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भारतीय विमानन क्षेत्र का डंका

यह चिंताजनक बात है कि देश में हवाईसेवा उपलब्ध कराने वाली सरकार की सब से पुरानी एयरलाइन एयर इंडिया 48 हजार करोड़ रुपए के घाटे में चल रही है. नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु ने कह दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की यह विमानन कंपनी काफी घाटे में चल रही है और इस को लाभ में लाने की संभावना न के बराबर है. दूसरी बड़ी निजी विमानन कंपनी जेट एयरवेज की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है और उस का निदेशक मंडल भी इस से निबटने पर माथापच्ची कर रहा है.

एशिया क्षेत्र में भारतीय विमानन क्षेत्र तेजी से प्रगति कर रहा है. मई में भारतीय विमानन क्षेत्र की प्रगति एशिया में सर्वाधिक 13.3 प्रतिशत आंकी गई जबकि चीन की हवाई यात्रा 8.3 प्रतिशत के साथ दूसरे और 8.1 प्रतिशत के साथ दक्षिण कोरिया तीसरे स्थान पर रहा. इन सब वास्तविकताओं के बावजूद इस दौरान जापान की दर में 2.8 प्रतिशत और आस्ट्रेलिया में 2.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

विमानन क्षेत्र में भारत की वृद्धि की वजह मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिति में सुधार बताया गया है. इस के अलावा भारत सरकार हवाई यातायात को बढ़ाने के लिए उड़ान जैसी कई योजनाएं भी चला रही है. सरकार ने कई इलाकों में बेकार पड़े विमानन केंद्रों को संचालित करना शुरू किया है. किफायती किराया दूसरी बड़ी वजह है. रेल के किराए और प्लेन के किराए में जब अंतर बराबरी का हो तो लोग समय की बचत तथा यात्रा में सहूलियत के लिए स्वाभाविक रूप से हवाईयात्रा का विकल्प चुनते हैं. भारत में यही हो रहा है जिस के कारण मध्यवर्ग का व्यक्ति हवाईयात्रा का सपना देखने लगा है. उम्मीद की जानी चाहिए यह सपना और अच्छी तरह से साकार हो.

मनोरंजन का नया क्रेज ‘वीडियो स्ट्रीमिंग’

नैटफिल्क्स पर प्रसारित वैब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ इन दिनों सुर्खियों में है. यह जुलाई में रिलीज हुई. इस की लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि सोशल मीडिया पर चारों तरफ इसी के चर्चे हो रहे हैं. सेके्रड गेम्स विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर आधारित है. इस सीरीज को अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाले ने डाइरैक्ट किया है. इस गैंगस्टर थ्रिलर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे और सैफ अली खान मुख्य भूमिका निभा रहे हैं.

इन दिनों बौलीवुड में तो बायोपिक की बारिश हो रही है, लेकिन अब यह ट्रैंड डिजिटल इंटरटेनमैंट प्लेटफौर्म में भी देखने को मिल रहा है. सनी लियोनी की बायोपिक की सीरीज का पहला सीजन ‘करनजीत कौर : द अनटोल्ड स्टोरी औफ सनी लियोनी’ जी-5 पर आ चुका है. और दूसरा सीजन औनएयर होने के लिए तैयार है.

सुपरहिट फिल्म ‘बाहुबली’ के दोनों पार्ट्स ने देशविदेश में जम कर कमाई की. इस की कहानी और कलाकार दोनों को काफी पसंद किया गया. लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि बाहुबली की कहानी जहां से शुरू होती है, उस से पहले क्या हुआ था. अब यह स्पिन औफ नैटफ्लिक्स पर आने वाले बाहुबली के 2 सीजन में वैब सीरीज के जरिए दिखाया जाएगा.

दरअसल, नैटफ्लिक्स ने एक करार किया है, जिस के तहत वह ‘द राइज औफ शिवगामी’ नौवेल की कहानी को वैब सीरीज में दिखाएगा. यह 2015 में आया बाहुबली का प्रीक्वल है. एस एस राजामौली निर्देशित बाहुबली के 2 पार्ट्स ‘बाहुबली द बिगिनिंग’ और ‘बाहुबली द कन्क्लूजन’ में जो कहानी चलती है, उस से पहले की कहानी को शिवगामी यानी राजमाता को आधार बना कर लिखा गया है. नैटफ्लिक्स बाहुबली के पहले सीजन में 9 एपिसोड्स दिखाएगा. इस में बताया जाएगा कि एक पूरा शहर कैसे साम्राज्य में तबदील हुआ. इस के बाद इस का दूसरा पार्ट भी रिलीज होगा.

डिजिटल इंटरटेनमैंट

ये न फिल्में हैं न सीरियल, ये सब वैब सीरीज या वीडियो स्ट्रीमिंग डिजिटल इंटरटेनमैंट की मिसालें हैं जो दर्शकों, खासकर युवाओं का नया क्रेज है. आजकल आप को ज्यादातर नौजवान इयरफोन लगा कर वीडियो देखते हुए जरूर दिखते होंगे. आप को लगता होगा कि वे कोई फिल्म देख रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. वे फिल्म नहीं, वैब सीरीज देख रहे होते हैं. आज वैब सीरीज एंटरटेनमैंट के एक नए माध्यम के रूप में सामने आया है.

बड़े परदे पर फिल्म, छोटे परदे पर सीरियल और उस से छोटी स्क्रीन मतलब मोबाइल और लैपटौप पर फनी वीडियो देखे जाते हैं. जिन्हें वीडियो स्ट्रीमिंग भी कहा जाता है. वैसे, वीडियो स्ट्रीमिंग क्या होता है? आप यूट्यूब देखते हों या हौटस्टार या फिर आप ने अमेजन प्राइम देखा होगा, इन दिनों नैटफ्लिक्स का नाम तो सुन ही रहे होंगे. जी हां, यही सब वीडियो स्ट्रीमिंग कहलाते हैं.

अब आप के मन में एक सवाल उठ रहा होगा कि फिल्में तो सिनेमाघर से कमाई करती हैं. टीवी सीरियल्स विज्ञापन से कमाई करते हैं लेकिन ये वीडियो स्ट्रीमिंग कहलाने वाले सभी प्लेटफौर्म्स कमाई कैसे करते होंगे, तो इस का सीधा फंडा है कि हमें इन सभी प्लेटफौर्म्स पर सब्सक्रिप्शन लेना होता है. वैसे यूजर चाहे तो कुछेक प्लेटफौर्म्स का सब्सक्रिप्शन नहीं भी ले सकता है, लेकिन फिर उसे वीडियो के बीच में ऐड देखने पड़ते हैं.

यह है भी बिलकुल आसान और पोर्टेबल. अपने स्मार्टफोन पर ऐप डाउनलोड कीजिए और अपने लिए सब्सक्रिप्शन लीजिए. इसे सब्सक्रिप्शन कहिए या यों कहिए कि आप ने बिना किसी ऐड ब्रेक और सैंसर कट के फिल्म देखने के लिए अमुक कंपनी को एडवांस किराया दे दिया. लोग नैटफ्लिक्स के लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग का आनंद ले रहे हैं.

हम आज तक किसी फिल्म या नाटक को या तो अपने टीवी में देखते थे या सिनेमाहौल में या फिर सीडी, डीवीडी में. लेकिन अब इन के अलावा एक और तरीके से हम फिल्म सीरियल वगैरह देख सकते हैं. वह तरीका दिया है इंटरनैट ने. तरीके का नाम है वीडियो स्ट्रीमिंग. आज के समय में इन्हें वैब टैलीविजन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इन में एक कहानी को 5-10 एपिसोड में दिखाया जाता है और ये एपिसोड 15 से 45 मिनट के ही होते हैं, जिस वजह से उबाऊ भी नहीं लगते.

सिनेमा, टीवी बनाम डिजिटल

भारत में मनोरंजन की होड़ खासी दिलचस्प होती जा रही है. मुकाबला जारी है. मनोरंजन के 3 ्रप्रमुख माध्यमों सिनेमा, टीवी और नए उभरे डिजिटल में कांटे की टक्कर चल रही है. 8वें दशक में यह सवाल उठता था क्या टीवी या बुद्धूबक्सा सिनेमा को खा जाएगा? आज फिर सवाल उठ रहा है क्या डिजिटल टीवी को लील जाएगा? आखिर क्या है हकीकत?

फिक्की अंर्स्ट ऐंड यंग की मीडिया ऐंड एंटरटेनमैंट 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत यूएसए को पीछे छोड़ कर दूसरा सब से बड़ा स्मार्टफोन उपभोक्ता देश बन चुका है. पहला नंबर चीन का है. भारत में 50 करोड़ से ज्यादा इंटरनैटधारियों की औनलाइन सेना 2020 तक दुनिया का नंबर 2 औनलाइन वीडियो दर्शक बाजार बनने जा रहा है.

रिपोेर्ट के मुताबिक, टीवी माध्यम आज भी भारत में मनोरंजन क्षेत्र का निर्विवाद लीडर है. लेकिन, दिलचस्प तथ्य यह है कि बीते 2 और आगामी 3 सालों में सब से तेज विकास करने वाला माध्यम टीवी नहीं, डिजिटल मीडिया है. जिस की इन 5 सालों में तरक्की की गति 24.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है. इस से भी ज्यादा रोचक बात यह है कि मनोरंजन के क्षेत्र में डिजिटल माध्यम भारत के सब से चहेते मनोरंजन माध्यम सिनेमा को 2020 तक ओवरटेक करने वाला है.

रिपोर्ट के अनुसार, जिस गति से डिजिटल माध्यम तरक्की कर रहा है, सिनेमा उद्योग के 19 हजार 200 करोड़ रुपए के आंकड़े के मुकाबले 2020 में उस की संभावित कमाई 22 हजार 440 करोड़ रुपए होगी. 8वें दशक में आया टीवी समाज के लिए सिनेमा के मुकाबले ज्यादा नया माध्यम है. मगर पारिवारिक मनोरंजन का माध्यम होने के कारण मध्यवर्ग का चहेता माध्यम बन गया.

बार्क की ताजा रपट के मुताबिक, देश के 29.8 करोड़ घरों में से 19.7 घरों में वह पहुंच चुका है. इन परिवारों के 83 करोड़ दर्शक आज भी उस के कब्जे में हैं. यह आंकड़ा डिजिटल टीवी के लिए सपने की तरह है. इस के बावजूद वह सैचुरेशन से बहुत दूर है. इसलिए उस की विकास यात्रा ऐसे ही चलती रहेगी, इस का उसे विश्वास है.

आज भारत में मनोरंजन का परिदृश्य दिलचस्प होता जा रहा है. जियो ने बाजार के 44 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा जमा लिया है. भारत में मोबाइल कनैक्शन की संख्या मानवीय संख्या के बराबर पहुंचती जा रही है. 2015 के अक्तूबर में यह आंकड़ा 100 करोड़ के जादुई नंबर को पार कर चुका था.

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 50 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं. फिक्की अंर्स्ट ऐंड यंग की मीडिया ऐंड एंटरटेनमैंट 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, यही 50 करोड़ उपभोक्ता भारत को जल्दी औनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग का सब से बड़ा बाजार बना देंगे.

इस तरह डिजिटल सिनेमा और टीवी दोनों के लिए खतरा है. मगर, टीवी के लिए खतरा ज्यादा  है. सिनेमा की ताकत अलग है. टीवी इस बात को पहचान चुका है. वह डिजिटल से प्रतिद्वंद्विता मोल लेने के बजाय तालमेल कर के चलना चाहता है.

नैटफ्लिक्स का आगाज

शहरों पर केबल टीवी वालों का कब्जा हो गया. उस के बाद तेजी से टीवी देखने का  कौन्सैप्ट बदला और अब भी बदल रहा है.

नैटफ्लिक्स दुनिया की टौप वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विस है, जिस में आप अपने स्मार्टफोन से ले कर स्मार्ट टीवी तक की स्क्रीन पर कंटैंट देख सकते हैं. ओरिजिनल वैब कंटैंट को नैटफ्लिक्स में क्रिएट किया जाता हैं, जिन में से अधिकांश अब  हाई रिजोल्यूशन वाले अल्ट्रा एचडी में उपलब्ध हैं.

नैटफ्लिक्स लगभग 20 वर्षों पहले जब शुरू हुआ, तो यह एक सब्सक्रिप्शन बेस्ड डीवीडी सर्विस था जो आप के घर में सीधे डीवीडी मेल करता था. यह अभी भी ऐसा ही करता है, लेकिन 2007 में नैटफ्लिक्स ने इस की स्ट्रीमिंग सर्विस शुरू की, जिस के बाद दर्शकों को हजारों औन डिमांड टीवी शो और फिल्मों को विज्ञापनमुक्त देखने की इजाजत मिल गई. 10 वर्षों बाद, नैटफ्लिक्स मनोरंजन में सब से बड़े नामों में शुमार हो गया. इस का बेस लौस गैटोस, कैलिफोेर्निया में है और भारत सहित दुनियाभर के 40 देशों में यह औपरेट होता है. इस की सर्विसेस औन डिमांड आधार पर प्रदान की जाती हैं, जिस का अर्थ है कि लोग जिस की मांग करते हैं, उन्हें वह कंटैंट उपलब्ध होता है. ये सर्विसेस फ्लैट रेट पर मुहैया कराई जाती हैं.

औनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग

भारत में तकरीबन 30 कंपनियां हैं जिन में मुख्यतया नैटफ्लिक्स, अमेजन, हौटस्टार, वायकौम हैं जो अभी देश में वीडियो गेम्स और खेल संबंधित कंटैंट लोगों को उपलब्ध करवा रही हैं. अब एक और कंपनी शीमारू एंटरटेनमैंट लिमिटेड ने भी इस मैदान में उतरने का मन बना लिया है. इस कंपनी के पास लगभग 3,500 भारतीय फिल्मों का जखीरा है और वह इसे सालाना 3-5 फीसदी की दर से बढ़ाते हुए कई औनलाइन प्लेटफौर्म्स से लाइसैंस फीस ले कर इस के जरिए कमाई करना चाहती है. इन सब कंपनियों में से नैटफिल्क्स के पास सब से ज्यादा ग्राहक हैं. दुनियाभर में 12 करोड़ ग्राहकों वाली कंपनी नैटफिल्क्स ने 31 दिसंबर, 2017 तक लगभग 50 लाख ग्राहक बना लिए हैं. रीड हेस्टिंग्स का मानना है कि भारत 10 करोड़ वीडियो कंटैंट देखने वाले ग्राहकों का बाजार बन सकता है.

भारत में औनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग का बाजार जल्द ही बदलने वाला है. समय आ गया है कि वीडियो कंटैंट और गेमिंग एप्लीकेशंस आप की और हमारी जिंदगी में भीतर तक प्रवेश कर जाएंगी. अंर्स्ट ऐंड यंग की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2016 के मुकाबले साल 2017 में भारत में मीडिया और एंटरटेनमैंट का बाजार 13 फीसदी की बढ़त के साथ डेढ़ लाख करोड़ का हो गया.

यूट्यूब ओरिजिनल बनाम नैटफ्लिक्स-अमेजन

अब तक भारत में फ्री में फिल्म और गानों का कोई डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफौर्म रहा है तो वह है यूट्यूब. बिना किसी सब्सक्रिप्शन चार्जेज के यहां 50-60 के दशक से ले कर आज तक हर भाषा में देश का सिनेमा, शौर्ट फिल्में और सीरियल्स फ्री में उपलब्ध होते रहे हैं.

ऐसे में जब नैटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम वीडियो जैसे ब्रैंड आ गए हैं तो उन्हें टक्कर देने और अपनी पुरानी दर्शक संख्या बरकरार रखने के लिए यूट्यूब कमर कस चुका है. इस क्रम में यूट्यूब फ्रांस, जरमनी, जापान और मैक्सिको के अलावा भारत में भी अपने ओरिजिनल प्रोग्रामिंग, ‘यूट्यूब ओरिजिनल’ सर्विस को लौंच करने की प्लानिंग कर रही है. इस के जरिए यूट्यूब यूजर्स को अपनी पेड सब्सिक्रप्शन सर्विस की तरफ आकर्षित करेगा.

दिलचस्प बात यह है कि यूट्यूब बाकी वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनियों की तरह महज फिल्म, सीरियल ब्रौडकास्टिंग तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि उस की ओरिजिनल प्रोग्रामिंग में टौक शो, स्क्रिप्टिड सीरीज, रिऐलिटी सीरीज, म्यूजिकल डौक्युमैंट्री शोज आदि भी शामिल होंगे.

यूट्यूब के लिए ओरिजिनल प्रोग्रामिंग के ग्लोबल हेड सुजाने डैनियल्स के मुताबिक, ‘‘ज्यादातर रीजनल प्रोग्राम भाषाओं में बनाए जाएंगे और सबटाइटल्स भी रखे जाएंगे. साथ ही यूट्यूब सभी कंटैंट को यूट्यूब प्रीमियम के लिए नहीं लाएगा. इस के बजाय इस में से कुछ ही कंटैंट यूट्यूब प्रीमियम पर होंगे जबकि बाकी ऐड के साथ यूट्यूब पर फ्री में उपलब्ध होंगे.’’

फिलहाल वह साउथ कोरिया में कई ओरिजिनल कार्यक्रम और भारत में एक हिंदी टौक शो अनक्रिकेट रिलीज कर चुका है. जाहिर है यूट्यूब का यह प्लानपेपर अमेजन प्राइम वीडियो और नैटफ्लिक्स को चुनौती देगा.

स्मार्टफोन की भूमिका अहम

भारत में स्मार्टफोन की क्रांति इस के पीछे एक अहम कारण है. आज भारत का स्मार्टफोन बाजार दुनिया में दूसरे नंबर पर आ गया है.

जानकारों का मानना है कि इस साल देशभर में लगभग 50 करोड़ ग्राहक इंटरनैट से जुड़ जाएंगे और इस में स्मार्टफोन सब से बड़ा कारक है. दुनियाभर में लोग पढ़ने की अपेक्षा वीडियो देखने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं. जाहिर है कि ऐसे माहौल में भारत वीडियो सर्फिंग और गेमिंग एक बड़ा बाजार बन जाएगा. तीसरा अहम कारण है कि भारत के देशी कंटैंट का अब इंटरनैट पर उपलब्ध  होना. भारतीय भाषाओं में कंटैंट की उपलब्धता ने मीडिया और एंटरटेनमैंट के बाजार में इजाफा किया है.

इंटरनैट प्रोवाइडर्स की औफरबाजी

वीडियो स्ट्रीमिंग का बाजार सिर्फ इंटरनैट पर ही निर्भर है. बिना इस के इन का कोई अस्तित्व नहीं है. जाहिर है भारत में इंटरनैट प्रोवाइड करने वाली ज्यादातर टैलीकौम कंपनियां अलगअलग प्लान्स पर पैकेज देती हैं. जियो के आने के बाद इंटरनैट पैकेज का सारा गणित बदला और अनलिमिटेड डाटा कम से कम दामों में उपभोक्ताओं को मिलने लगा. इस बात की तसदीक ऐसे भी होती है कि एक समय नैटफ्लिक्स ने भारत में आने से इनकार कर दिया था लेकिन कुछ सालों बाद जब जियो की सर्विस भारत में लौंच हुई तो इस के अधिकारियों ने जियो को धन्यवाद दिया.

अब जब नैटफ्लिक्स, अमेजन, वीवू, सोनी लिव, एएलटी बालाजी जैसी स्ट्रीमिंग फर्म्स मार्केट में मौजूद हैं तो इस का फायदा इंटरनैट प्रोवाइडर कंपनियां भी उठाती दिख रही हैं. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब एयरटेल ने अपने पोस्टपेड यूजर के लिए एक औफर के तहत नैटफ्लिक्स की फ्री मैंबरशिप दी थी. इस के लिए एयरटेल ने बाकायदा नैटफ्लिक्स के साथ पार्टनरशिप की.

भारती एयरटेल के सीईओ ने भी यह स्वीकार किया था कि यह पार्टनरशिप कंपनी की मुख्य रणनीति का ही एक हिस्सा है. हाई स्पीड डेटा सर्विस और बढ़ते स्मार्ट डिवाइस अंतर्राष्ट्रीय व स्थानीय दोनों स्तर पर नए अवसर पैदा कर रहे हैं और वे इस का पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार हैं.

कुछ महीनों की फ्री मैंबरशिप का यह आइडिया अगर चल निकला तो बाकी कंपनियां भी अन्य स्ट्रीमिंग साइट्स के साथ नएनए करार करेंगी.

क्यों है क्रेज

वैब सीरीज में खास यह है कि यहां ब्रेक का झंझट नहीं है. वैब सीरीज को तुगलकी सैंसरशिप से नहीं जूझना पड़ता, न ही सैंसर बोर्ड से पास होने का इंतजार करना पड़ता है. उस में आप अपनी रचनात्मकता खुल कर दिखा सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि इस में केवल वही कलाकार काम कर रहे हैं जिन्हें बौलीवुड में मौका नहीं मिल रहा है, सितारों को भी अब समझ आ गया है कि यह भविष्य की विधा है, इसलिए कई बड़े स्टार भी काम करने लगे हैं. ‘सेके्रड गेम्स’ को ही लीजिए, इस में सैफ अली खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी व राधिका आप्टे हैं. इस में कई बौलीवुड स्टार भी काम कर चुके हैं, जिन में कल्की कोचलिन, स्वरा भास्कर, करणवीर मेहरा, परिणीति चोपड़ा, कुणाल कपूर, भूमि पेडणेकर, रिचा चड्ढा, रिया चक्रवर्ती, अली फजल और आर माधवन जैसे कलाकार शामिल हैं.

अब तो फिल्मों के डाइरैक्टर भी वैब सीरीज में आ रहे हैं. अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ को भी वैब सीरीज मेें तबदील कर अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाया जा रहा है, जिसे खुद अनुराग कश्यप ने 8 हिस्सों की एक वैब सीरीज का फैलाव दिया है. टैलीविजन की महारानी एकता कपूर भी एक वैब सीरीज ले कर आई हैं, जिस में फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ स्टार निम्रत कौर हैं. साथ ही, ‘बाजीराव मस्तानी’ का निर्माण करने वाला स्टूडियो इरोस नाउ एकसाथ तकरीबन 6 वैब सीरीज पर काम कर रहा है. यही नहीं, देश के सब से बड़े फिल्म निर्माताओं में से एक यशराज फिल्म्स अपनी एक निर्माण शाखा  वाय फिल्म्स के माध्यम से वैब सीरीज बना रहे हैं.

नैटफ्लिक्स ने देश में कई गेम्स सीरीज शुरू करने की घोषणा की है. इस की पहली कड़ी में वह एक भारतीय कंपनी के साथ बौलीवुड अभिनेता सैफ अली खान को ले कर भारत के धार्मिक पात्रों पर आधारित एक गेम बनाने जा रही है.

भारत में मौजूद वीडियो औन डिमांड प्लेयर्स जैसे हौटस्टार, नैटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम वीडियो ने हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल कंटैंट बनाने में भारी पैसा लगाया है.

वीडियो औन डिमांड या ओटीटी प्रोवाइडर्स और प्रोडक्शन हाउस की डिमांड बढ़ने की वजह से टीवी ब्रौडकास्टर्स ने अपना डिजिटल मीडिया प्लेटफौर्म शुरू कर दिया है. इस में हौटस्टार, डिट्टो टीवी, ओजी, वूट, सोनीलिव शामिल हैं. इस के अलावा, इरोज और बालाजी भी डिजिटल मीडिया में कूद पड़े हैं.  बालाजी ने हाल में ही में बालाजी एएलटी शुरू किया है. जी 5 ने डिजिटल प्लेटफौर्म पर एंटरटेनमैंट से जुड़ी मूल सामग्री पेश करने के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है. इस के साथ ही जी 5 भारत में सब से बड़ा कंटैट हब बन गया है. जी 5 ओरिजिनल पर करीब 20 ऐसे कंटैट पेश किए जाएंगे जो इस की खास प्रस्तुति रहेगी जो ऐक्शन, सस्पैंस, थ्रिलर, बायोपिक और कौमेडी से भरपूर होगी. खास बात यह है कि इन सभी को करीब 6 भाषाओं में प्रस्तुत किया जाएगा.

पायरेसी और इंटरनैट स्पीड बिगाड़ रही है खेल

भले ही नैटफ्लिक्स दुनियाभर में डिमांडिंग ब्रैंड माना जाता हो और ताबड़तोड़ कमाई कर रहा हो लेकिन भारत में इस की राह आसान नहीं है. इस के पीछे असली कारण है पैसा. विदेशों में लोग कोई भी कंटैंट या सर्विस मुफ्त में लेना पसंद नहीं करते जबकि अपने यहां मुफ्त में खाने का चलन है. इसलिए आज पत्रिका खरीदने से बचने वाली जेनरेशन फ्री ईबुक्स और वीडियो जम कर देखती है. जाहिर है नैटफ्लिक्स और अन्य स्ट्रीमिंग सर्विस कंपनियों का कंटैट भी इंडिया में फ्री में ज्यादा देखा जा रहा है, वह भी पायरेसी के जरिए.

दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में चले जाइए. वहां मोबाइल की दुकानों के आगे लैपटौप लिए बैठे लड़के नैटफ्लिक्स और अमेजन की हर सीरीज के सारे सीजन पैनड्राइव में मात्र 10 रुपए में दे रहे हैं. बाद में ये कंटैंट दोस्तयारों से होता हुआ सब जगह  फ्री में शेयर होता रहता है.

दूसरी वजह इंटरनैट सेवाओं की स्पीड भी है.  अमेरिका और अन्य कई देशों की तुलना में यहां यह स्पीड  बहुत ही कम है तथा 4जी की आमद के बावजूद इस में बहुत जल्दी किसी बेहतरी की संभावना नहीं दिखाई देती है. जबकि नैटफ्लिक्स ने साफ कहा है कि इस में मूवीज देखने के लिए कम से कम 5 एमबीपीएस के कनैक्शन की दरकार है.

टैलीकौम टौक के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 45  फीसदी इंटरनैट यूजर्स के पास 1 से 3 एमबी प्रति सैकंड की स्पीड का कनैक्शन है. 30 फीसदी यूजर्स एक एमबी प्रति सैकंड से कम स्पीड वाले कनैक्शन से काम चलाते हैं और 50 एमबी प्रति सैकंड से अधिक स्पीड के कनैक्शन रखने वालों की संख्या एक फीसदी से भी कम है.

सामान्यतया नैटफ्लिक्स की हाई डैफिनीशन सेवाओं का समुचित ढंग से आनंद उठाने के लिए उपभोक्ता के पास 8 एमबी प्रति सैकंड स्पीड का कनैक्शन और 100 जीबी प्रतिमाह का डाटा  होना चाहिए. ऐसे कनैक्शन के लिए 2 हजार रुपए से अधिक शुल्क की सेवाएं लेनी होंगी. इस सेवा के लिए नैटफ्लिक्स की दरें भी अधिक हैं.

भारत में डीटीएच का व्यापक प्रसार है. ऐसे में इन तमाम कठिन प्रतिस्पर्धाओं से नैटफ्लिक्स को जूझना होगा.

-साथ में राजेश कुमार

कहीं आपका फोन खराब तो नहीं होने वाला

आपको कब पता चलेगा की आपका फोन खराब हो रहा है? उसे बदलने की जरूरत है या फिर आपको उसे समय रहते रिपेयर करवा लेना चाहिए. हम आपको बताने जा रहे हैं वो संकेत जिनसे पता चलता है कि आपका फोन खराब होने लगा है. कौन से हैं वो बदलाव….

1. टच स्क्रीन हो गई स्लो

अगर टच स्क्रीन में एक दो टैप करने के बाद रिसपॉन्स मिल रहा है तो आपका डिस्प्ले खराब हो रहा है.

क्यों है जरूरी

डिस्प्ले खराब हो जाए या टच स्क्रीन रिस्पॉन्ड ना करे तो फोन में ओरिजनल स्क्रीन लगवाने में कम से कम 2 से 3 हजार का खर्च आएगा.

2. ऐप हो रहे हैं बंद

अगर आप किसी ऐप पर काम कर रहे हैं और वो बार-बार बंद हो जाए और आप होम स्क्रीन पर आ जाएं.

क्यों है जरूरी

अगर ऐसा हो रहा है तो आपके फोन में वायरस हो सकता है. इसके अलावा, फोन का हार्डवेयर खराब होने का भी ये संकेत है.

3. होम बटन को करना पड़ रहा दो बार टैप

अगर आपके फोन में होम बटन को एक से ज्यादा टैप लग रहे हैं तो यकीनन आपको सर्विस सेंटर जाने की जरूरत है.

क्यों है जरूरी

होम बटन सबसे जरूरी बटन होती है. उसमें कोई दिक्कत हार्डवेयर गड़बड़ी को दिखाती है. फोन का हार्डवेयर खराब हो रहा है तो उसे ठीक करवाने में 1000-5000 रुपए तक खर्च हो सकते हैं.

4. मेमोरी बार-बार हो रही है फुल

स्पेस खाली करने के बाद भी अगर आपके फोन में मेमोरी कम है और आपको ऐप्स डाउनलोड करने में मुश्किल हो रही है तो फोन में मालवेयर है.

क्यों है जरूरी

मालवेयर के कारण फोन के सॉफ्टवेयर को नुकसान पहुंच सकता है साथ ही आपका पर्सनल डाटा भी चोरी हो सकता है.

5. बैटरी जल्दी हो रही है डिस्चार्ज

बैटरी अगर जल्दी डिस्चार्ज हो रही है तो इसके दो कारण हो सकते हैं. या तो बैटरी में दिक्कत है या फिर फोन की IC खराब हो रही है.

क्यों है जरूरी

अगर फोन बैटरी खराब है तो फिर भी ठीक है, लेकिन अगर आपकी IC या चार्जिंग सर्किट्स खराब हो रहे हैं तो उसके लिए आपको 1200- 2200 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं.

6. कैमरा स्टार्ट होने में देर लगना

अगर कोई भी कैमरा ऐप स्टार्ट होने में देर लगा रहा है तो नॉर्मल मेमोरी प्रॉब्लम के अलावा सॉफ्टवेयर इश्यू भी हो सकता है. ऐसा सॉफ्टवेयर बग के कारण भी हो सकता है. इससे धीरे-धीरे करके सभी ऐप्स इन्फेक्ट हो सकते हैं.

क्यों है जरूरी

सॉफ्टवेयर बग को टेस्ट करवाना जरूरी है. अगर ये जल्दी ठीक नहीं किया गया तो बाकी ऐप्स पर भी इसका असर पड़ेगा.

7. हैंग हो रहा है फोन

अगर फोन बार-बार हैंग हो रहा है तो सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर दोनो तरह के इश्यू हो सकते हैं. अगर हार्डवेयर इश्यू है तो जल्द ही फोन हैंग होने के साथ साथ बंद भी होने लगेगा या फिर मदरबोर्ड उड़ने की भी संभावना है.

क्यों है जरूरी

अगर मदरबोर्ड में कोई खराबी आ जाती है तो फोन एकदम से बंद हो जाएगा. इसे सुधरवाने में कम से कम 5000-7000 रुपए का खर्च आएगा.

अगली सरकार भाजपा नहीं बना पाएगी : जिग्नेश मेवाणी

2019 के आम चुनावों का अघोषित डंका बज चुका है. पक्षविपक्ष की अपनीअपनी गोलबंदी और व्यूहरचना शुरू हो गई है. माना जा रहा है कि 17वीं लोकसभा के लिए गोलबंद विपक्ष का एक प्रमुख चेहरा गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी का भी होगा. इस की वजह यह है कि राजनीति में आए भले उन्हें अभी बहुत दिन न हुए हों, लेकिन उन में जिस किस्म की ऊर्जा है, लोगों को संतुष्ट करने की जो वाकपुटता है, वह चुनावों के नजरिए से बहुत माने रखती है. जिग्नेश का उत्साह और अपनी सोच को मूर्तरूप देने का जनून उन्हें बाकी नेताओं से तो अलग बनाता ही है, उन में गजब की सांगठनिक क्षमता भी है. इसलिए भी उन्हें अगले लोकसभा चुनाव का स्टारप्रचारक माना जा रहा है. सवाल है साल 2019 के आम चुनावों को ले कर जिग्नेश क्या सोचते हैं? पिछले दिनों अहमदाबाद में जब उन से बातचीत हुई तो उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए. पेश हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश:

साल 2019 को ले कर बहुत सारी रणनीतियां सामने आ रही हैं. आप की क्या प्लानिंग है? मुझे ऐसा लगता है कि रेडियो पर मन की बात करना, 15 अगस्त व 26 जनवरी के मौके पर जुमलेबाजी करना, विदेशों में घूमना और ग्राउंड जीरो पर कुछ डिलीवर करना, इन बातों का कहीं न कहीं इस देश की जनता को एहसास हो रहा है. रामरहीम कांड, भीमाकोरेगांव कांड, रोहित वेमुला की आत्महत्या, गौरी लंकेश का मामला और नोटबंदी के चलते डेढ़ सौ लोगों के मारे जाने पर उन की खामोशी कई चीजें उजागर करती है. इन सारे मुद्दों पर सामूहिक नजर डालें तो यह बात साफ है कि 2014 में नरेंद्र मोदी जिस उम्मीद के प्रतीक थे, आज ऐसा नहीं है. 4 वर्षों में नोटबंदी और जीएसटी ने जिस तरह इकोनौमिक क्राइसिस पैदा किया, उस से उन की लोकप्रियता का ग्राफ काफी नीचे आया है.

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ आखिर नीचे क्यों आया? सत्ता मेें आते ही नरेंद्र मोदी ने सारे लेबर लौज को तोड़नेमरोड़ने की कोशिश की, दलित और मुसलमानों का घरवापसी, लवजिहाद और गौमाता के नाम पर उत्पीड़न बढ़ा है. इस सब के चलते न केवल उन की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आया है बल्कि उन के प्रति लोगों में असंतोष बढ़ा और आक्रोश भी बढ़ा है. इस का नतीजा क्या हो सकता है, क्या 2019 में भाजपा सत्ता में नहीं आएगी?

एक स्वाभाविक चांस है कि व्यक्तिगत तौर पर नरेंद्र मोदी पीएम न बनें और भाजपा दोबारा पावर में न आए. इस के लिए मेरा मानना है कि सारी मेनस्ट्रीम की राजनीतिक पार्टियों को एक महागठबंधन बनाना पड़ेगा और ऐसा ही महागठबंधन सारे पीपुल्स मूवमैंट का भी बने और इन दोनों की अपनी स्वतंत्र मौजूदगी रहे. ये दोनों गठबंधन अलगअलग दिशाओं से एकसाथ आगे बढ़ें. पीपुल्स मूवमैंट के लोकप्रिय हुए चेहरों की इस में क्या भूमिका होगी?

ये जो चेहरे हैं, जिन में सहला रशीद, कन्हैया कुमार, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और तमाम ऐक्सवाईजेड हैं, ये अगर पौलिटिकल मेनस्ट्रीम पार्टीज का हिस्सा बनते हैं तो जिस संघर्ष की जमीन से ये ऊपर उठे हैं, वह छूट जाएगी और फिर वे उस उम्मीद का प्रतीक भी नहीं रहेंगे. लेकिन अगर ये दोनों साथी बन सकते हैं तो मैं मानता हूं देयर इज मोर दैन अ चांस औफ कीपिंग बीजेपी अवे फ्रौम पावर. इस गठबंधन में सब से बड़ी भूमिका किस की हो सकती है?

इन सब में मेरे विचार से सब से अहम भूमिका मायावतीजी अदा कर सकती हैं. उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा और कांग्रेस का गठबंधन हो जाए तो नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बन सकते. ये हो जाए, वो हो जाए तो अपनी जगह है, लेकिन जब आप ग्राउंड में जाते हैं, चीजों को रीड करते हैं तो क्या यह संभावना नजर आती है?

इसी ग्राउंड की रीडिंग के बेस पर मैं यह कहता हूं. गुजरात में जिस तरह से दलित आंदोलन हुआ, पाटीदार आंदोलन हुआ, ओबीसी समाज का राइज हुआ, आशावर्कर बहनें लड़ीं, आंगनवाड़ी की बहनें लड़ीं, किसान सड़कों पर आए, सूरत के व्यापारी सड़कों पर आए, उसी के चलते भाजपा, जो 150 सीटों का घमंड ले कर घूम रही थी, 99 के आंकड़े पर अटक गई. राधनपुर में अल्पेश ठाकोर जीते और बडगाम में मैं. लेकिन गुजरात में सत्ता तो भाजपा की ही है?

भाजपा सत्ता में आने के बाद भी जुबिलिएंट या सैलिब्रेटिंग मूड में नहीं आ पाई. वह जानती है कि केवल 7 सीटों के बल पर ही वह सरकार बना पाई है. भाजपाइयों में यह सोच है जिस के चलते अब वे यह क्लेम नहीं कर पा रहे कि ग्रेट गुजराती मौडल औफ डैवलपमैंट पूरी दुनिया के लिए आदर्श है. आगामी चुनावों में केंद्र सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के पास सब से बड़े मुद्दे क्या होंगे?

पब्लिक हैल्थ और एजुकेशन के मुद्दे, कृषि संकट, आर्थिक संकट और बेरोजगारी जैसे मूवमैंट्स बड़े मुद्दे हैं. आप को ले कर इन्हीं मूवमैंट्स के बीच से कुछ बातें आ रही हैं. जैसे, मायावती ने कहा कि आप किसी का मुखौटा हो?

ऊना से ले कर अब तक जितने भी लोगों ने इस तरह से आलोचनात्मक बातें कहीं उन सब को मैं दिल की गहराइयों से धन्यवाद देता हूं, क्योंकि उन सब के चलते ही मैं इतना चर्चा में रहा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा को एहसास होना चाहिए कि नाउ आई एम मोर पौपुलर दैन रूपानी.

आंदोलनकारियों और मेनस्ट्रीम पार्टीज का साथ कितना और कहां तक हो सकता है? चुनावी राजनीति की जो मेनस्ट्रीम पौलिटिकल पार्टीज हैं और देश की जो वर्तमान परिस्थितियां हैं, इस के लिए वे जिम्मेदार भी हैं. हम अगर आज भाजपा के सामने खुल कर लड़ पा रहे हैं तो इसीलिए कि ये तमाम राजनीतिक पार्टियां भाजपा की तरह ही भ्रष्ट हैं. इसलिए जिस तरह से हम उस के खिलाफ खुल कर बोल रहे हैं, वे नहीं बोल पाएंगी. लेकिन पूरी तरह से ऐसी पार्टियों से दूरदूर तक कोई नाता न हो, ऐसी पोजिशन ले कर आइडियली तो हम शुद्ध रह सकते हैं लेकिन पौलिटिकली भाजपा के साथ हम नहीं चल सकते.

क्या वाकई देश को बुलेट ट्रेन की जरूरत है

बड़े बांधों जैसे टिहरी और सरदार सरोवर परियोजनाओं को छोड़ दिया जाए तो हिंदुस्तान के इतिहास में किसी और सरकारी परियोजना का अब तक इतना जबरदस्त विरोध कभी नहीं हुआ जितना अहमदाबाद से मुंबई के लिए प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना का हो रहा है. इस विरोध के कईर् पहलू हैं, लेकिन जो इसे सब से ज्यादा मुखर बनाता है, वह यह सवाल है कि क्या सचमुच अहमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन को चलाया जाना बहुत जरूरी है? निश्चित ही इस सवाल का जवाब है, नहीं. अगर हम प्रस्तावित बुलेट ट्रेन को जबरदस्ती देश की शान से न जोड़ें तो ऐसा कोई तर्क नहीं है जो इस परियोजना को एक जरूरी परियोजना बता सके. शायद यही वजह है कि सितंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने मिल कर अहमदाबाद से मुंबई के बीच प्रस्तावित जिस महत्त्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना की नींव रखी थी, अब तक वह लगभग नींव रखे जाने की स्थिति में ही है.

योजना के मुताबिक, 350 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलने के लिए प्रस्तावित हिंदुस्तान की इस सब से तेज ट्रेन की निर्माण परियोजना का कार्य इस साल के मध्य तक खूब जोरशोर से शुरू हो जाना था. लेकिन इस प्रस्तावित परियोजना की न तो अभी शुरुआत हुई है और न ही जरूरी जमीन का अधिग्रहण हुआ है. मतलब साफ है कि परियोजना शुरू हो जाने के बाद ट्रेन भले कितनी ही रफ्तार से चले लेकिन फिलहाल तो उस की निर्माण परियोजना पैसेंजर टे्रन से भी ज्यादा सुस्त है. सवाल है आखिर देश की अब तक कि सब से तेज प्रस्तावित ट्रेन की यह निर्माण परियोजना इतनी सुस्त क्यों है? जाहिर है इस की वजह इस का जबरदस्त विरोध है.

जिद पर उतारु केंद्र सरकार मोदी सरकार भले ही इस परियोजना को देश के विकास का अगला चरण बता रही हो या इसे नैक्स्ट इंडिया का सिंबल बना रही हो, लेकिन व्यावहारिक हकीकत यही है कि इस परियोजना से ज्यादातर लोग नाखुश हैं. 4 राज्यों के जिन किसानों की उपजाऊ जमीन इस तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए अधिग्रहित की जानी है, वे तो इस का विरोध करते ही हैं, वे लोग भी इस का विरोध कर रहे हैं जिन्हें हम रेल परिवहन के संदर्भ में विशेषज्ञों का दर्जा दे सकते हैं.

बावजूद इस के मोदी सरकार किसी भी विरोध को बिना भाव दिए अपने निर्णय पर अडिग है कि बुलेट ट्रेन 2022 तक भारत की हकीकत होगी. सवाल है, क्या वास्तव में हिंदुस्तान के लिए बुलेट ट्रेन इतनी जरूरी है कि किसी भी किस्म के विरोध को कान न दिया जाए या फिर इस परियोजना का हर तरफ से हो रहा जबरदस्त विरोध देख कर सरकार जिद पर उतर आई है? आइए, इस सवाल को इस क्षेत्र के तमाम विशेषज्ञों के निष्कर्षों की कसौटियों पर कस कर देखते हैं. रेल परिवहन के जितने भी जानकार हैं, उन में से ज्यादातर, फिर वे चाहे इंजीनियर हों, चाहे दूसरे तकनीकी विशेषज्ञ हों या आर्थिक प्रबंधक ही क्यों न हों, सब के सब बुलेट ट्रेन परियोजना का किसी न किसी स्तर पर विरोध

कर रहे हैं. इन सब का एक आवाज में कहना है कि यह जबरदस्त घाटे वाली परियोजना है. तमाम विशेषज्ञ दबी जबान यह आशंका भी जाहिर कर रहे हैं कि इस परियोजना को जिस तरह तमाम विरोध के बावजूद पूरा करने की सरकार जिद कर रही है, उस के पीछे कहीं कोई बड़ा खेल तो नहीं हो रहा है? यात्रियों को जरूरत नहीं

बुलेट ट्रेन परियोजना का यह विरोध इसलिए भी विरोध के लिए विरोध नहीं लग रहा, क्योंकि हाल ही में पूरे देश में मैट्रोमैन के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने भी बुलेट ट्रेन परियोजना की जबरदस्त मुखालफत की है. श्रीधरन के मुताबिक, ‘‘बुलेट ट्रेन सिर्फ संभ्रांत वर्ग के सपनों को पूरा करेगी. आम लोगों के लिए यह इतनी महंगी है कि वे कभी भी इस की सेवाएं हासिल नहीं कर पाएंगे. भारत को बुलेट ट्रेन की जगह एक आधुनिक, साफसुथरी, सुरक्षित और तेज रेल प्रणाली की जरूरत है.’’ हैरानी की बात यह है कि बुलेट ट्रेन की जरूरत अभी तक यह कह कर बताई जाती रही है कि मुंबई से अहमदाबाद या अहमदाबाद से मुंबई आनेजाने वाले ऐसे यात्रियों, जो लग्जरी यात्रा के लिए पैसा खर्च कर सकते हैं, को ऐनवक्त पर जरूरत भर के टिकट नहीं मिल पाते हैं. इसलिए हर दिन कुछकुछ घंटों के अंतराल में बुलेट टे्रन की जरूरत है ताकि महंगी टिकट खरीदने वाले यात्रियों को टिकट मिलने की चिंता न करनी पड़े.

लेकिन मुंबई और अहमदाबाद के बीच लग्जरी सीटों की कमी की यह बात किस कदर झूठ है, इस का खुलासा गत दिनों एक आरटीआई से हो चुका है. मुंबई के आरटीआई ऐक्टिविस्ट अनिल गलगली ने पश्चिम रेलवे से आरटीआई के जरिए यह जानकारी हासिल की है कि अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलने वाली तमाम लग्जरी रेलगाडि़यों की 40 फीसदी सीटें खाली रहती हैं, जिस से पश्चिम रेलवे को हर महीने 10 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

हालांकि आरटीआई से हासिल जवाब में तो यह नहीं कहा गया, लेकिन व्यक्तिगत रूप से पूछने पर पश्चिम रेलवे के तमाम बड़े अधिकारी अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि 2016 से 2017 के बीच पश्चिम रेलवे के कई प्रबंधक मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली कम से कम 5 ट्रेनों को बंद करने की सिफारिश कर चुके हैं. गौरतलब है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच हर दिन 11 और पूरे सप्ताह में 81 रेलगाडि़यां चलती हैं. साथ ही, मुंबई और अहमदाबाद के बीच के 491 किलोमीटर के फासले को पूरा

करने के लिए देश का सब से अच्छा 6 लेन का ऐक्सप्रैसवे भी मौजूद है, जिस से महज 4 से साढे़ 4 घंटे में मुंबई से अहमदाबाद पहुंचा जा सकता है. यही नहीं, अहमदाबाद से मुंबई के लिए और मुंबई से अहमदाबाद के लिए हर दिन 10 उड़ानें भी हैं और हैरानी की बात यह है कि इन उड़ानों में भी औसतन 10 फीसदी सीटें खाली ही रहती हैं. सवाल है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच इतने बेहतरीन यातायात नैटवर्क के बाद भी आखिरकार बुलेट टे्रन चलाने की इस कदर जिद क्यों की जा रही है? यह सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि मुंबई और अहमदाबाद के बीच जब

आज की तारीख में सभी तरह के माध्यमों से सफर करने वाले लोगों की तादाद 40 हजार नहीं है तो फिर बुलेट ट्रेन के लिए हर दिन इतने यात्री कहां से मिल जाएंगे, वह भी तब जब बुलेट ट्रेन का किराया हवाई जहाज से अगर ज्यादा नहीं, तो कम भी नहीं होगा.

बुलेट ट्रेन परियोजना का विरोध सिर्फ वे किसान ही नहीं कर रहे जिन की इस परियोजना के तहत जमीन अधिग्रहीत की जा रही है बल्कि इस का दबाछिपा विरोध वे तमाम विशेषज्ञ भी कर हैं जो इस परियोजना के साथ किसी न किसी रूप में जुडे़ हैं. गौरतलब है कि नैशनल हाईस्पीड रेल कौर्पोरेशन लिमिटेड के अब तक कई अधिकारियों ने जमीन अधिग्रहण सर्वे पर जाने से इनकार कर दिया है. हालांकि एनएचएसआरसीएल इस तरह की किसी भी बात से इनकार करता है और इसे किसानों का शिगूफा बताता है. लेकिन 2022 तक पूरी होने वाली एक लाख

10 हजार करोड़ रुपए की इस बुलेट ट्रेन परियोजना का विरोध महज महाराष्ट्र के कुछ किसान ही नहीं कर रहे हैं बल्कि केंद्रशासित दादर और नगर हवेली के साथसाथ गुजरात और महाराष्ट्र के 312 गांवों के 5,000 से ज्यादा किसान परिवार इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. उन का कहना है कि इस परियोजना के चलते उन की 850 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन अधिग्रहीत होनी है, जिस से वे हमेशाहमेशा के लिए आर्थिक रूप से मुहताज हो जाएंगे.

प्यार की गरमाहट कम होने लगे तो आजमाएं ये टिप्स

‘ये इश्क नहीं आसां…’ यह बात सब जानते हैं. मातापिता, नातेरिश्तेदार, समाज, जाति, धर्म इन सब की दीवार को तोड़ कर एक हो पाना आसान नहीं होता है. लेकिन इन तमाम हदों को पार कर जो एक हो जाते हैं वे अपनी मंजिल जीत लेते हैं. उन्हें लगता है उन्होंने वह सब पा लिया, जो चाहा था.

लेकिन जैसेजैसे गृहस्थी की जिम्मेदारी उन के कंधों पर आने लगती है, उन्हें अपनी शादी एक बंधन जैसी लगने लगती है. उन्हें लगता है कि इस से तो शादी के पहले ही ठीक थे. बेकार में शादी के झंझट में फंस गए.

वह रुठनामनाना, एकदूसरे से प्यार जताना सब फालतू की बातें लगने लगती हैं. शादी के 2-3 साल बाद ही उन का शादीशुदा रिश्ता ठंडा पड़ने लगता है और फिर दोनों प्रेमीप्रेमिका न रह कर आम पतिपत्नी बन जाते हैं और छोटीछोटी बातों पर झगड़ने लगते हैं. वैसे झगड़ा भी प्यार का ही एक रूप होता है और थोड़ीबहुत नोकझोंक तो हर रिश्ते में होती है, पर बात जब हद से ज्यादा गुजरने लगती है, तो तलाक तक पहुंच जाती है और फिर सब कुछ खत्म हो जाता है.

प्रिया और समीर के साथ भी ऐसा ही हुआ. परिवार और समाज से दुश्मनी ले कर दोनों एक हुए. जिंदगी में नए रंग भी भरे, लेकिन धीरेधीरे उन के प्यार का रंग उतरने लगा. अपने रिश्ते से उन्हें ऊब होने लगी. प्यारव्यार, सब उन्हें बकवास लगने लगा. उन्हें लगने लगा कि प्यार तक तो ठीक था, पर शादी में बंध कर उन्होंने गलती कर दी.

रिश्ते में रोमांस जगाएं

शादी के पहले तो 2 प्रेमी एकदूसरे पर अपनी जान छिड़कते हैं, उन्हें एकदूसरे की हर बात अच्छी लगती है, लेकिन शादी के बाद वे सब बातें उन्हें बोर करने लगती हैं. लेकिन ऐसा तो हर पतिपत्नी के रिश्ते में होता है. इस का यह मतलब नहीं कि आप लड़झगड़ कर अलग हो जाएं और फिर बाद में पछताएं. कुछ बातों पर अमल कर अपने रिश्ते को पहले जैसा रोमांटिक बनाए रख सकते हैं.

– दांपत्य में नई ऊर्जा का संचार करना कोई मुश्किल काम नहीं है. बस जरूरत है थोड़े बदलाव और समझदारी की. इस से न सिर्फ आप के पार्टनर को खुशी मिलेगी, बल्कि आप के रिश्ते में भी नयापन झलकने लगेगा. आप की बगिया फिर से महक उठेगी. रिश्ते निभाने के लिए बनाए जाते हैं, छोटीछोटी बातों में आ कर तोड़ देने के लिए नहीं, पतिपत्नी दोनों को यह बात समझना जरूरी है.

– शादी के बाद हर पतिपत्नी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. यह बात उतनी ही सत्य है, जितना आप का प्यार. हां, माना कि काम की व्यस्तता की वजह से दोनों एकदूसरे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं जिस से लगता है कि पार्टनर पहले जैसा नहीं रहा. लेकिन ऐसा नहीं है. यह बात आप भी जानते हैं. लेकिन हां, कितना भी बीजी शैड्यूल क्यों न हो, साथी के लिए समय जरूर निकालें. रोजरोज न सही, पर हफ्ते में 1 बार दोनों डेट पर जरूर जाएं. गले लगाना, छूना, चूमना, पकड़ना, आंखों हीं आंखों में बातें करना, शारीरिक स्पर्श, आप के संबंध में और मजबूती लाएगा और दिनप्रतिदिन आप का प्यार और निखरेगा.

– पहले आप दोनों प्रेमीप्रेमिका थे, अब पतिपत्नी बन चुके हैं, तो जीवन में थोड़ाबहुत बदलाव आना स्वाभाविक है, यह न भूलें. छोटीछोटी बातों में रूठनामनाना तो ठीक है, पर बात का बतंगड़ बनाना सही नहीं है. इस से रिश्ते में दूरियां पैदा होंगी और रिश्ता बोझ लगने लगेगा. शादी के पहले, जिस परिवार की परवाह किए बगैर 2 प्रेमी एक हो जाते हैं, शादी के बाद उसी परिवार को ले कर, तो कभी आपसी इगो के कारण अकसर दोनों के बीच मतभेद पैदा हो जाता है. इस सब से बचें क्योंकि आप का रिश्ता सब से अनमोल है यह समझें.

– सुबह की शुरुआत अपने पार्टनर को एक चुंबन दे कर करें. फिर देखिए कैसे आप पूरा दिन ताजगी से भरे रहेंगे और यह ताजगी तब तक बनी रहेगी, जब तक कि आप फिर एकदूसरे को नहीं देखते. एक चुंबन में सिर्फ 6 सैकंड लगते हैं, पर यह आप के संबंधों में उत्साह भर देगा.

– पतिपत्नी का अपना एक अलग कमरा होना चाहिए. अपने पार्टनर को खुश करने के लिए बैडरूम को सजाएं. फ्लौवर वाली चादर बिछाएं. खूशबूदार छोटीछोटी कैंडल्स जलाएं. ताकि कमरा महक उठे और आप का पार्टनर आप के आगोश में आने को मचल उठे.

– अपने पार्टनर को अपनी बांहों में भर कर बीते दिनों की यादें ताजा करें. याद करें कि जब एक दिन भी न मिल पाते थे तब कैसे आप एकदूसरे के लिए बेचैन हो जाते थे. घर में सब के सो जाने के बाद धीमी आवाज में फोन पर बातें करना, घंटों एकदूसरे से चैटिंग करना, डेट पर जाना, एकदूसरे के लिए तड़प महसूस करना, वो सब बातें याद करें. फिर देखिए आज भी कैसे वे सब बातें आप के मन को गुदगुदा देंगी.

– बिस्तर पर जाने से पहले अपने पार्टनर का मूड जान लें, फिर चुंबन, स्पर्श से सहलाते हुए एकदूसरे की आंखों में झांकें. यह आप के प्यार को और उभार देगा.

– चरमसुख प्राप्त कर लेने के बाद अकसर पतिपत्नी करवट बदल कर सो जाते हैं. ऐसा न करें. चरमसुख पर पहुंचने के बाद भी पार्टनर से अलग हो कर न सोएं. बल्कि बांहों में ले कर चुंबन दें, प्यार भरी बातें करें और अगले दिन क्या और कैसे करना है उस का प्लान करें.

– जितना हो सके साथ वक्त गुजारें. सुबह साथ घूमने जाएं, सुबह की चाय साथ बैठ कर पीएं. साथ मूवी देखने जाएं जैसे पहले जाते थे हाथों

में हाथ डाले. डिनर करते वक्त आंखों ही आंखों में बातें करें पहले की तरह. साथ बिताए पलों को याद कर के मुसकराएं. फिर देखिए आज भी कैसे आप के पार्टनर के गालों पर शर्म की लाली आ जाएगी.

– पतिपत्नी में सैक्स सब से अहम होता है. सैक्स रिश्ते को तो मजबूत बनाता ही है. जिंदगी को भी महका देता है. इसलिए इस की अनदेखी कभी न करें. जब भी मौका मिले प्यार को ऐंजौय करें.

सैक्स स्पैशलिस्ट के अनुसार पतिपत्नी के बीच बैड की अपनी एक खास एहमियत होती है. लेकिन जब वह अलग हो जाता है तो फिर रिश्ते के माने ही बदल जाते हैं. इसलिए इस बात का जरूर ध्यान रखें कि कितना भी मनमुटाव क्यों न हो जाए दोनों के बीच बैड कभी अलग नहीं होना चाहिए.

सुंदरता को ले कर मेरी सोच साफ थी : तेजस्विनी सिंह

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के खेमादेई गांव की तेजिस्वनी सिंह का परिवार मध्यवर्गीय परिवार है. पिता श्रीराम सिंह चकबंदी विभाग में थे. तेजस्विनी की एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई है. पढ़ाई के लिए पिता ने लखनऊ में रहना शुरू किया. तेजस्विनी की मां निर्मला सिंह ने अपनी बेटियों का पालनपोषण बहुत अच्छी तरह से किया. तेजस्विनी के पिता को जब कैंसर हुआ तो डाक्टरों ने कहा कि ये 6 माह से अधिक जीवित नहीं रह पाएंगे.

लखनऊ के संजय गांधी अस्पताल में उन का इलाज शुरू हुआ. तेजिस्वनी को स्कूल टाइम से ही हर्बल दवाएं बनाने का शौक था. वह स्किन केयर के लिए दवा खुद तैयार करती थी और उस का प्रयोग अपने दोस्तों और खुद पर करती रहती थी. पिता को कैंसर हुआ तो उस ने पढ़ना शुरू किया कि किन चीजों को प्रयोग कर के उन के खानपान को बेहतर किया जा सकता है.

पत्रकारिता में कैरियर बनाने के चलते उस की मुलाकात कैंसर विशेषज्ञ डाक्टरों से आसानी से हो जाती थी. ऐसे में उस ने कुछ दर्दनिवारक और डाइट सूप बनाने शुरू किए. इस में उस की डाइटिशियन बहन ने भी बहुत साथ दिया. हर्बल डाइट और इलाज से तेजस्विनी के पिता 4 साल तक जीवित रहे. उन का इलाज करने वाले डाक्टरों ने भी माना कि हर्बल दवाओं का असर है.

शादी के बाद पत्रकारिता छोड़ कर तेजस्विनी ने सौंदर्य प्रतियोगिताआें में हिस्सा लेना शुरू किया और ‘मिसेज इंडिया इंटरनैशनल सिंगापुर 2018’ का खिताब जीता. आज वह अपने हर्बल प्रोडक्ट्स को ले कर बनाई कंपनी ‘और्गैनिक ग्रीन्स’ को ले कर काम कर रही है. पेश हैं, तेजस्विनी के साथ हुई बातचीत के कुछ खास अंश:

शादी के बाद सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की वजह क्या थी?

मैं अपनी बहन से छोटी थी. मेरे मातापिता तो 2 बेटियों के होने से किसी दबाव में नहीं थे पर बाकी रिश्तेदारों की बातें सुन कर मुझे लगता था कि जैसे मेरी परवाह नहीं है किसी को. ऐसे में मैं हमेशा कुछ न कुछ अलग करती रहती थी. मैं तांबे और पीतल के तार से बहुत सुंदर ज्वैलरी बनाती थी. सुंदरता को ले कर मेरी सोच साफ थी. मैं हमेशा बहुत सुंदर और फिट दिखना चाहती थी.

स्कूल के समय में साथी कहते थे कि मौडल लगती हो. शादी के बाद जब सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अवसर आया तो सोचा एक बार ग्लैमर की फील्ड को भी आजमा लिया जाए. खुद को प्रूव करने के लिए इस में हिस्सा लिया.

‘मिसेज इंडिया इंटरनैशनल सिंगापुर-2018’ खिताब जीतने के बाद क्या बदलाव महसूस किया?

जीवन में सैलिब्रिटी सी फीलिंग महसूस होने लगी. मुझे ‘ब्यूटीफुल बौडी’ का खिताब भी मिला था. पहले मैं दूसरों के लिए लिखती थी अब लोग मुझ पर लिखने लगे. मौडलिंग और विज्ञापनों के कई अच्छे अवसर मिले. मेरा मन फैशन और मौडलिंग की दुनिया में जाने का नहीं था. ऐसे में मैं ने मौडलिंग के कई औफर छोड़े.

मुझे अभी भी कैंसर, हार्ट और डायबिटीज जैसे रोगों पर काम करना है. यह खिताब जीतने के बाद मेरी बातों को लोगों ने थोड़ा गंभीरता से सुनना शुरू किया है. मेरी बातों पर लोग भरोसा कर रहे हैं.

और्गैनिक ग्रीन्स की शुरुआत कैसे हुई?

जब मैं स्कूल में पढ़ती थी उस समय हम ने घर पर कई तरह के प्रोडक्ट्स को मिला कर एक क्रीम तैयार की थी. अपने घर में काम करने वाली नौकरानी कोे लगाने के लिए दी तो उस ने बताया कि बहुत अच्छी लग रही.

जब मैं पत्रकारिता के जौब में थी तो मैडिकल मेरी फील्ड थी. धूप में आनेजाने पर मुझे स्किन इन्फैक्शन हो गया. डाक्टरों को दिखाया तो बोले यह हाइपर पिगमैंटेशन है. मैं ने अपनी पहले वाली बनाई क्रीम का प्रयोग शुरू किया. धीरेधीरे मेरे दाग गायब हो गए. जब पिता को कैंसर हुआ तो वह बहुत खराब दौर था. हम ने कुछ हर्बल प्रोडक्ट्स और सूप तैयार कर उन को देना शुरू किया. इस से उन का जीवन थोड़ा लंबा हो सका.

उन का इलाज करने वाले डाक्टर आज भी यह सोच कर हैरान हैं कि लाइफ कैसे बढ़ गई थी?

आप ब्यूटी के क्षेत्र में काम कर रही हैं या हैल्थ के?

अभी ब्यूटी के क्षेत्र में काम कर रही हूं. हमारे 100 के करीब प्रोडक्ट्स हैं. अब हम हैल्थ के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं.

क्या सरल होता है ये सब करना?

सरल कुछ नहीं होता. हर्बल ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब बनाने शुरू किए तो क्व20 हजार की मशीन लगाना मुश्किल काम था. कुछ पैसे जोड़ कर क्रीम बनाई. उसे बेचने के लिए खुद दुकानदारों के पास गए. कई दुकानदारों ने क्रीम को रिजैक्ट कर दिया. मगर हिम्मत नहीं हारी. खुद पैदल दुकानदुकान जाती थी. अब वही दुकानदार हमारी खूब क्रीम बेच रहे हैं.

लड़कियों की समाज में क्या हालत है?

समाज के एक बड़े वर्ग की सोच लड़कियों को ले कर अभी भी पुरानी ही है. शादी लड़कियों के लिए एक बड़ा जुआ होता है. इस की सफलता और असफलता दोनों की जिम्मेदारी लड़की की मानी जाती है. उस का सब से अधिक प्रभाव लड़की पर पड़ता है.

लड़की की सफलता को उस की मेहनत से कम ही लोग जोड़ कर देखते हैं. यह सोच निचले स्तर से ले कर ऊपर के स्तर तक कायम है. बहुत सारे उदाहरणों के बाद भी यह सोच जल्दी बदलने वाली नहीं लग रही. आज भी बलात्कार, छेड़छाड़, शोषण और लड़कियों को दबाने, उन्हें मनचाहा न करने देने की घटनाएं कम नहीं घट रहीं.

शोको : धर्मगुरु को फांसी, सत्ता की चाह में निरीह लोगों की मौत का खेल

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं. यह बात जापान में एक जुलाहे के यहां चरितार्थ हुई. 5 मार्च, 1955 को दक्षि  ण जापान के कीसुशयु क्षेत्र में रहने वाले उस गरीब जुलाहे के यहां एक बेटे ने जन्म लिया. वह कोई साधारण बच्चा नहीं था. एक अजीब सा तेज था उस के चेहरे पर. बच्चे की दाईं आंख से न दिख पाने की बात को भी लोगों ने असाधारण बताया था.

लोगों की तारीफें सुनसुन कर जुलाहा भी अपनी किस्मत पर इठलाने लगा. बच्चे का नाम रखा गया शोको उर्फ चीजू. जुलाहे को क्या मालूम था कि उस का यह बेटा दौलत और शोहरत की बुलंदियों तक तो पहुंचेगा, लेकिन अमानवीयता और वीभत्सता की सीढ़ी पर चढ़ कर.

गरीब जुलाहे ने किसी तरह शोको को पालपोस कर नक्काशी के काम पर लगा दिया. नक्काशी का काम कर के किसी तरह दो जून की रोटी भर कमाने वाले जुलाहे का बेटा शोको उर्फ चीजू बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी था. गरीबी के फर्श और बेबसी की छत के नीचे लेटा शोको बस दौलत के सपने देखा करता था. मुफलिसी के चलते पढ़ना तो दूर, वह स्कूल का दरवाजा भी नहीं देख पाया था. पर यह उस का आत्मविश्वास ही था कि वह दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैद कर रखने का दम भरता था.

शोको को गरीबी की चादर से बेहद नफरत थी. गरीबी ही वह शब्द था, जो उस के मन में टीस बन कर रिसता रहता था. किसी के आगे हाथ फैलाना उसे गवारा नहीं था. वह तो बलात छीन कर सब कुछ हासिल करना चाहता था.

जवानी तक पहुंचतेपहुंचते शोको की महत्त्वाकांक्षा साकार रूप लेने को बेताब रहने लगी. उस के सपने भी पंख लगा कर हकीकत के आसमान में उड़ने को मचल रहे थे.

शोको ने पहला मुकाम हासिल कर लिया था ‘अम’ के रूप में. अम नाम से पंजीकृत हुई शोको की इस कंपनी ने बहुत कम समय में ही ‘पहाड़ी जादूगर समुदाय’ के नाम से अपनी अलग पहचान बना ली थी.

शोको ने काफी सोचसमझ कर अपनी कंपनी का नाम अम चुना था. अम जापानी लोगों के लिए मन और मस्तिष्क को सुकून देने वाली एक कारगर दवा थी. कंपनी की सफलता का राज किसी हद तक इस का नाम था. लोगों को जहां यह नाम प्रभावित करता, वहीं शोको का व्यक्तित्व भी उन्हें अपनी ओर खींच लेता था. मात्र एक छोटे से कमरे में शुरू हुई शोको की कंपनी की आय का एकमात्र स्रोत था— स्वास्थ्य के लिए आपत्तिजनक पेय पदार्थों की बिक्री.

कम समय में यह कंपनी जहां सफलता की बुलंदी पर पहुंच गई थी, वहीं शोको के पास दौलत का ढेर लग गया था. मगर शोको को इस से संतुष्टि नहीं थी. यह तो उस का एक कदम भर था, उसे तो अभी और लंबा रास्ता तय करना था. इसी राह पर जाने के लिए शोको ने अम कंपनी को योगा स्कूल का रूप दे दिया था.

दूसरी ओर शोको ने अपने नाम के आगे असाहारा शब्द जोड़ कर इस स्कूल के मुख्य निदेशक की कुरसी संभाल ली थी. शोको की दौलत की भूख कुछ शांत हुई तो उसे शोहरत की भूख बेचैन करने लगी. किसी तरह उस ने जापान की लोकप्रिय पत्रिका ‘ट्विलाइट जोन’ में अपना एक लेख प्रकाशित करवाया.

उस लेख के साथ शोको की योग की मुद्रा में एक फोटो भी छपी. फोटो एक पहुंचे हुए योगी की तरह लग रही थी. कुछ उस लेख का मर्म था तो कुछ फोटो का प्रभाव कि शोको रातोंरात मशहूर हो गया. उस के प्रति लोगों की श्रद्धा भावना ऐसी उमड़ी कि सैकड़ों लोगों ने उस के स्कूल की सदस्यता ले ली. कह सकते हैं कि शोको को एक अचूक हथियार मिल गया था.

जल्दी ही शोको को चिंतक और आदर्श योगी के रूप में पहचाना जाने लग. अपनी फितरत के अनुसार अब वह देश में ऐसी जगह बनाना चाहता था, जहां सारा देश उस के आगे शरणागत होता नजर आए. अपने ईष्ट के रूप में लोग उसी का नाम लें और उस का ही अनुसरण करें.

यहीं से शोको के नए सफर की शुरुआत हुई. अब वह अपना योग स्कूल छोड़ कर आध्यात्मिक शांति की खोज में जापान के पहाड़ों और समुद्र के तटों पर भटकने लगा. एक ऐसे ही एकांत स्थान पर शोको की मुलाकात इतिहास के मर्मज्ञ एक छात्र से हुई. वह भी शोको के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. उस ने शोको को अपने गूढ़ रहस्य बताते हुए कहा, ‘‘अरमागीडन जल्द ही दस्तक देने वाला है. इस विनाशकारी स्थिति में केवल शुद्ध आत्मा वाले ही जीवित रह पाएंगे.’’

शोको ने इस कथन को काफी गंभीरता से सुना और वह चिंतन करने लगा. उसे लगा कि आध्यात्मिकता उसे बुला रही है. वही एक ऐसा मनुष्य है, जो शुद्ध आत्मा वाले लोगों का नेतृत्व कर सकता है.

उसे यह भी झूठा विश्वास हो चला था कि वह अकेला ऐसा प्राणी है, जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति से दुनिया को विनाश के गर्त में जाने से बचा सकता है. इस के बाद शोको ने अपने पुराने चोले को उतार कर श्वेत और ढीलेढाले वस्त्र धारण कर लिए. सिर के बाल और दाढ़ीमूंछ भी बढ़ा ली.

वह अपने नए मिशन के तहत पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कई देशों की यात्रा पर निकल गया. वह जगहजगह आध्यात्मिक सत्संग करता और अम शब्द की शक्ति का प्रचार करता. उस ने दूसरी आध्यात्मिक संस्थाओं को भी अपनी शरण में लाने का पूरा प्रयास किया. इस का उसे लाभ भी मिला. उस की ख्याति उस से पहले उस स्थान पर पहुंच जाती, जहां वह अपने आध्यात्मिक भ्रमण के लिए जाता था.

धर्म की आड़ में बन गया धर्मगुरु

अपने इसी मिशन के अंतर्गत शोको असाहारा सन 1987 में भारत स्थित हिमालय की वादियों में बसे आध्यात्मिक शहर धर्मशाला पहुंचा. उस के साथ अनुयायियों का दल भी था. उस का उद्देश्य जहां हिमालय की महिमा का बारीकी से अध्ययन करना था, वहीं वह बौद्ध गुरु दलाई लामा का आशीर्वाद भी प्राप्त करना चाहता था. वह अपने मकसद में कामयाब रहा. उसे दलाई लामा का आशीर्वाद मिल गया. आशीर्वाद लेते हुए उस ने एक फोटो भी खिंचवाया.

जापान पहुंच कर शोको असाहारा ने इसे भुनाना शुरू कर दिया. उस ने दावा किया, ‘‘मुझे बौद्ध गुरु दलाई लामा ने आशीर्वाद दिया है. उन्होंने मुझे महात्मा बुद्ध की सत्य शिक्षाओं से लोगों को राह दिखाने का एक दैवीय अभियान सौंपा है.’’

शोको ने लोगों को यह बात जोर देते हुए बताई, ‘‘गुरु दलाई लामा ने मुझे विशेष तौर पर इस पावन कार्य के लिए चुना है. क्योंकि मैं महात्मा बुद्ध का सच्चा अनुयायी हूं.’’

शोको के आदेश पर उस के अनुयायियों ने अपने परिचितों और मित्रों को इस दैविक अभियान का लक्ष्य बताते हुए उन्हें इस मार्ग पर साथ चलने को कहा. शोको असाहारा का यह जादू काम कर गया.

अनुयायियों की जमात बढ़ती देख शोको ने अपनी दैविक शक्ति श्रद्धालुओं को देने का व्यवसाय शुरू कर दिया. उस ने श्रद्धालुओं के माथे पर अपना हाथ रखने की कीमत 350 डौलर रखी.

शोको का यह दैविक अभियान कई महीने चला. अनुयायी बढ़े तो दौलत के दरवाजे भी खुले. अपनी अगली योजना की जानकारी देते हुए शोको ने अपने शिष्यों को बताया, ‘‘समय की मांग को देखते हुए ‘पहाड़ी जादूगर संस्था’ अम को अब ‘अम परम सत्य’ में परिवर्तित कर दिया गया है.’’

शोको असाहारा की तकदीर कहें या उस के व्यक्तित्व का प्रभाव कि उस का यह आगाज कामयाब अंजाम तक पहुंच गया. अम परम सत्य अभियान शोको के नेतृत्व में बौद्ध, जैन धर्म की सत्यता और हिंदू धर्म की गूढ़ता का मिश्रण बन कर उभरा. शोको के रहस्यवादी उपदेश सुनने के लिए देश भर से श्रद्धालु उस की शरण में आने लगे.

2जो भी जीवन के परम सत्य की खोज में शोको का अनुयायी बनता, उसे सब से पहले शोको के शरीर के रक्त की कुछ बूंदें पिलाई जातीं. इस के पीछे यह तर्क दिया जाता कि शोको अलौकिक शक्ति है. उस के रक्त में कई तरह के चुंबकीय आकर्षण हैं, जिन्हें ग्रहण करने से मनुष्य को अलौकिक दिव्य दर्शन का आभास होता है.

इस में भी व्यवसायीकरण था. शोको के रक्त की बूंदें प्रसाद स्वरूप नहीं दी जाती थीं, बल्कि उस की भी कीमत थी. वह भी छोटीमोटी नहीं, पूरे 7 हजार डौलर. बता दें कि शोको शादीशुदा था और 3 बेटियों का बाप भी. शोको की शादी तोमोको मैट्सुमोटो के साथ सन 1978 में हुई थी.

शोको हर काम फीस ले कर करता था

आध्यात्मिकता के नाम पर शोको का व्यवसाय जहां फलफूल रहा था, वहीं कलेवर भी बदलता जा रहा था. शोको ने एक और मुकाम की तरफ कदम रखते हुए अपने विशाल भव्य भवन में एक तालाब का निर्माण करवाया, जिसे उस ने एक जादुई तालाब का नाम दिया था.

वैसे तो तालाब का जल सामान्य था, लेकिन इस के पीछे यह तर्क दिया जाता कि शोको द्वारा इस जल को छू लेने से यह करिश्माई जल बन गया है. अनुयायियों द्वारा यह प्रचार किया जाने लगा कि इस जल को पीने से जहां शरीर विकारों से मुक्त हो जाता है, वहीं जीवन में छाया अहंकार भी दूर हो जाता है. तालाब के इस जल को पीने की कीमत रखी गई थी 800 डौलर. लोगों की नजरों में भगवान बन चुका शोको पड़ाव दर पड़ाव पार करता जा रहा था. सन 1987 के अंत तक शोको के अम परम सत्य पथ के अनुयायियों की संख्या करीब डेढ़ हजार तक पहुंच गई थी. शोको असाहारा ने अब अपना पहला अंतरराष्ट्रीय औफिस न्यूयार्क, अमेरिका में ‘अम यूएसए’ नाम से खोला.

दौलत और शोहरत शोको के कदम चूम रही थी. मगर शोको की हवस थी कि शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. उस की निगाह तो विश्व पटल पर टिकी थी. शोको का योग स्कूल भी अब अन्य जापानी स्कूलों की तरह नहीं रहा था. इस स्कूल में अध्ययन केवल पत्राचार द्वारा ही होता था.

2 वर्षीय कोर्स की फीस 2 हजार डौलर रखी गई थी और दाखिले के रूप में लिए जाते थे 700 डौलर. अगर कोई दान देने में रुचि रखता था तो उसे शोको के जादुई तालाब का जल तोहफे के रूप में दिया जाता था.

कुछ भी हो, पर शोको के प्रवचनों में इतना दमखम और आकर्षण था कि उस से प्रभावित हो कर उस के शिष्य उस की शिक्षा का पालन करते थे. वह जमीन पर सोते, उस के लिए प्रार्थना करते, व्रत रखते और सभी सांसारिक बंधन छोड़ कर बस हर समय उस की सेवा में लगे रहते थे. इन शिष्यों ने शोको के आह्वान पर अपनी समस्त चलअचल संपत्ति और पूंजी शोको के शरणागत कर दी थी.

सन 1990 आतेआते शोको के शिष्य और शिष्याओं की संख्या में अच्छाखासा इजाफा हो गया था. गौरतलब बात यह थी कि इन में से 15-20 प्रतिशत की आयु मात्र 20 वर्ष थी.

शोको की आय बढ़ी तो उस का काफी पैसा टैक्स की अदायगी में जाने लगा. यह उस के लिए चिंता का विषय था. अत: शोको ने अपनी आय करमुक्त करने के लिए जापानी धार्मिक कारपोरेशन में कानून के तहत आवेदन दिया, मगर इसे निरस्त कर दिया गया.

परिणामस्वरूप टोक्यो के गवर्नर को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं. आखिर गवर्नर ने जापानी धार्मिक गतिविधियों के उल्लंघन का वास्ता दे कर शोको को कुछ रियायत दे दी.

इसी दौरान शोको के खिलाफ कई रिपोर्ट भी दर्ज हुईं, जिन में कहा गया कि वह लोगों को प्रभावित कर अपने जाल में फंसा लेता है और फिर उन की संपत्ति व जमापूंजी ठग लेता है. मगर शोको की ख्याति के चलते उस पर किसी तरह की काररवाई का दुस्साहस किसी ने नहीं किया.

शोको का सब से बड़ा उपासक और प्रेमी था हिडीयो मुराई. वह कुशाग्र बुद्धि एस्ट्रोफिजिक्स वैज्ञानिक था. उस ने समाचार पत्र में शोको के विषय में पढ़ा था. उसी से प्रभावित हो कर उस ने अपना सब कुछ शोको के चरणों में रख दिया और उस के ‘अम परम सत्य’ पथ का शिल्पकार बन गया.

अनपढ़ ने उच्चशिक्षित लोगों को बनाया शिष्य

शोको बेशक अनपढ़ था, पर उस के शिष्य उच्चशिक्षित थे. क्योरा यूनिवर्सिटी का छात्र सेइहि एंडो पूर्णत: शोको को समर्पित हो गया था. वहीं जेनेटिक्स इंजीनियर मासा की टसुचीया भी अपना उज्ज्वल भविष्य छोड़ कर शोको की शरण में आ गया था. इस क्रम में फुमिरो जीपो भी शोको का परम शिष्य था, जो दूरसंचार अनुसंधानात्मक केंद्र में अध्ययन कर चुका था और अवास्तविक राष्ट्रीय अंतरिक्ष आविष्कार एजेंसी में कार्यरत था. वह भी सब कुछ छोड़ शोको के पास आ गया.

हिडीयो मुराई ने शोको के लिए एक ऐसी टोपी का आविष्कार किया, जिसे पहनते ही ऊर्जा प्राप्त होती थी. जब इस टोपी को पहना जाता तो वह स्वयं उस व्यक्ति से जुड़ जाती थी. इस अद्भुत टोपी की कीमत थी 70 हजार डौलर.

शोको के पास वैज्ञानिकों की एक पूरी टीम थी. इसी ने शोको के आदेश पर एस्ट्रल और कौस्मिक अस्पताल का निर्माण किया. इस अस्पताल में चमत्कारी दवाओं का निर्माण होता था. इन दवाओं को यह कह कर बेचा जाता था कि इस में शोको के रक्त का अंश है, जिसे सेवन करने से परम शक्ति प्राप्त होती है.

शोको असाहारा का ‘अम परम सत्य’ पंथ अब कयामतवादी संप्रदाय का रूप ले चुका था. कहते हैं कि इस संप्रदाय में आना आसान था, लेकिन निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था. शोको के एक 25 वर्षीय शिष्य ने यहां से लौटने की कोशिश की तो परिणामस्वरूप उसे शोको के तथाकथित बदमाशों ने बिजली का करेंट दे कर मौत की नींद सुला दिया. इसी शिष्य के दोस्त को जब इस बारे में जानकारी मिली तो उस के साथ भी यही हुआ.

शुजी तागुची नामक इस शिष्य की शोको के अन्य 4 शिष्यों ने गरदन पकड़ी और झटके से घुमा दी. ‘चट’ की आवाज हुई और शुजी का मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया. शुजी की लाश को एक पौलीथिन की थैली में भर कर उस पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी गई. लेकिन उन्होंने एक गलती यह कर दी कि शुजी के घर संदेश भिजवा दिया कि वह शोको असाहारा के कामों में व्यस्त है, इसलिए घर नहीं लौट पाएगा.

दिनबदिन होता गया खतरनाक

यह सुन उस के मातापिता का परेशान होना लाजिमी था. कई महीने तक वह बेटे के घर लौटने का इंतजार करते रहे. वह नहीं लौटा तो निराश हो कर उन्होंने वकील तस्तुमी साकोमाटो से संपर्क कर अपनी व्यथा बताई. तस्तुमी ने उन्हें काररवाई करने का आश्वसन दिया.

इस की खबर कुछ और अभिभावकों को भी लग गई थी, जिन के बच्चे घरबार छोड़ कर शोको की शरण में चले गए थे. इन में ओयामा नामक एक युवती के मातापिता भी थे. उन्होंने बताया कि उन की बेटी अपना घर छोड़ कर कई सालों से शोको के पास रहती है. लाख समझाने पर भी वह घर नहीं लौटी. वह उस से मिलना चाहते हैं तो शोको के शिष्य मिलने तक नहीं देते.

सच्चाई का पता लगाने के लिए तस्तुमी शोको के कानूनी सलाहकार योशींबु से मिला. उस ने ओयामा के मातापिता द्वारा लगाए गए आरोपों की बात कही तो योशींबु ने इसे सिरे से नकार दिया. तब तस्तुमी ने ओयामा का टीवी पर इंटरव्यू करवाने की बात कही. लेकिन योशींबु ने स्पष्ट जवाब न दे कर उसे टाल दिया. यह खबर शोको तक पहुंची तो वह घबरा गया. ओयामा के टीवी पर इंटरव्यू से उस के तथाकथित संप्रदाय की काली करतूत उजागर हो सकती थी.

वकील तस्तुमी उस के लिए खतरे की घंटी बन कर आया था. अत: शोको ने अपने शिष्यों से तस्तुमी को धमकी भरे फोन करवाए. तस्तुमी धमकी से डरा नहीं, बल्कि वह अब विभिन्न माध्यमों से लोगों को जागरूक करने लगा. उस ने इस सच को लोगों के सामने उजागर किया कि शोको पाखंडी है. उस ने अपने शिष्यों और शिष्याओं को बंदी बना कर रखा हुआ है.

तस्तुमी की इस हरकत से शोको बौखला उठा. उस ने अपने संप्रदाय के वैज्ञानिकों को बुला कर तस्तुमी का मुंह सदा के लिए बंद करने का उपाय करने को कहा. शोको के इस आदेश का पालन हुआ.

एक योजना के तहत शोको के वैज्ञानिक शिष्यों हिडीई मुराई, सातोरो हाशिमोटो और डा. नाकागवा ने एक थैली में पोटैशियम क्लोराइड के 7 इंजेक्शन तैयार किए. फिर तीनों योकोहामा रेलवे स्टेशन पर तस्तुमी का इंतजार करने लगे. मगर कई घंटे बीत जाने पर भी उन्हें वह दिखाई नहीं दिया.

इस योजना के फेल हो जाने पर गुस्साए शोको के तथाकथित बदमाश शिष्यों का ग्रुप रात 3 बजे तस्तुमी के घर पहुंच गया. शोर सुन कर उस के एक वर्षीय बेटे की नींद खुल गई. एकाएक इतने लोगों को देख वह रोने लगा. तभी डा. नाकागवा (ग्रुप सदस्य) ने बच्चे के हाथ में इंजेक्शन लगा कर उसे मौत की नींद सुला दिया.

अब तक शोर और बच्चे के रोने की आवाज सुन कर तस्तुमी और उस की पत्नी भी जाग गए थे. उन्हें काबू में कर के विरोध करने से पहले ही जहरीले इंजेक्शन लगा कर दुनिया से विदा कर दिया गया. फिर तीनों की लाशें कपड़े में लपेट कर अपने साथ लाए ट्रक में लाद दीं और दूर पहाड़ों के बीच पहुंच कर तीनों लाशों के दांत निकाल लिए. इस के बाद तीनों लाशों को समुद्र की गहराई में फेंक दिया. यह घटना 3 नवंबर, 1989 की है.

तस्तुमी, उस की पत्नी और बेटे की हत्या हो जाने की खबर फैली जरूर, पर पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. न ही पुलिस शोको के खिलाफ कोई सबूत जुटा पाई.

शोको के कयामतवादी संप्रदाय के वैज्ञानिकों हिडीई मुराई और सीची एंडो ने अब तक मौत की नींद सुलाने वाले कई तरह के पदार्थों का आविष्कार कर लिया था.

इधर शोहरत की चरम पर पहुंच चुका शोको अब जापान पर हुकूमत करना चाहता था. सरकार को एक झटके में हटा कर खुद वहां का शासक बनने की उस की इच्छा तीव्र होती जा रही थी. शोको की ख्याति अन्य देशों में भी फैल चुकी थी. इसी का लाभ उठाते हुए एक योजना के तहत सन 1992 में शोको अपने दलबल के साथ रूस पहुंचा.

वहां के नेता उस से प्रभावित थे. अत: वहां उस का जोरदार स्वागत हुआ. अपनी योजना के अनुसार शोको ने अपने राजनैतिक दायरे को विस्तार देना शुरू कर दिया, ताकि उस की आड़ में वह रूस में रह कर आधुनिक हथियारों का निर्माण कर उन्हें जापान ला सके.

शोको असाहारा दिखावे के लिए साधारण संत की तरह था, पर उस की वास्तविक जिंदगी ऐश और विलासपूर्ण थी. उस के पास      दुनिया की सब से महंगी 11 कारों में से एक मर्सिडीज व रोल्स रौयस भी थीं. शोको की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि कब वह जापानी सरकार को गिरा कर देश के तख्तोताज पर विराजमान होगा.

मौत का बड़ा खेल खेलना चाहता था शोको

सन 1993 में इसी के चलते शोको वापस जापान लौट आया. टोक्यो के बाहरी इलाके में स्थित अपनी 8 मंजिला इमारत को उस ने पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया. यहीं पर शोको के वैज्ञानिक एक गैस ‘बासीलुसांथ्राक्स’ जिसे एंथ्रेक्स नाम से भी जाना जाता था, बनाने में कामयाब हो गए. इसी गैस का प्रयोग अंगरेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किया था.

एंथ्रेक्स का असर धीरेधीरे होता है. इस के नथुनों में पहुंचने पर पहले जुकाम व बुखार होता है, फिर मितली, उल्टी होनी शुरू हो जाती है. शरीर पर काले रंग के धब्बे उभरने लगते हैं. मस्तिष्क में इस के पहुंचने पर व्यक्ति कोमा में चला जाता है, फिर अंत में उस की दर्दनाक मौत होती है. एंथ्रेक्स गैस की गंध आसपास के इलाकों में फैलने लगी थी. शोको की इमारत से निकलने वाली इस गंध पर कुछ लोगों को संदेह हुआ तो उन्होंने पुलिस से शिकायत कर दी.

पुलिस ने प्रयोगशाला में छापा मारा तो वहां से बस सोयाबीन आयल के ड्रम ही मिले. फलस्वरूप पुलिस ने शोको के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की. दरअसल, शोको भी पहुंचा हुआ खिलाड़ी था. उसे पहले से पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. इसीलिए उस ने अपनी इस विशाल प्रयोगशाला से संवेदनशील और आपत्तिजनक पदार्थ पहले ही गायब करवा दिए थे.

शोको चाहता था कि उस के वैज्ञानिक बेहद खतरनाक गैस सेरिन का निर्माण जल्द से जल्द करें, ताकि वह मौत का तांडव कर लोगों में दहशत फैला सके और इसे सरकार की नाकामयाबी कह कर उसे उखाड़ फेंके.

मौत के इस भयानक खेल को अंजाम देने के लिए शोको ने भाउट फुजी नामक अपनी इमारत में सेरिन गैस का आविष्कार व निर्माण करने के लिए अपने वैज्ञानिकों को दिनरात एक कर देने का आदेश दे दिया था. उस ने अब इस इमारत का नाम बदल कर ‘सायतान-7’ कर दिया था. इंसान की मौत निश्चित करने के लिए सेरिन गैस की नाममात्र की मात्रा ही काफी होती है.

लंबे प्रयास के बाद आखिर शोको के वैज्ञानिकों ने इस गैस का निर्माण कर लिया. अब उस के वैज्ञानिकों, शिष्यों, सदस्यों और कर्मचारियों को इंतजार था तो बस अपने आका शोको के आदेश का, जिस से वह मौत का खेल खेल कर दहशत फैला सकें और अपने कयामतवादी संप्रदाय का लक्ष्य पूरा कर सकें.

टोक्यो की भूमिगत ट्रेन में प्रतिदिन करीब 10 लाख यात्री सफर करते थे. शोको का निशाना भूमिगत ट्रेन का सब से व्यस्ततम रेलवे स्टेशन था.

शोको के कहने पर शिष्यों ने रची बड़ी साजिश

20 मार्च, 1995 की सुबह के 8 बजे थे. टोक्यो वासी अंजान थे कि अगला पल उन की जिंदगी का काल बन कर आएगा. शोको का मुख्य वैज्ञानिक हिडीयो मुराई अपने 5 सहायकों कींची हीरोर, यासुओ हायाशी, मासानो योकोयामा, तोयीड़ा और डा. इराव हयाशी के साथ स्टेशन पर पहुंचा.

योजना के अनुसार सभी अलगअलग ट्रेनों में सवार हो गए. कासुमीगोसेकी स्टेशन आते ही हिडीयो के पांचों सहायकों ने छिपा कर रखे सेरिन के पैकेट खोल दिए. देखते ही देखते ट्रेनों में मर्मांतक चीखों से वातावरण थर्रा उठा.

ट्रेनों को रोका गया. जिसे जिधर जगह मिली, वह उधर ही अपनी जान बचाने को भागा. रेल प्रशासन भी हरकत में आ गया. इस भयावह स्थिति से निबटने के हर प्रयास किए गए. बावजूद इस के इस मौत के तांडव में 12 लोगों को जहां अपनी जान गंवानी पड़ी वहीं करीब 6 हजार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

इस घटना के बाद टोक्यो पुलिस ही नहीं, जापानी सरकार भी हिल गई. इसे आतंकवादी काररवाई मानते हुए इसे अंजाम देने वालों    को खतरनाक देशद्रोही आतंकी करार दिया  गया. टोक्यो की तमाम पुलिस और गुप्तचर संस्थाएं अपराधियों की तलाश में कमर कस कर जुट गईं.

घटना के 2 दिन बाद ही 22 मार्च, 1995 को करीब एक हजार पुलिसकर्मियों ने आखिर इस घटना को अंजाम देने वाले डा. इराव हयाशी, कीयोहीदी हायाकाता और टीमो मीस्तु नीमी के साथ शोको असाहारा के डेढ़ सौ शिष्यों को भी गिरफ्तार कर लिया.

अब तलाश थी मौत के सौदागार शोको असाहारा की. आखिर 16 मई, 1995 को दबिश दे कर शोको असाहारा को उस की ‘सायतान-7’ नामक इमारत से गिरफ्तार कर लिया गया. शोको असाहारा पर 11 सालों तक चले केस का अंतिम फैसला अक्तूबर, 2006 में आया.

11 सालों तक चले मुकदमे का अंतिम फैसला

जापान के सर्वोच्च न्यायालय ने कयामतवादी संप्रदाय चलाने वाले शोको को दी गई ‘मृत्युदंड’ की सजा पर अंतिम मोहर लगा दी. वैसे उसे यह सजा सन 2004 में ही सुना दी गई थी, पर शोको के वकीलों का तर्क था कि शोको की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है.

शोको ने केस की सुनवाई के दौरान कई बार सजा से बचने के लिए नाटक भी किया था. उस ने अपने वकीलों और बच्चों से बात करनी बंद कर दी, वह फर्श पर कुशन पर बैठता था और किसी बात का जवाब नहीं देता था. तब मनोवैज्ञानिकों ने उस की मानसिक दशा की जांच की और कहा कि वह जजों को गुमराह करने के लिए नाटक कर रहा है.

15 सितंबर, 2006 को जापान के सर्वोच्च न्यायालय ने बचावपक्ष की अपील फिर से सुनने के बाद उन की दलील को अंतिम तौर पर ठुकराते हुए शोको के गले में मौत का फंदा डालने का रास्ता साफ कर दिया. मगर उस के वकील कोई न कोई दलील पेश कर के उसे अब तक मौत से बचाए हुए थे. शोको की बेटी रायका मात्सुमोटा ने रहम के लिए कई बार गुहार लगाई.

मौत का खेल खेल कर दुनिया पर अपनी कयामतवादी हुकूमत स्थापित करने का ख्वाब सजाने वाला तथाकथित संत, एक्युपंक्चर विशेषज्ञ और आध्यात्मिक गुरु शोको असाहारा को 6 जुलाई, 2018 को फांसी पर लटका दिया गया.

शोको के साथ उस के 6 समर्थकों को भी फांसी की सजा दी गई. आखिरकार टोक्यो सबवे सेरिन गैस हमले के पीडि़तों को इंसाफ मिला. सालों से टोक्यो के लोग इस दिन का इंतजार कर रहे थे, जिन्होंने इस हमले में अपनों को खो दिया था. पिछले 23 सालों से उस दर्द को सीने में दबाए इन लोगों के चेहरे नम आंखों के साथ खुशी से खिल उठे.

स्वार्थ के रिश्ते : नलिनी और अमित के बीच कैसा रिश्ता था

घटना 27 जुलाई, 2018 की है. उस दिन कोर्ट में शीलेश की पत्नी नलिनी के बयान होने थे. शीलेश तो कोर्ट जाने के लिए तैयार हो गया था, नलिनी तैयार हो रही थी. शीलेश पत्नी से जल्द तैयार होने की कह कर किराए की गाड़ी लेने के लिए चला गया.

उस समय दोपहर के 12 बजे बजने वाले थे. थोड़ी देर बाद शीलेश जब घर वापस आया तो उस ने पत्नी को आवाज दी, ‘‘नलिनी, गाड़ी आ गई है, जल्दी आ जाओ.’’

आवाज देने के बाद भी जब कोई जवाब नहीं मिला तो वह अंदर कमरे में गया. वहां का दृश्य देखते ही उस के होश उड़ गए, मुंह से चीख निकल गई. नलिनी पंखे पर फंदा लगा कर लटकी हुई थी. वह जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग आ गए. पत्नी की सांस चल रही है या नहीं, जानने के लिए शीलेश ने लोगों की मदद से नलिनी को फंदे से नीचे उतारा. लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी.

किसी ने इस की सूचना थाना जसराना को दे दी. सूचना मिलने पर थानाप्रभारी मुनीश चंद्र और सीओ प्रेमप्रकाश यादव मौके पर पहुंच गए. कमरे से कोई सुसाइड नोट वगैरह नहीं मिला. पुलिस ने शव का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भेज दिया.

इस के बाद पुलिस ने मृतका के घर वालों से बात की तो पति शीलेश ने आरोप लगाया कि अगर पुलिस समय रहते काररवाई करती तो नलिनी को शायद आत्महत्या नहीं करनी पड़ती. इस के लिए गुनहगार वे लोग भी हैं, जिन के खिलाफ नलिनी ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना जसराना का एक गांव है औरंगाबाद. शीलेश चंद्र अपनी पत्नी नलिनी और 10 साल के बेटे के साथ इसी गांव में रहता था. उस ने घर में ही परचून की दुकान खोल रखी थी, इस के अलावा वह जीवनबीमा का काम भी करता था. इस सब से उसे अच्छीखासी आमदनी हो रही थी.

नलिनी ग्रैजुएट थी. साल 2015 में उस ने ग्रामप्रधान का चुनाव लड़ा था. चुनाव के समय गांव के ही अमित उर्फ छटंकी ने नलिनी का पूरा चुनावी प्रबंधन देखा था और हर तरह से सहयोग भी किया था. गांव के रिश्ते से अमित नलिनी को चाची कहता था.

चुनाव के दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. चुनाव में नलिनी कुछ वोटों के अंतर से हार भले ही गई थी, लेकिन इस बीच उस के अमित से अवैध संबंध बन गए थे.

कहने को 24 साल का अमित नलिनी से उम्र में 12 साल छोटा था, लेकिन वह अच्छी कदकाठी का गबरू जवान था. नलिनी भी हंसमुख व चंचल स्वभाव की आकर्षक नैननक्श वाली महिला थी.

घातक रिश्ता नलिनी और अमित का

अमित के 5 भाई थे. इन में से 4 भाई शहर में रह कर अपना काम कर रहे थे, जबकि अमित गांव में अपने बड़े भाई के साथ रहता था. अमित अपने भाइयों में सब से छोटा था. इसी वजह से सब प्यार से उसे छटंकी कहते थे. नलिनी और अमित दोनों एकदूसरे के प्यार में इस तरह डूबे कि उन्हें घर व गांव वालों का कोई डर ही नहीं रहा.

गुजरते समय के साथ दोनों के संबंध गहरे होते गए. शीलेश जब बीमा के काम से बाहर चला जाता, तो अमित चाची के घर पहुंच जाता. अमित ने होशियारी यह दिखाई कि नलिनी के साथ बिताए अंतरंग क्षणों को उस ने अपने मोबाइल में कैद कर लिया था.

नलिनी अमित को दिलोजान से चाहती थी. यह सिलसिला पिछले लगभग 4 सालों से चल रहा था. अवैध संबंध भला किसी के छिपे हैं जो इन के छिप जाते. कानाफूसी से होते हुए यह खबर पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गई.

शीलेश पत्नी पर बहुत विश्वास करता था. जब उसे पत्नी के बारे में पता लगा तो वह तिलमिला गया. गुस्से में उस का खून खौल उठा. उस ने पत्नी को जम कर खरीखोटी सुनाने के साथ ही अमित को भी बुराभला कहते हुए अपने घर न आने की सख्त हिदायत दे दी.

इसी बात को ले कर 16 जून, 2018 को शीलेश और अमित में विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट तक हो गई. मामला बढ़ने पर पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने दोनों पक्षों के खिलाफ शांति भंग की काररवाई की. इस मामले में अमित गिरफ्तार भी हुआ. जमानत के बाद उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया था.

अमित ने अपने मोबाइल से नलिनी के कई अश्लील फोटो खींचे थे. साथ ही कई वीडियो भी बना रखी थीं. उस ने शीलेश को दबाव में लेने और सबक सिखाने के लिए सोशल मीडिया पर नलिनी के अश्लील फोटो और वीडियो वायरल कर दिए. वायरल हुए वीडियो और फोटो वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए दोनों के परिवारों तक पहुंच गए.

फोटो और वीडियो देख कर घर वालों के होश उड़ गए. उधर गांव के युवक अश्लील वीडियो व फोटो मोबाइल पर देख कर मजे लेने के साथ ही शीलेश के ऊपर फब्तियां भी कसने लगे. इस के चलते पतिपत्नी का घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया.

शीलेश खून का घूंट पी कर रह गया. आखिर उस ने अमित व उस के साथियों के खिलाफ 20 जून, 2018 को थाना जसराना में मुकदमा दर्ज कराने के लिए तहरीर दी. पुलिस ने इस मामले में दिलचस्पी न ले कर पहले जांच कर के रिपोर्ट दर्ज करने की बात कही.

आरोपियों पर ब्लैकमेलिंग का आरोप

लोगों की फब्तियों से शीलेश और नलिनी गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे थे. आखिर किसी की सिफािरश के बाद पुलिस ने 16 जुलाई को अमित उर्फ छटंकी, अनिल व उस के भाई जितेंद्र के खिलाफ आईटी एक्ट में मुकदमा दर्ज कर लिया. दबाव में पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली लेकिन उस ने आरोपियों के खिलाफ काररवाई नहीं की.

आरोपी खुले में ऐसे ही घूमते रहे. इस पर शीलेश और नलिनी ने उच्चाधिकारियों के औफिसों के कई चक्कर लगाए. इस के बाद थाना पुलिस ने नलिनी के आत्महत्या करने से 4 दिन पहले यानी 23 जुलाई, 2018 को नलिनी को बयान देने के लिए थाने बुलाया. उस के बयान के बाद 24 जुलाई को पुलिस ने उस का मैडिकल कराया.

पीडि़ता के बयानों के आधार पर मुकदमे में पुलिस ने गैंगरेप की धारा भी जोड़ दी. 27 जुलाई को पीडि़ता के कोर्ट में बयान होने थे. लेकिन वह बयान देने के लिए कोर्ट जाने को तैयार नहीं थी. जबकि पति आरोपियों के खिलाफ बयान देने का दबाव डाल रहा था.

काफी दबाव के बाद वह कोर्ट जाने के लिए तैयार हुई. 27 जुलाई को शीलेश और नलिनी ने कोर्ट जाने की तैयारी कर ली थी. इस के लिए शीलेश किराए की गाड़ी लेने गया था. जब वह लौट कर आया तो उसे नलिनी पंखे से लटकी मिली.

शीलेश का कहना है कि उस के गाड़ी लेने के लिए जाने के बाद नलिनी ऊहापोह में फंस गई होगी. क्योंकि गांव में उस की बहुत बदनामी हो चुकी थी, वह पड़ोसियों और घर वालों से आंखें नहीं मिला पा रही थी. उसे एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई दिखाई दे रही थी. वह अमित के विरुद्ध कोर्ट में बयान नहीं देना चाहती थी. लेकिन अमित से प्यार के चलते हो रही बदनामी से वह पूरी तरह टूट चुकी थी.

पीडि़ता के पति शीलेश ने पत्नी द्वारा आत्महत्या करने पर तीनों आरोपियों पर पत्नी के साथ दुष्कर्म करने, उस के अश्लील वीडियो व फोटो बना कर वायरल करने तथा ब्लैकमेलिंग करने का आरोप लगाया. उस ने कहा कि आरोपी और उन के परिजन उसे व नलिनी को धमकी दे रहे थे कि वह अपनी रिपोर्ट वापस ले लें, नहीं तो अंजाम और ज्यादा खतरनाक होगा.

उस का आरोप था कि पुलिस समय से काररवाई करती तो नलिनी को आत्महत्या के लिए बाध्य नहीं होना पड़ता. जब मीडिया में पुलिस की लापरवाही वाली बात आई तो पुलिस उच्चाधिकारी हरकत में आए. उच्चाधिकारियों ने इस मामले की अलग से जांच बैठा दी.

थानाप्रभारी मुनीश चंद्र और इस मामले की विवेचना कर रहे इंसपेक्टर सोमपाल सिंह सैनी तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी में जुट गए. मुख्य आरोपी अमित पर दबाव बनाने के लिए पुलिस उस की भाभी रामप्यारी और बहनोई को थाने ले आई. बाद में बहनोई को थाने से छोड़ दिया गया.

आरोपी अमित ने भी की आत्महत्या

पीडि़ता द्वारा आत्महत्या किए अभी 12 घंटे ही बीते थे. उस का शव पोस्टमार्टम के बाद गांव पहुंच भी नहीं पहुंच पाया था कि 28 जुलाई, 2018 की रात में रेप के मुख्य आरोपी अमित उर्फ छटंकी ने भी अपने घर के बरामदे में पड़े लोहे के जाल पर फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली.

29 जुलाई की सुबह जब गांव वाले सो कर उठे तो उन्हें इस घटना की जानकारी मिली. इस से गांव में सनसनी फैल गई. सूचना मिलने पर पुलिस थाने से अमित की भाभी रामप्यारी को ले कर गांव पहुंच गई.

पुलिस ने अमित के शव को फंदे से उतार कर जरूरी काररवाई की और शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. अमित के पास से पुलिस ने एक सुसाइड नोट भी बरामद किया, जिस में लिखा था कि मेरी मौत का कोई जिम्मेदार नहीं है.

नलिनी ने मेरे लिए जान दी है. मैं भी उस के लिए जान दे रहा हूं. मेरी जान मुझे मिस कर रही है. मैं आ रहा हूं सनम. उस ने सुसाइड नोट में यह भी लिखा कि अनिल और उस का भाई जितेंद्र बेकुसूर हैं. सोशल साइट पर फोटो और वीडियो मैं ने ही वायरल किए थे.

रामप्यारी ने बताया कि सोशल साइट पर अश्लील फोटो नलिनी के पति शीलेश और अमित ने डाले थे. गांव के ही एक व्यक्ति के घर पर नलिनी के पति, देवर व गांव के कुछ लोगों की मीटिंग हुई थी. उस का आरोप था कि नलिनी को इन लोगों ने ही मारा है. मरने के बाद उसे पहले फंदे पर लटकाया फिर फंदे से उतार कर शोर मचा दिया गया.

रामप्यारी ने आगे बताया कि उस दिन इन लोगों ने हमारे साथ मारपीट के अलावा घर में आगजनी भी की. अमित के भाई वीर सिंह ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि नलिनी से अमित के संबंध पिछले 4 साल से थे. वह अमित से पैसे लेती रहती थी, इसलिए उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं कराना चाहती थी.

दबाव में उस ने रिपोर्ट तो लिखवा दी लेकिन वह उस के खिलाफ कोर्ट में बयान देने को मना कर रही थी, पर उस का पति गवाही देने के लिए उस पर दबाव डाल रहा था. नलिनी की मौत के बाद उस के पति, देवर व अन्य लोगों ने अमित को फंदे पर लटका कर उस की हत्या कर दी.

अमित द्वारा आत्महत्या कर लेने की सूचना पा कर एसएसपी सचिंद्र पटेल, एसपी (ग्रामीण) महेंद्र सिंह और कुछ देर बाद आईजी (आगरा रेंज) राजा श्रीवास्तव भी गांव पहुंच गए. तब तक मामले ने तूल पकड़ लिया था.

ग्रामीणों में भी आक्रोश था. गांव वालों का आरोप था कि नलिनी की मौत के बाद पुलिस दबिश दे कर आरोपियों को जल्दी गिरफ्तार करने का दावा कर रही थी, किसी की गिरफ्तारी तो हुई नहीं, उलटे आरोपी ने अपने ही मकान में गले में फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली.

आखिर पुलिस के दबिश देने के दावे में कितनी सच्चाई थी? आईजी ने भी घटनास्थल पर पहुंच कर नलिनी और अमित के घर वालों व ग्रामीणों से बात की.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को इस मामले में थाना पुलिस की लापरवाही की जानकारी मिल चुकी थी. आईजी राजा श्रीवास्तव के निर्देश पर एसएसपी सचिंद्र पटेल ने मामले को गंभीरता से ले कर थानाप्रभारी मुनीश चंद्र और विवेचक इंसपेक्टर सोमपाल सिंह सैनी के विरुद्ध काररवाई करते हुए दोनों को निलंबित कर दिया.

फिरोजाबाद के थाना उत्तर में तैनात अतिरिक्त थानाप्रभारी रणवीर सिंह को जसराना का थानाप्रभारी नियुक्त किया गया. एसएसपी ने बताया कि मामले की जांच कराई जा रही है. गांव में बने तनाव को देखते हुए फोर्स तैनात कर दी गई.

आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला

इस मामले में अमित के भाई ताराचंद, नलिनी के पति शीलेश और देवर के अलावा गांव के ही 2 अन्य लोगों के खिलाफ अमित को आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज हुआ. इस संबंध में एसपी (ग्रामीण) महेंद्र सिंह का कहना था कि जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ काररवाई होगी. उधर नए थानाप्रभारी रणवीर सिंह ने फोटो व वीडियो वायरल करने में सहयोगी रहे 2 सगे भाइयों अनिल और जितेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. उन से पूछताछ करने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

नलिनी के पति से झगड़ा होने के बाद अगर अमित संयम से काम लेता और बदला लेने के लिए फोटो और वीडियो वायरल करने जैसा गलत कदम न उठाता तो नलिनी और उसे आत्महत्या करने को बाध्य न होना पड़ता. गुस्से के वशीभूत अमित ने जो कदम उठाया, देखा जाए तो वह आत्मघाती था. अमित का यह कदम नलिनी और खुद उस के लिए फांसी का फंदा बन गया.

– कथा में पीडि़ता व उस के पति के नाम परिवर्तित हैं

चांद बूढ़ा हो गया

चांद बूढ़ा हो गया है अब नहीं लुभाता किसी को

चांद को देर तक तकना, बातें करना गुजरे समय की बात हो गई है.

इमारतें आसमान से बातें करती हैं

हालचाल पूछ लेती हैं चांद का वो जो चांद के कसीदे पढ़ते थे

उन की रातें फानूस को घूरते कटती हैं.

नई नस्ल का लगाव नहीं अब चांद से उन के सपने भी हाइटैक हो गए हैं

घर के बुजुर्गों जैसा हो गया है चांद राह में चुपचाप सा रहता है.

समय चिपक गया है जैसे

झुर्रियां बन कर उस के चेहरे पर उदास आंखों से ताकता है जमीं पर

शायद कभी कोई बच्चा चंदा मामा कह कर आवाज लगा दे.

– सरिता पंथी

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