खाने में नमक ज़्यादा हो जाए तो खाने का मज़ा खराब हो जाता है और यही नमक अगर शरीर में ज़्यादा हो जाए तो सेहत का सत्यानाश कर डालता है. तेज़रफ़्तार महानगरीय जीवन में कामकाजी लोग घर से बाहर अधिक समय व्यतीत करते हैं. ऐसे में बाहर का खाना एक मजबूरी बन गया है. होटल-रेस्टोरेंट के खाने में नमक और मसाला हमेशा तेज़ ही होता है. रेहड़ी-पटरी वालों के छोले-भठूरे, चाट-पापड़ी, गोलगप्पे, चाउमीन, ब्रेडपकोड़ा जैसी चीज़ों पर भी ऊपर से नमक और मसाला छिड़क कर दिया जाता है. पहले ये चीज़ें कभी-कभी का शौक होता था, मगर अब रोज़ का मामला हो गया है. लंच टाइम में ब्रेडपकोड़ा या चाउमीन मंगवा ली, छोले भठूरे ख़ा लिए या रेस्टोरेंट से थाली आर्डर कर दी. शाम के वक़्त गोलगप्पे और चाट पापड़ी के ठेलों पर लगी भीड़ देखिए, लोग चटपटा खाने पर टूटे पड़ते हैं. भैया, मसाला ज़रा तेज़ रखना ..... भैया, नमकीन चटनी तो डालो.....  मोटी-मोटी औरतें और युवतियां गोलगप्पे वाले से नमकीन चटपटा पानी अलग से पिलाने की गुहार लगाती दिखाई देती हैं, बिना ये सोचे कि आप चटपटा पानी नहीं बल्कि ज़हर पी रही हैं.

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