कुछ महिलाएं ऐसी होती हैं जो एक पल भी खाली नहीं बैठ सकतीं. अगर उन के पास काम नहीं तो उन्हें बेचैनी होने लगती है. आमतौर पर लोगों को यह सामान्य लगता है पर संभव है कि वे किसी अवसाद से ग्रस्त हों. कहीं आप की नजर में तो नहीं कोई ऐसी महिला?

रितिका का जीवन 17 वर्षों से घड़ी की सूइयों से बंधा हुआ है. सुबह 5.30 बजे से रात 11.30 बजे तक वह मशीन की तरह लगी रहती है. दफ्तर के काम के साथसाथ घर की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभाती है. रोज डायरी पर दिन के काम लिखना और फिर रात में यह चैक करना कि कितने काम वह पूरे कर पाई है और कितने नहीं. सोने से पहले फिर से वह एक लंबी काम की लिस्ट बना कर सो जाती है.

परंतु उस के परिवार में किसी को यह नहीं पता कि रितिका एक अलग ढंग के मानसिक अवसाद से घिरी हुई है. वह लगातर इस एंग्जायटी में रहती है कि वह खाली नहीं बैठ सकती है, जबकि यह गलत है. उसे हर समय काम में डूबे रहने की आदत सी पड़ गई है.

छुट्टी वाले दिन वह किचन की सफाई, बाथरूम की सफाई या कपड़ों की अलमारी संवारने में व्यस्त रहती है. बाकी समय वह बच्चों की पसंद के खाने बनाने में लगा देती है. एक अजीब सा तनाव रितिका के अंदर रातदिन पनपता रहता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया है.

42 वर्ष की उम्र होतेहोते रितिका ब्लडप्रैशर, डायबिटीज और आर्थ्रराइटिस की बीमारियों की शिकार हो गई है.

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