उम्मी भावुक हो उठी थी. आखिर क्यों होता है ऐसा? उस की हर इच्छाअनिच्छा का ध्यान रखने वाला सहृदय प्रेमी, ब्याह के कुछेक महीनों में ही क्यों बदल गया? पहले तो कांटे की सी नुकीली चुभन भी उसे रक्तरंजित करती, तो उस पर स्नेह का लेप लगा कर, समूल नष्ट करने का प्रयास करता था नागेश और अब उस की हृदयभावना से भी अनभिज्ञ रहता है. तभी उम्मी के मन में एक कुविचार कौंधा कि यह भी तो हो सकता है कि नागेश उसे अब प्यार ही न करता हो. तभी तो प्रशंसा के दो शब्द भी नहीं निकलते कभी उस के मुंह से. प्रशंसा के दो शब्द कहने में शब्दों के कलेवर ही तो चढ़ाने होते हैं. उसे महसूस होने लगा कि नागेश का कहा हुआ हर वाक्य निरर्थक था, निराधार था. सबकुछ झूठ था, मिथ्या था मृगमरीचिका सा. न जाने कब तक विचारों के भंवरजाल में फंसी रही थी वह.

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