सोमा ने, मजबूरी में ही सही, सूरज से विवाह कर लिया था लेकिन अपनी बेइज्जती उसे हरगिज बरदाश्त नहीं थी. इसलिए तो आज वह अकेली थी. क्या अकेलापन उस की नियति बन गया था?

सुबह के 6 बजे थे. रोज की तरह सोमा की आंखें खुल गई थीं.  अपनी बगल में अस्तव्यस्त हौल में लेटे महेंद्र को देख वह शरमा उठी थी. वह उठने के लिए कसमसाई, तो महेंद्र ने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया था.

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