Gajab Raat Film: निर्देशक रितेश शाह और लेखक व निर्माता नीरज पांडे की फिल्म ‘गजब रात’ पुलिस के भ्रष्ट पहलू को परदे पर लाने की कोशिश करती है. रिलीज से पहले विवादों में घिरी यह फिल्म सिर्फ नाम बदलने के झमेले से ही नहीं गुजरी, बल्कि अपनी कमजोर स्टोरीलाइन के कारण भी एक अच्छी थ्रिलर बनने का मौका गंवा बैठी है.
फिल्म का नाम पहले ‘घूसखोर पंडित’ रखा गया था. ब्राह्मण समाज और सोशल मीडिया पर हुए भारी विरोध के बाद मेकर्स ने दबाव में आ कर इस का नाम बदल कर ‘गजब रात’ कर दिया. हालांकि, अगर नाम को साइड में रख दें, तो पूरी फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिस से हैरानी हो. यह महज एक भ्रष्ट पुलिस अफसर की रातोंरात अंतरात्मा जागने की घिसीपिटी कहानी है, जो अपनी ही पहचान व इरादों के बीच झूलती रहती है.
कहानी शुरू होती है दिल्ली पुलिस की एक होटल में रेड से, जिसे सबइंस्पैक्टर अजय निवृत्त (मनोज वाजपेयी) लीड कर रहा होता है. अजय एक शातिर, कामचोर और रिश्वतखोर पुलिस अफसर है, जो कानून का पालन करने के बजाय उसे अपनी सहूलियत और कमाई के हिसाब से मोड़ने में उस्ताद है.
होटल में रेड मारने का मकसद जुर्म रोकना नहीं बल्कि होटल मालिक से अपनी कट की डील करना है. इसी रात एक बड़ी घटना घटती है, जब दिल्ली के कनौट प्लेस में एक चलती कार से घायल और बदहवास हालत में एक लड़की (अदिति संध्या शर्मा) सड़क पर फेंक दी जाती है.
सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो वायरल होते ही अजय को इस केस का जांच अधिकारी बना दिया जाता है. अजय लड़की को अस्पताल ले कर जाता है, जहां उस का इलाज चलता है. पता चलता है कि यह कोई छोटामोटा मामला नहीं बल्कि हाईप्रोफाइल है, जिस में बड़ेबड़े नेता भी शामिल हैं. परतें खुलती हैं तो यह नैशनल सिक्योरिटी और बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचार की कलह खुल कर भी सामने आती है. यहां से शुरू होती है लड़की को मारने वाले अफसरों और बचाने वाले अजय के बीच रस्साकसी का खेल.
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