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धरा स्त्री है

गरल तुम्हारा गर्भ में धारे,

तेज तुम्हारा साधेसाधे,

प्रियतम मेरे मैं थिरकूंगी.

तुम्हें तो घेरे अभिसारिकाएं,

अगणित ग्रह गणिकाएं,

प्रणयसूत्र पर मैं बांधूंगी.

देह तप्त यह चंदन चर्चित,

मय मकरंद का चुंबन अर्चित,

मादक यह मंथन सह लूंगी.

हठी प्रणयी बन चांद भी तो इक,

मोहपाश जिस का आलिंगन,

कसक कामुक सी, न बांटूंगी.

उन्मुक्त अधीर उज्ज्वल अभिसारी,

पगला, प्रवीण वह प्रेम पुजारी,

मुनहारे मोहक न मानूंगी.

सधे पगों से चाल सतर कर,

खुद की लक्ष्मण रेखा खींच कर,

चपल तरलता मैं बांधूंगी.

ज्वार प्रमादी है झकझोरे,

उछाह अनवरत अंतस घेरे,

पर बंधन था बांधा तुम से,

सूरज फेरे तुम्हारे ही लूंगी.

कैसे नियम, यह किस की रचना,

मैं धरा स्वयं सृष्टि बदलूंगी.

– डा. छवि

36 साल बाद वतन वापसी : जयपुर के गजानंद की कहानी

लंबे इंतजार के बाद आखिर वह समय आ ही गया, जब वक्त की सुइयां घूम कर 36 साल पहले के
कैलेंडर पर लौट आईं. वह भी ऐसा ही सामान्य दिन था, जब गजानंद शर्मा पाकिस्तान की सीमा पार कर गए थे. 36 सालों तक पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में रहने के बाद उन्हें अब रिहाई मिली थी. 14 अगस्त, 2018 को गजानंद शर्मा की वतन वापसी हुई. जब वह जयपुर पहुंचे तो उन की पत्नी मखनी देवी, दोनों बेटे मुकेश और राकेश, उन की पत्नियां और बच्चे उन के स्वागत के लिए जयपुर पहुंच गए थे.
मखनी देवी ने इतनी लंबी अवधि के बाद पति को देखा तो उन की आंखें बरस पड़ीं. गजानंद भी अपनी आंखों के आंसुओं को रोक नहीं पाए. मखनी देवी ने आगे बढ़ कर पति के पांव छू लिए. फिर दोनों ने एकदूसरे के गले में फूलमालाएं डालीं. बेटे, बहुओं और बच्चों ने भी गजानंद शर्मा के पैर छुए. सभी खुश थे, बहुत खुश.

अपने परिवार से मिलने के बाद गजानंद सब के साथ नाहरगढ़ इलाके की माउंट रोड पर स्थित फतेहराम का टीबा पहुंचे. यहीं पर उन का घर था. घर में अच्छीखासी भीड़ थी, गजानंद शर्मा असहज महसूस कर रहे थे. उन के लिए सभी अनजान थे. पति की मन:स्थिति को समझ कर उन का परिचय बेटों, बहुओं और बच्चों से कराया. जब वह गए थे, तब उन के बेटे बहुत छोटेछोटे थे. ऐसी स्थिति में बापबेटों के बीच एक अचिन्ही सी दीवार होने वाली बात स्वाभाविक ही थी.

दरअसल, पाकिस्तान ने इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस से 2 दिन पहले 13 अगस्त को गजानंद शर्मा सहित 29 भारतीय कैदियों को रिहा किया था. बदले में भारत ने भी पाकिस्तान के 7 कैदी को रिहा किए थे. दोनों देशों के कैदियों को वाघा अटारी बौर्डर पर पाक रेंजर्स और बीएसएफ के जवानों ने एकदूसरे के हवाले किया.

आश्चर्य की बात यह कि गजानंद शर्मा को खुद पता नहीं है कि वह पाकिस्तान कैसे पहुंच गए. हां, इतना जरूर याद है कि 1982 में जब वह 33 साल के थे, तब अचानक गायब हो गए थे. वे भले ही 36 साल पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में रहे, लेकिन उन्हें उन का अपराध नहीं बताया गया.
केवल इतनी बात जरूर पता चली कि बौर्डर पार कर लेने की वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. इस जुर्म में उन्हें 2 महीने की सजा सुनाई गई थी. लेकिन 2 महीने की सजा इतनी लंबी निकली कि उन्हें 36 साल कैदी बन कर पाकिस्तान में रहना पड़ा.

जयपुर निवासी गजानंद का मामला संवेदनशील था, इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे गंभीरता से लिया. लेकिन सुरक्षा कारणों से उन के घर वालों को वाघा बौर्डर पर आने से मना कर दिया था, इसीलिए गजानंद के बेटे और घर वाले उन्हें अटारी-वाघा बौर्डर पर रिसीव करने नहीं जा सके थे.

जयपुर के सांसद रामचरण बोहरा के कहने पर विप्र फाउंडेशन पंजाब के अध्यक्ष सहदेव शर्मा और उन के सहयोगियों ने गजानंद शर्मा को वाघा बौर्डर से रिसीव किया. वे उन्हें अपने साथ अमृतसर ले गए. वहां पर उन का मैडिकल चैकअप कराया गया. रात को वह अमृतसर में ही रुके.

अगले दिन 14 अगस्त की सुबह सहदेव शर्मा और उन के सहयोगी गजानंद को ले कर पंजाब से रवाना हुए और शाम को जयपुर पहुंच गए. उन के जयपुर पहुंचने पर सांसद रामचरण बोहरा, विधायक सुरेंद्र पारीक और अन्य लोगों ने गजानंद शर्मा और पंजाब से उन्हें ले कर आए दल का स्वागत किया.

सन 1982 में लापता हुए गजानंद को परिवार ने उन के जीवित होने की सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं. जब गजानंद लापता हुए थे, तब उन का परिवार जयपुर जिले के सामोद थाना क्षेत्र के महार कलां गांव में रहता था. बाद में वह परिवार सहित जयपुर आ कर नाहरगढ़ इलाके के माउंट रोड पर फतेहराम का टीबा में रहने लगा था.

गजानंद जब गायब हुए, तब वे मजदूरी करते थे. इसलिए वह अकसर घर से बाहर ही रहते थे. एक दिन वह घर से गए तो वापस नहीं लौटे. उस वक्त उन के 2 बेटे थे. बड़े बेटे की उम्र 15 साल थी और छोटे की 12 साल. दोनों नासमझ थे. मखनी देवी काफी दिनों तक पति को तलाश करती रहीं, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. वह पुलिस के पास भी गईं लेकिन पुलिस भी गजानंद के बारे में पता नहीं लगा सकी.
समय बीतता गया. मखनी देवी ने परिवार को पालने के लिए तमाम परेशानियां उठाईं. अस्पताल में नौकरी की. घरों में बरतन मांजे, झाड़ूपोंछा किया. शादीब्याह के कार्यक्रमों में पूडि़यां बेलीं. कई बार उन्हें भूखे पेट भी रहना पड़ता था. फिर भी उन्होंने बच्चों को पढ़ायालिखाया.

वक्त के झंझावातों से निकल कर दोनों बेटे जवान हो गए और उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां संभाल लीं. गजानंद की कोई सूचना न मिलने से सभी यह मान बैठे थे कि वह शायद ही जीवित हों.
इसी साल मई में केंद्रीय गृह मंत्रालय को पाकिस्तान से कुछ दस्तावेज मिले थे. इन में जयपुर के गजानंद शर्मा के कागजात भी थे. भारतीय राष्ट्रीयता के सत्यापन के लिए आए दस्तावेज केंद्रीय गृह मंत्रालय से राजस्थान सरकार को भेजे. इन दस्तावेजों से इस बात का खुलासा हुआ कि 36 साल पहले लापता हुए जयपुर के गजानंद शर्मा पाकिस्तान की जेल में बंद हैं.

ये दस्तावेज मखनी देवी और उन के परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थे. उन्हें पहली बार सामोद थाना पुलिस के जरिए पता चला कि गजानंद पाकिस्तान की जेल में बंद हैं. लेकिन वे लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि गजानंद पाकिस्तान कैसे पहुंचे और वहां की जेल में किस अपराध में जेल में बंद हैं.

पाकिस्तान से केंद्रीय गृह मंत्रालय के जरिए राजस्थान पुलिस के पास आए दस्तावेजों में भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था. केवल इतना पता चला कि गजानंद पर फारेनर्स एक्ट की धारा 13 और 14 में केस दर्ज था.

राजस्थान पुलिस की इंटेलीजेंस शाखा ने आवश्यक जांचपड़तल के बाद राजस्थान के गृह विभाग को गजानंद के जयपुर निवासी होने की रिपोर्ट सौंप दी. जयपुर से यह रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दी गई.

गजानंद के जीवित होने की सूचना मिलने से उन के परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन उन्हें यह नहीं समझ आ रहा था कि वह अब वापस कैसे आएंगे. लोगों के कहने पर गजानंद के परिजनों ने केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट कर के इस मामले में मदद करने की अपील की.

इसी के साथ गजानंद की रिहाई की मांग को ले कर जयपुर में 31 मई को धरोहर बचाओ समिति के नेतृत्व में विभिन्न सामाजिक संगठनों और प्रबुद्ध लोगों ने कैंडल मार्च निकाला. कैंडल मार्च में मखनी देवी ने भी पति की जल्द रिहाई की मांग करते हुए जोशखरोश से हिस्सा लिया. उन के बेटे और घर वाले भी कैंडल मार्च में शामिल हुए. चौड़ा रास्ता से छोटी चौपड़ तक निकाले गए इस कैंडल मार्च में लोग गजानंद की रिहाई और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए चल रहे थे.

इस के बाद जयपुर के सांसद रामचरण बोहरा ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह को पत्र लिख कर पाकिस्तान की जेल में बंद गजानंद शर्मा की जल्द रिहाई की मांग की. उन्होंने पत्र में लिखा कि गजानंद पिछले 36 सालों से पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद हैं.

उन्हें सिर्फ 2 महीने की सजा हुई थी, लेकिन काउंसलर एक्सेस न होने के कारण वह इतने सालों से वहां बेवजह बंद हैं. इस के अलावा भाजपा के प्रदेश प्रभारी अविनाश खन्ना ने भी विदेश मंत्री को पत्र लिख कर आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया.

2 जून को भाजपा के प्रदेश प्रभारी खन्ना, सांसद बोहरा व विधायक सुरेंद्र पारीक ने गजानंद के घर पहुंच कर उन के घर वालों से मुलाकात कर के हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया. गजानंद की वापसी के लिए 5 जून को जयपुर में प्रार्थना के साथ सांगानेरी गेट स्थित हनुमान मंदिर में 1100 दीपों से महाआरती की गई. इस मौके पर ‘गजानंद बचाओ-पाकिस्तान से जयपुर लाओ’ के नारे भी लगाए गए.

सांसद बोहरा ने 8 जून को दिल्ली में केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री से मुलाकात कर गजानंद की शीघ्र रिहाई की मांग करते हुए विदेश मंत्रालय के दखल का आग्रह किया. इस के अलावा मखनी देवी ने भी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मदद की गुहार लगाई.

गजानंद की रिहाई के लिए उन का परिवार 21 जून को राजभवन पहुंचा और राज्यपाल कल्याण सिंह को आपबीती सुनाई. राज्यपाल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे विदेश मंत्री को पत्र लिख कर प्रयास करेंगे कि गजानंद को न्याय मिले और जेल से जल्द रिहा हो कर वह स्वदेश लौट आएं.

सरकार के स्तर पर किए गए प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया. केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह से मिलने सांसद बोहरा के साथ दिल्ली पहुंची गजानंद की पत्नी मखनी देवी और बेटे मुकेश शर्मा को बताया कि स्वतंत्रता दिवस से 2 दिन पहले 13 अगस्त को गजानंद को पाकिस्तान की जेल से आजादी मिल जाएगी. इस बारे में पाकिस्तान के अधिकारियों से बात हो गई है.

विदेश राज्यमंत्री ने सांसद बोहरा को यह भी बताया कि पाकिस्तान की जेल में बंद राजस्थान के बूंदी के रहने वाले जुगराज की भी जल्द रिहाई के प्रयास किए जा रहे हैं.

गजानंद के साथ पाक जेल में बंद बूंदी के जुगराज और अजमेर के जय सिंह के दस्तावेज भी तसदीक के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से राजस्थान सरकार को भेजे गए थे. इन में गजानंद और जुगराज के घर वालों की तसदीक हो गई थी, लेकिन जय सिंह के घर वाले नहीं मिलने पर फाइल वापस भेज दी गई थी. केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री से पति गजानंद के 13 अगस्त को पाकिस्तान की जेल से रिहा होने की सूचना मिलने के बाद मखनी देवी की आंखों में चमक आ गई.

13 अगस्त को सावन की हरियाली तीज थी. राजस्थान में तीज के पर्व का अलग ही महत्त्व है. गजानंद के परिवार में तीज की अनूठी खुशियां मनीं. मखनी देवी ने 36 साल बाद मनोयोग से सुहागिन का शृंगार किया. घेवर मिठाई खाई और सब को खिलाई. टीवी पर चल रही पति की खबरें देख और सुन कर वह बोली, ‘‘अब मैं सुहागन की तरह जी सकूंगी.’’

पुलिस फाइल से : राज जो छिप न सका

पूरे मामले को पढ़ने के बाद एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि जब गुरदीप सिंह 18 तारीख को अपने काम पर लुधियाना चला गया था तो फिर 2 दिन बाद उस की लाश अपने ही घर के सामने कैसे मिली. इस का मतलब यह है कि या तो गुरदीप लुधियाना गया ही नहीं या फिर किसी के बुलावे पर वह 2 दिन बाद ही गांव वापस आ गया था. पर वह शख्स कौन था, जिस के साथ वह शहर से 2 दिन बाद ही गांव आ गया था. इन्हीं सब बातों का मुझे पता लगाना था.

साल 2018 के जुलाई महीने में मेरी नियुक्ति पंजाब के खन्ना जिले में बतौर एसएसपी हुई थी. इस के पहले मैं होशियारपुर, दसूहा में रहा था. 2011 बैच से आईपीएस करने के बाद मेरी पहली नियुक्ति 2014 में लुधियाना में एसीपी के पद पर हुई थी. जब मैं ने वहां अपना काम शुरू किया, तब शहर की कानूनव्यवस्था चरमराई हुई थी. यातायात का तो बहुत बुरा हाल था.

सब से पहले मैं ने शहरवासियों से मिलमिल कर अपना परिचय बढ़ाया और जगहजगह सभाएं कर पुलिस और जनता के बीच की दूरी खत्म करने की कोशिश की. उन्हें कानून के दायरे में रह कर एक अच्छा नागरिक बनने की सलाह दी.

यातायात को सुचारू रूप से चलाने के लिए मैं ने अपने स्टाफ को कड़े आदेश दे रखे थे कि यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाला कोई नेता हो या कोई अधिकारी, उसे बख्शा नहीं जाए. इसी कड़ी में अपनी नौकरी के मात्र 3 महीने बाद ही दिसंबर माह में पंजाब ऐंड हरियाणा हाईकोर्ट के एक जस्टिस की गाड़ी का नो पार्किंग का चालान काटने के बदले में मुझे ट्रांसफर झेलना पड़ा था.

लुधियाना से जालंधर, दसूहा, होशियारपुर आदि होते हुए जब मैं ने खन्ना पहुंच कर एसएसपी का कार्यभार संभाला तो अपनी आदत के अनुसार मैं ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को यह सख्त आदेश दिया कि किसी भी मामले में लापरवाही नहीं बरती जाएगी. कार्यभार संभालने के बाद सब से पहले मैं ने उन फाइलों को अपना निशाना बनाया जो पिछले 3-4 सालों से बंद पड़ी हुई थीं और उन पर अब तक कोई काररवाई नहीं हुई थी.

इन ढेरों फाइलों में एक फाइल सरवन कौर की थी. शिकायतकर्ता 50 वर्षीय सरवन कौर के 23 वर्षीय शादीशुदा बेटे गुरदीप की किसी ने हत्या कर के उस की लाश उसी के ही घर के सामने डंगरों वाले बाड़े में फेंक दी थी.

मैं ने सरवन कौर के बयान पढ़े. उस का बयान पढ़ने के बाद पता चला कि वह समराला थाने के गांव लोपो के रहने वाले लक्ष्मण सिंह की पत्नी थी. वह अपने पति के साथ खेतों पर मेहनतमजदूरी करती थी. उस के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. सभी शादीशुदा थे और अपनेअपने घरों में खुश थे. बेटों में पवित्र सिंह बड़ा था और गुरदीप उर्फ निका छोटा.

गुरदीप ने किसी लड़की से लवमैरिज की थी और वह उसी के साथ लुधियाना में रहता था. गुरदीप जेसीबी चलाता था. जब भी मौका मिलता, अपनी मां से मिलने वह गांव चला आता था.

16 नवंबर, 2015 को भी गुरदीप अपनी मां से मिलने के लिए घर आया था और 2 दिन रहने के बाद 18 तारीख को अपने काम पर लुधियाना लौट गया. 22 तारीख की सुबह 6 बजे गुरदीप का पिता लक्ष्मण सिंह अपने घर के सामने डंगरों के बाड़े में पशुओं को चारा डालने गया तो वहां पर बेटे गुरदीप की लाश देख कर गश खा कर गिर गया.

देखने से लग रहा था कि किसी ने गुरदीप की गला घोंट कर हत्या कर दी थी. उस के गले में केसरी रंग का पटका बंधा हुआ था.

बेटे की लाश देख कर लक्ष्मण ने जोरजोर से रोना शुरू कर दिया. रोने की आवाज सुन कर उस के परिवार के साथसाथ गांव वाले भी वहां जमा हो गए. गांव के किसी आदमी ने इस घटना की सूचना थाना समराला को दे दी. थाना समराला के तत्कालीन प्रभारी मंजीत सिंह एसआई नछत्तर सिंह के साथ मौके पर पहुंचे थे.

घटनास्थल का मौकामुआयना करने के बाद उन्होंने मृतक के परिवार वालों और ग्रामीणों के बयान दर्ज करने के बाद गुरदीप की हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 34 के तहत दर्ज कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भेज दी थी.

आगे की काररवाई के नाम पर तफ्तीश जारी है, लिख कर फाइल बंद कर दी गई थी. थानाप्रभारी मंजीत सिंह का तबादला हो जाने के बाद शायद नए थानाप्रभारी ने उक्त फाइल को खोल कर देखने की जहमत भी नहीं उठाई थी. उस के बाद कई थानाप्रभारी आए और गए, गुरदीप की हत्या की फाइल नीचे दब कर रह गई थी. इस घटना को लगभग ढाई साल गुजर गए थे.

फाइल का पूरी तरह से अध्ययन करने के बाद मैं ने तत्कालीन डीएसपी समराला हरसिमरत सिंह शेतरा और थानाप्रभारी भूपिंदर सिंह को अपने औफिस बुलाया. मैं ने उक्त फाइल उन्हें सौंपते हुए कहा कि मुझे जल्द से जल्द गुरदीप के हत्यारों का पता चाहिए. साथ ही केस की प्रोग्रैस रिपोर्ट रोज शाम को मेरी टेबल पर होनी चाहिए.

इस के बाद थानाप्रभारी भूपिंदर सिंह ने लोपा गांव में अपना नेटवर्क फैला दिया. गांव में ज्यादातर मेहनतमजदूरी करने वाले लोग थे. किसी को फुरसत नहीं थी. सभी अपने कामों में व्यस्त थे. फिर इतनी पुरानी बात लोग भूल से गए थे. उन्हें सिर्फ इतना याद था कि सरवन के बेटे गुरदीप की हत्या हुई थी.

मृतक की मां बेटे के हत्यारों को पकड़ने के लिए समयसमय पर अधिकारियों के यहां चक्कर काटती रहती थी. सरवन ने पुलिस को 4 संदिग्ध लोगों के नाम पुलिस को देते हुए उन पर शक जताया था, पर उस की बातों की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया था.

मैं ने उन चारों लोगों के नाम अपने खास मुखबिर को सौंपते हुए कहा था कि इन चारों की पूरी कुंडली का पता लगाओ और साथ में इस बात का भी पता लगाओ कि उस दिन गुरदीप अपने गांव किस के बुलावे पर लुधियाना से आया था.

अगले 2 दिन में मुझे इस पूरे मामले की तह तक की जानकारी मिल गई. और तो और, इस हत्या की योजना का एक चश्मदीद गवाह भी मेरे हाथ लग चुका था. सारी बातें मैं ने थानाप्रभारी भूपिंदर सिंह को बताईं. मैं ने उन चारों लोगों के नाम देते हुए कहा, ‘‘इन्हें बुलवा कर पूछताछ करो.’’

भूपिंदर सिंह ने उसी दिन गांव लोपो के मोहन सिंह, गुरमुख सिंह, दविंदर सिंह और बब्बू सिंह को थाने बुलवा लिया. इन चारों में मोहन सिंह के अलावा उस का एक बेटा, एक भाई और एक भतीजा था. मैं भी थाने पहुंच गया.

ढाई साल बाद जब गुरदीप की हत्या की जांच शुरू हुई तो सब चौंक गए. काफी देर याद करने का नाटक करने के बाद मोहन सिंह ने बताया था कि लक्ष्मण के बेटे की मौत हुई तो थी पर उस की मौत से उस का या उस के परिवार का कोई वास्ता नहीं था. लेकिन मेरे पास इस बात का पुख्ता सबूत था कि गुरदीप की हत्या के पीछे सिर्फ और सिर्फ मोहन सिंह का ही वास्ता है.

मैं ने काफी कोशिश की थी कि वह प्यार से अपने आप जुर्म कबूल कर के सब कुछ बता दे पर वह अपनी बातों से मुझे गुमराह करने की कोशिश करता. अंत में मैं ने चंद सिंह नाम के उस आदमी को ला कर मोहन सिंह के सामने खड़ा कर दिया, जिस के सामने उस ने अपने बेटे और भाई के साथ मिल कर गुरदीप की हत्या की योजना बनाई थी.

चंद सिंह भी लोपो गांव का एक जाट जमींदार था. चंद सिंह को अपने सामने देख कर मोहन की घिग्घी बंध गई. वह बगलें झांकने लगा. अंत में उस ने और अन्य तीनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया था कि उन्होंने ही योजना बना कर गुरदीप की हत्या की थी.

चारों आरोपियों को उसी दिन 5 अगस्त, 2018 को अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर लिया गया. विस्तार से की गई पूछताछ के बाद गुरदीप की हत्या की जो कहानी सामने आई, उस में दोष गुरदीप का अधिक था.

गुरदीप के पड़ोस में मोहन सिंह का घर था. मोहन सिंह मजदूर किसान था. मोहन की एक बेटी थी हरमनदीप कौर जो पास के रोपलो गांव में स्थित स्कूल में पढ़ती थी. गुरदीप गांव का बांका नौजवान था. पड़ोसी होने के नाते बचपन से ही हरमन और गुरदीप साथसाथ खेले थे और दोनों परिवारों का एक दूजे के घर काफी आनाजाना था.

हरमन जब जवान हुई तो उस का झुकाव गुरदीप की ओर हो गया था, जबकि गुरदीप ने लुधियाना काम करना शुरू कर दिया था. लेकिन वह जब भी गांव आता तो हरमन को अपने आसपास मंडराते पाता था. फिर मौका देख कर दोनों एकदूसरे से मिलने लगे.

हरमन के लिए गुरदीप से मिलने में कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि दोनों के परिवार में घनिष्ठ संबंध थे. वह स्कूल से छुट्टी मार कर गुरदीप के साथ सैरसपाटे पर चली जाया करती थी. धीरेधीरे उन के याराने के चर्चे गांव में भी होने लगे थे. उड़तेउड़ते यह बात मोहन सिंह को भी पता चल गई थी. उस ने जब अपनी बेटी की निगरानी की तो असलियत सामने आ गई थी.

फिर एक दिन मोहन सिंह को स्कूल से खबर मिली कि हरमनदीप कौर कई दिनों से स्कूल से गैरहाजिर है. यह सुन कर मोहन समझ गया कि वह गुरदीप के साथ ही घूमफिर रही होगी. उस दिन मोहन ने बेटी हरमन को खूब डांटाफटकारा. साथ ही उस ने गुरदीप के घर जा कर उस की मां और बाप को खूब खरीखोटी सुनाई. इतना ही नहीं उन्हें धमकी भी दी कि अगर गुरदीप ने अपनी आदत नहीं बदली तो गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा.

गलती गुरदीप की थी, इसलिए बात को खत्म करने के लिए सरवन कौर और उस के पति लक्ष्मण ने मोहन सिंह के पैर पकड़ कर माफी मांग ली.

कुछ दिन के लिए मामला ठंडा पड़ गया था. एक दिन मोहन को गांव वालों से पता चला कि गुरदीप के पास हरमन की अश्लील फोटो हैं. वह गांव में लोगों को बताता फिर रहा है कि अगर मोहन ने उसे हरमन से मिलने से रोका तो ये फोटो इंटरनेट पर डाल कर उन्हें बदनाम कर देगा.

यह बात सुन कर मोहन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. मोहन सिंह ने उसी दिन गुरदीप के घर जा कर उस के मांबाप से बात की. उन्होंने मोहन को आश्वासन दिया कि यदि ऐसी कोई फोटो गुरदीप के पास है तो वह उस से फोटो ले कर उन्हें सौंप देंगे. गुरदीप ने वे फोटो किसी को नहीं दिए. इस बात को ले कर मोहन और लक्ष्मण के परिवार में कई बार झगड़ा भी हुआ पर गुरदीप ने वह फोटो नहीं दीं.

गुरदीप को किसी भी तरह मानता न देख कर मोहन सिंह को अपनी इज्जत बचाने का एक ही रास्ता दिखाई दिया. वह रास्ता था गुरदीप की हत्या कर देने का. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. अपने भाई और बेटे के साथ मिल कर मोहन ने गुरदीप की हत्या की योजना बनाई. इस बारे में मोहन सिंह ने चंद सिंह से भी मशविरा किया.

अपनी योजना के अनुसार 21 नवंबर, 2015 की शाम को मोहन ने हरमन से गुरदीप का फोन नंबर ले कर उसे फोन कर गांव के बाहर मिलने के लिए बुलाया था. मोहन ने गुरदीप को कहा था कि अगर तुम फोटो वापस नहीं लौटाना चाहते तो हरमन से शादी कर लो. अगर हरमन से शादी करनी है तो आज रात 9 बजे तक गांव के अड्डे पर मिलो. यह बात सुन कर गुरदीप झट से तैयार हो गया. वह ठीक 9 बजे अड्डे पर पहुंच गया.

नवंबर महीने में हलकीहलकी ठंड पड़ रही थी. वैसे भी गांवों में दिन छिपने के बाद लोग अपनेअपने घरों में दुबक जाते हैं. जिस समय गुरदीप अड्डे पर पहुंचा तो उस समय चारों ओर सन्नाटा पसरा पड़ा था. बात करने के बहाने वे चारों उसे सुनसान खेत में ले गए.

मोहन सिंह ने एक बार फिर गुरदीप को अपनी इज्जत का वास्ता देते हुए फोटो लौटाने के लिए कहा. गुरदीप ने शराब पी रखी थी.

फोटो लौटाने की बात सुन कर गुरदीप भड़क गया. इतना ही नहीं, वह धमकी देने लगा तो मोहन सिंह को गुस्सा आ गया. चारों ने पकड़ कर उसे जमीन पर पटक दिया और अपने साथ लाए टेलीफोन के तार से उस का गला घोंट दिया.

इस के बाद उसी के सिर पर बंधे पटके को उतार कर उस के गले में डाला और कस दिया. गुरदीप की हत्या करने के बाद चारों ने उस की लाश खेत से उठा कर उस के घर के सामने डाल दी.

इस मुकदमे की जांच पूरी गहराई, तकनीकी ढंग और खुफिया सूत्रों के साथ की गई थी. इसी कारण इस ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी को ढाई साल बाद सुलझाया जा सका था. रिमांड के बाद 6 अगस्त, 2018 को गुरदीप की हत्या के आरोप में मोहन सिंह, गुरमुख सिंह, दविंदर सिंह और बब्बू को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया.

प्रस्तुति: हरमिंदर कपूर

खतरनाक डगर प्यार की : क्या हुआ उन दोनों के प्यार का अंजाम

जुलाई का महीना था. अन्य महीनों की अपेक्षा उस दिन गरमी कुछ अधिक थी. जतिंदर उर्फ जोबन ने चाटी से लस्सी निकाल उस में बर्फ मिलाया. फिर एक गिलास भर कर अपने पिता तरसेम सिंह को देते हुए कहा, ‘‘ले बापू, लस्सी पी ले. आज बड़ी गरमी है.’’

20 वर्षीय जोबन अपने 60 वर्षीय पिता के साथ घर के आंगन में बैठा गपशप कर रहा था. लस्सी का गिलास अपने हाथ में लेते हुए तरसेम सिंह बोले, ‘‘बेटा, गरमी हो या सर्दी, हम जट्ट किसानों को तो खेतों में ही रहना पड़ता है. हम एसी में तो नहीं बैठ सकते न.’’

जोबन ने पिता से मजाक करते हुए कहा, ‘‘बापू क्यों न हम अपने खेतों में एसी लगवा लें.’’

‘‘क्या ये बिना सिरपैर की बातें कर रहा है.’’ तरसेम बेटे की बात पर हंसते हुए बोले, ‘‘कहीं खेतों में भी एसी लगते हैं.’’

यूं ही फिजूल की इधरउधर की बातें कर के बापबेटा अपना मन बहला रहे थे कि जोबन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. अचानक फोन की घंटी ने उन की बातों पर विराम लगा दिया. जोबन पिता के पास से उठ कर एक तरफ चला गया और फोन पर किसी से बातें करने लगा. तरसेम सिंह अपनी जगह ही बैठे रहे. जोबन फोन पर बातें करते हुए जब घर से बाहर जाने लगा तो तरसेम सिंह ने उसे टोका, ‘‘ओए पुत्तर, खाने के वक्त कहां जा रहा है?’’

‘‘अभी आया पापाजी,’’ जोबन ने फोन सुनते हुए ही पिता को आवाज दे कर कहा और बातें करते हुए घर से बाहर निकल गया. यह बात 17 जुलाई, 2018 रात 9 बजे की है. जोबन के चले जाने के बाद तरसेम सिंह पोतेपोतियों से बातें करने लगे.

तरसेम सिंह पंजाब के जिला अमृतसर देहात के कस्बा ब्यास के पास वाले गांव शेरों निगाह के रहने वाले थे. गांव में उन का बहुत बड़ा कुनबा था. उन के पिता मोहन सिंह गांव के नामी जमींदार थे. उन की मृत्यु के बाद तरसेम सिंह ने भी अपने पुरखों की जागीर को संभाल कर रखा था. तरसेम सिंह ने 2 शादियां की थीं. दोनों ही पत्नियों की मृत्यु हो चुकी थी.

पहली पत्नी से उन की 2 बेटियां और 2 बेटे थे. पहली पत्नी की मृत्यु के बाद बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने दूसरी शादी की थी. दूसरी पत्नी से उन्हें 2 बेटियां और एक बेटा जतिंदर उर्फ जोबन था. पूरे परिवार में जोबन ही सब से छोटा था और इसी वजह से सब का प्यारा था. तरसेम सिंह के सभी बेटे शादीशुदा थे और गांव में पासपास बने घरों में रहते थे.

जोबन को घर से निकले काफी देर हो चुकी थी. जबकि अपने पिता से वह यह कह कर गया था कि अभी लौट आएगा. तरसेम सिंह के पोतेपोतियां भी सोने चले गए थे. उन्होंने समय देखा तो रात के 11 बज चुके थे. उन का चिंतित होना स्वाभाविक ही था. उन्होंने जोबन को फोन मिलाया तो उस का फोन बंद मिला. बारबार फोन मिलाने पर भी जब हर बार फोन बंद मिला तो वह अकेले ही गांव में उस की तलाश के लिए निकल पड़े.

उन्होंने पूरा गांव छान मारा पर जोबन का कहीं कोई पता नहीं चला. अंत में उन्होंने घर लौट कर अपने दूसरे बेटों को जगा कर सारी बात बताई. बेटे की तलाश के लिए उन्होंने अपने भाई सुखविंदर सिंह और शादीशुदा दोनों बेटियों को भी फोन कर के अपने यहां बुला लिया था.

सभी लोग एक बार फिर से जोबन को ढूंढने के लिए निकल पड़े. तरसेम के बेटों के साथ गांव के कुछ और लोग भी थे. पूरा कुनबा सारी रात ढूंढता रहा पर जोबन का पता नहीं चला. उसे हर उस संभावित जगह पर तलाशा गया था, जहां उस के मिलने की उम्मीद थी.

अगली सुबह जोबन के लापता होने की खबर थाना ब्यास में दे दी गई. उस की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद पुलिस ने भी उस की तलाश शुरू कर दी. अपने घर फोन पर किसी से बात करतेकरते जोबन अचानक कहां गायब हो गया, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी. जोबन को लापता हुए 24 घंटे से भी अधिक का समय बीत चुका था. उस का फोन अब भी बंद था.

शाम के समय गांव जोधा निवासी जोबन के एक दोस्त तरसपाल सिंह ने तरसेम सिंह को फोन पर बताया कि उस ने पहली जुलाई की रात जोबन को सुखबीर सिंह के साथ गांव से बाहर जाते देखा था.

उस वक्त सुखबीर के साथ 2 लड़के और भी थे. वह उन्हें पहचान नहीं पाया, क्योंकि उन दोनों ने अपने चेहरे कपड़े से ढक रखे थे. इस से पहले रात करीब 8 बजे सुखबीर उस के घर आया था और बहुत घबराया हुआ था. बता रहा था कि उस का स्कूल के ग्राउंड में किसी से झगड़ा हो गया था. विस्तार से बात समझने के लिए तरसेम सिंह ने तरसपाल को अपने पास बुलवा लिया और उस से पूरी बात पूछी.उस के बाद तरसेम सिंह को पूरा विश्वास हो गया कि उन के बेटे के लापता होने में सुखबीर का ही हाथ हो सकता है.

वह जानते थे कि जोबन का सुखबीर की बहन के साथ चक्कर चल रहा था. उन के दिमाग में यह बात भी आई कि कहीं इस रंजिश की वजह से सुखबीर ने जोबन को सबक सिखाने के लिए गायब तो नहीं करवा दिया.

बहरहाल, तरसेम ने इन सब बातों से अपने रिश्तेदारों को अवगत करवाया और तरसपाल को अपने साथ ले कर थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी किरणदीप सिंह को उन्होंने जोबन के लापता होने से ले कर अब तक की पूरी बात विस्तार से बता दी. थानाप्रभारी के पूछने पर तरसपाल ने बताया कि जोबन को फोन कर के सुखबीर सिंह उर्फ हीरा ने ही बुलाया था.

सुखबीर के साथ 2 और युवक भी थे, जिन्होंने मुंह पर कपड़ा बांध रखा था. वे तीनों जोबन को गांव शेरो बागा के स्कूल के ग्राउंड में ले गए थे, जहां पर झगड़े के दौरान सुखबीर ने जोबन के सिर पर ईंट से वार किया. इस से जोबन की मौके पर ही मौत हो गई थी. इस के बाद सुखबीर ने अपने साथियों के साथ मिल कर जोबन की लाश ब्यास नदी में फेंक दी.

तरसपाल का बयान दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी किरणदीप सिंह ने 3 जुलाई, 2018 को भादंवि की धारा 302 के तहत सुखबीर सिंह और 2 अन्य लोगों के खिलाफ जोबन की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद पुलिस ने सुखबीर के घर दबिश दे कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

सुखबीर से प्रारंभिक पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर जोबन की हत्या में शामिल दूसरे युवक लवप्रीत सिंह को भी गांव के बाहर से गिरफ्तार कर लिया.

4 जुलाई, 2018 को पुलिस ने सुखबीर और लवप्रीत को अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान हुई पूछताछ के दौरान सुखबीर सिंह ने जोबन की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था. विस्तार से की गई पूछताछ के बाद इस हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार से थी. कह सकते हैं कि यह मामला औनर किलिंग का था.

सुखबीर सिंह उर्फ हीरा अमृतसर के गांव अर्क के एक मध्यवर्गीय परिवार से था. उस के पिता बलबीर सिंह इतना कमा लेते थे जिस से घर खर्च और अन्य जरूरतें आराम से पूरी हो जाती थीं. सुखबीर 2 भाईबहन थे. किसी कारणवश सुखबीर ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी. अब सुखबीर और उस के मातापिता का एक ही सपना था कि वे किसी तरह अपनी बेटी पम्मी को उच्चशिक्षा दिलाएं. इस के लिए सुखबीर भी जीतोड़ मेहनत कर रहा था.

एक कहावत है कि जब इंसान के जीवन में 16वां साल तूफान बन कर आता है तो कोई विरला ही अपने आप को इस तूफान से बचा पाता है, ज्यादातर लोग तूफान की चपेट में आ जाते हैं. जोबन और पम्मी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था. जोबन करीब 20 साल काथा और पम्मी 16 पार कर चुकी थी. दोनों एक ही गांव के और एक ही जाति के थे.

आग और घी जब आसपास हों तो आंच पा कर घी पिघल ही जाता है. दुनिया और समाज के अंजाम की परवाह किए बिना जोबन और पम्मी प्रेम अग्नि के कुंड में कूद पड़े थे. लगभग एक साल तक तो किसी को उन की प्रेम कहानी का पता नहीं चला था. क्योंकि मिलनेजुलने में दोनों बड़ी ऐहतियात बरतते थे. पर ये बात जगजाहिर है कि इश्क और मुश्क कभी छिपाए नहीं छिपते. एक न एक दिन किसी न किसी को तो खबर लग ही जाती है.

किसी माध्यम से सुखबीर को जब अपनी बहन के प्रेम प्रसंग के बारे में पता चला तो जैसे घर में तूफान आ गया. सुखबीर को ज्यादा गुस्सा इस बात पर था कि वह बहन पम्मी को ऊंचाई तक पहुंचाना चाहता था और वह गलत रास्ते पर जा रही थी. गुस्सा या मारपीट करने से कोई लाभ नहीं था. उस ने पम्मी को प्यार से काफी समझाया.

पम्मी ने भी भाई को साफसाफ बता दिया कि वह जोबन के बिना नहीं रह सकती. सुखबीर अपनी बहन की खुशियों के लिए शायद उस की बात मान भी लेता, पर समस्या यह थी कि जोबन पर अदालत में एक आपराधिक मुकदमा चल रहा था. सुखबीर नहीं चाहता था कि उस की बहन ऐसे आदमी से शादी करे जो अपराधी किस्म का हो.

बहन को समझाने के बाद उस ने जोबन के पास जा कर उस के सामने हाथ जोड़ कर उसे समझाया, ‘‘जोबन, हम एक ही गांव के हैं और एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए हैं. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं कि मेरी बहन का पीछा छोड़ दो और हमें और हमारे सपनों को बरबाद न करो.’’

जोबन ने आश्वासन तो दे दिया कि वह आइंदा पम्मी से नहीं मिलेगा पर ऐसा हुआ नहीं. वह पम्मी से मिलता रहा. घटना से एक दिन पहले सुखबीर ने जोबन को पम्मी के साथ गांव के बाहर खेतों में देख लिया. उस समय वह खून का घूंट पी कर खामोश रह गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस समस्या का समाधान कैसे करे.

काफी सोचने के बाद उस ने जोबन को अपनी बहन की जिंदगी से हमेशा के लिए दूर करने का फैसला कर लिया. पर यह काम वह अकेले नहीं कर सकता था, इसलिए इस काम के लिए उस ने अपने दोस्त लवप्रीत और सुरजीत को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया. जोबन सहित ये सभी लोग एकदूसरे के दोस्त थे.

अगले दिन पहली जुलाई की रात में सुखबीर ने जोबन को फोन कर के मिलने के लिए गांव के स्कूल के ग्राउंड में बुलाया. उस ने कहा था कि पम्मी के बारे में जरूरी बात करनी है. उस वक्त लवप्रीत और सुरजीत उस के साथ थे. सुखबीर ने पहले से ही तय कर लिया था कि पहले वह जोबन को समझाएगा. अगर वह नहीं माना तो उसे अंत में ठिकाने लगा देगा.

पर ऐसा नहीं हुआ. बातोंबातों में उन के बीच बात इतनी बढ़ गई कि दोनों का आपस में झगड़ा हो गया. इसी दौरान सुखबीर ने पास पड़ी ईंट उठा कर पूरी ताकत से जोबन के सिर पर दे मारी, जिस से जोबन लुढ़क गया और मौके पर ही उस की मौत हो गई.

जोबन की मौत के बाद तीनों घबरा गए. अपना अपराध छिपाने के लिए उन्होंने मिल कर उस की लाश पास में बह रही ब्यास नदी में बहा दी और अपनेअपने घर चले गए.

चूंकि नदी से जोबन की लाश बरामद करनी थी, इसलिए पुलिस ने गोताखोरों की टीम बुलवा कर काफी खोजबीन की. 4-5 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद भी जोबन की लाश नहीं मिल सकी. जिन थाना क्षेत्रों से नदी गुजरती थी, थानाप्रभारी ने वहां की पुलिस से भी संपर्क किया कि उन के क्षेत्र में कोई लाश तो बरामद नहीं हुई है. कथा लिखे जाने तक जोबन की लाश पुलिस को नहीं मिली थी.

रिमांड अवधि खत्म होने के बाद पुलिस ने सुखबीर और लवप्रीत को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया. इस हत्या में शामिल तीसरे अभियुक्त सुरजीत की पुलिस तलाश कर रही है.

पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में पम्मी परिवर्तित नाम है.

रिलायंस शिपयार्ड ने तीन सालों से नहीं किया वेंडरों का भुगतान

गुजरात के अमरेली जिले के राजुला शहर में रिलायंस के एक शिपयार्ड में काम करने वाले लगभग 200 वेंडरों को कंपनी ने वर्ष 2015 से भुगतान नहीं किया है. उस वर्ष अनिल अंबानी के रिलायंस समूह ने देश की सबसे बड़ी पोत निर्माण कंपनी पीपावाव डिफेंस एंड औफशोर इंजीनियरिंग लिमिटेड को खरीदा था. बिकवाली के वक्त पीपावाव दिवालिया होने के कगार पर थी और उसके ऊपर 6000 करोड़ रुपए का कर्ज था. कंपनी के बिकने के बाद उसका सारा कर्ज भी रिलायंस के जिम्मे आ गया. राजुला से कांग्रेस के विधायक अंबरीश डेर की एक सूची के अनुसार सितंबर 2018 तक रिलायंस के ऊपर 191 वेंडरों का कुल 71 करोड़ 79 लाख रुपए बकाया है.

मेरी बातचीत में कई वेंडरों ने बताया कि शुरू में रिलायंस द्वारा पीपावाव को खरीदने की खबर से वे लोग खुश हुए थे. उन्होंने कहा कि 2012 तक भुगतान में कमी होने लगी थी लेकिन पीपावाव के संस्थापक-प्रमोटर निखिल गांधी और भावेश गांधी उन लोगों को बकाया का कुछ हिस्सा देते रहते थे. रिलायंस के अधिग्रहण करने के बाद वेंडरों का भुगतात या तो सीमित कर दिया गया या उसे पूरी तरह से ही रोक दिया गया. इसके तीन साल बाद कई बैंकों ने रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड (आरनेवल) के खिलाफ कर्ज उगाही कार्यवाही आरंभ की. वेंडर दावा कर रहे हैं कि रिलायंस पर उन लोगों की बहुत बड़ी रकम बकाया है.

इन वेंडरों में वे बिक्रेता और ठेकेदार हैं जो शिपयार्ड में काम के लिए केबल तार और बिजली के पैनल आदि की आपूर्ति करते हैं एवं यार्ड में काम के लिए मजदूर उपलब्ध कराते हैं. बजरंग कंस्ट्रक्शन के शिवा भाई वाघ ने बताया कि 2008 से उनकी कंपनी फैबरिकेशन का काम ले रही है. वो बताते हैं कि “2012 से भुगतान कम होने लगा था.” उन्होंने आगे कहा, “जब से रिलायंस आया ना, अनिल अंबानी, तब से तो वाट ही लग गई.” डेर की सूची के अनुसार रिलायंस पर वाघ कंपनी का 72 लाख रुपए बकाया है.

साल 2015 से रिलायंस समूह रक्षा क्षेत्र में व्याप्त व्यवसायिक अवसरों में तेजी के साथ  फैल कर रहा है. उस साल मार्च में रिलायंस समूह ने घोषणा की कि छह महीनों के भीतर वह पीपावाव शिपयार्ड का अधिग्रहण कर लेगी. जनवरी 2016 के शुरू में ही टेकओवर पूरा कर लिया गया. लेकिन राजुला में रिलायंस शिपयार्ड का मामला अंबानी के रक्षा व्यवसाय के खस्ता हाल को उजागर करता है. सार्वजनिक और निजी आश्वासनों के बावजूद स्थानीय ठेकेदारों पर बकाया करोड़ो रुपए का उधार चुकता नहीं हो पाया है. अनिल अंबानी का समूह शिपयार्ड को चलाए रखने के लिए संघर्षरत है.

जिन वेंडरों से मैंने बात की उनमें से अधिकांश ने अंबानी के किए वादे की बात बताई. हालांकि टेकओवर जनवरी 2016 में पूरा हुआ लेकिन सितंबर 2015 में ही, जैसा कि भावेश लखानी बताते हैं, अंबानी ने 2000 मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा था, “हमारे पास पैसों की कोई कमी नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति को उसका पूरा बकाया चुकाया जाएगा.” वो जोर देकर कहते हैं, “अनिल भाई ने खुद बोला था”. लखानी शिपिंग कंपनी आदित्य मैरीन के मालिक हैं जिसका 60 लाख रुपया रिलायंस पर बकाया है.

जिन बिक्रेता और ठेकेदारों से मैंने बात की उनका कहना था कि वे इस भरोसे कंपनी से जुड़े रहे कि रिलायंस उनके बकाया बिलों का पूरा भुगतान कर देगा. 2010 और 2015 के बीच शिपयार्ड में विद्युतीय सामग्री की आपूर्ति करने वाले व्यापारी प्रितिश भाई ने बताया कि वे उस साल के अंत तक आपूर्ति करते रहे जबकि कुल भुगतान का 60 प्रतिशत बकाया था. उन्होंने सोचा था कि “रिलायंस पैसे वाली कंपनी है.” प्रितीश बताते हैं कि शिपयार्ड की खरीद विभाग ने उन पर आपूर्ति जारी रखने का दवाब यह कह कर बनाया कि वे व्यपार में वृद्धि होने का इंतजार करें. उन्होंने बताया कि उनका रिलायंस पर अभी भी 85 लाख रुपए बकाया है.

जब रिलायंस ने 2015 के अंत तक भुगतान नहीं किया था, तो विक्रेताओं ने अपने मजदूरों और कच्चे माल को वापस उठाना शुरू कर दिया. 2016 की शुरुआत में रिलायंस समूह ने इन लोगों के साथ व्यक्तिगत बैठकें की. प्रितीश बताते हैं, “कंपनी के प्रतिनिधियों ने हमें आश्वासन दिया कि बकाया राशि का भुगतान किया जाएगा इसलिए हम आपूर्ति ना रोकें.” प्रितीश ने बताया कि ऐसी ही एक बैठक में कंपनी पर कुल बकाया राशि पर हमें छूट देने को कहा गया और रकम का भुगतान चार किस्तों में करने की पेशकश की गई. “उन्होंने शुरू में हमसे 50 प्रतिशत की छूट मांगी जिस पर हम लोग सहमत नहीं हुए और मेरे पिता कमरे से बाहर जाने लगे. फिर उनके प्रतिनिधियों में से एक ने हमें वापस बुलाया. हम अंत में 15 प्रतिशत की छूट देने पर सहमत हो गए.”

इस समझौते पर कभी हस्ताक्षर नहीं हुआ क्योंकि कंपनी ने अंतिम मसौदे में राशि को और कम कर दिया था. प्रितीश ने बताया कि उन्हें कोई पैसा नहीं दिया गया था. जब उन्होंने रिलायंस से संपर्क किया तो उनसे कहा गया कि उस प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया है और किसी से नया सौदा नहीं किया जाएगा. “अभी तो हमें गेट से अंदर ही नहीं जाने देते.”

सवज राम भाई ने 2011 और 2015 के बीच की अवधि में कंपनी से फैब्रिकेशन का ठेका लिया था. उन्होंने कंपनी को 20 प्रतिशत से अधिक की छूट देने का करार किया. छूट के बाद की बकाया राशी का भुगतान चार किस्तों में किया जाना था. कंपनी ने उन्हें 17 लाख रुपए की पहली किस्त का भुगतान किया लेकिन बाकी का 43 लाख रुपया अभी तक अटका पड़ा है. ऐसा ही हुआ 2013 से 2015 तक शिपयार्ड में मजदूरों की सप्लाई के ठेकेदार शब्बीर भाई के साथ. उन्होंने बताया कि कंपनी ने 1.5 करोड़ रुपए की कुल राशि में से केवल 28 लाख रुपए का भुगतान किया है. शब्बीर ने यह भी बताया कि उनसे वादा किया गया था कि उन्हें चार किस्तों में भुगतान हो जाएगा.

इस के बाद विक्रेताओं ने अलग अलग समय में आरनेवल के साथ काम करना बंद कर दिया. जो जितने दिन जोखिम उठा सकता था उसने उन दिन तक काम किया. प्रितीश भाई जैसे व्यपारियों ने, जिन्होंने आरनेवल को माल आपूर्ति की थी, 2015 के अंत तक आपूर्ति बंद कर दी, जबकि शिपयार्ड में रोजाना मजदूरों की सप्लाई करने वाले गबरू भाई जैसे ठेकेदारों ने तब तक आपूर्ति जारी रखी जब वे लेट पेमेंट के बावजूद मजदूरों को काम करते रहने के लिए प्रेरित रख सकते थे, गबरू ने जनवरी 2018 तक ऐसा करना जारी रखा. दूसरी ओर मार्च में पीपावाव में 18 प्रतिशत हिस्सेदारी लेने के तुरंत बाद, आरनेवल ने कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन या सीडीआर प्रक्रिया आरंभ कर दी. इस प्रक्रिया के तहत ऋणदाता अपने कर्जदार को भुगतान के लिए प्रस्ताव पेश करने को कहते हैं. ऐसा करना कंपनी की माली हालात को बयां करता है. मार्च 2017 तक कंपनी का कुल जमा कर्ज 8951 करोड़ रुपए जा पहुंचा था. अप्रैल 2017 में, आईडीबीआई के नेतृत्व में 23 बैंकों के एक संघ ने रिलायंस को सीडीआर प्रक्रिया से बाहर निकलने की इजाजत दे दी. ऐसा होने से 20000 करोड़ रुपए से अधिक के लैंडिंग प्लेटफार्म डौक्स या एलपीडी कहे जाने वाले 4 युद्धपोतों को विकसित करने के ठेका प्रक्रिया में निर्माण कंपनी लार्सन एंड टुब्रो के साथ इस कंपनी को भी शौर्टलिस्ट किया जा सका.

विक्रेताओं के मुताबिक जनवरी 2018 से शिपयार्ड में बहुत कम काम हुआ है. “हमेशा वे लोग बाहर से नए ठेकेदार ले आते हैं और प्रोजेक्ट पूरा हो जाने के बाद कंपनी नए ठेकेदार ले आएगी”, शब्बीर ने कहा. “राजुला का कोई स्थानीय ठेकेदार अब उनके साथ काम नहीं करता.” 12 मार्च को लगभग 100 स्थानीय ठेकेदारों और व्यापारियों, जिनमें से कई अभी भी कंपनी के साथ लेनेदेन कर रहे थे, राजुला में आरनेवल के प्रशासनिक भवन के सामने विरोध प्रदर्शन पर बैठे गए. विरोध में भाग लेने वाले सवज बताते हैं कि कंपनी के गार्ड अक्सर उनके तंबू को उखाड़ देते हैं जिससे गर्मियों के दिनों में उन्हें चिलचिलाती धूप में बैठना पड़ता था. उन्होंने कहा कि कंपनी के किसी भी प्रतिनिधि ने उनसे बात नहीं की और कंपनी या स्थानीय प्रशासन (कलेक्टर भी, जिनसे उन्होंने ने पहले अपील की थी) से किसी भी प्रकार के आश्वासन के बिना यह हड़ताल 25 जून तक जारी रही. ठेकेदारों का कहना है कि हड़ताल के दौरान पुलिस ने उनमें से कइयों को गैरकानूनी रूप से जमावड़े के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. बाद में इन लोगों को जमानत पर रिहा कर दिया गया. लखानी कहते है, “उल्टा हो गया, जिसने पैसा लिया उसको कुछ नहीं हुआ, जिसका पैसा गया उसको जेल में डाल दिया”.

विक्रेताओं ने मुझे बताया, गिरफ्तारी के बाद उन्हें एहसास हुआ कि रिलायंस उनके विरोध पर ध्यान नहीं देगा इसलिए लोगों ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं से संपर्क करना शुरू किया. उन लोगों ने जिन नेताओं से संपर्क किया उनमें से एक थे डेर जिन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने विक्रेताओं और बकाया राशी की सूची तैयार कर ली. “मैं सूची तैयार करने में सफल तो हो गया लेकिन जिला प्रशासन से कार्रवाई करने को कहना मुश्किल है क्योंकि सरकार हमारी नहीं है.”

इस साल कंपनी की हालत खराब होती जा रही है. मार्च 2018 के वित्तीय वक्तव्य में आरनेवल के एक स्वतंत्र लेखा परीक्षक ने कंपनी की “चालू चिंता” पर अनिश्चितता व्यक्त की – यह लेखा शब्द है जिसमें अनुमान होता है कि निकट भविष्य में कंपनी कार्य संचालन जारी रखेगी. लेखा परीक्षकों का कहना है, “होल्डिंग कंपनी (आरनेवल) नकद घाटे का सामना कर रही है, 31 मार्च 2018 तक कंपनी के बाजार भाव में बेहद गिरावट हो चुकी थी, सुरक्षित कर्जदारों ने अपना कर्ज वापस मांगा लिया है, कंपनी की वर्तमान दायित्व उसकी वर्तमान सम्पत्ति से अधिक है और कर्ज वसूली के लिए कंपनी को विघटित करने की याचिका गुजरात हाई कोर्ट में दायर है.”

अगस्त 2018 में, तेल और प्राकृतिक गैस कंपनी ने 12 में से 5 तटीय सहयोग पोतों के लिए अपना और्डर रद्द कर दिया. ओएनजीसी ने यह करार रिलायंस द्वारा पीपावाव के अधिग्रहण से पहले किया था. उस महीने, कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजेश ढिंगरा ने निदेशक मंडल से इस्तीफा दे दिया. दो हफ्ते बाद अनिल अंबानी ने आरनेवल के निदेशक का पद त्याग दिया. एक महीने बाद, 6 सितंबर को, आईडीबीआई बैंक ने कंपनी से अपना ऋण वसूलने के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण में गुहार लगाई. यह मामला एनसीएलटी की अहमदाबाद खंडपीठ में अभी चल रहा है.

लेकिन इस खस्ता हालत के बावजूद, आरनेवल अपने व्यवसाय का विस्तार कर रहा है. सितंबर 2016 में आरनेवल- जो तब रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड के नाम से जाना जाता था- भारतीय तट रक्षक बल के लिए 14 तीव्र निगरानी पोत या एफपीवी बनाने के अनुबंध के लिए सबसे कम बोली लगाने वाला बन गया. अगली जनवरी को कंपनी ने एफपीवी के निर्माण के लिए रक्षा मंत्रालय के साथ 916 करोड़ रुपए से अधिक के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए. 24 अक्टूबर 2018 को आरनेवल ने एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि उसने भारतीय तट रक्षक बल के लिए एक प्रशिक्षक जहाज बना लिया है. गांधी भाइयों के स्वामित्व के वक्त 2014 में शिपयार्ड को यह अनुबंध मिला था. लेकिन लखानी, जिन्होंने परियोजना पर काम किया है, का कहना है कि प्रशिक्षक जहाज नहीं बना है. लखानी ने कहा, “खाली बाहरी खोका तैयार हुआ है.” “पुरा शिप का हार्ट होता है, वो बाकी रहा होगा अभी. अभी समय लगेगा, दो साल चला जायेगा.”

मैंने विक्रेताओं का बकाया और शिपयार्ड में काम की वर्तमान स्थिति के संबंध में रिलायंस समूह में कॉर्पोरेट संचार विभाग के प्रमुख दलजीत सिंह को अपने सवाल ईमेल किए थे. लेकिन इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक मेरे सवालों का जवाब नहीं आया.

किचन के साथ-साथ और कई काम आसान करती है एल्युमिनियम फौयल

आमतौर पर आपके किचन में एल्युमिनियम फौयल का रोल मौजूद होता है. इसका इस्तेमाल खाना को गरम रखने के लिए करते हैं. और कई मौकों पर ओवन में खाने को बेक करने के लिए इसे काम में लाया जाता है.

घर के कई ऐसे छोटे बड़े काम हैं जिसके लिए आप एल्युमिनियम फौयल का इस्तमाल कर सकती हैं.तो देर किस बात की, आइए आपको बताते हैं इसके बारे में.

एक बर्तन से किसी बोतल में आप कोई चीज़ या कोई लिक्विड डालना चाहते हैं तो इसके लिए आप एलुमिनियम फौयल की मदद से कीप या ट्यूब बना सकते हैं. आपका सामान गिरेगा भी नहीं. यदि आपको बोतल में कोई तरल चीज़ डालनी है तो आप फौयल को ट्यूब बनाकर उसका इस्तेमाल कर सकती हैं.

अगर आपको कपड़े आयरन करने हैं  तो उसके नीचे पहले फौयल बिछा लें. जब आप आयरन करेंगे तो नीचे रखा फौयल ज़्यादा गरम हो जायेगा और एक बार में दोनों तरफ से कपड़े की सिलवटें हट जाएंगी.

घर में इस्तेमाल होने वाली कैंची की वक़्त के साथ धार कम हो जाती है और कई बार रखे रहने से उसमें जंग भी लग जाता है. अगर आप घर पर ही अपनी कैंची की धार तेज़ करना चाहते हैं तो उससे एलुमिनियम फौयल को आठ से दस बार काटें.

ये बैटरी की ज़िंदगी बढ़ता है. अगर घर में टीवी के रिमोट या किसी दूसरे चीज़ की बैटरी खत्म हो गयी है और उस वक़्त आपके पास इस्तेमाल करने के लिए नई बैटरी नहीं है तो एलुमिनियम फौयल को बैटरी के दोनों सिरों पर लगाकर दोबारा प्रयोग करें.

एलुमिनियम फौयल की मदद से आप अपने आयरन की प्लेट को भी चमका सकते हैं. इसके लिए बस आप फौयल को लपेट कर बाल का आकर दे दें और फिर उससे आयरन की प्लेट रगड़ें.

एलुमिनियम फौयल कुकिंग करने वालों के लिए बहुत अच्छा साथी है. ये आपके खाने को जलने से बचाता है. अगर आप चाहते हैं कि खाना बर्तन में ना चिपके तो पैन पर फौयल की एक परत बिछा दें. ऐसा करके आप बिना तेल के भी खाना बना सकती हैं.

उइगुर मुस्लिम समुदाय पर शिकंजा, चीन की शांति को बंटाधार करने की कोशिश

धर्मों की घुसपैठ ने दुनिया का बंटाधार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. छोटेछोटे धार्मिक समूह दुनिया में जहां कहीं भी बसे हैं, वे अपनी कट्टर फितरत से दूसरे लोगों के लिए परेशानी का सबब बनते रहे हैं. धर्मों द्वारा अपनी कट्टर गतिविधियों से नफरत, हिंसा फैलाई जा रही हैं. दूसरे समुदायों के लोगों के साथ उन का मतभेद बढ़ते बढ़ते बात कानून व्यवस्था तक जा पहुंचती है और धर्म किसी भी देश की शांति व्यवस्था के लिए खतरा बनने लगते हैं.

चीन में पिछले दिनों से उइगुर मुसलमानों की कट्टर हरकतों से ऐसा ही हो रहा है. यह समुदाय अपनी कट्टर धार्मिक गतिविधियों से चीन की आंखों की किरकिरी बनने लगा है.

चीन ने पश्चिमी शिनचियांग प्रांत में बड़ी तादाद में उइगुर मुस्लिमों और अन्य जातीय अल्पसंख्यक समुदायों को गिरफ्तार कर रखा है. इन पर आरोप है कि ये लोग कट्टरपंथ, आतंकवाद और अलगाववाद में लिप्त हैं.

शिनचियांग प्रांत के हामी शहर में उन उइगुर मुस्लिमों को 30 दिन के अंदर समर्पण करने की चेतावनी दी है जो कट्टरपंथ, आतंकवाद और अलगाववाद फैला रहे हैं. इन में वे कट्टरपंथी भी शामिल हैं जो विदेशी आतंकी समूहों के संपर्क में हैं या रूढिवादी तरीके से काम करते हैं और खुद को खलीफा यानी खुद की सत्ता चलाना चाहते हैं.

शिनचियांग में एक लाख से अधिक लोगों को हिरासत शिविरों में रखा गया है. इन शिविरों को ‘पुन: शिक्षा शिविर’ कहा जाता है. इन का उद्देश्य बंदियों को उन की पहचान और उन की धार्मिक मान्यताओं से संबंधित सोच में बदलाव लाना है.

हालांकि चीन ने कहा है कि वह देश के जातीय अल्पसंख्यक समुदायों के धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन अभी जो काररवाई की जा रही है वह सुरक्षा के मकसद से अतिवादी और कट्टरपंथी समूहों के खिलाफ की जा रही है.

दरअसल उइगुर मुस्लिम तुर्की जनजाति है जो चीन की बजाय पूर्वी और मध्य एशिया में बसने वाले तुर्क और कजाख के ज्यादा करीब है. ये लोग लाखों की तादाद में चीनी नियंत्रण वाले शिनचियांग में रहते हैं. यहां रहने वाले उइगुर सुन्नी बहुमत में हैं और उन में सूफी और गैर सूफी धार्मिक आदेशों को ले कर संघर्ष चलता रहता है.

चीन सरकार द्वारा इस कट्टर समुदाय पर शिकंजा कसने पर विदेशी सरकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध किया जा रहा है पर चीन का यह कदम सही है. किसी भी धर्म को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपनी हरकतों से औरों के लिए खतरा पैदा करें. धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा फैलाए.

चीन सरकार ने यह ठीक ही किया है कि इस समुदाय के कट्टरपंथियों को धर्म की हद में रहने की चेतावनी दी और ऐसा न करने पर कानूनी सजा की देने के लिए विवश हुई है.

दुनिया में जहां भी धर्मों को आजादी मिली, वहां वैर, वैमनस्य, खूनखराबा बढता गया. विश्व के ज्यादातर देशों में आज एक धर्म दूसरे का सिर फोड़ने पर आमादा दिखाई दे रहा है. एक धर्म में भी एका नहीं है. एक ही धर्म के दो पंथों में सिरफुटव्वल जारी है.

धर्मों में हिंसा का भरा पड़ा है. शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टैंट, बौद्धों में हीनयान-महायान, हिंदुओं में शैव-वैष्णव के बीच झगड़े चलते आए हैं.

धर्मों से दुनिया तबाह हो रही है. बिना धर्म के रह रहा चीन अपने यहां ऐसे धर्म के नागों को कुचलने की कोशिश कर रहा है तो उस की तारीफ करनी चाहिए. वह दुनिया की परवाह न करे. पिछले दशकों से चीन जो तरक्की कर रहा है उस का बड़ा श्रेय यहां धर्म को न पनपने देने की उस की नीति को दिया जाना चाहिए.

चीन ने शिनचियांग प्रांत में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगा रखा है. यहां धार्मिक स्कूलों पर बैन है और वे अवैध हैं.

कम्युनिस्ट चीन आज विश्व के देशों में तरक्की में आगे इसीलिए है क्योंकि वहां गलीगली में मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, तीर्थस्थल नहीं हैं. सुखशांति, समृद्धि, स्वर्गनरक, मोक्षमुक्ति को ज्ञान झाड़ने वाले निठल्ले धर्मगुरुओं, प्रवचकों, साधुसंन्यासियों, पंडेपुरोहितों, पादरियों, मुल्लामौलवियों की फौज और उन के पिछलग्गुओं की भीड़ नहीं है.

वहां समुद्र में तेल की पाइपलाइनें बिछाने, पहाड़ों पर खंभे, पुल बनाने वाले क्रिएटिव ब्रेन पैदा हो रहे हैं जो चीन की आर्थिक, सामाजिक समृद्धि बढाने में जुटे दिखाई दे रहे हैं.

दुनिया में सब से अधिक आबादी होने को इस देश ने अभिशाप नहीं, वरदान के तौर पर लेना शुरू कर दिया है. यह आबादी दिनरात बैठ कर भजनकीर्तन, हवनयज्ञ, जागरण नहीं करती. देश की उत्पादकता में बड़ा योगदान दे रही है.

आपको कर्मचारी चाहिए या रोबोट : सोशल साइट्स से खत्म होते सामाजिक रिश्ते

एक ही औफिस में आमने सामने बैठे कई कर्मचारी व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक, इन्स्टा और स्नैपचैट पर टेक्स्टिंग के जरिये बातचीत कर रहे हैं. कुछ गुड मोर्निंग विद कौफ़ी वाले रेगुलर मैसेज कर रहे हैं तो कुछ जोक्स शेयर करने में मसरूफ हैं. कुछ ऐसे भी हैं, जो वर्क असाइंमेंट या प्रोजेक्ट की डेडलाइन डिस्कस कर रहे हैं..

यह नजारा न्यूयार्क बेस्ड फर्म सीएफए इंस्टीट्यूट के दफ्तर का है. और इस व्यवहार को कई दिनों से फर्म के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ मार्केटिंग हेड माइकल जे कोलिन्स नोटिस कर रहे थे. अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें नोटिस करने वाली क्या बात है, ऐसा दृश्य तो हर औफिस में आम है. लेकिन माइकल जे कोलिन्स को ऐसा नहीं लगा. उन्हें लगा कि एक ही डेस्क या छत के नीचे बैठे दो इंसान सिर्फ टेक्निकल फैसिलिटी की वजह से एक दूसरे से न तो बात कर रहे हैं और न ही हाथ या गले मिल रहे हैं. सारी औपचारिकता टेक्स्टिंग के जरिये हो रही है.

एक तरह से ह्यूमन इंटरेक्शन (मानवीय संवाद) खत्म सा हो गया है. ये लोग इंसान या कर्मचारी कम रोबोट ज्यादा लग रहे हैं. बात-बात पर ग्रुप में आ जाओ, मेल कर दो, चेक माय इन्स्टा, ड्राइव पर डालो जैसे टर्म इस्तेमाल करते ये लोग किसी मशीन या कहें रोबोट की तरह बिहैव कर रहे थे. न कोई फिजिकल स्पर्श और न कोई आत्मीय बातचीत. बस मोबाइल या मैक पर झुकी गर्दनें और स्क्रीन पर ताबड़तोड़ चलती उंगलियाँ.

कर्मचारी चाहिए या रोबोट?

पिछले कई दशकों में कार्यस्थलों में टेक्नोलोजी ने अभूतपूर्व दखल दिया है. इसकी बदौलत आसानी से एक शहर में बैठा एमडी दूसरे शहर या देश के ब्रांच हेड से वीडिओ कौन्फ्रेसिंग कर दफ्तर के कामों को अंजाम दे रहा है. ग्लोबल दौर में तकनीक से सबको स्क्रीन से जोड़ दिया है. कौर्पोरेट वातावरण में समय और धन बच रहा है लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं. और सबसे बड़ा नुकसान है लोगों के बीच आपसी संवाद का कम या खत्म होना. माइकल ने अपनी कम्पनी में लाखों खर्च कर एक खुला कार्यक्षेत्र बनवाया है जहां बड़े बड़े मीटिंग रूम्स है क्लासिक फर्नीचर के साथ और रूफटोप कैंटीन है, फिर भी उनके संगठन के हजारों कर्मचारी वार्तालाप, विचार के आदान-प्रदान जीवंत रूप से सामने करने के बजाये टेक्स्टिंग के जरिये कर रहे हैं.

ऐसे सिखाया सबक

जाहिर है माइकल को यह हालात तंग कर रहे थे लेकिन वह एकदम से सबके फोन तो बंद नहीं करवा सकते थे, सो उन्होंने एक नया तरीका निकाला सबको सबक सिखाने के लिए. अगले दिन वे दफ्तर में आये और मोबाइल पर एक ग्रुप बनाकर सारे कर्मचारियों को उसमें जोड़ लिया. फिर लगातार टाइप करते गए. जिसमें औफिस का हर काम, प्रेजेंटेशन, प्रोजेक्ट ग्रुप में ही दिखाने को कहा. कोई उनसे मिलने कैबिन आता तो वे इंकार कर देते और उसे ग्रुप में ही बात करने का सन्देश टेक्स्ट कर देते.

थोड़ी ही देर में उनके स्मार्ट कर्मचारी माइकल का आशय समझ गए और आगे से आमने सामने बैठे कुलीग्स से साक्षात बात करने और टेक्स्टिंग को कम करने का वादा करने लगे. उन्हें अब अहसास हुआ कि औफिस में टेक्नोलॉजी के वश में आकर वे इंसान न होकर कोई मशीन या रोबोट बन गए हैं.

डिजिटल अंधभक्ति से टूटा ह्यूमन इंटरेक्शन

माइकल की तरह भारत में कम्पनी के कई बौसेस इस बात से परेशान रहते हैं कि उन्होंने इतना खर्च औफिस इन्फ्रास्ट्रक्चर कर मीटिंग रूम बनवाया, टीम साथ में खाना खाए इसके लिए डायनिंग रूम बनवाया, ट्रेनिंग और प्रेक्टिस सेशन के लिए प्रेक्टिस रूम और स्ट्रेस आउट करने के लिए स्पोर्ट्स रूम बनवाए, बावजूद इसके ज्यादातर एम्पलाइज आपस में बात ही नहीं करते. खाते या काम करते समय भी मोबाइल पर लगे रहते हैं. आमने सामने होने के बावजूद भी टेक्स्टिंग को तवज्जोह देते हैं.

किसी भी कम्पनी में बेशक तकनीकी आंतरिक संचार सिस्टम मजबूत होता है. लेकिन यह तकनीक इन्सानों के लिए होती है न कि इंसान तकनीक के लिए. इसका इतना ही इस्तेमाल हो जितना जरूरी हो. बातचीत और फिजिकल कन्वर्सेशन ही बंद हो जाएगा तो रचनात्मकता ख़त्म हो जायेगी और फिर रचनात्मक की कमी से कम्पनी की उत्पादकता प्रभावित होगी.

अजनबी पास, अपने दूर

यह हाल सिर्फ दफ्तरों का नहीं बल्कि घरों का भी है. औफिस की यह तकनीकी गुलामी घर पर भी जारी रहती है. फेसबुक, इन्स्टा, व्हाट्सएप, स्नैपचैट, ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्कींग साइट्स से अजनबी तो जुड़ रहे हैं लेकिन अपने पराये हो रहे हैं. रिश्तों मे दरार पड़ने लगी है.

इंटरनेट पर्सनलाइज्ड होने से हर हाथ में फोन है लेकिन कोई हाथ नहीं मिलाता. सब इमोजीज में हैंडशेक करते हैं. एक सर्वे के मुताबिक दुनिया भर में एक तिहाई रिश्ते सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से टूट रहे हैं. तमिलनाडु में पत्नी सिर्फ इसलिए डिवोर्स मांग रही है क्योंकि पति ने शादी के बाद अपने फेसबुक में मैरिटल स्टेटस चेंज नहीं किया. जबकि पुणे एक महिला ने तलाक के लिए इसलिए अर्जी दी, क्योंकि उसका पति फेसबुक पर महिला मित्रों को फ्रेंड रिवेस्ट भेज रहा था.

कुल मिलाकर तकनीकी घोड़े पर सवार होकर उड़ने से अच्छा है कि अपने पैर धरातल पर रखें. जिस कम्पनी में काम करते हैं उनसे आमना-सामना करें. अपनी बातें शेयर करें. तकनीक का इस्तेमाल वही करें जहां फिजिकल कौन्टेक्ट संभव न हो. वर्ना एक दिन आप इंसान नहीं बल्कि रोबोट सरीखे हो जायेंगे, इसमें कोई शक नहीं है.

जोगी के मोर्चे से बीजेपी और कांग्रेस को बराबर नुकसान

साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से ही, प्रदेश में हुए सभी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच का मुकाबला कभी एकतरफा नहीं रहा. लेकिन 2018 के इस विधानसभा चुनाव में (18 सीटों में पहले चरण का चुनाव 12 नवंबर को सम्पन्न हो चुका है. बाकी की 72 सीटों में आज मतदान हो रहा है.) एक तीसरा मोर्चा भी चुनावी मैदान में है.

स्वयं को अनुसूचित जनजाति कंवर का बताने वाले अजीत जोगी साल 2000 और 2003 के बीच प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे. दो साल पूर्व जोगी ने कांग्रेस को अलविदा कहा और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) नाम से नई पार्टी बना ली. इस साल अक्टूबर में जेसीसी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन बना लिया जिसमें बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) भी शामिल हो गई. यह गठबंधन प्रदेश की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. 55 सीटों पर जेसीसी और 35 पर बसपा ने उम्मीदवार उतारे हैं और जेसीसी ने अपने हिस्से से 2 सीटें सीपीआई को देने का वादा किया है.

उम्मीद की जा रही है कि यह गठबंधन बीजेपी और कांग्रेस के वोटों को प्रभाव करेगा. प्रदेश में पिछले 15 सालों से मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार है लेकिन इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर 2 प्रतिशत से अधिक कभी नहीं रहा. 2013 के विधानसभा चुनाव में वोटों का यह अंतर घट कर 0.75 प्रतिशत पर आ गया था. इसके अलावा एक और बात है कि प्रत्येक सीट में उम्मीदवारों के बीच जीत का अंतर अच्छा खासा रहा है. यानी जीतने वाले उम्मीदवार ने प्रतिद्वंद्वी को बड़े अंतर से हराया है. साथ ही सिटिंग विधायक अक्सर हार गए. पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी के 26 विधायक चुनाव हार गए थे. पार्टियों के बीच वोटों का अंतर कम रहने के बावजूद सत्ता विरोधी लहर से पार पाना छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दलों के लिए मुख्य चुनौती है.

जून 2018 में छत्तीसगढ़ की हिंदी वेबसाइट सीजीवॉल डॉट कॉम और गैर सरकारी संगठन फोर्थ डायमेंशन डिजिटल स्टूडियो ने ‘छत्तीसगढ़ का मूड’ नाम से चुनाव सर्वेक्षण कराया था. यह सर्वेक्षण मेरे नेतृत्व में हुआ था. बीजेपी के वर्तमान कार्यकाल में उसकी नीतिगत विफलता के कारण इन चुनावों को कांग्रेस के पक्ष में जाता देखा जा रहा है. प्रदेश के कई निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी मजबूत है और सत्ता विरोधी लहर का उसे लाभ मिलता दिख रहा है. अक्टूबर के मध्य में जब जेसीसी-बसपा-सीपीआई गठबंध की घोषणा हुई तो राजनीतिक विशलेषकों ने अपने पुर्वानुमानों में संशोधन करते हुए कयास लगाया कि यह गठबंधन कांग्रेस के वोटों पर सेंधमारी करेगा. लेकिन राज्य में समुदायों की स्थिति और सीटों के बंटवारे के अध्ययन से लगता है कि यह गठबंधन बीजेपी के लिए भी उतना ही बढ़ा खतरा है जितना कांग्रेस के लिए है.

केन्द्र में बीजेपी की सरकार के प्रदर्शन के कारण प्रदेश में बीजेपी कमजोर पड़ी है और उपरोक्त गठबंधन प्रदेश में उसके गणित को बिगाड़ कर सकता है. 2003 और 2013 के बीच जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, उस वक्त राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्राम रोजगार गारंटी कानून जैसी योजनाओं को सफलता के साथ लागू कर अच्छा प्रर्दशन किया था. 2014 में केन्द्र में बीजेपी की सरकार के बनने के बाद इन योजनाओं के आवंटन को कम कर दिया गया. उसके बाद माल एवं सेवा कर (जीएसटी) और नोटबंदी के कारण भाजपा का कोर वोट बैंक (मध्यमवर्ग व व्यापारी) पार्टी से नाराज हो गया.

बीजेपी ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को भी निराश करने की गलती की, जो राज्य की आबादी का क्रमशः 12 और 32 प्रतिशत हैं. अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार रोकथाम कानून को कमजोर बनाने का बीजेपी का प्रयास और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बढ़ते अत्याचार के प्रति उसकी उदासीनता के कारण दलित और आदिवासियों के बीच उसका समर्थन कम हुआ है.

दूसरी ओर जेसीसी को जोगी के नेतृत्व का लाभ मिलेगा. वे अनुसूचित जाति समुदायों में काफी लोकप्रिय हैं, खासकर प्रभावशाली सतनामी तथा सूर्यवंशी और गांडा जैसे अन्य समुदायों के बीच. ऐसा माना जाता है कि उनके दादा दलित थे और ईसाई धर्म अपना लिया था. जोगी जब तक कांग्रेस में रहे वे इन समुदायों का अच्छा खासा वोट पार्टी को दिलाते रहे. लेकिन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने मुख्यमंत्री के रूप में उनकी संभावनाओं को कम करके आंका. 2016 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए जोगी के बेटे अमित को कांग्रेस पार्टी ने बाहर कर दिया. परिणामस्वरूप पिता और पुत्र ने पार्टी छोड़ दी और जेसीसी का गठन कर लिया. जेसीसी को अच्छी तरह पता है कि नई पार्टी होने के कारण अकेले चुनाव लड़ने से वह कोई प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं रहेगी. इसलिए दलित और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों का समर्थन हासिल करने के लिए जेसीसी ने बसपा और सीपीआई के साथ गठबंधन बनाया है.

इन समुदायों का वोट, जो कांग्रेस को जाता दिख रहा था, अब कांग्रेस और गठबंधन के बीच बंटता दिख रहा है. इस बात को समझते हुए कांग्रेस पार्टी अन्य पिछड़े वर्गों, ओबीसी, में घुसपैठ करने का प्रयास कर रही है जो पारंपरिक रूप से बीजेपी का साथ देते रहे हैं. प्रदेश की जनसंख्या का कुल 45 प्रतिशत ओबीसी है. ओबीसी समुदाय में साहू प्रभुत्वशाली हैं और उसके बाद कुर्मी और यादव आते हैं. पिछले पांच वर्षों के दौरान पार्टी ने किसानों के मुद्दों पर लगातार आंदोलन किए. इस साल कांग्रेस के चुनावी अभियान की कमान कुर्मी समुदाय से आने वाले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और साहू समुदाय के ताम्रध्वज के हाथों में है. राज्य के लोक निर्माण विभाग मंत्री राजेश मूणत से जुड़ी कथित विवादास्पद वीडियो के संबंध में बघेल पर चार्जशीट दायर की गई है. इसके कारण उनकी छवि शहरी इलाकों में कमजोर पड़ी है लेकिन ग्रामीण मतदाओं में इसका कुछ असर नहीं हुआ है.

लगभग 10 सीटों में कांग्रेस ने गठबंधन के मुकाबले कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. उदाहरण के लिए लोरमी सीट के लिए गठबंधन ने धर्मजीत सिंह को टिकट दिया है. धर्मजीत सिंह तीन बार कांग्रेस विधायक रह चुके हैं और एक बार विधान सभा के उपाध्यक्ष भी रहे हैं. धर्मजीत के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने मुंगेली जिले की पंचायत के उपाध्यक्ष शत्रुहन “सोनू” चंद्राकर को यहां से मैदान में उतारा है जो धर्मजीत सिंह के मुकाबले कम अनुभवी हैं. खैरागढ़ में कांग्रेस के विधायक को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है और उनके खिलाफ आदिवासी समुदाय के जमींदार मैदान में हैं.

राज्य के दलित मतदाताओं के लिए गठबंधन एक विकल्प के रूप में उभरा है. 8 के आसपास सीटों में गठबंधन ने अपनी रणनीति के तहत ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जो उन समुदायों से हैं जो आमतौर पर बीजेपी को वोट देते हैं.

बिल्हा में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष धरम लाल कौशिक का मुकाबिला गठबंधन के उम्मीदवार सियाराम कौशिक से है. सक्ती और बैकुंठपुर में दोनों ने ओबीसी उम्मीदवर- साहू और राजबाड़े को टिकट दिया है. पाटन निर्वाचन क्षेत्र से दोनों ने साहू उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. इस सीट पर कांग्रेस के भूपेश बघेल मैदान में हैं. बघेल कुर्मी हैं लेकिन दमदार हैं.

धरसिवा से बीजेपी के देवजी पटेल मैदान में हैं, जो खुद को कुर्मी बताते हैं. उनका मुकाबला जेसीसी-बसपा-सीपीआई के पन्ना लाल साहू से है. टिकट वितरण के दौरान साहू समुदाय ने इस सीट पर अपने समुदाय के उम्मीदवार को टिकट देने की मांग बीजेपी से की थी. लेकिन बीजेपी ने सिटिंग विधायक संतोष उपाध्याय को ही टिकट दे दिया. जेसीसी-बसपा-सीपीआई गठबंधन ने रणनीतिक हिसाब से इस सीट पर रोहित साहू को टिकट दिया है.

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट लैलुंगा पर गठबंधन और बीजेपी ने प्रभावशाली राठिया समुदाय के उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इस सीट पर कांग्रेस ने सिदार को टिकट दिया है जो राठिया के नीचे माने जाते हैं.

इन सीटों पर बीजेपी का वोट कट सकता है लेकिन गठबंधन की जीत होना स्वाभाविक बात नहीं होगी. छत्तीसगढ़ में मात्र दलित वोटर चुनाव परिणाम तय नहीं कर सकता. छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों के लगभग 10 निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या 15 से 30 प्रतिशत है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में ओबीसी और सामान्य श्रेणी के मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होगी. यहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है.

हालांकि कांग्रेस नेताओं ने जोगी पर बीजेपी के साथ मिलकर पार्टी के वोट काटने का आरोप लगाया है लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस के वोटों में इस बार इजाफा होगा. दलित वोटर बीजेपी से नाराज है लेकिन गठबंधन की संभावना को लेकर आश्वस्त नहीं दिखाई दे रहा. 7 नवंबर को, पहले चरण के मतदान से पांच दिन पहले सनातनी नेता गुरु बल दास अपने परिवार और समर्थकों के साथ कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए. गठबंधन की जगह उनका कांग्रेस पार्टी का चयन करना राज्य में समुदाय के भीतर चल रहे मंथन को दर्शाने के साथ चुनाव परिणाम पर पड़ने वाले असर को भी दिखाता है.

जब शूटिंग के दौरान मुझ से कहा गया, ‘मैडम, जरा अपनी पैंट…’

हाल ही में देश में शुरू हुए मीटू मूवमेंट पर कई स्टार्स ने तनुश्री दत्ता का सपोर्ट किया था. उसमें एक नाम ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘मसान’ जैसी फिल्मों से बौलीवुड में पहचान बनाने वाली बौलीवुड एक्ट्रेस ऋचा चड्ढा का भी हैं.

एक मीडिया हाउस के कार्यक्रम में पहुंची ऋचा चड्ढा ने मीटू मूवमेंट और महिलाओं के साथ होने वाले यौन शोषण पर बात करते हुए अपने साथ घटी एक घटना का जिक्र किया है.

ऋचा चड्ढा ने बताया, ‘मैं एक फिल्म के गाने की शूटिंग कर रही थी और इस दौरान मैंने हाई वेस्ट पैंट पहनी हुई थी.’ शूटिंग के दौरान मुझसे कहा गया कि आपकी नाभि नहीं दिख रही है. क्या आप अपना पैंट थोड़ा नीचे कर सकती हैं. इस बात को सुनकर मैं एकदम से चौंक गई.

मैंने जवाब में कहा कि यह हाई वेस्ट पैंट है और इसमें नाभि नहीं दिखेगी. मैंने एक मार्कर लिया और कहा कि ‘मैं एक काम करती हूं, मार्कर से अपने माथे या गालों पर एक नाभि बना लेती हूं.’

वर्क फ्रंट की बात करें तो ऋचा चड्ढा फिलहाल शकीला की बायोपिक की शूटिंग में व्यस्त हैं. शकीला ने 20 साल की उम्र में सौफ्ट पोर्न फिल्म ‘प्लेगर्ल’ से अपने करियर की शुरुआत की थी. आज भी शकीला साउथ फिल्मों में एक्टिव हैं.

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