मुश्किल में श्रीनिवासन

जब श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष थे तब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर महासंघ के सीओओ इयान स्मिथ ने कहा था कि आईसीसी में श्रीनिवासन के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत किसी में नहीं है. यह बात इयान स्मिथ ने हवा में नहीं कही थी, वे जानते थे कि श्रीनिवासन क्रिकेट की दुनिया में बहुत ताकतवर इंसान हैं. और श्रीनिवासन ने यह साबित भी कर दिखाया. सच आज सब के सामने है. वे मनमानी करते रहे लेकिन किसी की हिम्मत तक नहीं हुई कि उन के खिलाफ कोई क्रिकेटर या क्रिकेट के अधिकारी कुछ बोले. अब सुप्रीम कोर्ट ने श्रीनिवासन के खिलाफ तीखी टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुद्गल समिति द्वारा दागी करार दिए गए प्रशासकों को बीसीसीआई के चुनाव लड़ने से क्यों न प्रतिबंधित कर दिया जाए. श्रीनिवासन पर स्पौट फिक्ंिसग मामले में गंभीर आरोप हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से श्रीनिवासन को जोर का झटका लगा है क्योंकि वे बीसीसीआई की कुरसी पर फिर से कुंडली मार कर बैठना चाहते थे. उन का नाम अध्यक्ष पद की रेस में सब से आगे था.

पूर्व क्रिकेटर मनिंदर सिंह ने कहा कि इस से श्रीनिवासन की ताकत कम होगी और हर तानाशाह का एक न एक दिन अंत होता ही है. मनिंदर सिंह सही कहते हैं क्योंकि महेंद्र सिंह धौनी की कप्तानी में भारत लगातार मैच हारता रहा लेकिन धौनी की कप्तानी बरकरार रही. धौनी की कप्तानी पर आंच इसलिए नहीं आई क्योंकि चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक हैं श्रीनिवासन और जो चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक की टीम का कप्तान हो उसे भला कैसे हटाया जा सकता है. लेकिन अगर कोई दूसरा खिलाड़ी होता तो उसे कब का बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता.

खिलाड़ी को तो छोडि़ए, पूर्व खिलाड़ी व चयनकर्ता मोहिंदर अमरनाथ के साथ क्या हुआ. उन्होंने क्रिकेट के हित के लिए आवाज उठाई तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसी तरह आईपीएल में सट्टेबाजी के मामले में गेंदबाज श्रीसंत का नाम आया तो उन पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया. इस तानाशाही ने क्रिकेट को बरबाद कर के रख दिया है. बड़ेबड़े उद्योगपति, कारोबारी, राजनेताओं ने बीसीसीआई को बुरी तरह से अपनी गिरफ्त में जकड़ रखा है. सुप्रीम कोर्ट की दखलंदाजी से हो सकता है बीसीसीआई के असली चरित्र का पता चले और क्रिकेट में फैली गंदगी कुछ हद तक हट सके और क्रिकेट के भी अच्छे दिन लौट सकें.

आखिर मिल गया सम्मान

जब किसी खिलाड़ी को सम्मान मिलता है तो उसे गर्व होता है. भारतीय मुक्केबाज मनोज कुमार को गर्व तो हुआ लेकिन मन में एक टीस जरूर रह गई. खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया. मनोज का कहना है कि अपने साथी खिलाडि़यों के बीच राष्ट्रपति के हाथों अगर यह सम्मान प्राप्त होता तो उस की बात ही कुछ और होती लेकिन हमें तो गुपचुप कमरे में यह सम्मान दे दिया गया. सम्मानित किए जाने के बाद उन्होंने कहा कि आज मैं कपिल देव को कह सकता हूं कि मैं मनोज कुमार हूं जिस ने वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक जीता था और अब अर्जुन अवार्ड मिला है.

वर्ष 2010 में मनोज राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक विजेता रहे हैं. वे 2 बार एशियाई मुक्केबाज चैंपियनशिप में कांस्य पदक भी जीत चुके हैं. बता दें कि मनोज को अर्जुन पुरस्कार समिति ने इस पुरस्कार के लिए पहले नहीं चुना था. समिति के अध्यक्ष पूर्व क्रिकेटर कपिल देव थे. लेकिन कपिल देव ने पुरस्कार पाने वाले खिलाडि़यों की लिस्ट में मनोज कुमार को शामिल नहीं किया. समिति के फैसले के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई और दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा जा खटखटाया जहां उन के पक्ष में फैसला आया.

मनोज का मानना है कि अपने हक के लिए लड़ना जरूरी है. चयन समिति ने इस पुरस्कार के लिए उन खिलाडि़यों का चयन किया जिन का प्रदर्शन उन से बेहतर नहीं था. तब मेरा मनोबल टूट गया और इस का असर इंचियोन एशियाई खेल में पड़ा लेकिन अब मेरा सारा फोकस रियो ओलिंपिक में है. मैं वहां से मैडल जीत कर लाऊंगा. मनोज जैसे बहुत कम ही खिलाड़ी होते हैं जो अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं. ज्यादातर खिलाडि़यों को डर होता है कि उन के आका कहीं उन के कैरियर को खत्म न कर दें. इसलिए वे ज्यादातर अपने आकाओं को खुश करने में लगे रहते हैं और उन की हां में हां मिलाते हैं. दूसरे खिलाडि़यों को मनोज से सीख लेनी चाहिए ताकि खिलाडि़यों की योग्यता व अधिकारों को खेल अधिकारी रौंद न सकें.

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