अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी छिन्नभिन्न होती नजर आ रही है. 1984 की भाजपा की सदस्य संख्या 2 से दोगुने यानी 4 सदस्य लोकसभा पहुंचाने के बाद भी यह पार्टी शून्य की ओर जा रही है. इस का कारण ढूंढ़ना आसान है.

अरविंद केजरीवाल की लहर उस मध्यवर्ग की देन है जो दिल्ली की तत्कालीन कांगे्रस सरकार से बेहद नाराज था और भ्रष्टाचार से भरी व निकम्मेपन की आदर्श बनी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता था. उसे 2 वर्ष पूर्व भारतीय जनता पार्टी में भी कोई आशा नजर नहीं आ रही थी. अरविंद केजरीवाल सामने आए तो उस वर्ग को एक खूंटा दिखा, जिस से बंध कर वह अपने विरोध का प्रदर्शन कर सके.

अरविंद केजरीवाल की सरलता और साफगोई राजनीति में नया अछूता प्रयोग था और हर कोई इस नए प्रयोग का हिस्सेदार बनना चाहता था. पर यह वर्ग असल में वह है जो अमीर है, मिश्रित है पर धर्मभीरु भी है और आसानी से नारों में बह जाता है. अरविंद केजरीवाल के नारे पहले तो उसे भाए पर दिसंबर में दिल्ली का चुनाव जीतने के बाद जब अरविंद केजरीवाल सरकार चलाने में व्यस्त होने लगे तो नारों का शोर मध्यम हो गया. भारतीय जनता पार्टी ने उस का लाभ उठाया. उस ने अरविंद केजरीवाल की हर छोटी भूल को तिल का ताड़ बना डाला.

अनुभवहीन अरविंद केजरीवाल इस हमले को पहले तो समझ ही नहीं पाए और उस में घिरते चले गए. जब उन्होंने सोचा लोकपाल कानून के नाम पर सरकार छोड़ कर वे शहीद हो जाएंगे तो भाजपा ने जम कर भगोड़ा कह कर उन्हें इतना बदनाम किया कि वे कदमकदम पर लड़खड़ाने लगे.

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