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फ्रेशर्स का सालाना वेतन अब 3.5 लाख रुपए से ज्यादा

पढ़े लिखे फ्रेशर्स के लिए खुशखबरी है. कालेज/इंस्टिट्यूट से आईटी (इन्फार्मेशन टेक्नोलौजी) के क्षेत्र में डिगरी हासिल कर जौब में आए फ्रेशर्स को अब 3.5 लाख रुपए या उस से ज्यादा सालाना वेतन मिलेगा.  आईटी कम्पनियों ने देश में तकरीबन 5 वर्षों में एंट्री लेवल के कर्मचारियों का सैलरी पैकेज बढ़ा कर 3.5-3.6 लाख रुपए सालाना कर दिया है. फ्रेशर्स का सैलरी पैकेज इसलिए बढ़ाया गया है क्योंकि ऐसी युवा प्रतिभाओं की मांग बढ़ रही है जिन्हें वैश्विक ग्राहकों के बढ़ते औडर्स से तालमेल बैठाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है.

एंट्री लेवल कर्मचारियों के सैलरी पैकेज में 8-10 फीसदी की बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह औद्योगिक क्षेत्र में तकनीक की बढती भूमिका भी है जो कम्पनियों को प्रशिक्षित प्रतिभाओं को नियुक्त करने के लिए मजबूर कर रही है.

देश की जानीमानी आईटी कंपनी विप्रो के प्रवक्ता का कहना है, “हम ने सभी इंस्टिट्यूट हायरिंग (कैम्पस रिक्रूटमेंट) के लिए सैलरी पैकज बढ़ाया है.  हम एंट्री लेवल पर पहले 3.2 लाख रुपए से 3.3 लाख रुपए तक औफर करते थे, जिसे अब बढ़ा कर 3.5लाख रुपए कर दिया है.

आईटी इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का कहना है कि पिछले 5-6 वर्षों से एंट्री लेवल पैकज 3.1 लाख रुपए से 3.3 लाख रुपए के बीच बना हुआ था.  पैकज बढ़ने से संकेत मिलता है कि कम्पनियां अपने ग्रोथ वाले व्यवसाय की वर्कफोर्स को मज़बूत कर रही हैं. भारतीय कम्पनियां तकरीबन 3 साल की सुस्ती के बाद हज़ारों फ्रेशर्स को रिक्रूट करने के लिए इंजीनियरिंग कैंपस में फिर से जा रही हैं. एचसीएल टेक्नोलोजीज करीब 25 हज़ार फ्रेशर्स को रिक्रूट करेगी. इनफ़ोसिस ने भी कहा है की उस ने एंट्री लेवल पैकज को बढ़ा कर 3.6  लाख रुपए कर दिया है.

इनफ़ोसिस के प्रवक्ता का कहना है कि कम्पनी ने कैम्पस रिक्रूटमेंट के लिए शुरूआती वेतन बढ़ा कर 3.6 लाख रुपए कर दिया है. इस के अलावा, कम्पनी चयन प्रक्रिया में अच्छा प्रदर्शन करने वाले और बेहतर स्किल वाले कैंडिडेट को 5 लाख से 8लाख रुपए भी औफर कर रही है.

गौरतलब है कि देश की सब से बड़ी टेक सर्विस फर्म टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने अक्टूबर की शुरुआत में कहा था कि उस ने डिजिटल टेक्नोलोजी स्किल वाले कैंडिडेट्स के लिए पैकेज को डबल करते हुए 6.5 लाख रुपए कर दिया है.

देश की आईटी कम्पनियां उन कैंडिडेट्स को 5 से 6 लाख रुपए के बीच और 8 लाख रुपए तक औफर कर रही हैं जिन के पास डेटा एनालिटिक्स, मशीन लर्निंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जैसी नई टेक्नोलौजी स्किल हैं. यह ऐसा सेगमेंट है जहां देसी कंपनियों को वैश्विक मल्टीनेशनल्स से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है.

नीड़ का निर्माण फिर से (अंतिम भाग)

पूर्व कथा

मानसी की जिंदगी में राज आया और चला गया तब उस को मनोहर से प्यार हो गया  और फिर विवाह. मनोहर की शराब पीने की आदत से बेजार मानसी आखिरकार उस से तलाक लेने का निर्णय ले लेती है. मनोहर को जब पता चलता है तब वह रो पड़ता है. वह मानसी को यकीन दिलाता है कि वह शराब छोड़ देगा. अब वह चोरीछिपे शराब पीने लगता है. तब सब के बहुत समझाने के बाद भी मानसी आखिकार तलाक ले लेती है और अपनी बच्ची चांदनी के साथ अलग रहने लगती है.

मनोहर अब और ज्यादा शराब पीने लगता है. उसे उम्मीद नहीं थी कि मानसी उसे इस तरह तलाक भी दे सकती है. वह अपनी मां को भी दोष देता है कि इस सब के पीछे वह भी जिम्मेदार है क्योंकि वह भी मानसी को हर समय कोसती रहती थी. उस के पिता उस की इस हालत से तंग आ कर अपने बड़े बेटे राकेश को बंगलौर से बुलाते हैं.

गतांक से आगे…….

‘अब तुम ही संभालो, राकेश. मैं हार चुका हूं,’ मनोहर के पिता के स्वर में गहरी हताशा थी.

‘मनोहर, तुम पीना छोड़ दो,’ राकेश बोला.

‘नहीं छोड़ूंगा.’

‘तुम्हारी हर जरूरत पूरी होगी बशर्ते तुम पीना छोड़ दो.’

राकेश के कथन पर मनोहर बोला, ‘मुझे कुछ नहीं चाहिए सिवा चांदनी और मानसी के.’

‘मानसी अब तुम्हारी जिंदगी में नहीं है. बेहतर होगा तुम अपनी आदत में सुधार ला कर फिर से नई जिंदगी शुरू करो. मैं तुम्हें अपनी कंपनी में काम दिलवा दूंगा.’ मुझे शादी नहीं करनी.’

‘मत करो शादी पर काम तो कर सकते हो.’

मनोहर पर राकेश के समझाने का असर पड़ा. वह शून्य में एकटक देखतेदेखते अचानक बच्चों की तरह फफक कर रो पड़ा, ‘भैया, मैं ने मानसी को बहुत कष्ट दिए. मैं उस का प्रायश्चित्त करना चाहता हूं. मैं अपनी फूल सी कोमल बेटी को मिस करता हूं.’

‘चांदनी अब भी तुम्हारी बेटी है. जब कहो तुम्हें उस से मिलवा दूं, पर…’

‘पर क्या?’

‘तुम्हें एक जिम्मेदार बाप बनना होगा. किस मुंह से चांदनी से मिलोगे. वह तुम्हें इस हालत में देखेगी तो क्या सोचेगी,’ राकेश कहता रहा, ‘पहले अपने पैरों पर खड़े हो ताकि चांदनी भी गर्व से कह सके कि तुम उस के पिता हो.’

उस रोज मनोहर को आत्मचिंतन का मौका मिला. राकेश उसे बंगलौर ले गया. उस का इलाज करवाया. जब वह सामान्य हो गया तो उस की नौकरी का भी बंदोबस्त कर दिया. धीरेधीरे मनोहर अतीत के हादसों से उबरने लगा.

इधर मानसी के आफिस के लोगों को पता चला कि उस का  तलाक हो गया है तो सभी उस पर डोरे डालने लगे. एक दिन तो हद हो गई जब स्टाफ के ही एक कर्मचारी नरेन ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया. नरेन कहने लगा, ‘मैं तुम्हारी बेटी को अपने से भी ज्यादा प्यार दूंगा.’

मानसी चाहती तो नरेन को सबक सिखा सकती थी पर वह कोई तमाशा खड़ा नहीं करना चाहती थी. काफी सोचविचार कर उस ने अपना तबादला इलाहाबाद करवाने की सोची. वहां मां का भी घर था. यहां लोगों की संदेहास्पद दृष्टि हर वक्त उस में असुरक्षा की भावना भरती.

इलाहाबाद आ कर मानसी निश्ंिचत हो गई. शहर से मायका 10 किलोमीटर दूर गांव में था. मानसी का मन एक बार हुआ कि गांव से ही रोजाना आएजाए. पर भाईभाभी की बेरुखी के चलते कुछ कहते न बना. मां की सहानुभूति उस के साथ थी पर भैया किसी भी सूरत में मानसी को गांव में नहीं रखना चाहते थे क्योंकि उस के गांव में रहने पर अनेक तरह के सवाल उठते और फिर उन की भी लड़कियां बड़ी हो रही थीं. इस तरह 10 साल गुजर गए. चांदनी भी 15 की हो गई.

तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी तो मानसी अतीत से जागी. वह चौंक कर उठी और जा कर दरवाजा खोला तो भतीजे के साथ चांदनी खड़ी थी.

‘‘क्या मां, मैं कितनी देर से दरवाजा खटखटा रही थी. आप सो रही थीं क्या?’’

‘‘हां, बेटी, कुछ ऐसा ही था. तू हाथमुंह धो ले, मैं कुछ खाने को लाती हूं,’’ यह कह कर मानसी अंदर चली गई.

एक दिन स्कूल से आने के बाद चांदनी बोली, ‘‘मम्मी, मेरे पापा कहां हैं?’’

मानसी क्षण भर के लिए अवाक् रह गई. तत्काल कुछ नहीं सूझा तो डपट दिया.

‘‘मम्मी, बताओ न, पापा कहां हैं?’’ वह भी मानसी की तरह जिद्दी थी.

‘‘क्या करोगी जान कर,’’ मानसी ने टालने की कोशिश की.

‘‘इतने साल गुजर गए. जब भी पेरेंट्स मीटिंग होती है सब के पापा आते हैं पर मेरे नहीं. क्यों?’’

अब मानसी के लिए सत्य पर परदा डालना आसान नहीं रहा. वह समय आने पर स्वयं कहने वाली थी पर अब जब उसे लगा कि चांदनी सयानी हो गई है तो क्या बहाने बनाना उचित होता?

‘‘तेरे पिता से मेरा तलाक हो चुका है.’’

‘‘तलाक क्या होता है, मम्मी?’’ उस ने बड़ी मासूमियत से पूछा.

‘‘बड़ी होने पर तुम खुद समझ जाओगी,’’ मानसी ने अपने तरीके से चांदनी को समझाने का प्रयत्न किया, ‘‘बेटी, तेरे पिता से अब मेरा कोई संबंध नहीं.’’

‘‘वह क्या मेरे पिता नहीं?’’

मानसी झल्लाई, ‘‘अभी पढ़ाई करो. आइंदा ऐसे बेहूदे सवाल मत करना,’’ कह कर मानसी ने चांदनी को चुप तो करा दिया पर वह अंदर ही अंदर आशंकित हो गई. अनेक सवाल उस के जेहन में उभरने लगे. चांदनी कल परिपक्व होगी. अपने पापा को जानने या मिलने के लिए अड़ गई तो? कहीं मनोहर से मिल कर उस के मन में उस के प्रति मोह जागा तो? कल को मनोहर ने, उस के मन में मेरे खिलाफ जहर भर दिया तो कैसे देगी अपनी बेगुनाही का सुबूत. कैसे जिएगी चांदनी के बगैर?

मानसी जितना सोचती उस का दिल उतना ही डूबता. उस की स्थिति परकटे परिंदे की तरह हो गई थी. न रोते बनता था न हंसते. अचला को फोन किया तो वह बोली, ‘‘तू व्यर्थ में परेशान होती है. वह जो जानना चाहती है, उसे बता दे. कुछ मत छिपा. वैसे भी तू चाह कर भी कुछ छिपा नहीं पाएगी. बेहतर होगा धीरेधीरे बेटी को सब बता दे,’

मानसी एक रोज आफिस से घर आई तो देखा कि चांदनी के पास अपने नएनए कपड़ों का अंबार लगा था. चांदनी खुशी से चहक रही थी.

‘‘ये सब क्या है?’’ मानसी ने तनिक रंज होते हुए पूछा.

‘‘पापा ने दिया है.’’

‘‘हर ऐरेगैरे को तुम पापा बना लोगी,’’ मानसी आपे से बाहर हो गई.

‘‘मम्मी, वह मेरे पापा ही थे.’’

तभी मानसी की मां कमरे में आ गईं तो वह बोली, ‘‘मां, सुन रही हो यह क्या कह रही है.’’

‘‘ठीक ही तो कह रही है. मनोहर आया था,’’ मानसी की मां निर्लिप्त भाव से बोलीं.

‘‘मां, आप ने ही उसे मेरे घर का पता दिया होगा,’’ मानसी बोली.

‘‘हर्ज ही क्या है. बेटी से बाप को मिला दिया.’’

‘‘मां, तुम ने यह क्या किया? मेरी वर्षों की तपस्या भंग कर दी. जिस मनोहर को मैं ने त्याग दिया था उसे फिर से मेरी जिंदगी में ला कर तुम ने मेरे साथ छल किया है,’’ मानसी रोंआसी हो गई.

‘‘मांबाप अपनी औलाद के साथ छल कर ही नहीं सकते. मनोहर ने फोन कर के सब से पहले मुझ से इजाजत ली. उस ने काफी मन्नतें कीं तब मैं ने उसे चांदनी से मिलवाने का वचन दिया. आखिरकार वह इस का पिता है. क्या उसे अपनी बेटी से मिलने का हक नहीं?’’ मानसी की मां ने स्पष्ट किया, ‘‘मनोहर अब पहले जैसा नहीं रहा.’’

‘‘अतीत लौट कर नहीं आता. मैं ने उस के बगैर खुद को तिलतिल कर जलाया. 10 साल कैसे काटे मैं ही जानती हूं. चांदनी और मेरी इज्जत बची रहे उस के लिए कितनी रातें मैं ने असुरक्षा के माहौल में काटीं.’’

‘‘आज भी तुम क्या सुरक्षित हो. खैर, छोड़ो इन बातों को…चांदनी से मिलने आया था, मिला और चला गया,’’ मानसी की मां बोलीं.

‘‘कल फिर आया तो?’’

‘‘तुम क्या उस को मना कर दोगी,’’ तनिक रंज हो कर मानसी की मां बोलीं, ‘‘अगर चांदनी ने जिद की तो? क्या तुम उसे बांध सकोगी?’’

मां के इस कथन पर मानसी गहरे सोच में पड़ गई. सयानी होती बेटी को क्या वह बांध सकेगी? सोचतेसोचते उस के हाथपांव ढीले पड़ गए. लगा जैसे जिस्म का सारा खून निचोड़ दिया गया हो. वह बेजान बिस्तर पर पड़ कर सुबकने लगी. मानसी की मां ने संभाला.

अगले दिन मानसी हरारत के चलते आफिस नहीं गई. चांदनी भी घर पर ही रही. मम्मीपापा के बीच चलने वाले द्वंद्व को ले कर वह पसोपेश में थी. आखिर सब के पापा अपने बच्चों के साथ रहते हैं फिर उस के पास रहने में मम्मी को क्या दिक्कत हो रही है? यह सवाल बारबार उस के जेहन में कौंधता रहा. मानसी ने सफाई में जो कुछ कहा उस से चांदनी संतुष्ट न थी.

एक रोज स्कूल से चांदनी घर आई तो रोने लगी. मानसी ने पूछा तो सिसकते हुए बोली, ‘‘कंचन कह रही थी कि उस की मां तलाकशुदा है. तलाकशुदा औरतें अच्छी नहीं होतीं.’’

मानसी का जी धक से रह गया. परिस्थितियों से हार न मानने वाली मानसी के लिए बच्चों के बीच होने वाली सामाजिक निंदा को बरदाश्त कर पाना असह्य था. इनसान यहीं हारता है. उत्तेजित होने की जगह मानसी ने प्यार से चांदनी के सिर पर हाथ फेरा और बोली, ‘‘तुझे क्या लगता है कि तेरी मां सचमुच गंदी है?’’

‘‘फिर पापा हमारे साथ रहते क्यों नहीं?’’

‘‘तुम्हारे पापा और मेरे बीच अब कोई संबंध नहीं है,’’ मानसी अब कुछ छिपाने की मुद्रा में न थी.

‘‘फिर वह क्यों आए थे?’’

‘‘तुझ से मिलने,’’ मानसी बोली.

‘‘वह क्यों नहीं हमारे साथ रहते हैं?’’ किंचित उस के चेहरे से तनाव झलक रहा था.

‘‘नहीं रहेंगे क्योंकि मैं उन से नफरत करती हूं,’’ मानसी का स्वर तेज हो गया.

‘‘मम्मी, क्यों करती हो नफरत? वह तो आप की बहुत तारीफ कर रहे थे.’’

‘‘यह सब तुम्हें भरमाने का तरीका है.’’

‘‘मम्मी, जो भी हो, मुझे पापा चाहिए.’’

‘‘अगर न मिले तो?’’

‘‘मैं ही उन के पास चली जाऊंगी. और अपने साथ तुम्हें भी ले कर जाऊंगी.’’

‘‘मैं न जाऊं तो…’’

‘‘तब मैं यही समझूंगी कि आप सचमुच में गंदी मम्मी हैं.’’

चांदनी के कथन पर मानसी एकाएक चिल्लाई. मां का रौद्र रूप देख कर वह बच्ची सहम गई. मानसी की आंखों से अंगारे बरसने लगे. उसे लगा जैसे किसी ने भरे बाजार में उसे नंगा कर दिया हो. गहरी हताशा के चलते उस के सामने अंधेरा छाने लगा. उसे सपने में भी उम्मीद न थी कि चांदनी से यह सुनने को मिलेगा. जिसे खून से सींचा, जिस के लिए न दिन देखा न रात, जो जीने का एकमात्र सहारा थी, उसी ने उसे अपनी नजरों से गिरा दिया. मनोहर उसे इतना प्रिय लगने लगा और आज मैं कुछ नहीं.

मानसी यह नहीं समझ पाई कि मनोहर से उस के संबंध खराब थे बेटी के नहीं. मनोहर उसे पसंद नहीं आया तो क्या चांदनी भी उसी नजरों से देखने लगे. बच्चे तो सिर्फ प्रेम के भूखे होते हैं. चांदनी को पिता का प्यार चाहिए था बस.

रात को मनोहर का फोन आया, ‘‘मानसी, मैं मनोहर बोल रहा हूं.’’

सुन कर मानसी का मन कसैला हो गया.

‘‘मिल गई तसल्ली,’’ वह चिढ़ कर बोली.

‘‘मुझे गलत मत समझो मानसी. मैं चाह कर भी तुम लोगों को भुला नहीं पाया. चांदनी मेरी भी बेटी है.’’

‘‘शराब पी कर हाथ छोड़ते हुए तुम्हें अपनी बेटी का खयाल नहीं आया,’’ मानसी बोली.

‘‘मैं भटक गया था,’’ मनोहर के स्वर में निराशा स्पष्ट थी.

‘‘नया घर बसा कर भी तुम्हें चैन नहीं मिला.’’

‘‘घर, कैसा घर…’’ मनोहर जज्बाती हो गया, ‘‘मानसी, सच कहूं तो दोबारा घर बसाना आसान नहीं होता. अगर होता तो क्या अब तक तुम नहीं बसा लेतीं. सिर्फ कहने की बात है कि पुरुष के लिए सबकुछ सहज होता है. उन्हें भी तकलीफ होती है जब उन का बसाबसाया घर उजड़ता है.’’

मनोहर के मुख से ऐसी बातें सुन कर मानसी का गुस्सा ठंडा पड़ गया. मनोहर काफी बदला लगा. उस ने अब तक शादी नहीं की. यह निश्चय ही चौंकाने वाली बात थी. मनोहर के साथ बिताए मधुर पल एकाएक उस के सामने चलचित्र की भांति तैरने लगे. कैसे उस ने अपनी पहली कमाई से उस के लिए कार खरीदी थी. तब उसे मनोहर का पीना बुरा नहीं लगता था. अचानक वक्त ने करवट ली और सब बदल गया. अतीत की बातें सोचतेसोचते मानसी की आंखें सजल हो उठीं.

‘‘मम्मी, आप को मेरे साथ पापा के पास चलना होगा वरना मैं उन्हें यहीं बुला लूंगी,’’ चांदनी ने बालसुलभ हठ की.

तभी मनोहर की बहन प्रतिमा आ गईं. 10 साल के बाद पहली बार वह आई थीं. उन्हें आया देख कर मानसी को अच्छा लगा. दरवाजे पर आते समय प्रतिमा ने चांदनी की कही बातें सुन ली थीं.

‘‘तलाक ले कर तुम ने कौन सा समझदारी का परिचय दिया था?’’

‘‘दीदी, आप तो जानती थीं कि तब मैं किन परिस्थितियों से गुजर रही थी,’’ मानसी ने सफाई दी.

‘‘और आज, क्या तुम उस से मुक्त हो पाई हो. औरत के लिए हर दिन एक जैसे होते हैं. सब उसी को सहना पड़ता है,’’ प्रतिमा ने दुनियादारी बताई.

‘‘दीदी, आप कहना क्या चाहती हैं?’’

‘‘बाप के साए से बेटी महरूम रहे, क्या यह उस के प्रति अन्याय नहीं,’’ प्रतिमा बोली.

‘‘मैं ने कब रोका था,’’ कदाचित मानसी का स्वर धीमा था.

‘‘रोका है, तभी तो कह रही हूं. 10 साल मनोहर ने अकेलेपन की पीड़ा कैसे झेली यह मुझ से ज्यादा तुम नहीं जान सकतीं. मैं ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि वह तुम से न मिले, न ही फोन पर बात करे. जैसा किया है वैसा भुगते.’’

‘‘दूसरी शादी कर लेते. क्या जरूरत थी अकेलेपन से जूझने की,’’ मानसी बोली.

‘‘यही तो हम औरतें नहीं समझतीं. हम हमेशा मर्द में ही खोट देखते हैं. जरा सी कमी नजर आते ही हजार लांछनों से लाद देते हैं,’’ प्रतिमा किंचित नाराज स्वर में बोलीं. एक पल की चुप्पी के बाद उस ने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘आज उस ने अपनी बेटी के लिए मेरी हिदायतों का उल्लंघन किया. जीवन एक बार मिलता है. हम उसे भी ठीक से नहीं जी पाते. अहं, नफरत और न जाने क्याक्या विकार पाले रहते हैं अपने दिलों में.’’

‘‘मुझ में कोई अहं नहीं था,’’ मानसी बोली.

‘‘था तभी तो कह रही हूं कि प्यार, मनुहार और इंतजार से सब ठीक किया जा सकता है. आखिर मनोहर रास्ते पर आ गया कि नहीं. अब वह शराब को हाथ तक नहीं लगाता. अपने काम के प्रति समर्पित है,’’ प्रतिमा बोलीं.

‘‘काम तो पहले भी वह अच्छा करते थे,’’ मानसी के मुख से अचानक निकला.

‘‘तब कहां रह गई कसर. क्या छूट गया तुम दोनों के बीच जिस की परिणति अलगाव के रूप में हुई. तुम ने एक बार भी नहीं सोचा कि बच्ची बड़ी होगी तो किसे गुनहगार मानेगी. तुम ने सोचा बाप को शराबी कह कर बेटी को मना लेंगे… पर क्या ऐसा हुआ? क्या खून के रिश्ते आसानी से मिटते हैं? मांबाप औलाद के लिए सुरक्षा कवच होते हैं. इस में से एक भी हटा नहीं कि असुरक्षा की भावना घर कर जाती है बच्चों में. ऐसे बच्चे कुंठा के शिकार होते हैं.’’

‘‘आप कहना चाहती हैं कि तलाक ले कर मैं ने गलती की. मनोहर मेरे खिलाफ हिंसा का सहारा ले और मैं चुप बैठी रहूं…यह सोच कर कि मैं एक औरत हूं,’’ मानसी तल्ख शब्दों में बोली.

‘‘मैं ऐसा क्यों कहूंगी बल्कि मैं तुम्हारी जगह होती तो शायद यही फैसलालेती पर ऐसा करते हुए हमारी सोच एकतरफा होती है. हम कहीं न कहीं अपनी औलाद के प्रति अन्याय करते हैं. दोष किसी का भी हो पर झेलना तो बच्चों को पड़ता है,’’ प्रतिमा लंबी सांस ले कर आगे बोलीं, ‘‘खैर, जो हुआ सो हुआ. वक्त हर घाव को भर देता है. मैं एक प्रस्ताव  ले कर आई हूं.’’

मानसी जिज्ञासावश उन्हें देखने लगी.

‘‘क्या तुम दोनों पुन: एक नहीं हो सकते?’’

एकबारगी प्रतिमा का प्रस्ताव मानसी को अटपटा लगा. वह असहज हो गई. दोबारा जब प्रतिमा ने कहा तो उस ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘मुझे सोचने का मौका दीजिए,’’

प्रतिमा के जाने के बाद वह अजीब कशमकश में फंस गई. न मना करते बन रहा था न ही हां. बेशक 10 साल उस ने सुकून से नहीं काटे सिर्फ इसलिए कि हर वक्त उसे अपनी और चांदनी के भविष्य को ले कर चिंता लगी रहती. एक क्षण भी चांदनी को अपनी आंखों से ओझल होने नहीं देती. उसे हमेशा इस बात का भय बना रहता कि अगर कुछ ऊंचनीच हो गया तो किस से कहेगी? कौन सहारा बनेगा? कहने को तो तमाम हमदर्द पुरुष हैं पर उन की निगाहें हमेशा मानसी के जिस्म पर होती. थोड़ी सी सहानुभूति जता कर लोग उस का सूद सहित मूल निकालने पर आमादा रहते.

अंतत: गहन सोच के बाद मानसी को लगा कि अपने लिए न सही, चांदनी के लिए मनोहर का आना उस की जिंदगी में निहायत जरूरी है. हां, थोड़ा अजीब सा मानसी को अवश्य लगा कि जब मनोहर फिर उस की जिंदगी में आएगा तो कैसा लगेगा? लोग क्या सोचेंगे? कैसे मनोहर का सामना करूंगी. क्या वह सब भूल जाएगा? क्या भूलना उस के लिए आसान होगा? टूटे हुए धागे बगैर गांठ के नहीं बंधते. क्या यह गांठ हमेशा के लिए खत्म हो पाएगी?

एक तरफ मनोहर के आने से उस की जिंदगी में अनिश्चितता का माहौल खत्म होगा, वहीं भविष्य को ले कर उस के मन में बुरेबुरे खयाल आ रहे थे. कहीं मनोहर फिर से उसी राह पर चल निकला तो? तब तो वह कहीं की नहीं रहेगी. प्रतिमा से उस ने अपनी सारी दुश्ंिचताओं का खुलासा किया. प्रतिमा ने उस से सहमति जताई और बोलीं, ‘‘मैं तुम से जबरदस्ती नहीं करूंगी. मनोहर से मिल कर तुम खुद ही फैसला लो.’’

मनोहर आया. दोनों में इतना साहस न था कि एकदूसरे से नजरें मिला सकें. मानसी की मां और प्रतिमा दोनों थीं पर वे उन दोनों को भरपूर मौका देना चाहती थीं, दोनों दूसरे कमरे में चली गईं.

‘‘मानसी, मैं ने तुम्हारे साथ अतीत में जो कुछ भी सलूक किया है उस का मुझे आज भी बेहद अफसोस है. यकीन मानो मैं ने कोई पहल नहीं की. मैं आज भी तुम्हारे लायक खुद को नहीं समझता. अगर चांदनी का मोह न होता…’’

‘‘उस के लिए विवाह क्या जरूरी है,’’ मानसी ने उस का मन टटोला.

‘‘बिलकुल नहीं,’’ वह उठ कर जाने लगा. कुछ ही कदम चला होगा कि मानसी ने रोका, ‘‘क्या हम अपनी बच्ची के लिए नए सिरे से जिंदगी नहीं शुरू कर सकते?’’

मानसी के अप्रत्याशित फैसले पर मनोहर को क्षणांश विश्वास नहीं हुआ. वह एक बार पुन: मानसी के मुख से सुनना चाहता था. मानसी ने जब अपनी इच्छा फिर दोहराई तो उस की भी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले.

जिस दिन दोनों एक होने वाले थे अचला भी आई. उसे तो विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि ऐसा भी हो सकता है. सुबह का भूला शाम को लौटे तो उसे भूला नहीं कहते. दरअसल, सब याद कर के ही नहीं, कुछ भूल कर भी जिंदगी जी जा सकती है.

मनोहर और मानसी ने उस अतीत को भुला दिया, जिस ने उन दोनों को पीड़ा दी. चांदनी इस अवसर पर ऐसे चहक रही थी जैसे नवजात परिंदा अपनी मां के मुख में अनाज का दाना देख कर.

एशिया, अफ्रीका और यूरोप पर अमेरिका का रुख

अमेरिका की दरियादिली को 3 साल तक अमेरिकियों के खिलाफ कहने वाले खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों को 60 अरब डौलर की सहायता देने को तैयार हो गए हैं. यह उन का हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि चीन के साथ, प्रभाव के क्षेत्र की जंग का हिस्सा है. राष्ट्रपति चुने जाने से पहले और बाद में ट्रंप यह कहते रहे थे कि अमेरिकी जनता का पैसा दूसरों पर खर्च किया जाए, यह गलत है.

इस के पहले चीन के नेताओं ने वन बैल्ट, वन रोड कार्यक्रम लगभग 60 देशों में चालू कर के चीन के लिए एक बड़े बाजार का रास्ता बनाना शुरू कर ही दिया. इन 60 देशों में सड़कों, रेलों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों को दुरुस्त करने का काम हो रहा है और वह इस पर 100 अरब डौलर से ज्यादा खर्च करने वाला है, जिस में से काफी खर्च हो भी चुका है.

चीन पैसा दान दे रहा हो, ऐसा नहीं. हर दान देने वाले के छिपे स्वार्थ होते हैं पर कई बार दान दोनों के लिए हितकारी होता है. वन बैल्ट, वन रोड कार्यक्रम से चीन का सामान तो दूर देशों में पहुंचेगा ही, वहीं उन देशों का कच्चा माल, मजदूर भी चीन पहुंच सकेंगे. चीन अपना काम जिन देशों में बांट सकेगा, वहां वहीं का कच्चा माल व वहीं के कर्मचारी इस्तेमाल हो सकते हैं.

अमेरिका की समृद्धि के पीछे उस की दूसरों की सहायता करने की नीति रही है. अमेरिका ने फौजें वहां भेजीं जहां आंतरिक विवाद खड़े हुए थे और जहां लोकतंत्र को खतरा था. वहीं, अमेरिका ने जिस देश की सहायता की, वहां से उसे कच्चा माल मिला और बाजार भी. सहायता देना एकतरफा काम नहीं है. भारत के जो सेठ दानी कहे जाते हैं वे असल में अपने स्थायी ग्राहक भी पा लेते हैं और निष्ठावान कर्मचारी भी.

दुनिया जोरजबरदस्ती से न आज चल सकती है, न कभी चली है. हर अन्यायी तानाशाह केवल तभी तक राज कर पाया जब तक पिछले राजाओं की जमा पूंजी थी. हिटलर हो या स्टालिन, उन्होंने तानाशाही से एकतरफा काम कर के अपने देशों को नष्ट ही किया.

भारत ने तो खुद की भिखारी की शक्ल बना रखी है जो कभी एक से मांगता है तो कभी दूसरे से. अच्छीभली उपजाऊ जमीन, बड़ी जनसंख्या, खेती के लिए अनुकूल मौसम के बावजूद हमारे यहां दूसरे की सहायता करने का अर्थशास्त्र बहुत कमों को समझ आया.

आज भारत जो अलगथलग पड़ गया है और जो नाम है इस का, वह खुशहाली के कारण नहीं बल्कि यहां गरीबों, फटेहालों की बड़ी संख्या होने के कारण है. इतनी बड़ी जनसंख्या, अगर हर रोज हर देशवासी 10 रुपए भी दे तो सरकार का खजाना भर जाए लेकिन, दरअसल, हम न बाहर वालों की सहायता करना जानते हैं, न अपनों की ही.

रौंग नंबर ने बदल दी दिशा : आत्महत्या को ले कर बुनी गई एक रोचक कहानी

दिशा को उस के प्रेमी ने तो धोखा दिया ही था, साथ ही उस की वजह से दिशा की अच्छीभली नौकरी भी चली गई थी. भेद खुला तो घर वाले बहुत नाराज हुए. साथ ही सगेसंबंधियों और जानपहचान वालों में उस की खासी बदनामी हुई. शरम के मारे दिशा ने बाहर आनाजाना तक बंद कर दिया था. वह घर में ही पड़ीपड़ी घुटती रहती थी. जिस की वजह से वह इतनी हताश और निराश हो गई कि उसे अपना जीवन व्यर्थ सा लगने लगा था.

एक दिन शाम को घर के सभी लोग किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे. वह दिशा को अपने साथ इसलिए नहीं ले गए थे कि लोग पता नहीं कैसेकैसे सवाल पूछें. पहले ही हताशनिराश दिशा घर वालों के इस व्यवहार से और ज्यादा निराश हुई. उसे लगा कि इस तरह जीने से तो मर जाना ही बेहतर है. उस समय वह घर में अकेली थी. उस के लिए यह अच्छा मौका था, इसलिए उस ने आत्महत्या करने का फैसला ले लिया.

नींद न आने की वजह से उस ने नींद की गोलियां पहले ही खरीद रखी थीं. उस ने झटपट सुसाइड नोट लिखा और नींद की गोलियों की पूरी शीशी और एक गिलास पानी अपने पास रख लिया. इस के बाद वह सोचने लगी कि उस के जीवन की यह अंतिम शाम होगी, क्योंकि ऐसे जीवन का कोई मतलब नहीं है, जिस में कोई अपना हो ही नहीं.

अब न तो कोई उस की चिंता करने वाला है और न कोई उस के बारे में सोचने वाला. अगर वह जिंदा रहती है तो पूरी जिंदगी उसे इसी तरह घर वालों के ताने सुनते रहना पड़ेगा. अब उस की सहन करने की सारी हदें पार हो गई हैं. जब घर वाले ही उस के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो जीने से क्या फायदा.

हाथ में नींद की गोलियों की शीशी लिए दिशा की सोच आगे बढ़ पाती, इस से पहले ही बैड पर पड़े मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. दिशा ने नफरत से मोबाइल की ओर देखा. उस ने सोच लिया कि फोन किसी का भी हो, वह नहीं उठाएगी. जब उस ने मरने का फैसला कर ही लिया है तो फोन उठाने की जरूरत ही क्या है. उस ने यह भी नहीं देखा कि फोन किस का है.

दूसरी ओर फोन करने वाले ने भी जैसे ठान लिया था कि जब तक फोन उठेगा नहीं, वह घंटी बजाता रहेगा. निश्चित समय तक घंटी बजने के बाद कुछ सैकेंड के लिए बंद होती और फिर बजनी शुरू हो जाती. यही क्रम लगातार चलता रहा. लगातार घंटी बजती रही तो उकता कर दिशा ने यह सोच कर फोन उठा लिया कि देखें कौन है, जो उस से बातें करने के लिए मरा जा रहा है. फोन रिसीव कर जैसे ही दिशा ने हैलो कहा तो दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘क्या मैं यश से बात कर सकता हूं?’’

‘‘कौन यश?’’ जवाब देने के बजाय दिशा ने सवाल किया.

‘‘यश…यश ठाकुर.’’ वह बोला.

‘‘सौरी रौंग नंबर, यहां कोई यश नहीं रहता.’’ दिशा ने कहा.

‘‘तो कौन रहता है?’’

‘‘क्या मतलब?’’ दिशा थोड़ी नाराज हो कर बोली.

‘‘मेरे पूछने का मतलब यह कि आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं यश तो नहीं हूं न, आप के लिए इतना पर्याप्त नहीं है क्या?’’

‘‘यह तो मैं भी जान रहा हूं कि आप यश नहीं हैं, क्योंकि यह आवाज यश की नहीं है. लेकिन आप बुरा मत मानिएगा, आप की आवाज बहुत मधुर है. एकदम शहद जैसी. आप की आवाज अच्छी लगी, इसीलिए पूछ लिया. आई एम वेरीवेरी सौरी, अगर बुरा लगा हो तो…’’

मस्का लगाने पर दिशा की नाराजगी थोड़ी कम हुई. क्षण भर चुप्पी साधे रहने के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं दिशा बोल रही हूं. आई मीन मेरा नाम दिशा है.’’

‘‘ओह ग्रेट, जीवन में सब को गाइड करने वाली यानी दिशा दिखाने वाली…सचमुच बड़ा सुंदर नाम है.’’

‘‘सौरी, मैं न किसी को गाइड करती हूं और न ही दिशा दिखाती हूं.’’

‘‘अगेन सौरी…मैं तो मजाक कर रहा था.’’

‘‘अनजान लोगों से आप की मजाक करने की आदत है क्या?’’

‘‘नहीं, आप अनजान नहीं लगीं, इसीलिए…’’

‘‘बातें करने में आप बहुत स्मार्ट लगते हैं.’’

‘‘सिर्फ बातें करने में ही नहीं, मैं तो पूरा का पूरा स्मार्ट हूं.’’

‘‘आप अपने बारे में ऊंची मान्यता रखने वाले लगते हैं.’’

‘‘अपने बारे में अच्छा सोचना, सम्मान रखना कोई बुरी बात तो नहीं. आप ही बताओ, अपनी उपेक्षा क्यों की जाए?’’

‘‘लेखक हो क्या?’’

‘‘हूं तो नहीं पर बनने के सपने देख रहा हूं.’’

‘‘सपना…केवल सपना ही देखते हो या मेहनत भी करते हो?’’ अब दिशा धीरेधीरे उस अनजान की बातों में उलझती जा रही थी.

‘‘इस समय मैं कर क्या रहा हूं, मेहनत ही तो कर रहा हूं. दिशा नाम की लड़की को पटाने की मेहनत…’’

‘‘व्हाट?’’ दिशा नाराज हो कर बोली.

‘‘सौरी…सौरी, मिठास के साथ आप में कड़वाहट भी है. मैं ने यही जानने के लिए पटाने वाली बात कही थी. क्योंकि केवल मिठास होना ही अच्छी बात नहीं है. आप में तो मिठास के साथसाथ कड़वाहट भी है.’’

‘‘बातें बनाना और मस्का लगाना आप को बहुत अच्छा आता है.’’

‘‘थैंक्स फौर कांप्लीमेंट्स. हमारे ऊपर हमेशा आप जैसी सुंदर लड़कियों की शुभकामनाओं की मेहरबानी रही है.’’

‘‘मैं सुंदर हूं, यह आप से किस ने कहा?’’

‘‘मैं लड़कियों को सुंदर ही मानता हूं. कहा जाता है कि सुंदरता नजरों में होती है और मेरी नजर सुंदर है. मैं तो उन्हीं कवियों को पसंद करता हूं जो प्रेम की कविताएं लिखते हैं.’’ इतना कह कर वह जोर से हंसा.

उस के इस तरह हंसने से दिशा खीझ कर बोली, ‘‘खुद को स्मार्ट साबित करने का तुम्हारा यह आइडिया बहुत सुंदर है. लगता है, तुम ने ‘रौंग नंबर’ कहानी पढ़ ली है.’’

‘‘आप बेकार ही इस कहानी को बीच में ला रही हैं. वैसे भी इस कहानी से हमें काफी सुविधा मिली है. फोन पर कैसे बात की जाए, यह तो पता चल ही जाता है.’’

‘‘कहीं वह कहानी आप ने ही तो नहीं लिखी है. इस तरह बातचीत कर के एक और कहानी लिखना चाहते हों. आप ने पहले ही बताया है कि आप लेखक बनने का सपना देख रहे हैं. इसी तरह कहानी लिख कर लेखक बन जाएं. वैसे आप का सेंस औफ ह्यूमर बहुत अच्छा है.’’

न चाहते हुए भी दिशा के चेहरे पर मुसकान की हलकी लहर दौड़ गई. आत्महत्या के अंतिम पलों में हंसी भला कहां आती है. अगर जीवन में हंसने के ही मौके होते तो मन में आत्महत्या का विचार ही क्यों आता.

‘‘मेरे सेंस औफ ह्यूमर के लिए तो मेरे दोस्त भी दाद देते हैं.’’ वह बोला.

‘‘लेकिन मैं आप की दोस्त थोड़े ही हूं.’’

‘‘मुझे तो यही लगता है कि अब तक आप मेरी दोस्त बन गई हैं. वरना कोई रौंग नंबर पर इतनी देर बातें करता है क्या?’’

दिशा ने तुरंत फोन काट दिया. वह बुदबुदाने लगी, ‘अपने आप को समझता क्या है?’

5-7 मिनट तक शांति छाई रही. उस के बाद फिर फोन बजा. इस बार न जाने क्यों दिशा ने तुरंत फोन उठा लिया. जबकि उसे उम्मीद थी कि फोन उसी अनजान आदमी का होगा. दिशा को लगा, यह आदमी आसानी से पीछा छोड़ने वाला नहीं है. इसे थोड़ा हड़काना ही पड़ेगा. इसलिए दिशा ने गुस्से में तेज आवाज में कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘हैलो.’’ फिर वही आवाज आई. शायद उस की समझ में आ गया कि दिशा उस के फोन करने से नाराज है, इसलिए उस ने सहानुभूति पाने के लिए बात बदल दी. उस ने कहा, ‘‘सौरी दिशाजी, मेरा इरादा आप को हर्ट करने का नहीं था. मुझे लगा कि जीवन के अंतिम पलों में किसी अच्छे व्यक्ति से बात कर के इस दुनिया को अलविदा कहूं. लेकिन…’’

दिशा चौंकी. इस का मतलब यह भी उसी की तरह दुखी है. बीमार तो है नहीं, शायद प्रेम में धोखा खाया होगा. इसलिए न चाहते हुए भी उस के मुंह से निकल गया, ‘‘यानी आप भी मेरी तरह..?’’

पलभर मौन के बाद दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘तो क्या आप भी मेरी तरह..?’’

‘‘हां, मेरी भी इस अंतिम शाम की यह अंतिम बातचीत है. अपनी मुलाकात आप को कुछ अनोखी नहीं लगती.’’

‘‘हां, अनोखी ही है, अंतिम पलों के साथी बन गए हैं हम.’’

‘‘पर आप तो पुरुष हैं. आप को आत्महत्या करने की क्या जरूरत है?’’

थोड़ी देर शांति के बाद दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘क्यों, ऐसा कोई नियम है क्या कि पुरुष को कोई परेशानी नहीं हो सकती?’’

‘‘नहीं…नहीं, नियम तो नहीं है लेकिन सामान्य रूप से हमारा समाज पुरुष प्रधान है. इसलिए जब सहन करने की बात आती है तो वह स्त्रियों के हिस्से में आता है.’’

‘‘यह आप का भ्रम है लेकिन अब अंतिम समय में आप का यह भ्रम तोड़ने से कोई फायदा नहीं है, वरना जरूर पूरी बात कहता. पर जाने से पहले दिल हलका करने के लिए एक बात…पर जाने दो. अंतिम समय में दिल हलका हो या न हो, क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘हमेशा ऐसा नहीं होता. अगर कोई सहृदय बात सुने तो जरूर अच्छा लगता है. और वैसे भी हंसतेहंसते दुनिया को अलविदा कहना हर आदमी के भाग्य में नहीं होता.’’

‘‘आप तो दार्शनिक की तरह बातें करने लगीं.’’

‘‘अंतिम पलों में शायद हर आदमी अपने आप दार्शनिक हो जाता है.’’ दिशा अनायास ही बातों के प्रवाह में बहती चली गई. उस ने आगे कहा, ‘‘पर अपनी बातें सुनने का समय अब किस के पास है.’’

‘‘आप की बात सच है. पर मुझे इस समय मौत जैसा कोई दूसरा सुख दिखाई नहीं दे रहा.’’ दूसरी ओर से निराशा भरी आवाज आई.

‘‘नहीं…नहीं, ऐसी बात नहीं है. आप तो पुरुष हैं, पुरुष हो कर भी हिम्मत हार गए. इस तरह निराशावादी होना आप के लिए शोभा नहीं देता.’’

‘‘मुझे कुछ भी ठीक नहीं लग रहा. दिशाजी, आप ही सोचो कि अगर सब अच्छा होता तो मरने के बारे में सोचता ही क्यों.’’

‘‘अच्छे में तो सभी जी लेते हैं, बात तो मुश्किलों से सामना करने की है. मरना तो आसान है. आप ने मुश्किलों से मुकाबला कर के जीने की कोशिश नहीं की?’’ अब तक दिशा जानेअनजाने में काउंसलर की भूमिका में आ गई थी.

‘‘हो सकता है. लेकिन एक बार जो निर्णय कर लिया, अब उसे बदलने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है.’’

‘‘जीवन में हम कितनी बार अपना फैसला बदलते हैं. आप अपना नजरिया तो बदलिए और थोड़ा पौजिटिव बनिए. हो सकता है, दुनिया कुछ अलग ही दिखाई दे.’’

‘‘शायद आप की बात सच हो…’’

‘‘सौ प्रतिशत सच है.’’ दिशा जैसे जुनून में आ गई थी.

‘‘होगी, पर अब मैं इस तरह कुछ नहीं सोचना चाहता. जीने के लिए कितने समझौते करने होते हैं. कभीकभी हमें भी…’’ दूसरी ओर से इतना कह कर बात अधूरी छोड़ दी गई.

‘‘परेशानियों से डर कर मैदान छोड़ देना कायरता कही जाएगी.’’ दिशा की काउंसलर की भूमिका आगे बढ़ी, ‘‘कभीकभी हम छोटी से छोटी बात को ले कर आवेश में आ जाते हैं और बिना सोचेसमझे उलटासीधा कदम उठा लेते हैं.’’

‘‘आप तो काफी पढ़ेलिखे लगते हैं. फिर भी…’’

‘‘थैंक फौर कांप्लीमेंट्स. पर कभीकभी ज्यादा पढ़लिख लेना भी काम नहीं आता. उस का ढंग से उपयोग नहीं किया जा सकता. किताबों में जो पढ़ाया जाता है, वह जीवन में किस काम आता है. मुझे तो यह सब बेकार की चीजें लगती हैं. दूसरों को कहना आसान है. जब खुद पर जरा भी परेशानी आती है तो सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है.’’

‘‘ऐसा हमेशा थोड़े ही होता है.’’

‘‘वैसे आप की बात निश्चित रूप से विचार करने लायक है. सच कहूं, मन में यह विचार तो आता ही है कि मैं तो आत्महत्या कर के इस समाज और दुनिया से छुटकारा पा जाऊंगा, पर क्या यह स्वार्थ नहीं होगा? क्या मैं स्वार्थी नहीं कहलाऊंगा? मेरे चले जाने के बाद दुनिया पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन कोई तो होगा, जिसे मेरे जाने का दुख होगा. यही मैं इतनी देर से सोच रहा हूं.’’

‘‘इतना सोचनेविचारने के बाद भी आखिर में आप ने नेगेटिव ही सोचा.’’

‘‘क्या करूं दिशाजी, आदत से मजबूर हूं.’’

‘‘आप जो कह रहे हैं, यह कह कर छुटकारा पाने का हमारा हक नहीं है. हमारी अब तक की जिंदगी में कितने लोगों का सहयोग है. मातापिता, सगेसंबंधी, मित्र…कोई तो होगा जो हमारे लिए…’’ कहतेकहते दिशा अचानक रुक गई.

दिशा बातों के प्रवाह में इस कदर बह गई थी कि उसे इस बात का भी भान नहीं रहा कि वह एक अपरिचित व्यक्ति से बात कर रही है. जबकि वह खुद भी आत्महत्या करने का निर्णय किए बैठी थी. ऐसे में इस तरह की दलीलें करना शोभा देता है क्या? पर नहीं, अपनी दलीलों से अगर किसी का जीवन बच जाता है तो…जातेजाते एक नेक काम तो करती जाए.

‘‘आप अचानक चुप क्यों हो गईं? अपनी बात आती है तो सभी इसी तरह चुप हो जाते हैं. देखिए, दूसरों को उपदेश देना या बड़ीबड़ी बातें करना बड़ा आसान होता है लेकिन उन्हें अमल में लाना आसान नहीं है.

‘‘मुझे पता था कि आप यही सब प्रवचन देंगी कि जीवन अनमोल है, समाज में हम से भी ज्यादा दुखी तमाम लोग हैं,जो मजे से जी रहे हैं. उन की तरफ देखो, तब पता चलेगा कि हमारे पास कितना कुछ है. यही सब कहना चाहती हैं न आप. अरे मोहतरमा, यह सब मैं खूब सुन चुका हूं. पर अब इन सब बातों का मेरे ऊपर कोई असर नहीं होने वाला.’’

दिशा को उस की इन बातों पर गुस्सा आया. जब उसे सब पता ही है तो इसे क्या समझाना. ऐसे आदमी को समझाया भी नहीं जा सकता. लेकिन जानते हुए किसी को मरने के लिए कैसे छोड़ा जा सकता है?

इसलिए उस ने एक बार और कोशिश की, ‘‘देखिए मिस्टर, आप कोई भी हैं. फिर भी लेट मी टेल वनथिंग… आप ने भले ही निर्णय कर लिया है, लेकिन एक काम कीजिए. आप ज्यादा दिनों के लिए नहीं, बस एक दिन के लिए इस विचार को मुल्तवी कर दीजिए. आप को आत्महत्या ही करनी है तो आज के बजाय कल कर लीजिएगा.’’

‘‘एक दिन में क्या फर्क पड़ने वाला है. अरे जो काम कल करना है, उसे आज ही कर के छुट्टी पा लो.’’

‘‘यह तो मुझे नहीं पता कि एक दिन में क्या फर्क पड़ेगा, पर शायद आप ने यह निर्णय किसी क्षणिक आवेश में लिया हो तो हो सकता कल का सूरज आप के लिए कोई शुभ संदेश ले कर उदय हो. आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह तो मुझे नहीं पता, पर हो सकता है कि कल आप को जिंदगी जीने लायक लगे. जैसा आप ने कहा है, शायद उसी तरह अगला बसंत आप की प्रतीक्षा में…’’

‘‘वैसे आप की सारी बातें सच हैं. किसी को भी आप बहुत अच्छी तरह से समझा लेती हैं. आप एक काम कीजिए, काउंसलिंग सर्विस खोल लीजिए, बहुत अच्छी चलेगी.’’

‘‘जब आप पर मेरी काउंसलिंग का कोई असर नहीं हो रहा है तो आप यह कैसे कह सकते हैं कि मेरी काउंसलिंग सर्विस अच्छी चलेगी.’’

‘‘यह किस ने कहा कि आप की काउंसलिंग का मेरे ऊपर असर नहीं हो रहा.’’

‘‘यानी आप ने मेरी बात मान ली है?’’ दिशा इस तरह उत्साह में कैसे आ गई, यह उस की समझ में नहीं आया.

‘‘इस समय तो यही लग रहा है कि आप जो एक दिन के लिए मुल्तवी करने को कह रही हैं, वह ठीक ही है. आप की इस बात पर विचार तो किया ही जा सकता है.’’

‘‘केवल विचार ही नहीं किया जा सकता, इस पर अमल करना जरूरी है.’’ दिशा ने यह बात एकदम गंभीर हो कर कही.

‘‘ओके मैडम, आप जीतीं, मैं हारा. आप की बात मान कर मैं आज के दिन…केवल आज के दिन मरने यानी आत्महत्या करने का कार्यक्रम टाल रहा हूं. हो सकता है, आप मेरे लिए सही अर्थ में मार्गदर्शक बन कर आई हों. मैं ने तो आप की बात मान ली, अब आप को भी मेरी बात माननी होगी. आप भी आज आत्महत्या नहीं करेंगी.’’

‘‘ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘आप कल मुझे फोन करेंगे.’’

‘‘मुझे आप की यह शर्त मंजूर है.’’ कह कर रौंग नंबर ने फोन काट दिया.

इस के बाद दिशा रौंग नंबर के नाम से नंबर सेव कर रही थी तो रौंग नंबर दिशा के नाम से. नंबर सेव करते हुए दिशा के कानों में अपने ही शब्द गूंज रहे थे.

5-7 मिनट तक वह नींद की गोलियों की शीशी को देखती रही.

उस के दिलोदिमाग में अपनी ही बातें गूंज रही थीं. वह जल्दी से उठी, शीशी का ढक्कन खोल कर सारी गोलियां नाली में फेंक दी. दूसरी ओर रौंग नंबर इस बात से खुश था कि उस ने अपनी साइकोलौजी से एक जान बचा ली.

पोथीज्ञान ने आसिफ को बना दिया आशु महाराज, पढ़िए पूरी कहानी

मीनाक्षी अपनी बेटी निकिता को ले कर बहुत परेशान रहती थी. इस की वजह यह कि उस की बेटी निकिता पोलियोग्रस्त थी. सन 2002 में निकिता का जब जन्म हुआ था तो उस समय वह देखने में स्वस्थ थी. जैसेजैसे वह बड़ी हुई, तब पता चला कि उसे पोलियो है. मीनाक्षी ने कई डाक्टरों से उस का इलाज कराया लेकिन वह ठीक नहीं हो सकी.

निकिता 6 साल की हो चुकी थी. पोलियो का प्रभाव अब उस के शरीर पर साफ दिखाई दे रहा था. बेटी के भविष्य को ले कर मीनाक्षी चिंतित रहती थी. उसे इस बात की भी चिंता थी कि यदि निकिता ठीक नहीं हुई तो उस की शादी कैसे होगी. क्योंकि आजकल अच्छीभली और स्वस्थ लड़की को भी उपयुक्त लड़का आसानी से नहीं मिलता, इसलिए मीनाक्षी इसी कोशिश में लगी रहती थी कि किसी भी तरह से निकिता ठीक हो जाए.

गाजियाबाद के इंदिरापुरम की रहने वाली मीनाक्षी को कोई जानपहचान वाला किसी हकीम या तांत्रिक के बारे में बताता तो वह बेटी को ले कर उस के पास पहुंच जाती. बेटी के चक्कर में वह कई पंडितों, तांत्रिकों और मुल्लामौलवियों के पास गई, लेकिन निकिता ठीक न हो सकी.

एक दिन मीनाक्षी ने टीवी पर आशु महाराज का कार्यक्रम देखा. आशुजी महाराज ज्योतिष विद्या के बारे में बताते थे. उन की पहचान हस्तरेखा विशेषज्ञ के रूप में थी. वह खुद को ज्योतिषाचार्य बताते थे. साथ ही अपने कार्यक्रम में लोगों की तमाम तरह की परेशानियां दूर करने के उपाय भी बताते थे. मीनाक्षी को आशुजी महाराज की बातें बहुत अच्छी लगती थीं. वह उन की बातों से बहुत प्रभावित थी.

मीनाक्षी निकिता के सही होने के चक्कर में जाने कहांकहां भागी थी. आशु महाराज की बातों से उसे उम्मीद की किरण दिखाई दी. उस ने सोचा कि क्यों न वह एक बार आशु महाराज से मिल कर बेटी के बारे में बताए. हो सकता है महाराज के आशीर्वाद से वह ठीक हो जाए. टीवी स्क्रीन से मीनाक्षी ने आशु महाराज से संपर्क करने का फोन नंबर लिख लिया.

एक दिन मीनाक्षी ने उस नंबर पर फोन किया. फोन उन के आश्रम के किसी कार्यकर्ता ने उठाया. मीनाक्षी ने आशु महाराज से बात करने की इच्छा जाहिर की. कार्यकर्ता ने मीनाक्षी को अगले दिन महाराज से मिलने का टाइम बता दिया. इतना ही नहीं, उस ने उन के सेक्टर-7 रोहिणी, दिल्ली स्थित आश्रम का पता भी बता दिया. यह बात सन 2008 की है.

आशु महाराज से मुलाकात का समय निश्चित हो जाने पर मीनाक्षी बहुत खुश हुई. जिन के कार्यक्रम वह टीवी पर देखा करती थी, उन से साक्षात मिलना मीनाक्षी के लिए सौभाग्य की बात थी. अगले दिन निर्धारित समय से पहले मीनाक्षी अपनी 6 वर्षीय बेटी निकिता को ले कर आशु महाराज के रोहिणी स्थित आश्रम में पहुंच गई. काफी देर इंतजार करने के बाद उसे आशु महाराज से मिलने के लिए उन के कमरे में भेजा गया.

मीनाक्षी बेटी को ले कर आशु महाराज के कमरे में पहुंच गई. वह सुसज्जित कमरा था. अंदर गुलाब की खुशबू महक रही थी. कमरे में घुसते ही मीनाक्षी का मन खुश हो गया. आशु महाराज ने जब मीनाक्षी से उस की समस्या पूछी तो उस ने पास बैठी निकिता की परेशानी उन्हें बता दी.

आशु महाराज ने निकिता को गौर से देखने के बाद उस से कमरे में कुछ कदम चलने को कहा. दरअसल वह उसे चलवा कर यह देखना चाहते थे कि निकिता को कितनी बड़ी प्रौब्लम है, जिस से उसी के अनुसार उस का ट्रीटमेंट कर सकें.

बेटी की वजह से खुद भी बनी शिकार

6 साल की निकिता भले ही पोलियोग्रस्त थी लेकिन वह थी बहुत खूबसूरत. मीनाक्षी ने बताया कि आशु महाराज ने उस से कहा था, ‘‘यह लड़की बहुत भाग्यवान है. इस का भविष्य बहुत ही उज्ज्वल है. मैं भविष्यवाणी कर रहा हूं कि एक दिन इसी की वजह से लोग तुम्हें जानेंगे. रही बात इस की बीमारी की, तो मैं मंत्रोच्चारित एक तेल दूंगा. उस तेल से तुम इस की रोजाना मालिश करना.

‘‘बीचबीच में तुम इसे आश्रम ले कर आती रहना. आश्रम में इस बच्ची के पूरे शरीर की मालिश हम अपने हाथों से ही किया करेंगे. जब हम इस की मालिश करेंगे तो इस के शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं होना चाहिए.’’

निर्वस्त्र कर मालिश करने की बात मीनाक्षी को थोड़ी अजीब सी लगी. फिर सोचा कि यह इतने पहुंचे हुए महाराज हैं. इन्होंने यह बात कुछ अच्छा समझ कर ही कही होगी. इसलिए मीनाक्षी उन के सामने हाथ जोेड़ते हुए बोली, ‘‘महाराजजी, आप जो करेंगे हमारे भले के लिए ही करेंगे. मैं तो यह चाहती हूं कि हमारी बच्ची ठीक हो जाए. आप जैसा कहेंगे, हम करने को तैयार हैं.’’

मीनाक्षी का आरोप है कि आशु महाराज उस की बेटी को निर्वस्त्र कर उस के शरीर की मालिश करता था. सन 2013 तक यह सिलसिला चलता रहा. सन 2013 में ही दीवाली के मौके पर मीनाक्षी आशु के आश्रम में गई तो आश्रम के मैनेजर ने उसे चाय पीने को दी. चाय पीने के कुछ देर बाद मीनाक्षी को नींद सी आने लगी. उसी दौरान मैनेजर उसे आशु महाराज के कमरे में ले गया. मीनाक्षी ने बताया कि वहां आशु व उस के साथियों ने उस के साथ सामूहिक बलात्कार किया.

उस के साथ क्या हो रहा है, यह तो उसे पता था लेकिन उसे दी गई दवा के असर से वह अर्द्धमूर्छित थी. उस समय वह विरोध करने की स्थिति में भी नहीं थी. जब काफी देर बाद मीनाक्षी को होश आया तो उस के अंग दुख रहे थे. पहले वह वहां जी भर कर रोई और उस ने पुलिस से शिकायत करने की धमकी दी.

इस पर बाबा ने उसे मुंह बंद रखने को कहा. साथ ही चेतावनी दी कि यदि यह बात बाहर किसी से कही तो पूरे परिवार को जान से हाथ धोना पड़ सकता है. यह भी कहा कि जिस तरह वह आश्रम में आती है, उसी तरह आती रहे. आश्रम आना बंद नहीं होना चाहिए. मीनाक्षी बाबा के रुतबे को जान चुकी थी इसलिए उस ने मुंह बंद रखने में ही भलाई समझी और वह आश्रम आतीजाती रही.

मीनाक्षी को महसूस होने लगा था कि वह आशु महाराज के शिकंजे में फंस चुकी है, जहां से निकलना आसान नहीं होगा. मीनाक्षी का आरोप है कि सन 2016 में बाबा के बेटे समर और उस के दोस्त सौरभ ने उस के साथ यौनाचार किया. पिता की तरह समर भी अय्याश था. वह यह सब सहती रही लेकिन उस ने बेटी को आश्रम लाना बंद कर दिया था.

हद तो तब हो गई जब सन 2017 में समर ने उस से निकिता को आश्रम लाने को कहा. मीनाक्षी ऐसा हरगिज नहीं चाहती थी. लिहाजा इस बात को ले कर वह आशु महाराज से मिली और उस ने समर की शिकायत की.

मीनाक्षी ने बताया कि इस पर आशु महाराज ने उसे धमकाया और अपने बेटे का ही पक्ष लिया. उन्होंने मीनाक्षी से यह भी कहा कि तू मेरी गुलाम है और अब तेरी बेटी भी मेरी गुलामी करेगी. 2017 में ही होली के दिन जब मीनाक्षी रोहिणी के आश्रम में अकेली पहुंची तो उस के साथ मारपीट की गई. मीनाक्षी ने बताया कि कुल मिला कर वह आशु महाराज की कठपुतली बन कर रह गई थी. वह उस से इतना खौफजदा थी कि उस के खिलाफ कुछ बोल भी नहीं सकती थी.

छलबल का खिलाड़ी था आशु उर्फ आसिफ

मीनाक्षी के अनुसार, सन 2017 में आशु महाराज ने उसे और उस की बेटी निकिता को दक्षिणी दिल्ली के हौजखास के एक्स ब्लौक स्थित आश्रम में बुलाया. वहां आशु महाराज ने उसी के सामने निकिता के साथ अश्लील हरकत की.

निकिता अब कोई बच्ची नहीं रही थी, वह 15 साल की हो चुकी थी. बाबा की ये हरकतें मीनाक्षी की बरदाश्त से बाहर हो चुकी थीं. लिहाजा उस ने बाबा का विरोध किया तो बाबा ने मीनाक्षी की पिटाई करा कर उसे आश्रम से बाहर निकलवा दिया.

मीनाक्षी ने इस की शिकायत हौजखास थाने में की. मीनाक्षी ने बताया कि पुलिस आशु महाराज से इतनी प्रभावित थी कि उस की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की. बल्कि पुलिस मामले को रफादफा करने का दबाव बनाने लगी, पर मीनाक्षी नहीं मानी.

काफी भागादौड़ी और मशक्कत के बाद पुलिस ने आशु महाराज, उस के बेटे व दोस्त के खिलाफ भादंवि की धारा 376डी, 354, 506 के अलावा पोक्सो एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज की. इस की जांच थाना पुलिस के बजाय क्राइम ब्रांच को सौंपी गई.

क्राइम ब्रांच ने आरोपियों की तलाश शुरू कर दी, लेकिन आरोपी न तो हौजखास वाले आश्रम में मिले और न ही रोहिणी के आश्रम में. वे सभी अंडरग्राउंड हो चुके थे.

इसी बीच शाहदरा जिले के एएटीएस की टीम को आशु महाराज के बारे में गुप्त सूत्रों द्वारा सूचना मिली कि आशु महाराज उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक ठिकाने पर छिपा बैठा है.

इस महत्त्वपूर्ण सूचना के बाद एएटीएस की टीम ने सूचना में बताई गई जगह पर दबिश दे कर आशु महाराज को गिरफ्तार कर लिया. उच्चाधिकारियों के फैसले के बाद एएटीएस ने उसे क्राइम ब्रांच के सुपुर्द कर दिया.

आसिफ उर्फ आशु महाराज ने पुलिस को बताया कि दिल्ली और देश भर में लगातार कई बाबाओं की गिरफ्तारी होने के बाद उसे इस बात का डर हो गया था कि कहीं पब्लिक उसे पकड़ कर मार न दे. इसी दहशत की वजह से वह दिल्ली से भाग कर गाजियाबाद के अजनारा अपार्टमेंट के एक फ्लैट में जा कर छिप गया था. क्राइम ब्रांच ने उस के मोबाइल फोन, लैपटाप और अन्य इलेक्ट्रौनिक गैजेट बरामद कर जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेज दिए हैं.

पुलिस ने 14 सितंबर को उसे कोर्ट में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. इस के अलावा आसिफ के बेटे समर को भी पूछताछ के लिए बुलाया. कई घंटे की गहन पूछताछ के बाद उसे भेज दिया गया. पुलिस समर के दोस्त सौरभ से भी पूछताछ करेगी.

क्राइम ब्रांच इस बात की भी जांच कर रही है कि कहीं आसिफ ने नाम बदल कर लोगों की भावनाओं से तो खिलवाड़ नहीं किया. यदि इस के सबूत मिले तो उस के खिलाफ काररवाई की जाएगी, क्योंकि उस ने भक्तों से असल पहचान छिपाई थी. कथा लिखने तक क्राइम ब्रांच आशु महाराज से पूछताछ कर रही थी.

पंक्चर लगाने वाला आसिफ खान बन गया आशु महाराज

मीनाक्षी और उस की बेटी निकिता के गैंगरेप का आरोपी आशु महाराज हिंदू नहीं बल्कि पैदाइशी मुसलमान था. लेकिन उस ने अपना नाम आशु रख लिया था, जिस से लोग उसे हिंदू समझें.

अभी तक लोग जिसे ज्योतिषाचार्य आशुजी महाराज के नाम से जानते थे, हकीकत में वह कोई ज्योतिषाचार्य नहीं है. 1990 के शुरुआती दौर में वह उत्तरपश्चिमी दिल्ली के वजीरपुर की जे.जे. कालोनी में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाता था.

साइकिल मिस्त्री आसिफ मोहम्मद खान बाद में उत्तरी दिल्ली के सराय रोहिल्ला इलाके में शिफ्ट हो गया. महत्त्वाकांक्षी आसिफ खान कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस में उसे अच्छी कमाई हो. तभी उस के दिमाग में आया कि धर्म के नाम पर लोगों से अच्छा पैसा कमाया जा सकता था. शातिरदिमाग आसिफ ने हिंदू और मुसलिम धर्मगुरुओं की तुलना की. उस में उसे लगा कि मुसलिम धर्मभीरू बनने के बजाय हिंदू धर्मभीरू बनने में ज्यादा फायदा रहेगा. क्योंकि हिंदू लोग अपने धर्मगुरुओं पर बहुत ज्यादा आस्था रखते हैं. उस ने तय कर लिया कि वह अपना नाम आसिफ से आशु रख लेगा.

उस ने ज्योतिष विद्या सीखने का मन बना लिया. इस के लिए वह अपनी साइकिल दुकान बंद कर के किसी के कहने पर गुवाहाटी चला गया. वहां से आसिफ ने कुंडली देखने की कला सीखी. गुवाहाटी से लौटने के बाद आसिफ मोहम्मद खान ने अपना नाम आशु महाराज रख लिया. इस के बाद उस ने सराय रोहिल्ला इलाके में कुंडली देखने का काम शुरू कर दिया.

कुछ दिनों बाद वह टीवी चैनलों के संपर्क में आ गया. टीवी कार्यक्रमों में वह लोगों के बैडलक को खत्म करने का दावा किया करता था. अपने प्रमोशन वीडियो में वह ट्रक ड्राइवर और रिक्शाचालक को अपने आशीर्वाद से लखपति बन जाने के दावे किया करता था. इस के चलते उसे अन्य प्रदेशों में भी सैकड़ों अनुयायी बन गए थे.

इस धंधे से उस ने अकूत संपत्ति जुटाई. उस ने दिल्ली के हौजखास और रोहिणी इलाकों में आश्रम बना लिए. बाद में 10वीं फेल आसिफ खान उर्फ आशु महाराज की पहचान एक नामी ज्योतिषी के रूप में हो गई. वह कुंडली देखने के 25 हजार रुपए लेने लगा. दरबार में आने वाले अंधविश्वासी लोग नोटों की थैली दे कर मत्था टेकने लगे. पैसा और रुतबा बढ़ा तो उस ने अपने परिवार से भी दूरी बना ली. इस के पिता कारपेंटर का काम करते हैं. उस की दुकानदारी अच्छीखासी चल रही थी लेकिन मीनाक्षी के मामले ने उस की सारी करतूत उजागर कर दी. ?

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, मीनाक्षी और निकिता परिवर्तित नाम है.

 

वर्जिनिटी खोने से पहले बरतें सावधानी

वर्जिन सैक्स को सैक्स संबंधों की वह सीढ़ी माना जाता है जहां पहली बार मर्दऔरत आपस में सैक्स संबंध बनाते हैं. लोगों का यह मानना है कि मर्द जब अपने अंग को पहली बार किसी औरत के अंग में प्रवेश कराता है तो यह वर्जिन सैक्स होता है यानी यहीं से औरत की वर्जिनिटी खत्म हो जाती है.

माना जाता है कि इस के पहले उस मर्दऔरत का किसी दूसरे से सैक्स संबंध नहीं बना है. अगर वर्जिन सैक्स के बारे में पहले से सही जानकारी न हो तो वह कई तरह से नुकसान भी पहुंचा सकता है.

अगर संबंध बनाते समय समझदारी न दिखाई जाए तो पहली बार का यह सैक्स दर्द देने वाला भी हो सकता है. इस की वजह औरत के अंग का सूखापन व झिल्ली का फटना भी हो सकती है. वहीं मर्द के मामले में उस के अंग के ऊपरी सिरे की चमड़ी पहली बार किए जाने वाले सैक्स के दौरान धीरेधीरे नीचे खिसकती है. ऐसे में मर्द के लिए भी यह दर्दभरा साबित हो सकता है.

वर्जिन सैक्स को ले कर कई तरह की गलतफहमियां व नासमझी दुखदायी सैक्स की वजह बन जाती हैं. वर्जिन सैक्स में औरत के अंग के ऊपरी हिस्से में पतली झिल्ली जिसे हाइमन झिल्ली कहा जाता है, फटती है. इस झिल्ली के फटने से खून भी बह सकता है. कभीकभी यह झिल्ली खेलकूद, भागदौड़ वगैरह से पहले ही फट चुकी होती है जिस की वजह से सैक्स के दौरान खून तो नहीं आएगा लेकिन उचित सावधानी न बरतने की वजह से यह दर्दभरा जरूर होता है.

ऐसे में वर्जिन सैक्स को ज्यादा मजेदार और यादगार बनाने के लिए कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत पड़ सकती है जिस से वर्जिनिटी खोने से पैदा होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है.

लोगों का यह मानना है कि वर्जिनिटी खोने के दौरान एचआईवी एड्स, यौन संक्रमण जैसी खतरनाक बीमारियां नहीं होती हैं.

वर्जिन सैक्स के मामले में यह माना जाता है कि किसी मर्द ने अगर किसी औरत के अंग में अपना अंग प्रवेश किया है या किसी औरत ने किसी मर्द का अंग अपने अंग में प्रवेश कराया है तो उस ने वर्जिनिटी खो दी है और ऐसे मामले में सुरक्षित सैक्स के तरीकों को अपनाना जरूरी हो जाता है लेकिन इस में अकसर लापरवाही बरती जाती है जो औरत व मर्द के लिए खतरनाक हो सकती है.

वर्जिनिटी खोने के दौरान सैक्स के सही तरीकों की जानकारी की कमी अकसर देखी गई है, जिस से औरत के अंग में दर्द की शिकायत पाई जाती है. वर्जिनिटी खोने की हड़बड़ी में घबराहट भी बड़ी रुकावट मानी जाती है. कभीकभी अंगों का कसा होना भी सैक्स में बाधा पैदा करता है.

इन सभी हालात से निबटने के लिए पहले से ही तैयार होना चाहिए. इस के लिए किसी माहिर डाक्टर से सलाह भी ली जा सकती है.

बरतें सावधानी

वर्जिनिटी सैक्स को ले कर डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि पहली बार के सैक्स में भी उतनी ही सावधानी जरूरी है जितनी कई बार सैक्स कर चुके लोगों  द्वारा अपनाई जाती है, क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि जिस पार्टनर के साथ सैक्स करने जा रहे हैं उस की वर्जिनिटी सुरक्षित ही हो.

किसी औरत के अंग में मर्द के अंग के प्रवेश को ही वर्जिनिटी का खोना माना जाता है जबकि अगर अंग में अंग के प्रवेश के अलावा मुख मैथुन, गुदा मैथुन की क्रिया की गई है तो एचआईवी एड्स व अंग संक्रमण का डर बढ़ जाता है.

इस के अलावा अगर आप का साथी वर्जिन है और वह संक्रमित सूई का इस्तेमाल करता है तब भी एचआईवी होने के खतरे कई गुना बढ़ जाते हैं.

अगर इन बीमारियों से बचना है तो कोशिश करनी चाहिए कि पहली बार सैक्स संबंध बनाने से पहले आपसी सहमति से डाक्टरी जांच जरूर कराई जाए. हो सकता है कि डाक्टरी जांच के मसले पर आप का साथी यह सवाल खड़ा करे कि आप उस के चरित्र पर उंगली उठा रहे हैं. लेकिन सब्र रखते हुए उसे यह समझाने की कोशिश करें कि जरूरी नहीं कि यौन रोग या एड्स सैक्स संबंध बनाने के चलते ही हों, वे कई दूसरी और वजह से भी होते हैं.

कंडोम बचाव का बेहतर उपाय

जब तक यह तय न हो जाए कि जिस के साथ आप पहली बार सैक्स संबंध बनाने जा रहे हैं, भले ही वह अपने वर्जिन होने के तमाम सुबूत दे लेकिन कोशिश करें कि सुरक्षा के लिए कंडोम का इस्तेमाल किया जाए.

इस से न केवल सैक्स से होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है बल्कि अनचाहे पेट से भी दूरी बनाए रखने में मदद मिल सकती है.

दर्द से मिल सकता है छुटकारा

अगर आप वर्जिनिटी खोने के दौरान होने वाले दर्द से छुटकारा पाना चाहते हैं तो कभी सैक्स की शुरुआत करने से पहले जल्दबाजी न दिखाएं बल्कि रोमांटिक बातों से शुरुआत करते हुए धीरेधीरे नाजुक अंगों के साथ छेड़छाड़ करें, जिस से औरत जल्दी ही सैक्स के लिए तैयार हो जाती है और उस के अंग के भीतर गीलापन बढ़ने से चिकनाहट बढ़ती है. इस हालत में मर्द के अंग में प्रवेश से औरत को दर्द से निजात मिल सकती है.

लोगों का मानना है कि पहली बार का सैक्स हमेशा ही दर्द देने वाला होता है जबकि यह एक भरम के हालात पैदा करता है. अगर मर्द को लगे कि उस के अंग में पहली बार के सैक्स में दर्द हो सकता है तो वह कंडोम का इस्तेमाल कर सकता है.

अगर आप भी अपनी वर्जिनिटी खोने जा रही हैं या जा रहे हैं तो कोशिश करें कि इस दौरान होने वाली परेशानियों से बचने के लिए बताए गए उपायों को अपनाएं. साथ ही, अपने जीवनसाथी को भी इन्हें अपनाने के लिए कहें. ये उपाय आप की वर्जिनिटी खोने के मजे को कई गुना ज्यादा बढ़ा देंगे.

आप भी साबित हो सकती हैं एक बेहतरीन साथी

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पतिपत्नी के बीच के प्यार का खो जाना स्वाभाविक है. पतिपत्नी दोनों ही अपनेअपने काम और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त रहते हैं कि जिंदगी एक मशीन की तरह हो जाती है. हैरानी की स्थिति तो तब होती है, जब शादी के कुछ महीनों बाद ही दोनों एकदूसरे को समझ नहीं पाते और दूरियां बढ़ने लगती हैं.

देव ने जब अपनी नई जौब शुरू की तो महीनों तक कड़ी मेहनत की. दिनरात सिर्फ अपनी जौब में बिजी रहता. देर रात तक घर आ पाता था. ऐसे में अगर उसे अपनी पत्नी सिमरन का साथ न मिला होता तो शायद मंजिल पाना आसान न होता. सिमरन ने न सिर्फ पत्नी, बल्कि एक दोस्त बन कर भी उस के हर कदम में और हर फैसले में उस का साथ निभाया.

सपोर्टिव भी हो: आमतौर पर पत्नियां सोचती हैं कि पति को पत्नी का रूपशृंगार, पहनावा, प्यार और मीठे बोल पसंद होते हैं, लेकिन क्या सिर्फ यही बातें उसे पसंद होती हैं? बेशक, एक पति अपनी पत्नी की नैचुरल सुंदरता के साथसाथ साजशृंगार और शालीनता का भी इच्छुक होता हो, पर साथ ही वह पत्नी की सादगी, अनुकूलता, प्रेम की गहराई और साथ निभाने वाली खूबियां भी पसंद करता है. वह चाहता है उस की जीवनसंगिनी सिर्फ नाम की ही संगिनी न हो कर समझदार, भावनाओं को समझने वाली, उस के सुखदुख में साथ निभाने वाली सपोर्टिव साथी भी हो.

बनावटीपन नहीं हो गहराई: पतिपत्नी का रिश्ता तभी सफल होता है जब दोनों के बीच अपनापन हो न कि बनावटीपन. पति को यह महसूस होना चाहिए कि उस की पत्नी जीवन की हर मुश्किल में उस का साथ निभाएगी. पत्नी का प्यारभरा साथ, उस की जरूरतों को समझने की शक्ति और विश्वास ही एक पति का सहारा होता है, जिस के दम पर वह दुनिया की तमाम उलझनों को आसानी से सुलझा सकता है.

आपसी समझ: इस रिश्ते में आपसी समझ और विश्वास बहुत जरूरी है. एक पत्नी भी चाहती है कि पति उस की भावनाओं को समझे और ऐसा सहारा बने जिस के साथ वह दुनिया की हर चुनौती का मुकाबला कर सके. मगर यह वन वे नहीं, समझदारी सिर्फ पत्नी ही दिखाए तब कदमताल बिगड़ जाएगी. इसलिए एकदूसरे के साथ कदम से कदम मिला कर चलें और जीवन की सारी परेशानियों के बोझ को आसानी से उतार फेंकें.

जरूरतों को समझें: बहुत से पतिपत्नी सालों तक एकदूसरे की जरूरतों और भावनाओं को नहीं समझ पाते, जिस से उन के बीच दूरियां बढ़ने लगती हैं. एक छत के नीचे रहते हुए भी वे एकदूसरे के लिए अजनबी बने रहते हैं. मानसिकरूप से त्रस्त रहते हैं.

यदि आप पति की बैटरहाफ बनना चाहती हैं तो पति की पसंद और नापसंद का ध्यान रखें. इसे कहीं आप सिर्फ खाना या पहनना ही तो नहीं समझ रही हैं? मैं जिस पसंद और नापसंद की बात कर रही हूं वह है पैशन और विचार. उन के पैशन को पूरा करने में उन की साथी बनें जैसे, यदि वे लेखक हैं, तो उन की कलम को कुछ नया लिखने की शक्ति उन्हें आप से मिले. उन की राजनीति में दिलचस्पी है, तो आप भी अपनी जानकारी बढ़ाएं और उन के साथ राजनीति पर बातें करें.

यदि उन्हें क्रिकेट का खेल पसंद है, तो आप भी उस में दिलचस्पी लें और जब भी वे टूर पर हों तो समयसमय पर उन्हें स्कोर अपडेट करें. यकीन मानिए, इस से आप दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा और जीवन सुखमय हो जाएगा. उन के धनी होने का हर समय दिखावा न करें और न ही उन की कम आमदनी होने पर असंतोष या मजाक उड़ाएं.

खालीपन भरें: कहने का मतलब यह है कि अपने पति के जीवन का हर खालीपन भरें. आप का सच्चा प्यार और साथ उन के जीवन की हर कमी को दूर करेगा. इसी में जीवन का आनंद है. जीवन में हर मोड़ पर अच्छे और बुरे दिन आतेजाते रहते हैं. एकदूसरे पर भरोसा मुश्किल हालत में भी हारने नहीं देगा. तब वे भी इतराते हुए कह उठेंगे मेड फौर ईचअदर.

बेतकल्लुफ हो उल्लास: जीवनसाथी के साथ गम बांटने में जितना सुकून मिलता है, उस से कहीं ज्यादा मजा उस के साथ अपनी हंसी बांटने में आता है. अगर आप के पास एक बेहतरीन लाइफपार्टनर का साथ है तो फिर जिंदगी की हर छोटी से छोटी खुशी में भी आप बहुत ही बेतकल्लुफ हो उल्लास के साथ हंसेंगे.

एकदूसरे से सीख सकते हैं: अगर आप की जिंदगी में एक अच्छी महिला पत्नी के रूप में आती है, तो आप के लिए यह बहुत ही फायदेमंद है, क्योंकि आप उस से बहुत कुछ सीख सकते हैं. आप दोनों एकदूसरे से खुले रहेंगे, जिस कारण आप दोनों के बीच बेहतर कम्यूनिकेशन होगा, जिस से आप दोनों एकदूसरे से बहुत कुछ सीख और समझ सकते हैं.

दो जिस्म एक जान: पतिपत्नी को यों ही दो जिस्म एक जान नहीं कहा जाता है. एक सच्ची और अपनेपन से युक्त महिला अगर किसी पुरुष की जिंदगी में आएगी तो वह हमेशा चाहेगी कि उस का जीवनसाथी हमेशा तरक्की करे. आप की जीवनसाथी में भी ऐसी ही खूबियां हैं, तो जाहिर तौर पर आप दोनों के जीवन का लक्ष्य अलगअलग होने के बजाय एक ही होगा.

2 मिनट नूडल वाला प्यार तो बाहरी दिखावे पर चल सकता है पर जिंदगी उसी के साथ खुशीखुशी व्यतीत होती है, जिस में ये सारी खूबियां होती हैं. ऐसी खूबियां सिर्फ लड़कों के लिए ही नहीं लड़कियों के लिए भी जरूरी हैं. रिश्ते के दोनों पहिए बराबर होंगे तभी रिश्ते की गाड़ी दूर तक चलेगी.

रसोई में छिपे कीटाणुओं का सफाया करें कुछ ऐसे

किचन घर की सब से महत्त्वपूर्ण जगह होती है. यहीं पूरे घर के सदस्यों के लिए पोषक भोजन तैयार होता है. मगर यदि किचन में कीटाणुओं को दूर रखने का पर्याप्त इंतजाम न हो तो भोजन के संक्रमित होने का खतरा भी सब से ज्यादा यहीं होता है.

इस का मतलब यह नहीं कि आप बारबार किचन के दरवाजे, दराजों, स्लैब आदि पर पोंछा लगाती रहें. कुछ आवश्यक बातों का खयाल रख कर आप इस खतरे को दूर रख सकती हैं. पहले ध्यान दीजिए कि कीटाणुओं के पनपने की वजह क्या हो सकती है.

रसोई का कपड़ा

रसोई के कपड़ा कीटाणुओं के पनपने की एक मुख्य वजह बन सकते हैं. इन में नमी रहती है. रसोई का कपड़ा रोज इस्तेमाल के बाद धो कर रखें. खाना बनाने के बाद स्लैब आदि पोंछने के लिए लाइजोल किचन क्लीनर स्प्रे कर कपड़े से साफ करें. कुकिंग टौप व स्लैब इत्यादि साफ करने वाला कपड़ा और हाथ पोंछने वाला कपड़ा अलगअलग होना चाहिए ताकि कीटाणुओं को फैलने से रोका जा सके.

काटने की जगह

कच्ची फलसब्जियां, सलाद आदि काटने की जगह साफ करती रहें. खासकर यदि उपयोग करने के बाद इस जगह को बगैर धोए हुए छोड़ दिया जाए तो कीटाणुओं को दावत मिल जाती है. इसी तरह चाकू को काम में लाने के बाद अच्छी तरह साफ करना चाहिए. कटिंग बोर्ड को भी हर बार इस्तेमाल के बाद धो कर रखें.

कुंडी, हत्था नल, फ्रिज की सतह, प्रैशर कुकर का हत्था, दरवाजे की कुंडी, दराज का हत्था, डब्बों के ढक्कन आदि को भी समयसमय पर कीटाणुमुक्त करते रहना चाहिए वरना इन के जरीए कीटाणु हमारे हाथ में आएंगे और फिर खाने को दूषित करेंगे.

कचरे का डब्बा

कचरे का डब्बा हमेशा कीटाणुओं के आकर्षण का केंद्र रहता है. फलसब्जियों को छीलनेकाटने के बाद बची फालतू सामग्री के साथ अकसर हम सड़ी या बची खाने की चीजें भी कूड़ेदान में फेंक देते हैं. इस से कीटाणुओं को वहां पनपने का पूरा मौका मिलता है. इसलिए कोशिश करें कि ढक्कन वाले कचरे का डब्बा ही उपयोग में लाएं और बचे हुए खाद्यपदार्थों को कूड़ेदान में फेंकने के बजाय अलगअलग पैकेट में बांध कर फिर कूड़ेदान में फेंकें. कूड़ेदान में डब्बे और आसपास की जगह को बीचबीच में लाइजोल किचन क्लीनर या ऐसे ही किसी अन्य कीटाणुनाशक से धोती रहें.

हाथों के जरीए

कीटाणु हाथों के जरीए भी आप के भोजन में जा सकते हैं. इसलिए खाना बनाने की तैयारी से पहले, खाना खाने से पहले और खाना परोसते समय अपने हाथों को साबुन से साफ जरूर करें.

यदि स्लैब पर खाने के कण छूटे हुए हैं तो वे चींटियों और कौकरोचों को दावत देंगे. इसलिए खाना बनाने के बाद स्लैब और

चूल्हे को लाइजोल किचन क्लीनर से अच्छी तरह साफ करना न भूलें. खाने को ढक कर रखें. पैन और कड़ाही पर ढक्कन जरूर रखें ताकि उन पर मक्खियों, कौकरोच या कीटाणुओं का हमला न हो और वे दूषित होने से बचे रह सकें.

कीटाणु हमारे शरीर के लिए काफी खतरनाक हो सकते हैं. इन के कारण सामान्य त्वचा रोग होने से ले कर जानलेवा बीमारियां तक हो सकती हैं. कीटाणुओं के कारण फैलने वाली प्रमुख बीमारियां हैं:

निमोनिया

निमोनिया फेफड़ों की सूजन से संबंधित एक खतरनाक बीमारी है. इस के प्रमुख लक्षण हैं- सीने में तेज दर्द के साथ बुखार आना, सांस लेने में कठिनाईर् होना आदि. ये रोग सीधे व्यक्ति के इम्यून सिस्टम को प्रभावित करते हैं.

ट्यूबरकुलोसिस

ट्यूबरकुलोसिस यानी क्षय रोग भी कीटाणुओं के कारण फैलता है. यह प्रमुख रूप से फेफड़ों को नष्ट करता है. इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति से यह रोग दूसरे व्यक्तियों में हवा के जरीए आसानी से हो सकता है, क्योंकि उस के थूकखांसी में इस रोग के कीटाणु होते हैं. बुखार, पसीना आना, वजन कम होना और बारबार कफ वाली खांसी होना इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं.

हैजा

यह कीटाणुओं से फैलन वाली एक संक्रामक बीमारी है. इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं- लगातार उल्टियां आना, पानी जैसे दस्त होना, मांसपेशियों में ऐंठन. यदि दस्त बहुत ज्यादा होने लगें तो व्यक्ति के शरीर में डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है जिस से जिंदगी खतरे में पड़ सकती है.

इस बीमारी के कीटाणु खासतौर पर सड़ीगली सब्जियों और फलों, गंदे भोजन और दूषित पानी में पाए जाते हैं. मक्खियां इस बीमारी की प्रमुख वाहक होती हैं जो गंदी चीजों पर बैठती हैं और फिर कीटाणुओं को खाने में मिला देती हैं.

टिटनैस

टिटनैस भी कीटाणुओं की वजह से फैलता है. धूलमिट्टी, लार और पशुओं के मल में पाए जाने वाले टिटनैस के कीटाणु शरीर की कटीफटी त्वचा के जरीए शरीर में प्रवेश करते हैं.

टाइफाइड

टाइफाइड को आंतों का बुखार भी कहते हैं. टाइफाइड पैदा करने वाले कीटाणु मनुष्य की आंतों में रह कर वृद्धि करते हैं और फिर वहां से खून में पहुंच जाते हैं. कीटाणु अकसर दूषित भोजन और पानी से शरीर में पहुंचते हैं. इस के कारण पेट दर्द और कब्ज की शिकायत, कमजोरी और तेज बुखार हो सकता है.

ई-कौमर्स कम्पनियों ने निकाला मोबाइल रिटेलर्स का दीवाला

दीवाली शौपिंग के लिए सज चुके देश के बाज़ारों में ग्राहकों की गहमागहमी के बीच मोबाइल खरीदार नदारद हैं. इलेक्ट्रोनिक्स के घरेलू सामान और स्मार्टफोन बेचने वाले रिटेलर्स (फुटकर दुकानदार) के लिए इस साल की दीवाली पिछले 5 वर्षों में सब से दर्दनाक साबित होने जा रही है.

बाजारों में दुकानदारों के यहां घरेलू इलेक्ट्रोनिक्स सामान और मोबाइल फोन के खरीदारों का टोटा होने की वजह औनलाइन ई-कौमर्स कम्पनियों द्वारा दिया जा रहा भारी डिस्काउंट है. इस के चलते रिटेल कारोबार कर रहे रिटेलर्स का बिजनेस ठंडा पड़ गया है.

नवरात्र के बाद से दीवाली तक 3 हफ्तों में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में क्न्ज़ूमर इलेक्ट्रोनिक्स और स्मार्टफोन का काम करने वाले रिटेलर्स की बिक्री औसतन 50 फीसदी कम चल रही है.

स्मार्टफोन रिटेलर्स स्पाईस हौटस्पौट के प्रवक्ता का कहना है, “ पहले कभी हमारी इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी. बिक्री अभी भी कम हो रही है क्योंकि लोग दीवाली पर ई-कौमर्स कम्पनियों से अभी और छूट की उम्मीद कर रहे हैं तो कुछ अपनी त्योहारी शौपिंग पूरी कर चुके हैं.”

दरअसल, औनलाइन प्लेटफोर्म पर कई स्मार्टफोन ब्रांड्स 30 फीसदी तक छूट दे रहे हैं और कई मामलों में तो कीमत डिस्ट्रीब्यूटर प्राइस से भी कम है.

औल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (एआईएमआरए) का कहना है कि पिछले साल के त्योहारी सीज़न की तुलना में इस साल बिक्री औसतन 20-25 फीसदी कम हो रही है. ज़्यादातर फोन स्टोर्स में बिक्री पिछले साल  से 50-55 फीसदी कम है.

एआईएमआरए का मानना है की पिछले वर्षों में इन स्टोर्स के लिए यह सब से खराब त्योहारी सीज़न रहा है. एआईएमआरए का कहना है,  “ऐसा लग रहा है कि औनलाइन मार्केटप्लेस प्रेसनोट 3 में उल्लिखित नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं.”  प्रेसनोट में कहा गया है कि औनलाइन मार्केटप्लेस कीमतों पर असर नहीं डाल सकते. इन नियम के ज़रिये प्रोडक्ट्स पर एक सीमा से अधिक छूट देने की उन पर पाबंदी लगाई गयी है.  इस नियम का मकसद यह है कि रिटेल स्टोर्स और औनलाइन कंपनियों को बराबर की प्रतियोगिता का अवसर मिले.

हालांकि कुछ इलेक्ट्रोनिक्स और मोबाइल ब्रांड्स औफलाइन स्टोर्स में भी भारी छूट दे रहे हैं लेकिन वे उन का प्रचार नहीं करते. एसोसिएशन ने कहा, “औनलाइन एक्सक्लूसिव मौडल्स पर छूट और फ्लिपकार्ट-अमेज़न के ज़बरदस्त प्रचार  के चलते लोगों के मन में यह बात घर कर गयी है कि औनलाइन मार्केटप्लेस पर सामान की कीमत सब से कम है.

एक बड़े कन्ज्यूमर इलेक्ट्रोनिक्स व मोबाइल ब्रांड का कहना है कि उस के सामानों का औनलाइन बिजनेस बढ़िया रहा है जबकि औफलाइन सेगमेंट में बिक्री बहुत कम हो रही है.

स्टेच्यू औफ यूनिटी : वोट बैंक हथियाने की कवायद

मूर्तिपूजक देश के भाजपा नेता आज एक और मूर्ति के अनावरण से गर्वित दिखाई दे रहे हैं. गुजरात के केवड़िया में नर्मदा तट पर सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची लोहे की प्रतिमा का अनावरण करते समय धर्मानुरागी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम के चेहरे पर जिस तरह गर्व और खुशी के भाव दिखाई पड़ रहे थे लग रहा था, देश ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है.

विश्व में सब से ऊंची प्रतिमा स्थापित कर के नेतागण इस कदर गदगद हो थे मानो भारत ने सब से ऊंची मूर्ति स्थापित कर आसमान की ऊंचाई माप ली है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुबह जब सरदार पटेल की प्रतिमा का अनावरण किया तो नहीं लगा कि वह देश की एकता के प्रतीक किसी नेता की प्रतिमा का अनावरण कर रहे हैं क्योंकि अनावरण समारोह में सिर्फ गुजरात के ही नेता मौजूद थे. इन में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और मध्यप्रदेश की मौजूदा राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ही उपस्थित थे.

यह बात और है कि अनावरण के बाद ‘देश की एकता जिंदाबाद’ के नारे जरूर लगवाए गए. एकता की बेहतर मिसाल तब ज्यादा सराही जाती जब देश के तमाम दलों के नेताओं की शिरकत दिखाई पड़ती और पटेल की प्रतिमा केवल गुजरात या भाजपा की नहीं, समूचे देश की मानी जाती. ऐसा न कर के भाजपा का एकता का नहीं, संकीर्णता का संदेश गया है.

यह सही है कि सरदार पटेल ने देशी रियासतों के एकीकरण में अहम भूमिका निभाई थी. वह कांग्रेस के कद्दावर नेता थे.

दरअसल मूर्तियों को ले कर हमारे देश में एक महाभारत चलता आया है. पुराने नेता, सुधारक, शहीद, देवीदेवता धर्म, जाति, वर्ग और विचारधाराओं में बांट दिए गए हैं.

मूर्तियों की स्थापना के पीछे पुराने नेताओं की अच्छी बातों की सीख ग्रहण करने या समाज को  एकता में बांधने की सोच नहीं, जातियों में विभाजित रहने की हमारी गुलाम सोच है. जातियों के नेताओं के नाम पर वोट बैंक हथियाने की कोशिशें होती हैं.

पिछले कुछ समय से भाजपा ने वोटों के लिए महात्मा गांधी पर अपना अधिकार जताना शुरू किया, फिर अंबेडकर और सरदार पटेल पर. इसे ले कर विपक्ष कांग्रेस और भाजपा दोनों के बीच तकरार चलती रहती है.

देश में असंख्य मूर्तियां हैं. महानगर, शहर, कस्बे और गांवों तक में गली, चौराहों पर मूर्तियां ही मूर्तियां हैं. अलगअलग धर्म, जाति, वर्ग, विचारधाराओं में बंटी मूर्तियों में कैसी सामाजिक एकता है?

यह विभाजन सामाजिक वैमनस्य, नफरत, हिंसा का कारण बन रहा है. आए दिन मूर्तियों को तोड़ने, गंदा करने की घटनाओं को ले कर विभिन्न वर्गों में लड़ाई झगड़ा, खूनखराबा, हिंसा आम है. कभी महात्मा गांधी की मूर्ति को ले कर, कभी अंबेडकर तो कभी देवीदेवताओं की मूर्तियों को ले कर विभिन्न जातियों, वर्गों में आए दिन तलवारें खींची रहती हैं.

इस देश में जातियों की दीवारें कब ढहेंगी? इंसानों में यूनिटी कब होगी? सामाजिक एकता कैसे होगी? क्या इस बारे में भी कोई योजना नहीं है? ऐसी कोई योजना नहीं है. यह मूर्तियों में बंटे देश की एकता नहीं, मूर्तियों के प्रति मानसिक गुलामी है.

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