Romantic Story in Hindi : सागर सिर्फ उस का है, ऐसा विश्वास था वसुधा को कि सरिता की यादों को सागर के जीवन से निकाल देगी वह लेकिन सागर था कि वसुधा में ही सरिता को ढूंढ़ रहा था. जो वसुधा को नागवार गुजर रहा था.

आज रहरह कर वह हाथों की लकीरें देख रही है. देख क्या रही है बल्कि घूर रही है. अभी कुछ ही महीनों पहले की बात उसे अच्छी तरह से याद है जब सागर की लकीरों संग अपनी लकीरें मैच करती खिलखिला उठी थी.

‘‘कैसे हर बात पर इतना हंस लेती हो?’’

‘‘कनक कनक तैं सौगुनौ मादकता अधिकाय, उहिं खाऐं बौराए जग इहिं पाऐं हीं बौराए, नहीं सुना है क्या यह दोहा?’’

‘‘जो सोचा भी न हो वह आंचल में आ गिरे तो खुशी से पागल न होऊं तो क्या करूं?’’

‘‘इतना चाहती थीं तो तब क्यों न मिलीं?’’

‘‘तुम जरमनी चले गए और लंबेलंबे समय तक न चिट्ठी न फोन. पापा ने मेरी इकतरफा जिद सम झ कहीं और थमा दिया.’’

‘‘और तुम, तुम तो मु झे इष्ट मानती थीं, तुम कैसे बदल गईं?’’

‘‘कहां बदली, युग कन्यादान का था, दान से कौन पूछता है उस की मरजी क्या है?’’

‘‘स्ट्रैंज!’’

‘‘स्ट्रैंज ही था. एक स्ट्रेंजर के साथ विदा हुई. घर वाले पीछा छुड़ा कर काफी खुश थे. खैर, तुम अपने बारे में बताओ.’’

‘‘मेरी जिंदगी तो खुली किताब की मानिंद रही. जरमनी से लौटा तो तुम मिलीं नहीं. तुम्हारेमेरे प्यार की बात जानते हुए भी जिस लड़की ने विवाह के लिए हामी भरी वह मन के अंतरंग में समाती चली गई.’’

‘‘पर तुम तो मेरे थे, सिर्फ मेरे. तुम किसी और के कैसे?’’

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