भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैदराबाद की 31 वर्षीया ज्वाला गुट्टा और बेंगलुरु की 21 वर्षीया अश्विनी पोनप्पा की जोड़ी ने वर्ष 2012 लंदन ओलिंपिक के बाद एकसाथ खेलते हुए कनाडा ओपेन ग्रांड प्रिक्स टूर्नामैंट में वीमैंस डबल का खिताब जीत कर इतिहास रच दिया. इस जोड़ी ने शीर्ष वरीयता प्राप्त नीदरलैंड की ईफ्जे मस्किन और सेलेना पाइक को हरा कर यह खिताब हासिल किया. गौरतलब है कि ज्वाला हमेशा से विवादों के घेरे में रही है और इस के लिए कई बार ज्वाला की खरीखरी बातें खेल अधिकारियों को रास नहीं आईं और वे ज्वाला को अपने अधिकारों और नियमकायदों का हवाला दे परेशान करने से भी नहीं चूके. पर ज्वाला ने भी कभी हार नहीं मानी. कुछ दिन पहले ज्वाला ने फेसबुक के जरिए सरकार की उन योजनाओं पर भी सवाल उठाए जिन में कहा गया कि जिन खिलाडि़यों से वर्ष 2016 में ओलिंपिक पदक आने की उम्मीद है, उन्हें आर्थिक मदद दी जाएगी लेकिन उस लिस्ट में ज्वाला का नाम नहीं था. अपनी नाराजगी जताते हुए ज्वाला ने लिखा कि हम ने खेलने के लिए बहुत संघर्ष किया है और ऐसे में सरकार और एसोसिएशन हमें नजरअंदाज करती रही तो हम अपना हौसला कैसे बनाए रखेंगे.

इस से पहले ज्वाला ने भारतीय बैडमिंटन संघ यानी बीएआई लीग की नीलामी प्रक्रिया के दौरान खेल अधिकारियों से बेस प्राइस घटाने के सिलसिले में लोहा लिया था. उन का बेस प्राइस बिना उन से पूछे 50 हजार डौलर से घटा कर 25 हजार कर दिया गया था. इसी तरह अश्विनी पोनप्पा का भी बेस प्राइस ऐन मौके पर 50 हजार डौलर से घटा कर 25 हजार डौलर कर दिया गया था. ज्वाला उन खिलाडि़यों में से नहीं है जो पैसे ले कर चुप बैठ जाते हैं या फिर उन खिलाडि़यों जैसी भी नहीं है जो अधिकारियों की धौंस से डर जाते हैं. बहरहाल, भारतीय पिता और चीनी मां की बेटी ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की जोड़ी ने यह खिताब जीत कर यह साबित कर दिया कि चाहे राह में कितने भी रोड़े अटकाए जाएं पर खेल के मैदान में अगर हौसले और बुलंद जज्बे के साथ उतरा जाए तो किसी भी विरोधी को पटकनी दी जा सकती है.

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