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विधानसभा में तंत्रमंत्र

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह सचमुच के यानी एलोपैथी के डाक्टर हैं जो इत्तफाक से राजनीति में आ कर मुख्यमंत्री बन बैठे तो इस आरामदेह कुरसी को छोड़ने का उन का मन नहीं कर रहा. इस बाबत वे अब तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे हैं. उन की ताजी हरकत देख सब टीवी पर प्रसारित होने वाले हास्य धारावाहिक ‘भाभी जी घर पर हैं’ के एक किरदार की याद आ गई, जो है तो डाक्टर पर इलाज तंत्रमंत्र से करने की बात करता रहता है. उस की मूर्खता पर दर्शक खूब हंसते हैं.

पिछले दिनों रमन सिंह एक तांत्रिक को विधानसभा ले गए जिस ने मन ही मन ॐ कलीम हीम फटनुमा कोई मंत्र बुदबुदाया और फिर यह ऐलान कर डाला कि उस ने विधानसभा बांध दी है जिस के चलते छत्तीसगढ़ में चौथी बार भी भाजपा की सरकार बनेगी और वह भी रमन सिंह के ही नेतृत्व में. तांत्रिक ने रमन सिंह शब्दों पर ज्यादा जोर दिया तो समझने वाले समझ गए कि अब चुनाव तक यही ढोंगपाखंड झेलना पड़ेगा. जाहिर यह भी हुआ कि रमन सिंह की नैया इस बार डोल रही है जिसे साहिल पर लाने के लिए फुटपाथी तांत्रिकों का सहारा लिया जा रहा है.

दान के नाम पर पैसा निकालने के नायाब तरीके

दृश्य-1

भोपाल के एक बड़े और पुराने मंदिर में भागवत कथा हो रही थी. प्रवेशद्वार के ठीक सामने महाराजजी और उन की मंडली संगीतमय भागवत वांच रही थी. कथावाचक महाराज के बारे में पहले ही काफी प्रचारप्रसार हो चुका था कि वे बहुत पहुंचे हुए हैं और कई बार उन का प्रभु से साक्षात्कार हो चुका है. लिहाजा, उन्हें किसी चीज की जरूरत नहीं. वे तो बस कलियुगी लोगों को तारने के लिए धर्म का काम करते हैं.

आयोजक एक संपन्न ब्राह्मण परिवार था, जिस के फ्लैक्स हौल के चारों तरफ लगे थे कि फलां परिवार श्रीमद्भावगत में आप का हार्दिक स्वागत करता है. इन फ्लैक्सों में कथावाचक सिद्ध महाराज का फोटो प्रमुखता से छपवाया गया था. हौल की सजावट में कोई कसर आयोजक परिवार ने नहीं छोड़ी थी. एक तरफ के कोने में चायपानी का इंतजाम भी था. भंडारा तो रोज भागवत में होता ही है.

सिंहासननुमा क्या, बल्कि सिंहासन कहना ही बेहतर होगा. महाराज माइक के सामने सुदामा प्रसंग सुना रहे थे. हौल में बैठे और खड़े लगभग डेढ़ हजार भक्त भक्तिरस में डूबे इस का रसास्वादन कर रहे थे. भागवत का यह चौथा ही दिन था और मोहमाया त्यागने का दावा करने वाले महाराजजी के सामने हजारों की दक्षिणा शोभायमान हो रही थी, जिसे देखदेख कर उन के चेहरे का तेज और बढ़ जाता है.

अभी महाराजजी ने कृष्णसुदामा प्रसंग का भावभीना वर्णन शुरू ही किया था कि मंच के पीछे से हाथ में दानपात्र लिए एक गरीब मैलाकुचैला सा पात्र अवतरित हुआ और महाराज की तरफ प्रणाम की मुद्रा में आते नीचे उतर गया. महाराज ने इशारे से स्पष्ट किया कि यही सुदामा है और फिर मूल प्रसंग पर आ गए.

उस सुदामा का दर्शकदीर्घा में आना था कि भक्त उस के पैर छूछू कर उस के पात्र में यथासंभव पैसा यानी दानराशि डालने लगे. भक्ति में सहानुभूति का पुट डालने की गरज से वह सुदामा थोड़ा लंगड़ा कर चल रहा था. देखते ही देखते उस का पात्र दान के नोटों से भर गया तो उस ने नोट कंधे पर टंगे थैले में ठूंस लिए, जिस से दानदाताओं को दान देने में परेशानी न रहे.

सुदामा ने हर लाइन में जा कर लोगों को आशीर्वाद दिया और बदले में धन लिया. इन नोटों की गिनती तो बाद में महाराजजी ने कर ली होगी, लेकिन हौल में लोगों को दान देते देख कर कहा जा सकता है कि 10 हजार रुपए से कम तो बटोरे नहीं होंगे.

दानदाता भक्तों में शिक्षित और संपन्न से ले कर अनपढ़ और गरीब लोग भी थे. हरेक ने अपनी हैसियत के मुताबिक सुदामा को दान दिया. हालांकि वे 4 दिनों से रोज मंदिर और महाराज को भी पैसा चढ़ा रहे थे, लेकिन सुदामा को बीच में आया देख उन्होंने पुण्य कमाने और दान देने का यह मौका भी नहीं छोड़ा.

भागवत कथाओं के आयोजनों में अब ऐसे दृश्य बेहद अहम हो चले है, जिन में सुदामा जैसा कोई पात्र ड्रामाई स्टाइल में मंच से नीचे आता है और पैसा बटोरता है. यह दरअसल में दान झटकने का एक नया तरीका है, जिसे शक्ति और धर्म के सम्मोहन में डूबे लोग नहीं समझ पाते कि भागवत कथा कैसेकैसे उन की जेब काट रही है और यह सुदामा कलयुग का ही है और उन की ही तरह हाड़मांस का पुतला है, जो अपना रोल निभा रहा था.

दृश्य -2

भोपाल के पौश इलाके शाहपुरा की मनीषा मार्केट में कैमिस्ट शौप चलाने वाले अनिल कुमार ललवानी के काउंटर पर एक संगमरमर की छोटी सी गाय रखी है. देखने में बेहद आकर्षक यह गाय दरअसल में एक गुल्लक है, जिस की पीठ पर संबंधित गौसेवा संस्थान का नामपता लिखा हुआ है.

अनिल के अंदाजे के मुताबिक रोजाना कम से कम 2 सौ रुपए ग्राहक इस गुल्लक में डालते हैं. कुछ लोग गाय के पांव भी पड़ते हैं. कुछ दिन पहले ही मथुरा वृंदावन के आश्रम के  कुछ लोग इस गाय यानी गुल्लक को अनिल की मिन्नतें कर काउंटर पर रख गए थे. अकेले भोपाल में अलगअलग दुकानों में रखी इन गुल्लकों की तादाद 2 हजार के आसपास होना अनुमानित है.

हैरानपरेशान लोग गाय की पीठ में बने छेद से नोट डालते हैं. 1-2 महीनों में जब पीठ (कहना तो पेट चाहिए) भर जाती है तो संस्था के लोग भरी गुल्लक उठा कर ले जाते हैं और दूसरी खाली रख जाते हैं. एक गुल्लक में छोटेबड़े नोट मिला कर 10 हजार रुपए आराम से आ जाते हैं.

यह हास्यास्पद और चिंतनीय बात है कि मनीषा मार्केट में ही दर्जनों जीतीजागती गाएं भूखीप्यासी बैठी रहती हैं जिन पर गौभक्त, दानदाता कोई ध्यान नहीं देते. शायद जीवित गाय को चारा खिलाने से उतना पुण्य नहीं मिलता जितना देश भर की लाखों दुकानों में रखी गाय छाप गुल्लकों में डालने से मिलता है.

सौ, दौ सौ रुपए की एक संगमरमरी गाय से लाखों रुपए कैसे बनाए जा सकते हैं, यह चालाकी कोई उन आश्रमों और संस्थान वालों से पूछें जो संगठित तरीके से दान का धंधा चलाते भक्तों की दान देने की मानसिकता और कमजोरी को भुनाते असली गाय का घी और दूध गटक रहे हैं. इन पर कोई टैक्स या जीएसटी भी प्रभावी नहीं है.

दुकानदार इन गायों को क्यों रखे हुए हैं, यह सवाल दान की मानसिकता जैसा बेमानी है, दुकानदार खुद अव्वल दर्जे के अंधविश्वासी होते हैं, जो यह मानते हैं कि यह गौसेवा है. पर उन्हें यह नहीं मालूम रहता कि वाकई दान के पैसे से गायों के भले के लिए कुछ होता है या नहीं या जानेअनजाने में वे धर्म के दुकानदारों का मुहरा बन कर रह गए है. कुछ दुकानदार मानते हैं कि प्रतिस्पर्धा के इस दौर में ऐसे टोटके भी कारगर साबित होते हैं. संगमरमर की चमचमाती गाय काउंटर पर रखने से नए ग्राहक दुकान की तरफ आकर्षित होते हैं. यानी यह श्रद्धा नहीं स्वार्थ है.

दूसरे हजारोंलाखों धार्मिक अंधविश्वासों और ठगी की तरह इस सवाल का जवाब और इस मानसिकता का कोई इलाज नहीं जो दान के नएनए तरीकों को बढ़ावा देते हैं.

दृश्य -3

भोपाल के ही कोलार इलाके के साईं मंदिर शिरडीपुरम में फरवरी के तीसरे हफ्ते में कुछ सिक्के दर्शनार्थ रखे गए थे, जिन्हें देखने हजारों साईंभक्त आए और पैसा चढ़ाया. इन सिक्कों के बारे में प्रचारित किया गया था कि ये खुद साईं बाबा ने सौ साल पहले अपनी एक भक्त को दिए थे.

इस में नया क्या जो लोग पूजापाठ और पैसा चढ़ाने उमड़ पड़े. ऐसे सिक्के तो आज भी कई घरों से मिल जाएंगे, जिन की उम्र सौ साल से ज्यादा है. फर्क इतना भर है कि वे सिक्के इसलिए चमत्कारी नहीं होगे, क्योंकि उन्हें साईंबाबा ने नहीं, बल्कि गृहस्वामी के पूर्वजों ने छुआ होगा जो चमत्कारी नहीं थे.

हकीकत में यह और ऐसे टोटके भक्तों और दान की तादाद बढ़ाने के लिए किए जाते हैं. साई बाबा के सिक्कों पर भी दान से एक अहम बात यह उजागर हुई कि अंधविश्वासों और दानदक्षिणा के मामले में लोग राम, कृष्ण, हनुमान और साईंबाबा में भेदभाव नहीं करते.

गौरतलब है कि एक शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद साईंबाबा पर मुसलमान और वैश्यापुत्र होने का आरोप लगा चुके हैं. उन्होंने इस बात पर भी एतराज जताया था कि लोग साईंबाबा का पूजापाठ सनातनी तरीके से न करें. इन आरोपों से तिलमिलाए साईं भक्तों ने अदालत की शरण ली थी, जिस का मुकदमा अभी भी चल रहा है.

इस प्रसंग का उल्लेख इसलिए कि विभिन्न देवीदेवताओं और साईं भक्तों में पूजापाठ, अंधविश्वासों और दान के मामले में कोई फर्क नहीं रह गया है. लोग अंधे हो कर हर उस जगह गाढ़ी कमाई का पैसा चढ़ाते हैं, जिस का तरीका पुराने तरीके से हट कर हो. हिंदू देवीदेवताओं की तरह ही साईंबाबा के भी हजारों मंदिर देशभर में बन चुके हैं, जिन में पूजापाठ और चढ़ावा आम बात है.

अंतहीन है दृश्य

ये तो एक शहर के चंद उदाहरण हैं जिन से यह साबित होता है कि दान झटकने के लिए धर्म के दुकानदार क्या कुछ नहीं करते. देशभर में ऐसी जगहों और प्रतीक चिह्नों की भरमार है जहां तबीयत से पैसा चढ़ाया जाता है.

जरूरी नहीं कि पैसा मंदिरों में विराजमान मूर्तियों के सामने ही चढ़ाया जाए, बल्कि ऐसेऐसे तरीके धर्म के धंधेबाजों ने ईजाद कर रखे हैं, जिन्हें देख उन के हुनर और चालबाजी की दाद देने से आप खुद को रोक नहीं सकते.

चित्रकूट में सीता रसोई है, नासिक में भी है और बस्तर जैसे आदिवासी बाहुल्य इलाके में भी है. इन सीता रसोइयों में भी भक्त इतनी श्रद्धा से पैसा चढ़ाते हैं मानो वे मंदिर के मालिक, संचालक, पुजारी या पंडे के पास न जा कर सीधा सीता माता के बैंक खाते में जा रहा हो.

लेने वाले दान क्यों लेते हैं, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि इस से बैठेबैठाए पेट भरता है और विलासी जीवन गुजारा जा सकता है और वह भी बगैर पसीना बहाए तो कोई क्यों काम करेगा?

पर देने वालों का क्या इलाज, जिन के दिमाग में यह बात कूटकूट कर भरी हुई है कि सब भगवान का ही है. वही देता है. अब इस में से कुछ चढ़ा दिया तो कौन सा गुनाह हो गया.

पाप कटने का पाखंड

दान से पाप कटते होते तो कम से कम हमारे देश में तो कोई पापी है ही नहीं जहां भिखारी भी दिनरात मेहनत कर भीख मांगता हैं और उस में से कुछ भगवान को चढ़ा आता है.

दान किसी तरह की आस्था का प्रतीक भी नहीं है, बल्कि यह एक डर है कि चढ़ाओगे नहीं तो पापी और नास्तिक कहलाओगे. यह डर किस ने व कैसे बैठाया यह हर दानदाता बेहतर जानता है. फिर भी इस से छुटकारा नहीं पाना चाहता तो देश का बेड़ा गर्क करने में वह अपनी आहुति ही दे रहा होता है. 60 साल की औसत जिंदगी में एक मध्यवर्गीय कम से कम 5 लाख रुपए दानदक्षिणा में जाया करता है और एवज में उसे तो क्या किसी को कुछ नहीं मिलता.

इतने पैसों में एक गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च लोग उठाएं तो देश में कोई अशिक्षित नहीं रह जाएगा.

दरअसल, लोग समाज और देश के भले के लिए कुछ नहीं करना चाहते, इसलिए कमाई का बड़ा पैसा दान में दे देते है ताकि अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों से बचे रहें. यह हीनता या ग्लानि जिस दिन दूर हो जाएगी देश खुशहाल हो जाएगा.

जिंदगी और मौत

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले में व्यक्ति के अस्तित्व, गरिमा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता, विवेक आदि के उन हिस्सों पर बात करनी पड़ी जो दर्शनशास्त्र का हिस्सा हैं. जो न तो सुन सकता है, न बोल सकता है, न चल सकता है, न लिख सकता है और न ही उस की स्मरणशक्ति काम कर रही है, सुप्रीम कोर्ट ऐसे व्यक्ति के जीवन के प्रश्न पर विचार कर रहा था. ऐसा व्यक्ति केवल डाक्टरों के कारण मशीनों के सहारे जिंदा रखा जा रहा था. क्या कोई व्यक्ति किसी मृत व्यक्ति की देह के साथ अपमानित व्यवहार कर सकता है? यह अपराध है या नहीं? इस बारे में कानून स्पष्ट है कि मृत व्यक्ति की देह के साथ कू्रर व्यवहार करना अपराध है. सदियों से आदिवासी कबीले ही नहीं, अच्छेभले राजा भी हारे हुए दुश्मन को मार कर उस की मृतदेह की नुमाइश करते रहे हैं, उस के शरीर का प्रदर्शन करते रहे हैं. सभी समाजों ने इसे क्रूरता की पराकाष्ठा माना है.

इसी तरह की स्थिति उस व्यक्ति की है जो ट्यूबों और मशीनों से बंधा अस्पताल के बैड पर पड़ा है. रिश्तेदार और डाक्टर न तो उसे मृत मान सकते हैं न ही जीवित. एक आशा होती है कि शायद वह जी उठे पर बहुत कम. क्या डाक्टरों को अधिकार है कि वे पैसे मिलने पर उस व्यक्ति को कृत्रिम तौर पर जीवित रख सकते हैं? आमतौर पर जब पैसा न मिलने की आशंका होती है तो डाक्टर कृत्रिम उपाय हटा लेते हैं. पर वह उन की हार होती है और वे सभी रिश्तेदारों की सहमति मांगते हैं जिसे देने में सगेसंबंधी हिचकिचाते हैं. जीवन का अधिकार क्या एक व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह पहले से घोषित कर दे कि उसे मैडिकल सुविधाओं से जिंदा न रखा जाए और डाक्टर को निर्देश दे सकता है कि उस के ठीक न हो सकने की हालत में उसे मशीनों से हटा लिया जाए?

एक अच्छे डाक्टर के लिए इस पर निर्णय लेना आसान नहीं है, क्योंकि उसे तो यही प्रशिक्षण दिया गया है कि वह अंतिम समय तक मरीज की बीमारी से लड़ता रहे. यदि डाक्टरों के पास लाए गए हर मरीज के साथ उस का घोषणापत्र भी लाया जाएगा कि उसे जबरदस्ती जिंदा न रखा जाए तो वे अपनी शिक्षा और अपने ध्येय से न्याय नहीं कर पाएंगे. फिर तो वे पशुओं के डाक्टर बन कर रह जाएंगे जो केवल उपयोगी पशुओं को ही जिंदा रखते हैं. अनुपयोगी मानव को मरने देने की घोषणा का कोई अर्थ कानून की दृष्टि में नहीं होना चाहिए, क्योंकि बच्चे या अन्य रिश्तेदार बीमार वृद्धों को बहका, बहला या धमका कर उन से इस प्रकार की घोषणा करा सकते हैं. अरबपति भी एक समय असहाय हो सकता है जब वह जिंदा रहना चाहता हो पर निकटसंबंधी

न चाहें. जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं पर बीमार पड़ने पर शशिकला उन से किसी को मिलने नहीं दे रही थीं. हफ्तों बीमार रहने के बाद उन की मृत्यु हो गई पर मालूम नहीं हो सका कि मृत्यु का कारण क्या था. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि जब केवल मशीनों पर व्यक्ति जीवित रखा जा रहा हो तो मरीज के होशोहवास में दिए गए घोषणापत्र पर डाक्टर विचार कर सकते हैं और मशीनें हटा सकते हैं. यदि कोई घोषणापत्र न हो तो व्यक्ति की गरिमा, आत्मसम्मान और जीवन के अधिकारों का संतुलन करते हुए निर्णय लेने में डाक्टर, कोर्ट के इस फैसले के बाद, स्वतंत्र हैं और तब मशीनें हटाना अपराध न होगा.

क्या यही मर्दानगी है, 21वीं सदी में भी पुरुषों की भेदभावपूर्ण सोच

किसी भी उम्र का पुरुष किसी भी उम्र की महिला से ऐसा कोई भी अवसर नहीं छोड़ना चाहता जहां उसे आनंद न मिलता हो. बातों से या औरत की अनजाने में हुई किसी भूल से, स्पर्श से वह अपना भरपूर मनोरंजन करता है और सोचता है कि औरत को मूर्ख बना कर भरपूर मनोरंजन करता है और सोचता है कि औरत को मूर्ख बना कर उस ने अपनी मर्दानगी दिखाई है. औरत मनोरंजन के लिए या मात्र मजा देने के लिए है. औरत की बेबसी मर्द के कथित मजे को और भी बढ़ाती है और वह चटखारे लेने लगता है. एक बार को पढ़ेलिखे मर्द सभ्यता की आड़ में स्वयं को खामोश रखने के लिए विवश हो सकते हैं, लेकिन होते नहीं हैं. ऐसे अवसरों पर उन की बुद्धिमत्ता का मुखौटा शीघ्रता से उतर जाता है. छेड़छाड़ और रेप के ज्यादातर किस्से इस तथाकथित पढ़ेलिखे सभ्य समाज में भी खूब मिलते हैं. द्विअर्थी संवादों द्वारा, आंखोंआंखों में अश्लील इशारों द्वारा, हावभाव द्वारा, फूहड़ शब्दों द्वारा तब उन में और कम पढ़ेलिखों या अनपढ़ों में कोई फर्क नहीं रह जाता. औरत कोई भी हो, हर व्यक्ति यहां मात्र अपनी मां, बहन, पत्नी और बेटी को बचा कर रखता है और दूसरी स्त्री को एकदम बाजारू चीज समझने लगता है.

घटिया सोच

औरत जितनी ज्यादा बेबस नजरों से देखेगी उस में मजे की सीमा उतनी ही बढ़ेगी. यदि बस चले तो ये मर्द अपनी मां, बहन और बेटी के बदन को भी नोच कर खा जाएं. अब कुछ लोग खाने भी लगे हैं. मर्यादाओं और संस्कारों के नाम पर औरत नहीं बच पाती, बच पाते हैं तो महज रिश्ते क्योंकि एक की मां, बहन, बेटी किसी दूसरे के मजे का कारण हो सकती है. औफिसों में जहां स्त्रीपुरुष एकसाथ काम करते हैं ऐसी बेचारगियां और मजे आम बात है. सफेद बालों वाले वृद्धों एवं प्रौढ़ों को भी खींसे निपोरते देखा जा सकता है और पार्कों में अकसर वृद्धों की टोली घूमने आने वाली महिलाओं पर छींटाकशी से बाज नहीं आती. नयनसुख के साथसाथ जबान सुख लेने से भी वंचित नहीं रहते.

चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तो द्वितीय श्रेणी की महिला कर्मचारी की किसी बेचारगी का आनंद तालियां बजाबजा कर, पान चबाचबा कर व पीक थूकते हुए सामूहिक रूप से लेते हैं. मसलन, ब्रा का हुक खुल जाए, साड़ी कंधे से सरक जाए, जूड़ा लटक जाए, अचानक पर्स गिर कर खुल जाए और पर्र्स उठाने के चक्कर में झुकी औरत के ब्लाउच से नजर टकरा जाए. औफिसों में तो शर्त यहां तक लग जाती है कि कौन औरत पीरियड से है, किस का पीरियड कब आता है. जैसे औरत उन के सामने निर्वस्त्र खड़ी है. ऐसी घटिया सोच पर अंकुश लगाने का कोई उपाय भी तो नहीं है. यहां लड़की और औरत दोनों सोच एकजैसी है कि सिकुड़ना उन की नियति है. शायद इसीलिए नजरों की पहचान होना और खतरों से आगाह होना लड़की को जल्दी आ जाता है.

कुप्रथाओं के नाम पर शोषण

अभी भी देश के पर्वतीय ग्रामीण अंचलों में ऐसी प्रथा है कि लड़की का विवाह लड़के की कमीज से कर दिया जाता है. यानी लड़की का महत्त्व कमीज जितना भी नहीं. कैसा क्रूर मजाक है यह? राजपूतों के समय राजामहाराजाओं के जमाने में युद्धरत राजपूत राजा का विवाह उस की अनुपस्थिति में उस की कटार या तलवार से कर दिया जाता था. हास्यास्पद स्थिति तब भी थी. ये विवाह साधूपंडे करते थे जो कहने को विद्वान थे.

यह कैसा धर्म है जो अपने ही हिस्से औरत के साथ इस कदर बेरहम है, दूल्हे की गैरमौजूदगी में विवाह की इतनी शीघ्रता या औरत के औरताना वजूद को कुचला जाना क्या सिद्ध करता है. कभी भी इतिहास में (तब भी जब मातृ सत्ता थी) किसी मर्द का विवाह किसी लड़की की साड़ी या चोली के साथ नहीं हुआ. पुरुषों को ऐसी दुर्गति कभी नहीं की गई लेकिन नारी शिक्षा के नाम पर ऐसी कुप्रथाओं के आज भी चटखारे ले कर पढ़ा जाता है. लड़की की मृत्यु पर आज भी आंसू नहीं छलकते. जो हाथ आज निर्माण के नाम पर ध्वंस कर रहे हैं, वे यह नहीं समझ पा रहे कि औरत के वजूद में ही उन का वजूद है. किसी मर्द ने औरत को जन्म नहीं दिया. जन्म औरत ही मर्द को देती है. औरत की कोख में ही उसे करवटें लेनी होती हैं. यही कटु सत्य है जिसे उसे समझना चाहिए.

आज समाज में बलात्कारों की बाढ़ आ गई है. कारण लड़कियों ने सिकुड़ना, सिमटना और छिपाना बंद कर दिया है. ठीक भी है. कोई कब तक सहेगा और क्यों सहेगा? लेकिन नियति तो अभी भी उसे सहने के लिए विवश कर रही है. सवालों के कठघरे में खड़ी लड़की न जाने कितने बलात्कार सहती है. ऐसिड अटैक भी एक तरह से शारीरिक, मानसिक बलात्कार ही है. कितनी आसानी से पूरी एक आदमजात महज एक वर्ग के सुख और मजे के लिए ‘वस्तु’ में तबदील कर दी जाती है और तब जब मानव प्रकृति की सब से श्रेष्ठ रचना मानी जाती है, क्योंकि उस में सोच है, विचार है, तर्क है, बुद्धि और विवेक है. सोच के द्वारा पुरुष नएनए तर्कजाल बुन कर औरत को फंसाता और उलझाता है जबकि जानवरों में भी पशु प्रवृत्ति के साथ ऐसा नहीं है. पशु पशु को पशु तो मानते ही हैं, वह चाहे नर हो या मादा. फिर आदमजात की इस वस्तु समझ को क्या कह कर संबोधित करें- यह सवाल हर उस शख्स से है जो आदमियत के माने समझता है.

कब सुधरेगा समाज

एक अकेली औरत तलाकशुदा, विधवा या कुंआरी उस का किसी से कोई संबंध नहीं होता. वह समाज में मात्र खिलौना या मनोरंजन की वस्तु बन कर रह जाती है. उस की चीखपुकार प्रार्थना, आंसू सब खो जाते हैं. वह स्वयं मूल्यहीन हो जाती है. बचती भी है तो मात्र देह ही और औरत की देह सजीव होने के बाद भी स्पंदनहीन हो जाती है. उसे फ्रीज कर दिया जाता है.

मर्द को औरत से मिलने वाला यह मजा मेलों, सार्वजनिक स्थानों, भीड़भाड़ वाली जगहों में खूब मिलता है. औरत की छाती पर हाथ मार देना, नितंबों पर चुटकी काट लेना, दुपट्टा या साड़ी खींच देना. गनीमत है कि इस देश में सार्वजनिक चुंबन की प्रथा नहीं है. नदियों, नहरों या तालाबों के किनारे स्नान करती, कपड़े बदलती महिलाओं के अंगप्रत्यंग दर्शनार्थी बहुतायत से मिलते हैं. नीम अंधेरे गांव से बाहर जंगल में शौच के लिए गईं महिलाओं पर अकसर ट्रक या बस के ड्राइवर लाइट डाल कर अपने मजे में बढ़ोतरी करते हैं. बसों आदि में अचानक ब्रेक लगा कर महिला सवारियों को पुरुष सवारियों पर गिराना, महिला सवारियों की सीट से टेक लगा कर टिकट काटना आम बातें हैं.

संस्कृति और संस्कारों की दुहाई दे कर औरत के लिए एक अलग कठघरा खड़ा कर दिया गया है. जो कार्य औरत को समाजिक अपराधी घोषित करता है, वही कार्य पुरुष सिर उठा कर करता है. धूल में गिर कर औरत मैली हो जाती है, क्योंकि वस्त्रों से धूल झाड़ने की इजाजत समाज नहीं देता. इन दोमुंही सामाजिक मर्यादाओं से औरत कब मुक्त होगी.

पीरियड्स से जुड़े रीयल फैक्ट्स जानेंगी तो हैरान रह जाएंगी

मासिकधर्म शुरू हो गया है, अब रसोईघर में नहीं जाना, मंदिर में नहीं जाना, पूजा नहीं करना, इन दिनों सफेद कपड़े मत पहनना, खेलनाकूदना, साइकिल चलाना सब बंद. दरअसल, ये सारे पीरियड्स टैबू महिलाओं की दिनचर्या को बांधने वाले हैं, जिन का कोई साइंटिफिक आधार नहीं है. ये टैबू छोटी बच्चियों पर सब से ज्यादा बुरा असर डालते हैं.

पीरियड्स से जुड़ी ढेर सारी भ्रांतियां हैं, जो पूरे देश में प्रचलित हैं. आप चाहे किसी भी शहर में हों, हर परिवार में इन से जुड़े जवाबों की एकरूपता आप को चौंका देगी. मगर अब वह वक्त नहीं रहा जब पीरियड्स से जुड़े सख्त नियमकायदे चल पाएं. ये बेकार की बातें आप को डिस्टर्ब करने के अलावा और कुछ नहीं दे सकतीं. इन्हें पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाना ही बेहतर होगा.

प्रतिबंध व रोकटोक

एक पढ़ीलिखी व खुले विचारों वाली महिला साधना शर्मा कहती हैं, ‘‘कुछ प्रतिबंध व रोकटोक तो हमारे घर में भी है, लेकिन इतनी सख्त नहीं कि कोई मुश्किल हो. लेकिन कई जगहों पर इतनी कठोर भी है कि जीना दुश्वार हो जाता है. इस से मैं पहली बार तब रूबरू हुई जब कुछ साल पहले दूसरे शहर में अपने करीबी रिश्तेदार के घर जाना हुआ. उसी दौरान मासिकधर्म शुरू हो गया.

‘‘मेजबान घर की बड़ी बहू को पता चला तो उन्होंने डूज ऐंड डोंट्स की लंबी लिस्ट समझाई कि उन के घर में इन दिनों क्याक्या नियमकायदे चलते हैं. लेकिन मैं ने सारे नियमों को मानने से इनकार कर दिया. मैं ने साफ कह दिया कि ज्यादा रोकटोक की तो मैं यहां से वापस चली जाऊंगी. मेरी नाराजगी का आशय थोड़ा गंभीर विषय था. अत: मेरी धमकी काम कर गई.

‘‘उन दिनों कितने ज्यादा रूल्स लागू कर दिए जाते हैं और आप से उम्मीद की जाती है कि घर के मर्दों को इस बात का पता न चले. मगर मेरा मानना है कि इतने नियमों का पालन कराओगे तो घर के मर्दों को तो क्या, पड़ोसियों तक को पता चल जाएगा.’’

जरूरी काम भी जरूरी नहीं

घर जाने के रास्ते में कपड़े पर खून के धब्बे देखे जाने की असहजता से देश की आधी आबादी खुद को घिरा पाती है. हर महिला जिसे माहवारी से हर महीने दोचार होना पड़ता है, के लिए किसी स्कूल, किसी कार्यालय या कौरपोरेट दफ्तरों में कोई समाधान नहीं है. यही वजह है कि माहवारी के दौरान बड़ी तादाद में लड़कियां स्कूल से और कामकाजी महिलाएं कार्यालय से किसी न किसी बहाने छुट्टी ले लेती हैं. करीब 70 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जो पीरियड्स के दिनों में

अपने रूटीन के कामों को भी बैकसीट पर रख देती हैं.

28 वर्षीय अनुराधा कहती हैं, ‘‘रजस्वला लड़की या औरत के अचार छूने भर से वह भला खराब कैसे हो सकता है? यह बात कोई प्रूव कर के तो दिखाए, मैं तो मानने वाली नहीं हूं. दादी थीं तब तो बात माननी पड़ती थी. मेरी बातों पर वे बहुत गुस्सा होती थीं. दादी के रहते मां ने भी पूरी तरह नियमों का पालन किया, पर उन के जाने के बाद सारी पाबंदियां हटा ली गईं. उन दिनों की ये मुश्किलें ही क्या कम हैं, जो ऊपर से ये कायदे और झेले जाएं?’’

40 वर्षीय वंदना का कहना है, ‘‘मैं पूरी तरह आजाद तो आज भी नहीं हूं. कुछ कायदों को मानते हैं, लेकिन उतना नहीं जितना मां और दादी से सुना था.’’

‘‘पहले शादी से पहले बेटी को माहवारी आना अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए पीरियड्स शुरू होने से पहले ही उस का ब्याह कर दिया जाता था. उस जमाने में मेरी शादी

10 साल की उम्र में ही कर दी गई थी,’’ यह कहना है 70 वर्षीय मायादेवी पारीक का.

वे आगे कहती हैं, ‘‘कालेज में पढ़ने वाली पोती पर हम ने इतनी पाबंदियां नहीं लगाई हैं, क्योंकि अब और तब में दिनरात का अंतर है. वैसे सुबह जल्दी उठ कर नहाने में बुराई नहीं है. शादी के बाद पीरियड्स शुरू हुए तो मुझे बाहर नहीं जाने दिया जाता था. सूर्य निकलने से पहले नहाना पड़ता था. चूल्हाचौका और झाड़ू को हाथ नहीं लगाने दिया जाता था. बरतन सूखे मांजने पड़ते

थे. इतना ही नहीं सब से अलग रहना पड़ता था. यहां तक कि कपड़ा भी फेंकने की मनाही थी. लेकिन आज का बदलाव अच्छा है. उन दिनों तो पड़ोस में 4 घर की दूरी पर मंगोड़ी, पापड़ आदि बनते थे, तो खुद की छत पर भी जाने की मनाही होती थी ताकि रजस्वला की छाया से वे खराब न हो जाएं.’’

चौंका देगी यह सचाई

हैरत की बात तो यह है कि 70 फीसदी महिलाएं आज भी सैनिटरी पैड खरीदते हुए झिझकती हैं. आज भी दुकानदार उन्हें सैनिटरी पैड अखबार में लपेट कर या फिर काली थैली में डाल कर देते हैं. 40 फीसदी महिलाएं पीरियड्स के उन दिनों घर से बाहर नहीं निकलतीं और 65 फीसदी इन दिनों अपने बाल धोने तक से परहेज करती हैं.

तगड़ा अंधविश्वास है कि उन दिनों अचार, मंगोड़ी, पापड़, चिप्स वगैरा आप के देख लेने भर से ही खराब हो जाएंगे. रसोईघर और पूजाघर में घुसने की तो सख्त मनाही होती है, क्योंकि इस से घर में बरकत नहीं होती और तथाकथित भगवान रूठ जाते हैं. 40 फीसदी शादीशुदा महिलाएं ऐसी भी हैं, जो इस दौरान पति के साथ एक कमरे में नहीं रहतीं.

ये चौंकाने वाले आंकड़े साबित करते हैं कि तमाम आधुनिकता और जागरूकता के बावजूद औरतों के पीरियड्स से जुड़े मिथक घरसमाज में ज्यों के त्यों जड़ें जमाए हैं.

पहली जिम्मेदारी मां की

खून देख कर कोई भी विचलित हो सकता है. आमतौर पर यही माना जाता है कि चोट लगने पर ही खून बहता है, इसलिए जब कोई किशोरी मासिक के बारे में सही जानकारी से अनजान रहती है, तो उस का ऐसा पहला अनुभव डरा देने वाला होता है. ऐसे में उसे यह जानने की जरूरत है कि मासिकधर्म में रक्तस्राव मामूली बात है और हर लड़की इस प्रक्रिया से गुजरती है.

जयपुर के जनाना चिकित्सालय में स्त्रीरोग विशेषज्ञ, डाक्टर सावित्री गुप्ता कहती हैं, ‘‘शुरू में पीरियड्स के समय लड़कियां काफी तनाव से गुजरती हैं, क्योंकि उन्हें इस बारे में बिलकुल जानकारी नहीं होती या फिर आधीअधूरी होती है. लड़कियों को यह बताया जाना बेहद जरूरी है कि मासिकधर्म एकदम नौर्मल प्रक्रिया है.

‘‘इस दौरान वे सब काम करें जिन की शरीर इजाजत देता हो. किसी तरह की कोई रोकटोक नहीं होनी चाहिए. इस समय उन्हें भावनात्मक सहारे की बहुत ज्यादा जरूरत होती है और बतौर मां आप उस की सही मार्गदर्शक बनें. शुरूशुरू में पीरियड्स कुछ महीनों के गैप से हो सकते हैं, लेकिन यह नौर्मल है. बच्चों से इस बारे में खुल कर बातचीत करें.’’

मानसिक रूप से रहें तैयार

जो किशोरियां पहले से पीरियड्स के लिए तैयार रहती हैं, वे इस का सामना अच्छी तरह से कर लेती हैं. उन्हें ज्यादा घबराहट नहीं होती. लेकिन अध्ययन बताते हैं कि ज्यादातर लड़कियां इस के लिए बिलकुल तैयार नहीं रहतीं. पहले पीरियड्स को ले कर 23 देशों में की गई एक रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि जिन किशोरियों से सवाल पूछे गए थे, उन में से एकतिहाई किशोरियों का जवाब था कि उन्हें मासिकधर्म शुरू होने से पहले इस बारे में नहीं बताया गया था.

जयपुर में महिला एवं बाल विकास परियोजना से जुड़ी एक जनसंपर्क अधिकारी मंजू चौहान बताती हैं, ‘‘पीरियड्स के बारे में समाज में एक माइंडसैट बना हुआ है, जो युवावस्था की ओर बढ़ते हुए इन लड़कियों के कदमों को थाम लेता है. इन भ्रांतियों और बेकार के भ्रमों को दूर किया जाना जरूरी है. इसी संदर्भ में पिछले दिनों जयपुर के कई स्कूलों में किशोरियों को अवेयर करने के लिए डौक्यूमैंट्री का प्रदर्शन भी किया गया था, जिस में पीरियड्स से जुड़ी तमाम चीजों का जिक्र था.’’

हरी सब्जियों के अनूठे जायके : करेला विद चना दाल

करेला विद चना दाल

सामग्री

– 250 ग्राम मुलायम छोटे करेले

– 1/2 कप चना दाल

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

– 2 छोटे चम्मच धनिया पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच मिर्च पाउडर

– 1 छोटा चम्मच सौंफ पाउडर

– 1 छोटा चम्मच गरममसाला

– 1 तेजपत्ता

– 2 बड़ी इलायची

– 2 लौंग

– 4 कालीमिर्च

– 1 बड़ा चम्मच टोमैटो प्यूरी

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1/4 कप प्याज बारीक कटा

– 1 छोटा चम्मच अदरक व लहसुन पेस्ट

– रिफाइंड औयल

– थोड़ी सी धनियापत्ती कटी

– नमक स्वादानुसार.

विधि

करेलों को खुरच कर गोलगोल काट कर थोड़ा सा नमक व हलदी पाउडर लगा कर 1/2 घंटा रखें.

दाल को भी 1/2 घंटा भिगो दें.

करेलों को 1/2 घंटे बाद साफ पानी से धो कर तौलिए पर थपथपा लें. गरम तेल में डीप फ्राई कर लें.

एक प्रैशर पैन में 1 बड़ा चम्मच तेल गरम कर सभी खड़े मसालों का तड़का लगा कर दाल छौंक दें.

हल्दी पाउडर व नमक डालें. पानी दाल के बराबर ही डालें. 1 सीटी आने तक पकाएं. जब भाप निकल जाए तो प्रैशर पैन खोलें. दाल कम गली हो तो फिर गला लें.

सभी मसाले व टोमैटो प्यूरी भी डाल दें. जब दाल गल जाए तब उस में फ्राई किए करेले के टुकड़े मिला दें. 1 मिनट और आंच पर रखें.

फिर गरमगरम करेला दाल सर्विंग बाउल में पलटें. धनियापत्ती से सजा कर सर्व करें.

सैक्स लाइफ का रीचार्ज है जरूरी, कैसे हम बताते हैं

मायके आई अपनी ननद अभिलाषा का लटका चेहरा देख उस की भाभी ने पूछ ही लिया, ‘‘कुछ प्रौब्लम है क्या पवन के साथ?’’ अभिलाषा कुछ नहीं बोली. मगर अनुभवी भाभी ने जरा सा कुरेदा, उस की पलकें भीग गईं. अभिलाषा खुद को रोक नहीं पाई. फिर उस ने वही बताया जिस का भाभी को शक था.

अभिलाषा बोली, ‘‘अभी तो शादी को 2 ही साल हुए हैं… पवन को मेरे में जैसे कोई दिलचस्पी ही नहीं…बस कभी इच्छा हुई, तो मशीनी तरीके से सब निबटा कर सो जाता है… न रोमांस, न हंसीठिठोली.’’

पत्नियों की यह आम शिकायत है कि शादी के 2-3 साल तक तो पति उन पर डोरे डालते रहते हैं, लेकिन बाद में उन में दिलचस्पी लेना बंद कर देते हैं. ऐसे में पत्नियां खुद को उपेक्षित सा महसूस करने लगती हैं.

अलगअलग शिकायतें

सैकड़ों दंपतियों पर किए गए अध्ययन में पत्नियों की इस शिकायत की पुष्टि भी हुई है. अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि हनीमून फेज, जोकि इस अध्ययन के मुताबिक 3 साल 6 महीने का होता है, के समाप्त होते ही पति और पत्नी दोनों ही एकदूसरे को लुभाने की कोशिश छोड़ देते हैं. दोनों ही आकर्षक दिखने, एकदूसरे का खयाल रखने की अतिरिक्त कोशिशें छोड़ देते हैं. प्यार को नौर्मल बात समझते हैं.

एक ओर पत्नियां शिकायत करती हैं कि पति उन्हें पहले की तरह प्यार नहीं करते और उन के साथ सैक्स में भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते, तो दूसरी ओर पति भी ऐसी ही शिकायत करते हैं.

उन का मानना है कि पत्नियां भी शादी के बाद एकाध साल तो बड़ा ध्यान रखती हैं, मृदुभाषी रहती हैं, अपनी साजसज्जा, पहनावे पर खूब ध्यान देती हैं, छेड़छाड़ और ठिठोली वाली हरकतें करती हैं, लेकिन बाद में गंभीरता का लबादा ओढ़ लेती हैं. बातबात में मुंह फुलाती हैं. हर वक्त थकान, बीमारी, व्यस्तता के बहाने बनाती हैं. सैक्स में भी सहयोग न कर आनाकानी करती हैं. पतियों की इस शिकायत को हलके में नहीं लिया जा सकता.

अभिलाषा जैसी पत्नियों को समझना होगा कि हमेशा पति ही पत्नी में दिलचस्पी क्यों ले? पति ही सैक्स के लिए मनुहार या पहल क्यों करें? पति पत्नी से ऐक्टिव होने की उम्मीद क्यों न करें?

अगर आप अपने सैक्स संबंधों में पहले जैसी ऊष्मा बरकरार रखना चाहती हैं, तो गौर फरमाएं इन टिप्स पर:

खुद को करें पैंपर: याद है पहले आप अपनी आईब्रोज, नेल्स, लिप्स, अंडरआर्म्स, पीठ, स्किन, बालों और चेहरे का कितना ध्यान रखती थीं. हर सुबह कपड़े पहनने से पहले उन के चयन में कितनी देर लगाती थीं और अब लाल ब्लाउज के साथ हरी साड़ी, लिप्स पर जमी पपड़ी, अंडरआर्म्स से पसीने की बदबू और बिकिनी एरिया से हेयर रिमूव करने की फुरसत तक नहीं.

जरा सोच कर देखिए कमर पर जमी चरबी, पेट का तोंद बन जाना क्या सारी गलती पति की ही है? नहीं न? फिर देर किस बात की है. पैडीक्योर, मैनीक्योर, स्पा, फेशियल ये सब कब काम आएंगे? जिम, ऐक्सरसाइज आदि से खुद को फिर से तराशिए, हंसिए, मुसकराइए फिर देखिए कमाल.

लौंजरी मेकओवर है जरूरी: सैक्स लाइफ में बोरियत की सब से बड़ी वजह होती है आकर्षण में कमी. कई पत्नियां तो शादी के 2-4 साल बाद पैंटी तक पहनना छोड़ देती हैं. कुछ पहनती भी हैं, तो घिसीपिटी, बेरंग हो चुकी या मैली सी, जिसे देख कर शायद उबकाई भी आ जाए.

ऐसी पत्नियों की सोच यह होती है कि इसे कौन देखेगा. वे भूल क्यों जाती हैं कि जिसे दिखानी है उसी को तो इंप्रैस करना है. रोमांस में सराबोर हसबैंड जब आप पर लट्टू हो कर आगे बढ़ता है और अंतर्वस्त्रों की ऐसी हालत देखता है, तो यकीन मानिए उस का आधा रोमांस हवा हो जाता है.

बेहतर होगा कि थोड़े से पैसे खर्च कर के कुछ सैक्सी लौंजरी ले आएं. इस मेकओवर का क्या फर्क पड़ता है, यह फिर आप को अपनेआप समझ में आ जाएगा.

रोमांस का दें चांस: रोज वही बैडरूम, वही माहौल… इस एकरसता से सैक्स भी बोरिंग होने लगता है. पति के साथ साल में 1-2 बार घूमनेफिरने जाएं. कारोबारी व्यस्तता या बच्चों की पढ़ाई आदि की वजह से बाहर जाना संभव न हो तो शहर में ही वीकैंड पर घूमने जाएं. पार्क में घूमने जाएं, मल्टीप्लैक्स में मूवी देखने या किसी शौपिंग मौल में विंडो शौपिंग करने जाएं तो जरा सी फ्लर्टी बन जाएं.

आप का पति से चुहलबाजी करना, छेड़छाड़ और रोमांटिक इशारेबाजी करना पति को उत्तेजित करने के साथसाथ आप के आमंत्रण का इशारा भी देगा. फिर देखिए पति खुद पर नियंत्रण खो कर कैसे आप की बाहों में आने को बेताब हो उठेगा.

गैजेट्स से गुदगुदाएं: आजकल मोबाइल फोन या टैब बड़े काम के साबित हो रहे हैं. कभी इन का भी फायदा उठा कर देखें. छिप कर पति की किसी खास मुद्रा या बेपरवाह ढंग से बिस्तर पर पड़े हुए की तसवीर ले लें. फिर रात को दिखाएं.

पति घर के बाहर हो तो रोमांटिक एसएमएस या वहाट्सऐप पोस्ट भेजें. आप की इन गुदगुदाने वाली हरकतों से पति आप के साथ रोमांस करने के लिए व्याकुल हो जाएगा. रोमांस के क्षणों को जादुई टच देने के लिए बैडरूम में कोई सैक्सी या रोमांटिक गाना धीमी आवाज में लगा दें और फिर एकदूसरे में खो जाएं.

मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ अकसर सैक्स करती हूं, पर कभी डिस्चार्ज नहीं होती हूं. क्या मुझे कोई बीमारी है.

सवाल
मैं 21 वर्षीय युवती हूं. 1 साल से अपने बौयफ्रैंड के साथ लिवइन रिलेशनशिप में हूं. हम अकसर सैक्स करते हैं पर मैं कभी डिस्चार्ज नहीं होती हूं. क्या मुझे कोई बीमारी है. यदि हां तो उपचार बताएं? इस तरह तो भविष्य में मैं मां भी नहीं बन पाऊंगी.

जवाब
आप पूरी तरह से सामान्य हैं. आप को कोई शारीरिक बीमारी नहीं है, इसलिए किसी उपचार की आवश्यकता नहीं है. सैक्स की जानकारी न होने के कारण अधिकांश युवतियां इस सुखानुभूति से वंचित रहती हैं.

अपने मन से हर तरह का पूर्वाग्रह निकाल दें और जान लें कि सहवास में स्त्रीपुरुष दोनों को मन से सक्रिय होना होता है. तभी दोनों को सुखानुभूति होती है. रही भविष्य में मातृत्व सुख की बात तो स्पष्ट कर दें कि इस वजह से आप को मां बनने में बाधा नहीं आएगी.

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पहले मिलन को कुछ इस तरह से बनाएं यादगार

अगर आप अपने जीवनसाथी के साथ पहले मिलन को यादगार बनाना चाहती हैं तो आप को न केवल कुछ तैयारी करनी होंगी, बल्कि साथ ही रखना होगा कुछ बातों का भी ध्यान. तभी आप का पहला मिलन आप के जीवन का यादगार लमहा बन पाएगा.

करें खास तैयारी: पहले मिलन पर एकदूसरे को पूरी तरह खुश करने की करें खास तैयारी ताकि एकदूसरे को इंप्रैस किया जा सके.

डैकोरेशन हो खास: वह जगह जहां आप पहली बार एकदूसरे से शारीरिक रूप से मिलने वाले हैं, वहां का माहौल ऐसा होना चाहिए कि आप अपने संबंध को पूरी तरह ऐंजौय कर सकें.

कमरे में विशेष प्रकार के रंग और खुशबू का प्रयोग कीजिए. आप चाहें तो कमरे में ऐरोमैटिक फ्लोरिंग कैंडल्स से रोमानी माहौल बना सकती हैं. इस के अलावा कमरे में दोनों की पसंद का संगीत और धीमी रोशनी भी माहौल को खुशगवार बनाने में मदद करेगी. कमरे को आप रैड हार्टशेप्ड बैलूंस और रैड हार्टशेप्ड कुशंस से सजाएं. चाहें तो कमरे में सैक्सी पैंटिंग भी लगा सकती हैं.

फूलों से भी कमरे को सजा सकती हैं. इस सारी तैयारी से सैक्स हारमोन के स्राव को बढ़ाने में मदद मिलेगी और आप का पहला मिलन हमेशा के लिए आप की यादों में बस जाएगा.

सैल्फ ग्रूमिंग: पहले मिलन का दिन निश्चित हो जाने के बाद आप खुद की ग्रूमिंग पर भी ध्यान दें. खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करें. इस से न केवल आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि आप स्ट्रैस फ्री हो कर बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगी. पहले मिलन से पहले पर्सनल हाइजीन को भी महत्त्व दें ताकि आप को संबंध बनाते समय झिझक न हो और आप पहले मिलन को पूरी तरह ऐंजौय कर सकें.

प्यार भरा उपहार: पहले मिलन को यादगार बनाने के लिए आप एकदूसरे के लिए गिफ्ट भी खरीद सकते हैं. जो आप दोनों का पर्सनलाइज्ड फोटो फ्रेम, की रिंग या सैक्सी इनरवियर भी हो सकता है. ऐसा कर के आप माहौल को रोमांटिक और उत्तेजक बना सकती हैं.

खुल कर बात करें: पहले मिलन को रोमांचक और यादगार बनाने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करें. अपने पार्टनर से इस बारे में खुल कर बात करें. अपने मन में उठ रहे सवालों के हल पूछें. एकदूसरे की पसंदनापसंद पूछें. जितना हो सके पौजिटिव रहने की कोशिश करें.

सैक्स सुरक्षा: संबंध बनाने से पहले सैक्सुअल सुरक्षा की पूरी तैयारी कीजिए. सैक्सुअल प्लेजर को ऐंजौय करने से पहले सैक्स प्रीकौशंस पर ध्यान दें. आप का जीवनसाथी कंडोम का प्रयोग कर सकता है. इस से अनचाही प्रैगनैंसी का डर भी नहीं रहेगा और आप यौन रोगों से भी बच जाएंगी.

सैक्स के दौरान

 – सैक्सी पलों की शुरुआत सैक्सी फूड जैसे स्ट्राबैरी, अंगूर या चौकलेट से करें.

– ज्यादा इंतजार न कराएं.

– मिलन के दौरान कोई भी ऐसी बात न करें जो एकदूसरे का मूड खराब करे या एकदूसरे को आहत करे. इस दौरान वर्जिनिटी या पुरानी गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड के बारे में कोई बात न करें.

– संबंध के दौरान कल्पनाओं को एक तरफ रख दें. पोर्न मूवी की तुलना खुद से या पार्टनर से न करें और वास्तविकता के धरातल पर एकदूसरे को खुश करने की कोशिश करें.

– बैडरूम में बैड पर जाने से पहले अगर आप घर में या होटल के रूम में अकेली हों तो थोड़ी सी मस्ती, थोड़ी सी शरारत आप काउच पर भी कर सकती हैं. ऐसी शरारतों से पहले सैक्स का रोमांच और बढ़ जाएगा.

– सैक्स संबंध के दौरान उंगलियों से छेड़खानी करें. पार्टनर के शरीर के उत्तेजित करने वाले अंगों को सहलाएं और मिलन को चरमसीमा पर ले जा कर पहले मिलन को यादगार बनाएं.

– मिलन से पहले फोरप्ले करें. पार्टनर को किस करें. उस के खास अंगों पर आप की प्यार भरी छुअन सैक्स प्लेजर को बढ़ाने में मदद करेगी.

– सैक्स के दौरान सैक्सी टौक करें. चाहें तो सैक्सुअल फैंटेसीज का सहारा ले सकती हैं. ऐसा करने से आप दोनों सैक्स को ज्यादा ऐंजौय कर पाएंगे. लेकिन ध्यान रहे सैक्सुअल फैंटेसीज को पूरा के लिए पार्टनर पर दबाव न डालें.

– संयम रखें. यह पहले मिलन के दौरान सब से ज्यादा ध्यान रखने वाली बात है, क्योंकि पहले मिलन में किसी भी तरह की जल्दबाजी न केवल आप के लिए नुकसानदेह होगी, बल्कि आप की पहली सैक्स नाइट को भी खराब कर सकती है.

सैक्स के दौरान बातें करते हुए सहज रह कर संबंध बनाएं. तभी आप पहले मिलन को यादगार बना पाएंगे. संबंध के दौरान एकदूसरे के साथ आई कौंटैक्ट बनाएं. ऐसा करने से पार्टनर को लगेगा कि आप संबंध को ऐंजौय कर रहे हैं.

फन्ने खां : नकल में भी अकल की जरूरत होती है

‘अक्स’, ‘रंग दे बसंती’, ‘दिल्ली 6’, ‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘मिर्जिया’ जैसी फिल्मों के सर्जक राकेश ओमप्रकाश मेहरा बतौर निर्माता एक डैनिश फिल्म ‘‘एवरी बडी इज फैमस’’ का भारतीयकरण कर ‘फन्ने खां’ नामक फिल्म लेकर आए हैं. अब तक अपनी मौलिक कहानियों पर काम करते रहे राकेश ओमप्रकाश मेहरा ‘फन्ने खां’ बनाते समय भूल गए कि ‘नकल के लिए भी अकल’ चाहिए. फिल्म के लेखक व निर्देशक अतुल मांजरेकर ने भी साबित कर दिखाया कि वह कितनी वाहियात और बेसिर पैर की फिल्म निर्देशित कर सकते हैं.

फिल्म ‘‘फन्ने खां’’ की कहानी के केंद्र में गायकी में सुपर स्टार न बन पाने वाले प्रशांत शर्मा (अनिल कपूर) हैं, जो कि अपने दोस्तों के बीच फन्ने खां के नाम से मशहूर हैं. प्रशांत के दो भगवान हैं मोहम्मद रफी और शम्मी कपूर और उसके खास दोस्त अधीर (राज कुमार राव) हैं. एक औक्रेस्टा में गाते हुए प्रशांत शर्मा अपने सपनों को पूरा करने के लिए काफी मेहनत करते हैं. यहां तक कि सुपरस्टार बनने के लिए वह शम्मी कपूर की पूजा तक करते नजर आते हैं. उनकी एकमात्र तमन्ना स्टारडम पाना है.

प्रशांत की पत्नी कविता (दिव्या दत्ता) भी उनके सपने को सच करने की दिशा में उनके साथ रहती है. मगर प्रशांत के सपने पूरे नहीं हो पाते हैं. प्रशांत एक फैक्टरी में नौकरी करते हैं. जब उनकी बेटी का जन्म होता है, तो वह उसका नाम लता रखते हैं और अब वह अपने सपने को अपनी बेटी लता के माध्यम से पूरा होते देखना चाहते हैं. जैसे जैसे लता बड़ी होती है, वह संगीत व नृत्य में अपना कौशल दिखाने लगती है. वह अच्छा गाती है और अच्छा नृत्य भी करती है. मगर शारीरिक रूप से मोटी होने के कारण जब लता (पिहू सैंड) स्टेज पर पहुंचती है, तो लोग उसका मजाक उड़ाते हैं.

प्रशांत अपनी बेटी को सफल गायिका बनाने के लिए हर तरह के प्रयास करते हैं. इसी दौरान उनकी नौकरी चली जाती है तो वह टैक्सी चलाने लगते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान प्रशांत को अपनी बेटी लता से फटकार भी सुननी पड़ती है. जबकि अब मशहूर पौप गायिका बेबी सिंह (ऐश्वर्या राय बच्चन) के लोग दीवाने बन चुके हैं. पर बेबी सिंह का मैनेजर चाहता है कि रियालिटी शो में बेबी सिंह के साथ कुछ गलत हो जाए. उधर प्रशांत चाहते हैं कि किसी तरह उनकी बेटी लता के गाए गीतों का एक संगीत अलबम बाजार में आ जाए.

जब एक दिन मशहूर पौप गायिका बेबी सिंह, प्रशांत की टैक्सी में यात्रा करती है, तो प्रशांत के दिमाग में आता है कि यदि बेबी सिंह का अपहरण कर लिया जाए तो उसका काम आसान हो सकता है. वह अपने मित्र अधीर की मदद से बेबी सिंह का अपहरण कर लेते हैं. उसके बाद बेबी सिंह के मैनेजर कक्कड़ (गिरीष कुलकर्णी) को फोनकर फिरौती मांगते हैं, मगर फिरौती में रकम नहीं मांगते. उसके बाद कहानी कई उतार चढ़ाव से गुजरती है.

एक सफल विदेशी फिल्म का भारतीयकरण करते समय लेखक व निर्देशक ने काफी गलतियां की हैं. मूल फिल्म ‘एवरी बडी इज फैमस’’ एक डार्क कौमेडी वाली छोटी फिल्म थी, जबकि ‘फन्ने खां’ मेलोड्रामैटिक और काफी लंबी फिल्म है. फिल्म का क्लायमेक्स सहित बहुत कुछ अविश्वसनीय लगता है. कहानी का ढांचा सही ढंग से बुना ही नहीं गया. एक संवेदनशील व बेहतरीन मुद्दे वाली फिल्म का हश्र ‘थोथा चना बाजे घना’ वाला हो गया.

कथानक के स्तर पर कहीं कोई गहराई नहीं है. लता का अपने पिता के खिलाफ शिकायत करते रहने की बात समझ में नहीं आती. ऐश्वर्या राय बच्चन अभिनीत बेबी सिंह का किरदार भी ठीक से गढ़ा नहीं गया. मजेदार बात यह है कि इंटरवल से पहले भी फिल्म वाहियात है, मगर इंटरवल के बाद तो यह फिल्म और अधिक वाहियात हो गयी है.

निर्देशक के तौर पर अतुल मांजरेकर अफसल रहे हैं. फिल्म के मूल कथानक से ही वह भटक गए हैं. काश राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह फिल्म अतुल मांजरेकर की बनिस्बत किसी समझदार निर्देशक को सौंपी होती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक भी कलाकार अपने अभिनय से प्रभावित नहीं करता. कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के चलते अनिल कपूर व राज कुमार राव जैसे बेहतरीन कलाकार भी फिल्म को डूबने से नहीं बचा सकते. राज कुमार राव व अनिल कपूर दोस्त हैं, मगर परदे पर इनकी केमिस्ट्री नजर ही नहीं आती. कैमरामैन तिरू की प्रशंसा की जा सकती है.

‘‘फन्ने खां’’ एक संगीत प्रधान फिल्म है. मगर संगीतकार अमित त्रिवेदी बुरी तरह से निराश करते हैं.

दो घंटे नौ मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘फन्ने खां’’ का निर्माण राकेश ओमप्रकाश मेहरा, अनिल कपूर, टीसीरीज, निशांत पिट्टी, वीरेंद्र अरोड़ा ने किया है. फिल्म के निर्देशक अतुल मांजरेकर, पटकथा लेखक अतुल मांजरेकर, हुसेन दलाल, अब्बास दलाल, संवाद लेखक हुसेन दलाल, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन तिरू तथा फिल्म के कलाकार हैं – अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय बच्चन, राज कुमार राव, पिहू सैंड, दिव्या दत्ता, करण सिंह छाबरा, अनैयथा नायर, गिरीष कुलकर्णी, स्वाती सेमवाल व अन्य.

7 बेहतरीन तरीके स्मार्टफोन और आईफोन में स्क्रीनशौट लेने के

स्क्रीनशौट का नाम सुना होगा. नाम से ही साफ है कि जो भी स्क्रीन पर दिख रहा है उसे कैप्चर कर लेना और सेव करके रखना या किसी को भेजना है. कई बार हमे फोन में स्क्रीनशौट लेने की जरूरत पड़ती है. कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि अपने मोबाइल में स्क्रीनशौट कैसे लें. आइए हम आपको स्मार्टफोन में स्क्रीनशौट लेने के 7 बेहतरीन तरीके बताते हैं.

एंड्रायड फोन में स्क्रीनशौट लेने के तरीके

  • पहला तरीका होम बटन और पावर को एक साथ दबाकर स्क्रीनशौट लेने का है.
  • दूसरा तरीका यह है कि वाल्यूम डाउन बटन और पावर बटन को एक साथ दबाकर रखें.
  • इसके अलावा शाओमी जैसी कंपनियों के मोबाइल में स्क्रीनशौट के लिए एक अलग से बटन दिया गया है. इसके लिए जिस स्क्रीन का शौट लेना चाहते हैं उसी पर रहते हुए ऊपर से नोटिफिकेशन बार को नीचे की ओर स्क्रौल करें और स्क्रीनशौट वाले बटन को दबाएं. ये सारे फोटोज फोन की गैलरी के फोल्डर में स्क्रीनशौट के नाम से एक फोल्डर में सेव होंगे.
  • वहीं अधिकतर फ्रिंगरप्रिंट वाले फोन में तीन उंगलियों को एक साथ ऊपर से नीचे की ओर करके स्क्रीनशौट लिया जा सकता है, हालांकि इसके लिए जरूरी है कि फिंगरप्रिंट फीचर औन हो.
  • इसके अलावा आप फोन में मौजूद Google Assistant से भी स्क्रीनशौट लेने के लिए बोल सकते हैं. इसके लिए पहले ओके गूगल बोलें, फिर टेक ए स्क्रीनशौट बोले. अब गूगल असिस्टेंट स्क्रीनशौट लेकर उसे शेयर करने के लिए पूछेगा. आप चाहें तो शेयर करें या फिर सेव कर लें.
  • वहीं विंडोज फोन में स्क्रीनशौट लेने के लिए भी होम बटन और पावर बटन को एक साथ दबाएं, हालांकि विंडोज 8 ओएस वाले फोन में ही स्क्रीनशौट लिए जा सकते हैं. इससे नीचे के ओएस पर यह फीचर काम नहीं करेगा.
  • आईफोन में भी एंड्रायड फोन की तरह की स्क्रीनशौट लिए जा सकते हैं. इसके लिए होम बटन और पावर बटन को एक साथ दबाएं. उसके बाद अब अपने फोन के फोटोरोल फोल्डर में स्क्रीन शौट चेक करें.
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