करेंगे, इस बात को ले कर एक शक सा सभी के मन में था. फिल्मी दुनिया के जानकार मान रहे थे कि पोर्न फिल्मों का विरोधी देश सनी लियोनी को कभी पसंद नहीं करेगा. खुद सनी लियोनी को भी यही लगता था.

कनाडा में पैदा हुई सनी लियोनी भारतीय मूल की पंजाबी लड़की हैं.

5 फुट, 4 इंच लंबी सनी लियोनी गोरे रंग की 50 किलो वजन की हैं. पोर्न फिल्मों में आने से पहले वे जरमन बेकरी में काम करती थीं. इस के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए एक टैक्स फर्म में काम किया था. फिर उन की मुलाकात एक फोटोग्राफर से हुई जो पोर्न फोटो खींचता था.

उस फोटोग्राफर के कहने पर सनी लियोनी ने पोर्न फोटो शूट कराए, फिर यहीं से उन की पोर्न फिल्मों का सफर शुरू हो गया.

साल 2011 में सनी लियोनी ने डेनियल वेबर से शादी की. भारतीय फिल्म उद्योग में आने के बाद उन्हें भारी कामयाबी मिली.

पोर्न का देशी बाजार

सनी लियोनी के बाद भारतीय दर्शकों में पोर्न फिल्मों का क्रेज तेजी से बढ़ा है. विदेशों में पोर्न फिल्मों का उद्योग हिंदी फिल्मों जैसा ही है. इन फिल्मों के भी कलाकार होते हैं, जो दूसरे कलाकारों  जैसे होते हैं. उन का अपना घरपरिवार होता है.

अमेरिका के लौस एंजिल्स में पोर्न फिल्मों की शूटिंग के लिए पूरी तरह से कानूनी इजाजत दी जाती है. वहां साल में जितनी फिल्मों की शूटिंग के लिए इजाजत ली जाती है उन में से 5 फीसदी पोर्न फिल्में होती हैं.

भारत में भले ही पोर्न फिल्में बनाने के लिए कानूनी इजाजत न हो, पर चोरीछिपे पिछले 20 सालों से ऐसी फिल्मेंबनती रही हैं.

टैक्नोलौजी में बदलाव के साथसाथ पोर्न फिल्मों के कारोबार में भी बदलाव आया है. आज इंटरनैट, सीडी और मोबाइल फोन के जरीए पोर्न फिल्मों का मजा देश के हर तबके के लोग ले रहे हैं.

एक सर्वे के मुताबिक, इंटरनैट का इस्तेमाल करने वाले 80 फीसदी लोग कभी न कभी पोर्न फिल्में जरूर देखते हैं. 60 फीसदी लोग इस के पक्के दर्शक हैं. 20 फीसदीलोग इंटरनैट से पोर्न फिल्मों की खरीदारी करते हैं.

ज्यादातर लोग इंटरनैट पर ऐसी फिल्में देखते हैं, जिन के लिए उन को अलग से पैसा देने की जरूरत नहीं पड़ती है.

ज्यादातर हिंदुस्तानी दर्शक विदेशी पोर्न फिल्मों को पसंद करते हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो देशी पोर्न फिल्में देखने के आदी हैं. यही वजह है कि इंटरनैट पर देशी पोर्न फिल्मों की अलग साइटें तैयार होने लगी हैं.

विदेशों में बनती देशी पोर्न

अभी तक ज्यादातर देशी पोर्न फिल्में चोरीछिपे बनती थीं, जिन की फोटोग्राफी अच्छी नहीं होती थी. अब हिंदुस्तानी लड़केलड़कियों को ले कर विदेशों में फिल्में बनने लगी हैं. इन को सीडी और इंटरनैट के जरीए बेचा जा रहा है.

मुंबई में चोरीछिपे पोर्न फिल्में बनाने वाले भारतीय फिल्मकारों के लिए अब विदेशों में यह काम करना आसान हो गया है.

एक ऐसे ही फिल्मकार का कहना है, ‘‘अब पोर्न फिल्मों में काम करनेसे देशी लड़कियों को कोई परहेज नहीं है. कुछ शादीशुदा लड़कियां भी इस के लिए तैयार होती हैं.

‘‘देश के तमाम हिस्सों से मुंबई में काम की तलाश में आने वाली कुछ लड़कियां ऐसी फिल्मों में काम कर के पैसे कमाना चाहती हैं. सनी लियोनी के बाद इन को लगता है कि देश के लोग इन्हें भी इज्जत की नजर से देख सकते हैं. ये लड़कियां विदेशों में पोर्न फिल्मों की शूटिंग को तवज्जुह देती हैं.’’

देशी पोर्न फिल्मों में कालगर्ल भी काम करने को तैयार हो जाती हैं. इन में से ज्यादातर को अपना चेहरा दिखाने से कोई गुरेज भी नहीं होता है. ये विदेशी पोर्न फिल्में देख कर देशी पोर्न फिल्में तैयार कर लेती हैं.

देशी पोर्न फिल्मों का एक बड़ा क्षेत्र बैंकौक बन गया है. वहां पर देशी लड़कियों को ले कर पोर्न फिल्में तैयार हो रही हैं. इन लड़कियों को केवल शूटिंग करने के लिए ही बैंकौक भेजा जाता है. ऐसी पोर्न फिल्मों की बड़ी मांग अपने देश के अलावा पाकिस्तान, अरब देशों और नेपाल में होती है.

अरब देशों में पोर्न फिल्मों की शूटिंग भले ही न होती हो, पर वहां पर भी पोर्न फिल्मों की मांग सब से ज्यादा है. वे लोग पोर्न फिल्में खरीदने के लिए पैसा भी खर्च करते हैं.

कौमार्य भंग होती पोर्न फिल्मों की ज्यादा मांग अरब देशों में होती है. इस के साथ ही वहां सैक्स के दूसरे क्रूर तरीके दिखाने वाली फिल्में भी देखी जाती हैं.

ऐसे में अरब देश की औरतों के किरदार निभाने के लिए भी भारतीय लड़कियों का सहारा लिया जाता है. इन को मेकअप और कपड़ों से अरब देश की औरतों का लुक भी देने की कोशिश की जाती है.

भारतीय लड़कियां टूरिस्ट वीजा ले कर विदेशों में जाती हैं. वहां पोर्न फिल्मों की शूटिंग कर के वापस चली आती हैं.

इंटरनैट पर पोर्न फिल्मों के सहारे तमाम तरह के दूसरे सैक्स के सामान बेचने का सहारा भी लिया जाता है. इन के लिए पोर्न फिल्मों की साइटें सब से बड़ा सहारा बन गई हैं. इन सैक्सी इतिश्हारों में मर्द के अंग को लंबा और मोटा करने के लिए दवा, सैक्सी बातचीत करने वाली लड़कियों का प्रचार, पोर्न फिल्मों के कुछ सीन दिखा कर पूरी फिल्में और सैक्सी खिलौने बेचने का काम खूब होता है.

हर उम्र को लुभाती हैं

नैट बैंकिंग के शुरू होने के बाद इस क्षेत्र में भुगतान करना आसान हो गया है. इन फिल्मों का सब से बड़ा दीवाना आज का नौजवान तबका है.

इस के अलावा 40 साल के बाद की उम्र के लोग भी पोर्न फिल्मों का पूरा मजा लेते हैं. अब लड़के ही नहीं लड़कियां भी इन को खूब देखती हैं.

वैसे तो भारत में सैक्स को ले कर ज्यादा भरोसे लायक सर्वे नहीं होते हैं, फिर भी जो होते हैं उन में से एक सर्वे से पता चलता है कि 30 फीसदी लड़कियां पोर्न फिल्में देखने का शौक रखती हैं. 38 फीसदी शादीशुदा लड़के और 20 फीसदी लड़कियां पोर्न फिल्मों को देखते हैं.

गांव और शहर के आधार पर जब इस का सर्वे किया गया तो पता चला कि शहरों के 35 फीसदी और गांव के 26 फीसदी लड़के पोर्न फिल्में देखते हैं.

लड़के जहां शादी से पहले अपने साथियों के साथ पोर्न फिल्में देखने की शुरुआत करते हैं, वहीं लड़कियां शादी के बाद पतियों की पहल पर पोर्न फिल्में देखती हैं.

शादीशुदा लड़कियों ने सर्वे में बताया कि उन के  पतिउन्हें पोर्न फिल्में सैक्स में बढ़ावा देने के लिए दिखाते हैं.

सर्वे से यह भी पता चलता है कि गांव के 17 फीसदी और शहरों में रहने वाले 10 फीसदी लड़के शादी से पहले सैक्स का अनुभव ले चुके थे.

गांव में रहने वाली 4 फीसदी लड़कियां और शहरों में रहने वाली 2 फीसदी लड़कियां शादी से पहले ही सैक्स का अनुभव कर चुकी होती हैं.

गांव हो या शहर, पोर्न फिल्मों का चलन बढ़ाने में मोबाइल फोन का सब से अहम रोल रहा है. मोबाइल फोन पर ऐसी फिल्में लोड करने का अलग कारोबार चल पड़ा है. 1,500 से 2,000 रुपए की कीमत में ऐसे मोबाइल फोन बाजार में आ गए हैं जिन में 2 जीबी से ले कर 10 जीबी तक के मैमोरी कार्ड लगते हैं. ये कार्ड 200 रुपए की कीमत में मिल जाते हैं. इस कार्ड में ऐसी पोर्न फिल्में आसानी से लोड कराई जा सकती हैं.

जिन लोगों के पास कंप्यूटर या लैपटौप जैसे महंगे साधन नहीं हैं उन के लिए मोबाइल फोन सब से अच्छा साधन बन गया है. पहले कुछ लोग साइबर शौप पर जाते थे, पर वहां परेशानी होती थी. अब जिन लोगों के मोबाइल फोन में इंटरनैट चलाने की सुविधा है वे सीधे पोर्न फिल्में देख सकते हैं.

जागरूक करतीं पोर्न फिल्में    

पोर्नोग्राफी और सैक्स ऐजूकेशन की किताबों के बीच एक बहुत ही महीन सी दीवार होती है. इस तरह की जानकारी काफी हद तक पतिपत्नी के बीच जिस्मानी संबंधों को ले कर फैली हुई भ्रांतियों को दूर करती है. इस को गलत तब कहा जा सकता है जब इस को गलत लोग देखें या फिर जबरदस्ती किसी लड़की या लड़के को दिखाएं.

पहले बड़ा परिवार होता था. इन में भाभी, बड़ी ननद, बूआ और बड़ी बहन जैसे तमाम रिश्ते होते थे जो लड़की को शादी के बाद जिस्मानी संबंधों के बारे में बताती थीं.

अब इस तरह के रिश्ते कम हो गए हैं. लड़कियां अपने कैरियर और दूसरे मसलों में इतना उलझी हुई होती हैं कि वे अपने परिवार के लोगों से इतना नहीं घुलमिल पाती हैं कि उन से जिस्मानी संबंधों पर बात कर सके. इस के चलते शादी के बाद जिस्मानी संबंधों को ले कर वे अनजान ही बनी रहती हैं.

जिन दोस्तों या सहेलियों के जरीए उन को पता चलता है, वह भी सही जानकारी नहीं दे पाते हैं. कभीकभी इन जानकारियों की कमी में लड़कियों को कुंआरी मां बनने तक की नौबत आ जाती है.

आमतौर पर अपने देश में इस तरह की सैक्स ऐजूकेशन को गलत माना जाता है. इस की कमी में लड़कियां सैक्स से जुड़ी बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

अपने देश में भले ही सैक्स सिखाने वाली किताबों को पोर्नोग्राफी माना जाता हो लेकिन दूसरे देशों में इस को इलाज के रूप में लिया जाता है.

एक डाक्टर बताते हैं, ‘‘जब मेरे पास कोई लड़का इस बात की शिकायत ले कर आता है कि वह नामर्दी का शिकार है, उस के अंग में तनाव नहीं आता है तो यह देखना पड़ता है कि यह तनाव हमेशा नहीं आता या फिर कभीकभी आता भी है.

‘‘जब लड़का कहता है कि सैक्स की किताबें पढ़ कर या फिर ब्लू फिल्में देख कर तनाव आता है, तब यह पता चलता है कि उस लड़के की नामर्दी केवल मन का वहम है. अगर इस हालत में भी तनाव नहीं आता है तो उस का इलाज थोड़ा मुश्किल हो जाता है.’’

विदेशों में पोर्नोग्राफी को ले कर कई तरह की रिसर्च होती रहती हैं. इसी तरह की एक रिसर्च बताती है कि ब्लू फिल्में देखने से आदमी के शुक्राणुओं की गति तेज हो जाती हैं.पोर्नोग्राफी को विदेशों में  एक कला की तरह देखा जाता है. कुछ कलाकार तो दूसरी फिल्मों में भी काम कर के अपना नाम कमाते हैं.

सैक्स संबंधों की काउंसलिंग करने वाले कुछ डाक्टरों का कहना है कि अपने देश में भी पोर्न फिल्मों को दिखा कर नामर्दी का इलाज करना कानूनी रूप से सही माना जाना चाहिए. कानून को इस बात की इजाजत देने के बारे में सोचना चाहिए. जब नामर्दी दूर करने के लिए दवाएं बनाई जाती हैं तो उन का असर देखने के लिए भी ब्लू फिल्मों का इस्तेमाल किया जाता है.

पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल जब पतिपत्नी आपसी समझदारी के साथ करते हैं तो उन के रिश्ते रोचक हो जाते हैं. सैक्स संबंध शादीशुदा जोड़ों की बड़ी जरूरत होते हैं. कभीकभी जब ये संबंध टूटते हैं तो इन का असर शादीशुदा जिंदगी पर भी पड़ता है.

हमारे समाज में औरतों को सैक्स के बारे में अपनी बात कहने से रोका जाता है. इस के उलट आदमी सैक्स को ले कर हर तरह का प्रयोग करना चाहता है.

जब पतिपत्नी के बीच इस तरह की परेशानी आती है तो पति दूसरी औरत की तरफ भागने लगता है. अगर दूसरी औरत वाले मामले को देखें तो उस की सब से बड़ी वजह सैक्स ही है.

हमारे समाज में औरतों को कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया. कभी उस को देवी बना दिया गया तो कभी कोठे पर बिठा दिया गया. उस को अपनी जिंदगी जीने के बारे में सिखाया ही नहीं गया.

आज भी सैक्स को ले कर पत्नी में एक झिझक रहती है. उस को लगता है कि अगर सैक्स को ले कर उस ने पहल की तो उसे ही बदचलन मान लिया जाएगा. इसलिए वह चुप ही रहती है.

इस तरह के जोड़ों में तनाव और लड़ाईझगड़ा ज्यादा होता है. जिन लोगों की सैक्स जिंदगी ठीक होती है, वे हंसीखुशी व तालमेल के साथ रहते हैं.

सैक्सिज्म और फ्रीकी फीफा 2018

रूस की राजधानी मास्को के ल्युजनियाकी स्टेडियम में खेले गए फीफा विश्वकप 2018 के फाइनल मुकाबले में फ्रांस के जीतते ही जब फ्रांसीसी राष्ट्रपति स्टेडियम में ही खुशी के मारे नाच रहे थे तब वहां से करीब 5,000 किलोमीटर दूर भारत के नेता हमेशा की तरह इस खेल में भी राजनीति का गोल और पैनल्टी कार्ड ढूंढ़ रहे थे. दरअसल, पुद्दुचेरी की राज्यपाल किरण बेदी ने ट्वीट कर फ्रांस की जीत पर बधाई देते हुए यह लिख दिया, ‘हम पुद्दुचेरीवासियों (जो पूर्व में फ्रांस का हिस्सा थे) ने वर्ल्डकप जीत लिया है. बधाई दोस्तो. फ्रांस की क्या शानदार मिक्स्ड टीम थी. खेल जोड़ता है.’

किरण बेदी के इस ट्वीट पर कांग्रेस के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन समेत कई नेताओं ने भावनाएं आहत होने का पुराना राग अलापते हुए इसे राष्ट्रविरोधी बयान करार दिया और प्रधानमंत्री मोदी से उन्हें तुरंत बरखास्त करने की मांग करने लगे. क्या करें, हमारे देशी नेता अपनी आदत से मजबूर हैं, लेकिन क्षेत्रफल में करीब हिमाचल प्रदेश के बराबर क्रोएशिया का जबरदस्त खेल और परफौर्मेंस देख कर हर कोई यही कह रहा था कि पहली बार वर्ल्डकप खेल रही इस टीम ने इतनी बड़ीबड़ी धुरंधर टीमों को किस तरह धूल चटा दी.

जहां दुनिया ने क्रोएशिया जैसे छोटे से देश का शानदार गेम देखा, वहीं मजबूत टीमों और नामी खिलाडि़यों को धराशायी होते भी देखा गया. फीफा वर्ल्डकप देखने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, क्रोएशिया की राष्ट्रपति कोलिंडा ग्रैबर कितारोविक और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी पहुंचे थे. मास्को से ले कर मुंबई तक इस खेल का जादू सिर चढ़ कर बोला. भारत से भी बड़ी तादाद में फुटबौलप्रेमी फाइनल मैच देखने रूस पहुंचे.

हार कर भी जीता क्रोएशिया

15 जुलाई को खिताबी मुकाबले में एक तरफ 6.69 करोड़ की आबादी वाला पूर्व विश्वकप विजेता फ्रांस था तो दूसरी तरफ सिर्फ 40 लाख की आबादी का नौसिखिया देश क्रोएशिया था. 68 साल बाद पहली बार कोई इतना छोटा देश वर्ल्डकप फाइनल में पहुंचा. 1950 में उरुग्वे ने भी कुछ ऐसा ही उलटफेर किया था. बहरहाल, फ्रांस 20 वर्षों बाद एक बार फिर से वर्ल्डकप फुटबौल चैंपियन बन गया है. फ्रांस ने वर्ल्डकप की ट्रौफी भले ही जीती हो, लेकिन क्रोएशिया ने दुनियाभर के फुटबौल फैंस के दिल जीत कर यह साबित कर दिया कि हार कर जीतने वाले को ही बाजीगर कहते हैं.

हाई वोल्टेज ड्रामा वाले इस रोमांचक मुकाबले में फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से शिकस्त दी. फ्रांस की टीम के पहले हाफ में अच्छा खेल दिखाने के कारण क्रोएशिया की टीम बढ़त नहीं बना सकी, लेकिन दूसरे हाफ में फ्रांस ने शानदार वापसी की और 2 और गोल दाग कर विश्व खिताब अपने नाम कर लिया. फ्रांस के लिए फाइनल में गोल ग्रीजमैन, पौल पोग्बा और एमबापे ने किए. खेल के शुरुआती 10 मिनट में तो दोनों टीमों में से कोई भी गोल नहीं कर सकी, लेकिन क्रोएशिया का खेल फ्रांस की तुलना में ज्यादा बेहतर था.

18वें मिनट में बढ़त औन गोल के रूप में फ्रांस को मिली. हालांकि ग्रीजमैन ने शानदार किक लगाई जो सीधे गोलपोस्ट के सामने पहुंची, लेकिन सैमीफाइनल में क्रोएशिया की जीत के हीरो रहे मारियो मांडजुकिक के सिर पर लग कर बौल सीधे गोलपोस्ट के अंदर पहुंच गई.

यही वह आत्मघाती गोल था जो क्रोएशिया के मारियो मांडजुकिक ने किया. यह विश्वकप के फाइनल में हुआ पहला आत्मघाती गोल था, जिस ने क्रोएशिया को निराश कर दिया. इसी गोल से क्रोएशिया की उलटी गिनती शुरू हो गई. हालांकि इवान पेरिसिक ने उसे बराबर कर दिया था, लेकिन फ्रांस को 38वें मिनट में मिली पैनल्टी ने इशारा कर दिया था कि फ्रांस जीत के करीब है. क्रोएशिया ने बेशक हार झेली हो, लेकिन टीम दुनियाभर के फुटबौलप्रेमियों का दिल जीतने में सफल रही.

रेसिज्म बनाम सैक्सिज्म 

मैच से इतर रूस की मेजबानी वाले इस वर्ल्डकप में रेसिज्म और सैक्सिज्म का खूब बोलबाला रहा. यों तो पहले से कयास लगाए जा रहे थे कि विश्वकप जैसे बड़े टूर्नामैंट में रेसिज्म और सैक्सिज्म से जुड़ी घटनाएं होने की आशंका है, लेकिन पुरुष फुटबौल प्रशंसकों की रशियन महिलाओं के साथ अभद्रता, रूस की महिलाओं का विदेशी पर्यटकों के साथ रोमांस, सैक्स विवाद, स्टेडियम में मौजूद महिला दर्शकों पर  कैमरे का एक्स्ट्रा जूम और द टाइम्स औफ व्होर्स जैसे विवादित आर्टिकल ने इस खिताब में रेसिज्म से ज्यादा सैक्सिज्म को चर्चा में रखा.

खास कर, प्लाटोन बेसेडिन के उस आर्टिकल पर बवाल मचा जो टाइम्स औफ व्होर्स शीर्षक से प्रकाशित हुआ. इस में वे कह रहे थे कि रूसी महिलाएं विदेशी फैंस के साथ सैक्स कर देश की नाक कटा रही हैं. उन्होंने यहां तक कह दिया कि चंद डौलर्स के लिए रूसी महिलाएं किसी के भी साथ व्होर्स (वेश्या) की तरह सोने को तैयार रहती हैं. हालांकि इस आर्टिकल को ले कर उन की खूब खिंचाई हुई और महिलाओं को सैक्स को ले कर अपनी पसंद के हक की बात कही गई.

इस के अलावा जब फीफा वर्ल्डकप के मेजबान देश की 70 वर्षीय सांसद तमारा प्लेटेनयोवा ने मास्को के एक रेडियो कार्यक्रम में रूसी महिलाओं को विदेशियों के साथ सैक्स न करने की हिदायत और सैक्स के लिए अपनी ही नस्ल का पार्टनर तलाशने की बात कही तो उन्हें भी आड़े हाथों लिया गया.

मामला इतना बढ़ गया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को रूसी महिलाओं के विदेशी टूरिस्ट्स के साथ सोने से परहेज करने की बातों को खारिज कर कहना पड़ा कि रूस की महिलाएं फीफा वर्ल्डकप के दौरान पर्यटकों के साथ संबंध बना सकती हैं.

फीफा विश्वकप में कई ऐसी कई घटनाएं भी सामने आईं जिन में महिला प्रैस रिपोर्टर को पुरुष फुटबौल प्रशंसकों ने जकड़ लिया और जबरदस्ती किस करने का प्रयास किया. गौरतलब है कि इसी विश्वकप में फोटो एजेंसी गेटी इमेज ने युवा फीमेल फैंस की एक गैलरी बनाई थी, जिसे बाद में माफी मांगते हुए हटा लिया गया.

बहरहाल, मेजबान देश में फुटबौल के फीवर के साथसाथ सैक्स का फीवर भी सिर चढ़ कर बोला. भारत में भी कौमनवैल्थ खेलों के दौरान वेश्यावृत्ति बढ़ने और कंडोम्स की खपत में बढ़ोतरी की बात सामने आई थी. दरअसल, अब खेल सिर्फ खेल नहीं, बल्कि ग्लैमर, नशा और पार्टीज कौकटेल बन चुका है, जहां खेल की आड़ में सैक्स और नशा दोनों परोसा जाता है. यह एक तरह से टूरिज्म की कमाई का मोटा हिस्सा भी बन चुका है, इसलिए इस पर कोई भी मेजबान देश रोक नहीं लगाना चाहता.

भारत में फुटबौल की दीवानगी

फुटबौल दुनियाभर में सब से ज्यादा देखा और पसंद किया जाने वाला खेल है. पिछले फुटबौल वर्ल्डकप को करीब 302 करोड़ से ज्यादा लोगों ने देखा था जबकि इस बार इसे 4 अरब से ज्यादा दर्शक मिले. नील्सन के एक सर्वे के अनुसार, दुनिया में इस खेल को ले कर सब से ज्यादा दर्शक और रुचि यूएई में है. यहां की 80 फीसदी आबादी की फुटबौल में रुचि है.

बात अगर भारत की करें तो यहां की करीब आधी से थोड़ा कम आबादी फुटबौल को ले कर दीवानी है. भारत में 45 फीसदी दर्शक फुटबौल देखते हैं. अगर राज्यों के लिहाज से देखें तो फुटबौल का सब से बड़ा बाजार पश्चिम बंगाल में है जहां 175 लाख फुटबालप्रेमी हैं, जबकि केरल में 158 लाख, पूर्वोत्तर में 93 लाख और महाराष्ट्र व गोवा में यह आंकड़ा 90 लाख का है.

इतना ही नहीं, भारत में कुल दर्शक संख्या 15.32 करोड़ है. इस में टीवी दर्शक 12.32 करोड़ हैं तो औनलाइन देखने वालों की तादाद 3 करोड़ है. ग्रामीण इलाकों में 5.15 करोड़ दर्शक हैं. ये आंकड़े साबित करते हैं कि देशभर में फुटबौलप्रेमियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है.

कुल मिला कर भारत में फुटबौल को क्रिकेट जैसी लोकप्रियता भले ही हासिल न हो, लेकिन टीवी और इंटरनैट की आसान उपलब्धता ने इसे यहां भी पौपुलर कर दिया है. कुछ समय बाद इस का बाजार भी भारत में घुसपैठ करेगा.

फिलहाल देशी और राष्ट्रीय खेल हाशिए पर रहेंगे, क्योंकि हम सामान हो या खेल, हमेशा आयातित माल ही पसंद करते हैं. मेहनत और सृजन से हम दूर भागते हैं. और फास्टफूड की तर्ज पर सबकुछ रेडी टू ईट खाना, देखना व खरीदने को ही तरक्की का पैमाना समझते हैं. इसीलिए क्षेत्रफल में हम से कई गुना छोटे देश आज हम से कहीं ज्यादा उन्नत व खुशहाल हैं और हम सिर्फ दर्शक बन कर तालियां पीटने को ही हुनर मान बैठे हैं.

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