Family Story in Hindi : दरवाजों के घुंघरुओं की रुनझुन से संज्ञा का मन झंकृत हो उठता था. उस का पूरा अस्तित्व मानो उन घुंघरुओं से बंध गया था, फिर भला वह कैसे दूर कर सकती उस घुंघरू वाले दरवाजे को अपनेआप से.
आज फिर जब घुंघरुओं के बजने की आवाज आई तब ‘संज्ञा’ ने झांक कर देखा. वहां तो कोई न था. हवा के झंकों से ये घुंघरू बज उठे थे. संज्ञा के लिए यह घुंघरुओं की आवाज कोई साधारण आवाज न थी. यह तो संजीवनी थी जो उस के बुझे से मन को झंकृत कर देती थी.
संज्ञा का बचपन तो हरीतिमा की गोद में ही बीता था. सागौन, शीशम, सरगी के वृक्षों की लोरी सुनसुन कर वह बड़ी हुई. गन्ने के खेत की सरसराहटों ने उसे यौवन की दहलीज पर ला खड़ा किया था.
मोरटपाल गांव की नदी की थाप से ही उसे नींद आती थी. अभिजात्य वर्ग से संबंधित संज्ञा संज्ञाशून्य थी, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी.
नाम, पद, प्रतिष्ठा जैसे ऐश्वर्य उस के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं थे जितना कि उसे आदिवासियों की बोली, उन के पहनावे, खानपान, बस्तर के कणकण में बसी जिंदादिली से मोह था. वह तो बादल का टुकड़ा बनना चाहती थी जो क्षण में इंद्रावती तो क्षण में केशकाल घूम कर आ जाए. जब वापस आए तो महुआ सी बौराती, गन्ने की पत्तियों की तरह सरसराती, शीशम, साल के जंगलों में बजती सीटी की आवाज की तरह ही गूंजती जाए, गूंजती जाए. इन सब से सराबोर उस की तरुणाई में घंटियों की ध्वनियां तो झंकृत होती थीं, साथ ही साथ, घुंघरुओं सा अल्हड़पन, खिलंदड़ी, फाकामस्ती जैसी स्वर लहरियां भी उस के व्यक्तित्व में समाहित थीं.
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