संविधान और कानून भले ही खानपान के मामले में कोई भेदभाव न करते हों, पर सरकारी एजेंसियों पर किसी का जोर नहीं चलता, जो तरहतरह के नियम की बिना पर आएदिन हैरान कर देने वाले न केवल फरमान जारी करती हैं, बल्कि उन पर अमल करते हुए यह भी जता देती हैं कि आम लोगों को खाना बेचने और खाने की भी उतनी आजादी नहीं है, जितनी वे संवैधानिक तौर पर समझते हैं.

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