जब भी किसी भारतीय मूल के अमेरिकी को अमेरिका में बड़ा स्थान मिलता है, भारतीयों की छाती चौड़ी हो जाती है. हाल के सालों में कई प्रमुख स्थानों पर भारतीय नाम दिखाई देने लगे हैं, सरकार में भी और कंपनियों में भी. अमेरिकी चाहे इसे महज घटना मानते हों, हमारे लिए यह उत्सव सा हो जाता है.

हम भूल जाते हैं कि ये वे लोग हैं जो भारत को छोड़ चुके हैं. इन की प्रतिभा को देख कर इन्हें भारत से आमंत्रित नहीं किया गया. ये भारत में फटेहाल, गरीबी, अवसरों की कमी के कारण अमेरिका गए और बेगानों के बीच हर तरह की गालियां सुन कर अपनी मेहनत से जगह बनाई है. वे भारत को याद करते हैं क्योंकि उन के रिश्तेदार यहां हैं. पर भारत के लिए उन का दिल धड़कता है, यह कहना गलत होगा. अमेरिका में वे अमेरिकियों की तरह रहते हैं और उन्हीं के लिए काम करते हैं.

इसलिए पैप्सीको की मुख्य इंदिरा नुई या माइक्रोसौफ्ट के संभावित सीईओ सत्य नडेला या सुंदर पिचई पर गाल फुलाना बेकार है. अमेरिका के मुख्य सरकारी वकील प्रीत भरारा नितांत अमेरिकी हैं और वैसे ही बौबी जिंदल भी, जो हो सकता है 2016 के राष्ट्रपति पद के चुनावों में कूदें.

ये लोग भारत से लगाव नाम का सा रखते हैं, वह भी इसलिए कि उन की त्वचा का रंग भारतीय है या बहुत से अभी भी हिंदू हैं. अमेरिका को तो हर तरह की त्वचा के रंगों की आदत है. अमेरिका में पहले मध्य यूरोप के लोग गए थे, बाद में दक्षिणी यूरोप के, फिर पूर्वी यूरोप के लोग गए. हर नई खेप ने पुराने को प्रतिस्पर्धा दी और अपनी जगह बनाई. गुलामी के लिए काले आए तो कुली का काम करने के लिए चीनी व जापानी भी. बाद में सब अमेरिकी बन गए और वहां की संस्कृति में रचबस गए.

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